31दिसंबर लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
31दिसंबर लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 31 दिसंबर 2023

राज बराड़

राज बराड़ 
#03jan
#31dic 
🎂03 जनवरी 1972, 
मोगा
⚰️31 दिसंबर 2016, गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज और हॉस्पिटल, चण्डीगढ़

पत्नी: बलविंदर कौर (विवा. ?–2016)
बच्चे: Savitaj Brar, Joshnoor Brar

एक भारतीय गायक, अभिनेता, गीतकार और संगीत निर्देशक थे जिन्होंने पंजाबी सिनेमा में काम किया था। वह अपने 2008 के हिट एल्बम रीबर्थ के लिए सबसे ज्यादा जाने जाते थे।
एक भारतीय गायक, अभिनेता, गीतकार और संगीत निर्देशक थे जिन्होंने पंजाबी सिनेमा में काम किया । उन्हें उनके 2008 के हिट एल्बम रीबर्थ के लिए सबसे ज्यादा जाना जाता था । उन्होंने 2010 की फिल्म जवानी जिंदाबाद से अपने अभिनय की शुरुआत की , और उन्होंने अपनी मृत्यु से पहले आखिरी फिल्म आम आदमी की शूटिंग पूरी की थी , जो 2018 में रिलीज हुई थी।
किसी ने नहीं सोचा था कि पंजाबी इंडस्ट्री को उंचाईयों पर ले जाने वालों में से एक राज बराड़ अपने जन्मदिन से दो दिन पहले दुनिया को अलविदा कह जाएंगे।पंजाब के प्रसिद्ध गायक राज बराड़ का शनिवार दोपहर चंडीगढ़ के सेक्टर-32 स्थित जीएमसीएच में निधन हो गया। बराड़ के निधन पर मनोरंजन जगत से जुड़े लोगों में शोक की लहर दौड़ गई। वह 44 साल के थे।राज बराड़ ने कई बार अपनी शराब पीने की आदत के बारे में सार्वजनिक रूप से भी बताया.
📽️
2010 जवानी जिंदाबाद
2013 मूड में जाट
2014 पॉलीवुड में पुलिस
2018 आम आदमी
विशेष
राज बरार की मृत्यु के बाद उनके कई गाने रिलीज़ नहीं हुए। इसलिए, बंटी बैंस और उनकी बेटी स्वीटाज बराड़ ने उस गाने को रिलीज़ करने का फैसला किया। अप्रकाशित गीतों में से एक चंडीगढ़ ड्रॉपआउट्स है जो जुलाई 2021 में रिलीज़ हुऐ.

मुश्ताक

मुश्ताक
#31dic 
🎂31 दिसंबर 1969

बैहर, मध्य प्रदेश , भारत
व्यवसायों अभिनेता हास्य_अभिनेता
सक्रिय वर्ष

स्वागत
टेलीविजन
हम हैं राही प्यार केजोड़ी नंबर 1स्वागत
जीवनसाथी सलमा खान
बच्चे 2
बचपन में ही मनोरंजन की दुनिया से जुड़ गए थे मुशताक खान? मायानगरी आकर ऐसे काटे संघर्ष के दिन फुट पाथ पर गुजरी थी रातें

मुशताक बहुत कम उम्र में ही मनोरंजन जगत से जुड़ गए। रिपोर्ट्स के मुताबिक जब वे सातवीं में थे तो नाटकों में हिस्सा लेने लगे। इसके अलावा बचपन में उन्होंने रामलीला में काम किया। इसके बाद वह बड़ा एक्टर बनने का सपना लेकर मायानगरी चले आए।
मुशताक खान का जन्म 31 दिसम्बर 1959 को बालाघाट मध्य प्रदेश में हुआ। मुशताक ने कम उम्र से ही लोगों का मनोरंजन करना शुरू कर दिया। बचपन में इन्हे जब रामलीला में काम करने का मौका मिलता तो ये पूरी जान लगा दिया करते।
मुशताक के अभिनय कौशल को देख इनके कुछ दोस्तों और शिक्षकों ने इन्हें मायानगरी जाकर किस्मत आजमाने की सलाह दी। दोस्तों ने कहा, 'तुम जैसे अच्छे कलाकार को इस छोटी सी जगह में नहीं रहना चाहिए। बाहर निकलो, कुछ बड़ा करो।' मुशताक ने जब अपने घर में इस बात का जिक्र किया तो सभी ने विरोध किया। मुशताक से फैमिली बिजनेस से जुड़ने को कहा गया। एक तरफ मुशताक की आंखों में एक्टर बनने के सपने थे, दूसरी तरफ परिवार के लोग विरोध में खड़े थे। हालांकि, इस दौरान मुशताक के बड़े भाई ने उनका भरपूर साथ दिया और घरवालों को मनाकर इन्हें मुंबई भेजने का इंतजाम करवा दिया।
मायानगरी में मुशताक के पास रहने की कोई जगह नहीं थी तो वह रेलवे स्टेशन पर रात गुजारते और फुटपाथ पर सोते थे। इनके पास पैसे तो थे पर इतने नहीं कि रहना और खाना दोनों हो सके। महीनों इन्होंने इसी तरह गुजारे। इनका एक-एक दिन पहाड़ के समान गुजरता था। दिनभर मुश्ताक काम की तलाश में लोगों से मिलते, मगर सब किसी ना किसी बहाने से मना कर देते। जिन दोस्तों ने मुंबई आने की सलाह दी वे ही मजाक उड़ाने लगे। बाद में मुशताक खान थिएटर से जुड़ गए। वहीं एक दिन जब ये एक नाटक में काम कर रहे थे तो मशहूर फिल्म निर्माता इस्माइल श्रॉफ की नजर इन पर पड़ी। उन्हें इनका अभिनय पसन्द आया और इस तरह उन्होंने अपनी फिल्म 'थोड़ी सी बेवफाई' मे काम करने का ऑफर मुशताक को दिया। इस तरह मुशताक खान का फिल्मी सफर शुरू हुआ। 
📽️
अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है (1980) - लचर शॉपर 'जोन पिंटो' (स्मिता पाटिल) के साथ फ़्लर्ट करने की कोशिश कर रहा है
थोडिसी बेवफ़ाई (1980) - बीमार पत्नी के साथ काम करनेवाला - मुश्ताक
लाराज़ (1981) - एक कसाई के रूप में
सज़ाये मौत (1981) - अभिनेता
कालिया (1981) - राम दीन
विवेक (1985)
कांग्रेगेशन (1986) - बांके नवाब उर्फ ​​"अंजुमन"
अंगारे (1986) - मुस्ताक खान
कबज़ा (1988) - तिवारी
मैं आज़ाद हूँ (1989) - पांडे
आखिरी गुलाम (1989) - अभिनेता
आशिकी (1990) - रफू मास्टर - मुस्ताक खान
बाप नंबरी बेटा दस नंबरी (1990)- पुलिस इंस्पेक्टर
दिल है कि मानता नहीं (1991) - बस कंडक्टर
साथी (1991) - शेट्टी
सदक (1991) - दलाल
लक्ष्मणरेखा (1991) - दिलावर लाहौरी
ज़ुल्म की हुकुमत (1992) - प्रभाकर
धारावी (1992) - शंकर
सातवाँ आसमान (1992) - उस्मान भाई
एक लड़का एक लड़की (1992) - स्कूल टीचर
जुनून (1992) - आदिवासी भीम
अनाम (1992) - इंस्पेक्टर पीसी यादव
प्यार प्यार (1993) - राम सेवक गायतोंडे
आदमी (1993)
गुनाह (1993) - होटल मैनेजर
लुटेरे (1993) - जोशी
प्लेटफ़ॉर्म (1993) - अर्जुन
सर (1993) - कालू बा
हम हैं राही प्यार के (1993) - भगवती प्रसाद मिश्रा
गुमराह (1993) - बॉम्बे पुलिस इंस्पेक्टर
क्रांतिवीर (1994) - बब्बनराव देशमुख
गोपी किशन (1994) - पुलिस इंस्पेक्टर मिश्रा
नाराज़ (1994) - ज़फीर खान
राजा (1995) - बनवारीलाल सान्याल
मिलन (1995) - हवलदार शांताराम
गुनेघर (1995) - मौलवी
बाजी (1995) - जामदादे - सब इंस्पेक्टर
द डॉन (1995)-प्रजापति
सरहद: द बॉर्डर ऑफ़ क्राइम (1995) - मिस्टर लोबो
इंग्लिश बाबू देसी मेम (1996)
बंबई का बाबू (1996) - कमिश्नर - डीए चौहान
चाहत (1996) - वेटर - अन्ना
यश (1996) - शराफत अली
अग्नि प्रेम (1996)
अग्नि मोर्चा (1997)
अकेले हम अकेले तुम (1997) - वकील श्री भतीजा
मृत्युदाता (1997) - पुलिस इंस्पेक्टर दानापानी
लहू के दो रंग (1997) - पप्पू शिकारी
मिलिट्री राज (1998)-मंत्री छेदीलाल
मेजर साब (1998) - हनुमान प्रसाद
जब प्यार किसी से होता है (1998) - सिंह
राजाजी (फिल्म) (1999) - कालीचरण उर्फ ​​कड़वा
तेरी मोहब्बत के नाम (1999) - पुलिस कांस्टेबल प्यारेलाल
हेरा फेरी (2000) - देवी प्रसाद का नौकर
हमारा दिल आपके पास है (2000)
गदर एक प्रेम कथा (2001) - गुल खान
जोड़ी नंबर 1 - (2001) - कैसीनो मैनेजर डी कोस्टा
दाल: द गैंग (2001) - बनारसी
दिल ने फिर याद किया (2001 फ़िल्म)
तनवीर जैदी के साथ बे-लगाम (2002) पुलिसवाला
एक और एक ग्यारह (2003) इंस्पेक्टर बहादुर सिंह
30 डेज़ (2004) - हवलदार गंगाराम
मुझसे शादी करोगी (2004) - छुटकी बाबा
रहगुज़ार (2006) - परवेज़
सैंडविच (2006) - पोपटलाल
खल्लास: द बिगिनिंग ऑफ एंड (2007) - शिंदे
लाइफ में कभी-कभी (2007) - मोनिका का एजेंट
माई फ्रेंड गणेशा (2007)
वेलकम (2007) - बल्लू
इश्क हो गया मामू (2008) - शायर ए आजम
ब्लैक एंड व्हाइट (2008) - मोहनलाल अग्रवाल - विधायक
मेहबूबा (2008)
आपको कामयाबी मिले! (2008)-तरुण के महाप्रबंधक
एक विवाह... ऐसा भी (2008) - बस में सीटी बजाता हुआ
ओह, माई गॉड (2008) - इंस्पेक्टर राणा
आसमा: द स्काई इज़ द लिमिट (2009) - कमलेश पांडे
शॉर्टकट - द कॉन इज़ ऑन (2009) - गायत्री के पिता
आखिरी फैसला (2010) - रंजीत (मुश्ताक खान के रूप में)
वांटेड (2010) - पुलिस इंस्पेक्टर
माई फ्रेंड गणेशा 3 (2010) - शिवधर पांडुरंग कांबले
अपार्टमेंट: अपने जोखिम पर किराया (2010) - चौकीदार मिश्रा
वह लड़की पीले जूते में (2011)
शागिर्द (2011) - जेलर
रास्कल्स (2011) - उस्मान
राउडी राठौड़ (2012) - बाबाजी के सहायक
वंस अपॉन ए टाइम इन मुंबई दोबारा! -असलम (इमरान के पिता)
डी सैटरडे नाइट (2014)
दिल मांगे कुछ और (2014)
गुर्जर आंदोलन अधिकार की लड़ाई (2014) - मनोहर गुर्जर (गुर्जर नेता) (अरुण नागर द्वारा निर्देशित)
हॉन्टेड रूह (2015) - जितेंद्र सिंह द्वारा निर्देशित
बस एक चांस (2015) - कीर्तन पटेल द्वारा निर्देशित गुजराती फिल्म
वेलकम बैक (2015) - बल्लू
रोमियो और राधिका (2016) गुजराती फिल्म
मिस टीचर (2016) - जय प्रकाश द्वारा निर्देशित
निदेशक का अंतिम कट (2016)
जब ओबामा को ओसामा से प्यार था (2018)
बाला (2019) - वकील
डॉली किट्टी और वो चमकते सितारे (2020)
अतुल्य भारत (2020)
सीक्रेट पॉकेटमार (2021)
मरने से पहले (2022)
है तुझे सलाम इंडिया (2022)
सौराष्ट्र (2022)
गदर 2 (2023)
📺

ज़ी हॉरर शो आफत में गंगवा मयूरी पिता के रूप में
कुछ रंग प्यार के ऐसे भी - बलदेव त्रिपाठी (2016-17)
अदालत - झिलमिल "केडीज़ फ्रेंड" (2010-11)
चाचा चौधरी
टेढ़े मेढ़े सपने - (2001)
चमत्कार - एनडी तिवारी (1996)
देवता - (1999)
हम सब एक हैं - (1999) (एपिसोड 66)
भारत एक खोज (1988)....मियां बुवन एपिसोड 31- राणा सांगा , इब्राहिम लोधी और बाबर
वागले की दुनिया (1988)...मनोहर के रूप में- एपिसोड लैंडलॉर्ड
नुक्कड़ (1986)....प्रभाकर के रूप में- एपिसोड मिस्ट्री वुमन
बेलन वाली बहू (2018) प्रेमनाथ अवस्थी के रूप में
कुछ रंग प्यार के ऐसे भी सीजन 3 - बलदेव त्रिपाठी (2021)
हमने तो लूट लिया (2023)... एमएक्स प्लेयर फिल्म

🏆🥇

2002 इंडियन टेली अवार्ड्स
2017 लायंस गोल्ड अवार्ड्स

शनिवार, 21 अक्टूबर 2023

कादर ख़ान


कादर ख़ान
🎂जन्म 22 अक्तूबर, 1935 बलूचिस्तान, पाकिस्तान
⚰️मृत्यु 31 दिसम्बर 2018टोरंटो, कनाडा
अभिभावक पिता- अब्दुल रहमान ख़ान, माता- इकबाल बेगम
पति/पत्नी अज़रा ख़ान
संतान सरफ़राज़ ख़ान, शाहनवाज़ ख़ान और क्यूडस ख़ान
कर्म भूमि मुम्बई
कर्म-क्षेत्र संवाद लेखक, अध्यापक
मुख्य फ़िल्में 'बाप नंबरी बेटा दस नंबरी', 'सनम तेरी कसम', 'नौकर बीबी का', 'शरारा', 'कैदी', 'घर एक मंदिर', 'वतन के रखवाले', 'खुदगर्ज', 'ख़ून भरी मांग', 'आँखेंं', 'शतरंज', 'कुली नंबर 1', 'हीरो नंबर 1', 'दूल्हे राजा', 'राजा बाबू', 'चालबाज़' आदि।
शिक्षा स्नातकोत्तर
विद्यालय इस्माइल यूसुफ़ कॉलेज, मुम्बई, उस्मानिया विश्वविद्यालय
पुरस्कार-उपाधि फ़िल्मफेयर पुरस्कार सर्वश्रेष्ठ हास्य अभिनेता (बाप नंबरी बेटा दस नंबरी)
प्रसिद्धि अभिनेता
नागरिकता भारतीय
भाषा ज्ञान उर्दू, हिंदी, अंग्रेज़ी
अन्य जानकारी अमर अकबर एंथोनी, ख़ून पसीना, परवरिश, शालीमार, मुक्कदर का सिकंदर, सुहाग, याराना, लावारिस, सत्ते पे सत्ता, धर्मकांटा, कुली, शराबी आदि फ़िल्मों में संवाद लिखे।
भारतीय सिनेमा जगत् में एक ऐसे बहुआयामी कलाकार के तौर पर जाना जाता है, जिन्होंने सहनायक, संवाद लेखक, खलनायक, हास्य अभिनेता और चरित्र अभिनेता के तौर पर दर्शकों के बीच अपनी पहचान बनाई। खलनायक से लेकर हास्य अभिनेता तक हर किरदार में जान फूंक देने वाले कादर ख़ान अब तक 300 से ज्यादा फ़िल्मों में काम कर चुके हैं, लेकिन उनकी प्रतिभा यहीं नहीं थमती। वह 80 से अधिक लोकप्रिय फ़िल्मों के लिए संवाद लिखकर उस दिशा में भी अपना लोहा मनवा चुके हैं। कादर ख़ान के अभिनय की एक विशेषता यह है कि वह किसी भी तरह की भूमिका के लिए उपयुक्त हैं। फ़िल्म 'कुली' एवं 'वर्दी' में एक ‘क्रूर खलनायक’ की भूमिका हो या फिर ‘कर्ज़ चुकाना है’, ‘जैसी करनी वैसी भरनी’ फ़िल्म में भावपूर्ण अभिनय या फिर ‘बाप नंबरी बेटा दस नंबरी’ और ‘प्यार का देवता’ जैसी फ़िल्मों में हास्य अभिनय इन सभी चरित्रों में उनका कोई जवाब नहीं है।

जीवन परिचय
कादर ख़ान का जन्म 22 अक्टूबर, 1935 को बलूचिस्तान में हुआ था, जो अब पाकिस्तान का हिस्सा है। भारत पाक बंटवारे के बाद उनका परिवार भारत में बस गया। कादर ख़ान ने अपनी स्नातकोत्तर की पढ़ाई उस्मानिया विश्वविद्यालय से पूरी की। इसके बाद उन्होंने अरबी भाषा के प्रशिक्षण के लिये एक संस्थान की स्थापना करने का निर्णय लिया। कादर ख़ान ने अपने कैरियर की शुरुआत एक शिक्षक के तौर पर की। एक बार कॉलेज में हो रहे वार्षिक समारोह में कादर ख़ान को अभिनय करने का मौका मिला। इस समारोह में अभिनेता दिलीप कुमार ने कादर ख़ान के अभिनय से काफ़ी प्रभावित हुए और उन्हें अपनी फ़िल्म ‘सगीना’ में काम करने का प्रस्ताव दिया। यही कारण है कि कादर के अंदर एक शिक्षक, एक संवाद लेखक और एक अभिनेता तीनों एक साथ बसते हैं।

फ़िल्मी कैरियर
महान अभिनेता दिलीप कुमार ने कादर ख़ान को अपनी फ़िल्म ‘सगीना’ में काम करने का प्रस्ताव दिया। वर्ष 1974 में आई फ़िल्म ‘सगीना’ के बाद भी कादर ख़ान को काफ़ी संघर्ष करना पड़ा। इस दौरान उनकी ‘दिल दीवाना’, ‘बेनाम’, ‘उमर कैद’, ‘अनाड़ी’ और बैराग जैसी फ़िल्में प्रदर्शित हुई। लेकिन इन फ़िल्मों से उन्हें कुछ ख़ास फायदा नहीं पहुंचा। वर्ष 1977 में कादर ख़ान की 'खून पसीना' और 'परवरिश' जैसी फ़िल्में प्रदर्शित हुई। इन फ़िल्मों के जरिए वह कुछ हद तक अपनी पहचान बनाने में कामयाब हुए।

सफल फ़िल्में
फ़िल्म ‘खून पसीना’ और ‘परवरिश’ की सफलता के बाद कादर ख़ान को कई अच्छी फ़िल्मों के प्रस्ताव मिलने शुरू हो गए। जिनमें मुकद्दर का सिकंदर, मिस्टर नटवरलाल, सुहाग, अब्दुल्ला, दो और दो पांच, लूटमार, कुर्बानी, याराना, बुलंदी और नसीब जैसी बड़े बजट की फ़िल्में शामिल थी। इन फ़िल्मों की सफलता के बाद कादर ख़ान ने सफलता की नयी बुलंदियों को छुआ और बतौर खलनायक फ़िल्म इंडस्ट्री में स्थापित हो गए। वर्ष 1983 में प्रदर्शित फ़िल्म ‘कुली’ कादर ख़ान के करियर की सुपरहिट फ़िल्मों में शुमार की जाती है। मनमोहन देसाई के बैनर तले बनी इस फ़िल्म में अमिताभ बच्चन ने मुख्य भूमिका निभाई थी। फ़िल्म टिकट खिड़की पर सुपरहिट साबित हुयी। इसके साथ ही कादर ख़ान फ़िल्म इंडस्ट्री के चोटी के खलनायकों की फेहरिस्त में शामिल हो गए। वर्ष 1990 में प्रदर्शित फ़िल्म ‘बाप नंबरी बेटा दस नंबरी’ कादर ख़ान के सिने करियर की महत्त्वपूर्ण फ़िल्मों में से एक है। इस फ़िल्म में कादर ख़ान और शक्ति कपूर ने बाप और बेटे की भूमिका निभाई जो ठग बनकर दूसरों को धोखा दिया करते हैं। फ़िल्म में कादर ख़ान और शक्ति कपूर ने अपने कारनामों के जरिये दर्शकों को हंसाते-हंसाते लोटपोट कर दिया। फ़िल्म में अपने दमदार अभिनय के लिये कादर ख़ान फ़िल्मफेयर पुरस्कार से सम्मानित भी किए गए।

चरित्र अभिनेता
नब्बे के दशक में कादर ख़ान ने अपने अभिनय को एकरूपता से बचाने और स्वयं को चरित्र अभिनेता के रूप में स्थापित करने के लिए अपनी भूमिकाओं में परिवर्तन भी किया। इस क्रम में वर्ष 1992 में प्रदर्शित फ़िल्म ‘अंगार’ में उन्होंने अंडर वर्ल्ड डॉन जहांगीर ख़ान की भूमिका को रूपहले पर्दे पर साकार किया। दशक के अंतिम वर्षो में बतौर ख़लनायक कादर ख़ान की फ़िल्मों को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। इसके बाद कादर ख़ान ने हास्य अभिनेता के तौर पर भी काम करना शुरू कर दिया। इस क्रम में वर्ष 1998 में प्रदर्शित फ़िल्म ‘दूल्हे राजा’ में अभिनेता गोविंदा के साथ उनकी भूमिका दर्शकों के बीच काफ़ी पसंद की गयी।

प्रसिद्ध फ़िल्में
कादर ख़ान ने अपने सिने करियर में लगभग 300 फ़िल्मों में अभिनय किया है। उनकी अभिनीत फ़िल्मों में मुक्ति, ज्वालामुखी, मेरी आवाज सुनो, जमाने को दिख़ाना है, सनम तेरी कसम, नौकर बीबी का, शरारा, कैदी, घर एक मंदिर, गंगवा, जान जानी जर्नादन, घर द्वार, तबायफ़, पाताल भैरवी, इंसाफ़ की आवाज़, स्वर्ग से सुंदर, वतन के रखवाले, खुदगर्ज़, ख़ून भरी मांग, आँखेंं, शतरंज, कुली नंबर 1, हीरो नंबर 1, जुड़वा, बड़े मियां छोटे मियां, दूल्हे राजा, राजा बाबू, चालबाज़, हसीना मान जाएगी, फंटूश आदि।

शक्ति कपूर के साथ जोड़ी
कादर ख़ान के सिने करियर में उनकी जोड़ी अभिनेता शक्ति कपूर के साथ काफ़ी पसंद की गयी। इन दोनों अभिनेताओं ने अब तक लगभग 100 फ़िल्मों में एक साथ काम किया है। उनकी जोड़ी वाली महत्त्वपूर्ण फ़िल्मों में से कुछ इस प्रकार हैं- बाप नंबरी बेटा दस नंबरी, नसीब, लूटमार, हिम्मतवाला, महान, हैसियत, जस्टिस चौधरी, अक्लमंद, मकसद, मवाली, तोहफा, इंकलाब, कैदी, गिरफ्तार, घर संसार, धर्म अधिकारी, सिंहासन, सोने पे सुहागा, मास्टरजी, इंसानियत के दुश्मन, वक्त की आवाज़, जैसी करनी वैसी भरनी, नाचने वाले गाने वाले, राजा बाबू आदि।

संवाद लेखक
कादर ख़ान ने कई फ़िल्मों में संवाद लेखक के तौर पर भी काम किया है। इनमें खेल खेल में, रफूचक्कर, धरमवीर, अमर अकबर एंथोनी, ख़ून पसीना, परवरिश, शालीमार, मुक्कदर का सिकंदर, मिस्टर नटवरलाल, सुहाग, याराना, लावारिस, सत्ते पे सत्ता, देश प्रेमी, सनम तेरी कसम, धर्मकांटा, कुली, शराबी, गिरफ्तार, कर्मा, ख़ून भरी मांग, हत्या, हम, कुली नंबर वन, साजन चले ससुराल जैसी सुपरहिट फ़िल्में शामिल है।

अमिताभ को निर्देशित करने की अधूरी तमन्ना
कादर ख़ान की अमिताभ बच्चन को लेकर फ़िल्म बनाने की तमन्ना अब तक पूरी नहीं हो सकी। अभिनेता कादर ख़ान और अमिताभ बच्चन ने एक साथ कई फ़िल्में कीं। अदालत, सुहाग, मुकद्दर का सिकंदर, नसीब और कुली जैसी बेहद कामयाब फ़िल्मों में इन दोनों ने साथ काम किया। इसके अलावा कादर ख़ान ने अमर अकबर एंथनी, सत्ते पे सत्ता और शराबी जैसी फ़िल्मों के संवाद भी लिखे, लेकिन कादर ख़ान अमिताभ बच्चन को लेकर खुद एक फ़िल्म बनाना चाहते थे और उनकी ये तमन्ना अब तक पूरी नहीं हो सकी। कादर ने ये बात एक ख़ास बातचीत में बताई। उन्होंने कहा, मैं अमिताभ बच्चन, जया प्रदा और अमरीश पुरी को लेकर फ़िल्म 'जाहिल' बनाना चाहता था। उसका निर्देशन भी मैं खुद करना चाहता था लेकिन खुदा को शायद कुछ और ही मंजूर था। कादर ख़ान ने बताया कि इसके फौरन बाद फ़िल्म 'कुली' की शूटिंग के दौरान अमिताभ बच्चन को जबरदस्त चोट लग गई और फिर वो महीनों अस्पताल में भर्ती रहे। अमिताभ के अस्पताल से वापस आने के बाद फिर कादर ख़ान अपनी दूसरी फ़िल्मों में बहुत ज्यादा व्यस्त हो गए और इधर अमिताभ बच्चन राजनीति में आ गए। उसके बाद कादर ख़ान और अमिताभ की जुगलबंदी वाली ये फ़िल्म हमेशा के लिए डब्बाबंद हो गई। अमिताभ की तारीफ़ करते हुए कादर ख़ान कहते हैं, वो संपूर्ण कलाकार हैं, अल्लाह ने उनको अच्छी आवाज़, अच्छी जबान, अच्छी ऊंचाई और बोलती आंखों से नवाजा है।

कादर ख़ान कुछ सालों से फ़िल्मों से दूर हो गए थे। इसकी वजह बताते हुए वो कहते हैं, वक्त के साथ फ़िल्में भी बदल गई हैं। अब ऐसे दौर में मैं अपने आपको फिट नहीं पाता। मेरे लिए बदलते दौर के साथ खुद को बदलना संभव नहीं है, तो मैंने अपने आपको फ़िल्मों से अलग कर लिया। कादर ख़ान ने ये भी कहा कि मौजूदा दौर के कलाकारों की भाषा पर पकड़ नहीं है और ये बात उन्हें दुखी करती है। 70 के दशक में अमिताभ बच्चन की कुछ फ़िल्मों जैसे सुहाग, अमर अकबर एंथनी और मुकद्दर का सिकंदर में कादर ख़ान की कलम से लिखे संवाद काफ़ी मशहूर हुए, लेकिन कादर ख़ान को इस बात का दु:ख है कि उन फ़िल्मों में नायक जिस चालू मुंबइया भाषा का इस्तेमाल करता है वही बाद की फ़िल्मों की मुख्य भाषा बन गई और फिर धीरे-धीरे उसकी आड़ में फ़िल्मों की भाषा खराब होती चली गई। वो कुछ दोष अपने आपको भी देते हैं। कादर ख़ान ने 80 के दशक में जीतेंद्र, मिथुन और 90 के दशक में गोविंदा के साथ भी कई फ़िल्में कीं। वो अपने दौर को याद करते हुए भावुक हो जाते हैं। उनके मुताबिक़ असरानी, शक्ति कपूर, गोविंदा, जीतेंद्र और अरुणा ईरानी के साथ की गई उनकी कई फ़िल्में और इन कलाकारों के साथ बिताया वक्त उन्हें बहुत याद आता है। कादर ख़ान ने बताया कि ख़ासतौर पर वो असरानी के जबरदस्त प्रशंसक हैं, जिनके साथ उन्होंने कई फ़िल्में कीं। फिलहाल कादर ख़ान अपने बेटों के थिएटर ग्रुप और उनके प्ले में व्यस्त हैं। उनके बेटे सरफ़राज ख़ान और शाहनवाज ख़ान, अपने पिता के लिखे दो नाटकों का मंचन कर रहे हैं। इन नाटकों के नाम है मेहरबां कैसे-कैसे और लोकल ट्रेन। ये दोनों ही नाटक राजनीतिक व्यंग्य हैं।

निधन
कादर ख़ान के बेटे सरफ़राज़ ने बताया, ‘मेरे पिता हमें छोड़कर चले गए। लंबी बीमारी के बाद 31 दिसम्बर शाम छह बजे (कनाडाई समय) उनका निधन हो गया। वह दोपहर को कोमा में चले गए थे। वह पिछले 16-17 हफ्तों से अस्पताल में भर्ती थे।’ 81 वर्षीय कादर ख़ान लंबे समय से बीमार चल रहे थे। वह कनाडा के एक अस्पताल में भर्ती थे। उनके बेटे ने बताया कि अभिनेता का अंतिम संस्कार भी वहीं किया जाएगा।

सम्मान और पुरस्कार
फ़िल्मफेयर पुरस्कार सर्वश्रेष्ठ हास्य अभिनेता (फ़िल्म- बाप नंबरी बेटा दस नंबरी)
कादर ख़ान को 1991 को बेस्ट कॉमेडियन का और 2004 में बेस्ट सपोर्टिंग रोल का फिल्म फेयर मिल चुका है।
2013 में, कादर ख़ान को उनके फिल्मों में योगदान के लिए साहित्य शिरोमनी अवार्ड से नवाजा गया।

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...