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शनिवार, 27 जनवरी 2024
कमलेश्वर
शनिवार, 6 जनवरी 2024
भरत व्यास
#06jan
#04july
भरत व्यास हिन्दी फ़िल्मों के प्रसिद्ध गीतकार थे।
🎂06 जनवरी 1918
⚰️04 जुलाई 1982 को मुंबई में उनका निधन हो गया।
जाति से पुष्करना ब्राह्मण थे। मूल रूप से चुरू (राजस्थान का एक जिला) के थे। बचपन से ही इनमे कवि प्रतिभा दिखने लगी थी। उन्होंने 17_18वर्ष की उम्र तक लेखन शुरू कर दिया था। चुरू से मैट्रिक करने के बाद वे कलकत्ता चले गए। उनका लिखा पहला गीत था — आओ वीरो हिलमिल गाए वंदे मातरम। उनके द्वारा "रामू चन्ना " नामक नाटक भी लिखा गया। 1942 के बाद वे बम्बई आ गए उन्होंने कुछ फ़िल्मों में भी भूमिका निभाई लेकिन प्रसिद्धि गीत लेखन से मिली।
हिंदी फिल्मों में उनका पहला ब्रेक फ़िल्म "दुहाई" के लिए था, जो 1943 में रिलीज़ हुई थी, और संगीत निर्देशन का श्रेय संयुक्त रूप से पन्नालाल घोष, रफ़ीक गज़नवी और शांति कुमार को दिया गया था। गीत नूरजहाँ और शांता आप्टे द्वारा गाए गए थे। व्यास नाटकों और रिकॉर्ड के लिए राजस्थानी गीत लिखते थे। यह भी उल्लेख है कि उन्होंने बंबई (अब मुंबई) में फिल्मों में आने से पहले कलकत्ता (अब कोलकाता) में पढ़ाई पूरी की। उन्हें फिल्म निर्देशन में भी दिलचस्पी थी और वास्तव में उन्होंने करियर की शुरुआत में ही एक फिल्म का निर्देशन किया था। उन्होंने 1940 के दशक में कुछ शुरुआती फिल्मों में अभिनय और गीत भी गाए। मुंबई आने के बाद, उनकी काव्य रचनाएँ लोकप्रिय हुईं।
उनकी मृत्यु 1982 मे हुई थी। उनके लिखे कुछ प्रमुख गीतों की फिल्मों के नाम हैं:— सारंगा, संत ज्ञानेश्वर, तूफ़ान और दिया, रानी रूपमती, गूंज उठी शहनाई, दो आँखे बारह हाथ, नवरंग, बूँद जो बन गई मोती, पूर्णिमा, आदि-आदि फ़िल्मों के यादगार/अमर गीत रचे थे।
दौलत के झूठे नशे में जो चूर (फ़िल्म: ऊँची हवेली)
आ लौट के आजा मीत (फ़िल्म: रानी रूपमती)
निर्बल से लडाई बलवान की (फ़िल्म: तूफ़ान और दिया)
ऐ मलिक तेरे बंदे हम (फ़िल्म: दो आंखें बारह हाथ)
सांझ हो गई प्रभु (फ़िल्म: जय चित्तौड़)
मैने पीना सीख लिया (फ़िल्म: गूंज उठी शहनाई)
तेरे सुर और मेरे गीत (फ़िल्म: गूंज उठी शहनाई)
कह दो कोई न करे यहाँ प्यार (फ़िल्म: गूंज उठी शहनाई)
दिल का खिलौना हाय टूट गया (फ़िल्म: गूंज उठी शहनाई)
हाँ दीवाना हूं मैं (फ़िल्म: सारंगा)
सारंगा तेरी याद में (फ़िल्म: सारंगा)
तू छुपी है कहाँ (फ़िल्म: नवरंग)
आधा है चन्द्रमा (फ़िल्म: नवरंग)
तुम मेरे मैं तेरी (फ़िल्म: नवरंग)
आज मधुउत्सव डोले (फ़िल्म: स्त्री)
ओ निर्दय प्रीतम (फ़िल्म: स्त्री)
रैन भये सो जा रे पंची (फ़िल्म: राम राज्य)
ज्योत से ज्योत जगाते चलो (फ़िल्म: संत ज्ञानेश्वर)
तुम गगन के चन्द्रमा हो (फ़िल्म: सती सावित्री)
जीवन डोर तुम्ही संग बाँधी (फ़िल्म: सती सावित्री)
मन की गहराई
4 जुलाई 1982 को मुंबई में उनका निधन हो गया। उनके छोटे भाई अभिनेता बृजमोहन व्यास (1920-2013) थे।
जिन फिल्मों के लिए उन्होंने गीत रचे:
मन की जीत' (1944; इस फ़िल्म के लिए दो गीत रचे; संगीत: एस.के. पाल ने दिया था।)
गुलामी (1945; फ़िल्म में व्यास ने पांच गाने लिखे, बाकी जोश मलीहाबादी ने; संगीत: एस.के. पाल ने दिया था।)
पृथ्वीराज संयुक्ता (1946; पृथ्वीराज कपूर मुख्य भूमिका में थे, और भरत व्यास ने फिल्म के लिए अभिनय किया और गाया; संगीत: एस.के. पाल ने दिया था।)
मीराबाई (1947)
चंद्रलेखा (1948; गीत बहुत लोकप्रिय थे, व्यास ने खुद एक गीत गाया ( संगीत: एस. राजेश्वर राव ने दिया था।) इस फ़िल्म में व्यास ने केवल दो गीत लिखे थे।
अंजना (1948)
रंगीला राजस्थान (1949; भरत व्यास ने इस फ़िल्म का निर्देशन किया था।)
सावन आया रे (1949)
बिजली (1950)
आंखें (1950)
हमारा घर (1950)
राज मुकुट (1950)
श्री गणेश जन्म (1951)
नखरे (1951)
भोला शंकर (1951)
तमाशा (1952)
अपनी इज़्ज़त (1952)
नौलखा हार (1953)
धर्मपत्नी (1953)
परिणीता (1953)
श्री चैतन्य महाप्रभु (1954)
जगदुरु शंकराचार्य (1955)
अंधेर नगरी चौपट राजा (1955)
ऊँची हवेली (1955)
तूफ़ान और दिया (1956)
द्वारिकाधीश (1956)
दो आँखें बारह हाथ (1957)
जनम जनम के फेरे (1957)
सम्राट चन्द्रगुप्त (1958)
सहारा (1958)
सुवर्णा सुंदरी (1958)
कवि कालिदास (1959)
सम्राट पृथ्वीराज चौहान (1959)
बेदर्द ज़माना क्या जाने (1959)
फैशनेबल पत्नी (1959)
गूंज उठी शहनाई (1959)
नवरंग (1959; गीत बहुत लोकप्रिय थे, व्यास ने खुद एक गीत गाया था।)
रानी रूपमती (1959)
चंद्रमुखी (1960)
अंगुलिमाल (1960)
हम हिंदुस्तानी (1960)
सम्पूर्ण रामायण (1961)
स्त्री (1961)
सारंगा (1961)
पिया मिलन की आस (1961)
जय चित्तौड़ (1961)
प्यार की प्यास (1961)
कण कण में भगवान (1963)
सती सावित्री (1964)
दाल में काला (1964)
चा चा चा (1964)
भारत मिलाप (1965)
पूर्णिमा (1965)
महाभारत (1965)
गोपाल-कृष्ण (1965)
राम राज्य (1967)
बून्द जो बन गई मोती (1967)
सती सुलोचना (1969)
लव कुश (1974)
तू ही राम तू ही कृष्णा (1976)
कर्म (1977)
दो चेहरे (1977)
मान अपमान (1979)
मुकद्दर (वर्ष ज्ञात नहीं/Year not known)
जन्माष्टमी (वर्ष ज्ञात नहीं/Year not known)
मौसी (वर्ष ज्ञात नहीं/Year not known)
मंगलवार, 17 अक्टूबर 2023
ओम पुरी
समानांतर सिनेमा एवं मुख्य धारा सिनेमा के प्रसिद्ध अभिनेता ओमपुरी के जन्मदिन पर हार्दिक श्रद्धांजलि
🎂जन्म की तारीख और समय: 18 अक्तूबर 1950, अम्बाला
⚰️मृत्यु की जगह और तारीख: 6 जनवरी 2017, अँधेरी
ओम राजेश पुरी हिन्दी फ़िल्मों के उन प्रसिद्ध अभिनेताओं में से एक थे, जो अपनी अभिनय क्षमता से किसी भी किरदार को पर्दे पर जीवंत करने में सक्षम थे। वे भारतीय सिनेमा के एक कालजयी अभिनेता थे। उनके अभिनय का हर अन्दाज दर्शकों को प्रभावित करता है। रूपहले पर्दे पर जब ओम पुरी का हँसता-मुस्कुराता चेहरा दिखता है तो दर्शकों को भी अपनी खुशियों का अहसास होता है और उनके दर्द में दर्शक भी दु:खी होते हैं। हिन्दी फ़िल्मों में उनके बहुमूल्य योगदान के लिए उन्हें 'राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार', 'फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार' और 'पद्मश्री' आदि से भी सम्मानित किया गया था। ओम पुरी हिन्दी सिनेमा के वह सितारे थे, जिन्हें लोग हर भूमिका में देखना पसंद करते थे। कलात्मक सिनेमा हो या कमर्शियल सिनेमा, वह सभी जगह अपना प्रभाव छोड़ने में सफल रहे।
परिचय
ओम पुरी का जन्म 18 अक्टूबर, 1950 को पंजाब के अम्बाला शहर में हुआ था। उनके बचपन का अधिकांश समय अम्बाला में ही व्यतीत हुआ। उनके पिता रेलवे में नौकरी करते थे, इसके बावजूद परिवार का गुजारा बामुश्किल चल रहा था। ओम पुरी का परिवार जिस मकान में रहता था। उसके पास एक रेलवे यार्ड था। ओम पुरी को ट्रेनों से काफ़ी लगाव था। रात के वक्त वह अक्सर घर से निकलकर रेलवे यार्ड में जाकर किसी भी ट्रेन में सोने चले जाते थे। यही वह वक्त था, जब ओम पुरी सोचते थे कि में बड़ा होकर एक रेलवे ड्राइवर बनूंगा। बताया जाता है कि आेम के पिता शराब पीने के आदी थे, जिसकी वजह से उनकी माँ उन्हें लेकर पटियाला स्थित अपने मायके सन्नौर चली गई थीं।
अभिनय_में_रुचि
ओम पुरी ने अपने परिवार की समस्या व ज़रूरतों को पूरा करने के लिए एक ढाबे पर नौकरी भी की। कुछ समय बाद ढाबे के मालिक ने उन पर चोरी का आरोप लगाते हुए नौकरी से हटा दिया। फिर कुछ समय बाद ओम पुरी पंजाब के पटियाला में स्थित गांव सन्नौर में अपने ननिहाल चले आए। वहां प्रारंभिक शिक्षा पूरी की। इसी दौरान उनका रुझान अभिनय की ओर हो गया और वे सिनेमा जगत् के लिए जागरूक से होने लगे और धीरे-धीरे नाटकों में हिस्सा लेने लगे। फिर खालसा कॉलेज में दाखिला लिया। उसी दौरान ओम पुरी एक वकील के यहां मुंशी का काम भी करने लगे। अपने एक साक्षात्कार में ओम पुरी ने खुद खुलासा किया था कि- "शुरुआती दिनों में वे चंडीगढ़ में वकील के साथ मुंशी थे। एक बार चंडीगढ़ में उनके नाटक की परफॉर्मेंस थी, लेकिन वकील ने उन्हें तीन छुट्टी देने से मना कर दिया। इस पर ओम पुरी ने कहा- "अपनी नौकरी रख ले, मेरा हिसाब कर दे।" जब कॉलेज के लड़कों को पता चला कि मैंने नौकरी छोड़ दी तो उन्होंने प्रिंसिपल से बात की। इस पर प्रिंसिपल ने प्रोफेसर से कहा- "कॉलेज में कोई जगह है क्या।" इस पर उन्होंने कहा- "है एक लैब असिस्टेंट की, लेकिन ये आज का स्टूडेंट है, इसे क्या पता साइंस के बारे में।" प्रिंसिपल बोले- "कोई बात नहीं, लड़के अपने आप कह देंगे, नीली शीशी पकड़ा दे, पीली शीशी पकड़ा दे।" इस नौकरी के साथ ही ओम पुरी कॉलेज में हो रहे नाटकों में भी हिस्सा लेते रहे।
इसी समय उनकी मुलाकात हरपाल और नीना टिवाना से हुई, जिनके सहयोग से वह 'पंजाब कला मंच' नामक नाट्य संस्था से जुड़ गए। 'फ़िल्म एंड टेलिविजन इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडिया' से स्नातक के बाद ओम पुरी ने देश की राजधानी दिल्ली स्थित 'नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा' (एनएसडी) से अभिनय का कोर्स किया। यहीं पर उनकी मुलाकात नसीरुद्दीन शाह जैसे कलाकार से भी हुई। फिर अभिनेता बनने का सपना लेकर उन्होंने 1976 में 'पुणे फ़िल्म संस्थान' में दाखिला ले लिया।
विवाह
ओम पुरी का निजी जीवन कई बार विवादों के घेरे में आया। उन्होंने दो विवाह किये थे। उनकी पहली पत्नी का नाम 'सीमा' है, किंतु यह दाम्पत्य जीवन अधिक लम्बा नहीं चला और उनका तलाक हो गया। इसके बाद ओम पुरी ने नंदिता पुरी से विवाह किया। नंदिता और ओम पुरी एक पुत्र के माता-पिता भी बने। उनके पुत्र का नाम ईशान है।
फ़िल्मी_शुरुआत
'नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा' से अभिनय का औपचारिक प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद ओम पुरी ने हिन्दी फ़िल्मों की ओर रूख किया। वर्ष 1976 की फ़िल्म 'घासीराम कोतवाल' में वे पहली बार हिन्दी दर्शकों से रू-ब-रू हुए। 'घासीराम कोतवाल' की संवेदनशील भूमिका में अपनी अभिनय क्षमता का प्रभावी परिचय ओम पुरी ने दिया और धीरे-धीरे वे मुख्य धारा की फ़िल्मों से अलग समानांतर फ़िल्मों के सर्वाधिक लोकप्रिय अभिनेता के रूप में उभरने लगे।
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सफलता
वर्ष 1981 में ओम पुरी को फ़िल्म 'आक्रोश' मिली। 'आक्रोश' में उनके अभिनय की जमकर तारीफ़ हुई। इसके बाद फ़िल्मी दुनिया में उनकी गाड़ी चल निकली। 'भवनी भवई', 'स्पर्श', 'मंडी', 'आक्रोश' और 'शोध' जैसी फ़िल्मों में ओम पुरी के सधे हुए अभिनय का जादू दर्शकों के सिर चढ़कर बोला। किंतु उनके फ़िल्मी सफर में मील का पत्थर साबित हुई- 'अर्धसत्य'। 'अर्धसत्य' में युवा, जुझारू और आंदोलनकारी पुलिस ऑफिसर की भूमिका में वे बेहद जँचे।
धीरे-धीरे ओम पुरी समानांतर सिनेमा की एक बड़ी ज़रूरत बन गए। समानांतर सिनेमा जगत् में अपनी प्रभावी उपस्थिति दर्ज कराने के साथ-साथ ओम पुरी ने मुख्य धारा की फ़िल्मों का भी रूख किया। कभी नायक, कभी खलनायक तो कभी चरित्र अभिनेता और हास्य अभिनेता के रूप में वे हर दर्शक वर्ग से रू-ब-रू हुए और उनकी प्रशंसा के पात्र बने।
प्रसिद्ध_कलाकारों_के_साथ_कार्य
नसीरुद्दीन शाह और स्मिता पाटिल के साथ ओम पुरी ने 'भवनी भवई', 'अर्धसत्य', 'मिर्च मसाला' और 'धारावी' जैसी फ़िल्मों में काम किया।
अंतरराष्ट्रीय_पहचान
ओम पुरी हिन्दी फ़िल्मों के उन गिने-चुने अभिनेताओं की सूची में शामिल हैं, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी पहचान बनायी है। 'ईस्ट इज ईस्ट', 'सिटी ऑफ़ ज्वॉय', 'वुल्फ़', 'द घोस्ट एंड डार्कनेस' जैसी हॉलीवुड फ़िल्मों में भी उन्होंने अपने उम्दा अभिनय की छाप छोड़ी है। 'सैम एंड मी', 'सिटी ऑफ़ ज्वॉय' और 'चार्ली विल्सन वार' जैसी अंग्रेज़ी फ़िल्मों समेत उन्होंने लगभग 200 फ़िल्मों में काम किया। 'चार्ली विल्सन' में उन्होंने पाकिस्तान के राष्ट्रपति जिया उल हक की भूमिका निभाई थी। हाल के वर्षों में मकबूल और देव जैसी गंभीर फ़िल्मों में अभिनय करने वाले ओम पुरी अपने सशक्त अभिनय के साथ ही अपनी सशक्त आवाज़ के लिए भी जाने जाते हैं।
हास्य_भूमिकाएँ
जीवन के कई वसंत देख चुके ओम पुरी आज भी हिन्दी फ़िल्मों में अपनी सक्रिय उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। अंतर बस इतना है कि इन दिनों वे नायक या खलनायक नहीं, बल्कि चरित्र या हास्य अभिनेता के रूप में हिन्दी फ़िल्मों के दर्शकों को लुभा रहे हैं। 'चाची 420', 'हेरा फेरी', 'मेरे बाप पहले आप', 'चुपके-चुपके' और 'मालामाल वीकली' में ओम पुरी हँसती-गुदगुदाती भूमिकाओं में दिखे तो 'शूट ऑन साइट', 'महारथी', 'देव' और 'दबंग' में चरित्र अभिनेता के रूप में वे दर्शकों के सामने आये।
कहा जाता है कि ओम पुरी को पहली फ़िल्म के मेहनताने में मूंगफलियां मिली थीं। ओम पुरी के फ़िल्मी कॅरियर की शुरुआत 1976 में मराठी फ़िल्म 'घासीराम कोतवाल' से हुई थी। यह फ़िल्म विजय तेंडुलकर के मराठी नाटक पर आधारित थी। ओम पुरी का कहना था कि तब उन्हें अच्छे काम के लिए मूंगफलियां मिली थीं। ओम पुरी ने एक चरित्र अभिनेता के अलावा निगेटिव किरदार भी निभाए। उनकी कॉमिक टाइमिंग गजब की थी। उन्होंने 'जाने भी दो यारों' जैसी डार्क कॉमिडी से लेकर आज के जमाने की हंसोड़ फ़िल्मों में काम किया। हाल ही में उन्होंने हॉलिवुड एनिमेशन फ़िल्म 'जंगल बुक' में एक किरदार को अपनी आवाज़ भी दी थी। उनकी आखिरी कमर्शल फ़िल्म 'घायल वन्स अगेन' थी। उनकी मशहूर आर्ट फ़िल्मों में 'अर्ध सत्य', 'सद्गति', 'भवनी भवाई', 'मिर्च मसाला' और 'धारावी' आदि शामिल हैं। 'हेराफेरी', 'सिंह इज किंग', 'मेरे बाप पहले आप', 'बिल्लू' जैसी फ़िल्मों में उन्होंने दर्शकों को खूब हंसाया।
पुरस्कार_व_सम्मान
अपने लम्बे फ़िल्मी सफर में ओम पुरी ने सशक्त अभिनय से कई उपलब्धियाँ और पुरस्कार आदि प्राप्त किये हैं-
'फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार' - 1981 - सर्वश्रेष्ठ सह-अभिनेता (फ़िल्म 'आक्रोश')
'राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार' - 1982 - सर्वश्रेष्ठ अभिनेता (फ़िल्म 'आरोहण')
'राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार' - 1984 - सर्वश्रेष्ठ अभिनेता (फ़िल्म 'अर्धसत्य')
'पद्मश्री' - 1990
'फ़िल्म फ़ेयर लाइफ़टाइम अचीवमेंट अवार्ड' - 2009
मृत्यु
अपने बेजोड़ अभिनय से भारतीय सिनेमा में कभी न मिट सकने वाली पहचान बनाने वाले अभिनेता ओम पुरी का निधन 6 जनवरी, 2017 को अंधेरी, मुम्बई में हुआ।
बुधवार, 2 अगस्त 2023
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