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गुरुवार, 23 नवंबर 2023

गीता दत्त

महान गायिका गीता दत्त  हार्दिक श्रधांजलि
🎂जन्म 23 नवंबर 1930 को फरीदपुर 
⚰️मृत्यु 20 जुलाई 1972
गीता दत्त भारतीय सिनेमा जगत में प्रसिद्ध पार्श्वगायिका जिसने अपनी दिलकश आवाज़ से लगभग तीन दशकों तक करोड़ों श्रोताओं को मदहोश किया। कालजयी फ़िल्म ‘प्यासा’ के अंत में इस फ़िल्म के गीतों को स्वर देने वाली पार्श्वगायिका गीता दत्त के पति प्रसिद्ध अभिनेता, निर्माता-निर्देशक गुरु दत्त थे।

फ़िल्म जगत में गीता दत्त के नाम से मशहूर गीता घोष राय चौधरी का जन्म 23 नवंबर 1930 को फरीदपुर शहर में हुआ। जब वे महज 12 वर्ष की थी तब उनका पूरा परिवार अब बांग्लादेश में फरीदपुर से मुंबई आ गया। उनके पिता जमींदार थे। बचपन के दिनों से ही गीता दत्त का रुझान संगीत की ओर था और वह पार्श्वगायिका बनना चाहती थी। गीता दत्त ने अपनी संगीत की प्रारंभिक शिक्षा हनुमान प्रसाद से हासिल की।

गीता दत्त को सबसे पहले वर्ष 1946 में फ़िल्म 'भक्त प्रहलाद' के लिए गाने का मौका मिला।गीता दत्त ने 'कश्मीर की कली', रसीली, सर्कस किंग (1946) जैसी कुछ फ़िल्मो के लिए भी गीत गाए लेकिन इनमें से कोई भी बॉक्स आफिस पर सफल नहीं हुई। इस बीच उनकी मुलाकात महान संगीतकार एस. डी. बर्मन से हुई। गीता राय में एस.डी. बर्मन को फ़िल्म इंडस्ट्री का उभरता हुआ
सितारा दिखाई दिया और उन्होंने गीता दत्त से अपनी अगली फ़िल्म 'दो भाई' के लिए गाने की पेशकश की। वर्ष 1947 में प्रदर्शित फ़िल्म 'दो भाई' गीता दत्त के सिने कैरियर की अहम फ़िल्म साबित हुई और इस फ़िल्म में उनका गाया यह गीत 'मेरा सुंदर सपना बीत गया' लोगों के बीच काफ़ी लोकप्रिय हुआ। फ़िल्म 'दो भाई' में अपने गाये इस गीत की कामयाबी की बाद बतौर पार्श्वगायिका गीतादत्त अपनी पहचान बनाने में सफल हो गई।

वर्ष 1951 गीता दत्त के सिने कैरियर के साथ ही व्यक्तिगत जीवन में भी एक नया मोड़ लेकर आया। फ़िल्म 'बाजी' के निर्माण के दौरान उनकी मुलाकात निर्देशक गुरुदत्त से हुई। फ़िल्म के एक गाने 'तदबीर से बिगड़ी हुई तकदीर बना ले' की रिर्काडिंग के दौरान गीता दत्त को देख गुरुदत्त मोहित हो गए। इसके बाद गीता दत्त भी गुरुदत्त से प्यार करने लगी। वर्ष 1953 में गीता दत्त ने
गुरुदत्त से शादी कर ली। इसके साथ ही फ़िल्म बाजी की सफलता ने गीता दत्त की तकदीर बना दी और बतौर पार्श्व गायिका वह फ़िल्म इंडस्ट्री में स्थापित हो गई।
दिलों की गहराई तक उतर जाने वाली आवाज़ और गाने के दिलकश अंदाज़ की मलिका गीता दत्त भारतीय फ़िल्म संगीत में पश्चिमी प्रभाव की पहचान थी और वह ऐसी फनकार थी जिन्हें हर तरह के गीत गाने में महारत हासिल थी। गीता दत्त की जादुई आवाज़ सबसे पहले ‘जोगन’ में सुनने को मिली। इस फ़िल्म में उन्होंने मीरा के आर्त्तनाद को उंडेलकर श्रोताओं को विरही बना दिया है। वे खुलकर गाती हैं- ‘मैं तो गिरधर के घर जाऊँ। घूँघट के पट खोल रे तोहे पिया मिलेंगे।‘ और गीता के पिया उससे नौ साल पहले चले गए। वे गाती रहीं - ‘जोगी मत जा, मत जा...।‘ गीता दत्त ने गुरुदत्त की फ़िल्मों में क्या खूब गाया है।गले से नहीं, एकदम दिल से। उनके मन की बेचैनी तथा छटपटाहट एक-एक शब्द से रिसती मिलती है।फ़िल्म चाहे ‘बाजी’ हो या ‘आरपार’, ‘सीआईडी’हो या ‘प्यासा’, ‘कागज के फूल’ हो या ‘चौदहवीं का चाँद’ उनके स्वर की विविधता का कायल हो जाता है श्रोता। ‘तदबीर से बिगड़ी हुई तकदीर बना ले’ (बाजी), ‘बाबूजी धीरे चलना, प्यार में जरा संभलना...हाँ बड़े धोखे हैं इस प्यार में’। सचमुच उन्होंने प्यार में धोखा खाया। फिर भी गाती रहीं - ‘ये लो मैं हारी पिया, हुई तेरी जीत रे।‘‘साहिब बीबी और ग़ुलाम’ फ़िल्म भले ही छोटी बहू यानी कि मीना कुमारी की फ़िल्म रही हो,लेकिन छोटी बहू का दर्द, शिकायत, अकेलेपन की पीड़ा, पति की बेवफाई को गीता की आवाज़ ने परदे पर ऐसा उतारा कि मीना अमर हो गईं। ‘न जाओ सैंया, छुड़ा के बैंया, कसम तुम्हारी मैं रो पड़ूँगी।‘ और मीना के साथ सिनेमाघर के अँधेरे में डूबे हजारों दर्शक रोए। गीता दत्त ने हर तरह के गाने गाए हैं। फ़िल्म ‘बाजी’ के गीत ‘जरा सामने आ, जरा आँख मिला’ में श्रोताओं को उन्मादी स्वर मिलते हैं। ‘भाई-भाई’ का गीत ‘ऐ दिल मुझे बता दे, तू किसपे आ गया है’ सुनकर मन प्रेम की सफलता से भर जाता है। ‘ प्यासा’ की गुलाबो का जीवन संगीत सुनकर मन अतृप्त प्यास में खो जाता है- ‘आज सजन मोहे अंग लगा ले, जनम सफल हो जाए।‘ लेकिन गीता ने जिन्दगीभर जिन्दगी का जहर पिया- ‘कैसे कोई जिए, जहर है जिन्दगी।‘ वह शराब का जहर रोजाना गले के नीचे उतारती रहीं और एक दिन सबको अकेला छोड़कर चली गईं।

वर्ष 1957 मे गीता दत्त और गुरुदत्त की विवाहित ज़िंदगी मे दरार आ गई। गुरुदत्त ने गीता दत्त के काम में दख़ल देना शुरू कर दिया। वह चाहते थे गीता दत्त केवल उनकी बनाई फ़िल्म के लिए ही गीत गाये। काम में प्रति समर्पित गीता दत्त तो पहले इस बात के लिये राजी नहीं हुयी लेकिन बाद में गीता दत्त ने किस्मत से समझौता करना ही बेहतर समझा। धीरे-धीरे अन्य निर्माता निर्देशको ने गीता दत्त से किनारा करना शुरू कर दिया।कुछ दिनों के बाद गीता दत्त अपने पति गुरुदत्त के बढ़ते दख़ल को बर्दाशत न कर सकी और उसने गुरुदत्त से अलग रहने का निर्णय कर लिया। इस बात की एक मुख्य वजह यह भी रही कि उस समय गुरुदत्त का नाम अभिनेत्री वहीदा रहमान के साथ भी जोड़ा जा रहा था जिसे गीता दत्त सहन नहीं कर सकीं। गीता दत्त से जुदाई के बाद गुरुदत्त टूट से गये और उन्होंने अपने आप को शराब के नशे मे डूबो दिया। 10 अक्तूबर 1964 को अत्यधिक मात्रा मे नींद की गोलियां लेने के कारण गुरुदत्त इस दुनियां को छोड़कर चले गए। गुरुदत्त की मौत के बाद गीता दत्त को गहरा सदमा पहुंचा और उसने भी अपने आप को नशे में डुबो दिया।

गीता दत्त के सदाबहार गीत

खयालों में किसी के इस तरह आया नहीं करते (बावरे नैन : 1950)
सुनो गजर क्या गाए (बाज़ी : 1951)
न ये चाँद होगा, न ये तारे रहेंगे (शर्त : 1954)
कैसे कोई जिए, जहर है जिन्दगी (बादबान 1954)
जाने कहाँ मेरा जिगर गया जी (मिस्टर एंड मिसेस 55 : 1955)
जाता कहाँ है दीवाने (सीआईडी : 1956)
ऐ दिल मुझे बता दे, तू किसपे आ गया है (भाई-भाई : 1956)
आज सजन मोहे अंग लगा ले (प्यासा : 1957)
मेरा नाम चिन-चिन चू (हावड़ा ब्रिज :1958)
वक्त ने किया क्या हँसीं सितम (कागज के फूल : 1959)

सत्तर के दशक में गीता दत्त की तबीयत खराब रहने
लगी और उन्होंने एक बार फिर से गीत गाना कम
कर दिया। लगभग तीन दशक तक अपनी आवाज़ से
श्रोताओं को मदहोश करने वाली पार्श्वगायिका गीता दत्त ने अंतत: 20 जुलाई 1972 को इस दुनिया से विदाई ले ली।

गुरुवार, 20 जुलाई 2023

कमालुद्दीन अहमद या कमल दासगुप्ता

कमालुद्दीन अहमद या कमल दासगुप्ता
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🎂जन्म: 28 जुलाई 1912, जेस्सोर, बांग्लादेश
⚰️मृत्यु : 20 जुलाई 1974, ढाका, बांग्लादेश
फ़िल्में: कृष्णा लीला, Bindiya, हॉस्पिटल, Arabian Nights, Faisla, ज़्यादा
पोते या नाती: अज़रफ़ राकिन अहमद, रानिया सफा अहमद, अहनफ़ अहमद
बच्चे: हामिन अहमद, शफिन अहमद, ताहसिन अहमद
पत्नी: फिरोजा बेगम (विवा. 1955–1974)
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कमालुद्दीन अहमद या कमल दासगुप्ता भारतीय उपमहाद्वीप के प्रसिद्ध संगीतकारों, संगीतकारों और संगीत निर्देशकों में से एक थे। 1955 में, कमल दासगुप्ता ने फिरोजा बेगम बेगम से शादी की, जो बांग्लादेश और भारतीय उपमहाद्वीप की नज़रूल संगीत हस्तियों में से एक थीं। तब वह 43 साल के थे।जिन्होंने लगभग आठ हजार गानों के लिए संगीत तैयार किया था।
1935 में, दासगुप्ता एक संगीत निर्देशक के रूप में ग्रामोफोन कंपनी ऑफ़ इंडिया में शामिल हुए। वहां अपने कार्यकाल के दौरान, उन्होंने काज़ी नज़रुल इस्लाम के साथ घनिष्ठ संबंध विकसित किया और उनके लगभग चार सौ गीतों के लिए संगीत तैयार किया। दासगुप्ता ने जिन ग्रामोफोन रिकॉर्ड्स के लिए संगीत तैयार किया, वे 1950 और 1960 के दशक में उल्लेखनीय थे। उनके गीतों में आज भी उल्लेखनीय हैं सांझेर तारका अमी (मैं गोधूलि का सितारा हूं), पृथ्वी अमारे चाय (दुनिया को मेरी जरूरत है), और अमी भोरेर जुथिका'' (मैं सुबह की चमेली हूं)।

दासगुप्ता की ⚰️मृत्यु 18 जुलाई 1974 को ढाका में हुई।

बुधवार, 19 जुलाई 2023

गीता दत्त

गीता दत्त विख्यात भारतीय गायिका थीं। इनका जन्म भारत के विभाजन से पहले फरीदपुर में हुआ। 

उन्होंने हिंदी सिनेमा में एक पार्श्व गायिका के रूप में विशेष पहचान पाई। 
🎂जन्म: 23 नवंबर 1930, इदिलपुर
⚰️मृत्यू: 20 जुलाई 1972, सर एच एन रिलायंस फाउंडेशन हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर, मुम्बई
पति: गुरु दत्त (विवा. 1953–1964)
बच्चे: तरुण दत्त, नीना दत्त, अरुण दत्त
भाई: कनु रॉय
गीता घोष रॉय चौधरी 10 बच्चों में से एक थी। उनका जन्म इदिलपुर नामक गाँव में एक अमीर ज़मींदार परिवार में हुआ था, जो अब बांग्लादेश के शरियतपुर ज़िले में आता है लेकिन उस समय बंगाल प्रांत, ब्रिटिश भारत के फरीदपुर जिले में था। उनका परिवार अपनी भूमि और संपत्तियों को पीछे छोड़ते हुए, 1940 के शुरुआती वर्षों में कलकत्ता और असम चला गया। 1942 में, उनके माता-पिता बॉम्बे के एक अपार्टमेंट में रहने लगे।गीता बारह वर्ष की थी और उन्होंने बंगाली हाई स्कूल में स्कूली शिक्षा जारी रखी।
↔️फिल्म बाज़ी के गाने की रिकॉर्डिंग के दौरान, गीता उसके युवा निर्देशक, गुरु दत्त से मिलीं। उनका प्रेम-सम्बन्ध 26 मई 1953 को विवाह के बाद समाप्त हुआ। साथ में उनके तीन बच्चे हुए: तरुण (1954-1985), अरुण (1956-2014) और नीना (जन्म: 1964)। उन्होंने सुधीर दासगुप्ता और अनिल चटर्जी जैसे उल्लेखनीय संगीत निर्देशकों की धुनों पर गाते हुए कई गैर-फिल्मी गाने भी रिकॉर्ड किये।

1957 में, गुरु दत्त ने गीता दत्त के साथ गायिका के रूप में फिल्म गौरी जारी की। यह सिनेमास्कोप में भारत की पहली फिल्म होने वाली थी, लेकिन फिल्मांकन के कुछ दिनों में ही इस परियोजना को रोक दिया गया। तब तक, गुरुदत्त ने वहीदा रहमान के साथ प्रेम-सम्बन्ध स्थापित कर लिया था और गीता ने शराब पीना शुरू कर दिया था।उनकी शादी ने गीता के गायन कैरियर को प्रभावित किया।

1958 में, एस॰ डी॰ बर्मन की पार्श्व गायिका लता मंगेशकर के साथ कलह हो गई थी और उन्होंने गीता को अपनी रचनाओं में मुख्य गायिका के रूप में विकसित करने का प्रयास किया था। उन्होंने आशा भोंसले के बजाय उनको चुना क्योंकि उन्हें लगता था कि आशा अपेक्षाकृत कच्ची हैं। हालाँकि, अपनी व्यक्तिगत समस्याओं के कारण, गीता अपनी कला का पर्याप्त अभ्यास नहीं करती थी और बर्मन के मानकों को पूरा करने में विफल रही। उन्होंने और ओ॰ पी॰ नैय्यर ने तब आशा के साथ काम करना शुरू किया और एक गायिका के रूप में उनके खिलने में मदद की।
के. हनुमान प्रसाद ने गीता को अपने संरक्षण में ले लिया, उन्हें प्रशिक्षित किया और उन्हें गायन के लिए तैयार किया और बाद में उन्हें फिल्मों में गाने का मौका दिया। 1946 में, उन्हें पौराणिक फिल्म भक्त प्रह्लाद में गाने का मौका मिला, जिसके लिए प्रसाद संगीत निर्देशक थे। उन्हें दो गानों के लिए दो पंक्तियाँ दी गईं। वह उस समय सोलह साल की थी।

1947 में, उन्होंने हनुमान प्रसाद की अन्य फिल्मों के लिए गाना गाया।

"नैनों की प्याली से होंठों की मदिरा" (रसीली)
"नेहा लगाके मुख मोड़ गया" (रसीली)
"आजा री निंदिया आजा": स्थापित पार्श्व गायक पारुल घोष (नई मां) के साथ एक लोरी

निचोडू दीन शाह

भारत में डरा हुआ नमक हराम
जन्म : 20 जुलाई 1950 (आयु 72 वर्ष), बाराबंकी
पत्नी: रत्ना पाठक
बच्चे: हीबा शाह, विवान शाह, इमाद शाह
भाई: ज़मीरुद-दीन शाह
माता-पिता: फ़ारूख सुल्तान, अले मोहम्मद शाह
नसीरुद्दीन शाह हिन्दी फ़िल्मों के एक प्रसिद्ध अभिनेता हैं। नसीरुद्दीन शाह, जिन्हें हिंदी फ़िल्म उद्योग में अदाकारी का एक पैमाना कहा जाए तो शायद ही किसी को एतराज हो। नसीर की काबिलियत का सबसे बड़ा सुबूत है, सिनेमा की दोनों धाराओं में जिनसे कामयाबी मिली उन्ही से इसको डर लगने लगा लोगो ने इसकी धजियाँ उड़ाने की भी कोई कोर कसर नही छोड़ी
↔️नसीरुद्दीन शाह, जिन्हें हिंदी फ़िल्म उद्योग में अदाकारी का एक पैमाना कहा जाए तो शायद ही किसी को एतराज हो। नसीर की काबिलियत का सबसे बड़ा सुबूत है, सिनेमा की दोनों धाराओं में उनकी कामयाबी। नसीर का नाम अगर पैरेलल सिनेमा के सबसे बेहतरीन अभिनेताओं की सूची में शामिल हुआ तो बॉलीवुड की मुख्य धारा या व्यापारिक फ़िल्मों में भी उन्होंने बड़ी कामयाबी हासिल की है।

नसीर अपने शानदार अंदाज से मुख्य धारा के चहेते सितारे बन गए, ऐसा सितारा जिसने हर तरह के किरदार को बेहतरीन अभिनय से जिंदा कर दिया। ये सितार जब भी स्क्रीन पर आया देखने वाले के दिल पर उस किरदार की यादगार छाप छोड़ गया। उसकी कॉमेडी ने पब्लिक को खूब गुदगुदाया तो एक्शन में भी उसका अलग ही अंदाज नजर आया।

मुख्य धारा सिनेमा में नसीरुद्दीन शाह के सफर की शुरुआत 1980 में आई फ़िल्म 'हम पांच' से हुई। फ़िल्म भले ही व्यापारिक थी, लेकिन इसमें नसीर के अभिनय की गहराई समानांतर सिनेमा वाली फ़िल्मों से कम नहीं थी। गुलामी को अपनी तकदीर मान चुके एक गांव में विद्रोह की आवाज बुलंद करते नौजवान के किरदार में नसीर ने जान फूंक दी।

हालांकि फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पर कामयाब नहीं रही और एक व्यापारिक एक्टर के तौर पर सफलता साबित करने के लिए नसीर को टिकट खिड़की पर भी बिकाऊ बनने की जरूरत थी। और उनके लिए ये काम किया 'जाने भी दो यारों' ने। बॉलीवुड की ऑल टाइम बेस्ट कॉमेडी फ़िल्मों में शुमार 'जाने भी दो यारों' में रवि वासवानी और नसीर की जोड़ी ने बेजोड़ कॉमिक टाइमिंग दिखाई और फ़िल्म बेहद कामयाब रही। लेकिन कमर्शियल सिनेमा में नसीर की सबसे बड़ी कामयाबी बनी 'मासूम'। बाप और बेटे के रिश्तों को उकेरती 'मासूम' में नसीर ने कमाल की अदाकारी से ना केवल खूब वाहवाही बटोरी बल्कि फ़िल्म भी सुपरहिट हुई और नसीर को एक स्टार का दर्जा मिल गया।

नसीर के इस स्टार स्टेटस को और मजबूत किया 1986 में आई सुभाष घई की मल्टीस्टारर मेगाबजट फ़िल्म 'कर्मा' ने। फ़िल्म में नसीर के लिए अपनी छाप छोड़ना आसान नहीं था क्योंकि वहां अभिनय सम्राट "दिलीप कुमार भी थे। और उस दौर के नए नवेले सितारे जैकी श्रॉफ और अनिल कपूर भी थे।

1987 में गुलजार की 'इजाजत' नसीर के लिए कामयाबी का एक और जरिया बन कर आई। एक जज्बाती कहानी, बेहतरीन निर्देशन, शानदार अभिनय और यादगार संगीत। 'इजाजत' ने बॉक्स ऑफिस पर जबरदस्त कामयाबी हासिल की और बतौर व्यापारिक एक्टर नसीर का रुतबा और बढ़ गया। 'त्रिदेव' जैसी सुपरहिट फ़िल्म देकर, 90 का दशक आते-आते नसीर ने व्यापारिक फ़िल्मों में भी अपनी अलग पहचान बना ली थी।

2003 में आई हॉलीवुड फ़िल्म 'द लीग ऑफ एक्सट्रा ऑर्डिनरी जेंटलमेन' में नसीरुद्दीन ने कैप्टन नीमो का किरदार निभाया तो दूसरी तरफ पाकिस्तानी फ़िल्म 'खुदा के लिए' में भी उन्होंने शानदार काम किया। देश से लेकर परदेस तक, नसीरुद्दीन शाह ने अपनी अदाकारी का लोहा सारी दुनिया में मनवाया है। लेकिन नसीर अपनी काबिलियत को खुशकिस्मती का नाम देते हैं। वो कहते हैं, 'मैं खुद को खुशकिस्मत मानता हूं कि मुझे इतने मौके मिले, लेकिन मैं व्यापारिक फ़िल्मों से अभी संतुष्ट नहीं हूँ।'

2008 में आई 'अ वेडनेसडे' ने नसीर की कमाल की अदाकारी का एक और नजराना पेश किया तो 'इश्किया', 'राजनीति', 'सात खून माफ' और 'डर्टी पिक्चर' जैसी फ़िल्मों के जरिए नसीरुद्दीन ने बार-बार ये साबित किया कि एक सच्चे कलाकार को उम्र बांध नहीं सकती। हाल ही में रिलीज हुई फ़िल्म 'मैक्सिमम' में भी नसीर की जोरदार एक्टिंग ने दर्शकों का खूब मनोरंजन किया है।

आज के नसीरुद्दीन शाह की बात करें तो शायद ही ऐसा कोई रोल है जो उनपर फिट नहीं बैठे। आखिर वो एक्टर ही ऐसे हैं कि हर रोल के मुताबिक खुद को ढाल लेते हैं। लेकिन एक समय था जब नसीर को दो रोल करने की इच्छा थी जो उस समय उन्हें नहीं मिले। लेकिन बाद 'मिर्जा गालिब', दूरदर्शन धारावाहिक में उन्हें दो रोल मिले जिसमें उन्होंने ग़ालिब का वास्तविक चित्र उभारने की कोशिश की।

लेकिन आप जानकर हैरान रह जाएंगे कि गालिब बनने की नसीर की तमन्ना उनके दिल में एक अधूरे ख्वाब की तरह अटकी हुई थी। 1988 में सीरियल बनाने से सालों पहले गुलजार साहब गालिब पर एक फ़िल्म बनाना चाहते थे और उस फ़िल्म में गालिब के तौर पर उनकी दिली इच्छा संजीव कुमार को लेने की थी।

नसीर साहब ने इस बारे में बताते हुए कहा, 'मैंने गुलजार भाई को चिठ्ठी लिखी और अपनी फोटोग्राफ्स भेजी, मैंने लिखा कि ये क्या कर रहे हैं, इस फ़िल्म में आपको मुझे लेना चाहिए।' लेकिन संजीव कुमार को दिल का दौरा पड़ गया था और सेहत उनका साथ नहीं दे रही थी। फिर उसके बाद गुलजार साहब के दिल में उस रोल के लिए अमिताभ के नाम का खयाल आया। लेकिन वहां भी बात नहीं बनी और आखिरकार गालिब पर फ़िल्म बनाने का प्लान ही ठंडे बस्ते में पड़ गया। शायद उस वक्त गुलजार को भी नहीं मालूम होगा कि इस किरदार पर तो तकदीर ने किसी और का नाम लिख दिया है। कई साल बाद गुलजार साहब ने एक दिन नसीर को फोन लगाया। नसीर ने बताया, 'एक दिन मुझे गुलजार भाई का फोन आया कि सीरियल में काम करोगे। मैंने पूछा कौन सा सीरियल तो उन्होंने बताया गालिब पर है। मैंने बिना कुछ सोचे फौरन हां कह दिया।'

साल 1982 में 'गांधी' के रिलीज होने के अट्ठारह साल बाद कमल हासन ने 'हे राम' बनाई, जिसने नसीर साहब की गांधी बनने की तमन्ना को भी पूरा कर दिया। सधी हुई अदाकरी और बेजोड़ अंदाज से उन्होंने ना केवल गांधी के किरदार में जान डाल दी।

बेजोड़ एक्टिंग और गजब की क्षमता से हर तरह के किरदार निभाने वाले नसीर ने अपनी छाप नकारात्मक भूमिकाओं में भी छोड़ी। समानांतर सिनेमा का ये हीरो कमर्शियल फ़िल्मों में एक ख़तरनाक विलेन के तौर पर भी हमेशा याद किया जाता रहेगा।

हिन्दी सिनेमा में विलेन का ये नया चेहरा था, खूंखार और अजीबोगरीब शक्ल वाला कोई गुंडा नहीं बल्कि सोफेस्टिकेटेड इंसान जिसके दिमाग में सिर्फ जहर ही जहर था। विलेन का ये किरदार जितना संजीदा था उससे भी ज्यादा संजीदगी से उसे निभाया था नसीरुद्दीन शाह ने। वैसे खलनायक के तौर पर उनकी एक दो फ़िल्में नहीं थीं। 'मोहरा' में उन्होंने दिखाया विलेन का वो चेहरा जो किसी के भी दिल में खौफ पैदा कर सकता है। अंधा होने का नाटक करने वाला एक शिकारी, लेकिन ये नसीर की असली पहचान नहीं थी।

नसीर की असली पहचान समानांतर सिनेमा था। सिनेमा की वो धारा जिसमें एक स्टार के लिए कम और एक्टर के लिए गुंजाइश ज्यादा होती है। और ये बात किसी से छुपी नहीं कि नसीर एक एक्टर पहले और स्टार बाद में हैं। समानांतर सिनेमा के इस सितारे ने स्मिता पाटिल, शबाना आजमी, अमरीश पुरी और ओम पुरी जैसे माहिर कलाकारों के साथ मिलकर आर्ट फ़िल्मों को एक नई पहचान दी। 'निशान्त' जैसी सेंसेटिव फ़िल्म से अभिनय का सफर शुरू करने वाले नसीर ने 'आक्रोश', 'स्पर्श', 'मिर्च मसाला', 'भवनी भवाई', 'अर्धसत्य', 'मंडी' और 'चक्र' जैसी फ़िल्मों में अभिनय की नई मिसाल पेश कर दी।
डरपोक अभिनेता की फिल्मे
२०१६  
जीवन  हठी 
तेरा  सुररूर  
२०१५ चार्ली  के  चक्कर  में  
वेलकम  बैक 
डर्टी  पॉलिटिक्स   
२०१४ फाइंडिंग  फन्नी 
डेढ़  इश्किया 
२०१३

जॉन  डे

ज़िंदा  भाग 

सिद्धार्थ

२०११ 
देओल

गर्ल  इन  येलो  बूट्स 

 डर्टी  पिक्चर 

ज़िन्दगी  न  मिलेगी  दोबारा 

७ खून माफ़  
२०१०  अल्लाह  के  बन्दे 
राजनीति  
इश्किया  
पीपली  लाइव 
२००९  फ़िराक 
बारह  आना  
२००८ दस  कहानियां  
जाने तू या जाने ना 
एक बुधवार! 
बॉम्बे से बैंकॉक 
अमल 
२००७ जाने तू या जाने ना 
शूट ऑन साइट 
हनीमून ट्रैवल्स प्राइवेट लिमिटेड 
२००६ कृश 
शून्य 
वैली ऑफ फ्लौवर्स 
एक धुन बनारस की 
मिक्सड डबल्स 
ओमकारा 
2005 पहेली 
इकबाल 
होम डिलीवरी 
बींग साइरस 
मैं मेरी पत्नी और वो 
परज़ानिया 
द ग्रेट न्यू वण्डरफुल 
2004 असंभव 
मैं हूँ ना 
2003 तीन दीवारें 
मकबूल 
द लीग ऑफ एक्सट्राऑर्डिनरी जेंटलमैन 
2002 एनकाउन्टर 
2001 कसम 
मोक्ष 
मानसून वैडिंग 
मुझे मेरी बीवी से बचाओ 
गुरु महागुरु 
2000 तूने मेरा दिल ले लिया 
हे राम 
गज गामिनी 
1999 सरफ़रोश 
भोपाल एक्सप्रेस 
1998 चाइना गेट 
दंड नायक 
धूँढते रह जाओगे 
सर उठा के जियो 
बॉम्बे बॉयेज़ 
सच अ लौंग जर्नी 
1997 अग्निचक्र 
दावा 
लहू के दो रंग 
प्राइवेट डिटेक्टिव 
1996 चाहत 
राजकुमार 
हिम्मत 
१९९५ टक्कर 
नाजायज़ 
मिस्टर अहमद 
१९९४ द्रोह काल 
पोंथन मादा 
त्रियाचरित्र 
मोहरा 
१९९३ लुटेरे 
सर 
कभी हाँ कभी ना 
हस्ती 
बेदर्दी 
गेम 
१९९२ विश्वात्मा 
चमत्कार 
पनाह देवा 
डाकू और पुलिस 
इलेक्ट्रिक मून 
तहलका 
टाइम मशीन 
१९९१ लक्ष्मण रेखा 
शिकारी 
एक घर 
माने 
१९९० पुलिस पब्लिक 
चोर पे मोर 
१९८९ खोज 
त्रिदेव 
१९८८ हीरो हीरालाल 
मालामाल 
पेस्तॉन जी 
रिहाई 
द पर्फेक्ट मर्डर 
ज़ुल्म को जला दूँगा 
लिबास 
मिर्ज़ा ग़ालिब 
१९८७ जलवा 
इजाज़त महेन्द्र 
ये वो मंज़िल तो नहीं 
१९८६ जेनेसिस 
शर्त 
एक पल 
मुसाफ़िर 
कर्मा 
१९८५ गुलामी 
मिसाल 
मिर्च मसाला 
त्रिकाल 
अघात 
अनंतयात्रा 
खामोश 
१९८४ मान मर्यादा 
लोरी 
होली 
मोहन जोशी हाज़िर हो 
कंधार 
पार 
पार्टी 
१९८३ जाने भी दो यारों 
मासूम 
हादसा 
मंडी 
अर्द्ध सत्य 
कथा 
वो सात दिन 
१९८२ बाज़ार 
दिल आखिर दिल है 
स्वामी दादा 
अधरशिला 
सितम 
तहलका 
१९८१ चक्र 
उमराव जान 
तजुर्बा 
अधरशिला 
सितम 
तहलका 
१९८१ चक्र 
उमराव जान 
तजुर्बा 
बेज़ुबान 
सज़ाये मौत 
१९८० आक्रोश 
अलबर्ट पिन्टो को गुस्सा क्यों आता है अलबर्ट 
हम पाँच सूरज 
स्पर्श 
भवनी भवाई 
१९७९ सुनयन 
शायद 
१९७८ जुनून 
१९७७ भूमिका 
गोधूलि 
१९७६ मंथन 
1975 निशांत
१९८४ मान मर्यादा 
लोरी 
होली 
मोहन जोशी हाज़िर हो 
कंधार 
पार 
पार्टी 
१९८३ जाने भी दो यारों 
मासूम 
हादसा 
मंडी 
अर्द्ध सत्य 
कथा 
वो सात दिन 
१९८२ बाज़ार 
दिल आखिर दिल है 
स्वामी दादा 
अधरशिला 
सितम 
तहलका 
१९८१ चक्र 
उमराव जान 
तजुर्बा 
बेज़ुबान 
सज़ाये मौत 
१९८० आक्रोश 
अलबर्ट पिन्टो को गुस्सा क्यों आता है अलबर्ट 
हम पाँच सूरज 
स्पर्श 
भवनी भवाई 
१९७९ सुनयन 
शायद 
१९७८ जुनून 
१९७७ भूमिका 
गोधूलि 
१९७६ मंथन 
1975 निशांत

जुबली कुमार यानी राजिंद्र कुमार

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महान अभिनेता, निर्माता निर्देशक राजेंद्र कुमार की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रधांजलि
🎂जन्म की तारीख और समय: 20 जुलाई 1929, सियालकोट, पाकिस्तान
⚰️मृत्यु की जगह और तारीख: 12 जुलाई 1999, मुम्बई
पत्नी: शुक्ला कुमार (विवा. ?–1999)
नातिन या पोतियां: साची कुमारसिया कुमार
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राजेंद्र कुमार एक फ़िल्म अभिनेता थे। राजेन्द्र कुमार 1960 और 1970 के दशक में फ़िल्मों में सक्रिय थे। राजेंद्र कुमार ने फ़िल्मों में अभिनय करने के अलावा कई फ़िल्मों का निर्माण और निर्देशन भी किया था। हिन्दी फ़िल्मों में अपने सफल अभिनय और बेमिसाल अदाकारी की वजह से राजेन्द्र कुमार ने जो स्थान बनाया है वहां तक पहुंचना हर अभिनेता का सपना होता है। राजेन्द्र
कुमार की हर फ़िल्म इतनी हिट होती थी कि वह कई सालों तक बेहतरीन बिजनेस किया करती थी और यही वजह थी कि लोग उन्हें ‘जुबली कुमार’ के नाम से पुकारते थे। अपने रोमांटिक व्यक्तित्व की उन्होंने सिनेमा जगत में ऐसी छटा बिखेरी की उनकी फ़िल्में एक यादगार बन गईं। फ़िल्म 'आरजू' हो या 'आई मिलन की बेला'हर फ़िल्म में राजेन्द्र कुमार का एक अलग ही स्वरूप दर्शकों ने देखा।

पश्चिम पंजाब के सियालकोट में 20 जुलाई , 1929 को जन्मे राजेन्द्र कुमार बचपन से ही अभिनेता बनने की चाह रखते थे। एक मध्यम वर्गीय परिवार से होने के बावजूद उन्होंने उम्मीदों का दामन नहीं छोड़ा। मुंबई में अपनी किस्मत आजमाने के लिए उन्होंने पिता द्वारा दी गई घड़ी को बेचा था पर मुंबई आकर अपनी किस्मत बदलने का हौसला उन्होंने किसी से नहीं लिया था।राजेन्द्र कुमार सुंदर होने के साथ साथ मानसिक रुप से भी बहुत ही दृढ़ अभिनेता थे। 21 साल की उम्र में ही उन्हें फ़िल्मों में काम करने का पहला मौका मिला। एक अभिनेता के तौर पर पहली बार उन्हें दिलीप कुमार अभिनीत फ़िल्म "जोगन" में एक छोटा-सा किरदार निभाने को मिला था। यहीं से वह लगातार सफलता प्राप्त करते गए। पहली बार फ़िल्म ‘जोगन’ में उन्होंने अभिनय किया और उसके बाद अपने हर रोल में वह खुद ब खुद फिट होते चले गए। इसके बाद ‘गूंज उठी शहनाई’ में पहली बार वह एक अभिनेता के तौर पर दिखे। वर्ष 1957 में प्रदर्शित महबूब खान की फ़िल्म ‘ मदर इंडिया’ में राजेंद्र कुमार ने जो अभिनय किया उसे देख आज भी लोग प्रफुल्लित हो उठते हैं। मदर इंडिया के बाद राजेन्द्र कुमार ने‘धूल का फूल’, ‘मेरे महबूब’, ‘आई मिलन की बेला’, ’संगम’, ‘आरजू’ , ‘सूरज’ आदि जैसे सफल फ़िल्मों में काम किया।

राजेन्द्र कुमार बचपन से ही अभिनेता बनने का सपना देखा करते थे। अपने इसी सपने को साकार करने के लिये पचास के दशक में वह मुंबई आ गये। मुंबई पहुंचने पर उनकी मुलाकात सेठी नाम के एक व्यक्ति से हुयी जिन्होंने उनका परिचय सुनील दत्त से कराया। जो उन दिनों स्वयं अभिनेता बनने के लिए संघर्ष कर रहे थे। इस बीच राजेन्द्र कुमार की मुलाकात जाने माने गीतकार राजेन्द्र कृष्ण से हुई जिनकी मदद से वह 150 रपए मासिक वेतन पर निर्माता, निर्देशक एच.एस. रवेल के सहायक निर्देशक बन
गए। बतौर सहायक निर्देशक राजेन्द्र कुमार ने रवेल के साथ प्रेमनाथ और मधुबाला अभिनीत 'साकी' तथा प्रेमनाथ और सुरैया अभिनीत 'शोखियां' के लिए काम किया। वर्ष 1950 में प्रदर्शित फ़िल्म 'जोगन' बतौर अभिनेता राजेन्द्र कुमार के सिने कैरियर की पहली फ़िल्म साबित हुयी। इस फ़िल्म में उन्हें दिलीप कुमार के साथ अभिनय करने का मौका मिला। इसके बावजूद राजेन्द्र कुमार दर्शकों के बीच अपनी पहचान बनाने में कामयाब रहे। 

दर्शकों के मध्य राजेन्द्र कुमार का स्थान महबूब ख़ान की फ़िल्म मदर इंडिया (1957) से बना। फ़िल्म मदर इंडिया में राजेन्द्र कुमार ने नरगिस के बेटे का रोल किया था। मदर इंडिया के बाद राजेन्द्र कुमार ने धूल का फूल (1959), मेरे महबूब (1963), आई मिलन की बेला (1964), संगम (1964), आरजू (1965), सूरज (1966) आदि जैसे सफल फ़िल्मों में काम किया।

यद्यपि राजेन्द्र कुमार 1960 के दशक में भारतीय रजत पट पर छाये रहे,इनकी अनेक फ़िल्मों ने लगातार रजत
जयंती (सिल्वर जुबली) की इसलिए उन्हें जुबली कुमार कहा जाने लगा। (1970 का दशक उनके लिये प्रतिकूल रहा क्योंकि उस दशक में राजेन्द्र कुमार की गंवार
(1970), तांगेवाला (1972), ललकार (1972), गाँव हमारा शहर तुम्हारा (1972), आन बान (1972) आदि फ़िल्में बॉक्स आफिस पर पिट गईं और उनकी मांग घटने लग गई। सन् 1970 से 1977 तक का समय उनके लिये अत्यंत दुष्कर रहा। सन् 1978 में बनी फ़िल्म साजन बिना सुहागन, जिसमें उनके साथ नूतन ने काम किया था, ने फिर से एक बार राजेन्द्र कुमार का समय पलट दिया और वे फिर से दर्शकों के चहेते बन गये। राज कपूर ने अपनी फ़िल्में संगम (1964) और मेरा नाम जोकर (1970) में बतौर सहायक हीरो के उन्हें रोल दिया था। राज कपूर के साथ उन्होंने फ़िल्म दो जासूस (1975) में भी काम किया और उन्हें दर्शकों की सराहना मिली। उनके दौर की फ़िल्मों के शौकीन लोगों के लिए राजेन्द्र कुमार भी उतने ही बड़े ट्रैजेडी किंग थे, जितने बड़े ट्रैजेडी किंग दिलीप कुमार को माना जाता है।

भारतीय फ़िल्म इतिहास में सत्तर के दशक में राजेन्द्र कुमार सबसे सफल अभिनेता साबित हुए। गायक मोहम्मद रफ़ी राजेन्द्र कुमार की पर्दे पर आवाज़ बन गये थे। यह एक ऐसा वक्त था जब एक साथ उनकी छः से ज्यादा फ़िल्में सिल्वर जुबली सप्ताह की सफलता मना
रही थीं। यह एक ऐसी सफलता थी जिसने उन्हें हिंदी फ़िल्मों का 'जुबली कुमार' बना दिया। फ़िल्म 'गूंज उठी शहनाई' के बाद 1959 में यश चोपड़ा निर्देशित 'धूल का फूल' भी बहुत पसंद की गयी। यह यश चोपड़ा के निर्देशन पारी की शुरुआत थी। 1963 में 'मेरे महबूब' के बाद राज कपूर द्वारा निर्देशित और अभिनीत फ़िल्म 'संगम' में भी राजेन्द्र कुमार के अभिनय को पसंद किया गया। इस फ़िल्म के लिए उन्हें फ़िल्म फेयर अवार्ड के लिए नामांकित किया गया। इसके बाद फ़िल्म 'आरजू', 'सूरज', 'गंवार' जैसी फ़िल्म भी उनके कैरियर में अहम् भूमिका निभाई। 

1970 के शुरूआती दशक में आई फ़िल्मों ने अच्छा व्यवसाय नहीं किया। यह वह समय था जब हिंदी फ़िल्मों में राजेश खन्ना का आगमन हुआ था। राजेन्द्र कुमार के कैरियर का यह कठिन समय था जिसमें 'गंवार' (1970), 'तांगेवाला' (1972), 'गांव हमारा शहर तुम्हारा' (1972), 'आन बान' (1972) आदि फ़िल्में बॉक्स ऑफिस पर असफल हो गयी। इस असफल और मुश्किल भरे वक्त को एक बार राजेन्द्र कुमार ने इंटरव्यू में स्वीकार किया था। यह मुश्किल भरा समय भी बीत गया था। 1978 में उनकी फ़िल्म 'साजन बिना सुहागन' ने बड़ी सफलता हासिल की। इस फ़िल्म में उनकी नायिका नूतन थी। यह फ़िल्म बहुत ही सफल रही। इसके बाद राजेन्द्र कुमार ने मुख्य किरदार के साथ ही चरित्र किरदार भी निभाने लगे। उन्होंने कुछ पंजाबी फ़िल्मों में भी काम किया,जिसमें 'तेरी मेरी एक ज़िंदगी' काफ़ी लोकप्रिय फ़िल्म है। आखिरी बार दीपा मेहता की फ़िल्म 'अर्थ' (1998) में राजेंद्र कुमार नजर आए थे। 

राजेन्द्र कुमार और सुनील दत्त में काफ़ी गहरी दोस्ती थी। इसी दोस्ती को निभाते हुए और अपने बेटे कुमार गौरव के कैरियर को संवारने के लिए उन्होंने सन 1987 में फ़िल्म 'नाम' का निर्माण किया। फ़िल्म बहुत ही सफल रही लेकिन इस फ़िल्म में संजय दत्त के कैरियर को फायदा मिला। राजेन्द्र कुमार के बारे में एक बार सुनील दत्त जी ने इंटरव्यू में कहा कि आज तक राजेन्द्र कुमार को भले ही किसी फ़िल्म के लिए पुरस्कार नहीं मिला है लेकिन वह एक मानवतावादी व्यक्ति हैं। उन दिनों जब संजय दत्त को गिरफ्तार किया गया था और प्रतिदिन हमारे घर की तलाशी होती थी। तब राजेन्द्र कुमार हमारे घर पर आकर रहते थे और इस बात की सांत्वना देते थे कि यह सिर्फ जांच का हिस्सा है। उनको दुनिया की अच्छी समझदारी थी।अपने फ़िल्म स्टार्स के साथ उदारता से पेश आते थे।अपनी इसी विशेष दोस्ती को रिश्ते में बदलते हुए उन्होंने कुमार गौरव का विवाह सुनील दत्त की बेटी नम्रता के साथ किया था। 

बतौर निर्माता-निर्देशक उनकी पहली फ़िल्म थी- लव स्टोरी, जो अपने समय की बड़ी हिट मानी जाती है, इसमें उन्होंने अपने सुपुत्र कुमार गौरव को लिया था। साथ ही उन्होंने फूल, जुर्रत, नाम,लवर्स आदि फ़िल्मों का निर्माण भी किया। उन्होंने मानद मजिस्ट्रेट के तौर पर भी अपनी सेवाएं दीं।

राजेंद्र कुमार ने (1950 और (1960 के दशक में कई कामयाब फ़िल्में दी। इनमें धूल का फूल, मेरे महबूब, संगम और आरजू प्रमुख रहीं। राजेंद्र कुमार को फ़िल्मफेयर पुरस्कार के सर्वश्रेष्ठ अभिनेता की श्रेणी में तीन बार नामांकन मिला, हालांकि उन्हें कभी यह पुरस्कार नहीं मिल पाया क्योंकि वह दौर कई महान अभिनेताओं का था, जो कुछ मामलों में उनसे बीस नजर आए। 1969 में उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया गया। हिन्दी फ़िल्म 'क़ानून' और गुजराती फ़िल्म 'मेंहदी रंग लाग्यो' के लिए उन्हें पं. जवाहरलाल नेहरू के कर-कमलों द्वारा
राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

12 जुलाई 1999 को कैंसर के कारण मुम्बई में राजेंद्र कुमार का निधन हो गया। राजेंद्र कुमार बहुत ही अनुशासित और आरोग्य दिनचर्या के लिए जाने जाते हैं। उनसे जुड़े लोगों का कहना है कि उन्होंने कभी भी जीवन में दवाइयां नहीं लीं।

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भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...