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मंगलवार, 16 अप्रैल 2024

जी एस नेपाली

प्रसिद्ध गीतकार जी एस नेपाली उर्फ गोपाल सिंह नेपाली के जन्मदिन पर हार्दिक श्रधांजलि
🎂जन्म 11 अगस्त 1911 ई॰ को बिहार के पश्चिमी चंपारण के बेयियास में हुआ था।

⚰️17 अप्रैल 1963 ई॰ को इनका निधन बिहार के भागलपुर रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म संख्या पांच पर हो गया था।

कलम की स्वाधीनता के लिए आजीवन संघर्षरत रहे 'गीतों के राजकुमार' गोपाल सिंह नेपाली लहरों की धारा के विपरीत चलकर हिन्दी साहित्य, पत्रकारिता और फिल्म उद्योग में ऊंचा स्थान हासिल करने वाले छायावादोत्तर काल के विशिष्ट कवि और गीतकार थे।

बिहार के पश्चिम चम्पारण जिले के बेतिया में 11 अगस्त 1911 को जन्मे गोपाल सिंह नेपाली की काव्य प्रतिभा बचपन में ही दिखाई देने लगी थी। एक बार एक दुकानदार ने बच्चा समझकर उन्हें पुराना कार्बन दे दिया जिस पर उन्होंने वह कार्बन लौटाते हुए दुकानदार से कहा- 'इसके लिए माफ कीजिएगा गोपाल पर, सड़ियल दिया है आपने कार्बन निकालकर'। उनकी इस कविता को सुनकर दुकानदार काफी शर्मिंदा हुआ और उसने उन्हें नया कार्बन निकालकर दे दिया।

साहित्य की लगभग सभी विधाओं में पारंगत नेपाली की पहली कविता 'भारत गगन के जगमग सितारे' 1930 में रामवृक्ष बेनीपुरी द्वारा संपादित बाल पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। पत्रकार के रूप में उन्होंने कम से कम 4 हिन्दी पत्रिकाओं- रतलाम टाइम्स, चित्रपट, सुधा और योगी का संपादन किया।

युवावस्था में नेपालीजी के गीतों की लोकप्रियता से प्रभावित होकर उन्हें आदर के साथ कवि सम्मेलनों में बुलाया जाने लगा। उस दौरान एक कवि सम्मेलन में राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' उनके एक गीत को सुनकर गद्गनद् हो गए। वह गीत था-

सुनहरी सुबह नेपाल की, ढलती शाम बंगाल की
कर दे फीका रंग चुनरी का, दोपहरी नैनीताल की
क्या दरस-परस की बात यहां, जहां पत्थर में भगवान है
यह मेरा हिन्दुस्तान है, यह मेरा हिन्दुस्तान है...

नेपालीजी के गीतों की उस दौर में धूम मची हुई थी लेकिन उनकी माली हालत खराब थी। वे चाहते तो नेपाल में उनके लिए सम्मानजनक व्यवस्था हो सकती थी, क्योंकि उनकी पत्नी नेपाल के राजपुरोहित के परिवार से ताल्लुक रखती थीं लेकिन उन्होंने बेतिया में ही रहने का निश्चय किया।

वर्ष 1944 में मुंबई में उनकी मुलाकात फिल्मीस्तान के मालिक सेठ तुलाराम जालान से हुई जिन्होंने नेपाली को 200 रुपए प्रतिमाह पर गीतकार के रूप में 4 साल के लिए अनुबंधित कर लिया। फिल्मीस्तान के बैनर तले बनी ऐतिहासिक फिल्म 'मजदूर' के लिए नेपाली ने सर्वप्रथम गीत लिखे।

फिल्मों में बतौर गीतकार नेपालीजी 1944 से 1962 तक गीत लेखन करते रहे। इस दौरान उन्होंने 60 से अधिक फिल्मों के लिए लगभग 400 से अधिक गीत लिखे। दिलचस्प बात यह है कि इनमें से अधिकतर गीतों की धुनें भी खुद उन्होंने बनाईं। नेपालीजी ने हिमालय फिल्म्स और नेपाली पिक्चर्स फिल्म कंपनी की स्थापना कर नजराना (1949), सनसनी (1951) और खुशबू (1955) जैसी कुछ फिल्मों का निर्माण भी किया।

नेपालीजी को जीते-जी वह सम्मान नहीं मिल सका जिसके वे हकदार थे। अपनी इस भावना को उन्होंने कविता में इस तरह उतारा था-

अफसोस नहीं हमको जीवन में कुछ कर न सके
झोलियां किसी की भर न सके, संताप किसी का हर न सके
अपने प्रति सच्चा रहने का जीवनभर हमने यत्न किया
देखा-देखी हम जी न सके, देखा-देखी हम मर न सके ।

17 अप्रैल 1963 को अपने जीवन के अंतिम कवि सम्मेलन से कविता पाठ करके लौ टते समय बिहार के भागलपुर रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर 2 पर गोपालसिंह नेपाली का अचानक निधन हो गया।

शुक्रवार, 3 नवंबर 2023

कृष्ण मोहन

कृष्ण मोहन
जन्म 11 अगस्त 1921
लाहौर , पंजाब , ब्रिटिश भारत
मृत 03 नवंबर 1990 (आयु 68 वर्ष)
बम्बई , महाराष्ट्र , भारत
अन्य नामों  मनमोहन कृष्ण
एक लोकप्रिय भारतीय फिल्म अभिनेता और निर्देशक थे, जिन्होंने चार दशकों तक हिंदी फिल्मों में काम किया , ज्यादातर एक चरित्र अभिनेता के रूप में । उन्होंने अपना करियर भौतिकी में प्रोफेसर के रूप में शुरू किया और भौतिकी में मास्टर डिग्री हासिल की। उन्होंने रेडियो शो कैडबरी की फुलवारी , एक गायन प्रतियोगिता की एंकरिंग की। बहुत से लोग नहीं जानते कि मनमोहन कृष्ण ने अपना पहला गाना 'झट खोल दे' अफसर (1950) में गाया था, जो देव आनंद की फिल्म थी, जिसमें एसडी बर्मन का संगीत था ।

वह चोपड़ा बंधुओं के पसंदीदा थे और उन्होंने उनके द्वारा निर्देशित और/या निर्मित फिल्मों में छोटी या बड़ी भूमिकाएँ निभाईं। दीवार , त्रिशूल , दाग , हमराज़ , जोशीला , कानून , साधना , काला पत्थर , धूल का फूल , वक्त और नया दौर इसके कुछ उदाहरण हैं।
उन्होंने चार दशकों तक हिंदी और पंजाबी फिल्मों में काम किया है. उन्होंने 250 से अधिक फिल्मों में काम किया.
मनमोहन कृष्ण बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे. वह बेहतरीन एक्टर होने के साथ ही उम्दा डायरेक्टर, प्रोड्यूसर भी थे. उनके बारें में बहुत कम लोग जानते हैं कि वह बॉलीवुड में बतौर सिंगर अपनी पहचान बनना चाहते थे, लेकिन किस्मत ने उन्हें एक्टर से डायरेक्टर बना दिया।
उन्होंने अपने बॉलीवुड करियर की शुरुआत बतौर एक्टर ‘अंधों की दुनिया’ (1947) से किया था और इस फिल्म के लिए उन्होंने एक गाना भी गाया था. फिल्म में लोगों ने उनकी एक्टिंग और आवाज दोनों की जमकर तारीफें की थी. बतौर डायरेक्टर उनकी डेब्यू फिल्म 1980 में रिलीज हुई फिल्म ‘नूरी’ थी. फिल्म बहुत सफल रही।
मनमोहन कृष्ण की आखिरी फिल्म

आपको जानकार हैरानी होगी कि फिल्म इंडस्ट्री में आने से पहले मनमोहन कृष्ण एक प्रोफेसर थे. उन्हें कॉलेज में बच्चों को पढ़ना पसंद था. उन्होंने फिजिक्स से एमएससी किया था. ये बातें उन्होंने खुद एक इंटरव्यू के दौरान बताया था. कॉलेज में 2 साल तक बच्चों को पढ़ाने के बाद उन्होंने बॉलीवुड की तरफ रुख किया क्योंकि उनकी दिलचस्पी हमेशा सिंगर बनने की रही और वह हमेशा से रेडियो ज्वाइन करने चाहते थे. अपने बॉलीवुड करियर में मनमोहन कृष्ण एक सिंगिग रेडियो शो, ‘कैडबरी की फुलवारी’ की भी एंकरिंग की. इसी के साथ इस महान दिग्गज कलाकार को आखिरी बार पर्दे पर साल 1990 में रिलीज हुई फिल्म हलात (Halaat) में देखा गया. इसी साल इस महान दिग्गज एक्टर ने 03 नवंबर 1990को 68 वर्ष की आयु में मुंबई के लोकमान्य तिलक अस्पताल में इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया.
व्यवसाय अभिनेता, निर्देशक

बुधवार, 27 सितंबर 2023

पी जयराज

पूरा नाम पैदी जयराज
प्रसिद्ध नाम पी जयराज
🎂जन्म 28 सितम्बर, 1909
जन्म भूमि करीमनगर, आंध्र प्रदेश
⚰️मृत्यु 11 अगस्त, 2000
मृत्यु स्थान मुम्बई, महाराष्ट्र
संतान पाँच (दो पुत्र दिलीप, जयतिलक और तीन पुत्रियाँ जयश्री, दीपा एवं गीता)
कर्म भूमि मुम्बई
कर्म-क्षेत्र अभिनेता, निर्माता-निर्देशक
मुख्य फ़िल्में 'हमारी बात', 'नई कहानी', 'शिकारी', 'रायफल गर्ल', 'भाभी' आदि।
शिक्षा स्नातक
विद्यालय वुड नेशनल कॉलेज, हैदराबाद
पुरस्कार-उपाधि दादा साहब फाल्के पुरस्कार
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी अपने फ़िल्मी कैरियर में बतौर अभिनेता तो लगभग 300 फ़िल्मों में अभिनय किया जिनमें से 160 फ़िल्मों में नायक की भूमिकाएँ निभाई अपने फ़िल्मी कैरियर में बतौर अभिनेता तो लगभग 300 फ़िल्मों में अभिनय किया जिनमें से 160 फ़िल्मों में नायक की भूमिकाएँ निभाईं।
पी. जयराज (पूरा नाम- 'पैदी जयराज', अंग्रेज़ी: Paidi Jairaj, जन्म: 28 सितम्बर, 1909; मृत्यु: 11 अगस्त, 2000) हिन्दी फ़िल्म जगत् के एकमात्र ऐसे अभिनेता थे, जिन्होंने मूक फ़िल्मों के दौर से लेकर वर्तमान दौर तक की अनेक फ़िल्मों में काम किया। हिन्दी सिनेमा के पर्दे पर सर्वाधिक राष्ट्रीय और ऐतिहासिक नायकों को जीवित करने का कीर्तिमान इसी कलाकार के साथ जुड़ा है। नौशाद जैसे महान् संगीतकार को फ़िल्मों में ब्रेक देने का श्रेय भी पी. जयराज को ही जाता है। उनकी ज़िंदगी हिन्दी सिने जगत् के इतिहास के साथ-साथ चलती हुई, एक सिनेमा की कहानी जैसी थी।

जीवन परिचय

जयराज का जन्म 28 सितम्बर, 1909 को निजाम स्टेट के करीमनगर ज़िले में हुआ था। 'पाइदीपाटी जैरुला नाइडू' उनका आन्ध्रीय नाम था। हैदराबाद में पले बड़े हुए जिससे उर्दू भाषा पर पकड़ अच्छी थी, वो काम आयी। उनके पिताजी सरकारी दफ्तर में लेखाजोखा देखा करते थे। उनकी प्रारंम्भिक शिक्षा हैदराबाद के रोमन कैथोलिक स्कूल में हुई। फिर तीन साल के लिए उन्हें 'वुड नेशनल कॉलेज' के बॉडिंग हाउस में पढ़ाया गया जहां से उन्होंने संस्कृत की शिक्षा ली। फिर हैदराबाद के 'निजाम हाईस्कूल' में उर्दू पढी। बी. एस. सी. करने के बाद नेवी में जाना चाह्ते थे किंतु उनके बडे भाई सुन्दरराज इंजीनिय्ररिंग की पढाई के लिए लंदन भेजना चाह्ते थे। उनकी माताजी बड़े भाई को ज्यादा प्यार देतीं थीं और उनकी इच्छा थी इंग्लैंड जाकर पढाई करने की जिसका परिवार ने विरोध किया जिससे नाराज होकर, युवा जयराज, किस्मत आजमाने के लिए सन् 1929 में मुम्बई आ गये। उस समय उनकी उम्र 19 वर्ष थी।

समुन्दर के साथ पहले से बहुत लगाव था सो, डॉक यार्ड में काम करने लगे ! वहाँ उनका एक दोस्त था जिसका नाम "रंग्या" था उसने सहायता की और तब, पोस्टर को रंगने का काम मिला जिससे स्टूडियो पहुंचे। उनकी मजबूत कद काठी ने जल्द ही उन्हें निर्माता की आंखों में चढ़ा दिया। महावीर फोटोप्लेज़ में काम मिला। उस समय चित्रपट मूक थे। कई जगह काम, ऐक्टर के बदले खड़े डबल का मिला, पर बाद में मुख्य भूमिकाएँ भी मिलने लगीं। भाभा वारेरकर उनके आकर्षक और सौष्ठव शरीर को देखकर उनके व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने अपनी पहली फ़िल्म में नायक की भूमिका के लिए चुन लिया। दुर्भाग्य से यह फ़िल्म बीच में ही बंद हो गई क्योंकि वारेरकर का अपने पार्टनर के साथ मनमुटाव हो गया था।

बतौर सहायक निर्देशक
भायखाला स्थित स्टुडियो में निर्देशक नागेन्द्र मजूमदार के पास उन्हें 'सहायक निर्देशक की नौकरी मिल गई। उनके साथ निर्देशन के अलावा संपादन, सिने-छांयाकन आदि का कार्य भी सीखा। दिलीप कुमार की पहली फ़िल्म "प्रतिमा" का निर्देशन जयराज ने किया था।

बतौर निर्देशक
पी. जयराज ने फ़िल्मों के निर्देशन का काम भी किया जिसमें बतौर निर्देशक पहली फ़िल्म थी-'प्रतिभा', जिसकी निर्मात्री देविका रानी थीं।

अभिनय की शुरूआत
फ़िल्मों में बतौर अभिनेता वर्ष 1929 में नागेन्द्र मजूमदार ने ही प्रथम फ़िल्म 'जगमगाती जवानी' में ब्रेक दिया। जिसमें माधव काले नायक थे और जयराज सहायक चूंकि माधव काले को घुड़सवारी और फाइटिंग नहीं आती थी, लिहाजा जयराज ने मास्क पहनकर उनका भी काम किया। जिसके मुख्य कलाकार माधव केले के स्टंट सीन भी उन्होंने ही किए थे। उसके बाद 'यंग इन्डिया पिक्चर्स' ने 35 रुपये प्रतिमाह, 3 वक्त का भोजन और 4 अन्य लोगों के साथ गिरगाम मुम्बई में रहने की सुविधा वाला काम दिया। अब जीवन की गाड़ी चल निकली। 1930 में "रसीली रानी" फ़िल्म बनी। माधुरी उनकी हिरोइन थीं। उसके बाद जयराज 'शारदा फ़िल्म कम्पनी' से जुड़े। 35 रुपये से 75 रुपये मिलने लगे। जेबुनिस्सा हिरोइन थीं जो हिन्दुस्तानी ग्रेटा के नाम से मशहूर थीं और जयराज जी गिल्बर्ट थे हिन्दुस्तान के। (Anthony Hope's की फ़िल्म 'द प्रिज़नर ऑफ़ जेंडा' ही हिन्दी फ़िल्म "रसीली रानी" के रूप में बनी थी) बतौर नायक उनकी पहली फ़िल्म 'रसीली रानी' 1929 में प्रदर्शित हुई माधुरी उनकी नायिका थीं। 'नवजीवन फ़िल्म्स' के बैनर तले बनी नागेन्द्र मजूमदार द्वारा निर्देशित वह फ़िल्म बहुत सफल रही थी। मूक फ़िल्मों के दौर में वह फ़िल्म कई सिनेमाघरों में पांच सप्ताह चली थी जो उन दिनों बहुत बड़ी बात थी। मूक फ़िल्मों में तो जयराज के नाम की धूम मची हूई थी।

बोलती फ़िल्मों का नया दौर
1931 में जब 'आलम आरा' से बोलती फ़िल्मों का दौर शुरू हुआ तो उन्होंने भी बोलती फ़िल्मों के अनुरूप खुद को ढाला। उनकी पहली बोलती फ़िल्म थी 'शिकारी'। 1932 में प्रदर्शित इस फ़िल्म में जयराज ने एक बौद्ध भिक्षुक की भुमिका निभाई थी और सांप, बाघ, शेर जैसे हिंसक जानवरों के साथ लड़ने के दृश्य दिए। बोलती फ़िल्म के साथ संगीत शुरू हुआ। कई कलाकार प्ले बैक भी देने लगे पर 1935 से दूसरे गाते और कलाकार सिर्फ़ होंठ हिलाते जिससे आसानी हो गयी। अब सिनेमा संगीतमय हो गया। हमजोली फ़िल्म में नूरजहाँ और जयराज जी ने काम किया था। राइफल गर्ल, हमारी बात आदि फ़िल्म मिलीं। जयराज की लोकप्रियता देखकर 'बाम्बे टॉकीज' के मालिक हिमांशु राय ने अपनी कंपनी की फ़िल्म 'भाभी' के लिए उन्हें बतौर नायक अनुबंधित किया, जिससे फ़िल्म-जगत् में सनसनी फैल गई। तब 'बाम्बे टॉकीज' बाहर के कलाकारों को अपनी फ़िल्म में काम नहीं देता था। फांज आस्टिन द्वारा निर्देशित वह फ़िल्म 'भाभी' बहुत सफल रही। मुम्बई में उस फ़िल्म ने रजत जयंती मनाई थी तो कलकत्ता में वह 80 सप्ताह चली थी। फिर आयी 'स्वामी' फ़िल्म, जिसमें सितारा देवी थीं। हातिम ताई, तमन्ना, उस समय के सिनेमा थे। जयराज ने मराठी, गुजराती फ़िल्म भी कीं। अपने फ़िल्मी कैरियर में बतौर अभिनेता तो लगभग 300 फ़िल्मों में अभिनय किया जिनमें से 160 फ़िल्मों में नायक की भूमिकाएँ निभाईं। बतौर नायक उनकी अंतिम फ़िल्म थी-खूनी कौन मुजरिम कौन', जो वर्ष 1965 में प्रदर्शित हुई थी। उसके बाद उन्होंने उम्र की मांग के अनुसार चरित्र भूमिकाएँ निभानी शुरु कर दीं। महात्मा गांधी की हत्या पर आधारित अमरीकी फ़िल्म- 'नाईन आवर्स टू रामा', मार्क रोब्सन निर्मित में जी. डी. बिड़ला की भूमिका निभाने का भी अवसर मिला जो आज तक हिन्दुस्तान में प्रदर्शित नहीं हो पायी है। माया फ़िल्म में आई. एस. जौहर के साथ काम किया। यह दोनों अमरीकी फ़िल्में हैं। इन्डो-रशियन फ़िल्म 'परदेसी' में भी काम किया। दो बार दुर्घट्ना ग्रस्त हो जाने के कारण चलने फिरने में तकलीफ होने लगी तो फ़िल्मों से दूरी बनानी शुरु कर दी।

बतौर निर्माता
एक फ़िल्म जयराज जी ने बनाना शुरू किया था जिसमें नर्गिस, भारत भूषण और ख़ुद वे काम कर रहे थे। फ़िल्म का नाम था सागर। उनका बहुत नाम था सिने जगत में और कई सारे निर्माता, निर्देशक, कलाकार उन्हें जन्मदिन की बधाई देने सुबह से उनके घर पहुँचते थे। 1951 में सागर फ़िल्म बनायी, जो लॉर्ड टेनिसन की "इनोच आर्डेन" पर आधारित कथा थी। वह निष्फल हुई क्योंकि जयराज ने अपना खुद का पैसा लगाया था और उन्होंने कुबूल किया था कि व्यवासायिक समझ उनमें नहीं थी।

परिवार
1939 में अपने घनिष्ठ मित्र पृथ्वीराज कपूर के कहने पर उन्होंने सावित्री नाम की युवती से विवाह कर लिया। तब उन्होंने ही सावित्री के कन्यादान की रस्म निभाई थी। 1942 में उनका वेतन 200 रुपये प्रतिमाह से बढ़कर 600 रुपये प्रतिमाह हो गया। उनकी 5 संतान थीं, दो पुत्र, दिलीप राज व जयतिलक और तीन पुत्रियाँ, जयश्री, दीपा एवं गीता। सबसे बड़े दिलीप राज, जो ऐक्टर बने। उनके द्वारा अभिनीत के. ए. अब्बास की फ़िल्म "शहर और सपना" को राष्ट्रपति पुरस्कार मिला था। जयराज का दूसरा पुत्र अमेरिका में रहता है। दूसरी बेटी थीं जयश्री, उनका विवाह राजकपूर की पत्नी कृष्णा के छोटे भाई भूपेन्द्रनाथ के साथ हुआ था। तीसरी बेटी थीं दीपा, फिर थी गीता सबसे छोटी।

मुख्य फ़िल्में
सन् 1938 - रायफल गर्ल
सन् 1939 - भाभी
सन् 1942 - खिलौना
सन् 1942 - मेरा गाँव
सन् 1943 - नई कहानी
सन् 1954 - बादबान
सन् 1954 - मुन्ना
सन् 1956 - अमरसिंह राठौड़
सन् 1956 - हातिमताई
सन् 1957 - परदेसी
सन् 1959 - चार दिल चार राहें
सन् 1962 - रजिया सुल्तान
पुरस्कार
50 के दशक में पी. जयराज को लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड से नवाजा गया। 1982 में उन्हें दादा साहेब फाल्के पुरस्कार भी मिला।

निधन
जयराज का निधन लीलावती अस्पताल, मुम्बई में ⚰️11 अगस्त सन् 2000 को हुआ और हिन्दी सिने संसार का मूक फ़िल्मों से आज तक का मानो एक सेतु ही टूट कर अदृश्य हो गया। 11 मूक चित्रपट और 200 बोलती फ़िल्मों से हमारा मनोरंजन करने वाले एक समर्थ कलाकार ने इस दुनिया से विदा ले ली

गुरुवार, 10 अगस्त 2023

जैकलीन फर्नांडिस

🎂जन्म : 11 अगस्त 1985 मनामा, बहरीन
माता-पिता: एलरॉय फेर्नान्सेज़, किम
भाई: वारेन फ़र्नांडिज़, गेराल्डाइन वॉकर, रयान फ़र्नांडिज़
जैकलिन फ़र्नांडीस श्रीलंकाई मूल की, भारतीय अभिनेत्री व मॉडल है जो हिन्दी फ़िल्मों में कार्यरत है। वे 2006 की मिस श्रीलंका यूनिवर्स रह चुकी है। उन्हें 2010 का सर्वश्रेष्ठ नई अभिनेत्री का आईफ़ा और स्टारडस्ट पुरस्कार फ़िल्म अलादीन के लिए प्रदान किया गया था।
जैकलिन फ़र्नांडीस श्रीलंकाई मूल की, भारतीय अभिनेत्री व मॉडल है जो हिन्दी फ़िल्मों में कार्यरत है। वे 2006 की मिस श्रीलंका यूनिवर्स रह चुकी है। उन्हें 2010 का सर्वश्रेष्ठ नई अभिनेत्री का आईफ़ा और स्टारडस्ट पुरस्कार फ़िल्म अलादीन के लिए प्रदान किया गया था। इन्होंने अपने कैरियर की अलादीन फ़िल्म से 2009 से की थी जबकि इन्होंने कई सुपर हिट फ़िल्मों में भी कार्य किया है जिसमें सलमान ख़ान के साथ किक (2014फ़िल्म) ,रॉय जैसी फ़िल्मों में कार्य किया है। ये डेविड धवन की निर्देशित फ़िल्म जुड़वा 2 में वरुण धवन के साथ भी दिखाई दीं।

📽️२००९ अलादीन जैसमीन 
२०१० जाने कहाँ से आयी है तारा 
२०१० हाउसफ़ुल (2010 फ़िल्म) धन्नो "आपका क्या होगा (धन्नो)" गीत में विशेष उपस्थिति
२०११ मर्डर 2 
२०१२ हाउसफ़ुल २ 
२०१३ रेस 2 ओमिषा 
२०१३ रमैया वस्तावैया अज्ञात "जादू की झप्पी" गीत में विशेष उपस्थिति
२०१४ किक डॉ. शायना मेहरा 
२०१५ रॉय आयशा/टिया दो किरदार
२०१५ बेनगिस्तान रोजन्ना 
२०१५ ब्रदर्स जेनि फ़र्नन्डेस 
२०१५ डेफ़िनेशन अफ़ फ़ियर सराह फोर्द्लिङ हॉलिवुड फिल्म
२०१६ हाउसफ़ुल 3
२०१६ डिशूम इशिका 
२०१६ ए फ़्लाइंग जट्ट कृति 
२०१७ जुड़वा 2 अलीशा 
२०१८ बाग़ी २ स्वयं गीत "एक दो तीन" में विशेष उपस्थिति
2018 रेस 3 जेसिका 
2019 ड्राइव तारा 
2020 मिसेज सीरियल किलर
2021 भूत पुलिस

तापस रेलिया

तापस रेलिया 
गुजरात के सूरत के संगीत रचयिता है
🎂जन्म11 अगस्त 1978 
सूरत , गुजरात, भारत
शैलियां
फ़िल्म स्कोर, पॉप, लोक, नया युग, भारतीय शास्त्रीय, फ़्यूज़न
व्यवसाय
संगीतकार, संगीत निर्माता, गायक, गीतकार
तापस रेलिया का जन्म सूरत , गुजरात में एक गुजराती जोड़े के यहाँ हुआ था जो मूल रूप से सूरत के थे

 *(लेकिन NRI वॉट्सएप ग्रुप के एडमिन मोटा भाई के शहर अहमदाबाद में रहते थे)*

 उन्होंने अपना पूरा बचपन और किशोरावस्था अहमदाबाद में बिताई और सेंट जेवियर्स हाई स्कूल, लोयोला हॉल, अहमदाबाद से उच्च माध्यमिक विद्यालय की पढ़ाई पूरी की । 1996 में वह आगे की शिक्षा और संगीत में अपना करियर बनाने के लिए मुंबई चले गए।उन्होंने पियानो को अपने प्रमुख वाद्ययंत्र के रूप में लेकर पश्चिमी शास्त्रीय संगीत सीखना शुरू किया और लंदन में ट्रिनिटी लाबान संगीत एवं नृत्य संगीतविद्यालय की 7वीं कक्षा पूरी की। इसके साथ ही, उन्होंने व्यावसायिक संगीत के क्षेत्र में भी प्रयोग किया और खुद को सिंथेसाइज़र और सीक्वेंसर पर संगीत प्रोग्रामिंग सिखाई।वर्ष 2000 में वह अमेरिका गए, और ग्रीष्मकालीन पाठ्यक्रम के रूप में न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय , न्यूयॉर्क शहर में फिल्म और मल्टीमीडिया के लिए कंपोज़िंग का अध्ययन किया , और इसके पूरा होने के बाद उसी वर्ष भारत लौट आए।

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...