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सोमवार, 5 फ़रवरी 2024

अंगद सिंह बेदी

#06feb 
अंगद सिंह बेदी

🎂06 फ़रवरी 1983 
दिल्ली , भारत
अल्मा मेटर
सेंट स्टीफंस कॉलेज
व्यवसायों
अभिनेता 
जीवनसाथी
नेहा धूपा ​( एम.  2018 )
बच्चे2
माता-पिता
बिशन सिंह बेदी (पिता)
बेदी का जन्म पूर्व भारतीय क्रिकेट कप्तान बिशन सिंह बेदी के घर हुआ था । उनकी एक बड़ी बहन, नेहा और उनके पिता की पिछली शादी से दो बड़े सौतेले भाई-बहन हैं - एक सौतेली बहन जिसका नाम गिलिंदर है और एक सौतेला भाई जिसका नाम गावसिंदर है। उन्होंने दिल्ली के लिए अंडर-19 स्तर तक क्रिकेट खेला। उन्होंने ज्ञान भारती स्कूल, साकेत, नई दिल्ली से पढ़ाई की और सेंट स्टीफंस कॉलेज, दिल्ली से स्नातक की उपाधि प्राप्त की । इसके बाद, उन्होंने मॉडलिंग में अपना करियर शुरू किया और अभिनय में कदम रखा।
बेदी ने अपने करियर की शुरुआत 2004 में शशि कुमार द्वारा निर्देशित फिल्म काया तरण से की थी  यह फिल्म 2002 के गुजरात दंगों और 1984 के सिख विरोधी दंगों की पृष्ठभूमि पर आधारित थी । फ़िल्म ने 2004 के लिए सर्वश्रेष्ठ प्रथम फ़िल्म निर्माता को दिया जाने वाला अरविंदन पुरस्कार जीताऔर फ़िल्म में बेदी के अभिनय की सराहना की गई। 

2005 में, वह स्टार वन पर कुक ना कहो नामक एक कुकिंग शो में होस्ट के रूप में दिखाई दिए। उन्होंने 2010 में एक्स्ट्रा इनिंग्स टी20 की मेजबानी की, यह शो इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) के दौरान मैच सत्र के बीच आयुष्मान खुराना के साथ प्रसारित किया गया था । वह कलर्स के शो फियर फैक्टर: खतरों के खिलाड़ी के सीजन 3 में एक प्रतियोगी के रूप में दिखाई दिए । प्रवेश राणा द्वारा प्रतिस्थापित किए जाने से पहले उन्होंने यूटीवी बिंदास पर रियलिटी टेलीविजन शो इमोशनल अत्याचार के पहले सीज़न की भी मेजबानी की थी ।

उन्होंने 2011 में रेमो डिसूजा द्वारा निर्देशित फिल्म फालतू से बॉलीवुड में वापसी की । अंगद को उंगली (2014) और पिंक (2016) जैसी फिल्मों में उनके अभिनय के लिए जाना जाता है  उन्हें सलमान खान के साथ टाइगर जिंदा है में भी देखा गया था । 

2017 में उन्होंने अमेज़ॅन मूल श्रृंखला इनसाइड एज में मुख्य भूमिका निभाई । 

वह फिल्म गुंजन सक्सेना: द कारगिल गर्ल , भारतीय वायु सेना पायलट गुंजन सक्सेना की बायोपिक का भी हिस्सा थे , जहां उन्होंने उनके भाई की भूमिका निभाई थी, साथ ही फिल्म सूरमा , पूर्व कप्तान संदीप सिंह की बायोपिक भी थी। भारतीय हॉकी टीम में उन्होंने उनके भाई की भूमिका भी निभाई। अभिनेता "द जोया फैक्टर" का हिस्सा रहे हैं।
📽️
2004 काया तारन
 2011फालतू
2011 फालतू
2013 रंगीला
2014 उंगली
2016 गुलाबी 
2016डियर जिंदगी
2017 टाइगर जिंदा है
2018सुरमा
2019 जोया फैक्टर

कवि प्रदीप

#06feb 
 #11dic 
कवि_प्रदीप कवि प्रदीप . 
कवि प्रदीप (मूल नाम : रामचन्द्र नारायणजी द्विवेदी ; 06फ़रवरी 1915 - 11 दिसम्बर 1998) भारतीय कवि एवं गीतकार थे जो देशभक्ति गीत ऐ मेरे वतन के लोगों की रचना के लिए प्रसिद्ध हैं। उन्होंने 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान शहीद हुए सैनिकों की श्रद्धांजलि में ये गीत लिखा था। लता मंगेशकर द्वारा गाए इस गीत का तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की उपस्थिति में 26 जनवरी 1963 को दिल्ली के रामलीला मैदान में सीधा प्रसारण किया गया।गीत सुनकर जवाहरलाल नेहरू के आंख भर आए थे।कवि प्रदीप ने इस गीत का राजस्व युद्ध विधवा कोष में जमा करने की अपील की। मुंबई उच्च न्यायालय ने 25 अगस्त 2005 को संगीत कंपनी एचएमवी को इस कोष में अग्रिम रूप से ₹10 लाख जमा करने का आदेश दिया।

रामचन्द्र नारायणजी द्विवेदी
06 फ़रवरी 1915
मौत
दिसम्बर 11, 1998 (उम्र 83)
पेशा
कवि, गीतकार

परिचय

कवि प्रदीप का मूल नाम 'रामचंद्र नारायणजी द्विवेदी' था। उनका जन्म मध्य प्रदेश के उज्जैन में बड़नगर नामक स्थान में हुआ। कवि प्रदीप की पहचान 1940 में रिलीज हुई फिल्म बंधन से बनी। हालांकि 1943 की स्वर्ण जयंती हिट फिल्म किस्मत के गीत "दूर हटो ऐ दुनिया वालों हिंदुस्तान हमारा है" ने उन्हें देशभक्ति गीत के रचनाकारों में अमर कर दिया। गीत के अर्थ से क्रोधित तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने उनकी गिरफ्तारी के आदेश दिए। इससे बचने के लिए कवि प्रदीप को भूमिगत होना पड़ा.

पांच दशक के अपने पेशे में कवि प्रदीप ने 71 फिल्मों के लिए 1700 गीत लिखे उनके देशभक्ति गीतों में, फिल्म बंधन (1940) में "चल चल रे नौजवान", फिल्म जागृति (1954) में "आओ बच्चों तुम्हें दिखाएं", "दे दी हमें आजादी बिना खडग ढाल" और फिल्म जय संतोषी मां (1975) में "यहां वहां जहां तहां मत पूछो कहां-कहां" है। इस गीत को उन्होंने फिल्म के लिए स्वयं गाया भी था।

आपने हिंदी फ़िल्मों के लिये कई यादगार गीत लिखे। भारत सरकार ने उन्हें सन 1997-98 में दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया।

कवि प्रदीप कुमार के सम्‍मान में मध्‍यप्रदेश सरकार के कला एवं संस्‍कृति विभाग ने कवि प्रदीप राष्‍ट्रीय सम्‍मान की स्‍थापना वर्ष 2013 में  की । Archived 2020-02-06 at the वेबैक मशीन पहला कवि प्रदीप राष्‍ट्रीय सम्‍मान पुरस्‍कार उत्‍तर प्रदेश के प्रसिध्‍द गीतकार गोपालदास नीरज को दिया गया।

लोकप्रिय गीत
संपादित करें
"ऐ मेरे वतन के लोगों" (कंगन)
"सूनी पड़ी रे सितार" (कंगन)
"नाचो नाचो प्यारे मन के मोर" (पुनर्मिलन)
"चल चल रे नौजवान" (बंधन)
"चने जोर गरम बाबू" (बंधन)
"पीयू पीयू बोल प्राण पपीहे" (बंधन)
"रुक न सको तो जाओ" (बंधन)
"खींचो कमान खींचो" (अंजान)
"झूले के संग झूलो" (झूला)
"न जाने किधर आज मेरी नाव चली रे" (झूला)
"मैं तो दिल्ली से दुल्हन लायारे" (झूला)
"आज मौसम सलोना सलोना रे" (झूला)
"मेरे बिछड़े हुए साथी" (झूला)
"दूर हटो ऐ दुनियावालो हिंदुस्तान हमारा है" (किस्मत)
"धीरे धीरे आरे बदल" (किस्मत)
"पपीहा रे, मेरे पियासे" (किस्मत)
"घर घर में दिवाली है मेरे घर में अँधेरा" (किस्मत)
"अब तेरे सिवा कौन मेरा" (किस्मत)
"हर हर महादेव अल्लाह-ओ-अकबर" (चल चल रे नौजवान)
"रामभरोसे मेरी गाड़ी" (गर्ल्स स्कूल)
"ऊपर गगन विशाल" (मशाल)
"किसकी किस्मत में क्या लिखा" (मशाल)
"आज एशिया के लोगों का काफिला चला" (काफिला)
"कोयल बोले कु" (बाप बेटी)
"कान्हा बजाए बंसरी" (नास्तिक)
"जय जय राम रघुराई" (नास्तिक)
"कितना बदलगया इंसान" (नास्तिक)
"गगन झंझना राजा" (नास्तिक)
"तेरे फूलों से भी प्यार" (नास्तिक)
"साबरमती के संत" (जागृती)
"हम लाये हैं तूफ़ान से" (जागृती)
"चलो चलें माँ" (जागृती)
"आओ बच्चों तुम्हें दिखाएँ" (जागृती)
"तेरे द्वार खड़ा भगवान" (वामन अवतार)
"कहेको बिसरा हरिनाम, माटी के पुतले" (चक्रधारी)
"दूसरो का दुखड़ा दूर करनेवाले" (दशहरा)
"तुंनक तुंनक बोले रे मेरा इकतारा" (रामनवमी)
"पिंजरे के पंछी रे" (नागमणि)
"कोई लाख करे चतुराई" (चंडी पूजा)
"नई उम्र की कलियों तुमको देख रही दुनिया सारी" (तलाक़)
"बिगुल बजरहा आज़ादी का" (तलाक़)
"मेरे जीवन में किरण बनके" (तलाक़)
"मुखड़ा देखले प्राणी" (दो बहन)
"इन्सान का इंसान से हो भाईचारा" (पैग़ाम)
"ओ अमीरों के परमेश्वर" (पैग़ाम)
"जवानी में अकेलापन" (पैग़ाम)
"ओ दिलदार बोलो एक बार" (स्कूल मास्टर)
"आज सुनो हम गीत विदा का गारहे" (स्कूल मास्टर)
"सांवरिया रे अपनी मीरा को भूल न जाना" (आँचल)
"न जाने कहाँ तुम थे" (जिंदगी और ख्वाब)
"आजके इस इंसान को ये क्या होगया" (अमर रहे ये प्यार)
"सूरज रे जलते रहना" (हरिश्चंद्र तारामती)
"टूटगई है माला" (हरिश्चंद्र तारामती)
"जन्मभूमि माँ" (नेताजी सुभाषचंद्र बोस)
"सुनो सुनो देशके हिन्दू - मुस्लमान" (नेताजी सुभाषचंद्र बोस)
"भारत के लिए भगवन का एक वरदान है गंगा" (हर हर गंगे)
"ये ख़ुशी लेके मैं क्या करूँ" (हर हर गंगे)
"चल अकेला चल अकेला" (संबंध)
"तुमको तो करोड़ों साल हुए" (संबंध)
"जो दिया था तुमने एक दिन" (संबंध)
"अँधेरे में जो बैठे हो" (संबंध)
"सुख दुःख दोनों रहते" (कभी धूप कभी छाँव)
"हाय रे संजोग क्या घडी दिखलाई" (कभी धूप कभी छाँव)
"चल मुसाफिर चल" (कभी धूप कभी छाँव)
"जय जय नारायण नारायण हरी हरी" (हरिदर्शन)
"प्रभु के भरोसे हांको गाडी" (हरिदर्शन)
"मारनेवाला है भगवन बचानेवाला है भगवन" (हरिदर्शन)
"मैं इस पार" (अग्निरेखा)
"मैं तो आरती उतरूँ" (जय संतोषी माँ)
"यहाँ वहां जहाँ तहां" (जय संतोषी माँ)
"मत रो मत रो आज" (जय संतोषी माँ)
"करती हूँ तुम्हारा व्रत मैं" (जय संतोषी माँ)
"मदद करो संतोषी माता" (जय संतोषी माँ)
"हे मारुती सारी रामकथा साकार" (बजरंगबली)
"बंजा हूँ मैं" (आँख का तारा)
"ऐ मेरे वतनके लोगों"

लता मंगेशकर

indo-canadian mudar:
कुमारी लता दीनानाथ मंगेशकर
⚰️जन्म 28 सितम्बर, 1929
जन्म भूमि इंदौर, मध्यप्रदेश
⚰️मृत्यु 06 फ़रवरी, 2022
मृत्यु स्थान मुम्बई, महाराष्ट्र
अभिभावक दीनानाथ मंगेशकर, सुधामती
कर्म भूमि मुम्बई
कर्म-क्षेत्र फ़िल्म संगीत (पार्श्वगायिका), भारतीय शास्त्रीय संगीत
मुख्य फ़िल्में मदर इंडिया, मुग़ल ए आज़म
विषय भारतीय शास्त्रीय संगीत, लोक संगीत, भजन, ग़ज़ल
पुरस्कार-उपाधि भारत रत्न, पद्म भूषण, दादा साहब फाल्के पुरस्कार, पद्मविभूषण
नागरिकता भारतीय
मुख्य गीत 'आएगा आने वाला', 'ऐ मेरे वतन के लोगों', 'नाम गुम जाएगा', 'अल्ला तेरो नाम' आदि।
भाई-बहन हृदयनाथ मंगेशकर, आशा भोंसले, उषा मंगेशकर, मीना खड़ीकर
अन्य जानकारी सर्वाधिक गीत रिकार्ड करने का भी गौरव प्राप्त है।
indo-canadian mudar:
स्वर कोकिला महान पार्श्वगायिका लता मंगेशकर की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि
🎂लता मंगेशकर जन्म- 28 सितम्बर, 1929; 
⚰️मृत्यु- 6 फ़रवरी, 2022 भारत की 'भारत रत्न' सम्मानित मशहूर पार्श्वगायिका थीं, जिनकी आवाज़ ने छह दशकों से भी ज़्यादा संगीत की दुनिया को सुरों से नवाज़ा। भारत की 'स्‍वर कोकिला' लता मंगेशकर ने 20 भाषाओं में 30,000 गाने गाये। उनकी आवाज़ सुनकर कभी किसी की आँखों में आँसू आए तो कभी सीमा पर खड़े जवानों को सहारा मिला। उन्होंने स्वयं को पूर्णत: संगीत को समर्पित कर रखा था। लता मंगेशकर जैसी शख़्सियतें विरले ही जन्म लेती हैं।

कुमारी लता दीनानाथ मंगेशकर का जन्म इंदौर, मध्यप्रदेश में 28 सितम्बर, 1929 को हुआ था। लता मंगेशकर का नाम विश्व के सबसे जाने माने लोगों में आता है। लता मंगेशकर के पिता दीनानाथ मंगेशकर एक कुशल रंगमंचीय गायक थे। दीनानाथ जी ने लता को तब से संगीत सिखाना शुरू किया, जब वे पाँच साल की थी। उनके साथ उनकी बहनें आशा, ऊषा और मीना भी सीखा करतीं थीं। लता 'अमान अली ख़ान साहिब' और बाद में 'अमानत ख़ान' के साथ भी पढ़ीं।

लता मंगेशकर हमेशा से ही ईश्वर के द्वारा दी गई सुरीली आवाज़, जानदार अभिव्यक्ति व बात को बहुत जल्द समझ लेने वाली अविश्वसनीय क्षमता का उदाहरण रहीं हैं। इन्हीं विशेषताओं के कारण उनकी इस प्रतिभा को बहुत जल्द ही पहचान मिल गई थी लेकिन पाँच वर्ष की छोटी आयु में ही आपको पहली बार एक नाटक में अभिनय करने का अवसर मिला। शुरुआत अवश्य अभिनय से हुई किंतु आपकी दिलचस्पी तो संगीत में ही थी। लताजी का नाम पहले 'हेमा' था, लेकिन जन्म के पांच साल बाद माता-पिता ने नाम बदलकर 'लता' रख दिया था।

ज़िम्मेदारी

1942 ई. में हृदय-गति के रुक जाने से उनके पिता का देहांत हो गया। तेरह वर्ष की अल्पायु में ही लता जी को परिवार की सारी ज़िम्मेदारियाँ अपने नाज़ुक कंधों पर उठानी पड़ी। अपने परिवार के भरण पोषण के लिये उन्होंने 1942 से 1948 के बीच हिन्दी व मराठी में क़रीबन 8 फ़िल्मों में काम किया। इन में से कुछ के नाम हैं: “पहेली मंगलागौर” 1942, “मांझे बाल” 1944, “गजाभाऊ” 1944, “छिमुकला संसार” 1943, “बडी माँ” 1945, “जीवन यात्रा” 1946, “छत्रपति शिवाजी” 1954 इत्यादि।[1] लेकिन आपकी मंज़िल तो संगीत ही थी और उनके पार्श्व गायन की शुरुआत 1942 की मराठी फ़िल्म "कीती हसाल" से हुई दुर्भाग्यवश यह गीत काट दिया गया और फ़िल्म में शामिल नहीं हुआ।

जीवन में संघर्ष

सफलता की राह कभी भी आसान नहीं होती है। लता जी को भी अपना स्थान बनाने में बहुत कठिनाइयों का सामना करना पडा़। कई संगीतकारों ने तो आपको शुरू-शुरू में पतली आवाज़ के कारण काम देने से साफ़ मना कर दिया था। उस समय की प्रसिद्ध पार्श्व गायिका नूरजहाँ के साथ लता जी की तुलना की जाती थी। लेकिन धीरे-धीरे अपनी लगन और प्रतिभा के बल पर आपको काम मिलने लगा।

संगीत में पहला क़दम

1942 में पहली बार गाने का पार्श्व अनुभव
1943 में पहला हिन्दी गाना
1947 में हिन्दी फ़िल्मों में पार्श्व गायन (आपकी सेवा में) के रूप में पहला गीत
1949 में प्रसिद्ध फ़िल्म बरसात, अंदाज, दुलारी और महल
1950 में वह फ़िल्मों में सबसे ताकतवर महिला बनीं

संगीत में प्रशंसा

नाम गुम जाएगा, चेहरा ये बदल जाएगा। मेरी आवाज़ ही पहचान है, गर याद रहे। यह गीत लोग कभी नहीं भूल सकते और लता जी का व्यक्तित्व भी इस गीत से झलकता है कि भले ही नाम गुम जाय या चेहरा बदल जाये पर उनकी आवाज़ कोई नहीं भूल सकता। लता जी की अद्भुत कामयाबी ने लता जी को फ़िल्मी जगत की सबसे मज़बूत महिला बना दिया था।लता जी को सर्वाधिक गीत रिकार्ड करने का भी गौरव प्राप्त है। फ़िल्मी गीतों के अतिरिक्त आपने ग़ैरफ़िल्मी गीत भी बहुत खूबी के साथ गाए हैं। लता जी की प्रतिभा को पहचान मिली सन् 1947 में, जब फ़िल्म “आपकी सेवा में” उन्हें एक गीत गाने का मौक़ा मिला। इस गीत के बाद तो आपको फ़िल्म जगत में एक पहचान मिल गयी और एक के बाद एक कई गीत गाने का मौक़ा मिला। इन में से कुछ प्रसिद्ध गीतों का उल्लेख करना यहाँ अप्रासंगिक न होगा। जिसे आपका पहला शाहकार गीत कहा

जाता है वह 1949 में गाया गया “आएगा आने वाला”, जिस के बाद आपके प्रशंसकों की संख्या दिनोदिन बढ़ने लगी। इस बीच आपने उस समय के सभी प्रसिद्ध संगीतकारों के साथ काम किया। अनिल बिस्वास, सलिल चौधरी, शंकर जयकिशन, एस. डी. बर्मन, आर. डी. बर्मन, नौशाद, मदनमोहन, सी. रामचंद्र इत्यादि सभी संगीतकारों ने आपकी प्रतिभा का लोहा माना। लता जी ने दो आँखें बारह हाथ, दो बीघा ज़मीन, मदर इंडिया, मुग़ल ए आज़म, आदि महान् फ़िल्मों में गाने गाये है। आपने “महल”, “बरसात”, “एक थी लड़की”, “बड़ी बहन” आदि फ़िल्मों में अपनी आवाज़ के जादू से इन फ़िल्मों की लोकप्रियता में चार चाँद लगाए। इस दौरान आपके कुछ प्रसिद्ध गीत थे: “ओ सजना बरखा बहार आई” (परख-1960), “आजा रे

परदेसी” (मधुमती-1958), “इतना ना मुझसे तू प्यार बढा़” (छाया- 1961), “अल्ला तेरो नाम”, (हम दोनो-1961), “एहसान तेरा होगा मुझ पर”, (जंगली-1961), “ये समां” (जब जब फूल खिले-1965) इत्यादि।

देश-भक्ति गीत

1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद शहीदों को श्रद्धांजलि देने के लिये एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। इस में तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू भी उपस्थित थे। इस समारोह में लता जी के द्वारा गाए गये गीत “ऐ मेरे वतन के लोगों” को सुन कर सब लोग भाव-विभोर हो गये थे। पं नेहरू की आँखें भी भर आईं थीं। ऐसा था आपका भावपूर्ण एवं मर्मस्पर्शी स्वर। आज भी जब देश-भक्ति के गीतों की बात चलती है तो सब से पहले इसी गीत का उदाहरण दिया जाता है।

आवाज़ का जादू

आपने गीत, गज़ल, भजन, संगीत के हर क्षेत्र में अपनी कला बिखेरी है। गीत चाहे शास्त्रीय संगीत पर आधारित हो, पाश्चात्य धुन पर आधारित हो या फिर लोक धुन की खुशबू में रचा-बसा हो। हर गीत को लता जी अपनी आवाज़ के जादू से एक ऐसे जीवंत रूप में पेश करती हैं कि सुनने वाला मंत्रमुग्ध हो जाता है। लता जी ने युगल गीत भी बहुत खूबी के साथ गाए हैं। मन्ना डे, मुहम्मद रफ़ी, किशोर कुमार, महेंद्र कपूर आदि के साथ-साथ आपने दिग्गज शास्त्रीय गायकों पं भीमसेन जोशी, पं जसराज इत्यादि के साथ भी मनोहारी युगल-गीत गाए हैं। गज़ल के बादशाह जगजीत सिंह के साथ आपकी एलबम “सजदा” ने लोकप्रियता की बुलंदियों को छुआ।

फ़िल्मकार, संगीतकार आदि के कथन

फ़िल्मकार श्याम बेनेगल कहते हैं कि "लता मंगेशकर के जैसा कोई और हुआ ही नहीं है। एक मिस्र की 'उम्मे कुल्सुम' थीं और एक लता हैं।"
पंडित हरिप्रसाद चौरसिया की लता जी के बारे में राय है कि "कभी-कभार ग़लती से ऐसा कलाकार पैदा हो जाता है।"
पटकथा लेखक और गीतकार जावेद अख़्तर ने लता मंगेशकर के लिए कई लाजवाब और दिल को छू लेने वाले गीत लिखे हैं। वे कहते हैं, "हमारे पास एक चांद है, एक सूरज है, तो एक लता मंगेशकर भी है।"
अपने समय के प्रसिद्ध अभिनेता दिलीप कुमार कहते हैं कि "लता जी की आवाज़ एक रौशनी है, जो सारे आलम के गोशे-गोशे में मौसिकी का उजाला फैलाती है। उनकी आवाज़ एक करिश्मा है।"
अमिताभ बच्चन कहते हैं कि "लता मंगेशकर की आवाज़ इस सदी की आवाज़ है।"
मशहूर नाटककार विजय तेंडुलकर कहते हैं कि "इस दुनिया में लोग बहुत व्यावहारिक होते हैं, पर लता जी के गीत रोज़ सुनते हैं। उससे किसी का पेट नहीं भरता, लेकिन सुने जा रहे हैं पागलों की तरह।"
शास्त्रीय गायक उस्ताद आमिर ख़ान कहते हैं कि "हम शास्त्रीय संगीतकारों को जिसे पूरा करने में तीन से डेढ़ घंटे लगते हैं, लता जी वह तीन मिनट में पूरा कर देती हैं।"
प्रसिद्ध संगीतकार एस. डी. बर्मन ने एक बार कहा था कि "जब तक लता है, तब तक हम संगीतकार सुरक्षित हैं।"
प्रसिद्ध ग़ज़ल गायक जगजीत सिंह ने कहा था कि "बीसवीं सदी की तीन बातें याद रखने लायक हैं, एक चांद पर आदमी की जीत, दूसरा बर्लिन की दीवार का टूटना और तीसरा लता का जन्म।"
अभिनेता शाहरुख़ ख़ान का कहना है कि "मेरी ख़्वाहिश है कि मैं किसी अभिनेत्री की भूमिका निभाऊं और मुझे पर्दे पर लता जी की आवाज़ पर अभिनय करने का मौका मिले।

पुरस्कार

सांगीतिक उपलब्धियों के लिए आपको अनेक पुरस्कारों से नवाज़ा गया। संगीत जगत में अविस्मरणीय योगदान के लिए लता जी को

फ़िल्म फेयर पुरस्कार (1958, 1962, 1965, 1969, 1993 और 1994)
राष्ट्रीय पुरस्कार (1972, 1975 और 1990)
महाराष्ट्र सरकार पुरस्कार (1966 और 1967)
सन 1969 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।
सन 1989 में उन्हें फ़िल्म जगत का सर्वोच्च सम्मान ‘दादा साहेब फाल्के पुरस्कार’ दिया गया।
सन 1993 में फ़िल्म फेयर के 'लाइफ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार' से सम्मानित किया गया।
सन 1996 में स्क्रीन के 'लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार' से सम्मानित किया गया।

सन 1997 में 'राजीव गांधी पुरस्कार' से सम्मानित किया गया।
सन 1999 में पद्मविभूषण, एन.टी.आर. और ज़ी सिने के 'लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार' से सम्मानित किया गया।
सन 2000 में आई. आई. ए. एफ.(आइफ़ा) के 'लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार' से सम्मानित किया गया।
सन 2001 में स्टारडस्ट के 'लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार', नूरजहाँ पुरस्कार, महाराष्ट्र भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
सन 2001 में भारत सरकार ने आपकी उपलब्धियों को सम्मान देते हुए देश के सर्वोच्च पुरस्कार “भारत रत्न” से आपको विभूषित किया।

मृत्यु

92 साल की उम्र में लगा मंगेशकर का निधन 22 फ़रवरी, 2022 को हुआ। उनका 29 दिनों से मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में इलाज चल रहा था। जानकारी के मुताबिक, रविवार सुबह 8:12 बजे उन्होंने आखिरी सांस ली।

पीएम नरेंद्र मोदी ने लता मंगेशकर के निधन पर शोक जताया। उन्होंने ट्वीट करते हुए लिखा, "लता दीदी के गानों ने कई तरह के इमोशन्स को उभारा। उन्होंने दशकों तक भारतीय फिल्म जगत के बदलावों को करीब से देखा। फिल्मों से परे, वह हमेशा भारत के विकास के बारे में भावुक थीं। वह हमेशा एक मजबूत और विकसित भारत देखना चाहती थीं

लता मंगेशकर के जीवन से जुड़े कुछ मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं-

लता जी को संगीत के अलावा खाना पकाने और फ़ोटो खींचने का बहुत शौक़ है।
सन 1974 में दुनिया में सबसे अधिक गीत गाने का 'गिनीज़ बुक रिकॉर्ड' उनके नाम पर दर्ज है।
अपना पहला गाना लता मंगेशकर ने मराठी फ़िल्म 'किती हसाल' (1942) में गाया था।
लता मंगेशकर को पहली बार सबसे बड़ा मौक़ा फ़िल्म 'महल' से मिला, उनका गाया "आयेगा आने वाला" बहुत प्रसिद्ध हुआ था।
उन्होंने 1980 के बाद से फ़िल्मों में गाना कम कर दिया था और कहानी, संवाद आदि पर अधिक ध्यान देने लगी थीं।
लता जी ही एकमात्र ऐसी जीवित महिला गायिका हैं, जिनके नाम से पुरस्कार दिए जाते हैं।
'आनंद गान बैनर' तले फ़िल्मों का निर्माण भी उन्होंने किया है और इसके साथ ही संगीत भी दिया है।
अभी भी गाने की रिकॉर्डिंग के लिये जाने से पहले लता मंगेशकर कमरे के बाहर अपनी चप्पलें उतारती हैं। वे हमेशा नंगे पाँव गाना गाती हैं।
#28sep
#06feb

भपिंदर सिंह सिंगर

#06feb
#18july 
भूपिंदर सिंह

पूरा नाम भूपिंदर सिंह
🎂जन्म 06 फ़रवरी, 1940
जन्म भूमि अमृतसर, पंजाब
⚰️मृत्यु 18 जुलाई, 2022
मृत्यु स्थान मुम्बई, महाराष्ट्र

अभिभावक पिता- प्रोफेसर नत्था सिंह
पति/पत्नी मिताली सिंह
संतान पुत्र- निहाल
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र भारतीय सिनेमा
प्रसिद्धि ग़ज़ल व पार्श्वगायक
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी संगीतकार मदन मोहन ने एक संगीत समारोह में भूपिंदर सिंह को गाते देखा तो बस उनकी आवाज़ और अंदाज पर ऐसे फिदा हुए कि उनको अपनी अगली फिल्म में मौका देने की ठान ली।
भूपिंदर सिंह (अंग्रेज़ी: Bhupinder Singh, जन्म- 6 फ़रवरी, 1940; मृत्यु- 18 जुलाई, 2022) भारतीय सिनेमा के ख्याति प्राप्त पार्श्वगायक और ग़ज़ल गायक थे। उनके गाये हुए प्रसिद्ध गीतों में 'मेरा रंग दे बसंती चोला', 'नाम गुम जाएगा', 'प्यार हमें किस मोड़ पे', 'हुजूर इस कदर' आदि शामिल है। फ़िल्म 'मौसम' के गीत 'दिल ढूंढता है फिर वही, फुरसत के रात दिन' के गायक भूपिंदर सिंह ने संगीत की दुनिया में अपनी सत्ता लगातार बनाए रखी। अपनी जवारीदार गंभीर आवाज़़ से मखमली एहसास पैदा करने वाले महान गायक भूपिंदर सिंह का जादू हमेशा सिर चढ़ कर बोलता था।

परिचय
भूपिंदर सिंह का जन्म पंजाब के अमृतसर में 6 फरवरी, 1940 को हुआ था। उनके पिता प्रोफेसर नत्था सिंह खुद अच्छे संगीतकार थे। ‘दिल ढूंढता है फिर वही फुरसत के रात दिन’ से भूपिंदर सिंह को शोहरत मिली। भूपिंदर सिंह का मोहम्मद रफ़ी, तलत महमूद और मन्ना डे के साथ गाया गीत ‘होके मजबूर मुझे, उसने बुलाया होगा’ बेहद लोकप्रिय हुआ था। उनके लोकप्रिय गीतों में 'दुनिया छूटे यार ना छूटे', 'थोड़ी सी जमीन थोड़ा आसमान', 'दिल ढूंढ़ता है', 'नाम गुम जाएगा' जैसे कई गाने शामिल हैं। यही नहीं भूपिंदर सिंह ने अपनी पत्नी मिताली सिंह के साथ 'दो दीवाने शहर में', 'कभी किसी को मुकम्मल जहां', 'एक अकेला इस शहर में' जैसे कई हिट गाने भी गाए। उन्हें सत्ते पे सत्ता, आहिस्ता-आहिस्ता, दूरियां, हकीकत और कई अन्य फिल्मों के यादगार गानों के लिए भी भूपिंदर को खूब याद किया जाता है।

विवाह
भूपिंदर सिंह ने 1980 के दशक में बांग्लादेश की गायिका मिताली मुखर्जी से शादी की थी। एक कार्यक्रम में उन्होंने मिताली को गाते सुना था। उसके बाद दोनों की मुलाकात प्यार में बदल गई। मिताली-भूपिंदर ने एक साथ सैकड़ों लाइव शो किए। उनका एक बेटा निहाल भी संगीतकार है।

दिल तक पहुंचने वाली आवाज़़
दिग्गज लेखक और फिल्मकार गुलज़ार भूपिंदर सिंह की आवाज़ के मुरीद रहे। उनके बारे में गुलज़ार ने एक बार कहा था, 'भूपिंदर की आवाज़़ किसी पहाड़ी से टकराने वाली बारिश की बूंदों की तरह है। उनकी मखमली आवाज़़ आत्मा तक सीधे पहुंचती है।'

मुंबई आगमन
अपने पिता की सख्त मिजाजी के कारण शुरुआती दौर में भूपिंदर सिंह को संगीत से नफरत हो गई थी। लेकिन उनकी आवाज़ का जादू ज्यादा देर तक इस चिढ़ का बंधक न रह पाया और उनके सुरीले सफर का सिलसिला तेजी से शुरू हो गया। सबसे पहले उनकी गजलें आकाशवाणी में चलीं। इसके बाद दिल्ली दूरदर्शन में अवसर मिला। 1968 में संगीतकार मदन मोहन ने ऑल इंडिया रेडियो पर उनका कार्यक्रम सुनकर उन्हें मुंबई बुला लिया था।[1]

दरअसल, संगीतकार मदन मोहन ने एक संगीत समारोह में भूपिंदर सिंह को गाते देखा तो बस उनकी आवाज़ और अंदाज पर ऐसे फिदा हुए कि उनको अपनी अगली फिल्म में मौका देने की ठान ली। गायिका मिताली मुखर्जी से भूपिंदर सिंह की शादी 1984 में हुई थी। गायन और गिटार बजाने में माहिर भूपिंदर सिंह और मिताली की जोड़ी ने फिल्म संगीत और गजलों की दुनिया में खूब धूम मचाई। 'गुलमोहर', 'शबनम', 'अर्ज किया है', 'दूरियां', 'तेरा प्यार', 'चांद परोसा है' जैसे म्यूजिक एल्बम्स के अलावा फिल्म 'सत्ते पे सत्ता', 'दीवार', 'ज्वेल थीफ', 'मौसम', 'एक बार फिर' जैसी यादगार फिल्मों में अपनी आवाज़ का जादू बिखेरा।

प्रसिद्ध गीत
नाम गुम जाएगा, चेहरा ये बदल जायेगा
प्यार हमें किस मोड़ पे
दिल ढूंढता है फिर वही
किसी नजर को तेरा इंतजार आज भी है
मेरे घर आना जिंदगी
हो के मजबूर मुझे
दो दिवाने शहर में
हुजूर इस कदर
करोगे याद तो हर बात याद आएगी
थोड़ी सी जमींन थोड़ा आसमान
शमा जलाए रखना
कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता
मृत्यु
प्रसिद्ध गायक भूपिंदर सिंह का निधन 18 जुलाई, 2022 को मुम्बई, महाराष्ट्र में हुआ। वह लंबे समय से बीमार चल रहे थे। उनकी पत्नी मिताली का कहना था कि वह पिछले 9 दिनों से अस्पताल में भर्ती थे और दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया।

मंगलवार, 18 जुलाई 2023

भूपेंद्र

🎂जन्म की तारीख और समय: 06 फ़रवरी 1940
⚰️मृत्यु की जगह और तारीख: 18 जुलाई 2022
अपने करियर की शुरुआत में, भूपिंदर ने ऑल इंडिया रेडियो, दिल्ली पर प्रदर्शन किया। वह दिल्ली दूरदर्शन केंद्र, दिल्ली से भी जुड़े रहे। उन्होंने गिटार और वायलिन बजाना सीखा। 1964 में, संगीत निर्देशक मदन मोहन ने उन्हें आकाशवाणी पर सुना, और उन्हें बॉम्बे बुलाया। उन्होंने उन्हें चेतन आनंद की हकीकत में मोहम्मद रफी के साथ होके मजबूर मुझे उसे बुलाया होगा गाना गाने का मौका दिया। हालांकि गाना हिट रहा, लेकिन भूपिंदर को ज्यादा पहचान नहीं मिली। उन्होंने कुछ कम बजट की फिल्मों में कुछ और गाने गाए।

बाद में, भूपेन्द्र सिंह राहुल देव बर्मन के ऑर्केस्ट्रा में शामिल हो गए और दम मारो दम सहित अपने कई लोकप्रिय गीतों के लिए गिटार बजाया। वह आर डी बर्मन के अच्छे दोस्त बन गए, जिन्होंने उन्हें गुलज़ार की परिचय (1972) में गाने का मौका दिया। भूपिंदर ने फिल्म में दो गाने, बेटी ना बीताई रैना और मितवा बोले मीठे बाई गाए, जिसने उन्हें एक गायक के रूप में पहचान दिलाई। भूपिंदर ने गुलजार की फिल्मों में कुछ और लोकप्रिय गाने गाए। इनमें से कुछ गानों में मौसम का “दिल ढूंढता है”, “नाम गम जाएगा” और “एक अकेला इस शहर में” शामिल हैं।

धीरे-धीरे, भूपेन्द्र सिंह ने निजी एल्बम जारी करना शुरू कर दिया। उनके पहले एलपी में तीन स्व-रचित गाने थे और 1968 में रिलीज़ हुए थे। 1978 में, उन्होंने ग़ज़लों का अपना दूसरा एल.पी. जारी किया, जिसमें उन्होंने स्पेनिश गिटार, बास और ड्रम को ग़ज़ल शैली में पेश किया। 1980 में, उन्होंने वो जो शायर था शीर्षक से अपना तीसरा एलपी रिलीज़ किया, जिसके लिए गीत गुलज़ार ने लिखे थे।

ब्रिटिश राज के दौरान गायक भूपिंदर सिंह का जन्म 6 फरवरी 1940 को पंजाब प्रांत के अमृतसर रियासत में हुआ था। उनके पिता का नाम प्रोफेसर नाथ सिंह था। उनके पिता भी एक कुशल संगीतकार थे।

भूपिंदर सिंह ने बचपन में ही अपने पिता से गाना सीखा था। शिक्षा के मामले में उनके पिता बेहद सख्त थे। अपने पिता के सख्त आचरण के कारण, युवा भूपिंदर सिंह ने शुरू में संगीत को तुच्छ जाना। भूपिंदर सिंह और उन्हें संगीत में बिल्कुल भी दिलचस्पी नहीं थी।

भूपिंदर सिंह ने 1980 के दशक में बांग्लादेशी हिंदू गायिका मिताली सिंह से शादी की। शादी के बाद उन्होंने पार्श्व गायन छोड़ दिया। उनकी पत्नी मिताली सिंह भी एक शानदार गायिका हैं।

मिताली सिंह और भूपिंदर सिंह ने कई बेहतरीन युगल संगीत कार्यक्रम किए हैं। फलस्वरूप उसकी ख्याति चार चन्द्रमाओं से बढ़ गई। निहाल सिंह मिताली सिंह और भूपिंदर सिंह के बेटे हैं।

एक समय था जब भूपिंदर सिंह सामान्य रूप से संगीत से घृणा करते थे। उन्हें संगीत में कोई दिलचस्पी नहीं थी। हालाँकि, उन्होंने धीरे-धीरे गायन में रुचि विकसित की और ग़ज़लों का प्रदर्शन करना शुरू कर दिया। अपने करियर के शुरुआती दिनों में गायक भूपिंदर सिंह का ऑल इंडिया रेडियो पर अपना शो था।

आकाशवाणी पर उनके उत्कृष्ट प्रदर्शन के कारण उन्हें दूरदर्शन केंद्र दिल्ली में काम करने का अवसर मिला। उन्होंने वहां काम किया और वायलिन और गिटार भी सिखाया।

प्रसिद्ध संगीतकार मदन मोहन ने ऑल इंडिया रेडियो पर भूपिंदर सिंह का कार्यक्रम सुना और उन्हें 1968 में दिल्ली से तत्कालीन बॉम्बे बुलाया। (मुंबई)।

भूपेन्द्र सिंह को बॉम्बे आने के बाद बॉलीवुड फिल्मों में गाने का मौका दिया गया। बॉलीवुड फिल्म हकीकत एक एक सॉन्ग होके मजबूर मुझे उन बुला होगा में उन्होंने अपनी पहली ग़ज़ल गाया था।
यह ग़ज़ल बहुत हिट हुई, लेकिन गायक भूपिंदर सिंह को इसके परिणामस्वरूप कोई विशेष पहचान नहीं मिली। बावजूद इसके भूपेन्द्र सिंह हो ने कम बजट की फिल्मों में काम करना और गाना जारी रखा।

बॉलीवुड गायक भूपिंदर सिंह ने स्पेनिश गिटार और ड्रम पर गाते हुए अपनी कुछ ग़ज़लों का प्रदर्शन किया।
भूपेन्द्र सिंह ने ग़ज़लों की अपनी पहली एलपी जारी की और 1968 में अपनी लिखी, लेकिन यह उनकी दूसरी एलपी थी जिसने उन्हें प्रसिद्ध बना दिया।
उसके बाद, भूपिंदर सिंह ने 1978 में अपना तीसरा एलपी, “वो जो शहर था” जारी किया, जिसने उन्हें प्रसिद्धि दिलाई।
भूपिंदर सिंह ने राहुल देव बर्मन, जयदेव लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, बप्पी लाहिड़ी और खय्याम सहित भारत के कई बड़े संगीतकारों के लिए गाया। उनकी प्रतिष्ठित आवाज बॉलीवुड के इतिहास में सबसे ज्यादा पहचानी जाने वाली आवाज में से एक है।

भूपिंदर सिंह आर.डी. बर्मन के ऑर्केस्ट्रा और ‘दम मारो दम…’ और ‘एक ही ख्वाब…’ सहित आरडी के कई सबसे प्रसिद्ध गीतों पर गिटार बजाया, आरडी बर्मन उनके करीबी दोस्त बन गए। 1972 में परिचय की रिलीज के साथ, आरडी ने उन्हें अपनी पहली ‘ओरिजिनल’ हिट दी। परिचय में, भूपिंदर ने दो गाने गाए: ‘काटे ना बीताई रैना..’ और ‘मितवा बोले मीठी बाई..’ उन्हें पूरे देश से बहुत प्रशंसा मिली। परिचय ने उनके दृष्टिकोण को बदल दिया; अब उन्हें एक गंभीर आवाज के रूप में माना जाता था, और संगीतकारों ने उन्हें गंभीरता से लिया। भूपिंदर ने गायन की अपनी शैली विकसित की। ‘दिल झूठा है…’, ‘नाम गुम जाएगा…’ और ‘एक अकेला इस शहर में…’ जैसे गानों के साथ गुलजार की फिल्मों ने उनके लिए एक जगह बनाई।

उनकी बिगड़ती तबीयत के कारण 18 जुलाई, 2022 को शाम 7:45 बजे उनकी मृत्यु हो गई।

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