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शनिवार, 28 अक्टूबर 2023

वी शांताराम

राजाराम वांकुडरे शांताराम
अन्य नाम अन्नासाहब वी शांता राम

🎂जन्म 18 नवंबर, 1901
जन्म भूमि कोल्हापुर
⚰️मृत्यु 30 अक्टूबर, 1990
मृत्यु स्थान मुंबई

कर्म भूमि महाराष्ट्र
कर्म-क्षेत्र फ़िल्म निर्देशक, अभिनेता
मुख्य फ़िल्में 'अमर कहानी', 'अमर भूपाली', 'झनक-झनक पायल बाजे', 'दो आँखेंं बारह हाथ', 'नवरंग'।
विषय नृत्य, संवाद, कथानक, संगीत
पुरस्कार-उपाधि 'फ़िल्मफेयर पुरस्कार', 'पद्म विभूषण', 'दादा साहब फाल्के पुरस्कार'
प्रसिद्धि फ़िल्म निर्देशक, फ़िल्मकार, अभिनेता

वी शांताराम

परिचय
महाराष्ट्र के कोल्हापुर में 18 नवंबर, 1901 को एक जैन परिवार में जन्मे राजाराम वांकुडरे शांताराम ने बाबूराव पेंटर की महाराष्ट्र फ़िल्म कम्पनी में छोटे-मोटे काम से अपनी शुरुआत की थी। शांताराम ने नाममात्र की शिक्षा पायी थी। उन्होंने 12 साल की उम्र में रेलवे वर्कशाप में अप्रेंटिस के रूप में काम किया था। कुछ समय बाद वह एक नाटक मंडली में शामिल हो गए।

गीत और संगीत
गीत और संगीत शांताराम की फ़िल्मों का एक और मज़बूत पक्ष होता था। एक फ़िल्मकार के रूप में वह अपनी फ़िल्मों के संगीत पर विशेष ध्यान देते और उनका ज़ोर इस बात पर रहता कि गानों के बोल आसान और गुनगुनाने योग्य हों। शांताराम की फ़िल्मों में रंगमंच का पुट ज़रूर नज़र आता था, लेकिन वह अपनी फ़िल्मों से समाज को एक नई दृष्टि देने में कामयाब रहे। हर फ़िल्म अपने वक़्त की कहानी बयान करती है, लेकिन उन्हें लगता है कि अब शांताराम की 'पड़ोसी' (1940) और 'दो आँखेंं बारह हाथ' जैसी जीवंत फ़िल्में दोबारा नहीं बनाई जा सकतीं। शांताराम की कुछ कृतियों की गुणवत्ता का मुक़ाबला आज भी नहीं किया जा सकता। क़रीब छह दशक लंबे अपने फ़िल्मी सफर में शांताराम ने हिन्दी व मराठी भाषा में कई सामाजिक एवं उद्देश्यपरक फ़िल्में बनाई और समाज में चली आ रही कुरीतियों पर चोट की।

निर्देशक
शांताराम ने फ़िल्मों की बारीकियाँ बाबूराव पेंटर से सीखीं। बाबूराव पेंटर ने उन्हें 'सवकारी पाश' (1925) में किसान की भूमिका भी दी। कुछ ही वर्षों में शांताराम ने फ़िल्म निर्माण की तमाम बारीकियाँ सीख लीं और निर्देशन की कमान संभाल ली। बतौर निर्देशक उनकी पहली फ़िल्म 'नेताजी पालकर' थी।

कंपनी का गठन
इसके बाद उन्होंने वी.जी. दामले, के. आर. धाईबर, एम. फतेलाल और एस. बी. कुलकर्णी के साथ मिलकर 'प्रभात फ़िल्म' कंपनी का गठन किया। अपने गुरु बाबूराव की ही तरह शांताराम ने शुरुआत में पौराणिक तथा ऐतिहासिक विषयों पर फ़िल्में बनाईं। लेकिन बाद में जर्मनी की यात्रा से उन्हें एक फ़िल्मकार के तौर पर नई दृष्टि मिली और उन्होंने 1934 में 'अमृत मंथन' फ़िल्म का निर्माण किया। शांताराम ने अपने लंबे फ़िल्मी सफर में कई उम्दा फ़िल्में बनाईं और उन्होंने मनोरंजन के साथ संदेश को हमेशा प्राथमिकता दी।

फ़िल्मी सफर
हिन्दी सिनेमा के शुरुआती दौर में प्रमुखता से उभरे फ़िल्मकार वी शांताराम उन हस्तियों में थे जिनके लिए फ़िल्में मनोरंजन के साथ सामाजिक संदेश देने का माध्यम थी। अपने लंबे फ़िल्मी सफर में उन्होंने प्रयोगधर्मिता को भी बढ़ावा दिया। डॉ. कोटनिस की अमर कहानी, झनक झनक पायल बाजे, दो आँखें बारह हाथ, नवरंग, दुनिया ना माने जैसी अपने समय की बेहद चर्चित फ़िल्मों में शांताराम ने फ़िल्म निर्माण से जुड़े कई प्रयोग किए। उन्होंने फ़िल्मों के मनोरंजन पक्ष से कोई समझौता किए बिना नए प्रयोग किए जिनके कारण उनकी फ़िल्में न केवल आम दर्शकों बल्कि समीक्षकों को भी काफ़ी प्रिय लगीं। शांताराम ने हिन्दी फ़िल्मों में मूविंग शॉट का प्रयोग सबसे पहले किया। उन्होंने बच्चों के लिए 1930 में रानी साहिबा फ़िल्म बनायी। 'चंद्रसेना' फ़िल्म में उन्होंने पहली बार ट्राली का प्रयोग किया।

रंगीन फ़िल्म
उन्होंने 1933 में पहली रंगीन फ़िल्म 'सैरंध्री' बनाई। भारत में एनिमेशन का इस्तेमाल करने वाले भी वह पहले फ़िल्मकार थे। वर्ष 1935 में प्रदर्शित हुई फ़िल्म 'जंबू काका' (1935) में उन्होंने एनिमेशन का इस्तेमाल किया था। उनकी फ़िल्म डॉ.कोटनिस की 'अमर कहानी' विदेश में दिखाई जाने वाली पहली भारतीय फ़िल्म थी।

राजकमल कला मंदिर
शांताराम ने प्रभात फ़िल्म के लिए तीन बेहद शानदार फ़िल्में बनाई। शांताराम ने 1937 में करुकू (हिन्दी में दुनिया ना माने), 1939 में मानुष (हिन्दी में आदमी) और 1941 में शेजारी (हिन्दी में पड़ोसी) बनाई। शांताराम ने बाद में प्रभात फ़िल्म को छोड़कर राजकमल कला मंदिर का निर्माण किया। इसके लिए उन्होंने 'शकुंतला' फ़िल्म बनाई। इसका 1947 में कनाडा की राष्ट्रीय प्रदर्शनी में प्रदर्शन किया गया। शांताराम की बेहतरीन फ़िल्मों में से एक है डॉ.कोटनिस की अमर कहानी। यह एक देशभक्त डाक्टर की सच्ची कहानी पर आधारित है जो सद्भावना मिशन पर चीन गए चिकित्सकों के एक दल का सदस्य था।

दो आँखें बारह हाथ
मुख्य लेख : दो आँखे बारह हाथ
शांताराम की सर्वाधिक चर्चित फ़िल्म दो आँखें बारह हाथ है। जो 1957 में प्रदर्शित हुई। यह एक साहसिक जेलर की कहानी है जो छह क़ैदियों को सुधारता है। इस फ़िल्म को सर्वश्रेष्ठ फ़ीचर फ़िल्म के लिए राष्ट्रपति के स्वर्ण पदक से सम्मानित किया गया था। इसे बर्लिन फ़िल्म फेस्टिवल में सिल्वर बियर और सर्वश्रेष्ठ विदेशी फ़िल्म के लिए सैमुअल गोल्डविन पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। इस फ़िल्म का गीत ऐ मालिक तेरे बंदे हम... आज भी लोगों को याद है।

झनक झनक पायल बाजे और नवरंग
झनक झनक पायल बाजे और नवरंग उनकी बेहद कामयाब फ़िल्में रहीं। दर्शकों ने इन फ़िल्मों के गीत और नृत्य को काफ़ी सराहा और फ़िल्मों को कई-कई बार देखा।

पिंजरा
शांताराम की आख़िरी महत्त्वपूर्ण फ़िल्म थी पिंजरा। यह फ़िल्म जोसफ स्टर्नबर्ग की 1930 में प्रदर्शित हुई क्लासिक फ़िल्म 'द ब्ल्यू एंजेल' पर आधारित थी। वैसे उनकी आख़िरी फ़िल्म झांझर थी। यह फ़िल्म बॉक्स ऑफ़िस पर कामयाब नहीं हो सकी और सात दशकों तक चले उनके शानदार फ़िल्मी कैरियर का अंत हो गया।

पुरस्कार
शांताराम एक चलते-फिरते संस्थान थे, जिन्होंने फ़िल्म जगत में बहुत सम्मान हासिल किया। फ़िल्म निर्माण की उनकी तकनीक और उनके जैसी दृष्टि आज के निर्देशकों में कम ही नज़र आती है। उन्हें वर्ष 1957 में झनक-झनक पायल बाजे के लिए सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का फ़िल्मफेयर पुरस्कार दिया गया था। उनकी कालजयी फ़िल्म दो आँखेंं बारह हाथ के लिए सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का पुरस्कार प्रदान किया गया। इस फ़िल्म ने बर्लिन फ़िल्म समारोह और गोल्डन ग्लोब अवॉर्ड में भी झंडे गाड़े। अन्नासाहब के नाम से मशहूर शांताराम को वर्ष 1985 में भारतीय सिनेमा के सबसे बड़े पुरस्कार दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

मंगलवार, 18 जुलाई 2023

अरब्रार आलवी

अबरार अल्वी
🎂जन्मतिथि: 19-जुलाई -1927

⚰️मृत्यु तिथि: 18-नवंबर-2009

व्यवसाय: पटकथा लेखक, अभिनेता, फ़िल्म निर्देशक, फ़िल्म अभिनेता

अबरार अल्वी के बारे में। अबरार अल्वी गुरु दत्त के लिए फिल्में लिखते थे। उन्होंने फिल्में भी डायरेक्ट कीं। 'साहब बीवी और गुलाम' पहली फिल्म थी जो उन्होंने डायरेक्ट की। फिल्म के लेकिन फिल्म के साथ एक नया विवाद भी छिड़ गया। लोगों को लगा कि गुरु दत्त ने बिना अपना नाम बताये ये फिल्म डायरेक्ट की है।अब भला सोचिए अबरार की पहली फिल्म का क्रेडिट अगर गुरु दत्त को मिल रहा हो तो उन्हें कैसा महसूस हो रहा होगा। खैर ऐसी बातें क्यों की गई ये भी आपको बता देते हैं। ये फिल्म गुरु दत्त के मिजाज की थी। इसलिए लोगों को लगा कि इसे गुरु दत्त ने छुप-छुपा के बिना अपना नाम बताए डायरेक्ट किया है। दूसरी वजह थी कि फिल्म के कुछ हिस्सों और गानों को गुरु दत्त ने सचमुच डायरेक्ट किया था।
एक लेखक को एक चरित्र को उसी तरह जानना होता है जैसे एक माँ अपने बच्चों को जानती है। जैसे एक माँ जानती है, जब वह मुड़ती है और कमरे के कोने में शरारत कर रहे अपने दो बच्चों को क्रोध भरी आँखों से देखती है, तो उनमें से एक डर के मारे सहम जाएगा और दूसरा उस पर अपनी जीभ फिराएगा, इसलिए लेखक को यह भी पता होना चाहिए कि उसका प्रत्येक पात्र किसी भी स्थिति पर कैसे प्रतिक्रिया देगा।

यह लेखक, निर्देशक और फिल्मी हस्ती अबरार अल्वी का दर्शन था। उन्हें महान निर्देशक, अभिनेता और निर्माता गुरु दत्त की कई फिल्मों के पटकथा लेखक के रूप में जाना जाता था। लेकिन वास्तव में, वह उनके शिष्य, सहयोगी, विश्वासपात्र और करीबी दोस्त थे।

शनिवार, 1 जुलाई 2023

अरबार अली

अबरार अल्वी,  जो एक सिने दिग्दर्शक, पटकथा लेखक,संवाद लेखक थे उनका जन्म 1जुलाई 1927
अबरार जी का इन्तकाल बंबई मे 18 नवंबर 2009मे हो गया...आज उनके जयंती पर शत शत नमन🙏🙏🙏🙏🙏🌺🎂💐
अबरार मुल शब्द अरबी से अबरार का मतलब, पवित्रता,सुंदरता,ईश्वर से डरनेवाला,ऐसे नाम के एक  फिल्म से जुडे हूए व्यक्तिमत्व के धनी,अबरार अल्वी,  जो एक सिने दिग्दर्शक, पटकथा लेखक,संवाद लेखक थे उनका जन्म 1जुलाई 1927मे अयोध्या मे हुआ उनका बचपन  उनके पिता के करियर की वजह से अकोला,खामगाव,होशांगाबाद,जबलपूर,और नागपूर मे बिता,बाद वो माॅरिस कालेज मे पढकर उन्होंने इंग्लिश मे डिग्री हासिल की ऊनका रुझान जादातर काॅलेज के अन्य प्रतियोगीता मे जादा रहता था खास कर डिबेटस मे वो बढचढकर हिस्सा लेते थे।इस वजह वहां उन्होने लेखक के रुप मे रेडिओ मे नौकरी भी कर ली,साथ मे एल एल बी मे स्नातक बन गये थे कुछ नाटक कथा लिखने बाद वो बंबई चले गये साल 1951मे वहां इन्डियन पिपल असोसिएशन थियटर से जुड गये ,पर उनका अभी कुछ तय नहीं हुआ के आगे अब क्या करना है,ऐसे ही चार माह गुजर गये.तब उनके चचरे भाई इर्शाद हसन,उन्हे जसवंत भी कहते थे वो गुरूदत्त की फिल्म  1953की बाज मे वो असिस्टंट डायरेक्टर के रुप मे काम कर रहे थे वो अबरार को साथ ले गये थे एक सिन मे गुरूदत्त जी को संवाद कहते हुए दिक्कत आ रही थी तो अबरार जी ने उनकी मदद की,फिर गुरूदत्त जी इतने प्रभावित हुए अबरार जी से की उन्होंने उनकी अगली फिल्म साहब,बिबी गुलाम के लिए संवाद लेखक का काम दे दिया वहां  अबरार जी का करियर शुरू हो गया इतना दोस्ताना हो गया इन दोनों मे के गुरूदत्त जी के जिवन के सभी पहलू उन्हे पता थे*
उन्होंने गुरूदत्त की लगभग सभी फिल्म की  पटकथा लिखी प्यासा,कागज के फुल,मिस्टर एन्ड मिसेस55, चौदहवी का चान्द,बहारे फिर भी आऐगी,गुड्डू,प्रोफेसर, प्रिन्स,शिकार,आर-पार आदी फिल्मे जो उन्होंने लेखक के रुप मे अपने नाम दर्ज की उन्हे साहाब बिबी और गुलाम को 1963मे सर्वोत्तम दिग्दर्शक का पुरस्कार मिला था,इसी फिल्म को दुसरा राष्ट्रीय सर्वोत्कृष्ट हिन्दी फिल्म का पुरस्कार भी इसी साल मिला था।
उन्होंने गुरूदत्त पर एक किताब भी लिखी थी नाम था गुरूदत्त के साथ एक दशक,
अबरार जी का इन्तकाल बंबई मे 18 नवंबर 2009मे हो गया...आज उनके जयंती पर शत शत नमन🙏🙏🙏🙏🙏🌺🎂💐

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...