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बुधवार, 3 जनवरी 2024

आर डी बर्मन

#04jan
#27jun 
राहुल देव बर्मन
प्रसिद्ध नाम आर. डी. बर्मन, पंचम दा

🎂जन्म 27 जून, 1939
जन्म भूमि कलकत्ता, पश्चिम बंगाल
⚰️मृत्यु 04 जनवरी, 1994
मृत्यु स्थान मुम्बई, महाराष्ट्र

अभिभावक एस.डी. बर्मन, गायिका मीरा
कर्म भूमि मुंबई
कर्म-क्षेत्र संगीतकार और गायक
मुख्य फ़िल्में 1942 ए लव स्टोरी (1995), तीसरी मंज़िल (1966), यादों की बारात (1974), हम किसी से कम नहीं (1978), कारवाँ (1972) आदि।
विषय भारतीय शास्त्रीय संगीत
पुरस्कार-उपाधि फ़िल्मफेयर पुरस्कार, सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक, सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायक
नागरिकता भारतीय
मुख्य गीत ‘चिंगारी कोई भड़के’, ‘कुछ तो लोग कहेंगे’ 'महबूबा महबूबा', 'पिया तू अब तो आजा' आदि।
अन्य जानकारी आर. डी. बर्मन प्रयोगवादी संगीतकार के रूप में जाने जाते हैं। उन्होंने पश्चिमी संगीत को मिलाकर अनेक नई धुनें तैयार की थीं। उन्होंने अपने करियर के दौरान लगभग 300 फ़िल्मों में संगीत दिया।
आर. डी. बर्मन  R. D. Burman,

भारतीय हिन्दी सिनेमा में एक महान् संगीतकार के रूप में प्रसिद्ध थे। आर. डी. बर्मन का पूरा नाम 'राहुल देव बर्मन' था और फ़िल्मी दुनिया में वे 'पंचम दा' के नाम से विख्यात थे। उन्होंने अपने कॅरियर के दौरान लगभग 300 फ़िल्मों में संगीत दिया। मधुर संगीत से श्रोताओं का दिल जीतने वाले संगीतकार राहुल देव बर्मन के लोकप्रिय संगीत से सजे गीत 'चिंगारी कोई भड़के', 'कुछ तो लोग कहेंगे', 'पिया तू अब तो आजा' आदि हैं।

आर. डी. बर्मन का जन्म 27 जून, 1939 को कलकत्ता, पश्चिम बंगाल में हुआ था। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा बालीगंज गवर्नमेंट हाई स्कूल, कोलकाता से प्राप्त की थी। बाद में उन्होंने उस्ताद अली अकबर खान से सरोद भी सीखा। आर. डी. बर्मन ने आशा भोंसले के साथ विवाह किया था।

संगीतकार
आर. डी. बर्मन के पिता एस. डी. बर्मन (सचिन देव बर्मन) भी जाने माने संगीतकार थे और उन्होंने अपने करियर की शुरुआत उनके सहायक के रूप में की थी। आर. डी. बर्मन प्रयोगवादी संगीतकार के रूप में जाने जाते हैं। उन्होंने पश्चिमी संगीत को मिलाकर अनेक नई धुनें तैयार की थीं। उन्होंने अपने करियर के दौरान लगभग 300 फ़िल्मों में संगीत दिया।

पंचम दा नाम
आर. डी. बर्मन को पंचम नाम से फ़िल्म जगत में पुकारा जाता था। आर. डी. बचपन में जब भी गुनगुनाते थे, 'प' शब्द का ही उपयोग करते थे। यह अभिनेता अशोक कुमार के ध्यान में आई। सा रे गा मा पा में ‘प’ का स्थान पाँचवाँ है। इसलिए उन्होंने राहुल देव को पंचम नाम से पुकारना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे उनका यही नाम लोकप्रिय हो गया।

सफलता का स्वाद

एस.डी. बर्मन हमेशा आर. डी. बर्मन को अपने साथ रखते थे। इस वजह से आर. डी. बर्मन को लोकगीतों, वाद्यों और आर्केस्ट्रा की समझ बहुत कम उम्र में हो गई थी। जब एस.डी. ‘आराधना’ का संगीत तैयार कर रहे थे, तब काफ़ी बीमार थे। आर. डी. बर्मन ने कुशलता से उनका काम संभाला और इस फ़िल्म की अधिकतर धुनें उन्होंने ही तैयार की। आर. डी. बर्मन को बड़ी सफलता मिली ‘अमर प्रेम’ से। ‘चिंगारी कोई भड़के’ और ‘कुछ तो लोग कहेंगे’ जैसे यादगार गीत देकर उन्होंने साबित किया कि वे भी प्रतिभाशाली हैं।

पहला अवसर
एस. डी. बर्मन की वजह से आर. डी. बर्मन को फ़िल्म जगत के सभी लोग जानते थे। पंचम दा को माउथआर्गन बजाने का बेहद शौक़ था। लक्ष्मीकांत प्यारेलाल उस समय ‘दोस्ती’ फ़िल्म में संगीत दे रहे थे। उन्हें माउथआर्गन बजाने वाले की ज़रूरत थी। वे चाहते थे कि पंचम यह काम करें, लेकिन उनसे कैसे कहें क्योंकि वे एक प्रसिद्ध संगीतकार के बेटे थे। जब यह बात पंचम को पता चली तो वे फौरन राजी हो गए। महमूद से पंचम की अच्छी दोस्ती थी। महमूद ने पंचम से वादा किया था कि वे स्वतंत्र संगीतकार के रूप में उन्हें ज़रूर अवसर देंगे। ‘छोटे नवाब’ के ज़रिये महमूद ने अपना वादा निभाया।

पहला एकल गीत
महमूद की फ़िल्म छोटे नवाब बतौर संगीतकार उनकी पहली फ़िल्म थी। लेकिन उन्हें असली पहचान फ़िल्म 'तीसरी मंजिल' और फ़िल्म 'पड़ोसन' से मिली। उन्होंने नासिर हुसैन, रमेश सिप्पी जैसे फ़िल्मकारों के साथ लंबे समय तक काम किया।

प्रयोग के हिमायती

राहुल देव बर्मन
आर. डी. बर्मन को संगीत में प्रयोग करने का बेहद शौक़ था। नई तकनीक को भी वे बेहद पसंद करते थे। उन्होंने विदेश यात्राएँ कर संगीत संयोजन का अध्ययन किया। 27 ट्रैक की रिकॉर्डिंग के बारे में जाना। इलेक्ट्रॉनिक वाद्ययंत्रों का प्रयोग किया। कंघी और कई फ़ालतू समझी जाने वाली चीजों का उपयोग उन्होंने अपने संगीत में किया। भारतीय संगीत के साथ पाश्चात्य संगीत का उन्होंने भरपूर उपयोग किया। आर. डी. बर्मन के बारे में कहा जाता है कि वे समय से आगे के संगीतकार थे। उन्होंने अपने संगीत में वे प्रयोग कर दिखाए थे, जो आज के संगीतकार कर रहे हैं। आर. डी. का यह दुर्भाग्य रहा कि उनके समय में फ़िल्मों में एक्शन हावी हो गया था और संगीत के लिए ज़्यादा गुंजाइश नहीं थी। अपने अंतिम समय में उन्होंने ‘1942 ए लव स्टोरी’ में यादगार संगीत देकर यह साबित किया था कि उनकी प्रतिभा का सही दोहन फ़िल्म जगत नहीं कर पाया। 4 जनवरी 1994 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कहा, लेकिन दुनिया को गुनगुनाने लायक़ ढेर सारे गीत वे दे गए।

युवाओं के संगीतकार
आर. डी. बर्मन द्वारा संगीतबद्ध की गई फ़िल्में ‘तीसरी मंजिल’ और ‘यादों की बारात’ ने धूम मचा दी। राजेश खन्ना को सुपर सितारा बनाने में भी आर. डी. बर्मन का अहम योगदान है। राजेश खन्ना, किशोर कुमार और आर. डी. बर्मन की तिकड़ी ने 70 के दशक में धूम मचा दी थी। आर. डी. का संगीत युवा वर्ग को बेहद पसंद आया। उनके संगीत में बेफ़िक्री, जोश, ऊर्जा और मधुरता है, जिसे युवाओं ने पसंद किया। ‘दम मारो दम’ जैसी धुन उन्होंने उस दौर में बनाकर तहलका मचा दिया था। जब राजेश खन्ना का सितारा अस्त हुआ तो आर. डी. ने अमिताभ के लिए यादगार धुनें बनाईं। आर. डी. बर्मन का संगीत आज का युवा भी सुनता है। समय का उनके संगीत पर कोई असर नहीं हुआ। पुराने गानों को रीमिक्स कर आज पेश किया जाता है, उनमें आर. डी. द्वारा संगीतबद्ध गीत ही सबसे अधिक होते हैं। ऐसा नहीं है कि आर. डी. ने धूम-धड़ाके वाली धुनें ही बनाईं। गीतकार गुलज़ार के साथ राहुल देव एक अलग ही संगीतकार के रूप में नजर आते हैं। ‘आँधी’, ‘किनारा’, ‘परिचय’, ‘खुश्बू’, ‘इजाजत’, ‘लिबास’ फ़िल्मों के गीत सुनकर लगता ही नहीं कि ये वही आर. डी. बर्मन हैं, जिन्होंने ‘दम मारो दम’ जैसा गाना बनाया है।

प्रसिद्ध गीत
जी.पी. सिप्पी के साथ उन्होंने 'सीता और गीता', 'शोले', 'शान' जैसी फ़िल्मों में संगीत दिया। नासिर हुसैन के साथ उनका लंबा साथ रहा और उन्होंने तीसरी मंजिल, कारवाँ, हम किसी से कम नहीं, यादों की बारात जैसी कई फ़िल्मों के गानों को यादगार बना दिया। आर. डी. बर्मन के विविधतापूर्ण गानों में एक ओर जहाँ शास्त्रीय संगीत पर आधारित रैना बीती जाए, मेरा कुछ सामान जैसे गाने है वहीं महबूबा महबूबा, पिया तू अब तो आजा जैसे गाने भी हैं।

लोकप्रियता
1970 के दशक की उनकी लोकप्रियता 1980 के दशक में भी क़ायम रही और इस दौरान भी उन्होंने कई चर्चित फ़िल्मों में संगीत दिया। लेकिन दशक के आखिरी कुछ वर्ष अपेक्षा के अनुरूप नहीं रहे और उनकी कई फ़िल्में नाकाम रहीं। '1942 ए लव स्टोरी' उनके निधन के बाद प्रदर्शित हुई। इस फ़िल्म के गानों में नई ताजगी थी और उन्हें खूब पसंद किया गया। उनका 4 जनवरी, 1994 को निधन हो गया। उनके निधन के बाद रिमिक्स गानों का दौर शुरू हुआ। दिलचस्प है कि रीमिक्स किए गए अधिकतर गाने आर. डी. बर्मन के ही स्वरबद्ध हैं। आर डी बर्मन ने लगभग 300 फ़िल्मों में संगीत दिया जिनमें 292 हिंदी फ़िल्में थीं। इसके अलावा उन्होंने बंगाली, तमिल, तेलुगू और उड़िया फ़िल्मों के लिए भी संगीत दिया।

निधन
4 जनवरी 1994 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कहा, लेकिन दुनिया को गुनगुनाने लायक़ बहुत सारे गीत दे गए। अपने अंतिम समय में उन्होंने ‘1942 ए लव स्टोरी’ में यादगार संगीत देकर यह साबित किया था कि उनकी प्रतिभा का सही दोहन फ़िल्म जगत नहीं कर पाया।

रविवार, 23 जुलाई 2023

आमला शंकर

आमला शंकर मशहूर भारतीय नृत्यांगना एवं कोरियोग्राफर
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मशहूर भारतीय नृत्यांगना एवं कोरियोग्राफर
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अमला शंकर
🎂जन्म 27 जून, 1919
जन्म भूमि जेसोर
⚰️मृत्यु 24 जुलाई, 2020
मृत्यु स्थान कोलकाता
अभिभावक पिता- अक्षय कुमार नंदी
पति/पत्नी उदय शंकर
संतान पुत्र- आनंद शंकर, पुत्री- ममता शंकर
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र नृत्यांगना व कोरियोग्राफर
मुख्य फ़िल्में 'कल्‍पना'
अन्य जानकारी फ़िल्म 'कल्‍पना' बुरी तरह फ्लॉप रही थी, लेकिन यह अलग बात है कि आज इसकी हिफाजत किसी बेशकीमती नगीने की तरह की जाती है और सन 2010 में मार्टिन स्कोर्सेसी की कंपनी वर्ल्ड सिनेमा फाउंडेशन ने इसके डिजिटल संरक्षण का जिम्मा उठाया।
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अमला शंकर का जन्म अमला नंदी के रूप में 27 जून 1919 को बटाजोर गांव, मगुरा जिला , बंगाल प्रेसीडेंसी , ब्रिटिश भारत (आधुनिक बांग्लादेश ) में हुआ था । उनके पिता अखॉय कुमार नंदी चाहते थे कि उनके बच्चे प्रकृति और गांवों में रुचि लें।  1931 में, जब वह 11 वर्ष की थीं, तब वह पेरिस में अंतर्राष्ट्रीय औपनिवेशिक प्रदर्शनी में गयीं। यहां उनकी मुलाकात उदय शंकर और उनके परिवार से हुई. अमला ने उस वक्त फ्रॉक पहना हुआ था. उदय शंकर की मां हेमांगिनी देवी ने उन्हें पहनने के लिए साड़ी दी . वह उदय शंकर की नृत्य मंडली में शामिल हुईं और दुनिया भर में प्रदर्शन किया।
❤️1939 में जब वह उदय शंकर के डांस ग्रुप के साथ चेन्नई में रह रही थीं, तो एक दिन रात में अमला के पास आईं और उन्हें शादी का प्रस्ताव दिया।उदय शंकर ने 1942 में अमला से शादी की।उनके पहले बेटे आनंद शंकर का जन्म दिसंबर 1942 में हुआ था।उनकी बेटी ममता शंकर का जन्म जनवरी 1955 में हुआ था।उदय शंकर और अमला शंकर लंबे समय तक एक लोकप्रिय नृत्य युगल थे। लेकिन, बाद में उदय शंकर अपनी मंडली की एक युवा लड़की के साथ रोमांटिक रूप से जुड़ गए और उन्होंने अमाला के बिना चांडालिका का निर्माण किया।उदय शंकर की 1977 में मृत्यु हो गई। पिछले कुछ वर्षों से, दंपति अलग-अलग रहते थे।2012 तक अमला शंकर अभी भी सक्रिय थीं और उन्होंने अपनी बेटी ममता और बहू तनुश्री शंकर के साथ शंकर घराने को जीवित रखा है ।वह रविशंकर की भाभी थीं , जो एक सितार वादक थे ।  नब्बे के दशक तक सक्रिय रहीं, उनकी आखिरी प्रस्तुति 92 साल की उम्र में नृत्य नाटिका सीता स्वयंवर थी, जिसमें उन्होंने राजा जनक की भूमिका निभाई थी।

मंगलवार, 27 जून 2023

चंद्र नाथ मिश्र

चंद्र नाथ मिश्र
 एक सहायक और कास्टिंग निर्देशक हैं जो मुख्य रूप से हिंदी फिल्म उद्योग में काम करते हैं। 

*जन्म 🎂27 जून 1988* 

दिल्ली में जन्मे चंदर ने अपनी स्कूली शिक्षा नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से और स्नातक की पढ़ाई इग्नू, दिल्ली विश्वविद्यालय से पूरी की। उन्होंने एक अभिनय कार्यशाला निदेशक के रूप में भी काम किया है और बच्चों के अभिनय कार्यशाला विशेषज्ञ हैं। चंदर नाथ ने एक अभिनेता के रूप में अपने करियर की शुरुआत वर्ष 1998 में नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से थिएटर से की।

उन्होंने शिक्षा संस्कार रंग टोली में थिएटर में भी अभिनय किया और वहां से अभिनय में डिप्लोमा किया था। उन्होंने नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में अक्टूबर 2006 से जनवरी 2013 तक फ्रीलांसर के रूप में काम किया। वर्तमान में मुंबई में रहते हुए, वह टोंगा टॉकीज़ प्रोडक्शन हाउस के तहत सहायक निर्देशक के रूप में काम कर रहे हैं, जिसमें वह अप्रैल 2010 में शामिल हुए थे। वह निर्देशक के साथ काम करते हैंअजय बहल. चंदर फिल्मों के साथ फ्रीलांस कास्टिंग डायरेक्टर के रूप में भी काम कर रहे हैं, जिसकी शुरुआत उन्होंने जुलाई 2011 में की थी।

उन्होंने पवन कृपलानी जैसे निर्देशकों और निर्माताओं के साथ फिल्म 'रागिनी एमएमएस' से कास्टिंग असिस्टेंट के रूप में सिनेमा में कदम रखा।एकता कपूर. उसी वर्ष, उन्होंने फिल्मों के लिए काम किया।बबल गम' और 'मौसम'. निर्देशकसंजीवन लाल'बबलगम' एक नाटक है कि कैसे माता-पिता, एक भाई और एक प्रतिद्वंद्वी मिलकर योजना बनाते हैं और एक लड़की के प्रति लड़के के स्नेह में बाधाएं पैदा करते हैं। '

'मौसम' अभिनीत एक थ्रिलर ड्रामा हैशाहिद कपूर,सोनम कपूर, औरअनुपम खेरमुख्य भूमिकाओं में. यह उन कठिनाइयों के बारे में भी है जिनका सामना एक जोड़े को अलग-अलग राज्यों से होने के कारण करना पड़ता है और निकट आने वाले भारत-पाकिस्तान युद्ध के बारे में भी है। इसके बाद साल 2012 में उन्होंने फिर से तीन फिल्मों के लिए काम किया जिनमें 'शंघाई', 'बीए पास', और 'चटगांव'. 'बीए पास' में उन्होंने सेकेंड असिस्टेंट डायरेक्टर के तौर पर भी काम किया।

2013 में उन्हें जैसे मशहूर एक्टर्स को कास्ट करने का मौका मिलाअनुष्का शर्माऔरइमरान खानमें 'मटरू की बिजली का मंडोला',इमरान हाशमी, विद्याबालन,कल्कि कोचलिन, औरहुमा क़ुरैशी'एक थी डायन' में. उन्हें महान अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा की बेटी के साथ काम करने का मौका मिला।सोनाक्षी सिन्हाऔररणवीर सिंहमें 'लुटेरा'. 'लुटेरा' ओ हेनरी की कहानी 'द लास्ट लीफ' पर आधारित है। चंदर ने 'के लिए कास्टिंग असिस्टेंट के रूप में भी काम किया।फुकरे'. 2014 उनके करियर के लिए इतना अच्छा साल साबित नहीं हुआ.

उस वर्ष उनकी तीन रिलीज़ भी हुईं। 2015 चंदर के लिए एक बड़ा ब्रेक साबित हुआ क्योंकि 'कौन कितने पानी में' रिलीज़ हुई जो एक स्वतंत्र कास्टिंग निर्देशक के रूप में उनकी पहली फिल्म थी। उन्होंने 'तबाही' के लिए भी काम किया।'प्रेत', 'डिटेक्टिव ब्योमकेश बख्शी' और 'वेडिंग पुलाव'।

ऐदेउ हांडिक

ऐदेउ हांडिक हिंदी अभिनेत्री
🎂जन्मतिथि: 27-06-1915

⚰️मृत्यु तिथि: 17-12-2002

फिल्म-अभिनेत्री

पहली असमिया फिल्म अभिनेत्री, ऐदु नीलांबर हांडिक , 1933 में फिल्म उद्योग का हिस्सा बनीं जब उन्होंने अपनी पहली फिल्म 'जॉयमोती' में अभिनय किया। ऐदेउ उस युग का हिस्सा था जहां लड़कियों को स्कूल जाने या थिएटर देखने की भी अनुमति नहीं थी, स्क्रीन पर अभिनय करना तो दूर की बात थी। उन्हें हमेशा एक बहादुर और साहसी महिला माना जाता है, क्योंकि वह अभिनय में करियर बनाने वाली पहली असमिया महिला थीं। कई महिलाएं उसे आदर की दृष्टि से देखती हैं।

ऐदेउ हांडिक का जन्म 27 जून 1920 को पानी दिहिंगिया, गोलाघाट में हुआ था। उनके माता-पिता नीलांबर हांडिक और मां-लक्ष्मी थे। वह 15 साल की एक साधारण ग्रामीण लड़की थी, जब उसका एक चचेरा भाई, जो फिल्म निर्माता ज्योति प्रसाद अग्रवाल का सहयोगी था, उसे 'जॉयमोती' के सेट पर ले गया। 1933 में, ज्योति प्रसाद अग्रवाल पहली असमिया टॉकी, 'जॉयमोती' की योजना बना रहे थे। पहले महिलाओं की भूमिकाएं पुरुष ही निभाते थे, लेकिन जॉयती इसके लिए महिला किरदार निभाना चाहती थीं और इस तरह ऐदेउ हांडिक का उनसे परिचय हुआ।

ज्योति प्रसाद ने उन्हें फिल्म में विभिन्न स्थितियों के लिए अभिनय करना सिखाया। इस फिल्म की शूटिंग में लगभग एक महीना लगा और 'जॉयमोती' का प्रीमियर 1935 में हुआ और यह क्लासिक बन गई। उनके गांव के लोगों को ऐदु को 'जॉयमोती' में नायिका के रूप में कभी देखने का मौका नहीं मिला क्योंकि 1985 तक वहां कोई स्थानीय सिनेमा नहीं था। केवल 1985 में, जब असम ने राज्य के सिनेमा की स्वर्ण जयंती मनाई, तब उनकी भूमिका को स्वीकार किया गया। स्थानीय सरकार ने उनके लिए पेंशन निर्धारित की और उनके गांव में उनके नाम पर एक स्कूल का नाम रखा गया।

लेकिन ऐडू अभिनय नहीं करना चाहता था। अपने पिता की सहमति से ही वह 'जॉयमोती' में काम करने के लिए राजी हुईं। एक महीने बाद अपने गाँव लौटने पर, उन्हें मनोरंजन उद्योग में शामिल होने के परिणामों का एहसास हुआ। ऐदेउ को उसके पड़ोसियों ने तिरस्कृत कर दिया था, ग्रामीण उस तालाब से पानी नहीं पीते थे जहाँ से वह पानी लाती थी, कंगारू अदालत ने उसके परिवार पर जुर्माना लगाया था और कोई भी पुरुष उससे शादी नहीं करेगा। उसे सामाजिक स्वीकृति, विशेषाधिकार, मित्रता से वंचित कर दिया गया और गाँव से बहिष्कृत कर दिया गया। उन्हें अपने घर में भी रहने की इजाजत नहीं थी और उन्हें अपनी पूरी जिंदगी फूस की झोपड़ी में रहने के लिए मजबूर होना पड़ा। फिल्म में अपने हीरो को बोंगोहोर्डियो या 'प्रिय पति' कहकर संबोधित करना उनकी गलती थी, जिसने उन्हें उनके गांव में भयावह बना दिया।

उन्होंने एक साक्षात्कार में बताया कि उनके गांव वाले उनके बारे में क्या कहते थे, "ऐसी लड़की से कौन शादी करेगा जो एक महीने तक एक शिविर में पुरुषों के साथ रही हो?" ऐडू ने आह भरते हुए कहा। अरुप मन्ना की एक असमिया फिल्म 'ऐदेउ (स्क्रीन के पीछे)' उन्हें श्रद्धांजलि देने और उनके दुखद जीवन को उजागर करने के लिए ऐदेउ हांडिक पर बनाई गई थी। यह करुणा से भरे हर दृश्य के साथ दुखद मानवीय अस्तित्व का एक सशक्त चित्रण है। यह फिल्म 8 फरवरी, 2007 को मुंबई अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में रिलीज हुई। दुर्भाग्य से वह इसे देखने में सक्षम नहीं थीं क्योंकि उनका बहुत समय पहले, 17 दिसंबर 2002 को कामरगांव, गोलाघाट में निधन हो गया था। जब एड्यू की मृत्यु हुई तब वह 87 वर्ष की थीं। वह फिल्म 'ऐडू' के 10 फ्रेमों में नजर आईं, जिसमें उन्हें पुरानी यादों की गलियों में जाते हुए दिखाया गया। ऐदेउ हांडिक एक ऐसी किंवदंती थी जिसे असमिया समाज कभी नहीं भूल सकता।

फिल्म गंगा सिलोनी में एक छोटी सी भूमिका और अपने जीवन पर बनी फिल्म में अतिथि भूमिका को छोड़कर उन्होंने जॉयमोती के बाद फिर कभी अभिनय नहीं किया।1985 में, जब असम ने राज्य के सिनेमा की स्वर्ण जयंती मनाई, तो उनकी भूमिका को स्वीकार किया गया। ईस्ट इंडियन मोशन पिक्चर एसोसिएशन ने ऐदेउ को एक व्हीलचेयर उपहार में दी थी। बहुत बाद में असम सरकार ने उन्हें पेंशन के रूप में 1,500 रुपये प्रति माह दिये। इसने पद्मश्री के लिए भी उनके नाम की सिफारिश की , लेकिन उन्हें पुरस्कार देने से इनकार कर दिया गया क्योंकि उन्होंने केवल एक ही फिल्म की थी।1991 में, उनके गांव में एक लड़कियों के स्कूल का नाम उनके नाम पर रखा गया था।

नितिन मुकेश

जन्म नाम नितिन मुकेश माथुर
🎂जन्म 27 जून 1950 

🎤पार्श्व गायन गायक

नितिन मुकेश माथुर (नितिन मुकेश के नाम से बेहतर जाने जाते हैं) एक भारतीय पार्श्व गायक हैं जो हिंदी फिल्मों के साथ-साथ भजनों में पार्श्व गायक के रूप में अपने काम के लिए जाने जाते हैं।
उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दौरा किया है, जिसमें 1993 में संयुक्त राज्य अमेरिका और 2006 में अपने पिता को श्रद्धांजलि के रूप में अपने शो कल की यादें के साथ एक विश्व दौरा शामिल है। नितिन के बेटे नील नितिन मुकेश एक अभिनेता हैं। नितिन मुकेश ने मोहम्मद जैसे उल्लेखनीय संगीत निर्देशकों के साथ काम किया है। 1980 और 1990 के दशक के दौरान जहूर खय्याम, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, बप्पी लाहिड़ी, राजेश रोशन, नदीम श्रवण, आनंद मिलिंद।
उन्होंने मनोज कुमार, शशि कपूर, अनिल कपूर, जैकी श्रॉफ और अन्य अभिनेताओं के लिए आवाज उठाई।
नितिन मुकेश के पिता मुकेश हैं , जो दिल्ली के माथुर कायस्थ थे , जबकि उनकी माँ, सरल त्रिवेदी, एक गुजराती श्रीमाली ब्राह्मण हैं ।

उनका विवाह निशी मुकेश से हुआ है उनका बेटा, नील नितिन मुकेश एक अभिनेता है।

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...