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सोमवार, 4 दिसंबर 2023

मोती लाल राज वंश

मोती लाल राजवंश
🎂जन्म की तारीख और समय: 04 दिसंबर 1910, शिमला (हिमाचल परदेश)
⚰️मृत्यु की जगह और तारीख: 17 जून 1965, मुम्बई
पार्टनर: शोभना समर्थ
      #04dic
      #17jun 

मोतीलाल राजवंश हिन्दी फ़िल्मों के एक अभिनेता थे। उनको हिंदी सिनेमा के पहले सहज अभिनेता होने का श्रेय दिया जाता है। उनको फ़िल्म देवदास और परख के लिए फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का पुरस्कार मिला। 
मोतीलाल राजवंश ने अपने स्क्रीन करियर के बारे में विशिष्ट हास्य के साथ कहा: 
100 बार शादी हुई, लगभग दो बार मृत्यु हुई, कभी जन्म नहीं हुआ लेकिन हमेशा पैराशूट द्वारा नीचे लाया गया।
मोतीलाल  हिंदी सिनेमा के प्रसिद्ध अभिनेता थे। मोतीलाल ने अपने जादू से नायक और चरित्र अभिनेता के रूप में दो दशक तक दर्शकों के दिलों पर राज किया। उन्होंने हिंदी फ़िल्मों को मेलोड्रामाई संवाद अदायगी और अदाकारी की तंग गलियों से निकालकर खुले मैदान की ताजी हवा में खड़ा किया।

शिमला में 4 दिसंबर 1910 को जन्मे मोतीलाल राजवंश जब एक साल के थे, तभी पिता का साया सिर से उठ गया। चाचा ने परवरिश की, जो उत्तर प्रदेश में सिविल सर्जन थे। चाचा ने मोती को बचपन से जीवन को बिंदास अंदाज में जीने और उदारवादी सोच का नजरिया दिया। शिमला के अंग्रेज़ी स्कूल में शुरूआती पढ़ाई के बाद उत्तर प्रदेश और फिर दिल्ली में उच्च शिक्षा हासिल की। अपने कॉलेज के दिनों में वे हरफनमौला विद्यार्थी थे। नौसेना में शामिल होने के इरादे से मुंबई आए थे। अचानक बीमार हो गए, तो प्रवेश परीक्षा नहीं दे पाए। शानदार ड्रेस पहनकर सागर स्टूडियो में शूटिंग देखने जा पहुंचे। वहां निर्देशक कालीप्रसाद घोष एक सामाजिक फ़िल्म की शूटिंग कर रहे थे। अपने सामने स्मार्ट यंगमैन मोतीलाल को देखा, तो उनकी आंखें खुली रह गई। उन्हें अपनी फ़िल्म के लिए ऐसे ही हीरो की तलाश थी, जो बगैर बुलाए मेहमान की तरह सामने खड़ा था। उन्होंने अगली फ़िल्म 'शहर का जादू' (1934) में सविता देवी के साथ मोतीलाल को नायक बना दिया। तब तक पार्श्वगायन प्रचलन में नहीं आया था। लिहाजा मोतीलाल ने के. सी. डे के संगीत निर्देशन में अपने गीत खुद गाए थे। इनमें 'हमसे सुंदर कोई नहीं है, कोई नहीं हो सकता' गीत लोकप्रिय भी हुआ। सागर मूवीटोन उस जमाने में कलाकारों की नर्सरी थी। सुरेंद्र, बिब्बो, याकूब, माया बनर्जी, कुमार और रोज जैसे कलाकार वहां कार्यरत थे। निर्देशकों में महबूब ख़ान, सर्वोत्तम बदामी, चिमनलाल लोहार अपनी सेवाएं दे रहे थे। मोतीलाल ने अपनी शालीन कॉमेडी, मैनरिज्म और स्वाभाविक संवाद अदायगी के जरिए तमाम नायकों को पीछे छोड़ते हुए नया इतिहास रचा। परदे पर वे अभिनय करते कभी नजर नहीं आए। मानो उसी किरदार को साकार रहे हो।

वर्ष 1937 में मोतीलाल ने सागर मूवीटोन छोडकर रणजीत स्टूडियो में शामिल हुए। इस बैनर की फ़िल्मों में उन्होंने 'दीवाली' से 'होली' के रंगों तक, ब्राह्मण से अछूत तक, देहाती से शहरी छैला बाबू तक के बहुरंगी रोल से अपने प्रशंसकों का भरपूर मनोरंजन किया। उस दौर की लोकप्रिय गायिका-नायिका खुर्शीद के साथ उनकी फ़िल्म 'शादी' सुपर हिट रही थी। रणजीत स्टूडियो में काम करते हुए मोतीलाल की कई जगमगाती फ़िल्में आई- 'परदेसी', 'अरमान', 'ससुराल' और 'मूर्ति'। बॉम्बे टॉकीज ने गांधीजी से प्रेरित होकर फ़िल्म 'अछूत कन्या' बनाई थी। रणजीत ने मोतीलाल- गौहर मामाजीवाला की जोडी को लेकर 'अछूत' फ़िल्म बनाई। फ़िल्म का नायक बचपन की सखी का हाथ थामता है, जो अछूत है। नायक ही मंदिर के द्वार सबके लिए खुलवाता है। इस फ़िल्म को गांधीजी और सरदार पटेल का आशीर्वाद मिला था। 1939 में इन इंडियन फ़िल्म्स नाम से ऑल इंडिया रेडियो ने फ़िल्म कलाकारों से साक्षातकार की एक शृंखला प्रसारित की थी। इसमें 'अछूत' का विशेष उल्लेख इसलिए किया गया था कि फ़िल्म में गांधीजी के अछूत उद्घार के संदेश को सही तरीके से उठाया गया था। नायकों में सर्वाधिक वेतन पाने वाले थे उस जमाने के लोकप्रिय अभिनेता मोतीलाल, उन्हें ढाई हजार रुपये मासिक वेतन के रूप में मिलते थे। फ़िल्मी कलाकारों से मिलने के लियए उस जमाने में भी लोग लालायित रहते थे।

मोतीलाल की अदाकारी के अनेक पहलू हैं। कॉमेडी रोल से वे दर्शकों को गुदगुदाते थे, तो 'दोस्त' और 'गजरे' जैसी फ़िल्मों में अपनी संजीदा अदाकारी से लोगों की आंखों में आंसू भी भर देते थे। वर्ष 1950 के बाद मोतीलाल ने चरित्र नायक का चोला धारणकर अपने अद्भुत अभिनय की मिसाल पेश की। विमल राय की फ़िल्म 'देवदास' (1955) में देवदास के शराबी दोस्त चुन्नीबाबू के रोल को उन्होंने लार्जर देन लाइफ का दर्जा दिलाया। दर्शकों के दिमाग में वह सीन याद होगा, जब नशे में चूर चुन्नीबाबू घर लौटते हैं, तो दीवार पर पड़ रही खूंटी की छाया में अपनी छड़ी को बार-बार लटकाने की नाकाम कोशिश करते हैं। 'देवदास' का यह क्लासिक सीन है। राज कपूर निर्मित और शंभू मित्रा-अमित मोइत्रा निर्देशित फ़िल्म 'जागते रहो' (1956) के उस शराबी को याद कीजिए, जो रात को सुनसान सडक पर नशे में झूमता-लडखडाता गाता है- 'ज़िंदगी ख्वाब है
पाये थे। फ़िल्म का नाम भी नहीं याद रह पाया था उनको, न उसके निर्माता-निर्देशक का अता-पता, लेकिन उस फ़िल्म के निर्माण के मध्य जिस छोटी सी घटना के माध्यम से उन्हें जीवन के सबसे बड़े सन्तोष की प्राप्ति हुर्इ थी वह जीवन के अंत तक उनकी आंखों में तैरती रही। कोशिश करने पर भी उसे भूल सकना शायद उनके लिये संभव ही नहीं हो पाया।

बम्बर्इ के बोरीबन्दर के सम्मुख वह उस दृश्य की शूटिंग कर रहे थे। भूमिका थी जूतों पर पालिश करने वाले एक आदमी की। फटे-पुराने कपड़े, बढ़ी हुर्इ डाढ़ी-मूंछें, धूलधूसरित हाथ-पैर और आंखों में एक दारूण दैन्य। पालिश करने वाले उस पात्र का जैसे पूरा रूप उजागर हो गया हो उनके माध्यम से। तभी उनको एक परिचित वृद्ध दिखायी दे गये और यह जानते हुए भी कि वह मात्र अभिनय है, मोती के लिये उनकी आंखों से आंख मिला पाना मुमकिन नहीं हो पाया उस वक्त। लेकिन वह सज्जन मोती के पास पहुंच चुके थे और तब मोती को उनकी ओर मुखातिब ही होना पड़ा। देखा, उन बुज़ुर्ग की आंखों से अविरल आंसू बह रहे थे और अपने उन्हीं आंसुओं के मध्य वह मोती से कहते जा रहे थे, अभी तो मैं ज़िंदा हूँ बेटा, मेरे पास तुम क्यों नहीं आये आखिर – जैसे भी होता हम लोग मिलजुल कर अपना पेट पाल लेते, यह नौबत आने ही क्यों दी तुमने? …… और मोती कुछ भी नहीं बोल पाये थे उस वक्त। अपनी सफ़ार्इ दे पाना भी संभव नहीं लग रहा था उनको। लेकिन उस घटना को मोती आजीवन अपनी अभिनय-प्रतिभा का सबसे बड़ा प्रमाणपत्र मानते रहे, और जब कभी उसकी याद उनको आती थी उनकी आंखों से झरझर आंसू बहने लगते थे।

पहले के दिग्गज फ़िल्म निर्देशकों को अपने पर पूरा विश्वास और भरोसा होता था। उनके नाम और प्रोडक्शन की बनी फ़िल्म का लोग इंतज़ार करते थे। उसमें कौन काम कर रहा है यह बात उतने मायने नहीं रखती थी। कसी हुई पटकथा और सधे निर्देशन से उनकी फ़िल्में सदा धूम मचाती रहती थीं। अपनी कला पर पूर्ण विश्वास होने के कारण ऐसे निर्देशक कभी किसी प्रकार का समझौता नहीं करते थे। ऐसे ही फ़िल्म निर्देशक थे वही। शांताराम। उन्हीं से जुड़ी एक घटना का ज़िक्र है :-

उन दिनों शांताराम जी डॉ. कोटनीस पर एक फ़िल्म बना रहे थे "डॉ. कोटनीस की अमर कहानी" जिसमें उन दिनों के दिग्गज तथा प्रथम श्रेणी के नायक मोतीलाल को लेना तय किया गया था। मोतीलाल ने उनका प्रस्ताव स्वीकार भी कर लिया था। शांतारामजी ने उन्हें मुंहमांगी रकम भी दे दी थी। पहले दिन जब सारी बातें तय हो गयीं तो मोतीलाल ने अपने सिगरेट केस से सिगरेट निकाली और वहीं पीने लगे। शांतारामजी बहुत अनुशासनप्रिय व्यक्ति थे। उनका नियम था कि स्टुडियो में कोई धूम्रपान नहीं करेगा। उन्होंने यह बात मोतीलाल को बताई और उनसे ऐसा ना करने को कहा। मोतीलाल को यह बात खल गयी, उन्होंने कहा कि सिगरेट तो मैं यहीं पिऊंगा। शांतारामजी ने उसी समय सारे अनुबंध खत्म कर डाले और मोतीलाल को फ़िल्म से अलग कर दिया। फिर खुद ही कोटनीस की भूमिका निभायी।

सम्मान और पुरस्कार

1961 - फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता पुरस्कार - परख
1957 - फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता पुरस्कार - देवदास

उन्होंने अपने जीवन के उत्तरार्द्घ में राजवंश प्रोडक्शन क़ायम करके फ़िल्म 'छोटी-छोटी बातें' बनाई थी। फ़िल्म को राष्ट्रपति का सर्टिफिकेट ऑफ मेरिट जरूर मिला, पर मोतीलाल दिवालिया हो गए। फ़िल्म 'तीसरी कसम' शैलेंद्र के जीवन के लिए भारी साबित हुई थी। मोतीलाल का यही हाल 'छोटी छोटी बातें' कर गयी कहा जाता है कि मोती अभिनय नहीं करते थे, अभिनय की भूमिका को अपने में आत्मसात कर जाते थे वह। इसी से आप उनकी किसी भी फ़िल्म को याद कीजिए, आपको ऐसा लगेगा जैसे उस कहानी का जीवित पात्र आपकी आंखों के सम्मुख आकर उपस्थित हो गया हो। मोती स्वयं इसका कारण नहीं समझ पाते थे - या शायद यह फिर उनकी विनम्रता रही हो। अपने अभिनय जीवन के प्रारंभ की उस घटना को आजीवन विस्मृत नहीं कर सकते
📽️
ये जिंदगी कितनी हसीन है (1966)
छोटी छोटी बातें (1965)
वक़्त (1965)
सोलह सिंगार करे दुल्हनिया (भोजपुरी) (1965)
जी चाहता है (1964)
नेता (1964)
ये रास्ते हैं प्यार के (1963)
असली-नकली (1962)
परख (1960)
अनाड़ी (1959)
पैघम (1959)
अब दिल्ली दूर नहीं (1957)
जागते रहो (1956)
देवदास (1955)
धुन (1953)
एक दो तीन (1953)
अपनी इज्जत (1952)
श्री संपत (1952)
हमारी बेटी (1950)
हंसते आंसू (1950)
एक थी लड़की (1949)
लेख (1949)
गजरे (1948)
मेरा मुन्ना (1948)
आज की रात (1948)
दो दिल (1947)
फुलवारी (1946)
पहली नज़र (1945)
दोस्त (1944)
मुजरिम (1944)
रौनक (1944)
उमंग (1944)
आगे कदम (1943)
तक़दीर (1943)
तसवीर (1943)
अरमान (1942)
परदेसी (1941)
ससुराल (1941)
अछूत (1940)
होली (1940)
आप की मर्जी (1939)
सच है (1939)
हम तुम और वो (1938)
तीन सौ दिन के बाद (1938)
कैप्टन कीर्ति कुमार (1937)
जागीरदार (1937)
कुलवधु (1937)
कोकिला (1937)
दिलावर (1936)
दो दीवाने (1936)
जीवन लता (1936)
लग्न बंधन (1936)
दो घड़ी की मौज (1935)
डॉ. मधुरिका (1935)
सिल्वर किंग (1935)
शहर का जादू (1934)
वतन परस्ता (1934)

निदेशक

छोटी छोटी बातें (1965)

शनिवार, 17 जून 2023

रवि सुंदरम

रवि सुंदरम

जन्म : 17 जून 1947
13 नवंबर को नवी मुंबई में उनकी मृत्यु हो गई

रवि सुंदरम को दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे (1995), चांदनी (1989) और दयावान (1988) के लिए जाना जाता है।
रवि सुंदरम, चुरा लिया गिटार रिफ़ के पीछे आदमी, महबूबा मैंडोलिन

लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, आरडी बर्मन और नौशाद के कई हिट गानों में बैंजो और मैंडोलिन सोलो का इस्तेमाल करने वाले दिग्गज संगीतकार का पिछले महीने निधन हो गया।

सोनल पंड्या ने बताया

बहुमुखी प्रतिभा के धनी रवि सुंदरम, जिनका जन्म 17 जून 1947 को हुआ था, ने नौशाद से लेकर जतिन-ललित तक हिंदी सिनेमा के कई बेहतरीन संगीतकारों के साथ बैंजो, मैंडोलिन, बालिका, गुलज़ूकी और गिटार बजाया। उनके सोलो टुकड़े बहुत लोकप्रिय हैं, हालांकि, निश्चित रूप से, उनके पीछे संगीतकार को शायद ही कोई जानता था।

यादों की बारात (1973) में 'चुरा लिया' के लिए प्रतिष्ठित गिटार रिफ़ से लेकर शोले (1975) में आरडी बर्मन द्वारा रचित 'महबूबा महबूबा' में यादगार मैंडोलिन तक, रवि अज्ञात संगीतकार थे जिन्होंने इन अद्भुत रचनाओं को जीवंत किया। 

रवि, ​​जिन्हें बड़े पैमाने पर दिल का दौरा पड़ा और 13 नवंबर को नवी मुंबई में उनकी मृत्यु हो गई, ने अपने करियर की शुरुआत अपनी किशोरावस्था में ही की थी। उनकी बेटी, संगीता सुंदरम ने याद किया: “मेरे दादा, सुंदरम, हैदराबाद के एक वायलिन वादक थे। वे ऑल इंडिया रेडियो पर नाटक करते थे। यह निजाम के दिनों [हैदराबाद में] तक जाता है। उन्हें हैदराबाद से भागकर [मुंबई] आना पड़ा। मेरे दादाजी ने किसी समय सिने म्यूज़िशियन एसोसिएशन (CMA) में दाखिला लिया था। इस तरह [मेरे पिता] 13 साल की उम्र से CMA का हिस्सा थे।”
एक कुशल गिटारवादक और CMA के साथी सदस्य तुषार परते ने रवि को याद किया। उन्होंने कहा, "वह मेरे पिता, जयकुमार परते [फिल्म उद्योग में एक संगीत अरेंजर्स] को जानते थे। वह मेरी शादी में आया था, मेरे पास एक फोटो है। वह जमीन से जुड़े संगीतकार थे, कोई गॉसिप नहीं; वह मैंडोलिन बजाते हुए अपने संगीत के लिए बहुत समर्पित थे।

परते ने उन लोक गीतों को याद किया जिनके लिए रवि ने लता मंगेशकर के साथ अभिनय किया था। "[मराठी] 'मी डोलकर' जैसे लोक गीत, उन गीतों में उन्होंने मैंडोलिन बजाया। वे बहुत प्रसिद्ध गीत हैं और प्रसिद्ध मेन्डोलिन टुकड़े हैं। महाराष्ट्र में, हर कोई इन कोली  [ मछुआरों ] गीतों को जानता है, ये लताजी द्वारा गाए गए सदाबहार क्लासिक्स हैं। मैं तारीखों के बारे में निश्चित नहीं हूं लेकिन बचपन में भी मैं उन गानों को सुनता था।”

दादा साहेब फाल्के फिल्म फाउंडेशन पुरस्कार जीतने के लिए जब सीएमए ने रवि सुंदरम को सम्मानित किया, तब पार्टे मौजूद थे। अप्रैल में रवि को यह सम्मान प्रदान किया गया था; वह 1961 में CMA में शामिल हुए थे और संगीता ने याद किया कि वे कितने खुश थे। उन्होंने कहा, 'इस साल दादासाहेब पुरस्कार मिलने पर वह बहुत खुश थे। उसके बाद उन्हें हरि प्रसाद चौरसिया द्वारा पुरस्कार जीतने के लिए CMA में सम्मानित किया गया, जो एक अच्छे दोस्त हैं।

संगीता ने अपने पिता के पसंदीदा वाद्ययंत्र मैंडोलिन से संबंधित एक घटना सुनाई। "वह फिल्म द गॉडफादर (1972) और विशेष रूप से एकल ट्रैक से प्रेरित थे, जो एक मैंडोलिन पर बजाया जाता है, जो उनका पसंदीदा था," उसने कहा। "तो हर बार मैं उसे ऊपर रखता था। वास्तव में, आप विश्वास नहीं करेंगे, शनिवार की रात उसके समाप्त होने से पहले, गॉडफादर [टीवी पर खेल रहा था]। मैं घर आया और उससे पूछा, 'अरे, द गॉडफादर टीवी पर , क्या आप देखना चाहते हो?' हमने पिछली रात द गॉडफादर को देखा और देखा।

रवि ने अपने संगीत की शुरुआत अपने पिता से सीखकर घर पर की थी। संगीता ने कहा , "मेरे दादाजी के पास हर किसी को सीखने के लिए एक विशिष्ट गुरुकुल प्रणाली थी, इसलिए मेरे परिवार में, मेरे पिता के परिवार में हर कोई तब सीखा जब वे बहुत छोटे थे।" "वे सुबह 5 बजे उठ जाते थे और सीखते थे कि कैसे करना है। मैंडोलिन और वायलिन बजाओ। मूल रूप से, हर कोई हारमोनियम से शुरू करता है, इसलिए वह आधार है, और फिर आप जो चाहें उठा लेते हैं। मेरे पिताजी को तार वाले वाद्य यंत्र पसंद थे, इसलिए उन्होंने मैंडोलिन उठाया और इस तरह उनके लिए जीवन शुरू हुआ।

उन्होंने कोई समय बर्बाद नहीं किया और संगीत बजाना शुरू किया "13 साल की उम्र में [जब] वह स्कूल में थे, लोग उनके स्कूल में आते थे और उनसे कहते थे, 'अरे, एक टेक या सेशन हो रहा है, तुम क्यों नहीं जाना?' वह बदलता भी नहीं था, वह अपना मैंडोलिन लेकर चला जाता था," संगीता ने कहा।

सर्वश्रेष्ठ संगीतकारों के साथ खेलने के अलावा, रवि लता मंगेशकर जैसे गायकों और आरडी बर्मन जैसे संगीतकारों के साथ पर्यटन पर गए। वह लंदन के रॉयल अल्बर्ट हॉल में भी खेले।

उनकी बेटी ने कहा, “हर बार जब वह यात्रा करते थे, तो सबसे पहले एक संगीत की दुकान पर जाते थे और अपने पसंदीदा वाद्य यंत्र देखते थे। [रवि] बालिका और गुलज़ूकी [हिंदी फिल्म संगीत में] पेश करने वाले पहले व्यक्ति थे। एक ग्रीक है और दूसरा रूसी है। उसने उन्हें खुद उठाया। आरडी बर्मन के साथ उनका तालमेल ऐसा था, वे सुझाव देते थे कि शायद हमें यह करना चाहिए, शायद हमें वह करना चाहिए। और फिर वे इसे उठा लेंगे। वे किसी चीज़ पर अटक जाते और कहते, 'अरे, यह सही लगता है, शायद हमें यह करना चाहिए'।

↔️रवि ने खुद अपने फेसबुक पेज पर बर्मन को पहली बार नया वाद्य यंत्र दिखाए जाने की कहानी लिखी। "महान बोज़ूकी ग्रीक से अपनी उत्पत्ति पाता है। मुझे रोम में अपने एक दौरे के दौरान इस खूबसूरत वाद्य यंत्र को खरीदने की बहुत अच्छी याद है। जैसे ही मैं देश वापस आया, मैं इसे सुनने के लिए पंचम दा के पास गया। मेरा उत्साह जल्द ही घबराहट में बदल गया क्योंकि उसने एक जासूस के ध्यान से इसकी आवाज़ की जाँच की। मेरी राहत के लिए, वह इसे प्यार करता था। और इस प्रकार, यह निर्णय लिया गया कि [कि] बूज़ूकी को [द] शोले टाइटल ट्रैक में पेश किया जाएगा। मुझ पर विश्वास करने के लिए पंचम दा, मैं आपको पर्याप्त धन्यवाद नहीं दे सकता।
↔️☑️शोले (1975) से दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे (1995) तक, रवि ने कई प्रमुख हिंदी फिल्मों में अभिनय किया। कई अलग-अलग भाषाओं में और भी बहुत कुछ हैं जिनके बारे में हम नहीं जानते हैं। संगीता ने कहा कि कई ऐसे हैं जिनसे परिवार के सदस्य भी अनजान रहते हैं। "उसके पास गुजराती गाने नहीं हैं जो उसने किए हैं, मुझे लगता है कि उसने मराठी, उड़िया [साथ ही] किया है। उसे एक दिन में 10 अलग-अलग लोगों से फोन आते थे और वह बस अपना बैग उठाकर सुबह निकल जाता था और सुबह 4 बजे वापस आना। वही दिनचर्या, लगभग हर दिन। उसके पास ट्रैक नहीं है क्योंकि वह इतना व्यस्त था।

संगीता ने उस गर्व के बारे में बताया जब भी वह मोबाइल रिंगटोन पर अपने पिता द्वारा बजाए जाने वाले संगीत को सुनती थी तो उसे गर्व महसूस होता था। "इन रिंगटोन के साथ, जैसे DDLJ सोलो या कर्ज़ सोलो, उसने यह सब बजाया है और मैंने सुना है कि लोगों के पास ये रिंगटोन हैं और यह मेरे मुंह पर है और मैं कहना चाहता हूं, 'आप जानते हैं क्या? मेरे पिताजी ने वह खेला। मुझे इतना गर्व था कि [वह जो संगीत बजाता था] वह भी रिंगटोन था। जाहिर है, उन्होंने उस तरह के संगीत निर्देशकों के साथ काम किया है जिन्होंने इसके बारे में सोचा है और इसे मेरे पिता ने निभाया है।

अच्छे दोस्त और साथी संगीतकार उल्हास बापट ने कहा, "एक शब्द में, मैं कह सकता हूँ - सबसे अच्छा। [वह] बहुत ईमानदार था। मैंने उन्हें बिना वजह रिकॉर्डिंग [स्टूडियो] में देर से आते नहीं देखा। वे बहुत ही समय के पाबंद संगीतकार थे। वह सभी अंकन पूरी तरह से लिखते थे और सब कुछ पूरी तरह से पढ़ते थे और मेरे अनुसार, वह सबसे अच्छे थे।”

बापट ने उन्हें "अपना सबसे अच्छा दोस्त" कहा और उन कई संगीत निर्देशकों को याद किया, जिनके साथ उन्होंने विभिन्न उद्योगों से अभिनय किया था। उन्होंने कहा कि रवि ने मराठी में सुधीर फड़के और अनिल-अरुण से लेकर राम कदम और अशोक पाटकी तक सभी के साथ काम किया है। हिंदी में उन्होंने सबसे ज्यादा लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, आरडी बर्मन और रवींद्र जैन के साथ काम किया।

संतूर वादक, जो रवि से बहुत छोटा था, ने कहा कि वे दोनों कई मौकों पर एक साथ खेले हैं। उन्होंने अपने दोस्त के सबसे अच्छे गानों को भी याद किया, "सागर (1985) में, थीम संगीत, वह वहां के मुख्य संगीतकार थे और बैकग्राउंड स्कोर में एक मैंडोलिन पीस है [जिसे उन्होंने बजाया था]। मुझे याद है कि दक्षिण की एक डब फिल्म थी, प्रतिशोध (1982), और हमने एक बैकग्राउंड स्कोर निभाया, मैं, रविजी और उनके भाई, सेलू। रवींद्र जैन द्वारा रचित यह इतनी कठिन रचना थी कि हम तीनों ने एक अच्छा परिणाम देने की पूरी कोशिश की और मुझे वह टुकड़ा और वह स्थिति आज भी याद है। इसे नवरंग स्टूडियो, परेल में रिकॉर्ड किया गया था।”

बापट ने उन दिनों फोन पर हुई उनकी लंबी बातचीत को भी प्यार से याद किया। "हम फोन पर कम से कम 45 मिनट से एक घंटे तक बात करते थे, हम बात करते थे और संगीतकारों के रूप में अनुभवों का आदान-प्रदान करते थे, विभिन्न संगीत निर्देशकों के बारे में, सब कुछ। हमने संगीत के बारे में बात की। उन्होंने मेरे खेलने की शैली की भी सराहना की, हमने बहुत सारे टुकड़े बजाए। एक साथ। वाद्ययंत्रों के अलावा, हमारी व्यक्तिगत ट्यूनिंग अच्छी थी। वह सभी के साथ मित्रवत थे। हर तबका उन्हें प्यार करता था।

अमृताराव

*,🎂जन्म 17जून*
अभिनेत्री अमृता राव के जन्मदिन पर हार्दिक शुभकामनाएं

अमृता राव एक भारतीय फिल्म मॉडल,अभिनेत्री और फिल्हैंम एवं शोज़ डायरेक्टर हैं।।  
अमृता राव का जन्म 17 जून 1987 में मुंबई में हुआ था। उन्हे अंग्रेजी, हिन्दी, मराठी और कोंकणी भाषाओं का ज्ञान है।
अमृता राव ने अपने बॉयफ्रेंड अनमोल(जो की एक रेडियो जॉकी है) उनसे, 15 मई 2016 को मुंबई में शादी की है। अमृता और अनमोल का एक बेटा है। 
अमृता ने अपने करियर की शुरुआत मॉडलिंग से की थी। उनके मॉडलिंग की शुरुआत एक फेस क्रीम के ऐड के जरिये हुई थी, जिसमे उन्हें 60 मॉडल्स में चुना गया था।  उसके बाद उन्होंने तकरीबन 35 से विज्ञापनों में काम किया। कैड्बरी पर्क और ब्रू काफ़ी की ऎड फ़िल्मों मे उनके शानदार अभिनय के बाद से उन्हे बॉलीवुड फ़िल्मो में काम करने के प्रस्ताव आने लगे।

उन्होंने अपने फ़िल्मी करियर की शुरुआत साल 2002 में फिल्म अब के बरस से की थी। इस फिल्म का निर्देशन राज़ कंवर ने किया था। लेकिन उन्हें हिंदी सिनेमा में पहचान फ़िल्म इश्क विश्क से मिली। इस फिल्म में उनके अपोजिट शाहिद कपूर नजर आये थे। इस फिल्म ने बॉक्स-ऑफिस पर कुछ खास कमाई नहीं की थी, लेकिन वाह दर्शकों की नजर में जरूर आ गयी थीं। इसके बाद वह मस्ती, मैं हूँ ना, वाह लाइफ हो तो ऐसी फिल्मों में नजर आईं। उनकी कुछ फ़िल्में बाॅक्स ऑफ़िस पर असफ़ल भी रही जैसे दीवार, शिखर, प्यारे मोहन शामिल हैं। उसके बाद वह सूरज बड़जात्या की फिल्म विवाह में नजर आई, इस फिल्म में उनके अपोजिट शाहिद कपूर नजर आये थे , यह एक पारिवारिक फिल्म थी, जिसे दर्शकों द्वारा बेहद पसंद भी किया गया। इस फिल्म के बाद वह निर्देशक प्रकाश झा की फिल्म सत्याग्रह और सनी देओल स्टारर फिल्म सिंह साहब दी ग्रेट में नजर आयीं। दोनों ही फिल्मों ने बॉक्स-ऑफिस पर ठीक-ठाक कमाई की थी।

कांति लाल अभिनेता और गायक

*●▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬●
  ꧁ *कांतिलाल छगनलाल पच्चीगर*
*Ş₳ŦเŞ𝓱👸🏻◣🍁💜⃝🇱♥︎2*
*🎂जन्म18 अप्रैल*
*⚰️मृत्यु 17 जून*
*Ş₳ŦเŞ𝓱👸🏻◣🍁💜⃝🇱♥︎2*
●▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬●
  ꧁।  *कांतिलाल छगनलाल पच्चीगर*


पुराने जमाने के गायक अभिनेता भाई कांतिलाल की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रधांजलि

पुराने जमाने के गायक अभिनेता कांतिलाल का जन्म 18 अप्रैल 1907 में सूरत गुजरात मे हुआ था उनका असली नाम कांतिलाल छगनलाल पच्चीगर था उनके परिवार में सुनार का काम होता था कांतिलाल का झुकाव बचपन से ही संगीत की तरफ था जब वह स्कूल में पढ़ते थे तभी उन्होंने ओंकारनाथ से संगीत की शिक्षा लेनी शुरू कर दी वह स्कूल में थिएटर में भाग लेते थे कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने बाद वह बम्बई गायक बनने के लिए आये

उनको पहला ब्रेक  1934 में फ़िल्म बुलबुल-ए-परिस्तान में अभिनेता के रूप में मिला इस फ़िल्म का निर्देशन धीरूभाई देसाई ने विष्णु सिनेटोन बैनर तले किया था इस फ़िल्म में कांतिलाल ने अभिनय के साथ साथ दो गाने भी गाये थे दुनिया एक मुसाफिरखाना है ऐ ख़ुदावंदे तल्लाह इन गानो के लिए संगीत दिया था किकुभाई याग्निक ने

1935 में रिलीज फ़िल्म प्रीत की रीत में उन्होंने अभिनय के साथ साथ 6 गाने भी गाये  
फ़िल्म प्रीत की रीत (1935) फ़िल्म पंजाब का सिंह (1936) फ़िल्म गुलबदन (1937)में उन्होंने संगीत भी दिया था

1937 में उन्होंने रंजीत मूवीटोन जॉइन कर लिया वहाँ उन्होंने 1941 तक काम किया इन चार वर्षों में उन्होंने रंजीत मूवीटोन के 16 फिल्मों में अभिनय किया एवं गाना गाया
जैसे फ़िल्म तूफानी टोली (1937) फ़िल्म बन की चिड़िया (1938) फ़िल्म बिल्ली (1938) फ़िल्म गोरख आया (1938) फ़िल्म नदी किनारे (1939) फ़िल्म आज का हिंदुस्तान (1940) फ़िल्म दीवाली (1940) फ़िल्म होली (1940) फ़िल्म मुसाफिर (1940) फ़िल्म परदेसी (1941) फ़िल्म ससुराल (1941) फ़िल्म उम्मीद (1941) इन सभी फिल्मों में उन्होंने जयंत देसाई ,ए आर कारदार ,चतुर्भुज देसाई जैसे लोगो के साथ काम किया इन 16 फिल्मों में से 6 फ़िल्म में खेमचंद प्रकाश ने बाकी 10 फिल्मों में ज्ञान दत्त ने संगीत दिया था कांतिलाल ने इन दोनों संगीतकारों के लिए 40 गाने गाये
उन्होंने सुप्रीम पिक्चर्स के लिए  गाज़ी सलाहुद्दीन (1939) हॉलिडे इन बॉम्बे (1941) और कंचन (1941) जैसी फिल्मों में काम किया बॉम्बे टाकीज़ के लिए 1939 में कंगन फ़िल्म में काम किया 
फ़िल्म गाज़ी सलाहुद्दीन में वह मुझको जाम दूर से दिखला के पी गया गाना काफी हिट हुआ
फ़िल्म गाज़ी सलाहुद्दीन संगीतकार खेमचन्द प्रकाश की डेब्यू फिल्म थी
फ़िल्म कंगन में उन्होंने मरण रे तू ही मेरो श्याम समान गाना गाया यह गाना रविन्द्र नाथ टैगोर के बंगला गाने पर आधारित था इस गीत में संगीत रामचन्द्र पाल ने दिया था

कांतिलाल ने 5 संगीतकारो के लिए 24 फिल्मों में लगभग 60 गाने गाये
कांतिलाल के सी डे से बहुत ज़्यादा प्रभावित थे यह उनके गीतों में भी झलकता है जैसे
मूरख क्या करता मनमानी फ़िल्म तूफानी टोली मन भाये री मोरे मन भाए फ़िल्म बन की चिड़िया
आराम कहाँ जो दिल लड़ा गैरों के पाले फ़िल्म नदी किनारे

1943 में उन्होंने उषा बेन से विवाह किया
इसके बाद उन्होंने खुद को थिएटर तक सीमित कर लिया उन्होने कुछ गुजराती फिल्मों में भी काम किया

17 जून 1971 में उनका निधन हो गया

शुक्रवार, 16 जून 2023

अनूप कुमार

अनूप कुमार
अनूप कुमार का जन्म 17 जून 1930 को कलकत्ता , ब्रिटिश भारत में हुआ था । उनका असली नाम सत्येन दास था। उनके माता-पिता धीरेंद्र नाथ दास थे जो एक गायक और अभिनेता थे और प्रसिद्ध कवि और संगीतकार, काज़ी नज़रूल इस्लाम [1899-1976] और बिजोया दास के साथ निकटता से जुड़े थे। उन्होंने कलकत्ता जुबली इंस्टीट्यूशन से मैट्रिक पास किया। 1986 में उन्होंने अभिनेत्री आलोक गांगुली से शादी की।

↔️अनूप कुमार ने अपने पिता और सिसिर कुमार भादुड़ी से अभिनय की शिक्षा ली । उन्होंने जीवन में काफी पहले अभिनय करना शुरू कर दिया था। बाल कलाकार के रूप में उन्हें पहला ब्रेक धीरेन गांगुली की फिल्म हल्काथा (1938) में मिला। पलटक , जीबन काहिनी , अलोर पिपासा , निमंत्रन और थगिनी ऐसी फिल्में थीं, जिन्होंने एक अभिनेता के रूप में उनकी बहुमुखी प्रतिभा को उजागर किया। वह लाइव थिएटर, यात्रा और फिल्म निर्देशन से भी जुड़े थे।

1964 में, उन्हें फिल्म पलटक में उनके प्रदर्शन के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के बीएफजेए पुरस्कार से सम्मानित किया गया । उन्होंने स्टार थियेटर से रजत पदक प्राप्त किया । 1988 में, उन्होंने पश्चिम बंगाल नाट्य अकादमी पुरस्कार जीता । 1989 में, उन्हें सिरोमोनी पुरस्कार से सम्मानित किया गया और 1991 में, उन्हें अपनी यात्राओं के लिए सर्वश्रेष्ठ निर्देशक से सम्मानित किया गया । 1997 में, उन्हें फिल्मों में 50 साल पूरे करने के लिए BFJA अवार्ड्स द्वारा मान्यता दी गई थी।

पलटक में अपने शानदार प्रदर्शन के अलावा , अनूप कुमार को उनकी शानदार कॉमिक टाइमिंग के लिए भी याद किया जाता है। नबद्वीप हलदर , भानु बंदोपाध्याय , जहोर रॉय और रबी घोष जैसे क्लासिक कॉमेडियन के साथ , अनूप कुमार को बसंत बिलाप , मौचक , फुलेश्वरी , दादर कीर्ति , प्रोतिशोध आदि जैसी फिल्मों में हास्य भूमिकाओं के लिए काफी पसंद किया जाता है।

↔️राजनीति

1996 में, कुमार कोसीपुर से सीपीआई (एम) के प्रतिनिधि के रूप में विधान सभा के चुनाव में खड़े हुए ; लेकिन वह निर्वाचित नहीं हुआ था।

सोना महापात्रा


सोना महापात्रा
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सोना मैकेनिकल इंजीनियरिंग में कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी, भुवनेश्वर से बीटेक इंजीनियरिंग स्नातक हैं । उन्होंने सिम्बायोसिस सेंटर फॉर मैनेजमेंट एंड एचआरडी , पुणे से मार्केटिंग एंड सिस्टम्स में एमबीए की डिग्री भी प्राप्त की । बाद में उन्होंने मैरिको में ब्रांड मैनेजर के रूप में काम किया , पैराशूट और मेडिकर जैसे ब्रांडों को संभाला
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संगीत उद्योग में उनका पहला उद्यम विज्ञापन के साथ शुरू हुआ। उनके सबसे प्रसिद्ध जिंगल्स में से एक टाटा साल्ट के लिए था - "कल का भारत है" और यूनिलीवर के क्लोज अप के अभियान में उनके गीत "पास आओ ना" का एक भाग है, जिसे कई भाषाओं में रिकॉर्ड किया गया है और 13 देशों में प्रसारित किया गया है। लगातार चार वर्षों के लिए। 2007 में, उन्होंने सोनी रिकॉर्ड्स पर अपना पहला एल्बम सोना जारी किया , जिसमें रॉक, रिदम और ब्लूज़ , फ्लेमेंको , हिंदुस्तानी , बाउल और रोमानी संगीत की विविध शैलियों का पता लगाने की कोशिश की गई थी । 2009 में, उन्होंने उसी वर्ष सिंगल दिलजले और पास आओ ना रिलीज़ किया। उन्होंने आमिर खान प्रोडक्शंस के लिए फिल्म डेल्ही बेली में "बेदर्दी राजा" गाना गाया और इसमें एक कैमियो किया। उन्होंने टीवी शो सत्यमेव जयते के लिए थीम गीत "मुझे क्या बेचागा रुपैया" और "घर याद आता है मुझे" भी गाया है । तलाश के साउंडट्रैक से उनके गीत "जिया लागे ना" को रिलीज़ होने पर शानदार समीक्षा मिली। सोना के पास पांच और संगीतकारों के बीच गिटार गुणी संजय दास का अपना बैंड है और वह एक इलेक्ट्रिक लाइव परफॉर्मर हैं, जिन्होंने न्यूयॉर्क में लिंकन सेंटर सहित कई लाइव स्थानों पर प्रस्तुति दी है।और भारत में चंडीगढ़, चेन्नई और सिलीगुड़ी में स्टेडियम की भीड़ के बीच अन्य। उन्होंने मेहरानगढ़ किले में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय जोधपुर आरआईएफएफ उत्सव का भी नेतृत्व किया है । सोना के गाने "बोलो ना" को दर्शकों ने खूब सराहा।

↔️सोना महापात्रा आमिर खान के साथ ट्रेंडब्रेकिंग टॉक शो सत्यमेव जयते के साथ मुख्य धारा में आईं , जिसमें वह अक्सर मुख्य गायिका और कलाकार के रूप में दिखाई देती थीं। वह उसी शो में म्यूजिकल प्रोजेक्ट की कार्यकारी निर्माता भी थीं। नवीनतम डिजिटल गणना के अनुसार, उनके कैमियो प्रदर्शन को साइटों पर 9 मिलियन से अधिक बार देखा गया। उसने हाल ही में एक साक्षात्कार में स्वीकार किया कि परियोजना में निवेश की गई भावनात्मक और शारीरिक ऊर्जा के मामले में सभी खपत कर रहे थे। इसमें कई गीतकार, अपरंपरागत विषय और गाने, गीत, शूट और रिकॉर्डिंग पर बहुत सारे मंथन शामिल थे। सबसे बढ़कर, सभी गानों का कई भाषाओं में अनुवाद और रिकॉर्ड किया गया। सोना के अनुसार "बॉलीवुड में उड़िया का प्रभाव अभी तक दुर्लभ है - पंजाबी, राजस्थानी, बंगाली और यहां तक ​​​​कि दक्षिणी संगीत के ओवरडोज के विपरीत। महापात्र द्वारा गाया गया गीत" मुझे क्या बनेगा रुपैया, राम संपत द्वारा संगीतबद्ध किया गया था और इस पर प्रसारित किया गया था । महिलाओं की स्वतंत्रता का जश्न मनाने पर आधारित सत्यमेव जयते की तीसरी कड़ी। गाने को टी-सीरीज़ के YouTube चैनल पर 26 मिलियन से अधिक हिट मिले हैं।
↔️महापात्रा ने बॉलीवुड में एक गीत संगीतकार और संगीत निर्देशक राम संपत से शादी की है । वह पहली बार उनसे 2002 में मिली थी, जब वह अभी भी मैरिको के साथ एक ब्रांड मैनेजर के रूप में काम कर रही थी । उनका परिचय निर्देशक राम माधवानी ने कराया , जिनके साथ संपत लेट्स टॉक (2002) के लिए काम कर रहे थे; उन्होंने 2005 में शादी की।  राम बाद में फिल्म डेल्ही बेली (2011) के अपने अभिनव स्कोर के लिए एक घरेलू नाम बन गए, इसके बाद सत्यमेव जयते (2012) और तालाश (2012) आए। वह संपत के साथ उनके म्यूजिक प्रोडक्शन हाउस ओमग्रोन म्यूजिक में पार्टनर हैं और मुंबई में रहती हैं , जहां उनका अपना स्टूडियो भी है।

☑️अक्टूबर 2018 में, उसने कैलाश खेर और अनु मलिक पर यौन दुराचार का आरोप लगाया।  हाल ही में, महापात्रा को जान से मारने की धमकी मिली थी, जब उन्होंने सलमान खान पर भारत छोड़ने के लिए प्रियंका चोपड़ा पर लगातार कटाक्ष करने के लिए निशाना साधा था ।

बीफ नेकिड़


बिफ नेकेड का जन्म नई दिल्ली 🇮🇳, भारत में निजी स्कूल में पढ़ने वाले किशोर माता-पिता के लिए हुआ था। बाद में उसे अमेरिकी मिशनरियों ने गोद ले लिया ।  उन्होंने अपने बचपन का कुछ हिस्सा लेक्सिंगटन, केंटकी में बिताया , जहां उनके पिता केंटकी विश्वविद्यालय में प्रोफेसर थे । वह कुछ वर्षों के लिए द पास ,🇨🇦 मैनिटोबा में केल्सी एलीमेंट्री स्कूल गई ।दौफिन , मैनिटोबा में कुछ समय तक रहने के बाद , उनका परिवार अंततः विन्निपेग में बस गया ।उन्होंने जॉन टेलर कॉलेजिएट से स्नातक की उपाधि प्राप्त की और थिएटर में अध्ययन कियाविन्निपेग विश्वविद्यालय । विश्वविद्यालय के बाद, उन्होंने स्टैंड-अप कॉमिक के रूप में करियर बनाना शुरू किया।

"बिफ" नाम उनके असली नाम बेथ के गलत उच्चारण के आधार पर एक उपनाम के रूप में शुरू हुआ। 

↔️कई भूमिगत बैंडों के साथ गायन में कई साल बिताने के बाद, बिफ नेकेड ने स्वतंत्र रूप से 1994 में एक स्व-शीर्षक एकल एल्बम, बिफ नेकेड , [3] और 1998 में आई बिफिकस जारी किया। 1999 में उसने पूरे कनाडा का दौरा किया।

एक और एकल एल्बम, पर्ज 2001 में जारी किया गया था। उन्होंने ओकेन्सपे ऑर्डवे: थिंग्स आई फॉरगॉट टू टेल मॉमी नामक एक स्पोकन वर्ड एल्बम भी जारी किया । 2005 में, इसे पचास से अधिक गानों से कम करने के बाद, उन्होंने सुपरब्यूटिफुलमॉन्स्टर रिलीज़ किया , जिसमें तेरह ट्रैक थे। प्रॉमिस , जिसे रिकॉर्ड किया गया था, जबकि बिफ स्तन कैंसर के लिए कीमोथेरेपी से गुजर रही थी, 2009 में रिलीज़ हुई थी और अपने प्रशंसकों को समर्पित थी। एल्बम में जूनो अवार्ड विजेता माइक फ्रेजर द्वारा मिश्रित ट्रैक थे. 2011 में, दौरे पर ध्वनिक सेट करने के बाद, बिफ ने 2013 के अंत में उसके रॉयल मैजेस्टीज़ रिकॉर्ड्स पर एक ध्वनिक रिकॉर्ड जारी किया, जिसमें उसके पिछले गीतों के ध्वनिक संस्करणों के साथ-साथ पहले से अप्रकाशित ट्रैक भी शामिल थे। एल्बम का शीर्षक BIF NAKED Forever: Acoustic Hits and Other Delights है । बिफ एक साइड प्रोजेक्ट, जकार्ता में भी शामिल रहा है ।

अपने एकल करियर से पहले, टॉर्बर्ट ने गुंडा बैंड गोरिल्ला गोरिल्ला और क्रोम डॉग के साथ खेला। उसने यूरोप, संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा का एक प्रमुख कार्य के रूप में दौरा किया है, और बिलों पर प्रदर्शन किया है: स्नूप डॉग , बिली आइडल , डिडो , डेविन टाउनसेंड , सारा मैकलाचलन , शेरिल क्रो , क्रिसी हिंडे , फू फाइटर्स , द कल्ट , प्रोडिजी , स्मैशिंग कद्दू , मंत्रालय , ग्रीन डे , और बहुत कुछ।

बिफ के संगीत को बफी द वैम्पायर स्लेयर , चार्म्ड , मूनलाइट , द क्रो: स्टेयरवे टू हेवन , रेडी टू रंबल , द वेस्ट विंग और सेलिब्रिटी डेथमैच सहित शो के साउंडट्रैक में और पर चित्रित किया गया है । उसने एमटीवी के टोटल रिक्वेस्ट लाइव सीडी एमटीवी: टीआरएल क्रिसमस के लिए 1999 में क्रिसमस क्लासिक , " आई सॉ मॉमी किसिंग सांता क्लॉज " का गायन रिकॉर्ड किया और ट्विस्टेड सिस्टर के कवर के साथ रेडी टू रंबल साउंडट्रैक पर भी चित्रित किया गया था। हमलोग इसे नहीं लेंगे"। (जिसे अतिरिक्त रूप से डेविड आर्क्वेट के प्रवेश विषय के रूप में इस्तेमाल किया गया था, जबकि वह WCW मंडे नाइट्रो पर थे)। पर्ज से लिया गया गीत "डॉन" फिल्म अमेरिकन साइको 2 में चित्रित किया गया था , जिसमें मिला कुनिस और विलियम ने अभिनय किया था। शैटनर ।

उन्होंने 2006 में स्ट्रैपिंग यंग लैड के एल्बम द न्यू ब्लैक के गाने "फकर" में अतिथि भूमिका निभाई। बिफ नेकेड ने एसएनएफयू जैसे कलाकारों के साथ "वन लास्ट लवशॉव" और "यू मेक मी मोटा"। वह "इन दिस डे एंड एज" शीर्षक वाले ट्रैक पर डेड सेलेब्रिटी स्टेटस एल्बम ब्लड म्यूजिक में भी दिखाई दीं। 2011 में, उसने वैंकूवर स्थित योगी और नेटवर्क रिकॉर्डिंग कलाकार विल ब्लंडरफ़ील्ड के साथ अपने एल्बम हलेलुजाह के अंतर्राष्ट्रीय संस्करण के लिए एक युगल गीत रिकॉर्ड किया ।

बिफ नेकेड अन्य कलाकारों के लिए संगीत वीडियो में भी दिखाई दिया है, जिनमें शामिल हैं: द ऑफस्प्रिंग के " द किड्स अरे नॉट अलायड ", "बिलीव मी" और "सिल्वर" मोइस्ट और लाइवोनरिलीज़ के "गेट विद इट।" 2009 में, वह सिंपल प्लान के " सेव यू " के वीडियो में अंत के पास अन्य लोगों (जैसे शेरोन ऑस्बॉर्न और रेने एंजेल ) के साथ दिखाई दी, जो बच गए हैं या कैंसर का इलाज करवा चुके हैं।

अपने संगीत करियर के अलावा, बिफ ने अभिनय भी किया है। 1990 में, वह फिल्म महादूत में दिखाई दी , जहां उन्हें एक रूसी सैनिक की भूमिका निभाते हुए "बिफ टोरबर्ट" के रूप में श्रेय दिया गया। 1997 में, उन्होंने द बॉयज़ क्लब में एक शराब स्टोर मैनेजर की भूमिका निभाई । वह 1998 में टेलीविजन श्रृंखला वंस ए थीफ में नास्तास्जा मोमोमेम की भूमिका निभाते हुए दिखाई दीं। 2000 में, उन्होंने डारिया फिल्म, इज़ इट फॉल येट में एलिसन के चरित्र को आवाज दी ? , एक उभयलिंगी कला शिविर में भाग लेने वाले की भूमिका निभा रहा है जो जेन लेन को आकर्षित करने का प्रयास करता है । वह कनाडाई इंडी फिल्मों लंच विद चार्ल्स (2001) और क्रॉसिंग में दिखाई दीं(2005), जिसके उत्तरार्ध में उन्होंने "माई ग्रेटेस्ट मास्टरपीस" गीत रिकॉर्ड किया। उसने CBC टेलीविज़न सीरीज़ ZeD (2002 में उनकी पहली होस्ट बनने) के लिए होस्टिंग का काम किया है, और Bodog के लिए, 2006 में Bodog फ़ाइट की मेजबानी के साथ-साथ वैंकूवर सन स्पोर्ट्स राइटर, इयान के साथ अपनी शादी के दिनों को आगे बढ़ाने वाली एक रियलिटी सीरीज़ की मेजबानी की है। वाकर, 2007 में बिफ नेकेड ब्राइड कहा जाता है । उन्होंने एसएसएक्स वीडियो गेम श्रृंखला और स्लेज स्टॉर्म में जो पायने के चरित्र को आवाज दी । 2003 में, उन्होंने जॉम्बी में एक छोटी भूमिका निभाईहॉरर फिल्म द हाउस ऑफ द डेड । उसी वर्ष, वह टीवी श्रृंखला कोल्ड स्क्वाड में एक काल्पनिक रियलिटी शो के जज के रूप में दिखाई दी । 2006 में, उन्होंने द एल वर्ड के एक एपिसोड में अतिथि भूमिका निभाई , जिसमें सिंथिया नाम का एक चरित्र था। इसके अलावा, बिफ नेकेड बफी द वैम्पायर स्लेयर , द क्रो: स्टेयरवे टू हेवन और द क्रिस इसाक शो में खुद के रूप में दिखाई दिए हैं । बिफ नेकेड ने टीवी श्रृंखला दैट्स आर्ट?! (2012)। 

2021 में, बिफ कनाडा के ड्रैग रेस के दूसरे सीज़न के एक एपिसोड में अतिथि न्यायाधीश के रूप में दिखाई दिए । 
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*वर्तमान बैंड के सदस्य*

बिफ नेकेड - वोकल्स, बैकग्राउंड वोकल्स
डग रोष – गिटार
चिको मिसोमाली - ड्रम, बैकग्राउंड वोकल्स
पीटर करोल – बास

*पुराने सदस्य*

स्टीव एलन - गिटार
फेरडी बेलैंड - बास
एली आर्टिको - गिटार
एलेक्स अरुंडेल उर्फ ​​एक्सफैक्टर (उर्फ जीन पूले, "छोटे" के सह-लेखक) - गिटार
Kuryakin - सिंथेस और बास बैकअप वोकल्स
कोरिन कुलबर्टसन कूको - बास
माइक ऋषि – ड्रम
डग फ्यूरी (अब स्कैटरहार्ट में) - गिटार, बास, सह-लेखक और सह-निर्माता
गेल ग्रीनवुड ( बेली / एल 7 ) - बास
स्कॉटी McCarger – ड्रम
क्रिस क्रिपिन (सब कुछ बाद / हेडली ) - ड्रम
रैंडी ब्लैक ( एनीहिलेटर ) - ड्रम
जैकन एक्स्ट्रॉम ( न्यूरोसोनिक / क्रैशसीन) - बास (मृतक)
जॉन बेट्स ( बिग जॉन बेट्स ) - गिटार
गिलियन हैना - गिटार (मृतक)
ब्रिट ब्लैक – गिटार
रिच प्रिस्क - बास (मृतक)
स्कॉट कुक – बास
टिम स्मिथ – बास
ग्रेग मार्क ( जूनो -नामांकित वैंकूवर साइकेडेलिक पॉप बैंड टेम्पलर ) - गिटार
शॉन स्टब्स - ड्रम
एडम (एटीओएम) पर्सी ( इकोनोलिन क्रश ) - कीबोर्ड
डैन येरेम्को ( इकोनोलिन क्रश )/( डीओए ) - बास
लैमर एंगेल - (आर्ट रॉक बैंड एन ओपियेट फॉर एंजल्स के लिए गायक/संगीतकार) - बास
डेव मार्टोन - बास
गेबे सिप्स - बास
जो वेल्ट्री - बास
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वीडियो संगीत
संपादन करना
"सब कुछ" (1994)
"मेरा पूरा जीवन"
"तुम पर बताओ"
"कभी अकेले नहीं"
"डैडीज़ गेटिंग मैरिड" ( विलियम मॉरिसन द्वारा निर्देशित 1996)
"अंतरिक्ष यात्री"
"लकी" (पीटर कैरोल द्वारा सह-निर्देशित)
"कमजोरी का क्षण" (1999) ( मार्कोस सीगा द्वारा निर्देशित )
"हमलोग इसे नहीं लेंगे"
"छोटे"
"ट्विच" (1999) (पीटर कैरोल द्वारा निर्देशित)
"मैं आज खुद से प्यार करता हूँ"
"टैंगो शूज़" (नील ब्लोमकैंप द्वारा निर्देशित (जिला 9 / चैपी)
"चोकिंग इन द ट्रुथ" (नील ब्लोमकैंप द्वारा निर्देशित (जिला 9 / चैपी)
"बैक इन द डे" (पीटर कैरोल द्वारा सह-निर्देशित)
"अमीर और गंदी"
"लेट डाउन" (पीटर कैरोल द्वारा निर्देशित)
"और कुछ मायने नहीं रखता है"
"एवरीडे" (पीटर कैरोल द्वारा निर्देशित)
"माई ग्रेटेस्ट मास्टरपीस" (2007)
"भाड़ में जाओ तुम 2" (2009)
"बीमार" (2009)
"कर्म का राजा" (2009)
कोको कैरोल द्वारा निर्देशित "केवल एक" 2016
पीटर कैरोल द्वारा निर्देशित "हैवी" 2018
"जिम" (2020)

सरबजीत चड्ढा

सरबजीत चड्ढा

*सरबजीत सिंह चड्ढा ( जापानी :チャダ, रोमांटिक :  चडा ; जन्म 17 जून 1952 को नई दिल्ली, भारत में ) एक भारतीय गायक हैं, जिन्हें पहले गैर-जापानी एंका गायक कहा जाता है। वह कृषि उद्योग का अध्ययन करने के लिए जापान गए, और वहां वे एंका को पसंद करने लगे। उन्होंने जापानी टेलीविजन कार्यक्रम किन्यो 10 जी: उवासा नो चैनल के माध्यम से लोकप्रियता अर्जित की ।  उन्होंने 1975 में जेवीसी के तहत एकल "ओमोकेज नो हिटो" (面影の人) के साथ एक एंका गायक के रूप में शुरुआत की । एकल कथित तौर पर 100,000 से अधिक प्रतियां बिकीं। वीजा की समस्याके कारण वह जल्द ही भारत लौट आएहालांकि, वह 2008 में जापान लौट आया।*
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सरबजीत सिंह चड्ढा (जन्म 17 जून, 1952 को नई दिल्ली, भारत में) एक भारतीय गायक हैं, जिन्हें पहला गैर-जापानी एंका गायक कहा जाता है।
वह कृषि उद्योग का अध्ययन करने के लिए जापान गया, और वहाँ वह एंका को पसंद करने लगा।
उन्होंने जापानी टेलीविजन कार्यक्रम किन्यो 10 जी: उवासा नो चैनल के माध्यम से लोकप्रियता हासिल की।
उन्होंने 1975 में JVC के तहत एकल "ओमोकेज नो हिटो" (????) के साथ एक एंका गायक के रूप में शुरुआत की।
एकल ने कथित तौर पर 100,000 से अधिक प्रतियां बेचीं।
वीजा की समस्या के कारण वह जल्द ही भारत लौट आए।
हालाँकि, वह 2008 में जापान लौट आया।
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भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...