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सोमवार, 3 जुलाई 2023

जानी राज कुमार

🎂जन्म की तारीख और समय: 8 अक्तूबर 1926, लोरलाई, पाकिस्तान
⚰️मृत्यु की जगह और तारीख: 3 जुलाई 1996, मुम्बई
पत्नी: गायत्री राजकुमार (विवा. ?–1996)
बच्चे: पुरु राजकुमार, वास्तविकता, पाणिनि राजकुमार
माता-पिता: जगदीश्वर नाथ पंडित, धनराज रानी पंडित
भाई: जीवनलाल पंडित, आनंद बाबी पंडित, महिन्द्रपाल पंडित

हिन्दी सिनेमा जगत में यूं तो अपने दमदार अभिनय से कई सितारों ने दर्शकों के दिल पर राज किया लेकिन एक ऐसा भी सितारा हुआ, जिसे सिर्फ दर्शकों ने ही नहीं बल्कि पूरी फ़िल्म इंडस्ट्री ने भी 'राजकुमार' माना और वह थे संवाद अदायगी के बेताज बादशाह कुलभूषण पंडित उर्फ राजकुमार।
हिन्दी सिनेमा जगत में यूं तो अपने दमदार अभिनय से कई सितारों ने दर्शकों के दिल पर राज किया लेकिन एक ऐसा भी सितारा हुआ, जिसे सिर्फ दर्शकों ने ही नहीं बल्कि पूरी फ़िल्म इंडस्ट्री ने भी 'राजकुमार' माना और वह थे संवाद अदायगी के बेताज बादशाह कुलभूषण पंडित उर्फ राजकुमार।         

पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में 8 अक्टूबर 1926 को जन्मे राजकुमार स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद  मुंबई के माहिम थाने में सब इंस्पेक्टर के रूप में काम करने लगे। 
एक दिन रात में गश्त के दौरान एक सिपाही ने राजकुमार से कहा कि हजूर आप रंग-ढंग और कद-काठी में किसी हीरो से कम नहीं है। फ़िल्मों में यदि आप हीरो बन जायें तो लाखों दिलों पर राज कर सकते हैं और राजकुमार को सिपाही की यह बात जंच गयी।         

राजकुमार मुंबई के जिस थाने मे कार्यरत थे। वहां अक्सर फ़िल्म उद्योग से जुड़े लोगों का आना-जाना लगा रहता था। एक बार पुलिस स्टेशन में फ़िल्म निर्माता बलदेव दुबे कुछ जरूरी काम के लिये आये हुए थे। वह राजकुमार के बातचीत करने के अंदाज से काफी प्रभावित हुए और उन्होंने राजकुमार से अपनी फ़िल्म 'शाही बाजार' में अभिनेता के रूप में काम करने की पेशकश की। राजकुमार सिपाही की बात सुनकर पहले ही अभिनेता बनने का मन बना चुके थे। इसलिए उन्होंने तुरंत ही अपनी सब इंस्पेक्टर की नौकरी से इस्तीफा दे दिया और निर्माता की पेशकश स्वीकार कर ली।                

शाही बाजार को बनने में काफी समय लग गया और राजकुमार को अपना जीवनयापन करना भी मुश्किल हो गया। इसलिए उन्होंने वर्ष 1952 मे प्रदर्शित फ़िल्म 'रंगीली' में एक छोटी सी भूमिका स्वीकार कर ली। यह फ़िल्म सिनेमा घरों में कब लगी और कब चली गयी। यह पता ही नहीं चला। इस बीच उनकी फ़िल्म 'शाही बाजार' भी प्रदर्शित हुई। जो बॉक्स ऑफिस पर औंधे मुंह गिरी।

शाही बाजार की असफलता के बाद राजकुमार के तमाम रिश्तेदार यह कहने लगे कि तुम्हारा चेहरा फ़िल्म के लिये उपयुक्त नहीं है। और कुछ लोग कहने लगे कि तुम खलनायक बन सकते हो। वर्ष 1952 से 1957 तक राजकुमार फ़िल्म इंडस्ट्री में अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष करते रहे।         

'रंगीली' के बाद उन्हें जो भी भूमिका मिली राजकुमार उसे स्वीकार करते चले गए। इस बीच उन्होंने 'अनमोल' 'सहारा', 'अवसर', 'घमंड', 'नीलमणि' और 'कृष्ण सुदामा' जैसी कई फ़िल्मों में अभिनय किया लेकिन इनमें से कोई भी फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं हुई।             
वर्ष 1957 में प्रदर्शित महबूब ख़ान की फ़िल्म मदर इंडिया में राज कुमार गांव के एक किसान की छोटी सी भूमिका में दिखाई दिए। हालांकि यह फ़िल्म पूरी तरह अभिनेत्री नरगिस पर केन्द्रित थी फिर भी राज कुमार अपनी छोटी सी भूमिका में अपने अभिनय की छाप छोड़ने में कामयाब रहे। इस फ़िल्म में उनके दमदार अभिनय के लिए उन्हें अंतर्राष्ट्रीय ख्याति भी मिली और फ़िल्म की सफलता के बाद राज कुमार बतौर अभिनेता फ़िल्म इंडस्ट्री में स्थापित हो गए।

फ़िल्मों में मिली कामयाबी

वर्ष 1959 में प्रदर्शित फ़िल्म 'पैग़ाम' में उनके सामने हिन्दी फ़िल्म जगत के अभिनय सम्राट दिलीप कुमार थे लेकिन राज कुमार ने यहाँ भी अपनी सशक्त भूमिका के ज़रिये दर्शकों की वाहवाही लूटने में सफल रहे। इसके बाद राज कुमार 'दिल अपना और प्रीत पराई-1960', 'घराना- 1961', 'गोदान- 1963', 'दिल एक मंदिर- 1964', 'दूज का चांद- 1964' जैसी फ़िल्मों में मिली कामयाबी के ज़रिये राज कुमार दर्शको के बीच अपने अभिनय की धाक जमाते हुए ऐसी स्थिति में पहुँच गये जहाँ वह फ़िल्म में अपनी भूमिका स्वयं चुन सकते थे। वर्ष 1965 में प्रदर्शित फ़िल्म काजल की जबर्दस्त कामयाबी के बाद राज कुमार बतौर अभिनेता अपनी अलग पहचान बना ली। वर्ष 1965 बी.आर.चोपड़ा की फ़िल्म वक़्त में अपने लाजवाब अभिनय से वह एक बार फिर से अपनी ओर दर्शक का ध्यान आकर्षित करने में सफल रहे। फ़िल्म वक़्त में राज कुमार का बोला गया एक संवाद "चिनाय सेठ जिनके घर शीशे के बने होते है वो दूसरों पे पत्थर नहीं फेंका करते या फिर चिनाय सेठ ये छुरी बच्चों के खेलने की चीज़ नहीं हाथ कट जाये तो ख़ून निकल आता है" दर्शकों के बीच काफ़ी लोकप्रिय हुआ। फ़िल्म वक़्त की कामयाबी से राज कुमार शोहरत की बुंलदियों पर जा पहुँचे। ऐसी स्थिति जब किसी अभिनेता के सामने आती है तो वह मनमानी करने लगता है और ख्याति छा जाने की उसकी प्रवृति बढ़ती जाती है और जल्द ही वह किसी ख़ास इमेज में भी बंध जाता है। लेकिन राज कुमार कभी भी किसी ख़ास इमेज में नहीं बंधे इसलिये अपनी इन फ़िल्मो की कामयाबी के बाद भी उन्होंने 'हमराज़- 1967', 'नीलकमल- 1968', 'मेरे हूजूर- 1968', 'हीर रांझा- 1970' और 'पाकीज़ा- 1971' में रूमानी भूमिका भी स्वीकार की जो उनके फ़िल्मी चरित्र से मेल नहीं खाती थी इसके बावजूद भी राज कुमार यहाँ दर्शकों का दिल जीतने में सफल रहे।

वर्ष 1978 में प्रदर्शित फ़िल्म कर्मयोगी में राज कुमार के अभिनय और विविधता के नए आयाम दर्शकों को देखने को मिले। इस फ़िल्म में उन्होंने दो अलग-अलग भूमिकाओं में अपने अभिनय की छाप छोड़ी। अभिनय में एकरुपता से बचने और स्वयं को चरित्र अभिनेता के रूप में भी स्थापित करने के लिए राज कुमार ने अपने को विभिन्न भूमिकाओं में पेश किया। इस क्रम में वर्ष 1980 में प्रदर्शित फ़िल्म बुलंदी में वह चरित्र भूमिका निभाने से भी नहीं हिचके और इस फ़िल्म के जरिए भी उन्होंने दर्शको का मन मोहे रखा। इसके बाद राज कुमार ने 'कुदरत- 1981', 'धर्मकांटा- 1982', 'शरारा- 1984', 'राजतिलक- 1984', 'एक नयी पहेली- 1984', 'मरते दम तक- 1987', 'सूर्या- 1989', 'जंगबाज- 1989', 'पुलिस पब्लिक- 1990' जैसी कई सुपरहिट फ़िल्मों के ज़रिये दर्शको के दिल पर राज किया।

वर्ष 1991 में प्रदर्शित फ़िल्म 'सौदागर' में राजकुमार के अभिनय के नए आयाम देखने को मिले। सुभाष घई की निर्मित इस फ़िल्म में राजकुमार 1959 में प्रदर्शित फ़िल्म 'पैगाम' के बाद दूसरी बार दिलीप कुमार के सामने थे और अभिनय की दुनिया के इन दोनों महारथियों का टकराव देखने लायक था।

नब्बे के दशक में राज कुमार ने फ़िल्मों मे काम करना काफ़ी कम कर दिया। इस दौरान राज कुमार की 'तिरंगा- 1992', 'पुलिस और मुजरिम इंसानियत के देवता- 1993', 'बेताज बादशाह- 1994', 'जवाब- 1995', 'गॉड और गन' जैसी फ़िल्में प्रदर्शित हुई। नितांत अकेले रहने वाले राज कुमार ने शायद यह महसूस कर लिया था कि मौत उनके काफ़ी क़रीब है इसीलिए अपने पुत्र पुरू राज कुमार को उन्होंने अपने पास बुला लिया और कहा, "देखो मौत और ज़िंदगी इंसान का निजी मामला होता है। मेरी मौत के बारे में मेरे मित्र चेतन आनंद के अलावा और किसी को नहीं बताना। मेरा अंतिम संस्कार करने के बाद ही फ़िल्म उद्योग को सूचित करना।"

राजकुमार बेहद मुंहफट आदमी थे। जो दिल में आता था, उसे शब्दों का बाण बनाकर सामने वाले पर दाग देते थे। ये बात तो सोचते भी नहीं थे कि सामने वाले को इसका बुरा लगेगा या नहीं। पेश हैं कुछ ऐसे किस्से, जो बॉलीवुड में बहुत मशहूर हैं। ये कितने सही हैं या गलत, ये तो हम नहीं बता सकते, लेकिन इन्हें खूब चटखारे लेकर सुनाया गया।

राजकुमार और गोविंदा एक फिल्म की शूटिंग कर रहे थे। गोविंदा झकाझक शर्ट पहने हुए राजकुमार के साथ शूटिंग खत्म होने के बाद वक्त बिता रहे थे।। राजकुमार ने गोविंदा से कहा यार तुम्हारी शर्ट बहुत शानदार है। चीची इतने बड़े आर्टिस्ट की यह बात सुनकर बहुत खुश हो गए। उन्होंने कहा कि सर आपको यह शर्ट पसंद आ रही है तो आप रख लीजिए। राजकुमार ने गोविंदा से शर्ट ले ली। गोविंदा खुश हुए कि राजकुमार उनकी शर्ट पहनेंगे। दो दिन चीची ने देखा कि राजकुमार ने उस शर्ट का एक रुमाल बनवाकर अपनी जेब में रखा हुआ है।

एक पार्टी में संगीतकार बप्पी अक्खड़ राजकुमार से मिले। अपनी आदत के मुताबिक बप्पी ढेर सारे सोने से लदे हुए थे। बप्पी को राजकुमार ने ऊपर से नीचे देखा और फिर कहा वाह, शानदार। एक से एक गहने पहने हो, सिर्फ मंगलसूत्र की कमी रह गई है। बप्पी का मुंह खुला का खुला ही रह गया होगा।

जीनत अमान फिल्म इंडस्ट्री में फेमस हो गई थी। दम मारो दम गाना धूम मचा चुका था। फिल्म निर्माता अपनी फिल्म में जीनत को साइन करने के लिए मरे जा रहे थे। एक पार्टी में जीनत की मुलाकात राजकुमार से हुई। जीनत को लगा तारीफ के दो-चार शब्द राजकुमार जैसे कलाकार से सुनने को मिलेगी। जीनत को राजकुमार ने देखा और कहा कि तुम इतनी सुंदर हो, फिल्मों में कोशिश क्यों नहीं करती। अब ये बात सुनकर जीनत का क्या हाल हुआ होगा, समझा ही जा सकता है।

फ़िल्मी दुनिया के सरताज अभिनेता राजकुमार 3 जुलाई 1996 में के दिन हमें छोड़कर चले गए थे। लेकिन राजकुमार की एक्टिंग स्टाईल, उनके सफेद जूते और उनके डायलॉग आज तक दर्शकों के जेहन में जिंदा हैं। फ़िल्म पाकीज़ा में राज कुमार का बोला गया एक संवाद “आपके पांव देखे बहुत हसीन हैं इन्हें ज़मीन पर मत उतारियेगा मैले हो जायेगें” इस क़दर लोकप्रिय हुआ कि लोग राज कुमार की आवाज़ की नक़्ल करने लगे। इसी प्रकार-

चिनॉय सेठ, जिनके घर शीशे के बने होते हैं वो दूसरों पर पत्थर नहीं फेंकते। फ़िल्म 'वक्त' 

आपके पैर बहुत खूबसूरत हैं। इन्हें ज़मीन पर मत रखिए, मैले हो जाएंगे। फ़िल्म 'पाकीजा'

हम तुम्हें मारेंगे और जरूर मारेंगे। लेकिन वह वक्त भी हमारा होगा। बंदूक भी हमारी होगी और गोली भी हमारी होगी। फ़िल्म 'सौदागर'

काश कि तुमने हमे आवाज दी होती तो हम मौत की नींद से भी उठकर चले आते। फ़िल्म 'सौदागर'

हमारी जुबान भी हमारी गोली की तरह है। दुश्मन से सीधी बात करती है। फ़िल्म 'तिरंगा'

हम आंखो से सुरमा नहीं चुराते। हम आंखें ही चुरा लेते हैं। फ़िल्म 'तिरंगा'

हम तुम्हें वह मौत देंगे जो न तो किसी कानून की किताब में लिखी होगी और न ही किसी मुजरिम ने सोची होगी। फ़िल्म 'तिरंगा'

दादा तो इस दुनिया में दो ही हैं। एक ऊपर वाला और दूसरा मैं। फ़िल्म 'मरते दम तक' 

हम कुत्तों से बात नहीं करते। 'मरते दम तक'

बाजार के किसी सड़क छाप दर्जी को बुलाकर उसे अपने कफन का नाप दे दो। 'मरते दम तक' 

हम तुम्हें ऐसी मौत मारेंगे कि तुम्हारी आने वाली नस्लों की नींद भी उस मौत को सोचकर उड़ जाएगी। फ़िल्म 'मरते दम तक'
अपने संजीदा अभिनय से लगभग चार दशक तक दर्शकों के दिल पर राज करने वाले महान अभिनेता राज कुमार 3 जुलाई 1996 के दिन इस दुनिया को अलविदा कह गए

कवल शर्मा बॉलीवुड फ़िल्म निर्देशक , निर्माता

🎂जन्म3 जुलाई 1959

कवल शर्मा बॉलीवुड फ़िल्म निर्देशक , निर्माता
कवल शर्मा बॉलीवुड फिल्म इंडस्ट्री के जाने-माने डायरेक्टर हैं। उनका जन्म 3 जुलाई 1959 को हुआ था और उनकी उम्र 58 साल है। वह एक सफल निर्देशक होने के साथ-साथ एक सफल निर्माता भी हैं। उन्होंने अभिनेत्री रोशनी से शादी की है जिन्होंने 'जीने नहीं दूंगा' और 'समुंदर' जैसी फिल्मों से शुरुआत की थी। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत साल 1980 में फिल्म 'बदला और बलिदान' से की थी। तब से वह इंडस्ट्री के सबसे प्रमुख निर्देशकों में से एक बन गए। उन्होंने ज्यादातर सुपरस्टार के साथ काम कियामिथुन चक्रवर्तीउनकी फिल्मों के लिए और उन सभी को दर्शकों ने सराहा।

उनकी कुछ फिल्में हैं 'पाप की कमाई', 'मालामाल', 'हीरा लाल पन्ना लाल', 'जीते हैं हम शान से' आदि। कवल की प्रतिभा सिर्फ फिल्मों के निर्देशन तक ही सीमित नहीं है, वह एक अच्छे सहायक भी थे। निर्देशक, संपादक और उन्होंने फिल्म 'हीरा लाल पन्ना लाल' में एक गाने के लिए अपनी आवाज भी दी। अच्छी तरह से पहचाने जाने वाले कवल ने अपने युग के सभी मेगास्टार जैसे संगीता बजलानी, मिथुन चक्रवर्ती, गोविंदा आहूजा, संजय दत्ता आदि के साथ काम किया है। अपनी फिल्म के बाद, शर्मा ने फिल्म, उद्योग से एक लंबा ब्रेक लिया लेकिन उन्होंने वापसी की। साल 2012 में उनकी फिल्म दिल्ली आई आई जैसे स्टार्स ने अभिनय किया थाशक्ति कपूर,राजू खेर,राकेश बेदी,नितिन गुरबानी, वगैरह

बंकिम पाठक (बंकिम प्रवीणचंद्र पाठक)

*🎂जन्म 3 जुलाई 1948*

बंकिम पाठक (बंकिम प्रवीणचंद्र पाठक) का जन्म 3 जुलाई 1948 को अहमदाबाद में हुआ था। उनके पिता भी एक प्रसिद्ध लोक गायक थे। बंकिम पाठक बचपन से ही अपने पिता से बहुत प्रेरित थे। स्कूल के दिनों में उन्हें उनकी प्रिंसिपल श्रीमती जयाबेन पटेल का भी समर्थन प्राप्त था। वह हमेशा उसे स्कूल में दैनिक प्रार्थना और अन्य छोटे कार्यक्रमों में गाने के लिए प्रोत्साहित करती रहती थी। अपना स्कूल पूरा करने के बाद उन्होंने सेंट जेवियर्स कॉलेज में दाखिला लिया और वर्ष 1969 में बीए के साथ स्नातक की उपाधि प्राप्त की। अपने कॉलेज जीवन के 1966 से 1969 के बीच वह लगभग सभी समारोहों में अपने पसंदीदा गायक मोहम्मद रफ़ी का गाना जरूर गाते थे। वह अपने दोस्तों और सामाजिक दायरे में "रफ़ी की आवाज़" के रूप में जाने जाते थे।
बंकिम पाठक ने संगीत की प्राथमिक शिक्षा श्री नवीनभाई शाह और श्री कृष्णकांत पारिख (रेडियो कलाकार) से ली। लेकिन इसके बाद उन्होंने प्रो से बुनियादी आवाज सांस्कृतिक प्रशिक्षण लिया। सुधीर खांडेकर और सच्ची आवाज के साथ पले-बढ़े- आज बंकिम पाठक सचमुच कह रहे हैं कि उनका पूरा उत्थान प्रो. सुधीर खांडेकर और श्री शरद खांडेकर (ऑर्केस्ट्रा खांडेकर ब्रदर्स)।

वर्ष 1969 में "विसारता सूर" फेम श्री अंबरीश पारिख ने बंकिम पाठक को अपने बैनर में एक पेशेवर गायक के रूप में पहला ब्रेक दिया। वर्ष 1976 से 1980 तक उन्होंने एक प्रमुख गायक के रूप में खांडेकर ब्रदर्स ऑर्केस्ट्रा के साथ प्रदर्शन करना शुरू किया और वह अधिक अनुभवी गायक बन गये।

लेकिन कहानी अब शुरू होती है... 8 अप्रैल, 1980 को, जयशंकर सुंदरी हॉल, अहमदाबाद - बंकिम पाठक ने "बंकिम-अनिला कॉन्सर्ट" के बैनर तले महिला गायिका अनिला गोहिल के साथ अपना पहला वन मैन शो प्रस्तुत किया। कार्यक्रम को सभी संगीत प्रेमियों और श्री मोहम्मद रफ़ी के प्रशंसकों से अविस्मरणीय प्रतिक्रिया मिली। अन्य शहरों की जनता की मांग पर सूरत, नवसारी और बड़ौदा में भी कई शो किए गए और बंकिम पाठक ने रफ़ी की आवाज़ के रूप में अपनी असली पहचान बनाई।

31 जुलाई, 1980 – मोहम्मद रफ़ी हमारे बीच से चले गये। सभी संगीत प्रेमी हैरान रह गए. रफ़ी साहब की आवाज़ के बिना वे बहुत अकेला और उदास महसूस करते थे। जनवरी, 1981 में रफ़ी साब की मृत्यु के ठीक छह महीने बाद बंकिम पाठक ने अपना खुद का शीर्षक - "एक याद रफ़ी के बाद" (अनिला गोहिल के साथ बंकिम पाठक नाइट) शुरू किया और पूरे भारत में प्रदर्शन किया और रफ़ी साब के दिल में अपनी आदर्श जगह बनाई। प्रशंसकों और उन्हें एहसास कराएं कि वे अकेले नहीं हैं, वे फिर से रफ़ी साहब की आवाज़ का आनंद ले सकते हैं - बंकिम पाठक के माध्यम से।

बंकिम पाठक ने अपना पहला विदेश दौरा मई 1981 में यूके में किया। इस दौरे में उन्होंने "एक याद रफ़ी के बाद" के 10 सफल शो किए। चूंकि 1981 विकलांगों का वर्ष है और बंकिम पाठक स्वयं एक विकलांग व्यक्ति हैं, उन्होंने इसके लिए एक चैरिटी शो की व्यवस्था की और 33,000 रुपये (लगभग 6,60,000 रुपये) एकत्र कर सेंट मेरी चिल्ड्रेन हॉस्पिटल, लंदन को दिए। इसकी सराहना पूरे ब्रिटेन और भारत में हुई। इस क्रमिक दौरे के बाद बंकिम पाठक ने दुनिया भर में प्रदर्शन किया। आज अपने अधिकांश विदेशी दौरों में वह विकलांगों के लिए एक चैरिटी शो देते हैं।

रेट्रो-02बंकिम पाठक उस प्रोत्साहन को कभी नहीं भूले जो उनके पिता, उनकी पत्नी, उनके परिवार के सदस्यों-दोस्तों ने दिया था। वह प्रो के भी विशेष आभारी थे। सुधीर खांडेकर और श्री शरद खांडेकर (ऑर्केस्ट्रा खांडेकर ब्रदर्स), श्री महेश कनोडिया और श्री नरेश कनोडिया (महेश कुमार एंड पार्टी), उनके आयोजक श्री महेंद्र शाह (सूरत) और वे सभी जो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से उनकी सफलता में योगदान करते हैं।

आज तक "एक याद रफ़ी के बाद" गुजरात, राजस्थान और महाराष्ट्र के लगभग सभी मुख्य केंद्रों सहित पूरे देश में 3500 से अधिक बार प्रदर्शन किया जा चुका है। प्रमुख शहरों की बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ, सरकारी क्षेत्र और लायंस क्लब, रोटरी क्लब, जैन सोशल ग्रुप जैसे अंतर्राष्ट्रीय संगठन हमेशा बंकिम पाठक के लाइव कॉन्सर्ट की व्यवस्था करने को प्राथमिकता देते हैं।

बंकिम पाठक ने गुजरात और महाराष्ट्र की 80 से अधिक प्रसिद्ध महिला गायकों के साथ प्रदर्शन किया है। उन्होंने सबसे ज्यादा गाने अनिला गोहिल के साथ और दूसरे सबसे ज्यादा गाने दक्षा गोहिल के साथ गाए। फिलहाल दक्षा गोहिल 1981 से उनके ग्रुप की प्रमुख महिला गायिका हैं।

आज अहमदाबाद, सूरत, मुंबई, मद्रास, बेंगलुरु, कलकत्ता और पुणे में लाखों संगीत प्रेमी हैं - जो रफी साब के सदाबहार गीतों का आनंद लेने के लिए बंकिम पाठक के लाइव कॉन्सर्ट का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं।

भारती

🎂03 जुलाई
भारती सिंह हिंदी और पंजाबी इंडस्ट्री की मशहूर कॉमेडियन और एक्ट्रेस हैं। उनका जन्म अम्रिस्टार में हुआ था। साथकपिल शर्मा वह भारतीय टीवी जगत में कॉमेडी का पर्याय बन गई हैं। वह पहली बार तब सुर्खियों में आईं जब उन्होंने स्टार वन पर "द ग्रेट इंडियन लाफ्टर चैलेंज (सीजन 4)" में उपविजेता स्थान हासिल किया।

हेराल्टर एगो "लल्ली" आज भी दर्शकों के मन में बसा हुआ है। इससे भारती के लिए गेट खुल गया और उसके बाद उनके लिए कोई नहीं रुका। वह भारतीय टीवी की निर्विवाद कॉमेडी क्वीन हैं। यदि भारती सिंह का कोई आइटम शामिल न हो तो मूवी पुरस्कार अधूरे हैं। वह किसी भी अवॉर्ड फंक्शन में भीड़ का मनोरंजन करने के लिए हमेशा मौजूद रहती हैं। वह भारतीय टीवी उद्योग की सबसे अधिक मांग वाली महिला बन गई हैं।

अमृतसर में जन्मे यह कॉमेडियन कॉमेडी सर्कस की 2010 श्रृंखला में एक प्रतिभागी के रूप में दिखाई दिए हैं। दरअसल वह कॉमेडी सर्कस के सभी संस्करणों में नजर आ चुकी हैं। कॉमेडी सर्कस सीरीज में सिद्धार्थ जाधव के साथ उनकी जोड़ी मजेदार थी। लोग उन्हें स्टेज पर देखकर खूब हंसते थे. उन्होंने स्टार प्लस सिटकॉम में एक हास्य भूमिका निभाई।प्यार में ट्विस्टऔर बाद में सेलिब्रिटी डांस रियलिटी शो, "झलक दिखला जा (सीजन 5)" में एक प्रतियोगी के रूप में भाग लिया। हालांकि वह भारी-भरकम दिखती हैं लेकिन उन्होंने प्रतियोगिता में बहुत अच्छा डांस किया.

उन्होंने "एक नूर" (2011), "जैसी पंजाबी और हिंदी फिल्मों में भी अभिनय किया है।"खिलाड़ी 786” (2012), “जट्ट एंड जूलियट 2” (2013)-पंजाबी। उन्होंने भारतीय टीवी उद्योग में हास्य कलाकारों की स्थिति को फिर से स्थापित किया है और भारत में कई हास्य कलाकारों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गई हैं। हमेशा कहा जाता है कि लोगों को हंसाना दुनिया का सबसे मुश्किल काम है लेकिन भारती इस काम को बड़ी आसानी से कर रही हैं। हम उनकी आगामी परियोजनाओं और भविष्य के लिए शुभकामनाएं देते हैं।

 

इस जीवनी का दूसरा संस्करण...

भारती के नाम से मशहूर भारती सिंह का जन्म 3 जुलाई 1986 को हुआ था। उनका पालन-पोषण अमृतसर में एक अकेली मां ने किया था। भारती अपनी कॉमेडी और एक्टिंग के लिए जानी जाती हैं। वह शुरुआत में स्टैंड-अप कॉमेडी शो "ग्रेट इंडियन लाफ्टर चैलेंज सीजन 4" में एक प्रतियोगी के रूप में दिखाई दीं। वह शो में रनरअप रहीं। शो के दौरान उनका किरदार 'लल्ली' काफी मशहूर हुआ और आज भी लोकप्रिय है. टेलीविजन पर डेब्यू के बाद भारती ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और आगे बढ़ती गईं।

बाद में, भारती को "कॉमेडी सर्कस" और इसके विभिन्न सीज़न में देखा गया। इन सीरीज में उन्होंने कॉमेडी में अपने विभिन्न पहलुओं को प्रदर्शित किया। उन्होंने सोनी टीवी पर "कॉमेडी सर्कस" में जादू, संगीत और बहुत कुछ शामिल करके अपनी कॉमेडी के साथ प्रयोग किया। 

भारती "डांस रियलिटी शो" में एक प्रतियोगी भी थीं।झलक दिखला जा'''' कलर्स टीवी पर प्रसारित हुआ। इस शो के दौरान शो मेकर्स और उनके बीच कुछ विवाद हो गया था. उन्होंने दावा किया कि उन्होंने शो में डांस करने के अलावा और भी बहुत कुछ किया है। हालाँकि, भारती विजेता नहीं रहीं, लेकिन उन्होंने फिर से दर्शकों के सामने अपना अनदेखा पक्ष रखा और सभी का मनोरंजन किया। वह अब अपने डांस के लिए भी जानी जाती हैं।

भारती ने स्टार प्लस पर प्रसारित धारावाहिक "प्यार में ट्विस्ट" में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। इसके अलावा वह डांस शो में गेस्ट के तौर पर भी नजर आई थीं।नच बलिएस्टार प्लस पर। भारती ने कॉमेडियन कृष्णा के साथ "" नामक एक कॉमेडी श्रृंखला की मेजबानी की।कॉमेडी कक्षाएंलाइफ ओके पर प्रसारित। वर्तमान में, वह कलर्स टीवी पर "कॉमेडी नाइट्स बचाओ" और सोनी मैक्स टीवी पर फिलर्स की मेजबानी कर रही हैं।

भारती सिर्फ टेलीविजन पर ही नहीं बल्कि क्षेत्रीय फिल्मों में भी नजर आती हैं। उन्होंने निर्देशित "एक नूर" जैसी कई पंजाबी फिल्मों में हास्य भूमिकाएँ निभाईंमुकेश गौतम, जोनिता दादा अभिनीत ''यमले जट यमले'' और सेवी डडवालऔर "जट्ट एंड जूलियट" द्वारा निर्देशितअनुराग सिंह. उन्होंने कन्नड़ फिल्म "रंगन शैली” और हिंदी फिल्म “खिलाड़ी 786”।

भारती को टेलीविजन पर उनकी कॉमेडी भूमिकाओं के लिए "न्यू टैलेंट अवार्ड", "इंडियन टेली अवार्ड्स", "पीपुल्स च्वाइस अवार्ड" और "लायंस गोल्ड अवार्ड" जैसे कई पुरस्कार मिले।

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...