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शनिवार, 27 जनवरी 2024

कमलेश्वर

#06jan
#27jan 
कमलेश्वर

🎂 06 जनवरी, 1932
⚰️27 जनवरी, 2007 को फ़रीदाबाद, हरियाणा

उपन्यास के लेखक उपन्यासकार, लेखक, आलोचक, फ़िल्म पटकथा लेखक 
इनाम: पद्म भूषण, फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार - सर्वश्रेष्ठ पटकथा
शिक्षा: इलाहाबाद विश्वविद्यालय
आंदोलन: नई कहानी

कमलेश्वर बीसवीं शती के सबसे सशक्त लेखकों में से एक हैं। कहानी, उपन्यास, पत्रकारिता, स्तंभ लेखन, फ़िल्म पटकथा जैसी अनेक विधाओं में उन्होंने अपनी लेखन प्रतिभा का परिचय दिया। इन्होंने अनेक हिन्दी फ़िल्मों के लिए पटकथाएँ लिखीं तथा भारतीय दूरदर्शन शृंखलाओं के लिए दर्पण, चन्द्रकान्ता, बेताल पच्चीसी, विराट युग आदि लिखे। भारतीय स्वातंत्रता संग्राम पर आधारित पहली प्रामाणिक एवं इतिहासपरक जन-मंचीय मीडिया कथा ‘हिन्दुस्तां हमारा’ का भी लेखन किया।

पूरा नाम 'कमलेश्वर प्रसाद सक्सेना' का जन्म उत्तर प्रदेश के मैनपुरी में 6 जनवरी, 1932 को हुआ था। प्रारम्भिक पढ़ाई के पश्चात् कमलेश्वर ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से परास्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण की। कमलेश्वर बहुआयामी रचनाकार थे। उन्होंने सम्पादन क्षेत्र में भी एक प्रतिमान स्थापित किया। ‘नई कहानियों’ के अलावा ‘सारिका’, ‘कथा यात्रा’, ‘गंगा’ आदि पत्रिकाओं का सम्पादन तो किया ही ‘दैनिक भास्कर’ के राजस्थान अलंकरणों के प्रधान सम्पादक भी रहे। कश्मीर एवं अयोध्या आदि पर वृत्त चित्रों तथा दूरदर्शन के लिए ‘बन्द फ़ाइल’ एवं ‘जलता सवाल’ जैसे सामाजिक सरोकारों के वृत्त चित्रों का भी लेखन-निर्देशन और निर्माण किया।

'विहान' जैसी पत्रिका का 1954 में संपादन आरंभ कर कमलेश्वर ने कई पत्रिकाओं का सफल संपादन किया जिनमें 'नई कहानियाँ' (1963-66), 'सारिका' (1967-78), 'कथायात्रा' (1978-79), 'गंगा' (1984-88) आदि प्रमुख हैं। इनके द्वारा संपादित अन्य पत्रिकाएँ हैं- 'इंगित' (1961-63) 'श्रीवर्षा' (1979-80)। हिंदी दैनिक 'दैनिक जागरण'(1990-92) के भी वे संपादक रहे हैं। 'दैनिक भास्कर' से 1997 से वे लगातार जुड़े हैं। इस बीच जैन टीवी के समाचार प्रभाग का कार्य भार संभाला। सन 1980-82 तक कमलेश्वर दूरदर्शन के अतिरिक्त महानिदेशक भी रहे। कमलेश्वर का नाम नई कहानी आंदोलन से जुड़े अगुआ कथाकारों में आता है। उनकी पहली कहानी 1948 में प्रकाशित हो चुकी थी परंतु 'राजा निरबंसिया' (1957) से वे रातों-रात एक बड़े कथाकार बन गए। कमलेश्वर ने तीन सौ से ऊपर कहानियाँ लिखी हैं। उनकी कहानियों में 'मांस का दरिया,' 'नीली झील', 'तलाश', 'बयान', 'नागमणि', 'अपना एकांत', 'आसक्ति', 'ज़िंदा मुर्दे', 'जॉर्ज पंचम की नाक', 'मुर्दों की दुनिया', 'क़सबे का आदमी' एवं 'स्मारक' आदि उल्लेखनीय हैं।

फ़िल्म और टेलीविजन के लिए लेखन के क्षेत्र में भी कमलेश्वर को काफ़ी सफलता मिली है। उन्होंने सारा आकाश, आँधी, अमानुष और मौसम जैसी फ़िल्मों के अलावा 'मि. नटवरलाल', 'द बर्निंग ट्रेन', 'राम बलराम' जैसी फ़िल्मों सहित 99 हिंदी फ़िल्मों का लेखन किया है। कमलेश्वर भारतीय दूरदर्शन के पहले स्क्रिप्ट लेखक के रूप में भी जाने जाते हैं। उन्होंने टेलीविजन के लिए कई सफल धारावाहिक लिखे हैं जिनमें 'चंद्रकांता', 'युग', 'बेताल पचीसी', 'आकाश गंगा', 'रेत पर लिखे नाम' आदि प्रमुख हैं। भारतीय कथाओं पर आधारित पहला साहित्यिक सीरियल 'दर्पण' भी उन्होंने ही लिखा। दूरदर्शन पर साहित्यिक कार्यक्रम 'पत्रिका' की शुरुआत इन्हीं के द्वारा हुई तथा पहली टेलीफ़िल्म 'पंद्रह अगस्त' के निर्माण का श्रेय भी इन्हीं को जाता है। तकरीबन सात वर्षों तक दूरदर्शन पर चलने वाले 'परिक्रमा' में सामाजिक-सांस्कृतिक समस्याओं पर खुली बहस चलाने की दिशा में साहसिक पहल भी कमलेश्वर जी की थी। वे स्वातंत्र्योत्तर भारत के सर्वाधिक क्रियाशील, विविधतापूर्ण और मेधावी हिंदी लेखक थे

उपन्यासकार के रूप में ‘कितने पाकिस्तान’ ने इन्हें सर्वाधिक ख्याति प्रदान की और इन्हें एक कालजयी साहित्यकार बना दिया। हिन्दी में यह प्रथम उपन्यास है, जिसके अब तक पाँच वर्षों में, 2002 से 2008 तक ग्यारह संस्करण हो चुके हैं। पहला संस्करण छ: महीने के अन्तर्गत समाप्त हो गया था। दूसरा संस्करण पाँच महीने के अन्तर्गत, तीसरा संस्करण चार महीने के अन्तर्गत। इस तरह हर कुछेक महीनों में इसके संस्करण होते रहे और समाप्त होते रहे।

कमलेश्वर को उनकी रचनाधर्मिता के फलस्वरूप पर्याप्त सम्मान एवं पुरस्कार मिले। 2005 में उन्हें ‘पद्मभूषण’ अलंकरण से राष्ट्रपति महोदय ने विभूषित किया। उनकी पुस्तक ‘कितने पाकिस्तान’ पर साहित्य अकादमी ने उन्हें पुरस्कृत किया।

27 जनवरी, 2007 को फ़रीदाबाद, हरियाणा में कमलेश्वर का निधन हो गया।

उनकी कहानियाँ

कमलेश्वर ने तीन सौ से अधिक कहानियाँ लिखीं। उनकी कुछ प्रसिद्ध कहानियाँ हैं -

राजा निरबंसिया
मांस का दरिया
नीली झील
तलाश
बयान
नागमणि
अपना एकांत
आसक्ति
ज़िंदा मुर्दे
जॉर्ज पंचम की नाक
मुर्दों की दुनिया
कस्बे का आदमी
स्मारक
नाटक

उन्होंने तीन नाटक लिखे -

अधूरी आवाज़
रेत पर लिखे नाम
हिंदोस्ता हमारा

उपन्यास -

एक सड़क सत्तावन गलियाँ- 1957
तीसरा आदमी- 1976
डाक बंगला -1959
समुद्र में खोया हुआ आदमी-1967
काली आँधी-1974
आगामी अतीत -1976
सुबह...दोपहर...शाम-1982
रेगिस्तान-1988
लौटे हुए मुसाफ़िर-1961
वही बात-1980
एक और चंद्रकांता
कितने पाकिस्तान-2000
 अंतिम सफर
पटकथा एवं संवाद

कमलेश्वर ने ९९ फ़िल्मों के संवाद, कहानी या पटकथा लेखन का काम किया। कुछ प्रसिद्ध फ़िल्मों के नाम हैं-

१. सौतन की बेटी(१९८९)-संवाद
२. लैला(१९८४)- संवाद, पटकथा
३. यह देश (१९८४) -संवाद
४. रंग बिरंगी(१९८३) -कहानी
५. सौतन(१९८३)- संवाद
६. साजन की सहेली(१९८१)- संवाद, पटकथा
७. राम बलराम (१९८०)- संवाद, पटकथा
८. मौसम(१९७५)- कहानी
९. आंधी (१९७५)- उपन्यास
संपादन

अपने जीवनकाल में अलग-अलग समय पर उन्होंने सात पत्रिकाओं का संपादन किया -

विहान-पत्रिका (१९५४)
नई कहानियाँ-पत्रिका (१९५८-६६)
सारिका-पत्रिका (१९६७-७८)
कथायात्रा-पत्रिका (१९७८-७९)
गंगा-पत्रिका(१९८४-८८)
इंगित-पत्रिका (१९६१-६८)
श्रीवर्षा-पत्रिका (१९७९-८०)

शनिवार, 6 जनवरी 2024

भरत व्यास

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भरत व्यास हिन्दी फ़िल्मों के प्रसिद्ध गीतकार थे। 


🎂06 जनवरी 1918

⚰️04 जुलाई 1982 को मुंबई में उनका निधन हो गया।


 जाति से पुष्करना ब्राह्मण थे। मूल रूप से चुरू (राजस्थान का एक जिला) के थे। बचपन से ही इनमे कवि प्रतिभा दिखने लगी थी। उन्होंने 17_18वर्ष की उम्र तक लेखन शुरू कर दिया था। चुरू से मैट्रिक करने के बाद वे कलकत्ता चले गए। उनका लिखा पहला गीत था — आओ वीरो हिलमिल गाए वंदे मातरम। उनके द्वारा "रामू चन्ना " नामक नाटक भी लिखा गया। 1942 के बाद वे बम्बई आ गए उन्होंने कुछ फ़िल्मों में भी भूमिका निभाई लेकिन प्रसिद्धि गीत लेखन से मिली।


हिंदी फिल्मों में उनका पहला ब्रेक फ़िल्म "दुहाई" के लिए था, जो 1943 में रिलीज़ हुई थी, और संगीत निर्देशन का श्रेय संयुक्त रूप से पन्नालाल घोष, रफ़ीक गज़नवी और शांति कुमार को दिया गया था। गीत नूरजहाँ और शांता आप्टे द्वारा गाए गए थे। व्यास नाटकों और रिकॉर्ड के लिए राजस्थानी गीत लिखते थे। यह भी उल्लेख है कि उन्होंने बंबई (अब मुंबई) में फिल्मों में आने से पहले कलकत्ता (अब कोलकाता) में पढ़ाई पूरी की। उन्हें फिल्म निर्देशन में भी दिलचस्पी थी और वास्तव में उन्होंने करियर की शुरुआत में ही एक फिल्म का निर्देशन किया था। उन्होंने 1940 के दशक में कुछ शुरुआती फिल्मों में अभिनय और गीत भी गाए। मुंबई आने के बाद, उनकी काव्य रचनाएँ लोकप्रिय हुईं।


उनकी मृत्यु 1982 मे हुई थी। उनके लिखे कुछ प्रमुख गीतों की फिल्मों के नाम हैं:— सारंगा, संत ज्ञानेश्वर, तूफ़ान और दिया, रानी रूपमती, गूंज उठी शहनाई, दो आँखे बारह हाथ, नवरंग, बूँद जो बन गई मोती, पूर्णिमा, आदि-आदि फ़िल्मों के यादगार/अमर गीत रचे थे।

दौलत के झूठे नशे में जो चूर (फ़िल्म: ऊँची हवेली)

आ लौट के आजा मीत (फ़िल्म: रानी रूपमती)

निर्बल से लडाई बलवान की (फ़िल्म: तूफ़ान और दिया)

ऐ मलिक तेरे बंदे हम (फ़िल्म: दो आंखें बारह हाथ)

सांझ हो गई प्रभु (फ़िल्म: जय चित्तौड़)

मैने पीना सीख लिया (फ़िल्म: गूंज उठी शहनाई)

तेरे सुर और मेरे गीत (फ़िल्म: गूंज उठी शहनाई)

कह दो कोई न करे यहाँ प्यार (फ़िल्म: गूंज उठी शहनाई)

दिल का खिलौना हाय टूट गया (फ़िल्म: गूंज उठी शहनाई)

हाँ दीवाना हूं मैं (फ़िल्म: सारंगा)

सारंगा तेरी याद में (फ़िल्म: सारंगा)

तू छुपी है कहाँ (फ़िल्म: नवरंग)

आधा है चन्द्रमा (फ़िल्म: नवरंग)

तुम मेरे मैं तेरी (फ़िल्म: नवरंग)

आज मधुउत्सव डोले (फ़िल्म: स्त्री)

ओ निर्दय प्रीतम (फ़िल्म: स्त्री)

रैन भये सो जा रे पंची (फ़िल्म: राम राज्य)

ज्योत से ज्योत जगाते चलो (फ़िल्म: संत ज्ञानेश्वर)

तुम गगन के चन्द्रमा हो (फ़िल्म: सती सावित्री)

जीवन डोर तुम्ही संग बाँधी (फ़िल्म: सती सावित्री)

मन की गहराई

4 जुलाई 1982 को मुंबई में उनका निधन हो गया। उनके छोटे भाई अभिनेता बृजमोहन व्यास (1920-2013) थे।


जिन फिल्मों के लिए उन्होंने गीत रचे:


मन की जीत' (1944; इस फ़िल्म के लिए दो गीत रचे; संगीत: एस.के. पाल ने दिया था।)

गुलामी (1945; फ़िल्म में व्यास ने पांच गाने लिखे, बाकी जोश मलीहाबादी ने; संगीत: एस.के. पाल ने दिया था।)

पृथ्वीराज संयुक्ता (1946; पृथ्वीराज कपूर मुख्य भूमिका में थे, और भरत व्यास ने फिल्म के लिए अभिनय किया और गाया; संगीत: एस.के. पाल ने दिया था।)

मीराबाई (1947)

चंद्रलेखा (1948; गीत बहुत लोकप्रिय थे, व्यास ने खुद एक गीत गाया ( संगीत: एस. राजेश्वर राव ने दिया था।) इस फ़िल्म में व्यास ने केवल दो गीत लिखे थे।

अंजना (1948)

रंगीला राजस्थान (1949; भरत व्यास ने इस फ़िल्म का निर्देशन किया था।)

सावन आया रे (1949)

बिजली (1950)

आंखें (1950)

हमारा घर (1950)

राज मुकुट (1950)

श्री गणेश जन्म (1951)

नखरे (1951)

भोला शंकर (1951)

तमाशा (1952)

अपनी इज़्ज़त (1952)

नौलखा हार (1953)

धर्मपत्नी  (1953)

परिणीता (1953)

श्री चैतन्य महाप्रभु (1954)

जगदुरु शंकराचार्य (1955)

अंधेर नगरी चौपट राजा (1955)

ऊँची हवेली (1955)

तूफ़ान और दिया (1956)

द्वारिकाधीश (1956)

दो आँखें बारह हाथ (1957)

जनम जनम के फेरे (1957)

सम्राट चन्द्रगुप्त (1958)

सहारा (1958)

सुवर्णा सुंदरी (1958)

कवि कालिदास (1959)

सम्राट पृथ्वीराज चौहान (1959)

बेदर्द ज़माना क्या जाने (1959)

फैशनेबल पत्नी (1959)

गूंज उठी शहनाई (1959)

नवरंग (1959; गीत बहुत लोकप्रिय थे, व्यास ने खुद एक गीत गाया था।)

रानी रूपमती (1959)

चंद्रमुखी (1960)

अंगुलिमाल (1960)

हम हिंदुस्तानी (1960)

सम्पूर्ण रामायण (1961)

स्त्री (1961)

सारंगा (1961)

पिया मिलन की आस (1961)

जय चित्तौड़ (1961)

प्यार की प्यास (1961)

कण कण में भगवान (1963)

सती सावित्री (1964)

दाल में काला (1964)

चा चा चा (1964)

भारत मिलाप (1965)

पूर्णिमा (1965)

महाभारत (1965)

गोपाल-कृष्ण (1965)

राम राज्य (1967)

बून्द जो बन गई मोती (1967)

सती सुलोचना (1969)

लव कुश (1974)

तू ही राम तू ही कृष्णा (1976)

कर्म (1977)

दो चेहरे (1977)

मान अपमान (1979)

मुकद्दर (वर्ष ज्ञात नहीं/Year not known)

जन्माष्टमी (वर्ष ज्ञात नहीं/Year not known)

मौसी (वर्ष ज्ञात नहीं/Year not known)


मंगलवार, 17 अक्टूबर 2023

ओम पुरी



ओम पुरी हिन्दी फिल्मों के एक प्रसिद्ध अभिनेता थे।
🎂जन्म की तारीख और समय: 18 अक्तूबर 1950, अम्बाला
⚰️मृत्यु की जगह और तारीख: 06 जनवरी 2017, अँधेरी
 ओम पुरी का जन्म अम्बाला, पंजाब में हुआ हुआ था जिसे आज कल हरियाणा कहा जाता है। 

इन्होने ब्रिटिश तथा अमेरिकी सिनेमा में भी योगदान किया है। ये पद्मश्री पुरस्कार विजेता भी हैं, जोकि भारत के नागरिक पुरस्कारों के पदानुक्रम में चौथा पुरस्कार है। 
पत्नी: नंदिता पुरी (विवा. 1993–2013), सीमा कपूर (विवा. 1991–1991)
भाई: वेद पुरी
बच्चे: ईशान पुरी
माता-पिता: तारा देवी, Tek Chand Puri
 उनके पिता रेलवे और इंडियन आर्मी में थे। ओम पुरी के पैरेंट्स के पास उनके जन्म का न तो कोई सर्टिफिकेट था और न ही उन्हें उनकी जन्मतिथि याद थी। उनकी मां ने उन्हें बताया था कि वो हिंदू फेस्टिवल दशहरा से दो दिन पहले पैदा हुए थे। जब वो स्कूल जाने लगे, तब उनके अंकल ने उनका बर्थडे 9 मार्च 1950 दर्ज कराया, लेकिन जब ओम पुरी मुंबई पहुंचे, तब उन्होंने देखा कि साल 1950 में दशहरा कब मनाया गया था और उसी हिसाब से उन्होंने खुद की बर्थडेट 18 अक्टूबर लिखी। ओम पुरी का बचपन बहुत गरीबी में बीता था। फिर किस्मत बदली और उन्होंने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में खूब नाम कमाया, लेकिन वो मुश्किल दौर में तब आए, जब दूसरी बीवी संग उनका मनमुटाव हो गया। 
ओमपुरी की विवादों से भरी जिंदगी
ओम पुरी ने ऐसा बचपन जिया था, जिसमें कोई खुशियां नहीं थीं। जब वो 6 साल के थे, उनके पिता रेलवे में कर्मचारी थे, उन पर सीमेंट चोरी का आरोप लगा और उन्हें जेल की सलाखों के पीछे डाल दिया गया था। इसके बाद उनका परिवार बेघर हो गया था। पेट पालने के लिए ओम पुरी के भाई वेद प्रकाश पुरी ने रेलवे में कुली की नौकरी की और ओम पुरी एक दुकान पर चाय बेचने लगे। अपने परिवार को सहारा देने के लिए ओम पुरी ने कई तरह की नौकरी की। वो रेलवे ट्रैक से कोयला भी इकट्ठा करते थे, ताकि घरवालों का पेट पाल सकें। बाद में उनका और उनके भाई के बच्चों का पालन-पोषण एक नौकरानी शांति ने किया।
ओम पुरी ने कई फिल्मों में बेहतरीन एक्टिंग की। उनकी दिल तक जाने वाली आवाज की दुनिया कायल थी। फिल्मों से ज्यादा वो पर्सनल लाइफ को लेकर भी काफी चर्चा में रहे थे। उन्होंने साल 1991 में डायरेक्टर और राइटर सीमा कपूर से शादी की थी, जो एक्टर अन्नू कपूर की बहन हैं। हालांकि, ओम पुरी और सीमा की शादी 8 महीने तक ही चली। इसके बाद 1993 में ओम पुरी ने जर्नलिस्ट नंदिता पुरी संग ब्याह रचाया। कपल को एक बेटा हुआ, जिसका नाम ईशान है। 
साल 2009 की बात है, जब नंदिता ने पति पर एक बायोग्राफी लिखी, जिसका नाम है- Unlikely Hero: The Story of Om Puri। इस बायोग्राफी ने तहलका मचा दिया था, क्योंकि उन्होंने इसमें ऐसे-ऐसे खुलासे किए थे, जिसे सुनकर और पढ़कर लोग दंग रह गए थे। जिस में लिखा था।
नौकरानी संग फिजिकल रिलेशन का जिक्र।

ओम पुरी को सबसे ज्यादा इस बात ने अपसेट किया था कि उनकी वाइफ ने बायोग्राफी में ये लिखा था कि ओम पुरी ने 14 साल की उम्र में अपनी नौकरानी के साथ फिजिकल रिलेशनशिप बनाया था। इसके साथ ही नंदिता ने एक लक्ष्मी नाम की महिला के बारे में भी जिक्र किया था, जिससे ओमपुरी सेक्शुअली और इमोशनल दोनों रूप में इनवॉल्व थे।

ओमपुरी ने मानी थी ये बात
ओम पुरी ने ये भी बताया था कि अपनी वाइफ से उन्होंने सारे डार्क सीक्रेट्स शेयर किए थे, जैसे सभी पति करते हैं, लेकिन उसने उनकी लाइफ के सबसे महत्वपूर्ण और पवित्र हिस्से को घटिया और बेहूदे गॉसिप में बदल दिया। उन्होंने कहा था, 'लक्ष्मी मेरी लाइफ की सबसे महत्वपूर्ण महिलाओं में से एक थीं। जिसने मुझे और मेरे भाई के अनाथ बच्चों को पाला।' हालांकि, उन्होंने इस बात से इनकार नहीं किया था कि उन्होंने लक्ष्मी के साथ फिजिकल रिलेशन बनाया था। उन्होंने इसे खूबसूरत एक्सपीरियंस बताया था।

indo-canadian mudar:
जीवनी
समानांतर सिनेमा एवं मुख्य धारा सिनेमा के प्रसिद्ध अभिनेता ओमपुरी के जन्मदिन पर हार्दिक श्रद्धांजलि

🎂जन्म की तारीख और समय: 18 अक्तूबर 1950, अम्बाला
⚰️मृत्यु की जगह और तारीख: 6 जनवरी 2017, अँधेरी

ओम राजेश पुरी हिन्दी फ़िल्मों के उन प्रसिद्ध अभिनेताओं में से एक थे, जो अपनी अभिनय क्षमता से किसी भी किरदार को पर्दे पर जीवंत करने में सक्षम थे। वे भारतीय सिनेमा के एक कालजयी अभिनेता थे। उनके अभिनय का हर अन्दाज दर्शकों को प्रभावित करता है। रूपहले पर्दे पर जब ओम पुरी का हँसता-मुस्कुराता चेहरा दिखता है तो दर्शकों को भी अपनी खुशियों का अहसास होता है और उनके दर्द में दर्शक भी दु:खी होते हैं। हिन्दी फ़िल्मों में उनके बहुमूल्य योगदान के लिए उन्हें 'राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार', 'फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार' और 'पद्मश्री' आदि से भी सम्मानित किया गया था। ओम पुरी हिन्दी सिनेमा के वह सितारे थे, जिन्हें लोग हर भूमिका में देखना पसंद करते थे। कलात्मक सिनेमा हो या कमर्शियल सिनेमा, वह सभी जगह अपना प्रभाव छोड़ने में सफल रहे।

परिचय

ओम पुरी का जन्म 18 अक्टूबर, 1950 को पंजाब के अम्बाला शहर में हुआ था। उनके बचपन का अधिकांश समय अम्बाला में ही व्यतीत हुआ। उनके पिता रेलवे में नौकरी करते थे, इसके बावजूद परिवार का गुजारा बामुश्किल चल रहा था। ओम पुरी का परिवार जिस मकान में रहता था। उसके पास एक रेलवे यार्ड था। ओम पुरी को ट्रेनों से काफ़ी लगाव था। रात के वक्त वह अक्सर घर से निकलकर रेलवे यार्ड में जाकर किसी भी ट्रेन में सोने चले जाते थे। यही वह वक्त था, जब ओम पुरी सोचते थे कि में बड़ा होकर एक रेलवे ड्राइवर बनूंगा। बताया जाता है कि आेम के पिता शराब पीने के आदी थे, जिसकी वजह से उनकी माँ उन्हें लेकर पटियाला स्थित अपने मायके सन्नौर चली गई थीं।

अभिनय_में_रुचि

ओम पुरी ने अपने परिवार की समस्या व ज़रूरतों को पूरा करने के लिए एक ढाबे पर नौकरी भी की। कुछ समय बाद ढाबे के मालिक ने उन पर चोरी का आरोप लगाते हुए नौकरी से हटा दिया। फिर कुछ समय बाद ओम पुरी पंजाब के पटियाला में स्थित गांव सन्नौर में अपने ननिहाल चले आए। वहां प्रारंभिक शिक्षा पूरी की। इसी दौरान उनका रुझान अभिनय की ओर हो गया और वे सिनेमा जगत् के लिए जागरूक से होने लगे और धीरे-धीरे नाटकों में हिस्सा लेने लगे। फिर खालसा कॉलेज में दाखिला लिया। उसी दौरान ओम पुरी एक वकील के यहां मुंशी का काम भी करने लगे। अपने एक साक्षात्कार में ओम पुरी ने खुद खुलासा किया था कि- "शुरुआती दिनों में वे चंडीगढ़ में वकील के साथ मुंशी थे। एक बार चंडीगढ़ में उनके नाटक की परफॉर्मेंस थी, लेकिन वकील ने उन्हें तीन छुट्टी देने से मना कर दिया। इस पर ओम पुरी ने कहा- "अपनी नौकरी रख ले, मेरा हिसाब कर दे।" जब कॉलेज के लड़कों को पता चला कि मैंने नौकरी छोड़ दी तो उन्होंने प्रिंसिपल से बात की। इस पर प्रिंसिपल ने प्रोफेसर से कहा- "कॉलेज में कोई जगह है क्या।" इस पर उन्होंने कहा- "है एक लैब असिस्टेंट की, लेकिन ये आज का स्टूडेंट है, इसे क्या पता साइंस के बारे में।" प्रिंसिपल बोले- "कोई बात नहीं, लड़के अपने आप कह देंगे, नीली शीशी पकड़ा दे, पीली शीशी पकड़ा दे।" इस नौकरी के साथ ही ओम पुरी कॉलेज में हो रहे नाटकों में भी हिस्सा लेते रहे।

इसी समय उनकी मुलाकात हरपाल और नीना टिवाना से हुई, जिनके सहयोग से वह 'पंजाब कला मंच' नामक नाट्य संस्था से जुड़ गए। 'फ़िल्म एंड टेलिविजन इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडिया' से स्नातक के बाद ओम पुरी ने देश की राजधानी दिल्ली स्थित 'नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा' (एनएसडी) से अभिनय का कोर्स किया। यहीं पर उनकी मुलाकात नसीरुद्दीन शाह जैसे कलाकार से भी हुई। फिर अभिनेता बनने का सपना लेकर उन्होंने 1976 में 'पुणे फ़िल्म संस्थान' में दाखिला ले लिया।

विवाह

ओम पुरी का निजी जीवन कई बार विवादों के घेरे में आया। उन्होंने दो विवाह किये थे। उनकी पहली पत्नी का नाम 'सीमा' है, किंतु यह दाम्पत्य जीवन अधिक लम्बा नहीं चला और उनका तलाक हो गया। इसके बाद ओम पुरी ने नंदिता पुरी से विवाह किया। नंदिता और ओम पुरी एक पुत्र के माता-पिता भी बने। उनके पुत्र का नाम ईशान है।

फ़िल्मी_शुरुआत

'नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा' से अभिनय का औपचारिक प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद ओम पुरी ने हिन्दी फ़िल्मों की ओर रूख किया। वर्ष 1976 की फ़िल्म 'घासीराम कोतवाल' में वे पहली बार हिन्दी दर्शकों से रू-ब-रू हुए। 'घासीराम कोतवाल' की संवेदनशील भूमिका में अपनी अभिनय क्षमता का प्रभावी परिचय ओम पुरी ने दिया और धीरे-धीरे वे मुख्य धारा की फ़िल्मों से अलग समानांतर फ़िल्मों के सर्वाधिक लोकप्रिय अभिनेता के रूप में उभरने लगे।
आगे पढ़े https://t.me/baiografi/1245/3819
सफलता

वर्ष 1981 में ओम पुरी को फ़िल्म 'आक्रोश' मिली। 'आक्रोश' में उनके अभिनय की जमकर तारीफ़ हुई। इसके बाद फ़िल्मी दुनिया में उनकी गाड़ी चल निकली। 'भवनी भवई', 'स्पर्श', 'मंडी', 'आक्रोश' और 'शोध' जैसी फ़िल्मों में ओम पुरी के सधे हुए अभिनय का जादू दर्शकों के सिर चढ़कर बोला। किंतु उनके फ़िल्मी सफर में मील का पत्थर साबित हुई- 'अर्धसत्य'। 'अर्धसत्य' में युवा, जुझारू और आंदोलनकारी पुलिस ऑफिसर की भूमिका में वे बेहद जँचे।

धीरे-धीरे ओम पुरी समानांतर सिनेमा की एक बड़ी ज़रूरत बन गए। समानांतर सिनेमा जगत् में अपनी प्रभावी उपस्थिति दर्ज कराने के साथ-साथ ओम पुरी ने मुख्य धारा की फ़िल्मों का भी रूख किया। कभी नायक, कभी खलनायक तो कभी चरित्र अभिनेता और हास्य अभिनेता के रूप में वे हर दर्शक वर्ग से रू-ब-रू हुए और उनकी प्रशंसा के पात्र बने।

प्रसिद्ध_कलाकारों_के_साथ_कार्य

नसीरुद्दीन शाह और स्मिता पाटिल के साथ ओम पुरी ने 'भवनी भवई', 'अर्धसत्य', 'मिर्च मसाला' और 'धारावी' जैसी फ़िल्मों में काम किया।

अंतरराष्ट्रीय_पहचान

ओम पुरी हिन्दी फ़िल्मों के उन गिने-चुने अभिनेताओं की सूची में शामिल हैं, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी पहचान बनायी है। 'ईस्ट इज ईस्ट', 'सिटी ऑफ़ ज्वॉय', 'वुल्फ़', 'द घोस्ट एंड डार्कनेस' जैसी हॉलीवुड फ़िल्मों में भी उन्होंने अपने उम्दा अभिनय की छाप छोड़ी है। 'सैम एंड मी', 'सिटी ऑफ़ ज्वॉय' और 'चार्ली विल्सन वार' जैसी अंग्रेज़ी फ़िल्मों समेत उन्होंने लगभग 200 फ़िल्मों में काम किया। 'चार्ली विल्सन' में उन्होंने पाकिस्तान के राष्ट्रपति जिया उल हक की भूमिका निभाई थी। हाल के वर्षों में मकबूल और देव जैसी गंभीर फ़िल्मों में अभिनय करने वाले ओम पुरी अपने सशक्त अभिनय के साथ ही अपनी सशक्त आवाज़ के लिए भी जाने जाते हैं।

हास्य_भूमिकाएँ

जीवन के कई वसंत देख चुके ओम पुरी आज भी हिन्दी फ़िल्मों में अपनी सक्रिय उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। अंतर बस इतना है कि इन दिनों वे नायक या खलनायक नहीं, बल्कि चरित्र या हास्य अभिनेता के रूप में हिन्दी फ़िल्मों के दर्शकों को लुभा रहे हैं। 'चाची 420', 'हेरा फेरी', 'मेरे बाप पहले आप', 'चुपके-चुपके' और 'मालामाल वीकली' में ओम पुरी हँसती-गुदगुदाती भूमिकाओं में दिखे तो 'शूट ऑन साइट', 'महारथी', 'देव' और 'दबंग' में चरित्र अभिनेता के रूप में वे दर्शकों के सामने आये।

कहा जाता है कि ओम पुरी को पहली फ़िल्म के मेहनताने में मूंगफलियां मिली थीं। ओम पुरी के फ़िल्मी कॅरियर की शुरुआत 1976 में मराठी फ़िल्म 'घासीराम कोतवाल' से हुई थी। यह फ़िल्म विजय तेंडुलकर के मराठी नाटक पर आधारित थी। ओम पुरी का कहना था कि तब उन्हें अच्छे काम के लिए मूंगफलियां मिली थीं। ओम पुरी ने एक चरित्र अभिनेता के अलावा निगेटिव किरदार भी निभाए। उनकी कॉमिक टाइमिंग गजब की थी। उन्होंने 'जाने भी दो यारों' जैसी डार्क कॉमिडी से लेकर आज के जमाने की हंसोड़ फ़िल्मों में काम किया। हाल ही में उन्होंने हॉलिवुड एनिमेशन फ़िल्म 'जंगल बुक' में एक किरदार को अपनी आवाज़ भी दी थी। उनकी आखिरी कमर्शल फ़िल्म 'घायल वन्स अगेन' थी। उनकी मशहूर आर्ट फ़िल्मों में 'अर्ध सत्य', 'सद्गति', 'भवनी भवाई', 'मिर्च मसाला' और 'धारावी' आदि शामिल हैं। 'हेराफेरी', 'सिंह इज किंग', 'मेरे बाप पहले आप', 'बिल्लू' जैसी फ़िल्मों में उन्होंने दर्शकों को खूब हंसाया।

पुरस्कार_व_सम्मान

अपने लम्बे फ़िल्मी सफर में ओम पुरी ने सशक्त अभिनय से कई उपलब्धियाँ और पुरस्कार आदि प्राप्त किये हैं-

'फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार' - 1981 - सर्वश्रेष्ठ सह-अभिनेता (फ़िल्म 'आक्रोश')
'राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार' - 1982 - सर्वश्रेष्ठ अभिनेता (फ़िल्म 'आरोहण')
'राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार' - 1984 - सर्वश्रेष्ठ अभिनेता (फ़िल्म 'अर्धसत्य')
'पद्मश्री' - 1990
'फ़िल्म फ़ेयर लाइफ़टाइम अचीवमेंट अवार्ड' - 2009

मृत्यु

अपने बेजोड़ अभिनय से भारतीय सिनेमा में कभी न मिट सकने वाली पहचान बनाने वाले अभिनेता ओम पुरी का निधन 6 जनवरी, 2017 को अंधेरी, मुम्बई में हुआ।

बुधवार, 2 अगस्त 2023

जय देव

जय देव
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*Ş₳ŦเŞ𝓱👸🏻◣🍁💜⃝🇱♥︎2*

🎂जन्म : 03 अगस्त 1918, नैरोबी, केन्या
⚰️मृत्यु: 06 जनवरी 1987, मुम्बई
बहन: वेद कुमारी
इनाम: राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार - सर्वश्रेष्ठ म्यूज़िक डायरेक्शन
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जयदेव हिंदी फिल्मों में एक संगीतकार थे, जिन्हें फिल्मों में उनके काम के लिए जाना जाता था: हम दोनो, रेशमा और शेरा, प्रेम पर्वत, घरौंदा और गमन। उन्होंने रेशमा और शेरा, गमन और अनकही के लिए तीन बार सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशन के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीता।
जयदेव का जन्म नैरोबी में हुआ और उनका पालन-पोषण भारत के लुधियाना में हुआ। 1933 में, जब वह 15 वर्ष के थे, वह फिल्म स्टार बनने के लिए मुंबई भाग गये। वहां, उन्होंने वाडिया फिल्म कंपनी के लिए एक बाल कलाकार के रूप में आठ फिल्मों में अभिनय किया। प्रोफेसर बरकत राय ने उन्हें कम उम्र में ही लुधियाना में संगीत की शिक्षा दी थी। बाद में, जब वे मुंबई आये, तो उन्होंने कृष्णराव जावकर और जनार्दन जावकर से संगीत सीखा।

दुर्भाग्य से, अपने पिता के अंधेपन के कारण उन्हें अपना फ़िल्मी करियर अचानक छोड़ना पड़ा और लुधियाना लौटना पड़ा, जिसके कारण उनके परिवार की एकमात्र ज़िम्मेदारी उनके युवा कंधों पर आ गई।

अपने पिता की मृत्यु के बाद, जयदेव ने अपनी बहन वेद कुमारी की देखभाल की जिम्मेदारी ली और बाद में उनकी शादी सत-पॉल वर्मा से कर दी। उसके बाद 1943 में, वह संगीत उस्ताद अली अकबर खान के संरक्षण में अध्ययन करने के लिए लखनऊ चले गए ।
जयदेव का जन्म नैरोबी में हुआ और उनका पालन-पोषण भारत के लुधियाना में हुआ। 1933 में, जब वह 15 वर्ष के थे, वह फिल्म स्टार बनने के लिए मुंबई भाग गये। वहां, उन्होंने वाडिया फिल्म कंपनी के लिए एक बाल कलाकार के रूप में आठ फिल्मों में अभिनय किया। प्रोफेसर बरकत राय ने उन्हें कम उम्र में ही लुधियाना में संगीत की शिक्षा दी थी। बाद में, जब वे मुंबई आये, तो उन्होंने कृष्णराव जावकर और जनार्दन जावकर से संगीत सीखा।

दुर्भाग्य से, अपने पिता के अंधेपन के कारण उन्हें अपना फ़िल्मी करियर अचानक छोड़ना पड़ा और लुधियाना लौटना पड़ा, जिसके कारण उनके परिवार की एकमात्र ज़िम्मेदारी उनके युवा कंधों पर आ गई।

अपने पिता की मृत्यु के बाद, जयदेव ने अपनी बहन वेद कुमारी की देखभाल की जिम्मेदारी ली और बाद में उनकी शादी सत-पॉल वर्मा से कर दी। उसके बाद 1943 में, वह संगीत उस्ताद अली अकबर खान के संरक्षण में अध्ययन करने के लिए लखनऊ चले गए ।
जयदेव तीन राष्ट्रीय पुरस्कार पाने वाले पहले संगीत निर्देशक थे। अली अकबर खान ने 1951 में जयदेव को अपने संगीत सहायक के रूप में लिया, जब उन्होंने नवकेतन फिल्म्स की आंधियां (1952) और 'हम सफर' के लिए संगीत तैयार किया। फिल्म 'टैक्सी ड्राइवर' से वह संगीतकार एसडी बर्मन के सहायक बन गये ।

एक पूर्ण संगीत निर्देशक के रूप में उन्हें बड़ा ब्रेक चेतन आनंद की फिल्म जोरू का भाई से मिला , उसके बाद चेतन आनंद की अगली अंजलि , ये दोनों फिल्में बहुत लोकप्रिय हुईं।

हालाँकि नवकेतन की फिल्म हम दोनों (1961) से जयदेव सच में सुर्खियों में आए, "अल्लाह तेरो नाम", "अभी ना जाओ छोड़ कर", "मैं जिंदगी का साथ" और "कभी खुद पे कभी" जैसे क्लासिक गानों के साथ। हालात पे'' उनकी दूसरी बड़ी सफलता सुनील दत्त अभिनीत फिल्म मुझे जीने दो (1963) से मिली।

हालाँकि जयदेव की कई फ़िल्में बॉक्स ऑफिस पर असफल रहीं, लेकिन उनमें से कई, जैसे अलाप , किनारे किनारे और अनकही , को उनके कल्पनाशील संगीत स्कोर के लिए याद किया जाता है। जयदेव ने मुजफ्फर अली की फिल्म 'गमन' में सीने में जलन , रात भर आपकी याद आती रही और अजीब सनेहा मुझपर गुजर गया यारों जैसी अपनी गजलों और गानों से एक बार फिर प्रसिद्धि हासिल की । उन्होंने गमन में सुरेश वाडकर, ए हरिहरन और उनकी शिष्या छाया गांगुली जैसे कई नए गायकों को पेश किया ।

जयदेव में पारंपरिक और लोक संगीत को हिंदी फिल्म स्थितियों में मिश्रित करने की अद्वितीय क्षमता थी, जिससे उन्हें अपने समय के अन्य संगीत निर्देशकों से एक अद्वितीय लाभ मिला।

उन्हें हिंदी कवि हरिवंश राय बच्चन की क्लासिक कृति मधुशाला के दोहों के गैर-फिल्मी एल्बम के लिए भी जाना जाता है, जिसे गायक मन्ना डे ने संगीत दिया है और गाया है ।

वह सलिल चौधरी और मदन मोहन के अलावा लता मंगेशकर के पसंदीदा संगीतकारों में से एक हैं। उन्होंने नेपाली फिल्म मैतीघर के लिए भी संगीत तैयार किया।

जयदेव ने कभी शादी नहीं की. वह अपनी बहन के परिवार के करीब रहे जो बाद में यूनाइटेड किंगडम में बस गए। 6 जनवरी 1987 को 68 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।
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जोरू का भाई (1955)
समुंद्री डाकू (1956)
अंजलि (1957)
अर्पण (1957)
रात के राही (1959)
हम दोनों (1961)
किनारे किनारे (1963)
मुझे जीने दो (1963)
मैतीघर (नेपाली फिल्म) (1966)
हमारे गम से मत खेलो (1967)
जियो और जीने दो (1969)
सपना (1969)
आषाढ़ का एक दिन (1971)
दो बूंद पानी (1971)
एक थी रीता (1971)
रेशमा और शेरा (1971)
संपूर्ण देव दर्शन (1971)
आतिश उर्फ ​​दौलत का नशा (1972)
भावना (1972)
भारत दर्शन (1972)
मन जाइये (1972)
आलिंगन (1973)
आज़ादी पच्चीस बरस की (1973)
प्रेम पर्वत (1973)
फासला (1974)
परिणय (1974)
आंदोलन (1975)
एक हंस का जोड़ा (1975)
शादी कर लो (1975)
लैला मजनू (1976)
अलाप (1977)
घरौंदा (1977)
किस्सा कुर्सी का (1977)
वही बात उर्फ ​​समीरा (1977)
दूरियां (1978)
गमन (1978)
सोलवा सावन (1978)
तुम्हारे लिए (1978)
आई तेरी याद (1980)
एक गुनाह और सही (1980)
रामनगरी (1982)
एक नया इतिहास (1983)
अमर ज्योति (1984)
अनकही (1984)
जुम्बिश (1985)
त्रिकोण का चौथा कोण (1986)
खुन्नुस (1987)
चंद्र ग्रहण (1997)

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...