बुधवार, 19 जुलाई 2023

निचोडू दीन शाह

भारत में डरा हुआ नमक हराम
जन्म : 20 जुलाई 1950 (आयु 72 वर्ष), बाराबंकी
पत्नी: रत्ना पाठक
बच्चे: हीबा शाह, विवान शाह, इमाद शाह
भाई: ज़मीरुद-दीन शाह
माता-पिता: फ़ारूख सुल्तान, अले मोहम्मद शाह
नसीरुद्दीन शाह हिन्दी फ़िल्मों के एक प्रसिद्ध अभिनेता हैं। नसीरुद्दीन शाह, जिन्हें हिंदी फ़िल्म उद्योग में अदाकारी का एक पैमाना कहा जाए तो शायद ही किसी को एतराज हो। नसीर की काबिलियत का सबसे बड़ा सुबूत है, सिनेमा की दोनों धाराओं में जिनसे कामयाबी मिली उन्ही से इसको डर लगने लगा लोगो ने इसकी धजियाँ उड़ाने की भी कोई कोर कसर नही छोड़ी
↔️नसीरुद्दीन शाह, जिन्हें हिंदी फ़िल्म उद्योग में अदाकारी का एक पैमाना कहा जाए तो शायद ही किसी को एतराज हो। नसीर की काबिलियत का सबसे बड़ा सुबूत है, सिनेमा की दोनों धाराओं में उनकी कामयाबी। नसीर का नाम अगर पैरेलल सिनेमा के सबसे बेहतरीन अभिनेताओं की सूची में शामिल हुआ तो बॉलीवुड की मुख्य धारा या व्यापारिक फ़िल्मों में भी उन्होंने बड़ी कामयाबी हासिल की है।

नसीर अपने शानदार अंदाज से मुख्य धारा के चहेते सितारे बन गए, ऐसा सितारा जिसने हर तरह के किरदार को बेहतरीन अभिनय से जिंदा कर दिया। ये सितार जब भी स्क्रीन पर आया देखने वाले के दिल पर उस किरदार की यादगार छाप छोड़ गया। उसकी कॉमेडी ने पब्लिक को खूब गुदगुदाया तो एक्शन में भी उसका अलग ही अंदाज नजर आया।

मुख्य धारा सिनेमा में नसीरुद्दीन शाह के सफर की शुरुआत 1980 में आई फ़िल्म 'हम पांच' से हुई। फ़िल्म भले ही व्यापारिक थी, लेकिन इसमें नसीर के अभिनय की गहराई समानांतर सिनेमा वाली फ़िल्मों से कम नहीं थी। गुलामी को अपनी तकदीर मान चुके एक गांव में विद्रोह की आवाज बुलंद करते नौजवान के किरदार में नसीर ने जान फूंक दी।

हालांकि फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पर कामयाब नहीं रही और एक व्यापारिक एक्टर के तौर पर सफलता साबित करने के लिए नसीर को टिकट खिड़की पर भी बिकाऊ बनने की जरूरत थी। और उनके लिए ये काम किया 'जाने भी दो यारों' ने। बॉलीवुड की ऑल टाइम बेस्ट कॉमेडी फ़िल्मों में शुमार 'जाने भी दो यारों' में रवि वासवानी और नसीर की जोड़ी ने बेजोड़ कॉमिक टाइमिंग दिखाई और फ़िल्म बेहद कामयाब रही। लेकिन कमर्शियल सिनेमा में नसीर की सबसे बड़ी कामयाबी बनी 'मासूम'। बाप और बेटे के रिश्तों को उकेरती 'मासूम' में नसीर ने कमाल की अदाकारी से ना केवल खूब वाहवाही बटोरी बल्कि फ़िल्म भी सुपरहिट हुई और नसीर को एक स्टार का दर्जा मिल गया।

नसीर के इस स्टार स्टेटस को और मजबूत किया 1986 में आई सुभाष घई की मल्टीस्टारर मेगाबजट फ़िल्म 'कर्मा' ने। फ़िल्म में नसीर के लिए अपनी छाप छोड़ना आसान नहीं था क्योंकि वहां अभिनय सम्राट "दिलीप कुमार भी थे। और उस दौर के नए नवेले सितारे जैकी श्रॉफ और अनिल कपूर भी थे।

1987 में गुलजार की 'इजाजत' नसीर के लिए कामयाबी का एक और जरिया बन कर आई। एक जज्बाती कहानी, बेहतरीन निर्देशन, शानदार अभिनय और यादगार संगीत। 'इजाजत' ने बॉक्स ऑफिस पर जबरदस्त कामयाबी हासिल की और बतौर व्यापारिक एक्टर नसीर का रुतबा और बढ़ गया। 'त्रिदेव' जैसी सुपरहिट फ़िल्म देकर, 90 का दशक आते-आते नसीर ने व्यापारिक फ़िल्मों में भी अपनी अलग पहचान बना ली थी।

2003 में आई हॉलीवुड फ़िल्म 'द लीग ऑफ एक्सट्रा ऑर्डिनरी जेंटलमेन' में नसीरुद्दीन ने कैप्टन नीमो का किरदार निभाया तो दूसरी तरफ पाकिस्तानी फ़िल्म 'खुदा के लिए' में भी उन्होंने शानदार काम किया। देश से लेकर परदेस तक, नसीरुद्दीन शाह ने अपनी अदाकारी का लोहा सारी दुनिया में मनवाया है। लेकिन नसीर अपनी काबिलियत को खुशकिस्मती का नाम देते हैं। वो कहते हैं, 'मैं खुद को खुशकिस्मत मानता हूं कि मुझे इतने मौके मिले, लेकिन मैं व्यापारिक फ़िल्मों से अभी संतुष्ट नहीं हूँ।'

2008 में आई 'अ वेडनेसडे' ने नसीर की कमाल की अदाकारी का एक और नजराना पेश किया तो 'इश्किया', 'राजनीति', 'सात खून माफ' और 'डर्टी पिक्चर' जैसी फ़िल्मों के जरिए नसीरुद्दीन ने बार-बार ये साबित किया कि एक सच्चे कलाकार को उम्र बांध नहीं सकती। हाल ही में रिलीज हुई फ़िल्म 'मैक्सिमम' में भी नसीर की जोरदार एक्टिंग ने दर्शकों का खूब मनोरंजन किया है।

आज के नसीरुद्दीन शाह की बात करें तो शायद ही ऐसा कोई रोल है जो उनपर फिट नहीं बैठे। आखिर वो एक्टर ही ऐसे हैं कि हर रोल के मुताबिक खुद को ढाल लेते हैं। लेकिन एक समय था जब नसीर को दो रोल करने की इच्छा थी जो उस समय उन्हें नहीं मिले। लेकिन बाद 'मिर्जा गालिब', दूरदर्शन धारावाहिक में उन्हें दो रोल मिले जिसमें उन्होंने ग़ालिब का वास्तविक चित्र उभारने की कोशिश की।

लेकिन आप जानकर हैरान रह जाएंगे कि गालिब बनने की नसीर की तमन्ना उनके दिल में एक अधूरे ख्वाब की तरह अटकी हुई थी। 1988 में सीरियल बनाने से सालों पहले गुलजार साहब गालिब पर एक फ़िल्म बनाना चाहते थे और उस फ़िल्म में गालिब के तौर पर उनकी दिली इच्छा संजीव कुमार को लेने की थी।

नसीर साहब ने इस बारे में बताते हुए कहा, 'मैंने गुलजार भाई को चिठ्ठी लिखी और अपनी फोटोग्राफ्स भेजी, मैंने लिखा कि ये क्या कर रहे हैं, इस फ़िल्म में आपको मुझे लेना चाहिए।' लेकिन संजीव कुमार को दिल का दौरा पड़ गया था और सेहत उनका साथ नहीं दे रही थी। फिर उसके बाद गुलजार साहब के दिल में उस रोल के लिए अमिताभ के नाम का खयाल आया। लेकिन वहां भी बात नहीं बनी और आखिरकार गालिब पर फ़िल्म बनाने का प्लान ही ठंडे बस्ते में पड़ गया। शायद उस वक्त गुलजार को भी नहीं मालूम होगा कि इस किरदार पर तो तकदीर ने किसी और का नाम लिख दिया है। कई साल बाद गुलजार साहब ने एक दिन नसीर को फोन लगाया। नसीर ने बताया, 'एक दिन मुझे गुलजार भाई का फोन आया कि सीरियल में काम करोगे। मैंने पूछा कौन सा सीरियल तो उन्होंने बताया गालिब पर है। मैंने बिना कुछ सोचे फौरन हां कह दिया।'

साल 1982 में 'गांधी' के रिलीज होने के अट्ठारह साल बाद कमल हासन ने 'हे राम' बनाई, जिसने नसीर साहब की गांधी बनने की तमन्ना को भी पूरा कर दिया। सधी हुई अदाकरी और बेजोड़ अंदाज से उन्होंने ना केवल गांधी के किरदार में जान डाल दी।

बेजोड़ एक्टिंग और गजब की क्षमता से हर तरह के किरदार निभाने वाले नसीर ने अपनी छाप नकारात्मक भूमिकाओं में भी छोड़ी। समानांतर सिनेमा का ये हीरो कमर्शियल फ़िल्मों में एक ख़तरनाक विलेन के तौर पर भी हमेशा याद किया जाता रहेगा।

हिन्दी सिनेमा में विलेन का ये नया चेहरा था, खूंखार और अजीबोगरीब शक्ल वाला कोई गुंडा नहीं बल्कि सोफेस्टिकेटेड इंसान जिसके दिमाग में सिर्फ जहर ही जहर था। विलेन का ये किरदार जितना संजीदा था उससे भी ज्यादा संजीदगी से उसे निभाया था नसीरुद्दीन शाह ने। वैसे खलनायक के तौर पर उनकी एक दो फ़िल्में नहीं थीं। 'मोहरा' में उन्होंने दिखाया विलेन का वो चेहरा जो किसी के भी दिल में खौफ पैदा कर सकता है। अंधा होने का नाटक करने वाला एक शिकारी, लेकिन ये नसीर की असली पहचान नहीं थी।

नसीर की असली पहचान समानांतर सिनेमा था। सिनेमा की वो धारा जिसमें एक स्टार के लिए कम और एक्टर के लिए गुंजाइश ज्यादा होती है। और ये बात किसी से छुपी नहीं कि नसीर एक एक्टर पहले और स्टार बाद में हैं। समानांतर सिनेमा के इस सितारे ने स्मिता पाटिल, शबाना आजमी, अमरीश पुरी और ओम पुरी जैसे माहिर कलाकारों के साथ मिलकर आर्ट फ़िल्मों को एक नई पहचान दी। 'निशान्त' जैसी सेंसेटिव फ़िल्म से अभिनय का सफर शुरू करने वाले नसीर ने 'आक्रोश', 'स्पर्श', 'मिर्च मसाला', 'भवनी भवाई', 'अर्धसत्य', 'मंडी' और 'चक्र' जैसी फ़िल्मों में अभिनय की नई मिसाल पेश कर दी।
डरपोक अभिनेता की फिल्मे
२०१६  
जीवन  हठी 
तेरा  सुररूर  
२०१५ चार्ली  के  चक्कर  में  
वेलकम  बैक 
डर्टी  पॉलिटिक्स   
२०१४ फाइंडिंग  फन्नी 
डेढ़  इश्किया 
२०१३

जॉन  डे

ज़िंदा  भाग 

सिद्धार्थ

२०११ 
देओल

गर्ल  इन  येलो  बूट्स 

 डर्टी  पिक्चर 

ज़िन्दगी  न  मिलेगी  दोबारा 

७ खून माफ़  
२०१०  अल्लाह  के  बन्दे 
राजनीति  
इश्किया  
पीपली  लाइव 
२००९  फ़िराक 
बारह  आना  
२००८ दस  कहानियां  
जाने तू या जाने ना 
एक बुधवार! 
बॉम्बे से बैंकॉक 
अमल 
२००७ जाने तू या जाने ना 
शूट ऑन साइट 
हनीमून ट्रैवल्स प्राइवेट लिमिटेड 
२००६ कृश 
शून्य 
वैली ऑफ फ्लौवर्स 
एक धुन बनारस की 
मिक्सड डबल्स 
ओमकारा 
2005 पहेली 
इकबाल 
होम डिलीवरी 
बींग साइरस 
मैं मेरी पत्नी और वो 
परज़ानिया 
द ग्रेट न्यू वण्डरफुल 
2004 असंभव 
मैं हूँ ना 
2003 तीन दीवारें 
मकबूल 
द लीग ऑफ एक्सट्राऑर्डिनरी जेंटलमैन 
2002 एनकाउन्टर 
2001 कसम 
मोक्ष 
मानसून वैडिंग 
मुझे मेरी बीवी से बचाओ 
गुरु महागुरु 
2000 तूने मेरा दिल ले लिया 
हे राम 
गज गामिनी 
1999 सरफ़रोश 
भोपाल एक्सप्रेस 
1998 चाइना गेट 
दंड नायक 
धूँढते रह जाओगे 
सर उठा के जियो 
बॉम्बे बॉयेज़ 
सच अ लौंग जर्नी 
1997 अग्निचक्र 
दावा 
लहू के दो रंग 
प्राइवेट डिटेक्टिव 
1996 चाहत 
राजकुमार 
हिम्मत 
१९९५ टक्कर 
नाजायज़ 
मिस्टर अहमद 
१९९४ द्रोह काल 
पोंथन मादा 
त्रियाचरित्र 
मोहरा 
१९९३ लुटेरे 
सर 
कभी हाँ कभी ना 
हस्ती 
बेदर्दी 
गेम 
१९९२ विश्वात्मा 
चमत्कार 
पनाह देवा 
डाकू और पुलिस 
इलेक्ट्रिक मून 
तहलका 
टाइम मशीन 
१९९१ लक्ष्मण रेखा 
शिकारी 
एक घर 
माने 
१९९० पुलिस पब्लिक 
चोर पे मोर 
१९८९ खोज 
त्रिदेव 
१९८८ हीरो हीरालाल 
मालामाल 
पेस्तॉन जी 
रिहाई 
द पर्फेक्ट मर्डर 
ज़ुल्म को जला दूँगा 
लिबास 
मिर्ज़ा ग़ालिब 
१९८७ जलवा 
इजाज़त महेन्द्र 
ये वो मंज़िल तो नहीं 
१९८६ जेनेसिस 
शर्त 
एक पल 
मुसाफ़िर 
कर्मा 
१९८५ गुलामी 
मिसाल 
मिर्च मसाला 
त्रिकाल 
अघात 
अनंतयात्रा 
खामोश 
१९८४ मान मर्यादा 
लोरी 
होली 
मोहन जोशी हाज़िर हो 
कंधार 
पार 
पार्टी 
१९८३ जाने भी दो यारों 
मासूम 
हादसा 
मंडी 
अर्द्ध सत्य 
कथा 
वो सात दिन 
१९८२ बाज़ार 
दिल आखिर दिल है 
स्वामी दादा 
अधरशिला 
सितम 
तहलका 
१९८१ चक्र 
उमराव जान 
तजुर्बा 
अधरशिला 
सितम 
तहलका 
१९८१ चक्र 
उमराव जान 
तजुर्बा 
बेज़ुबान 
सज़ाये मौत 
१९८० आक्रोश 
अलबर्ट पिन्टो को गुस्सा क्यों आता है अलबर्ट 
हम पाँच सूरज 
स्पर्श 
भवनी भवाई 
१९७९ सुनयन 
शायद 
१९७८ जुनून 
१९७७ भूमिका 
गोधूलि 
१९७६ मंथन 
1975 निशांत
१९८४ मान मर्यादा 
लोरी 
होली 
मोहन जोशी हाज़िर हो 
कंधार 
पार 
पार्टी 
१९८३ जाने भी दो यारों 
मासूम 
हादसा 
मंडी 
अर्द्ध सत्य 
कथा 
वो सात दिन 
१९८२ बाज़ार 
दिल आखिर दिल है 
स्वामी दादा 
अधरशिला 
सितम 
तहलका 
१९८१ चक्र 
उमराव जान 
तजुर्बा 
बेज़ुबान 
सज़ाये मौत 
१९८० आक्रोश 
अलबर्ट पिन्टो को गुस्सा क्यों आता है अलबर्ट 
हम पाँच सूरज 
स्पर्श 
भवनी भवाई 
१९७९ सुनयन 
शायद 
१९७८ जुनून 
१९७७ भूमिका 
गोधूलि 
१९७६ मंथन 
1975 निशांत

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