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गुरुवार, 12 मार्च 2026

भारत की विडंबना


भारतीय चुनाव आयोग किसी से चुनाव लड़ने या वोट का अधिकार नहीं छीन ता?
 

भारत की विविधता ही उसकी सबसे बड़ी शक्ति रही है। इतिहास गवाह है कि यह देश सदियों से अलग-अलग विचारधाराओं और संस्कृतियों का संगम रहा है।
​हम एक ऐसे आधुनिक युग में जी रहे हैं जहाँ संविधान और मानवता सर्वोपरि हैं। किसी भी धर्म या आस्था का मूल उद्देश्य शांति, सद्भाव और "वसुधैव कुटुंबकम" (पूरी दुनिया एक परिवार है) की भावना को बढ़ावा देना होता है।
​डराने वाली भविष्यवाणियों या संघर्ष की बातों के बजाय, अगर हम मिलकर तरक्की, शिक्षा और आपसी प्रेम पर ध्यान दें, तो भारत सचमुच विश्व गुरु बन सकता है। समाज तब और मजबूत होता है जब हर नागरिक सुरक्षित महसूस करे।

भारतीय इतिहास और संस्कृति की सबसे बड़ी खूबी उसकी 'समावेशिता' (Inclusivity) रही है। यह कोई नई बात नहीं है, बल्कि हजारों वर्षों से चली आ रही एक परंपरा है।

यहाँ कुछ मुख्य बिंदु हैं जो बताते हैं कि भारतीय समाज ने ऐतिहासिक रूप से सबको साथ लाने में कैसी भूमिका निभाई है:

 विविधता में एकता (Unity in Diversity): 

भारत ने हमेशा 'एकम सद् विप्रा बहुधा वदन्ति' (सत्य एक है, विद्वान उसे अलग-अलग नामों से पुकारते हैं) के सिद्धांत को माना है। यही कारण है कि यहाँ अलग-अलग मतों और पंथों को फलने-फूलने की जगह मिली।

 दार्शनिक आधार: 

सनातन धर्म का मूल विचार 'वसुधैव कुटुंबकम' (पूरी पृथ्वी एक परिवार है) है। यह संकुचित सोच के बजाय पूरे विश्व को अपना मानने की उदारता देता है।

 सांस्कृतिक आदान-प्रदान: 

सदियों से भारत में संगीत, वास्तुकला (Architecture), और खान-पान में अलग-अलग परंपराओं का मेल हुआ है। उदाहरण के तौर पर, हमारा शास्त्रीय संगीत या ऐतिहासिक इमारतें किसी एक विचारधारा की नहीं, बल्कि सामूहिक रचनात्मकता की देन हैं।

 संविधान की शक्ति: 

आधुनिक भारत में हमारा संविधान हर नागरिक को अपनी आस्था का पालन करने और सम्मान के साथ जीने का बराबर अधिकार देता है। यही वह धागा है जो 140 करोड़ लोगों को एक सूत्र में पिरोकर रखता है।

इतिहास गवाह है कि जब-जब समाज ने एकजुट होकर काम किया है, भारत ने सोने की चिड़िया और विश्व गुरु के रूप में अपनी पहचान बनाई है। नफरत या डर के बजाय संवाद और विकास ही भविष्य का सही रास्ता है।

'राम राज्य' की अवधारणा भारतीय संस्कृति में सुशासन (Good Governance), न्याय और सामाजिक समरसता का सर्वोच्च शिखर मानी गई है। जब हम राम राज्य की बात करते हैं, तो यह केवल एक कालखंड नहीं, बल्कि एक ऐसा आदर्श है जिसे आज भी दुनिया भर में एक 'Perfect State' के रूप में देखा जाता है।

​राम राज्य की वे विशेषताएँ, जिन्होंने समाज को जोड़ने का काम किया:

​१. न्याय और समानता (Justice for All)
​राम राज्य की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वहाँ न्याय सबके लिए बराबर था। राजा का कर्तव्य अपनी प्रजा की रक्षा और खुशी सुनिश्चित करना था। गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में लिखा है:

"दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा॥"
अर्थात, राम राज्य में किसी भी व्यक्ति को शारीरिक, मानसिक या दैवीय कष्ट नहीं था। हर व्यक्ति भयमुक्त और सुरक्षित था।

​२. समावेशी समाज (Inclusive Society)
​मर्यादा पुरुषोत्तम राम के जीवन में सामाजिक एकता के अद्भुत उदाहरण मिलते हैं:

निषादराज गुह: श्री राम ने अपने वनवास के दौरान निषादराज (जो एक केवट थे) को गले लगाया और उन्हें अपना 'सखा' माना। यह जातिगत भेदभाव को मिटाने का सबसे बड़ा संदेश था।

माता शबरी: ऊंच-नीच के भेदभाव को दरकिनार कर उन्होंने शबरी के जूठे बेर खाए, जो भक्ति और प्रेम की पराकाष्ठा है।
​वानर और भालू: उन्होंने समाज के वंचित और पिछड़े वर्गों (प्रतीकात्मक रूप से वानर-भालू) को संगठित किया और उन्हें रावण जैसी आसुरी शक्ति के विरुद्ध खड़ा किया।


​३. 'लोकरंजन' ही राजधर्म

राम राज्य में राजा का निजी सुख मायने नहीं रखता था, बल्कि 'प्रजा सुखे सुखं राज्ञः' (प्रजा के सुख में ही राजा का सुख है) का पालन होता था। उन्होंने लोक-लाज और जन-मानस की संतुष्टि के लिए कठिन से कठिन निर्णय लिए, ताकि समाज में नैतिकता की स्थापना हो सके।

४. आर्थिक और प्राकृतिक समृद्धि

ऐतिहासिक ग्रंथों के अनुसार, उस काल में न केवल मनुष्य बल्कि प्रकृति भी प्रसन्न थी। नदियाँ स्वच्छ थीं, खेती फलती-फूलती थी और कोई भी निर्धन नहीं था। संसाधनों का वितरण ऐसा था कि समाज में असंतोष की कोई जगह नहीं थी।

राम राज्य का असली अर्थ किसी पर विजय पाना नहीं, बल्कि स्वयं पर विजय पाना और सबको साथ लेकर चलना है। आज के समय में भी, जब हम राम राज्य की कल्पना करते हैं, तो उसका अर्थ एक ऐसे समाज से होता है जहाँ कोई भूखा न सोए, किसी के साथ अन्याय न हो और सब प्रेम से रहें।

राम राज्य के इन सिद्धांतों को आज के लोकतंत्र और शासन व्यवस्था में कैसे लागू किया जा सकता है?

राम राज्य के सिद्धांतों को आज के आधुनिक लोकतंत्र में लागू करना एक प्रगतिशील समाज की नींव रख सकता है। यह केवल एक धार्मिक विचार नहीं, बल्कि सुशासन (Good Governance) का एक मानवीय मॉडल है।
​आज के संदर्भ में इसे इन ५ स्तंभों के माध्यम से समझा जा सकता है:

१. न्याय की सुलभता (Social and Legal Justice)
​राम राज्य का मूल था—'अन्याय का अंत'। आज के लोकतंत्र में इसका अर्थ है कि न्याय केवल अमीर या शक्तिशाली के लिए न हो।
​लागू करने का तरीका: अदालतों में मुकदमों का त्वरित निपटारा और गरीब से गरीब व्यक्ति को मुफ्त और निष्पक्ष कानूनी सहायता मिलना। जब 'अंतिम व्यक्ति' को न्याय मिलता है, तभी राम राज्य की कल्पना साकार होती है।

२. समावेशी विकास (Sabka Saath, Sabka Vikas)
​भगवान राम ने केवट, शबरी और वानर सेना को जो सम्मान दिया, वह आज के 'सोशल इंक्लूजन' का सबसे बड़ा उदाहरण है।
​लागू करने का तरीका: सरकार की योजनाएं जाति, धर्म या क्षेत्र के भेदभाव के बिना समाज के सबसे निचले तबके तक पहुँचनी चाहिए। शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं पर सबका समान अधिकार होना चाहिए।

३. नैतिकता और शुचिता (Ethical Leadership)
​'मर्यादा पुरुषोत्तम' का अर्थ है मर्यादाओं में रहने वाला श्रेष्ठ पुरुष। आज की राजनीति में चरित्र और नैतिकता की भारी कमी दिखती है।
​लागू करने का तरीका: जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों में भ्रष्टाचार के प्रति 'जीरो टॉलरेंस' होना चाहिए। शासन में पारदर्शिता और जनता के प्रति जवाबदेही (Accountability) ही आधुनिक राजधर्म है।

४. लोकमत का सम्मान (Respect for Public Opinion)
​राम राज्य में राजा अपनी प्रजा की छोटी से छोटी आवाज को भी अनसुना नहीं करता था।
​लागू करने का तरीका: लोकतंत्र में 'लोक' (जनता) ही सर्वोपरि है। नीतियों के निर्धारण में जनता की भागीदारी बढ़ाना और उनकी समस्याओं का संवेदनशीलता से समाधान करना ही सच्चा लोकतंत्र है।

५. पर्यावरण और प्रकृति का संरक्षण
​राम के जीवन का बड़ा हिस्सा वनों में बीता, जहाँ उन्होंने प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर रहने का संदेश दिया।
​लागू करने का तरीका: आज के प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के दौर में, जल संरक्षण, वृक्षारोपण और टिकाऊ विकास (Sustainable Development) को प्राथमिकता देना अनिवार्य है।


​राम राज्य कोई 'जादुई छड़ी' नहीं है, बल्कि यह नागरिकों और शासकों के कर्तव्यों का एक चार्टर है। जब एक नागरिक अपने कर्तव्यों का पालन करता है और सरकार अपनी शक्तियों का उपयोग सेवा के लिए करती है, तब समाज अपने आप उस आदर्श की ओर बढ़ने लगता है।

'राम राज्य' की परिकल्पना में नागरिक का स्थान केवल एक 'प्रजा' का नहीं, बल्कि एक 'भागीदार' का है। नागरिक धर्म (Civic Duty) का पालन ही वह आधार है जिससे कोई भी देश महान बनता है।

यहाँ 'नागरिक धर्म' के पालन और उसके उल्लंघन पर दंड के प्रावधानों को आधुनिक और प्राचीन दोनों परिप्रेक्ष्यों से समझा जा सकता है:

१. नागरिक धर्म: राम राज्य की ओर हमारे कदम

एक आम नागरिक के रूप में हम इन छोटे लेकिन महत्वपूर्ण बदलावों से योगदान दे सकते हैं:

 सत्य और ईमानदारी (Integrity): अपने कार्यों में ईमानदार रहना। चाहे वह समय पर टैक्स भरना हो या अपने काम को पूरी निष्ठा से करना।

 परहित सरिस धर्म नहिं भाई (Service): दूसरों की मदद करना और समाज के कमजोर वर्गों के प्रति संवेदनशील रहना। 'राम राज्य' में कोई भी अकेला या असहाय महसूस नहीं करता था।

  कानून और मर्यादा का पालन: सड़कों पर यातायात नियमों से लेकर समाज के नैतिक नियमों तक, मर्यादा पुरुषोत्तम राम की तरह स्वयं को अनुशासन में रखना।

  पर्यावरण और स्वच्छता: अपने आस-पास की सफाई रखना और प्राकृतिक संसाधनों (पानी, पेड़) का सम्मान करना, क्योंकि राम राज्य में प्रकृति भी पूजनीय थी।

 शिक्षा और जागरूकता: स्वयं शिक्षित होना और दूसरों को जागरूक करना ताकि समाज अंधविश्वास और नफरत से मुक्त रहे।

२. नागरिक धर्म न मानने पर दंड का स्वरूप

प्राचीन भारतीय न्यायशास्त्र और आधुनिक लोकतंत्र, दोनों ही 'दंड' को समाज में व्यवस्था बनाए रखने का साधन मानते हैं। यदि कोई नागरिक धर्म (कानून और कर्तव्य) का पालन नहीं करता, तो दंड का उद्देश्य 'बदला लेना' नहीं बल्कि 'सुधार करना' होना चाहिए।

  विधिक दंड (Legal Punishment): आधुनिक लोकतंत्र में संविधान सर्वोपरि है। यदि कोई नागरिक कानून तोड़ता है (जैसे चोरी, हिंसा, या भ्रष्टाचार), तो उसे निष्पक्ष न्याय प्रणाली के तहत जेल या जुर्माने का सामना करना पड़ता है। राम राज्य में भी अपराधी को दंड देने का प्रावधान था ताकि निर्दोष व्यक्ति भयमुक्त रह सके।

 (सामाजिक बहिष्कार या तिरस्कार (Social Accountability): )

प्राचीन समय में जो व्यक्ति नैतिक मर्यादाएं तोड़ता था, समाज उसे सम्मान देना बंद कर देता था। आज के समय में, अनैतिक कार्यों में लिप्त लोगों को सामाजिक रूप से जवाबदेह ठहराना एक बड़ा दंड है।

 सुधारात्मक दंड (Reformative Justice): राम राज्य की भावना यह कहती है कि दंड ऐसा हो जो व्यक्ति को अपनी गलती का अहसास कराए और उसे वापस मुख्यधारा में लौटने का मौका दे। उदाहरण के तौर पर, सामुदायिक सेवा (Community Service) जैसे दंड व्यक्ति को समाज से जोड़ते हैं।

 आर्थिक दंड (Fines): छोटे अपराधों या नागरिक कर्तव्यों की अनदेखी (जैसे गंदगी फैलाना या नियम तोड़ना) पर आर्थिक जुर्माना अनुशासन सिखाने का एक प्रभावी तरीका है।

'राम राज्य' में दंड की आवश्यकता बहुत कम पड़ती थी क्योंकि नागरिक स्वयं 'स्व-अनुशासन' (Self-discipline) का पालन करते थे। जब नागरिक अपने अधिकारों से ज्यादा अपने कर्तव्यों (धर्म) की चिंता करता है, तो समाज में संघर्ष अपने आप कम हो जाता है।


भारतीय न्याय प्रणाली और प्राचीन 'धर्मशास्त्र' (विशेषकर मनुस्मृति, कौटिल्य का अर्थशास्त्र और याज्ञवल्क्य स्मृति) के दंड विधान में कई ऐसी समानताएं हैं जो दिखाती हैं कि न्याय की अवधारणा समय के साथ विकसित तो हुई है, लेकिन उसके मूल सिद्धांत वही हैं।
यहाँ प्रमुख समानताओं का विश्लेषण दिया गया है:

१. 'विधि का शासन' (Rule of Law)
 
प्राचीन काल: धर्मशास्त्रों के अनुसार 'धर्म' (कानून) राजा से भी ऊपर था। राजा स्वयं धर्म का पालन करने के लिए बाध्य था और यदि वह न्याय नहीं करता था, तो वह दोषी माना जाता था।
 आधुनिक काल: भारतीय संविधान 'सर्वोपरि' है। प्रधानमंत्री हो या साधारण नागरिक, सभी कानून के दायरे में आते हैं। यह प्राचीन 'धर्म' की अवधारणा का ही आधुनिक रूप है।

२. साक्ष्य और गवाही (Evidence and Witnesses)
 
प्राचीन काल: प्राचीन न्याय व्यवस्था में 'साक्षी' (गवाह) और 'प्रमाण' (दस्तावेज) को बहुत महत्व दिया जाता था। झूठी गवाही देने वाले के लिए कठोर दंड का प्रावधान था।
 आधुनिक काल: भारतीय साक्ष्य अधिनियम (Indian Evidence Act) पूरी तरह से गवाहों और भौतिक साक्ष्यों पर आधारित है। झूठी गवाही (Perjury) आज भी एक गंभीर अपराध है।

३. दंड का उद्देश्य: निवारण और सुधार (Deterrence and Reformation)
  
प्राचीन काल: दंड का उद्देश्य समाज में 'मत्स्य न्याय' (बड़ी मछली का छोटी मछली को खाना यानी अराजकता) को रोकना था। दंड को 'धर्म' का रक्षक माना जाता था।
 आधुनिक काल: हमारी न्याय प्रणाली में दंड के दो मुख्य उद्देश्य हैं—अपराधी को सुधारना (Rehabilitation) और समाज में अपराध के प्रति डर पैदा करना (Deterrence)।

४. श्रेणीबद्ध न्यायपालिका (Hierarchy of Courts)
 प्राचीन काल: कौटिल्य के अर्थशास्त्र में 'संग्रहण' (१० गाँवों के लिए), 'द्रोणमुख' (४०० गाँवों के लिए) और 'स्थानीय' अदालतों का वर्णन है, जिसके ऊपर राजा की सभा होती थी।
 आधुनिक काल: आज हमारे पास निचली अदालतें (District Courts), उच्च न्यायालय (High Court) और अंत में सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) की एक स्पष्ट संरचना है।

५. निष्पक्षता और तटस्थता (Impartiality)
 प्राचीन काल: न्यायाधीशों (प्राड्विवाक) के लिए अनिवार्य था कि वे क्रोध, लोभ या पक्षपात से मुक्त होकर न्याय करें। पक्षपाती न्यायाधीश को दंडित करने का भी नियम था।
 आधुनिक काल: न्यायाधीशों की स्वतंत्रता और निष्पक्षता भारतीय न्यायपालिका का आधार स्तंभ है। किसी भी प्रकार का व्यक्तिगत हित होने पर न्यायाधीश खुद को केस से अलग कर लेते हैं।
मुख्य अंतर: दंड का स्वरूप
जहाँ सिद्धांत समान हैं, वहीं दंड की प्रकृति बदल गई है:
  प्राचीन काल में 'जैसे को तैसा' (Retributive) और शारीरिक दंड (कोड़े मारना, अंग भंग) का चलन था।
 आधुनिक प्रणाली 'मानवाधिकारों' पर आधारित है, जहाँ जेल, जुर्माना या बहुत दुर्लभ मामलों में मृत्युदंड दिया जाता है।

प्राचीन 'धर्मशास्त्र' सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए 'नैतिकता और कर्तव्य' पर जोर देते थे, जबकि आधुनिक प्रणाली 'अधिकारों और लिखित प्रक्रियाओं' पर। हालांकि, दोनों का अंतिम लक्ष्य एक ही है—"यतो धर्मस्ततो जयः" (जहाँ धर्म/न्याय है, वहीं विजय है)।
प्राचीन काल में राजा का चुनाव जनता 'वोट' देकर नहीं करती थी (हालांकि कुछ 'गणराज्यों' में सभाएं होती थीं), लेकिन आज के लोकतंत्र में 'वोट' ही नागरिक का सबसे बड़ा 'ब्रह्मास्त्र' है।
जब हम नागरिक धर्म की बात करते हैं, तो वोटिंग के माध्यम से मिलने वाला दंड कोई शारीरिक जेल नहीं, बल्कि 'राजनैतिक और सामाजिक दंड' होता है। इसके स्वरूप कुछ इस प्रकार हैं:

१. सत्ता परिवर्तन (The Ultimate Punishment)

लोकतंत्र में सबसे बड़ा दंड 'बेदखली' है।
  पालन न करने वालों के लिए: यदि कोई शासक या प्रतिनिधि अपने 'राजधर्म' (जनता की सेवा, विकास, न्याय) का पालन नहीं करता, तो जनता वोट के जरिए उसे सत्ता से बाहर कर देती है। यह एक राजा को 'रंक' बनाने की शक्ति तो है।

(लेकिन जब नेता अपने चुनाव क्षेत्र को छोड़ किसी दूसरे क्षेत्र से चुनाव जीत कर आ जाता हे तो उसके लिए कोई दंड का कानून ही नहीं जो उसे सुधार सके)
 
 नागरिक का कर्तव्य: वोट देना केवल अधिकार नहीं, 'नागरिक धर्म' है। जो नागरिक वोट नहीं देता, वह अप्रत्यक्ष रूप से गलत व्यक्ति के चुने जाने का मार्ग प्रशस्त करता है। और नागरिक धर्म अपनी हार स्वीकार कर अगले चुनाव आने तक गुमराह हो जाता हे

२. जवाबदेही का दंड (Accountability)
आज के दौर में 'वोट की चोट' का डर नेताओं को जनता के बीच जाने और उनके काम करने के लिए मजबूर करता है। और नागरिक धर्म ऐसा कर नहीं पाता
 जो नेता अपने वादे पूरे नहीं करते, उन्हें चुनाव के दौरान जनता के सामाजिक तिरस्कार और विरोध का सामना करना पड़ता है। यह आधुनिक युग का 'नैतिक दंड' पर्याप्त नहीं लगता है।

३. सामूहिक दंड (Collective Consequence)

यदि नागरिक अपने 'वोट देने के धर्म' का पालन नहीं करते या गलत आधार (लालच, जाति, या नफरत) पर वोट देते हैं, तो इसका दंड पूरे समाज को भुगतना पड़ता है: पर ऐसा कोई संविधान नहीं जो सही समाजिक लोगों से न्याय करे
 
खराब बुनियादी ढांचा: सड़कें, स्कूल और अस्पतालों की बदहाली।
 भ्रष्टाचार: जब हम गलत व्यक्ति को चुनते हैं, तो वह समाज के संसाधनों की चोरी करता है।
 अराजकता: न्याय प्रणाली का कमजोर होना।
   यह दंड किसी अदालत से नहीं मिलता, बल्कि समाज के गिरते स्तर के रूप में हम खुद भुगतते हैं।

४. नोटा (NOTA - None of the Above)

भारतीय चुनाव प्रणाली में 'नोटा' का विकल्प एक तरह का 'मौन दंड' है। यह उन सभी प्रत्याशियों के लिए जनता का संदेश है कि "आप में से कोई भी हमारे नागरिक धर्म की कसौटी पर खरा नहीं उतरा।" जो मतदाताओं को न्याय नहीं दिला पाता

राम राज्य और आधुनिक वोट

प्राचीन काल में राजा को 'धर्म' और 'ऋषियों' का डर होता था कि कहीं वे उन्हें शाप न दे दें या गद्दी से न उतार दें। आज के 'राम राज्य' की कल्पना में जनता ही वह ऋषि है और वोट ही वह शाप या आशीर्वाद है।
 पालन करने वाले या ना करने वाले को: निरंतर सेवा करते रहने का अवसर आशीर्वाद के रूप में प्राप्त होता है।
पर किसी से चुनाव लड़ने या वोट का अधिकार नहीं छीन ता
 




शुक्रवार, 6 मार्च 2026

डीजल पेट्रोल की कहानी

पश्चिम एशिया या कहें कि मिडिल ईस्ट में बढ़ते युद्ध और समुद्री हमलों के खतरे के बीच भारत ने अपनी ऊर्जा आपूर्ति सुरक्षित रखने के लिए बड़ा कदम उठाया है.समाचार एजेंसी रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत सरकार मध्य पूर्व से आने वाले तेल और गैस के जहाजों की सुरक्षा के लिए अमेरिका से समुद्री सुरक्षा कवर पर बातचीत कर रही है.


​1. ईरान के मामले में (2019)
​यह सच है कि राष्ट्रपति ट्रंप के पिछले कार्यकाल (2019) के दौरान अमेरिका ने ईरान पर कड़े प्रतिबंध लगाए थे। उस समय भारत ने अमेरिका के दबाव और अपनी ऊर्जा सुरक्षा के बीच संतुलन बनाते हुए ईरान से तेल खरीदना पूरी तरह बंद कर दिया था। यह भारत के लिए एक बड़ा समझौता था क्योंकि ईरान भारत का तीसरा सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता था।
​2. रूस के मामले में (2025-2026)
​हाल ही में (अगस्त 2025 में), ट्रंप प्रशासन ने भारत द्वारा रूसी तेल खरीदने पर 25% अतिरिक्त टैरिफ लगा दिए थे। इसके बाद:
​दबाव: अमेरिका चाहता था कि भारत रूस पर अपनी निर्भरता कम करे।
​भारत का कदम: जनवरी 2026 तक भारत ने रूस से अपनी खरीद काफी घटा दी थी (आयात में लगभग 20% तक की गिरावट आई)।
​ताज़ा मोड़ (मार्च 2026): वर्तमान में मध्य-पूर्व (ईरान-इजरायल युद्ध) में बढ़ते तनाव और 'हॉर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) के बंद होने की आशंका के कारण, अमेरिका ने 6 मार्च 2026 को भारत को एक 30-दिन की विशेष छूट (Waiver) दी है।
​विशेष नोट: इस छूट का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि वैश्विक बाजार में तेल की कमी न हो और कीमतें न बढ़ें। अब भारत उन रूसी जहाजों से तेल ले सकता है जो समुद्र में फंसे हुए थे।
​मुख्य बिंदु:
​भारत ने अमेरिका के साथ एक अंतरिम व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसके तहत भारत रूसी तेल कम करने और अमेरिकी ऊर्जा उत्पाद बढ़ाने पर सहमत हुआ है।
​भारत की प्राथमिकता हमेशा अपनी ऊर्जा सुरक्षा रही है, इसलिए वह पूरी तरह किसी एक देश पर निर्भर रहने के बजाय अपने विकल्पों को संतुलित रख रहा है।

निश्चित रूप से, यह राहत भारत के आम आदमी की जेब के लिए एक बड़ी खबर है। 6 मार्च 2026 को मिली इस विशेष अमेरिकी छूट (Waiver) का सीधा असर हमारे घरेलू बाज़ार पर कुछ इस तरह पड़ेगा:
​1. पेट्रोल और डीज़ल की कीमतों में गिरावट
​चूंकि भारत अब फंसे हुए रूसी तेल के कार्गो को स्वीकार कर सकता है, इसलिए घरेलू रिफाइनरियों के पास कच्चे तेल की सप्लाई बढ़ जाएगी।
​अनुमान: जानकारों का मानना है कि तेल कंपनियां आने वाले हफ्तों में पेट्रोल और डीज़ल के दामों में ₹3 से ₹5 प्रति लीटर की कटौती कर सकती हैं।
​सस्ता विकल्प: रूस से मिलने वाला तेल अभी भी खाड़ी देशों (Middle East) के तेल के मुकाबले डिस्काउंट पर मिल रहा है।
​2. महंगाई (Inflation) पर नियंत्रण
​भारत में परिवहन (Transport) पूरी तरह डीज़ल पर निर्भर है। जब डीज़ल सस्ता होता है, तो:
​फल, सब्जियां और अनाज ढोने की लागत कम हो जाती है।
​इससे रसोई का बजट संतुलित होता है और थोक महंगाई दर नीचे आती है।
​3. मध्य-पूर्व के संकट से सुरक्षा
​अभी ईरान-इजरायल के बीच जो तनाव चल रहा है, उसकी वजह से वैश्विक बाजार में तेल $100 प्रति बैरल के पार जा सकता था।
​बचाव: अमेरिका की इस छूट ने भारत को एक 'सुरक्षा कवच' दे दिया है। अब अगर खाड़ी देशों से तेल की सप्लाई रुकती भी है, तो भारत के पास रूस का विकल्प खुला रहेगा।
​क्या चुनौतियां अभी भी हैं?
​हालांकि यह राहत मिली है, लेकिन यह केवल 30 दिनों के लिए है।
​डॉलर बनाम रुपया: अगर भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर होता है, तो तेल सस्ता होने का पूरा फायदा जनता तक नहीं पहुँच पाएगा।
​दीर्घकालिक रणनीति: ट्रंप प्रशासन भारत पर दबाव बना रहा है कि भारत अपने तेल के भुगतान के लिए रूसी सिस्टम के बजाय अमेरिकी वित्तीय प्रणालियों का ही उपयोग करे

 

अगर ईरान-इजरायल युद्ध लंबा खिंचता है, तो इसके परिणाम केवल तेल की कीमतों तक सीमित नहीं रहेंगे। मार्च 2026 की मौजूदा स्थितियों को देखते हुए, भारत की अर्थव्यवस्था पर इसके चार सबसे बुरे असर नीचे दिए गए हैं:
​1. 'स्ट्रेयट ऑफ हॉर्मुज' (Hormuz Strait) का बंद होना
​यह भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा है। दुनिया का 20% और भारत का लगभग 50% कच्चा तेल व 60% एलएनजी (LNG) इसी संकरे समुद्री रास्ते से आता है।
​असर: अगर ईरान इस रास्ते को पूरी तरह ब्लॉक कर देता है, तो भारत में कच्चे तेल की भारी किल्लत हो जाएगी। इससे पेट्रोल-डीजल की कीमतें आसमान छू सकती हैं, जिससे ट्रांसपोर्टेशन और हर चीज़ महंगी हो जाएगी।
​LNG संकट: भारत अपनी रसोई गैस (LPG) और औद्योगिक गैस का बड़ा हिस्सा कतर से इसी रास्ते के जरिए मंगाता है। इसकी कमी से घरों में खाना पकाने की लागत बढ़ सकती है।
​2. निर्यात (Exports) पर संकट
​खाड़ी देश (Middle East) भारत के प्रमुख व्यापारिक साझेदार हैं। युद्ध लंबा चलने पर:
​बासमती चावल: भारत के बासमती चावल का 70% निर्यात खाड़ी देशों को होता है। शिपिंग रूट्स बंद होने से करोड़ों का माल बंदरगाहों पर फंस सकता है।
​इलेक्ट्रॉनिक्स और जेम्स: भारत का लगभग $4.5 बिलियन का इलेक्ट्रॉनिक्स और अरबों डॉलर का हीरा व्यापार (Diamond trade) दुबई के जरिए होता है। युद्ध की वजह से सप्लाई चेन टूटने से इस सेक्टर में छंटनी और घाटा हो सकता है।
​3. प्रवासियों की सुरक्षा और 'रेमिटेंस' (Remittances) में कमी
​पश्चिम एशिया (Middle East) में करीब 90 लाख भारतीय रहते हैं और काम करते हैं।
​पैसे भेजना: भारत दुनिया में सबसे ज्यादा रेमिटेंस (प्रवासियों द्वारा भेजा गया पैसा) पाने वाला देश है। युद्ध की स्थिति में अगर भारतीयों को वहां से वापस आना पड़ा, तो भारत की विदेशी मुद्रा आय में भारी गिरावट आएगी।
​बेरोजगारी: अचानक लाखों लोगों के भारत लौटने से देश में बेरोजगारी का दबाव भी बढ़ सकता है।
​4. शेयर बाज़ार और रुपए में गिरावट
​अनिश्चितता के माहौल में विदेशी निवेशक (FIIs) भारतीय बाज़ार से अपना पैसा निकालकर सुरक्षित विकल्पों (जैसे सोना या अमेरिकी डॉलर) में निवेश करने लगते हैं।
​असर: इससे सेंसेक्स और निफ्टी में बड़ी गिरावट आ सकती है और डॉलर के मुकाबले रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुँच सकता है। रुपया कमजोर होने का मतलब है—विदेश से आयात होने वाली हर चीज़ (मोबाइल, लैपटॉप, दवाइयां) महंगी हो जाएगी।
​निष्कर्ष और भारत का रुख
​भारत सरकार फिलहाल 'वेट एंड वॉच' (Wait and Watch) की नीति अपना रही है और वेनेजुएला व अमेरिका जैसे वैकल्पिक देशों से तेल की बात कर रही है ताकि खाड़ी देशों पर निर्भरता कम की जा सके।

अगर ऐसे माहौल में भारत और अमेरिका के संबंध बिगड़ते हैं, तो अमेरिका को ये 4 बड़े नुकसान उठाने पड़ेंगे:

​1. चीन के खिलाफ 'अकेला' पड़ जाना
​अमेरिका के लिए इस समय सबसे बड़ी चुनौती चीन है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र (Indo-Pacific) में चीन को रोकने के लिए भारत एकमात्र ऐसी ताकत है जिसके पास बड़ी सेना और रणनीतिक स्थिति है।
​नुकसान: अगर भारत साथ छोड़ देता है, तो 'क्वाड' (Quad) जैसी संस्थाएं खत्म हो जाएंगी और एशिया में अमेरिका का प्रभाव पूरी तरह समाप्त हो जाएगा। अमेरिका कभी नहीं चाहेगा कि भारत रूस या चीन के और करीब जाए।
​2. $500 बिलियन का बड़ा बाज़ार खोना
​फरवरी 2026 में हुए नए ट्रेड डील के तहत भारत ने अमेरिका से $500 बिलियन का सामान (ऊर्जा, अनाज, और टेक्नोलॉजी) खरीदने का वादा किया है।
​असर: अगर संबंध बिगड़ते हैं, तो अमेरिकी किसानों और ऊर्जा कंपनियों (Gas & Oil companies) को भारी नुकसान होगा। ट्रंप की 'Make America Great Again' नीति के लिए भारत का बाज़ार एक ऑक्सीजन की तरह है।
​3. अमेरिकी टेक कंपनियों का संकट
​गूगल, एप्पल, माइक्रोसॉफ्ट और अमेज़न जैसी कंपनियों के लिए भारत न केवल सबसे बड़ा बाज़ार है, बल्कि उनके टैलेंट (इंजीनियर्स) का मुख्य स्रोत भी है।
​टैलेंट वॉर: अगर भारत अपने नागरिकों के लिए वर्क-वीजा या डेटा नियमों को कड़ा कर देता है, तो सिलिकॉन वैली की रफ्तार सुस्त पड़ जाएगी।
​4. महंगाई का नया दौर
​अमेरिका पहले से ही महंगाई से जूझ रहा है।
​दवाइयां और कपड़े: अमेरिका अपनी जेनेरिक दवाओं (Generic Drugs) और कपड़ों के लिए भारत पर निर्भर है। भारत से रिश्ते बिगड़ने का मतलब है अमेरिकी स्टोर्स में सामान का और महंगा होना, जिससे वहां की जनता ट्रंप सरकार के खिलाफ हो सकती है।
​तस्वीर का दूसरा पहलू (कड़वा सच):
​जैसा कि , ट्रंप प्रशासन दबाव तो बना रहा है, लेकिन वे जानते हैं कि भारत को पूरी तरह 'दुश्मन' बनाना उनके लिए "अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने" जैसा होगा। इसीलिए वे प्रतिबंध लगाने के साथ-साथ '30 दिन की छूट' (Waiver) जैसे रास्ते भी खुले रखते हैं।
​एक दिलचस्प बात: मार्च 2026 में ट्रंप की लोकप्रियता (Approval Rating) अमेरिका में गिर रही है। ऐसे में उन्हें भारत जैसे बड़े साझेदार की आर्थिक मदद की सख्त ज़रूरत है ताकि वे अपनी अर्थव्यवस्था को संभाल सकें।

ट्रम्प प्रशासन के दबाव के बीच, रूस ने भारत के लिए अपने 'पिटारे' खोल दिए हैं। रूस जानता है कि अगर भारत उसके हाथ से निकल गया, तो उसकी अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका लगेगा।
​यहाँ मार्च 2026 की ताज़ा स्थिति के अनुसार रूस द्वारा भारत को दिए जा रहे 4 बड़े ऑफर्स हैं:
​1. "संकट के समय का सारथी" - तेल और गैस का आश्वासन
​मध्य-पूर्व (ईरान-इजरायल) में युद्ध के कारण जब खाड़ी देशों से तेल की सप्लाई खतरे में है, तब रूस ने भारत को 'अनलिमिटेड सप्लाई' का भरोसा दिया है।
​फंसा हुआ तेल: रूस के 1.5 करोड़ बैरल तेल से भरे जहाज भारतीय तटों के पास खड़े हैं। रूस ने इन्हें बहुत ही कम कीमत (डिस्काउंट) पर भारत को देने का ऑफर दिया है।
​LNG (गैस): रूस ने पाइपलाइन और जहाजों के जरिए भारत को सस्ती प्राकृतिक गैस (LNG) देने का प्रस्ताव रखा है ताकि भारत की रसोई और फैक्ट्रियां चलती रहें।
​2. 'रुपया-रूबल' व्यापार (96% सफलता)
​रूस ने भारत को डॉलर की चिंता से पूरी तरह मुक्त होने का ऑफर दिया है।
​ताज़ा अपडेट: पुतिन के अनुसार, भारत और रूस का 96% व्यापार अब उनकी अपनी मुद्राओं (रुपया और रूबल) में हो रहा है।
​इसका मतलब है कि अमेरिका चाहे कितने भी प्रतिबंध लगा दे, भारत सीधे अपनी करेंसी में रूस को भुगतान कर सकता है।
​3. रक्षा और तकनीक (Shtil-1 और परमाणु ऊर्जा)
​सिर्फ तेल ही नहीं, रूस रक्षा क्षेत्र में भी भारत को बड़े ऑफर दे रहा है:
​मिसाइल डील: 3 मार्च 2026 को भारत ने रूस के साथ ₹2,182 करोड़ का एक समझौता किया है, जिसके तहत भारतीय नौसेना के जहाजों के लिए आधुनिक 'Shtil-1' एंटी-एयर मिसाइलें मिलेंगी।
​परमाणु ऊर्जा: रूस तमिलनाडु के कुडनकुलम में 4 नए परमाणु रिएक्टर (1000 MW प्रत्येक) बनाने और भारत में ही उनके पुर्जे (Spares) तैयार करने की तकनीक देने पर सहमत हुआ है।
​4. 'मेक इन इंडिया' में भागीदारी
​रूस अब केवल हथियार बेचना नहीं चाहता, बल्कि वह भारत में ही हथियारों के कारखाने लगाने का ऑफर दे रहा है।
​रूस इस बात पर सहमत हो गया है कि वह अपने सैन्य उपकरणों की तकनीक भारत को ट्रांसफर करेगा ताकि भारत उन्हें यहीं बनाकर दूसरे मित्र देशों को निर्यात (Export) कर सके।
​चुनौती क्या है?
​रूस के ये ऑफर्स बहुत लुभावने हैं, लेकिन भारत के सामने चुनौती यह है कि वह रूस से हाथ मिलाते समय अमेरिका के गुस्से (टैरिफ और प्रतिबंध) को कैसे संभाले। भारत फिलहाल एक 'बैलेंसिंग एक्ट' कर रहा है—रूस से सस्ता तेल ले रहा है और अमेरिका से आधुनिक तकनीक।ले रहा और देख भी रहा है।

भारत, चीन और रूस के बीच का यह त्रिकोण (Triangle) इस समय दुनिया की सबसे जटिल कूटनीति का केंद्र है। मार्च 2026 में ईरान-इजरायल युद्ध और ट्रम्प प्रशासन की नीतियों के बीच इन तीनों की भूमिका कुछ इस तरह है:
​1. भारत: "संतुलन बनाने वाला" (The Balancer)
​भारत इस समय सबसे कठिन स्थिति में है क्योंकि उसे एक तरफ अमेरिका से रिश्ते बचाने हैं और दूसरी तरफ अपनी ऊर्जा ज़रूरतें पूरी करनी हैं।
​भूमिका: भारत BRICS 2026 का अध्यक्ष (Chair) है। भारत की कोशिश है कि यह समूह युद्ध को रोकने के लिए दबाव बनाए।
​रणनीति: भारत ने अमेरिका से '30 दिन की छूट' ली है, लेकिन वह पर्दे के पीछे रूस से अपनी दोस्ती को और मजबूत कर रहा है ताकि खाड़ी देशों से तेल की सप्लाई रुकने पर देश में हाहाकार न मचे।
​2. रूस: "सबसे बड़ा लाभार्थी" (The Beneficiary)
​रूस के लिए यह युद्ध एक 'वरदान' की तरह साबित हो रहा है।
​भूमिका: जैसे-जैसे खाड़ी देशों का तेल असुरक्षित हो रहा है, रूस दुनिया का सबसे भरोसेमंद तेल आपूर्तिकर्ता बनता जा रहा है।
​फायदा: युद्ध की वजह से तेल की कीमतें बढ़ रही हैं, जिससे रूस का 'वॉर चेस्ट' (यूक्रेन युद्ध के लिए पैसा) भर रहा है। वह भारत और चीन को और अधिक तेल बेचने के लिए उकसा रहा है ताकि अमेरिका के प्रतिबंध बेकार साबित हों।
​3. चीन: "चुपचाप फायदा उठाने वाला" (The Opportunist)
​चीन इस समय "एक तीर से दो निशाने" साध रहा है।
​भूमिका: जब अमेरिका ने भारत पर रूसी तेल कम करने का दबाव बनाया, तो चीन ने तुरंत वह सारा तेल खुद खरीदना शुरू कर दिया। जनवरी 2026 में चीन रूस का सबसे बड़ा तेल खरीदार बन गया है।
​रणनीति: चीन चाहता है कि अमेरिका मध्य-पूर्व के युद्ध में पूरी तरह फंस जाए ताकि उसका ध्यान दक्षिण चीन सागर और ताइवान से हट जाए। चीन भारत के साथ भी अपने सीमा विवाद को थोड़ा ठंडा रख रहा है (अगस्त 2025 के समझौते के बाद) ताकि वह एशियाई शक्तियों को एकजुट कर सके।

​त्रिकोणीय समीकरण: क्या ये तीनों साथ आएंगे?
​हालांकि रूस चाहता है कि RIC (Russia-India-China) एक मजबूत गुट बने, लेकिन भारत इसमें सावधानी बरत रहा है:
​अविश्वास: भारत और चीन के बीच अभी भी सीमा पर अविश्वास बना हुआ है।
​अमेरिका का डर: भारत नहीं चाहता कि वह पूरी तरह से चीन-रूस खेमे में दिखे, जिससे अमेरिका उस पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगा दे।

देश मुख्य लक्ष्य सबसे बड़ा डर
भारत सस्ती ऊर्जा और आर्थिक स्थिरता अमेरिका के प्रतिबंध और तेल की किल्लत
रूस तेल से अधिक कमाई और यूक्रेन युद्ध जीतना भारत का पूरी तरह अमेरिका की तरफ जाना
चीन ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक प्रभाव अमेरिका के साथ सीधा सैन्य टकराव

 

निष्कर्ष: रूस और चीन इस समय भारत को अपनी तरफ खींच रहे हैं, जबकि अमेरिका भारत को अपनी ओर। भारत फिलहाल "बीच का रास्ता" अपनाकर अपनी अर्थव्यवस्था को बचाने की कोशिश कर रहा है।
​क्या आप यह जानना चाहेंगे कि इन तीनों देशों के बीच 'BRICS 2026' सम्मेलन में किस बड़े मुद्दे पर फैसला होने की उम्मीद है?

गुरुवार, 5 मार्च 2026

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध स्थापित किए।

भारत और ईरान का सम्बन्ध प्रागैतिहासिक काल से ही देखा गया है। सैन्धवघाटी के मुहरों को मेसोपोटामिया, बेविलोन, उर, लगाश जैसे प्रागैतिहासिक स्थलों पर पाया गया है। ऐतिहासिक-युगो मे स्थलमार्ग से ईरान के शासकवर्ग एवम आमलोग व्यक्तिगत प्रयासो से भारत के पश्चिमोत्तर भागो मे आये, परन्तु सबसे अधिक दिल्चस्प है भारत-ईरानी आर्यो का अन्तरसम्बन्ध। 
भारत-ईरानी आर्यो क मूल स्थान, धर्म, समाज, सांस्कृतिक क्रिया-कलाप बहुत ही मिलते-जुलते है, और भिन्नता बहुत ही कम देखने को मिलती है। ईरान, भारत को सिर्फ कच्चा तेल ही नहीं देता है। बल्कि अन्य समान भी आयात करता है।
शीत युद्ध के अधिकांश समय के दौरान , भारत और तत्कालीन शाही राज्य ईरान के बीच संबंधों को उनके अलग-अलग राजनीतिक हितों के कारण नुकसान उठाना पड़ा: भारत ने एक गुटनिरपेक्ष स्थिति का समर्थन किया लेकिन सोवियत संघ के साथ मजबूत संबंधों को बढ़ावा दिया, जबकि ईरान पश्चिमी ब्लॉक का एक खुला सदस्य था और संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ उसके घनिष्ठ संबंध थे। जबकि भारत ने 1979 की इस्लामिक क्रांति का स्वागत नहीं किया , दोनों राज्यों के बीच संबंध इसके बाद क्षणिक रूप से मजबूत हुए । 
1990 के दशक में, भारत और ईरान दोनों ने अफ़गानिस्तान में तालिबान के खिलाफ़ उत्तरी गठबंधन का समर्थन किया था , जिसके बाद वाले को पाकिस्तान का खुला समर्थन प्राप्त हुआ और 2001 में संयुक्त राज्य अमेरिका के नेतृत्व वाले आक्रमण तक देश के अधिकांश हिस्से पर शासन किया । उन्होंने अशरफ़ ग़नी के नेतृत्व वाली और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय द्वारा समर्थित व्यापक-आधारित तालिबान विरोधी सरकार का समर्थन करने में सहयोग करना जारी रखा , जब तक कि तालिबान ने 2021 में काबुल पर कब्ज़ा नहीं कर लिया और अफ़गानिस्तान के इस्लामी अमीरात को फिर से स्थापित नहीं कर दिया । भारत और ईरान ने दिसंबर 2002 में एक रक्षा सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए।

आर्थिक दृष्टिकोण से, ईरान भारत को कच्चे तेल का दूसरा सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता है , जो प्रति दिन 425,000 बैरल से अधिक की आपूर्ति करता है; परिणामस्वरूप, भारत ईरान के तेल और गैस उद्योग में सबसे बड़े विदेशी निवेशकों में से एक है ।  
2011 में, ईरान के खिलाफ व्यापक आर्थिक प्रतिबंधों के कारण भारत और ईरान के बीच 12 बिलियन अमेरिकी डॉलर का वार्षिक तेल व्यापार रुक गया था, जिससे भारतीय तेल मंत्रालय को तुर्की के माध्यम से बैंकिंग प्रणाली के माध्यम से ऋण का भुगतान करने के लिए मजबूर होना पड़ा ।
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भू-राजनीतिक दृष्टिकोण से, दोनों देशों के कुछ साझा रणनीतिक हित होने के बावजूद, भारत और ईरान प्रमुख विदेश नीति मुद्दों पर काफी भिन्न हैं। 
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*भारत ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम का कड़ा विरोध व्यक्त किया है और जबकि दोनों देश तालिबान का विरोध करना जारी रखते हैं, भारत ने ईरान के विपरीत, अफ़गानिस्तान में नाटो के नेतृत्व वाली सेनाओं की उपस्थिति का समर्थन किया ।*
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2005 के अंत में बीबीसी द्वारा कराए गए वर्ल्ड सर्विस पोल के अनुसार , 71 प्रतिशत ईरानियों ने भारत के प्रभाव को सकारात्मक रूप से देखा, जबकि 21 प्रतिशत ने इसे नकारात्मक रूप से देखा - दुनिया के किसी भी देश के लिए भारत की सबसे अनुकूल रेटिंग।

आर्थिक दृष्टिकोण से, ईरान भारत को कच्चे तेल का दूसरा सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता है , जो प्रति दिन 425,000 बैरल से अधिक की आपूर्ति करता है; परिणामस्वरूप, भारत ईरान के तेल और गैस उद्योग में सबसे बड़े विदेशी निवेशकों में से एक है ।  2011 में, ईरान के खिलाफ व्यापक आर्थिक प्रतिबंधों के कारण भारत और ईरान के बीच 12 बिलियन अमेरिकी डॉलर का वार्षिक तेल व्यापार रुक गया था, जिससे भारतीय तेल मंत्रालय को तुर्की के माध्यम से बैंकिंग प्रणाली के माध्यम से ऋण का भुगतान करने के लिए मजबूर होना पड़ा ।

भू-राजनीतिक दृष्टिकोण से, दोनों देशों के कुछ साझा रणनीतिक हित होने के बावजूद, भारत और ईरान प्रमुख विदेश नीति मुद्दों पर काफी भिन्न हैं। भारत ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम का कड़ा विरोध व्यक्त किया है और जबकि दोनों देश तालिबान का विरोध करना जारी रखते हैं, भारत ने ईरान के विपरीत, अफ़गानिस्तान में नाटो के नेतृत्व वाली सेनाओं की उपस्थिति का समर्थन किया ।

2005 के अंत में बीबीसी द्वारा कराए गए वर्ल्ड सर्विस पोल के अनुसार , 71 प्रतिशत ईरानियों ने भारत के प्रभाव को सकारात्मक रूप से देखा, जबकि 21 प्रतिशत ने इसे नकारात्मक रूप से देखा - दुनिया के किसी भी देश के लिए भारत की सबसे अनुकूल रेटिंग।2007 में भारत के साथ ईरान का व्यापार 13 बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक हो गया, एक वर्ष के भीतर व्यापार की मात्रा में 80% की वृद्धि हुई।  अरब अमीरात जैसे तीसरे पक्ष के देशों के माध्यम से यह आंकड़ा 30 अरब डॉलर तक पहुंच जाता है।भारत और ईरान, दो प्राचीन पड़ोसी सभ्यताओं के लोगों के बीच सदियों से घनिष्ठ ऐतिहासिक संबंध रहे हैं। उनकी एक ही मातृभूमि थी और एक ही भाषाई और जातीय अतीत था। कई सहस्राब्दियों तक, उन्होंने भाषा, धर्म, कला, संस्कृति, और परंपराओं के क्षेत्र में एक-दूसरे को समृद्ध किया।
ईरान के परमाणु कार्यक्रम ने पश्चिमी देशों के साथ चर्चा शुरू कर दी। प्रारंभिक वार्ता खतामी सरकार के कार्यकाल के दौरान यूके, फ्रांस और जर्मनी से मिलकर ई -3 के साथ थी। चर्चा पूरी नहीं हो सकी। राष्ट्रपति ओबामा के सत्ता में आने के बाद अगला चरण शुरू हुआ। इस बार की वार्ता में पी 5 + 1 देशों का समूह (अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस, चीन और जर्मनी) शामिल थे।

यह वार्ता ईरान के खिलाफ अमेरिकी प्रतिबंधों की पृष्ठभूमि के खिलाफ की गई थी। इनमें बैंकिंग और बीमा के खिलाफ मंजूरी शामिल थी। इसके लिए भारत द्वारा ईरान से कच्चे तेल के आयात के लिए भुगतान करने के लिए एक रुपया भुगतान तंत्र की आवश्यकता थी। इस व्यवस्था ने 4 वर्षों की अवधि में 1,00,000 करोड़ रुपये से अधिक की विदेशी मुद्रा की बचत की। ईरान के लिए, भुगतान चैनल अपने तेल निर्यात प्रवाह में महत्वपूर्ण था। भारत ईरानी कच्चे तेल का दूसरा सबसे बड़ा आयातक था।

पी 5 + 1 वार्ता के परिणामस्वरूप परमाणु समझौता हुआ, जिसमें एक कठिन नामकरण है - संयुक्त व्यापक कार्य योजना (जेसीपीओए)। यह समझौता 2015 जुलाई में संपन्न हुआ था। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद्आर 2231 को उसी महीने के दौरान परमाणु समझौते को मंजूरी देते हुए अपनाया गया था। हालांकि पी-5 आम सहमति के साथ अपनाए गए प्रस्ताव को निरस्त नहीं किया गया है, लेकिन ट्रम्प प्रशासन के तहत अमेरिका मई 2018 में समझौते से पीछे हट गया।

ट्रम्प प्रशासन ने ईरान के खिलाफ फिर से प्रतिबंध लगाए, भले ही ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी सहित अन्य हस्ताक्षरकर्ता समझौते के पक्षकार बने हुए हैं। राष्ट्रपति चुनाव प्रचार के दौरान तत्कालीन राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार जो बाइडेन ने कहा था कि वह समझौते में अमेरिका की वापसी सुनिश्चित करेंगे। वार्ताओं को फिर से शुरू करने में देरी के परिणामस्वरूप दोनों पक्षों की ओर से स्थिति सख्त हो गई है। इस बीच रूहानी सरकार की जगह ईरान में राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी के प्रशासन ने ले ली। हालांकि, यूक्रेन संकट ने सौदे को पुनर्जीवित करने में रुचि को नवीनीकृत किया है ताकि ईरानी कच्चे तेल के निर्यात को बाजार में लाया जा सके। इस क्षेत्र की अपनी हालिया यात्रा के दौरान राष्ट्रपति बाइडन ने चर्चा की संभावनाओं को खुला रखा है।
अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण पारगमन गलियारा (आईएनएसटीसी) भारत और मध्य एशिया के साथ-साथ भारत और रूस के बीच कनेक्टिविटी में सुधार करेगा। इस मार्ग में भारतीय बंदरगाहों से बंदर अब्बास तक और वहां से ईरान की उत्तरी सीमा तक की यात्रा शामिल है। उत्तर में, माल को मध्य एशिया या रूस में स्थानांतरित करने के लिए कम से कम 5 पारगमन बिंदु हैं। इनमें से दो लैंड क्रॉसिंग हैं, जबकि अन्य तीन बंदरगाह हैं। चरम पूर्वोत्तर में, ईरान, अफगानिस्तान और तुर्कमेनिस्तान सीमा पर सरखस में एक रेलवे जंक्शन है। यहां से, माल तुर्कमेनिस्तान में जा सकता है। सीमा के दूसरी तरफ, माल के लिए मध्य एशियाई गणराज्यों में से किसी में भी जाने के लिए एक रेल नेटवर्क मौजूद है। दूसरा पारगमन बिंदु सरखस के पश्चिम में इंचेबरुन रेलवे क्रॉसिंग है। इसका उद्घाटन 2014 में कजाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और ईरान के राष्ट्रपतियों द्वारा संयुक्त रूप से किया गया था। पश्चिम में तीसरा क्रॉसिंग ईरान के कैस्पियन सागर तट पर अमीराबाद बंदरगाह है। कजाकिस्तान ने उस बंदरगाह में निवेश किया है जिसका उपयोग वह अनाज निर्यात के लिए करता है। आगे पश्चिम में बंदर-ए-अंजाली का ईरानी बंदरगाह है। यह पहले से ही रूसी बंदरगाह अस्त्रखान या अकताउ के कजाख बंदरगाह पर माल परिवहन के लिए उपयोग में है। पांचवां बिंदु अजरबैजान के साथ ईरान की सीमा के पास चरम पश्चिम में अस्तारा का ईरानी बंदरगाह है। यह रूस के अस्त्रखान बंदरगाह से भी जुड़ा हुआ है।चाबहार बंदरगाह अफगानिस्तान के विकल्पों को भी व्यापक बनाएगा, और पारगमन के लिए कराची बंदरगाह पर इसकी निर्भरता को कम करेगा। पाकिस्तान ने अतीत में अफगान सरकार पर दबाव बनाने के लिए इस निर्भरता का उपयोग लाभ उठाने के रूप में किया है। कराची से माल आयात करने में अक्सर अधिक देरी और चोरी होती है। चाबहार बंदरगाह मध्य एशिया के लैंडलॉक राज्यों के लिए समुद्र के लिए एक आउटलेट भी प्रदान करेगा। जबकि बंदर अब्बास ईरान का सबसे बड़ा बंदरगाह है, यह भीड़भाड़ वाला है और इसमें अधिक देरी होती है। चाबहार के मामले में इससे परेशानी नहीं होगी। ईरानी सरकार टर्मिनल हैंडलिंग शुल्क के मामले में भी छूट प्रदान करती है।सबसे कम वृद्धि है। तब से कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट देखी जाती है, लेकिन यह मंदी की आशंका के कारण अधिक है, बल्कि मांग-आपूर्ति की स्थिति में सुधार के कारण है।

ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों को हटाने और ईरान के अंतरराष्ट्रीय मुख्यधारा में एकीकरण के साथ कच्चे तेल की कीमत की स्थिति में काफी सुधार हो सकता है। ईरान अपने उत्पादन के मौजूदा स्तर पर प्रति दिन कम से कम 1 मिलियन बैरल तेल की आपूर्ति कर सकता है। उसके पास अपने कच्चे तेल का उत्पादन बढ़ाने की महत्वाकांक्षी योजना है। जेसीपीओए को पुनर्जीवित करने के लिए वियना में ईरान और पी 5 + 1 के बीच परमाणु वार्ता फिर से शुरू होने के साथ कुछ आशावादी संकेत हैं। वार्ता की सफलता से न केवल तेल की कीमतों को कम करने में मदद मिलेगी बल्कि क्षेत्रीय तनाव भी कम होगा। ईरान भी अपने पड़ोसियों के साथ नियमित आदान-प्रदान करता रहा है। सबसे अहम बात यह है कि ईरान और सऊदी अरब के बीच कई दौर की चर्चा हो चुकी है। इसके विपरीत, यदि वार्ता सफल नहीं होती है, तो क्षेत्र में विभाजन रेखाएं तेज हो जाएंगी। आज वैश्विक तेल आपूर्ति में 20 प्रतिशत से अधिक हिस्सेदारी रखने वाले इस क्षेत्र में टकराव होना किसी के हित में नहीं है।

ईरानी लोगों ने प्रतिबंधों के दौरान अपना लचीलापन दिखाया है। अंतरराष्ट्रीय मुख्यधारा में इसके एकीकरण से क्षेत्र में स्थिरता आएगी।

मनुस्मृति

. ................मनुस्मृति.................... जरा सोचिए, अगर आज भारत का कानून यह तय कर दे कि— "एक आम आदमी चोरी करे तो उसे...