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सोमवार, 19 फ़रवरी 2024

सुदर्शन (फकीर)


सुदर्शन फ़ाकिर
🎂जन्म1934
जालंधर, पंजाब, ब्रिटिश भारत
⚰️मौत फ़रवरी 19, 2008 (74 साल)
जालंधर, पंजाब, भारत
पेशा
शायर, गीतकार
जिनका वास्तविक नाम सुदर्शन कामरा था, एक भारतीय शायर और गीतकार थे। उनकी कई ग़ज़लें, ठुमरियाँ और नज़्में बेग़म अख़्तर और जगजीत सिंह द्वारा स्वरबद्ध की गयीं।
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*Ş₳ŦเŞ𝓱👸🏻◣🍁💜⃝🇱♥︎2*
सामने है जो उसे लोग बुरा कहते हैं 

जिस को देखा ही नहीं उस को ख़ुदा कहते हैं 

इश्क़ है इश्क़ ये मज़ाक़ नहीं 

चंद लम्हों में फ़ैसला न करो 

तेरे जाने में और आने में 

हम ने सदियों का फ़ासला देखा 

हम तो समझे थे कि बरसात में बरसेगी शराब 

आई बरसात तो बरसात ने दिल तोड़ दिया 

देखने वालो तबस्सुम को करम मत समझो 

उन्हें तो देखने वालों पे हँसी आती है

❤️आज जाने की ज़िद न करो 

यूँ ही पहलू में बैठे रहो 

आज जाने की ज़िद न करो 

हाए मर जाएँगे, हम तो लुट जाएँगे 

ऐसी बातें किया न करो 

आज जाने की ज़िद न करो 

तुम ही सोचो ज़रा क्यूँ न रोकें तुम्हें 

जान जाती है जब उठ के जाते हो तुम 

तुम को अपनी क़सम जान-ए-जाँ 

बात इतनी मिरी मान लो 

आज जाने की ज़िद न करो 

यूँ ही पहलू में बैठे रहो 

आज जाने की ज़िद न करो 

वक़्त की क़ैद में ज़िंदगी है मगर 

चंद घड़ियाँ यही हैं जो आज़ाद हैं 

इन को खो कर मिरी जान-ए-जाँ 

उम्र-भर ना तरसते रहो 

आज जाने की ज़िद न करो 

कितना मासूम रंगीन है ये समाँ 

हुस्न और इश्क़ की आज मेराज है 

कल की किस को ख़बर जान-ए-जाँ 

रोक लो आज की रात को 

आज जाने की ज़िद न करो 

यूँही पहलू में बैठे रहो 

आज जाने की ज़िद न करो 

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सुदर्शन फ़ाकिर का जन्म 1934 में ब्रिटिश पंजाब के जालंधर में हुआ था ।हाई स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद, वह जालंधर चले गए और डीएवी कॉलेज से बीए की पढ़ाई पूरी की। कॉलेज के दौरान वह नाटक और कविता में बहुत सक्रिय थे। 

उन्होंने डीएवी कॉलेज , जालंधर से राजनीति विज्ञान और अंग्रेजी में एमए की पढ़ाई की । अपने कॉलेज के दिनों से ही नाटक और कविता में सक्रिय, उन्होंने अपनी युवावस्था में मोहन राकेश के नाटक " आषाढ़ का एक दिन " का निर्देशन किया। 

बंबई जाने से पहले उन्होंने आकाशवाणी , जालंधर में अपनी आवाज दी, जहां बाद में उन्होंने संगीत निर्देशक जयदेव के लिए लिखा । भीम सेन की फिल्म ' दूरियां ' का उनका गाना 'जिंदगी, जिंदगी, मेरे घर आना जिंदगी' और फिल्म 'यलगार' के डायलॉग आज तक लोकप्रिय हैं। यह भी दावा किया जाता है कि देश भर के एनसीसी शिविरों में गाया जाने वाला गीत "हम सब भारतीय हैं" उनके द्वारा लिखा गया था।फ़ाकिर पूर्वी पंजाब के गैर-मुस्लिम उर्दू कवियों की छोटी और घटती जनजाति से थे। सुदर्शन फ़ाकिर पहले ऐसे गीतकार हैं जिन्होंने अपने पहले ही गाने के लिए फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार जीता था। वो कागज की कश्ती जैसी हिट फिल्मों के अलावा , वह एक धार्मिक नंबर - हे राम... हे राम' के लिए प्रसिद्ध थे । वह भारत के राष्ट्रीय एनसीसी गीत- हम सब भारतीय हैं के लेखक हैं । गैर-फिल्मी संगीत के अलावा, सुदर्शन फ़ाकिर ने विभिन्न फिल्मों के गाने भी लिखे हैं।
सुदर्शन का विवाह सुदेश से हुआ था। दंपति का एक बेटा है। 18 फरवरी 2008 को जालंधर में उनका निधन हो गया।
रचनाएं
सुदर्शन का विवाह सुदेश से हुआ था। दंपति का एक बेटा है। [6] 18 फरवरी 2008 को जालंधर में उनका निधन हो गया।

सुदर्शन 'फ़ाकिर' अपने आखिरी दौर में 'मल्लिका-ए-ग़ज़ल' बेगम अख्तर के पसंदीदा शायर थे, उन्होंने उनकी पांच ग़ज़लें गाईं। वह जगजीत सिंह के सह-यात्री भी थे, जिसकी शुरुआत 1982 में 'वो कागज की किश्ती, वो बारिश का पानी' से हुई थी।

पूरी तरह से एक पूर्णतावादी, उन्होंने अपनी कविता पर कड़ी मेहनत की। फ़ाकिर शायद लुप्त हो रहे कवियों की उस जमात के आखिरी कवियों में से एक हैं जो कविता के लिए जीते थे और यह उल्लेखनीय है कि उन्होंने अपनी कविता को एक संकलन में संकलित किया और अपना पहला ' दीवान ' तभी प्रकाशित किया जब वह एक बहुत प्रसिद्ध कवि बन गए।

लंबी बीमारी के बाद 18 फरवरी 2008 को 73 वर्ष की आयु में सुदर्शन का जालंधर के एक अस्पताल में निधन हो गया। उनका अंतिम संस्कार मॉडल टाउन में किया गया।

रचनाएं

अगर हम कहे और वो मुस्कुराए 
गम बड़े आते हैं कातिल की निगाहों की तरह 
मेरे दुख की कोई दवा ना करो 
शायद मैं जिंदगी की सहर लेके आ गया 
ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो (1987 की हिंदी फिल्म आज में प्रयुक्त )
जिंदगी जिंदगी मेरे घर आना, आना जिंदगी (1979 की हिंदी फिल्म दूरियां में प्रयुक्त) 
हो जाता है कैसा प्यार, ना जाने कोई (1992 की हिंदी फिल्म यलगार में प्रयुक्त) 
बेज़ुबानी ज़ुबान ना हो जाए (गैर-फ़िल्मी) 
फिर आज मुझे तुमको बस इतना बताना है (1987 की हिंदी फिल्म आज में प्रयुक्त ) 
जिंदगी में जब तुम्हारे गम नहीं थे (1979 की हिंदी फिल्म दूरियां में प्रयुक्त) 
जिंदगी तुझको जिया है कोई अफ़सोस नहीं, ज़हर खुद मैंने पिया है कोई अफ़सोस नहीं
शायद मैं जिंदगी की सहर लेके आ गया 
पत्थर के खुदा, पत्थर के सनम अपनों के सितम हम से बतियाते नहीं जाते 
आज के दौर में ऐ दोस्त ये मंज़र क्यू है 
नाजायज से "बरसात के मौसम में"

खुमार बारंकवी


#15sep
#19feb
खुमार बाराबंकवी

🎂जन्म: 15 सितंबर 1919, बाराबंकी
⚰️मृत्य: 19 फ़रवरी 1999

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*Ş₳ŦเŞ𝓱👸🏻◣🍁💜⃝🇱♥︎2*
एक पल में एक सदी का मजा हमसे पूछिए
दो दिन की जिंदगी का मजा हमसे पूछिए।

भूले हैं रफ्ता-रफ्ता उन्हें मुद्दतों में हम
किश्तों में खुदकुशी का मजा हमसे पूछिए।

मुझको शिकस्त-ए-दिल का मजा याद आ गया
तुम क्यों उदास हो गए क्या याद आ गया।

कहने को जिंदगी थी बहुत मुख्तसर मगर
कुछ यूं बसर हुई कि खुदा याद आ गया।

बरसे बगैर ही जो घटा घिर के खुल गई
इक बेवफा का अहद-ए-वफा याद आ गया।

हैरत है तुमको देख के मस्जिद में ऐ 'खुमार'
क्या बात हो गई जो खुदा याद आ गया।
●▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬●

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खुमार बाराबंकवी से उर्दू के प्रख्यात शायर थे। 15 सितम्बर 1919 को जन्मे खुमार बाराबंकवी का मूल नाम मोहम्मद हैदर खान था। बाराबंकी जिले को अन्तर्राष्ट्रीय पटल पर पहचान दिलाने वाले अजीम शायर खुमार बाराबंकवी को प्यार से बेहद करीबी लोग 'दुल्लन' भी बुलाते थे।

खुमार" ने शहर के सिटी इंटर कालेज से आठवीं तक शिक्षा ग्रहण की। इसके पश्चात वह राजकीय इंटर कालेज बाराबंकी जिसकी मान्यता उस समय हाईस्कूल तक ही थी वहां से कक्षा 10 की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके पश्चात लखनऊ के जुबली इंटर कालेज में उन्होंने दाखिला लिया लेकिन उनका मन पढ़ाई में नहीं लगा।

वर्ष 1938 से ही उन्होंने मुशायरों में भाग लेना शुरू कर दिया। खुमार ने अपना पहला मुशायरा बरेली में पढ़ा। उनका प्रथम शेर 'वाकिफ नहीं तुम अपनी निगाहों के असर से, इस राज़ को पूछो किसी बरबाद नजर से' था। ढाई वर्ष के अंतराल में ही वे पूरे मुल्क में प्रसिद्ध हो गये। उस दौर में जिगर मुरादाबादी उच्च कोटि के शायर माने जाते थे चूंकि खुमार ने 'तरन्नुम' से ही शुरूआत की, इसलिये शीघ्र ही वे जिगर मुरादाबादी के समकक्ष पहुंच गये। मुशायरों में अगर मजरूह सुलतानपुरी साहब के बाद अगर किसी को तवज्जो दी जाती थी तो वो "खुमार साहब" ही थे |

महान शायर और गीतकार मजरूह सुलतानपुरी आपके अज़ीज़ दोस्त थे। जितना बड़ा क़द विनम्रता की उतनी ही बड़ी मूरत, कभी-कभी तो मुशायरों में आपको घंटों तक ग़ज़ल पढ़नी पड़ती थी, लोग उठने ही नहीं देते थे | हर मिसरे के बाद "आदाब" कहने की इनकी अदा इन्हें बाकियों से मुख्तलिफ़ (अलग) करती है। आपका अंदाज- ए- बयां भी औरों से अलग था जो इनकी ख़ूबसूरत ग़ज़लों में और भी चार-चाँद लगाता था ।

वैसे तो खुमार साहब मुशायरों को ही तवज्जो देते थे, लेकिन फिर भी उन्होंने कुछ फ़िल्मों के गीत भी लिखे, जो उनकी ग़ज़लों की तरह ही उम्दा हैं। हर दिल अजीज 'खुमार बाराबंकवी' को वर्ष 1942-43 में प्रख्यात फिल्म निर्देशक एआर अख्तर ने मुम्बई बुला लिया। यहाँ से शुरू हुआ उनका फ़िल्मी सफ़र और वे फ़िल्मी दुनिया में एक सफल गीतकार के रूप में जुड़ गए।

आपने 1955 में फिल्म "रुख़साना" के लिये " शकील बदायूँनी " के साथ गाने लिखे थे। उससे पहले 1946 में फ़िल्म "शहंशाह " के एक गीत "चाह बरबाद करेगी" को "खुमार" साहब ने हीं लिखा था, जिसे संगीत से सजाया था "नौशाद" ने और अपनी आवाज़ दी थी गायकी के बेताज बादशाह कुंदन लाल सहगल साहब ने |

फ़िल्म 'बारादरी' के लिये लिखा गया उनका यह गीत 'तस्वीर बनाता हूँ, तस्वीर नहीं बनती' आज भी लोगों के दिलों में बसा है। उन्होंने तमाम फ़िल्मों के लिये 'अपने किये पे कोई परेशान हो गया', 'एक दिल और तलबगार है बहुत', 'दिल की महफ़िल सजी है चले आइए', 'साज हो तुम आवाज़ हूँ मैं','भुला नहीं देना', 'दर्द भरा दिल भर-भर आए', 'आग लग जाए इस ज़िन्दगी को, मोहब्बत की बस इतनी दास्ताँ है', 'आई बैरन बयार, कियो सोलह सिंगार', जैसे गीत लिखे जो खासे लोकप्रिय हए। खुमार के ये गीत आज भी हमारी ज़िन्दगी में रस घोल देते हैं।

खुमार साहब ने चार पुस्तकें भी लिखीं ये पुस्तकें शब-ए-ताब, हदीस-ए-दीगर, आतिश-ए-तर और रख्स-ए-मचा हैं।

खुमार की पुस्तकें कई विश्वविद्यालयों के पाठयक्रम में शामिल की गई। उन्हें उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी, जिगर मुरादाबादी, उर्दू अवार्ड, उर्दू सेंटर कीनिया और अकादमी नवाये मीर उस्मानिया विश्वविद्यालय हैदराबाद, मल्टी कल्चरल सेंटर ओसो कनाडा, अदबी संगम न्यूयार्क, दीन दयाल जालान सम्मान वाराणसी, कमर जलालवी एलाइड्स कालेज पाकिस्तान आदि ने सम्मानित किया।

वर्ष 1992 में दुबई में खुमार की प्रसिद्धि और कामयाबी के लिये जश्न मनाया गया। 25 सितम्बर 1993 को बाराबंकी जिले में जश्न-ए-खुमार का आयोजन किया गया। जिसमें तत्कालीन गवर्नर मोतीलाल वोरा ने एक लाख की धनराशि व प्रशस्ति पत्र उन्हें देकर सम्मानित किया।

खुमार का अंतिम समय काफी कष्टप्रद रहा। मृत्यु के एक वर्ष पूर्व से ही उन्होंने खाना पीना छोड़ दिया था। 13 फ़रवरी 99 को उनकी हालत गंभीर हो गई। उन्हें लखनऊ के मेडिकल कालेज में भर्ती कराया गया। जहाँ 19 फ़रवरी की रात उन्होंने आखिरी साँस ली।

कवि शास्त्री

#19feb 
कवी शास्त्री 
🎂19 फरवरी 1986 को लंदन, इंग्लैंड
एक बिर्टिश फिल्म और टीवी कलाकार है, जोकि अब हिंदी सिनेमा में भी अपनी पैठ जमा चुके हैं।

निजी जीवन 
कवी का जन्म गुजराती परिवार में 19 फरवरी 1986 को लंदन, इंग्लैंड में हुआ था। हालांकि बाद में उनके माता पिता, कौशिक, गीता, बड़े भाई रवि साउथ वुडफोर्ड, लंदन में शिफ्ट हो गये। 

शादी 
कवी शास्त्री की शादी ऑस्ट्रेलियन इंडियन शेरील विल्टशिर से वर्ष 2012, मुंबई में हुई थी।

एक्टिंग करियर 
कवी ने अपने एक्टिंग करियर की शुरुआत बीबीसी वन के शो होल्बी सिटी से की थी, इसके बाद वह कई इंग्लिश शो में नजर आये।

हिंदी एक्टिंग करियर 
कवी ने हिंदी सिनेमा में एंट्री फिल्म लव आज कल से की, उन्होंने इस फिल्म में जाट की भूमिका निभायी, इसके बाद वह मुझसे फ्रेंडशिप करोगे में नजर जाये। अब तक कवी कई हिंदी फिल्मों में काम कर चुके हैं, जिनमे मैं और मिस्टर राईट, अमित शाहनी की लिस्ट, हैप्पी न्यू इयर, ब्रदर्स, नीरजा, औरंगजेब, रोन्ग साइड राजू, जब हैरी मेट सेजल आदि शामिल है।
📺
2001 होल्बी सिटी
2003 यूगेटमी
2005 बिल
2008 परिकथाएं 
2010 रिश्ता.कॉम 
2010 किस्मत
2014 चांस द्वारा प्यार 
📽️
2005 यह तुम हो सकते हो अंग्रेज़ी
2007 पॉपकॉर्न चाहिए
2009 लव आज कल हिंदी
2011 मुझसे फ्रैंडशिप करोगे
2013 औरंगजेब 
2013 मैं और मिस्टर राइट
2014 अमित साहनी की सूची 
2014 नए साल की शुभकामनाएँ
2015 भाई बंधु
2016 नीरजा 
2016गलत पक्ष राजू
2017 जब हैरी मेट सेजल हिंदी
2019 जजमेंटल है क्या

परेश गनात्रा

#19feb 
परेश गनात्रा
 
🎂19 फरवरी 1965 
 मुंबई , भारत में एक गुजराती परिवार में हुआ था , 
जहां उनका पालन-पोषण हुआ। उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा 1981 में लायंस जुहू हाई स्कूल से की। इसके बाद उन्होंने 1986 में नरसी मोनजी कॉलेज ऑफ कॉमर्स एंड इकोनॉमिक्स से स्नातक की उपाधि प्राप्त की , और सोमैया कॉलेज, मुंबई में प्रबंधन अध्ययन में शामिल हो गए।
कॉलेज में रहते हुए थिएटर में भाग लेते हुए, उन्होंने 1984 से 1992 तक शहर में गुजराती थिएटर से अपने अभिनय करियर की शुरुआत की। उन्होंने 1999 में मन में एक भूमिका के साथ अपनी फिल्म की शुरुआत की। उन्होंने टीवी श्रृंखला एक महल हो सपनों का , एक औपनिवेशिक में अभिनय किया। कजिन्स म्यूजिक वीडियो, टीवी विज्ञापन (सिम्फनी एयर कूलर्स, टाटा फोन्स, कॉफी बाइट, एलजी टीवी, नेरोलैक, डाबर और मैकडॉनल्ड्स सहित), जब वह 2002 की मल्टी-स्टार हिट फिल्म आंखें से प्रसिद्धि तक पहुंचे । 

तभी से वह बॉलीवुड में सक्रिय हैं । उन्हें कॉमेडी फिल्मों में उनकी हास्य भूमिकाओं के लिए जाना जाता है, जिनमें नो एंट्री , वेलकम , मनी है तो हनी है और डेल्ही बेली शामिल हैं।  राउडी राठौड़ , जिसमें परेश ने अक्षय कुमार के साथ सहायक भूमिका निभाई , बॉक्स ऑफिस पर सफल होने के कारण यह उनके लिए एक मील का पत्थर बन गई। उन्होंने कॉमेडी फिल्म बोल बच्चन में काम किया, जिसमें अजय देवगन , अभिषेक बच्चन , असिन थोट्टूमकल , प्राची देसाई ने अभिनय किया और रोहित शेट्टी ने निर्देशन किया।
📽️
मान (1999) 
काई झाला (2001)
आँखें (2002)
नो एंट्री (2005)
दिल दिया है (2006)
स्वागत है (2007)
मनी है तो हनी है (2008)
खल्लबली: फन अनलिमिटेड (2008)
खिचड़ी: द मूवी (2010)
कोई समस्या नहीं (2010)
दिल्ली बेली (2011)
राउडी राठौड़ (2012)
मैं कृष्णा हूं (2013)
श्री (2013)
रमैया वस्तावैया (2013)
शेल्टर स्केल्टर (2013)
फ़्रीकी अली (2016)
यमला पगला दीवाना फिर से (2018)
दबंग 3 (2019)
खिचड़ी 2: मिशन पंथुकिस्तान (2023) 

एक निर्माता के रूप में

त्रिगुट (2018)

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...