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सोमवार, 19 फ़रवरी 2024

निर्मल पांडे

#10aug
#18feb 
निर्मल पांडे

🎂जन्म: 10 अगस्त 1962, नैनीताल
⚰️मृत्यु : 18 फ़रवरी 2010, मुम्बई

पत्नी: अर्चना शर्मा (विवा. 2005–2010), कौसर मुनीर (विवा. 1997–2000)
भाई: भारती पांडे, मिथिलेश पांडे, लता पांडे, ज्योति पांडे
माता-पिता: रेवा पांडे
एक भारतीय बॉलीवुड अभिनेता थे, जिन्हें शेखर कपूर की बैंडिट क्वीन (1994) में विक्रम मल्लाह की भूमिका के लिए जाना जाता था , और टेलीविजन श्रृंखला हातिम में दज्जाल की भूमिका, दायरा में एक ट्रांसवेस्टाइट की भूमिका निभाने के लिए जाना जाता था । 1996) जिसके लिए उन्होंने फ्रांस, ट्रेन टू पाकिस्तान (1998) और गॉडमदर (1999) में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री वैलेंटी पुरस्कार जीता ।  उन्होंने मलयालम भाषा की फिल्म दुबई (2001) में किशन भट्टा की भूमिका निभाई ।
उनकी आखिरी फिल्म लाहौर जो उनकी मृत्यु के एक महीने बाद 19 मार्च 2010 को रिलीज़ हुई थी।

निर्मल पांडे की स्मृति में, निर्मल पांडे स्मृति न्यास और फिल्म महोत्सव की स्थापना फिल्म और टीवी निर्देशक अनिल दुबे और फिल्म निर्माता, निर्देशक और सामाजिक कार्यकर्ता रवींद्र चौहान ने मई 2020 में की थी। यह फिल्म महोत्सव उनके जन्मदिन 10 अगस्त को आयोजित किया जाता है।
नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा छोड़ने के बाद वह लंदन चले गए, एक थिएटर ग्रुप, तारा के साथ, उन्होंने हीर रांझा और एंटीगोन जैसे नाटक किए और लगभग 125 नाटकों में अभिनय किया।

दो छोटी भूमिकाएँ करने के बाद, उन्हें पहली बार शेखर कपूर की बैंडिट क्वीन (1994) में देखा गया । उन्हें अमोल पालेकर की दायरा (स्क्वायर सर्कल) (1996), ट्रेन टू पाकिस्तान (1998), इस रात की सुबह नहीं और हम तुम पे मरते हैं जैसी फिल्मों के लिए सकारात्मक समीक्षा मिली । उन्होंने लैला , प्यार किया तो डरना क्या , वन 2 का 4 और शिकारी जैसी फिल्मों और हातिम और प्रिंसेस डॉली और उसका मैजिक बैग (2005) सहित कई टेलीविजन धारावाहिकों में अभिनय किया ।

एक अभिनेता होने के अलावा, वह एक गायक थे, जिन्होंने 1999 में जज़्बा नामक एक एल्बम जारी किया था । 2002 में, उन्होंने प्रसिद्ध नाटककार धर्मवीर भारती द्वारा लिखित एक हिंदी नाटक अंधायुग का निर्देशन किया , जो महाभारत युद्ध के 18 दिनों के बाद की कहानी है। इसमें 70 कलाकार हैं, जिनमें से सभी 1994 में उनके द्वारा शुरू किए गए थिएटर ग्रुप संवेदना से संबंधित हैं।

उनका गाजियाबाद में एक अभिनय संस्थान, "फ्रेश टैलेंट एकेडमी" है और थिएटर कार्यशालाएँ आयोजित करता है। 
निर्मल पांडे की 47 वर्ष की आयु में 18 फरवरी 2010 को उनके 48वें जन्मदिन से लगभग 6 महीने पहले मुंबई में दिल का दौरा पड़ने से मृत्यु हो गई।
📽️
1994 दस्यु रानी 
1996 क्या रात की सुबह नहीं
1996 दायरा ट्रांसवेस्टाइट 
2008 कोई बच ना पायेगा 
1997 औज़ार
1998 पाकिस्तान के लिए ट्रेन 
1998 प्यार किया तो डरना क्या
1999 जहां तुम ले चलो 
1999 धर्म-माता
1999 हम तुम पे मरते हैं
2000 हद कर दी आपने 
2000 शिकारी
2001 दुबई
2001 एक 2 का 4
2002 दीवानगी 
2003 आंच
2003 पथ 
2005 लैला
2008 देशद्रोही 
2008 उलाढाल
2009 मड्रैंक: द स्टाम्प 
2010 केडी
2010 लाहौर

रविवार, 18 फ़रवरी 2024

ख्याम

#18feb
#19aug 
"खय्याम"
(मोहम्मद ज़हूर)

🎂जन्म की तारीख और समय: 18 फ़रवरी 1927, 
राहों, नवांशहर जिला, पंजाब
⚰️मृत्यु की जगह और तारीख: 19 अगस्त 2019, सुजय हॉस्पिटल, मुम्बई

पत्नी: जगजीत कौर (विवा. 1954–2019)
मोहम्मद ज़हूर "खय्याम" हाशमी, जिन्हें "खय्याम" नाम से जाना जाता था, भारतीय फ़िल्मों के प्रसिद्ध संगीतकार थे। अविभाजित पंजाब के राहों नगर में जन्मे खय्याम छोटी उम्र में ही घर से भागकर दिल्ली चले आये, जहाँ उन्होंने पण्डित अमरनाथ से संगीत की दीक्षा ली।
1927 में जन्में ख़य्याम 10 साल की उम्र में ही घर छोड़कर दिल्ली आ गए थे.अभिनेता बनने का सपना उन्हें दिल्ली ले आया था. लेकिन किस्मत को कुछ और मंजूर था. दिल्ली में 5 साल रहते हुए उन्होंने संगीत सीखा और अपनी किस्मत आजमाने के लिए बम्बई (आज के मुंबई) चले गए. खय्याम ने बताया कि वो कैसे बचपन में छिप–छिपाकर फ़िल्में देखा करते थे जिसकी वजह से उनके परिवार वालों ने उन्हें घर से निकाल दिया था.

खय्याम अपने करियर की शुरुआत अभिनेता के तौर पर करना चाहते थे पर धीरे-धीरे उनकी दिलचस्पी फ़िल्मी संगीत में बढ़ती गई और वह संगीत के मुरीद हो गए.

उन्होंने पहली बार फ़िल्म 'हीर रांझा' में संगीत दिया लेकिन मोहम्मद रफ़ी के गीत 'अकेले में वह घबराते तो होंगे' से उन्हें पहचान मिली.

फ़िल्म 'शोला और शबनम' ने उन्हें संगीतकार के रूप में स्थापित कर दिया.

खय्याम ने बताया कि 'पाकीज़ा' की जबर्दस्त कामयाबी के बाद 'उमराव जान' का संगीत बनाते समय उन्हें बहुत डर लग रहा था.

उन्होंने कहा, "पाकीज़ा और उमराव जान की पृष्ठभूमि एक जैसी थी. 'पाकीज़ा' कमाल अमरोही साहब ने बनाई थी जिसमें मीना कुमारी, अशोक कुमार, राज कुमार थे. इसका संगीत गुलाम मोहम्मद ने दिया था और यह बड़ी हिट फ़िल्म थी. ऐसे में 'उमराव जान' का संगीत बनाते समय मैं बहुत डरा हुआ था और वो मेरे लिए बहुत बड़ी चुनौती थी."

खय्याम ने आगे कहा, "लोग 'पाकीज़ा' में सब कुछ देख सुन चुके थे. ऐसे में उमराव जान के संगीत को खास बनाने के लिए मैंने इतिहास पढ़ना शुरू किया."

आखिरकार खय्याम की मेहनत रंग लाई और 1982 में रिलीज हुई मुज़फ़्फ़र अली की 'उमराव जान' ने कामयाबी के झंडे गाड़ दिए.

ख़य्याम कहते हैं, "रेखा ने मेरे संगीत में जान दाल दी. उनके अभिनय को देखकर लगता है कि रेखा पिछले जन्म में उमराव जान ही थी."
खय्याम ने 04 दशकों तक बॉलीवुड फ़िल्मों के लिए संगीत रचना की। वर्ष 1982 में आयी फ़िल्म उमराव जान के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार मिला। इसी फ़िल्म के लिए, और 1977की कभी कभी लिए उन्होंने दो बार सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार भी जीता। वर्ष 2007में खय्याम को संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 2010 में फ़िल्मफ़ेयर लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार और 2018 में हृदयनाथ मंगेशकर पुरस्कार प्राप्त हुआ। कला क्षेत्र में उनके योगदान के लिए खय्याम को वर्ष 2011 में भारत सरकार द्वारा पदम् भूषण पुरस्कार प्रदान किया गया था।
खय्याम ने जगजीत कौर से 1954 में भारतीय फिल्म उद्योग में पहली अंतर-सांप्रदायिक शादियों में से एक से शादी की।उनका एक बेटा था, प्रदीप, जिसकी 2012 में दिल का दौरा पड़ने से मृत्यु हो गई। अपने बेटे की मदद करने की प्रकृति से प्रेरित होकर, उन्होंने कलाकारों और तकनीशियनों की ज़रूरत में मदद करने के लिए "खय्याम जगजीत कौर चैरिटेबल ट्रस्ट" ट्रस्ट शुरू किया।

अपने अंतिम दिनों में, खय्याम विभिन्न आयु संबंधी बीमारियों से पीड़ित थे। 28 जुलाई 2019 को खय्याम को फेफड़ों में संक्रमण के कारण जुहू, मुंबई के सुजय अस्पताल में भर्ती कराया गया था। 19 अगस्त 2019 को 92 वर्ष की आयु में हृदय गति रुकने से उनका निधन हो गया।अगले दिन पूरे राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया।

पुरस्कार

1977- फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ संगीतकार पुरस्कार : कभी कभी
1982- फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ संगीतकार पुरस्कार : उमराव जान
2007- संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार
2011- पद्म भूषण

नामांकन

1980- फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ संगीतकार पुरस्कार : नूरी
1981- फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ संगीतकार पुरस्कार : थोडी़ सी बवफाई
1982- फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ संगीतकार पुरस्कार : बाजा़र
1984 - फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ संगीतकार पुरस्कार : रज़िया सुल्तान

बुधवार, 3 जनवरी 2024

अब्दुल हलीम जाफ़र ख़ाँ

#18feb
#04jan 
पूरा नाम अब्दुल हलीम जाफ़र ख़ाँ
🎂जन्म 18 फ़रवरी, 1927
जन्म भूमि इन्दौर, मध्य प्रदेश
⚰️मृत्यु 04 जनवरी, 2017
मृत्यु स्थान मुम्बई, महाराष्ट्र
अभिभावक उस्ताद जाफ़र खाँ (पिता)
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र सितार वादक
पुरस्कार-उपाधि पद्मभूषण, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, पद्मश्री, शिखर सम्मान
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी अब्दुल हलीम जाफ़र ख़ाँ के सितार वादन की अपनी अलग शैली है, जिसे लोग 'जाफ़रखानी बाज' कहने लगे हैं।
इनका चमत्कारिक सितार वादन संगीत से अनभिज्ञ श्रोताओं को भी रसमग्न कर देता है। इनके वादन की अपनी अलग शैली है, जिसे लोग 'जाफ़रखानी बाज' कहने लगे हैं। इसमें मिज़राव का काम कम तथा बाएँ हाथ का काम ज़्यादा होता हैं। कण, मुर्की, खटका आदि का काम भी अधिक रहता है। प्रस्तुतीकरण में बीन तथा सरोद अंग का आभास होता है।

जीवन परिचय

हलीम साहब का जन्म इन्दौर, मध्य प्रदेश के निकटस्थ जावरा नामक गाँव में सन् 1929 में हुआ था। कुछ समय बाद इनका परिवार बंबई चला गया। अब्दुल हलीम के पिता उस्ताद जाफ़र खाँ भी सितार के अच्छे ज्ञाता थे। बचपन से ही सांगीतिक वातावरण मिलने से संगीत के प्रति लगाव हो जाना स्वाभाविक था।

शिक्षा
प्रारंभिक सितार-शिक्षा अब्दुल हलीम जाफ़र ख़ाँ ने प्रसिद्ध बीनकार उस्ताद बाबू खाँ से शुरू हुई। तत्पश्चात् उस्ताद महबूब खाँ से सितार की उच्च स्तरीय तालीम हासिल की। अब तक आप अपने फन में पूरी तरह माहिर हो चुके थे।

फ़िल्मी जीवन
पिता का इन्तकाल होने की वजह से हलीम साहब के सामने आर्थिक समस्या खड़ी हो गई, परिणामतः आपको फ़िल्मी क्षेत्र में जाना पड़ा। यहाँ आपको काफ़ी कामयाबी मिली, साथ ही सारे भारत में आपके सितार वादन की धूम मच गई। आकाशवाणी के राष्ट्रीय कार्यक्रमों तथा अखिल भारतीय संगीत सम्मेलनों में अपने सितार वादन से आपने लाखों श्रोताओं की आनन्द-विभोर तथा आश्चर्यचकित किया है। आपने चकंधुन, कल्पना, मध्यमी तथा खुसरूबानी जैसे मधुर राग निर्मित किए हैं। कुछ दक्षिणी रागों को भी उत्तर भारत में लोकप्रिय बनाया है। सांस्कृतिक प्रतिनिधिमण्डल के माध्यम से कई बार विदेश भ्रमण कर चुके हैं।

सम्मान और पुरस्कार

पद्मभूषण (2006)
शिखर सम्मान (मध्य प्रदेश सरकार, 1991)
गौरव पुरस्कार (महाराष्ट्र सरकार, 1990)
संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1987)
पद्मश्री (1970)

रविवार, 20 अगस्त 2023

जां निसार

🎂18 फ़रवरी 1914
⚰️19 अगस्त 1976
••••••••••••••••••••••
जां निसार 
कहा जाता है दीपक बुझने से पहले  तेज़  रोशनी बिखरता है.ऐसा ही कुछ मशहूर शायर जां निसार अख़्तर के साथ भी हुआ. बतौर गीतकार उनकी सबसे अंतिम फिल्म 'रज़िया सुल्तान' में उनकी शायरी चरम पर थी.कमाल अमरोही की इस फिल्म 'रज़िया सुल्तान' का लाजवाब संगीत दिया था ख़य्याम ने.उन्होंने इसमें दो जबरदस्त शायरों निदा फ़ाज़ली और जां निसार अख़्तर से गीत लिखवाए. अख़्तर साहब ने जो गीत लिखा था उसको क़ब्बन मिर्ज़ा ने अपनी अनूठी आवाज़ में गाकर हमेशा के लिए अमर कर दिया.
"आई ज़ंजीर की झनकार ख़ुदा ख़ैर करे,
दिल हुआ किसका ग़िरफ़्तार ख़ुदा ख़ैर करे।
इसी  फ़िल्म का एक और गीत बेहद मशहूर हुआ था जो जां निसार अख़्तर का ही लिखा हुआ था. इसे लता मंगेशकर ने अपनी मिठी आवाज में लाजवाब ढंग से गाया है.. "ऐ दिल-ए-नादान…"

18 फरवरी 1914 को  जन्मे जां निसार को ऊर्दू शायरी विरासत में मिली थी. इनके परदादा ’फ़ज़्ले हक़ खैराबादी’ ने मिर्ज़ा गालिब के कहने पर उनके दीवान का संपादन किया था. बाद में 1857 में ब्रिटिश सरकार के ख़िलाफ़ ज़िहाद का फ़तवा ज़ारी करने के कारण उन्हें ’कालापानी’ की सजा हुई थी. जाँ निसार अख्तर के पिता ’मुज़्तर  खैराबादी’ भी मशहूर शायर थे.

जाँ निसार अख़्तर ने अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से एम.ए. गोल्ड मैडल के साथ पास किया था. बंटवारे से पहले ग्वालियर के 'विक्टोरिया कॉलेज' में उन्हें उर्दू पढ़ाने का काम मिला पर दंगों की वजह से वे भोपाल चले आये. सन् 1943 में जाँ निसार की शादी मशहूर शायर ’मज़ाज लखनवी’ की बहन ’साफ़िया सिराज़ुल हक़’ से हुई. उन्हीं से आज के दौर के लोकप्रिय संवाद लेखक और गीतकार जावेद अख़्तरका जन्म हुआ था.भोपाल के हमीदिया कालेज में जांनिसार और साफ़िया, दोनो अध्यापन करने लगे.ये उनके संघर्ष के दिन थे. ये नौकरी रास नहीं आई और 1949 में जांनिसार बंबई चले गए. बीवी साफ़िया अख्तर,बच्चे जावेद अख्तर और सलमान अख्तर को खुदा के हवाले छोड़कर.बम्बई में कृष्णचंदर, इस्मत चुगताई, मुल्कराज आनंद, साहिर लुधियानवी से दोस्ती हुई. जब वे बंबई में संघर्ष कर रहे थे भोपाल में 1953 में कैंसर से सफ़िया की मौत हो गई. कुछ सालउ बाद 1956 में जां निसार ने ख़दीजा तलत से शादी रचा ली.

एक फिल्म गीतकार के रूप में उन्हें सफलता काफी देर से मिली.फ़िल्म थी; यास्मीन (1955)  संगीत था- सी. रामचंद्र द्वारा का. इसके साथ ही उन्होंने हिंदी सिनेमा को एक से एक लाजवाब गीत दिए.अपने चार दशक के करियर में उन्होंने सी.रामचंद्र,ओपी नय्यर, एन दत्ता, जयदेव और खय्याम के जैसे नामी-गिरामी संगीतकारों के साथ काम किया और उनके लिये तक़रीबन 151 गाने लिखे. उनके गानों से सजी कुछ  मशहूर फिल्में आज भी संगीतप्रेमियों के ज़हन में  तरोताज़ा हैं-यास्मीन (1955) बाप रे बाप (1955) सी.आई.डी. (1956) नया अंदाज़ 19656) ब्लैक कैट(1956) छूमन्तर (1957) रुस्तम सोहराब (1963) प्रेम पर्बत (1974) शंकर हुसैन (1977) नूरी (1979) रज़िया सुल्तान (1983)

संगीतकार ख़य्याम के अनुसार जाँ निसार अख़्तर में अल्फ़ाज़ और इल्म का खज़ाना था.एक-एक गीत के लिए चुटकियों में वह कई-कई मुखड़े लिखते थे. दरअसल फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की तरह वह  भी।मुशायरे के शायर नहीं थे.अपनी मृत्यु के चार साल की अवधि के दौरान उन्होंने अपनी रचनाओं के तीन संग्रह प्रकाशित किए, जिनमें से सबसे महत्वपूर्ण, ख़ाक़-ए-दिल (दिल की राख) है, जिसमें 1935 से 1970 तक उनकी प्रतिनिधि कविताएँ हैं.1976 के साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया.

अख्तर साहब न सिर्फ़ गज़लें लिखते थे, बल्कि नज़्में, रूबाइयाँ और फिल्मी गीत भी उसी जोश-ओ-जुनून के साथ लिखा करते थे.उनमें वतनपरस्ती कूट-कूट कर भरी थी. वह जिंदगी भर देश के जवानों को जिंदगी की सही राह दिखाते, जगाते, आगाह करते रहे.उसका एक बेहतरीन नमूना देखिये:
"एक है अपना जहाँ,
एक है अपना वतन,
अपने सभी सुख एक हैं,
अपने सभी ग़म एक हैं
आवाज़ दो हम एक हैं'."

जां निसार अख़्तर के साथ यह दुर्भाग्य और सौभाग्य दोनों रहा कि वो उस दौर के सबसे बड़े शायर और हिंदी सिनेमा के सबसे ज़्यादा पैसे पाने वाले गीतकार साहिर लुधियानवी के सबसे क़रीबी दोस्तों में से एक थे.कहा जाता है कि अपनी ज़िन्दगी के सबसे हसीन साल साहिर लुधियानवी के साथ दोस्ती में ग़र्क़ कर दिए.वो साहिर के साए में ही रहे और साहिर ने उन्हें उभरने का मौका नहीं दिया लेकिन जैसे ही वो साहिर की दोस्ती से आज़ाद हुए, उनमें और उनकी शायरी में 'क्रांतिकारी परिवर्तन: हुआ.
उसके बाद उन्होंने जो भी लिखा उससे  शायरी धनवान हुई. 

जां निसार को भारत के पहले प्रधान- मंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा पिछले 300 वर्षों की सर्वश्रेष्ठ हिंदुस्तानी कविता को समेटने के लिए कमीशन किया गया था, और बाद में दो खंडों में 'हिंदुस्तान हमारा' नामक पुस्तक का पहला संस्करण इंदिरा गांधी द्वारा जारी किया गया था. इसमें भारत और उसके इतिहास के लिए प्यार और प्रशंसा से लेकर होली और दिवाली जैसे त्योहारों तक, गंगा, यमुना और हिमालय जैसी भारतीय नदियों पर उर्दू छंद शामिल थे.

उन्होंने प्रदीप कुमार और मीना कुमारी अभिनीत एक फिल्म, बहू बेगम (1967) का लेखन और निर्माण किया. पर  गीत उन्होंने साहिर साहब से लिखवाए.फ़िल्म चल न सकी.19 अगस्त 1976 को बॉम्बे में उनका निधन हो गया.उन्हें मरणोपरांत 1980 के फिल्म नूरी के "आजा रे मेरे दिलबर" के लिए सर्वश्रेष्ठ गीतकार पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया था.

उनके बारे में मशहूर शायर निदा फ़ाजली लिखते  हैं- "जां निसार आख़िरी दम तक जवान रहे.बुढ़ापे में जवानी का यह जोश उर्दू इतिहास में एक चमत्कार है जो उनकी याद को शेरो-अदब की महफ़िल में हमेशा जवान रखेगा."
"आहट सी कोई आए तो लगता है कि तुम हो 
साया कोई लहराए तो लगता है कि तुम हो".

महान शायर और गीतकार जां निसार अख़्तर की 47 वीं पुण्यतिथी पर हम उन्हें हार्दिक श्रद्धा- सुमन अर्पित करते हैं.
🙏🙏

शनिवार, 19 अगस्त 2023

अब्दुल राशिद खान

अब्दुल राशिद ख़ान 
प्रसिद्ध हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायक अब्दुल राशिद खान की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि

अब्दुल राशिद ख़ान 
🎂 जन्म: 19 अगस्त 1908 
⚰️मृत्यु: 18 फ़रवरी 2016
 प्रसिद्ध हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायक थे। ये ग्वालियर घराने से थे। इन्हें पद्मभूषण (2013), संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (2009) आदि से नवाजा जा चुका है।

अब्दुल राशिद ख़ान का जन्म 19 अगस्त, 1908 को रायबरेली, उत्तर प्रदेश में हुआ था।
उन्हें वर्ष 2013 में पद्मभूषण से सम्मानित किया गया था।
उस्ताद अब्दुल राशिद ख़ान ग्वालियर घराने से जुड़े थे।
अब्दुल राशिद ख़ान लगभग 20 वर्ष तक आईटीसी संगीत अनुसंधान अकादमी से जुड़े रहे।
वे 105 वर्ष की उम्र में पद्मभूषण (2013) पाने वाले सबसे उम्रदराज व्यक्ति थे।

निधन

करीब 107 वर्ष की अवस्था में 18 फ़रवरी 2016 को उनका निधन हो गया था। उम्र और बीमारियां उनके लिए कभी भी बाधक साबित नहीं हुईं। उनके एक छात्र के अनुसार राशिद ख़ान ने मरने से एक दिन पहले तक संगीत की शिक्षा दी। अब्दुल राशिद ख़ान के निधन पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने शोक व्यक्त किया। उन्होंने ट्विटर पर लिखा कि दिग्गज गायक के निधन पर मैं दुखी हूं। देश ने इनके निधन के साथ संगीत की दुनिया में एक महान मणि को खो दिया है।

शुक्रवार, 18 अगस्त 2023

"खय्याम"

"खय्याम"
🎂जन्म की तारीख और समय: 18 फ़रवरी 1927, राहोन
⚰️मृत्यु की जगह और तारीख: 19 अगस्त 2019, सुजय हॉस्पिटल, मुम्बई
पत्नी: जगजीत कौर (विवा. 1954–2019)

मोहम्मद ज़हूर "खय्याम" हाशमी, जिन्हें "खय्याम" नाम से जाना जाता था, भारतीय फ़िल्मों के प्रसिद्ध संगीतकार थे। अविभाजित पंजाब के राहों नगर में जन्मे खय्याम छोटी उम्र में ही घर से भागकर दिल्ली चले आये, जहाँ उन्होंने पण्डित अमरनाथ से संगीत की दीक्षा ली।
1927 में जन्में ख़य्याम 10 साल की उम्र में ही घर छोड़कर दिल्ली आ गए थे.अभिनेता बनने का सपना उन्हें दिल्ली ले आया था. लेकिन किस्मत को कुछ और मंजूर था. दिल्ली में 5 साल रहते हुए उन्होंने संगीत सीखा और अपनी किस्मत आजमाने के लिए बम्बई (आज के मुंबई) चले गए. खय्याम ने बताया कि वो कैसे बचपन में छिप–छिपाकर फ़िल्में देखा करते थे जिसकी वजह से उनके परिवार वालों ने उन्हें घर से निकाल दिया था.

खय्याम अपने करियर की शुरुआत अभिनेता के तौर पर करना चाहते थे पर धीरे-धीरे उनकी दिलचस्पी फ़िल्मी संगीत में बढ़ती गई और वह संगीत के मुरीद हो गए.

उन्होंने पहली बार फ़िल्म 'हीर रांझा' में संगीत दिया लेकिन मोहम्मद रफ़ी के गीत 'अकेले में वह घबराते तो होंगे' से उन्हें पहचान मिली.

फ़िल्म 'शोला और शबनम' ने उन्हें संगीतकार के रूप में स्थापित कर दिया.

खय्याम ने बताया कि 'पाकीज़ा' की जबर्दस्त कामयाबी के बाद 'उमराव जान' का संगीत बनाते समय उन्हें बहुत डर लग रहा था.

उन्होंने कहा, "पाकीज़ा और उमराव जान की पृष्ठभूमि एक जैसी थी. 'पाकीज़ा' कमाल अमरोही साहब ने बनाई थी जिसमें मीना कुमारी, अशोक कुमार, राज कुमार थे. इसका संगीत गुलाम मोहम्मद ने दिया था और यह बड़ी हिट फ़िल्म थी. ऐसे में 'उमराव जान' का संगीत बनाते समय मैं बहुत डरा हुआ था और वो मेरे लिए बहुत बड़ी चुनौती थी."

खय्याम ने आगे कहा, "लोग 'पाकीज़ा' में सब कुछ देख सुन चुके थे. ऐसे में उमराव जान के संगीत को खास बनाने के लिए मैंने इतिहास पढ़ना शुरू किया."

आखिरकार खय्याम की मेहनत रंग लाई और 1982 में रिलीज हुई मुज़फ़्फ़र अली की 'उमराव जान' ने कामयाबी के झंडे गाड़ दिए.

ख़य्याम कहते हैं, "रेखा ने मेरे संगीत में जान दाल दी. उनके अभिनय को देखकर लगता है कि रेखा पिछले जन्म में उमराव जान ही थी."
अपने अंतिम दिनों में, खय्याम विभिन्न आयु संबंधी बीमारियों से पीड़ित थे। 28 जुलाई 2019 को खय्याम को फेफड़ों में संक्रमण के कारण जुहू, मुंबई के सुजय अस्पताल में भर्ती कराया गया था। 19 अगस्त 2019 को 92 वर्ष की आयु में हृदय गति रुकने से उनका निधन हो गया। अगले दिन पूरे राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया।

बुधवार, 9 अगस्त 2023

निर्मल पांडेय

निर्मल पांडे
फ़िल्म अभिनेता
🎂जन्मतिथि: 10-अगस्त -1962
नैनीताल, उत्तराखंड, भारत
⚰️मृत्यु तिथि: 18-फ़रवरी-2010
व्यवसाय: अभिनेता, टेलीविजन अभिनेता
निर्मल पांडे (10 अगस्त 1962 - 18 फरवरी 2010) एक भारतीय बॉलीवुड अभिनेता थे, जिन्हें शेखर कपूर की बैंडिट क्वीन (1994) में विक्रम मल्लाह की भूमिका के लिए जाना जाता था, और टेलीविजन श्रृंखला हातिम में दज्जाल, दायरा (1996) में एक ट्रांसवेस्टाइट की भूमिका निभाने के लिए जाना जाता था। जिसके लिए उन्होंने फ्रांस, ट्रेन टू पाकिस्तान (1998) और गॉडमदर (1999) में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता वैलेंटी पुरस्कार जीता। उन्होंने मलयालम मूवी दुबई (2001) में ममूटी के सामने मुख्य प्रतिद्वंद्वी किशन भट्टा की भूमिका निभाई, उन्हें 22 फरवरी 2010 को हास्य कलाकार आर के साथ एक विशेष स्क्रीनिंग में अपनी नवीनतम फिल्म लाहौर देखनी थी।
क।
लक्ष्मण और संगीत उस्ताद एम.
एम।
क्रीम.
यह 19 मार्च 2010 को रिलीज़ होने वाली थी और यह पांडे की आखिरी फिल्म साबित होगी।

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...