Ş₳ŦเŞ𝓱👸🏻◣🍁💜⃝🇱♥︎𝐕𝐄4♥️𝐘𝐎🕉️◣पिछला अध्याय5
✍️अध्याय 6
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गीता जी अध्याय 6 का पहला श्लोक ही नहीं सभी अध्याय ही संपूर्ण गीता के सार को ही बताते नजर आते है चलिए इस ज्ञान गंगा में अगली डुबकी लगा लेते है।
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*📚श्री गीता जी अध्याय 6 का पहला श्लोक*
✍️अध्याय 6 श्री गीता जी
इस अध्याय में श्रीकृष्ण ने कर्म योग (सांसारिक कर्तव्यों का पालन करते हुए आध्यात्मिकता का अभ्यास) और कर्म संन्यास (त्याग अवस्था में आध्यात्मिकता का अभ्यास) के बीच तुलनात्मक मूल्यांकन जारी रखा है। वे दोहराते हैं कि कर्म संन्यास की तुलना में कर्म योग अधिक व्यावहारिक मार्ग है।
✍️जो लोग अपने कर्मों के फल की इच्छा किए बिना निर्धारित कर्तव्यों का पालन करते हैं, वे ही वास्तविक संन्यासी और योगी हैं.
✍️मन को वश में करना कठिन है, लेकिन अभ्यास और विरक्ति से इसे नियंत्रित किया जा सकता है.
✍️मन जहां कहीं भी भटकने लगे, वहां से इसे वापस लाकर निरंतर भगवान में केंद्रित करना चाहिए.
✍️जब मन शुद्ध हो जाता है, तब यह अलौकिकता में स्थिर हो जाता है.
✍️त्याग का अर्थ कर्म का त्याग करना नहीं है, बल्कि उन बाधाओं का त्याग करना है जो उत्तम कर्म के मार्ग में आती हैं.
कर्म का मार्ग सक्रिय लोगों के लिए है और त्याग का मार्ग चिंतनशील लोगों के लिए है.
भौतिक या आध्यात्मिक प्रगति के लिए जीवन की गतिविधियों का संयम और नियमन आवश्यक है.
✍️योग दुःख से एकाकार होने का नाम है.
कर्म द्वाराआध्यात्मिक विकास की कसौटी(पैमान नापने का यंत्र) यह है कि आप दूसरों में स्वयं को और स्वयं में सभी प्राणियों को देख सकें.
भलाई करने वाले को कभी दुःख नहीं होता।
कर भला अंत भले का भला
भगवद गीता अध्याय: 6
श्लोक 1
श्लोक:
( कर्मयोग का विषय और योगारूढ़ पुरुष के लक्षण )
श्रीभगवानुवाच
अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः।
स सन्न्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः॥
भावार्थ:
श्री भगवान बोले- जो पुरुष कर्मफल का आश्रय न लेकर करने योग्य कर्म करता है, वह संन्यासी तथा योगी है और केवल अग्नि का त्याग करने वाला संन्यासी नहीं है तथा केवल क्रियाओं का त्याग करने वाला योगी नहीं है
॥1॥
(क्रिया को त्यागने वाला भी योगी नहीं ओर अग्नि का त्याग करने वाला सन्यासी नहीं का भाव यहां यह है कि निष्काम कर्म करने वाला ही संन्यासी और योगी होता है. सांसों को रोकने या छोड़ना तो स्वाभाविक रूप से हो ही रहा है अब श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो पुरुष कर्मफल का आश्रय न लेकर करने योग्य कर्म करता है, वह संन्यासी और योगी है)
क्यों कि कर्म प्रधान संसार है
जैसा यह लोक - वैसा ही है परलोक
जिस को यहां धक्के
वो वहां भी कैसे रुके
राग देवेश है यहां
वहां कोन सा नही
कोन है जो इन्द्र को नहीं जानता
भोग, विलास, शोक, सन्ताप,
इधर भी उधर भी
इधर का परिवार है सहार
वहां का
जिसका परिवार यहां नहीं
वहां क्या बनेगा
श्राद्ध तपर्ण,
मुक्ति करे गा क्या?
करे गा अच्छा कर्म हमारा
या पुत्र के किया श्राद्ध
अर्पण तर्पण
जीव की मुक्ती करेगा
यह शुभ कर्म
पुत्र ही कर पाता है
तो यह शुभ कर्म
केवल पुत्र का था
नहीं करे गा
तो गया जीव
अपने पित्रों सहित
नरकों मे गिरेगा
राग द्वेष चला जैसा यहां,
वहां भी वैसा ही चलेगा
इस लोक और प्रलोक में
केवल यही अन्तर है
प्रायशचित कर्म होता है यहाँ
वहां उसका का दरवाजा भी बन्द है।
उसका का दरवाजा भी बन्द है।
अब विचार करना बनता की कर्म ज्ञान से ओर प्रत्यक्ष ज्ञान से भी जान सके।
✍️कर्म चार प्रकार के होते हैं:
संचित कर्म, या संचित कर्म , आपके कुल कर्म को संदर्भित करता है, जिसमें पिछले जन्मों से प्राप्त कर्म भी शामिल हैं, जिनके बारे में हमें पूरी जानकारी है ही नहीं!
जब हम लोग कष्टों से घिर जाते है गुरु आज्ञा का अनुसरण करते हुए भी कष्ट पाते हैं।तब यही ज्ञान वान गुरुदेव कहते है यह पूर्व जन्मों के कर्मों का फल है।
हम सभी 100% इस से सहमत है। जब कि हम जानते ही नहीं कि वह पूर्व जन्मों के कौनसे कर्म से कष्ट हमें प्राप्त हो रहे है।.......
क्यों कि हम जानते है पूर्व जन्मों के शुभ कर्मों से ही हमें मनुष्य जन्म मिलता है जो 84 लाख योनियों में सब से श्रेष्ठ कहा गया है।यही मनुष्य योनि का द्वार ही "मोक्ष का द्वार कहलाता है"
पिछले जन्म में जहां हमारा कर्म योग टूटा था उसी को आगे पूरा करने के लिए पुनः हमें जन्म मिलता है। उसे इस जन्म में कर हम आगे बढ़ जाते है।
बाइबिल भी इस की पुष्टि करता है।
बाइबल के यूहन्ना 3:5 में, यीशु ने उत्तर दिया, "मैं तुम से सच सच कहता हूँ, यदि कोई जल और आत्मा से न जन्मे तो परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकता।
इधर हमारा सनातन धर्म भी84लाख योनियों में जन्म के बाद ही मनुष्य जन्म की बात करता है।
ध्यान रहे पता नहीं हम को कर्म की बात करते करते आत्मा को पवित्र शुद्ध करने के कर्म पर क्यों आना पड़ गया।
जैसे किसी के का जन्म पिछले जन्म के कर्मों के कारण ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य या शुद्र के चिकित्सक परिवार में हुआ था।
ओर संभव हो सकता हे कि शायद पिछले जन्म में, उसके मन में दूसरों को ठीक करने और उनकी मदद करने की गहरी इच्छा थी, या शायद उसके पास स्वास्थ्य और कल्याण से संबंधित अनसुलझे मुद्दे थे जिन्हें उसने अपने वर्तमान में आगे बढ़ाने को जन्म मिला। उसका का डॉक्टर बनने का झुकाव और क्षमता उसके संचित कर्मों से ही उपजी हुई है।इस कोआगे चल कर भगवान खुद ही स्पष्ट कर देते है।
✍️प्रारब्ध कर्म, या आवंटित कर्म आपके कुल संचित कर्मों में से कर्मों का एक चयन है जिसे आप अपने वर्तमान जीवनकाल में पूरा करते हैं। आपके आवंटित कर्म आपके सामने आने वाली परिस्थितियों और स्थितियों को आकार देते हैं। आप प्रत्येक जीवनकाल में अपने संचित कर्म का एक हिस्सा (अपने आवंटित कर्म) जीकर काम कर सकते हैं।
आगामी कर्म, या भविष्य में किए जाने वाले कर्म , से तात्पर्य आपके वर्तमान कार्यों और विकल्पों से उत्पन्न कर्म से है, जिनके परिणाम या तो इस जीवनकाल में या भविष्य के जीवनकाल में होते हैं।
क्रियमाण कर्म, या वर्तमान क्रियाशील कर्म , अधिक विशिष्ट रूप से आपके कार्यों के तात्कालिक या तत्काल परिणामों को संदर्भित करता है। यह आपके कार्यों और उनके तत्काल परिणामों के बीच कारण-और-प्रभाव संबंध पर जोर देता है।
यहां भी कल्पना का ही प्रयोग कर रहा हूं
संचित कर्मों का हमारा खुद का के विशाल भंडार है डाटा का पहाड बना हुआ है, जो शायद कभी भी किसी भी समय के वर्तमान जीवन में उसका एक निश्चित हिस्सा सक्रिय हो जाता हो , जो हमारी परिस्थितियों को प्रभावित करता हो, जैसे कि हम पैदा कहा हुए है , उस में भी पारिवारिक पृष्ठभूमि, के अनुसार हमारे सामने हमारी अधूरी छुटी जानकारी, शिक्षा और उसकी योग्यता, उसके सामने आने वाली खास चुनौतियाँ और अवसर। अपनी कड़ी मेहनत के बावजूद, उसे अपने करियर में नौकर शाही जैसी बाधाओं या अपने समुदायों में ही चुनौती पूर्ण परिस्थितियों में उत्पन अप्रत्याशित बाधाओं का सामना ही करना पड़ सकता है - इन सभी को उसके आवंटित कर्म की अभिव्यक्ति के रूप में देखा जा सकता है।
अब करने योग्य कर्म
करने योग्य कर्म वह है जो ज़रूरत और समय परिस्थिति के मुताबिक सोच-समझकर किया जाए. पर यहां भी ध्यान देने की जरूरत है फल की इच्छा से रहित होकर सिर्फ़ अपने कर्म को करना. कर्म योग करने से इंसान मानसिक, शारीरिक, आत्मिक, और आध्यात्मिक स्तर पर स्वस्थ रहता है. कर्म योग करने के बारे में कुछ और बातें भी हो सकती है सब के भाव काल परिस्थिति के जरूरत के अनुसार कर्म करने की नौबत भी आ ही जाती है देश में सात्विक भोजन उपलब्ध है पर विदेश में उपलब्ध नहीं हो तो शरीर पालन पोषण हेतु कुछ तो बदलाव जबरजस्ती भी आ ही जाते है आने वाले इस बाधा को स्वाभाविक कर्म का ही हिस्सा भी कह सकते हैं।जिस के कारण कुछ हम ब्राह्मण शाकाहारी कुछ मांसाहारी हो गये इसको भी भगवान आगे चल कर स्पष्ट करेंगे।इस प्रकार जान कर कर्म करने वाले कर्म वाले व्यक्ति को सच्चा कर्मयोगी कहा जाता है।
कर्म योग में ईश्वर का ध्यान ज़रूरी है
कर्म योग करने से इंसान अपने कर्मों और इंद्रियों को वश में भी कर सकता है
कर्म योग करने से इंसान सुख और दुख के चक्र से मुक्त ही रहता है
कर्म योग करने से इंसान अपने विकास की ओर तो बढ़ता ही है।
कर्म योग करने से इंसान अपने कर्मों से भी ज्ञान प्राप्त कर सकता है। जो सब का अपना अपना अनुभव होता है
कर्म योग करने से इंसान अपने जीवन-चक्र को रोक सकता है
कर्म योग करने से इंसान को श्रेष्ठ इंसान भी माना जाता है।
कर्म योग करने से इंसान उच्च योनि में जन्म ले सकता है।
कर्म योग करने से इंसान जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्त हो सकता है इन सभी बातों का जिक्र एक गीता में ही प्राप्त हो जाता है इसी लिए कहा है गीता पड़ो आगे बढ़ो
इन सब से अलग अब नित्य कर्म भी देखते हुए आगे बढ़ते है।
नित्य किए जाने वाले कर्मों में आवश्यक है सर्व प्रथम।
शौच आदि क्रिया के कर्म को पूरा करना।
जिसे यदि हम ना भी चाहे तो भी वो अविनाशी गुरु बलात हम से करवा ही लेता है।
यह वही है जिसने मां के गर्भ में हमारा साथ निभाया था।
सुना है जब गर्भ में पल रहा जीव उसके साथ था तो कहता था प्रभु मुझे इस नर्क से बाहर निकालो मैं जीवन भर तुम को तो नहीं भूलूं गा पर आगे क्या से क्या हो गया किसी से छिपा नहीं।
मै भगवान को नहीं मानता कुल पांच शब्द
मैं भगवान को मानता हूं इसमें भी पांच शब्द पर "भगवान" तो दोनो ही जबरदस्ती ही कह रहे है।
राम राम को जपना कितना भी कठिन क्यों ना हो सर्दियों में ठंडे पानी से नहाने पर बलात पूर्वक वह हमारे मुंह से निकलवा ही लेता है।
भगवद गीता अध्याय: 6
श्लोक 2
श्लोक:
यं सन्न्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव।
न ह्यसन्न्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन॥
भावार्थ:
हे अर्जुन! जिसको संन्यास (गीता अध्याय 3 श्लोक 3 की टिप्पणी में इसका खुलासा अर्थ लिखा है।) ऐसा कहते हैं, उसी को तू योग (गीता अध्याय 3 श्लोक 3 की टिप्पणी में इसका खुलासा अर्थ लिखा है।) जान क्योंकि संकल्पों का त्याग न करने वाला कोई भी पुरुष योगी नहीं होता
॥2॥
जो पुरुष अपने इंद्रियों को वश में करके आत्म-संयम में स्थित है, वही सच्चा व्रती है और वही सच्चा योगी है, न कि दूसरे जो बाहरी आडंबरों में फंसे रहते हैं.
व्याख्या:
इस श्लोक में, भगवान श्रीकृष्ण आत्म-संयम के महत्व को बता रहे हैं। वह कहते हैं कि जो व्यक्ति अपने इंद्रियों को वश में करके आत्म-संयम में स्थित है, वही सच्चा व्रती और सच्चा योगी है। यहाँ 'व्रत' का अर्थ है आत्म-नियंत्रण और 'योग' का अर्थ है आत्मा के साथ एकत्व।
भगवान श्रीकृष्ण यह भी कहते हैं कि बाहरी आडंबरों में फंसने से कोई सच्चा योगी नहीं बन सकता। इसका अर्थ है कि केवल बाहरी गतिविधियों और रीति-रिवाजों को करने से कोई आत्म-संयम और आत्म-ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता। इसके लिए आत्म-नियंत्रण और आत्म-विचार की आवश्यकता होती है।
अब
(गीता के अध्याय 3 के श्लोक 3 का मूल श्लोक और भावार्थ सहित व्याख्या पर आते है:)
मूल श्लोक:
यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते आत्मकर्मसु
असंशयं सम्प्रमुक्तो येन न स सिद्धिमाप्नोति
भावार्थ:
जो पुरुष शास्त्रों के विधान को त्यागकर अपने इच्छानुसार कार्य करता है, वह निश्चित रूप से सिद्धि प्राप्त नहीं कर सकता है.
व्याख्या:
इस श्लोक में, भगवान श्रीकृष्ण यह बता रहे हैं कि जो व्यक्ति शास्त्रों के निर्देशों को नकारकर अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करता है,
जैसे विवाह का महूर्त फिक्स समय होता है और बाराती शराब पी कर सड़कों पर भांगड़ा डाल रहे होते है, या दुल्हन ब्यूटी पार्लर में ही होती है और मुहूर्त निकल जाता है।
वह आत्म-सिद्धि या मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकता। यहाँ 'शास्त्र' का अर्थ है धार्मिक ग्रंथ और 'विधान' का अर्थ है निर्देश या नियम से है.
भगवान श्रीकृष्ण यह भी बता रहे हैं कि शास्त्रों के निर्देशों का पालन करना आवश्यक है, क्योंकि वे हमें सही मार्ग दिखाते हैं और हमें आत्म-सिद्धि की ओर ले जाते हैं। जो व्यक्ति इन निर्देशों को नकारता है, वह अपने जीवन को सही दिशा में नहीं ले जा सकता और इसलिए वह सिद्धि प्राप्त नहीं कर सकता।
आजकल तो ब्राह्मण से ही लोग कहते देखे जाते है पंडित जी आप गलत मंत्र या विधि कर रहे हैं ।अरे भाई अगर तुम जानते हो तो खुद ही विवाह करवा लेते पंडित ,ब्राह्मण को बुलाने की जरूरत ही क्या थी?ऐसे लोग भी ब्राह्मण की गलती का दोष कर्मफल खुद पा जाते है शास्त्र विरुद्ध चलकर कुछ तो शॉट कट मारने की भी पंडित जी को सलाह देते है।
जो धर्म के निर्देश या नियम से हट कर करते करवाते है.
संकल्प का कोई विकल्प नहीं होता पर भगवान तो कह रहे है।संकल्पों का त्याग ना करने वाला कोई भी पुरुष योगी नहीं होता।
संकल्प शब्द का मतलब है, मन में उत्पन्न होने वाली कार्य करने की इच्छा या विचार. दान, पुण्य, या कोई और देवकार्य शुरू करने से पहले, निश्चित मंत्र का उच्चारण करते हुए अपना दृढ़ निश्चय या विचार प्रकट करना भी संकल्प कहलाता है.
अब दान पुन के लिए किसी मंत्र या महूर्त को त्याग कर कर्म करने वाला ही सच्चा योगी है क्यों कि मारने वाले व्यक्ति से अगर दान पुण्य करवाने के चक्कर में मुहूर्त का इंतजार करते करते पहले ही निकल गया तो होगया दान पुन।इसलिए
भगवद् गीता के मुताबिक, संकल्पों का त्याग न करने वाला कोई भी पुरुष योगी नहीं होता, इसका मतलब है कि योगी बनने के लिए संकल्पों का त्याग करना ज़रूरी है. गीता के मुताबिक, जो मनुष्य कर्मफल पर आश्रित न होकर निष्काम कर्म करता है, वही संन्यासी और योगी होता है.
गीता के मुताबिक, कर्मों से संन्यास लेने या उनका परित्याग करने की अपेक्षा कर्मयोग ज़्यादा श्रेयस्कर है. कर्म करना मनुष्य के लिए ज़रूरी है और उसके बिना शरीर का निर्वाह भी संभव नहीं है।
अभी शुरू करते हैं अध्याय 6 का श्लोक 4
भगवद गीता अध्याय: 6
श्लोक 4
श्लोक:
यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते।
सर्वसङ्कल्पसन्न्यासी योगारूढ़स्तदोच्यते॥
भावार्थ:
जिस काल में न तो इन्द्रियों के भोगों में और न कर्मों में ही आसक्त होता है, उस काल में सर्वसंकल्पों का त्यागी पुरुष योगारूढ़ कहा जाता है
॥4॥
साधक कब योगारूढ़ हो जाता है अब बताता है चित्त का समाधान कर लेने वाला योगी जब इंद्रियोंके अर्थों में अर्थात् इंद्रियोंके विषय जो शब्दादि हैं वे एवं नित्य नैमित्तिक काम्य और दृढ़ कर्मों में अपने कुछ भी प्रस्ताव न देखकर असक्त नहीं होते उनमें आशक्ति अर्थात ये होती है मुझे ऐसा करने की अनुमति नहीं है। तब उस समय वह सब संकल्पों का त्याग करता है अर्थात इस लोक और लोक के भोगों की कामना के कारण सभी संकल्पों का त्याग करना जिसका स्वभाव हो गया है ऐसा पुरुष योगारूढ़ अर्थात योग को प्राप्त हो गया है ऐसा कहा जाता है। सर्वसंकल्पसंन्यासी इस कथन का उद्देश्य यह है कि सभी कामनाओं को और सभी कर्मों को पितृत्व छोड़ दें। क्योंकि सबकी इच्छा मूल संकल्प ही है। स्मृति में यह भी कहा गया है कि काम का मूल कारण संकल्प ही है। समस्त यज्ञ संकल्पों से उत्पन्न होते हैं। हे काम मैं तेरा मूल कारण जानता हूँ। तू निःसंदेह संकल्प से ही उत्पन्न होता है। मैं तेरा संकल्प नहीं, बल्कि फिर तू मुझे प्राप्त नहीं करेगा। सभी कामनाओं के परित्याग से ही सर्व कर्मों का त्याग सिद्ध हो जाता है। यह बात उसने जैसी चाही थी वैसी ही स्थिति वाली होती है जैसी स्थिति वाली होती है वैसी ही कर्म करती है अन्य श्रुतिसे प्रमाणित है और जीव जो जो कर्म करता है वह सब काम करता है वही चेष्टा है। अन्य स्मृतियों से भी प्रमाणित है। युक्तिसे से भी यही बात सिद्ध होती है क्योंकि सभी संकल्पों का त्याग कर दें तो कोई जरासा हिल भी नहीं सकता। सुतरां सर्वसंकल्पसंन्यासी भगवान सभी की कामना करते हैं और सभी कर्मोंका त्याग करते हैं।
भगवद गीता अध्याय: 6
श्लोक 5
श्लोक:
( आत्म-उद्धार के लिए प्रेरणा और भगवत्प्राप्त पुरुष के लक्षण )
उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥
भावार्थ:
अपने द्वारा अपना संसार-समुद्र से उद्धार करे और अपने को अधोगति में न डाले क्योंकि यह मनुष्य आप ही तो अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है
॥5॥
व्याख्या:
जब मनुष्य इस प्रकार योगारूढ़
(आरूढ़ शब्द के कई अर्थ होते हैं:
चढ़ा हुआ, सवारा,
दृढ़, मजबूती से मान लेना की गुरु बिन ज्ञान नहीं
स्थिर, टस से मस ना होना
पदस्थ, किसी पद पर होना जैसे वो गुरु, जिस को भगवान नहीं बनाते हम लोग पदवी दे देते है।
और आसानी से समझे D.C को सरकार बनाती है तो उस के हाथ में कुछ शक्तियां आ जाती हैं जिसको हम लोग .D.C बनाते हैं क्या उसके पास वो शक्तियां होती है? नहीं ना आसीन.बैठा हुआ।या पद पर नियुक्त क्या हुआ इसको तो पहचानने का ज्ञान सभी के पास होता ही है
चलिए अब चढ़ना और सवार होना को प्रत्यक्ष ज्ञान से देखते है।तब समझना और आसान हो जाए गा।
अपनी सवारी पर बैठने पर भी कुछ नियमों का पालन करना होता ही होता है। गर्दन बाहर ना निकालना, हाथ बाहर ना निकालना ।
बस पर सवार का भी नियम होता है हाथ देने पर रुक जाती है।आग्रह कर के आप नीचे भी उतर कर लघु शंका से निर्वित हो पुनः आकर बैठ सकते है।
रेल, और प्लेन सभी के नियम अलग अलग होते है।प्लेन में बैठ आप बस वाले नियम तो लागू कर नहीं सकते क्यों कि यह अकेले आप को ही नहीं दूसरों को भी नुकसान देने वाला बन जाता है। योगारूढ़ हो जाने पर उस योगारूढ़ पुरुष का जो सर्वसंकल्पों का अभाव हो जाता है, उसी को भगवान कल्याण हेतु कह रहे है मेरी समझ में यही आता है।)
हो जाता है तब वह अनर्थोंके समूह इस संसारसमुद्रसे स्वयं को अपना लक्ष्य बना लेता है इसलिए संसारसागरमें डूबे पड़े हुए अपने आप को उस संसारसमुद्रसे आत्मबलके द्वारा ऊंचा उठा लिया जाता है अर्थात योगारूढ़ राज्य को प्राप्त कर लिया जाता है। अपना अधपतन नहीं देना चाहता मतलब अपनी आत्मा को नीचे नहीं गिरा देना चाहता। क्योंकि यह आप ही अपना बंधू है। दूसरा कोई (ऐसा) बंधू नहीं है जो दुनिया से मुक्त होनेवाला हो। प्रेमादि भाव बंधनके स्थान होने के कारण मोक्षमार्गका भी (वास्तव में) मोक्षमार्गका तो विरोधी ही होता है। इसलिए निश्चय यह कहना ठीक है कि आप ही अपना बंधू है। और आप ही अपना शत्रु है। जो कोई दूसरा अनिष्ट करने वाला शत्रु है वह भी अपना ही बनाया होता है इसलिए आप ही अपना शत्रु है इस प्रकार केवल अपने को ही शत्रु बतलाना भी ठीक है।
भगवद गीता अध्याय: 6
श्लोक 4
श्लोक:
यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते।
सर्वसङ्कल्पसन्न्यासी योगारूढ़स्तदोच्यते॥
*भावार्थ:*
*जिस काल में न तो इन्द्रियों के भोगों में और न कर्मों में ही आसक्त होता है, उस काल में सर्वसंकल्पों का त्यागी पुरुष योगारूढ़ कहा जाता है*
॥4॥
*व्याख्या:*
*"जिसने अपने आप पर विजय प्राप्त की है, वह अपने में ही स्थित है।"*
*इसका अर्थ है कि जिसने अपने मन, बुद्धि, और शरीर पर नियंत्रण पा लिया है, वह वास्तव में अपने आप में स्थित है। वह अपनी आवश्यकताओं और विचारों को नियंत्रित कर सकता है और अपने आप में शांति और स्थिरता प्राप्त कर सकता है।*
*"अपने आप को जीतने के लिए, आपको अपने आप पर विश्वास करना होगा और अपनी आवश्यकताओं को नियंत्रित करना होगा।"*
*जीसका अर्थ है कि अपने आप को जीतने के लिए, आपको अपने आप पर विश्वास करना होगा और अपनी आवश्यकताओं को नियंत्रित करना होगा। आपको अपने मन और बुद्धि को नियंत्रित करना होगा और अपने आप में शांति और स्थिरता प्राप्त करनी होगी।*
*"जो आपके लिए आवश्यक नहीं है, वह आपका शत्रु है।"*
*इसका भाव है कि जो आपके लिए आवश्यक नहीं है, वह आपका शत्रु है। आपको अपने आप से जुड़ी चीजों को पहचानना होगा और उन्हें नियंत्रित करना होगा, ताकि आप अपने आप में शांति और स्थिरता प्राप्त कर सकें।*
भगवद गीता अध्याय: 6
श्लोक 5
श्लोक:
( आत्म-उद्धार के लिए प्रेरणा और भगवत्प्राप्त पुरुष के लक्षण )
उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥
भावार्थ:
अपने द्वारा अपना संसार-समुद्र से उद्धार करे और अपने को अधोगति में न डाले क्योंकि यह मनुष्य आप ही तो अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है
॥5॥
व्याख्या:
जब मनुष्य इस प्रकार योगारूढ़ हो जाता है तब वह अनर्थोंके समूह इस संसार समुद्र से स्वयं को अपना लक्ष्य बना लेता है इसलिए संसारसागरमें डूबे पड़े हुए अपने आप को उस संसार समुद्र से आत्मबल के द्वारा ऊंचा उठा लिया जाता है अर्थात योगारूढ़ राज्य को प्राप्त कर लिया जाता है। अपना अधपतन नहीं देना चाहता मतलब अपनी आत्मा को नीचे नहीं गिरा देना चाहता। क्योंकि यह आप ही अपना बंधू है। दूसरा कोई (ऐसा) बंधू नहीं है जो दुनिया से मुक्त होनेवाला हो। प्रेमादि भाव बंधन के स्थान होने के कारण मोक्षमार्गका भी (वास्तव में) मोक्षमार्गका तो विरोधी ही होता है। इसलिए निश्चय यह कहना ठीक है कि आप ही अपना बंधू है। और आप ही अपना शत्रु है। जो कोई दूसरा अनिष्ट करने वाला शत्रु है वह भी अपना ही बनाया होता है इसलिए आप ही अपना शत्रु है इस प्रकार केवल अपने को ही शत्रु बतलाना भी ठीक है।
गीता के उपदेश का सारांश:
गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने बताया है कि मनुष्य को अपने आप पर विजय प्राप्त करनी होगी, तभी वह अपने जीवन को सफल बना सकता है।
आत्म-निरीक्षण और स्वयं को जानने के लिए आवश्यक है कि हम अपने दोषों को स्वीकार करें और उन्हें दूर करने का प्रयास करें।
हमारा मन ही हमारा सबसे बड़ा शत्रु हो सकता है, लेकिन हमारी बुद्धि इसको नियंत्रित कर सकती है।
चैतन्य आत्मा हमेशा उपलब्ध है, लेकिन हमें इसको पहचानने के लिए अपने आप पर काम करना होगा।
हम स्वयं ही अपने मित्र और शत्रु हो सकते हैं, इसलिए हमें अपने विचारों और कार्यों पर ध्यान देना होगा।
गीता के उपदेश का मुख्य उद्देश्य है कि हम अपने आप को जानें और अपने जीवन को सफल बनाएं।
6॥5॥
भगवद गीता अध्याय: 6
श्लोक 6
श्लोक:
बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः।
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्॥
भावार्थ:
जिस जीवात्मा द्वारा मन और इन्द्रियों सहित शरीर जीता हुआ है, उस जीवात्मा का तो वह आप ही मित्र है और जिसके द्वारा मन तथा इन्द्रियों सहित शरीर नहीं जीता गया है, उसके लिए वह आप ही शत्रु के सदृश शत्रुता में बर्तता है
6॥6॥
आपके मित्र का कहना है कि जो स्वयंमेव कार्यकरने के लिए सामुदायिक शरीररूप आत्मा को अपने वश में कर लेता है अर्थात जो चेतन्य हो। जिसने (कार्यकर्ता संघात) शरीररूप आत्मा को अपने वश में नहीं किया वह अपने शत्रु की भाँति शत्रु भाव में बर्ताता है। यानी जैसे दूसरा शत्रु अपना अनिष्ट करने वाला होता है वैसे ही वह आप ही अपना अनिष्ट करने में लगा रहता है।
6॥6॥
जिस मात्रा में जीव शरीर मन और बुद्धि से तादात्म्य को त्यागता है उस मात्रा में वह आत्मा के दिव्य प्रभाव से प्रभावित होता है। तब आत्मा उसकी मित्र है। जिस मन में बहिर्मुखी प्रवृत्तियों की दृष्टि से वह मनुष्य की मित्र या शत्रु है। और यदि आत्मा शब्द का अर्थ मन करे तो अर्थ होगा कि संयमित मन मनुष्य का मित्र है और धर्माचारी उसका शत्रु है। यह श्लोक पूर्व श्लोक का अर्थ अधिक स्पष्ट करता है। अगले श्लोक में योगरूढ़ मनुष्य की स्थिति बताई गई है।
।।6.6।।
भगवद गीता अध्याय: 6
श्लोक 7
श्लोक:
जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः।
शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः॥
भावार्थ:
सरदी-गरमी और सुख-दुःखादि में तथा मान और अपमान में जिसके अन्तःकरण की वृत्तियाँ भलीभाँति शांत हैं, ऐसे स्वाधीन आत्मावाले पुरुष के ज्ञान में सच्चिदानन्दघन परमात्मा सम्यक् प्रकार से स्थित है अर्थात उसके ज्ञान में परमात्मा के सिवा अन्य कुछ है ही नहीं
॥7॥
जब योगारूढ़ पुरुष आत्मचिन्तन में स्थित हो जाता है तब उसमें वह क्षमताएं उत्पन्न हो जाती है जिससे वह जीवन की अनुकूलता और विपरीत परिस्थितयों में ध्यानाभ्यास की सामीप्यता बनाए रख सकता है। यहाँ दूसरी पंक्ति में स्पष्ट विवरण है कि बाहरी जगत में कोई ऐसा सात्त्विकता नहीं रह जाती जो उसे आत्मध्यान से अलग कर सके। समता और शांति को भंग करने में समर्थ होते हैं। शीतलता का अनुभव स्थिर शरीर के स्तर पर होता है। ठंडा या उष्ण में हमारे मन के विचार पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। वे शीत में न आकृतिते हैं और न कांपते हैं एक ही प्रकार के उष्णता से न वे अधिक व्यापक होते हैं और न उनमें स्वेदित आता है ये सभी लक्षण शरीर में ही प्रकट होते हैं और इसलिए शीतोष्ण इस द्वंद्व के द्वारा सभी अनुभव बताए गए हैं जो शरीर में हैं ऐसे होते हैं जैसे रोग युवा अवस्था वृद्धावस्था आदि। सुखदुख मन के स्तर पर प्राप्त होने वाले सभी सुखों को सुखदुख द्वन्द्व से आरंभिक रूप दिया गया है। स्पष्ट है कि इसका अनुभव मन को होता है शरीर को नहीं। प्रेम और घृणा और मित्रता, करुणा और मित्रता, ऐसे ही अनेक प्रकार की भावनाएँ मन में उठती रहती हैं, जो मनुष्य को आरोपित कर देती हैं, यहाँ किसी भी तरह से यह सामर्थ्य नहीं है कि वह शशकप्रिय संयमित पुरुष को किसी प्रकार की हानि पहुँचा सके। क्योंकि यदि किसी साधक का विक्षेप होता है तो उसकी प्रति सहानुभूति की कोई आवश्यकता नहीं है। मनअपमान की काल्पनिक बुद्धि की होती है और फिर मनुष्य अपनी कल्पना के अनुसार प्राप्त एलसीडी में प्रतिक्रिया व्यक्त करता है। शरीर मन और बुद्धि ये तीन डिग्रीयां लोक द्वारा प्रयोगशाला द्वंद्वरूप विघ्न की संभावनाएं बनी रहती हैं। भगवान कहते हैं कि प्रशांत चित्त वाले मंदिर वाले भगवान के लिए भगवान सदा ही आत्मभाव से उदय रहते हैं। इन रेनॉल्डो का उस पर कुछ भी प्रभाव नहीं। अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थितियाँ अच्छा या बुरा वातावरण हो या मूर्ख या बुद्धि का साथ हो आत्मज्ञानी पुरुष सदा प्रशांत और समभाव में स्थित रहता है।
भगवद गीता अध्याय: 6
श्लोक 8
श्लोक:
ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः।
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकांचनः॥
भावार्थ:
जिसका अन्तःकरण ज्ञान-विज्ञान से तृप्त है, जिसकी स्थिति विकाररहित है, जिसकी इन्द्रियाँ भलीभाँति जीती हुई हैं और जिसके लिए मिट्टी, पत्थर और सुवर्ण समान हैं, वह योगी युक्त अर्थात भगवत्प्राप्त है, ऐसे कहा जाता है
॥8॥
यहाँ इसकी सरल भाषा में व्याख्या
"जो व्यक्ति शास्त्रों के अनुसार आत्म-ध्यान करता है, वह आत्मसंयमी और अद्भुत पूर्णयोगी बन जाता है और दिव्य तृप्ति और आनंद का अनुभव करता है।"
इसका अर्थ है कि:
- आत्म-ध्यान से व्यक्ति अपने आप को जान सकता है।
जितना मैं या आप खुद को जान सकते हैं। उतना तो हम दोनों भी एक दूसरे को नहीं जान सकते।
इस कारण से भी वह अपने विचारों और कार्यों पर नियंत्रण पा सकता है।
इससे वह दिव्य तृप्ति और आनंद का अनुभव कर पाता है।
यह तृप्ति शास्त्रों के ज्ञान से कहीं अधिक उत्कृष्ट है।
इसके अलावा, यह भी कहा गया है:
कूटस्थ वेदांत में आत्मा को निहाई कहा गया है, जिसका अर्थ है अविचलित।
जिसका भाव है कि आत्मा अपने आप में स्थिर रहता है, जैसे निहाई पर रखा लोहखंड।
इससे वह समदर्शी बन जाता है और सभी वस्तुओं को समान भाव से देखता है।
ज्ञान का मापदण्ड यही है कि व्यक्ति प्रिय अप्रिय की प्राप्ति या हानि में सुखी या दुःखी नहीं होता।
परमपूर्ण स्वरूप में स्थित पुरुष के लिए मिट्टी पाषाण और स्वर्ण का कोई अर्थ ही नहीं रह जाता है।
6 ॥8॥
भगवद गीता अध्याय: 6
श्लोक 9
श्लोक:
सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु।
साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते॥
भावार्थ:
सुहृद् (स्वार्थ रहित सबका हित करने वाला), मित्र, वैरी, उदासीन (पक्षपातरहित), मध्यस्थ (दोनों ओर की भलाई चाहने वाला), द्वेष्य और बन्धुगणों में, धर्मात्माओं में और पापियों में भी समान भाव रखने वाला अत्यन्त श्रेष्ठ है
॥9॥
व्याख्या:
6.।।9।। जो पुरुष सुहृद, मित्र, शत्रु, नाथ, मध्यस्थ, द्वेषी और बंधुओं में तथा धर्मात्माओं और पापियों में भी समान भाव वाला है, वह श्रेष्ठ है।
भावार्थ:
सरल व्याख्या:
"जो व्यक्ति अपने मित्र, शत्रु, परिवार, धर्मात्माओं और पापियों के प्रति समान भाव रखता है, वह सबसे श्रेष्ठ है।"
प्रत्यक्ष ज्ञान:
इस श्लोक का अर्थ है कि:
हमें अपने मित्रों और शत्रुओं के प्रति समान भाव रखना चाहिए हमें अपने परिवार और अन्य लोगों के प्रति भी समान भाव रखना चाहिए।
हमें धर्मात्माओं और पापियों के प्रति भी समान भाव रखना चाहिए।इससे हमारा मन शांत और स्थिर रहता है।इससे हम अपने जीवन में शांति और संतुष्टि प्राप्त कर सकते हैं।यही सबसे श्रेष्ठ जीवन का मार्ग है।
उदाहरण:
जब हम अपने मित्र की सफलता पर खुश होते हैं, पर हमें तो अपने शत्रु की असफलता पर भी खुश नहीं होना चाहिए।
हमें अपने परिवार के प्रति प्यार और सम्मान तो रखना ही चाहिए, लेकिन अन्य लोगों के प्रति भी समान भाव रखना चाहिए।
हमें उन धर्मात्माओं का सम्मान करना चाहिए, जो सच को सच कहने से भी भयभीत नहीं होते लेकिन पापियों के प्रति भी दया और करुणा रख ते है।
6॥9॥
भगवद गीता अध्याय: 6
श्लोक 10
श्लोक:
योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः।
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः॥
भावार्थ:
मन और इन्द्रियों सहित शरीर को वश में रखने वाला, आशारहित और संग्रहरहित योगी अकेला ही एकांत स्थान में स्थित होकर आत्मा को निरंतर परमात्मा में लगाए
॥10॥
6.10।। महाभारत में स्पष्ट कहा गया है कि श्रीकृष्ण सर्वज्ञ ईश्वर के अवतार थे इसीलिए उन्हें श्रीकृष्ण परमात्मा कहा गया है। वे यहाँ अर्जुन को आत्मोन्नति के साधन का उपदेश दे रहे हैं। अर्जुन उनका परम मित्र था। स्वयं भगवान् की मित्रता प्राप्त होने पर भी महाभारत में किसी भी स्थान पर यह नहीं कहा गया है कि अर्जुन को स्वयं संघर्ष किये बिना आत्मविकास की प्राप्ति के लिए भगवान् कोई गुप्त साधन बतलायेंगे जिसका सम्पूर्ण उत्तरदायित्व श्रीकृष्ण के ऊपर होगा। इस श्लोक की प्रथम पंक्ति ही किसी ऐसी मिथ्या आशा को साधक के मन से दूर कर देती है। यहाँ स्पष्ट कहा गया है कि योगी को निरन्तर मन को आत्मा में स्थिर करने का प्रयत्न करना चाहिए। ध्यानाभ्यास के द्वारा ही मनुष्य अपने दोषों से मुक्त होकर पूर्णत्व को प्राप्त हो सकता है।ध्यानविधि की विस्तृत जानकारी यहाँ दी गयी है। ध्यान का अभ्यास एकांत में करने को कहा गया हैं। कुछ समय पहले भारत में एकान्त शब्द पर इतना अधिक बल दिया गया कि ध्यान शब्द से ही लोगों के मन में उसके प्रति एक प्रकार का भय व्याप्त हो गया। एकान्त का अर्थ केवल जंगल या गुफा नहीं वरन् बाह्य विषयों से मन को विमुख करना है। अपने ही घर में शान्त समय में एक आसन में बैठकर ध्यान का अभ्यास किया जा सकता है।वास्तविक एकान्त तो तभी प्राप्त होगा जब मन की विषयाभिमुखी प्रवृत्ति क्षीण होगी। मन इच्छाओं से परिपूर्ण होने पर निर्जन वन अथवा गुफा में जाने से भी मनुष्य विषयों का ही चिन्तन करता रहेगा और उसे एकान्त की प्राप्ति नहीं होगी। रहसि अर्थात् एकान्त इस शब्द के द्वारा यह सूचित करते हैं कि धर्म आत्म प्रचार का कोई साधन नहीं वरन् जीवन में उच्च मूल्यों को जीने का सतत् प्रयत्न है जिनका गोपन शैली में अभ्यास करना चाहिए। साधक को चाहिए कि वह पूरी लगन से विचारों को सही दिशा प्रदान कर लक्ष्य की ओर अग्रसर होने का प्रयत्न करे।दैनिक जीवन में ध्यानाभ्यास की सफलता साधक के आत्मसंयम पर निर्भर करती है। जब तक हम वस्तुओं की प्राप्ति की आशा तथा वस्तुओं का संग्रह (परिग्रह) करने की प्रवृत्ति से स्वयं को मुक्त करना नहीं सीखते तब तक वास्तविक अर्थ में आत्मसंयम संभव नहीं होता। अत साधक को निराशी अर्थात् झूठी आशाओं से रहित तथा अपरिग्रह होना चाहिए।उक्त गुणों से युक्त होकर जो साधक ध्यान का अभ्यास करता है वह जीवन के सर्वोच्च लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सही दिशा में आगे बढ़ता है।अब योगाभ्यास करने वाले साधक के लिए उपयोगी आसन आहार विहार आदि के नियम बताते हैं। सर्वप्रथम आसन का वर्णन करते हैं।
❤️सरल भाव में:
श्रीकृष्ण अर्जुन को आत्मोन्नति के साधन का उपदेश दे रहे हैं। वे कहते हैं:
- साधक को अपने मन को आत्मा में स्थिर करने का प्रयत्न करना चाहिए।
- ध्यानाभ्यास से ही मनुष्य अपने दोषों से मुक्त होकर पूर्णत्व को प्राप्त हो सकता है।
- ध्यान एकांत में करना चाहिए, जिसका अर्थ है बाह्य विषयों से मन को विमुख करना।
- अपने घर में शांत समय में एक आसन में बैठकर ध्यान का अभ्यास किया जा सकता है।
- वास्तविक एकान्त तो तब प्राप्त होगा जब मन की विषयाभिमुखी प्रवृत्ति क्षीण होगी।
- साधक को अपरिग्रह और निराशी होना चाहिए, अर्थात् झूठी आशाओं से रहित और वस्तुओं के संग्रह से मुक्त।
- उक्त गुणों से युक्त होकर साधक ध्यान का अभ्यास कर जीवन के सर्वोच्च लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है।
विशेष बात
अर्जुन पहले भी युद्धके लिये तैयार थे और अन्तमें भी उन्होंने युद्ध किया। केवल बीचमें वे युद्धको पाप समझने लगे थे तो भगवान्के समझा देनेसे उन्होंने युद्ध करना स्वीकार किया। इस तरह प्रसङ्ग कर्मोंका होनेसे गीतामें कर्मयोगका विषय आना तो ठीक ही था, पर इसमें ज्ञानयोग, भक्तियोग आदि कई पारमार्थिक साधनोंका वर्णन कैसे आया है? उनमें भी यहाँ ध्यानयोगका वर्णन आया जिसमें केवल एकान्में बैठकर ध्यान लगाना पड़ता है। यह प्रसङ्ग ही यहाँ क्यों आया?
अर्जुन पापके भयसे युद्धसे उपरत होते हैं, तो उनके भीतर कल्याणकी इच्छा जाग्रत् होती है। अतः वे भगवान्से प्रार्थना करते हैं कि जिससे मेरा निश्चित श्रेय (कल्याण) हो वह बात आप कहिये (2। 7 3। 2 5। 1)। इसपर भगवान्को श्रेय करनेवाले जितने मार्ग हैं, वे सब बताने पड़े। उनमें दान, यज्ञ, तप, वेदाध्ययन, प्राणायाम, ध्यानयोग, हठयोग, लययोग आदिको कहना भी कर्तव्य हो जाता है। इसलिये भगवान्ने गीतामें कल्याणकारक साधन बताये हैं। उन सब साधनोंमें भगवान्ने यह बात बतायी कि उत्पत्ति-विनाशशील वस्तुओंका जो लक्ष्य है, वही खास बन्धनकारक है। अगर साधकका लक्ष्य केवल परमात्माका है, तो फिर उसके सामने कोई भी कर्तव्य-कर्म आ जाय, उसको समभावसे करना चाहिये। समभावसे किये गये सब-के-सब कर्तव्य-कर्म कल्याण करनेवाले होते हैं।
सम्बन्ध--पूर्वश्लोकमें भगवान्ने ध्यानयोगके लिये प्रेरणा की। ध्यानयोगका साधन कैसे करे--इसके लिये अब आगेके तीन श्लोकोंमें ध्यानयोगकी उपयोगी बातें बताते हैं।
6.10।।
भगवद गीता अध्याय: 6
श्लोक 11
श्लोक:
( विस्तार से ध्यान योग का विषय )
शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः।
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम्॥
भावार्थ:
शुद्ध भूमि में, जिसके ऊपर क्रमशः कुशा, मृगछाला और वस्त्र बिछे हैं, जो न बहुत ऊँचा है और न बहुत नीचा, ऐसे अपने आसन को स्थिर स्थापन करके
॥11॥
व्याख्या:
6.11.योगाभ्यास करनेवाले के लिए योगके साधन रूप आसन उसके साथ आहार और विहार आदि के नियम बताते हैं और योग को प्राप्त होते हैं पुरुष लक्षण और उनके फल आदि भी कहते हैं। इसलिए अब (यह एपिसोड) आरंभ किया गया है। पहले आसन का वर्णन शुद्ध स्थानों में किया जाता है अर्थात जो स्वभाव से या झाड़ने से पहले आदि संस्कारों से साफ किया जाता है पवित्र और एकांत स्थान हो जिसमें आपके आसन को जो हुआ न ज्यादा ऊंचा ही हो(आज के गुरुओं के आसन देखो भगवान के बताए अनुसा होते है क्या?)
और न अति नीचा हो और जिस पर क्रम से वस्त्र मृगचर्म और कुशा साथी गए हों जो अपवित्र भाव से स्थापन करके ।।
यहां पाठ्यक्रम से उन वस्त्रपादिका अनुक्रम उलटा कलाकृति की सूची का अर्थ है पहले कुशा उसपर मृगचर्म और फिर उसपर वस्त्र परिधान। कैसा हो।
व्याख्या:
6.11. परम शांति एवं समदृष्टि प्राप्त करने का साधन निदिध्यासन है और इसलिए यहां भगवान की आवश्यकता है उस विधि का विस्तृत वर्णन करें। यहां कुछ श्लोकों में साधक के लिए आसन साधन एवं ध्यान के फल के बारे में बताया गया है। विचार श्लोक में स्थान एवं आसन का वर्णन है। शुद्ध भूमि में मनोरम वातावरण एवं इंद्रधनुष का मनुष्य के मन पर बहुत प्रभाव पड़ता है। इसलिए ध्यानाभ्यास का स्थान शांति एवं शुद्ध होना चाहिए। मन की शुद्धि में भी वह उपयोगी होता है। व्याख्याकार संलग्न हैं कि वह स्थान मच्छर मक्खी चिंति खटमल आदि कृमि किराने का सामान होना चाहिए जो साधक की एकाग्रता में बाधक हो सकता है। आसन के विषय में कहा गया है कि वह स्थिर रहना चाहिए। उसे न अति ऊँचा और न अति नीचा होना चाहिए। ऊँचे से प्राकृतिक पर्वत की चोटी से है। ऐसी स्थिति में साधक के मन में सुरक्षा का भय उत्पन्न हो सकता है और उस स्थिति में आकर्षक जगत् से मन को भावना में स्थिर करना अत्यंत कठिन हो सकता है। इसी प्रकार नीचे का अर्थ है जमीन के स्थान पर गुफा आदि। ऐसा स्थान नमक आदि से जोड़ो में पीड़ा होना दुर्लभ है। ध्यानाभ्यास के समय हृदय की गति और रक्त प्रवाह का दबाव भी कुछ धीमा पड़ जाता है और टैब नीचा स्थान और भी खोखला हो सकता है। इसलिए यहां कहा गया है कि ध्यान का स्थान न अति ऊंचा हो न अति निंदा। ध्यान विधि का वर्णन स्पष्ट उदाहरण है। कुश नाम की घास के ऊपर मृगछाला कंबलकर उसके ऊपर के कपड़े को बेचने से उपयुक्त आसन बनता है। कुशा घास से भूमि के नमकीनपन से सुरक्षा होती है। उसी प्रकार ग्रीष्मकाल में मृगखला के भी गर्म होने से साधक के स्वेद आने से एकाग्रता में बाधा आ सकती है। उसे दूर करने के लिए मृगाचर्म पर वेश्यालय को कहा गया है। ऐसे आसन पर बैठने के साधक को मन और बुद्धि से क्या करना चाहिए,
अब सरल व्याख्या:
ध्यानाभ्यास के लिए आवश्यक बातें:
1. शांत और शुद्ध स्थान चुनें।
2. आसन स्थिर और समतल होना चाहिए, न अति ऊँचा और न अति नीचा।
3. कुशा घास, मृगछाला, और कपड़े से आसन बनाएं।
4. मन और बुद्धि को एकाग्र करें।
5. ध्यानाभ्यास से परम शांति और समदृष्टि प्राप्त होती है।
ध्यानाभ्यास के लिए उपयुक्त स्थान:
- शांत और शुद्ध
- मच्छर, मक्खी, चिंति, खटमल आदि कृमि किराने से मुक्त
- प्राकृतिक सौंदर्य से युक्त
ध्यानाभ्यास के लिए उपयुक्त आसन:
- स्थिर और समतल
- न अति ऊँचा और न अति नीचा
- कुशा घास, मृगछाला, और कपड़े से बना हुआ
ध्यानाभ्यास के लाभ:
- परम शांति
- समदृष्टि
- मन और बुद्धि की एकाग्रता की नितान्त आवश्यकता होती है
6.11
भगवद गीता अध्याय: 6
श्लोक 12
श्लोक:
तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः।
उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये॥
भावार्थ:
उस आसन पर बैठकर चित्त और इन्द्रियों की क्रियाओं को वश में रखते हुए मन को एकाग्र करके अन्तःकरण की शुद्धि के लिए योग का अभ्यास करे
॥12॥
व्याख्या:
"उपयुक्त आसन में बैठकर, मन को एकाग्र कर, और इंद्रियों की क्रियाओं को नियंत्रित कर, आत्मविशुद्धि के लिए योग का अभ्यास करें।"
व्याख्या:
ध्यानाभ्यास के लिए पहले उपयुक्त आसन में बैठें।मन को एकाग्र करें और इंद्रियों की क्रियाओं को नियंत्रित करें।ध्यानाभ्यास का उद्देश्य आत्मविशुद्धि (आत्मशुद्धि) है।आत्मशुद्धि से चित्त शुद्ध होता है और आत्मा का साक्षात अनुभव भी होता है।ध्यानाभ्यास से मन की विक्षेपता दूर होती है और मन स्थिर होता है।
अब सुझाव:
ध्यानाभ्यास के लिए शांत और एकांत स्थान ही चुनें।
मन को एकाग्र करने के लिए प्रतिदिन अभ्यास करें।
इंद्रियों की क्रियाओं को नियंत्रित करने के लिए आत्म-नियंत्रण का अभ्यास करें।
ऐसा करने से ही योग सिद्ध होता है
प्रत्यक्ष ज्ञान:
भगवद गीता अध्याय: 6
श्लोक 12
श्लोक:
तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः।
उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये॥
भावार्थ:
उस आसन पर बैठकर चित्त और इन्द्रियों की क्रियाओं को वश में रखते हुए मन को एकाग्र करके अन्तःकरण की शुद्धि के लिए योग का अभ्यास करे।
॥12॥
व्याख्या:
"उपयुक्त आसन में बैठकर, मन को एकाग्र कर, और इंद्रियों की क्रियाओं को नियंत्रित कर, आत्मविशुद्धि के लिए योग का अभ्यास करें।"
व्याख्या:
ध्यानाभ्यास के लिए पहले उपयुक्त आसन में बैठें।मन को एकाग्र करें और इंद्रियों की क्रियाओं को नियंत्रित करें।ध्यानाभ्यास का उद्देश्य आत्मविशुद्धि (आत्मशुद्धि) है।आत्मशुद्धि से चित्त शुद्ध होता है और आत्मा का साक्षात अनुभव भी होता है।ध्यानाभ्यास से मन की विक्षेपता दूर होती है और मन स्थिर होता है।
अब सुझाव:
ध्यानाभ्यास के लिए शांत और एकांत स्थान ही चुनें।
मन को एकाग्र करने के लिए प्रतिदिन अभ्यास करें।
इंद्रियों की क्रियाओं को नियंत्रित करने के लिए आत्म-नियंत्रण का अब अभ्यास करें।
ऐसा करने से ही योग एक दिन सिद्ध हो जाता है
प्रत्यक्ष ज्ञान:
👉पनघट पर महिलाएं घड़े को लेकर जाती है।जिस पत्थर पर वो घड़ा रखतीं हैं।रोज रोज रखते रखते एक दिन वो भी आता है जब घड़ा अपने बैठने की जगह पत्थर में गढ़ा बना कर बैठ ही जाता है ।
👉दूसरा प्रत्यक्ष ज्ञान भी कुएं पर नजर आता है; कुएं से पानी निकालने को उस की लकड़ी से बनी पुली पर रसी द्वारा पानी भरने को बाल्टी लटकाई जाती है।रोज रोज के अभ्यास के बाद एक दिन रसी ही उस लकड़ी की पुली को दो भागों में काट देती है।
6 ॥12॥
भगवद गीता अध्याय: 6
श्लोक 13
श्लोक:
समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः।
सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन्॥
भावार्थ:
काया, सिर और गले को समान एवं अचल धारण करके और स्थिर होकर, अपनी नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि जमाकर, अन्य दिशाओं को न देखता हुआ
॥13॥
व्याख्या:
बह्य आसन का वर्णन अब शरीर को कैसे रखें, इसलिए कहते हैं काया सिर और गर्दनको सम और अचल भाव से धारण करके स्थिर बैठे। समान भाव से धारण किए हुए कायदिका भी चलन संभव है इसलिए अचलम् यह विशेष किया गया है। तथा अपनी नासिका के अग्र भाग को देखा, मानो वह उधर ही अच्छी दिख रही है। इस प्रकार दृष्टि देखकर। यहां संप्रेक्ष्य के साथ-साथ पुरानी कलाकृतियां भी हैं, क्योंकि यहां आपके साकाके अग्रभागको देखने का विधान करना अभिमत नहीं है। तो क्या है बस उत्सवों की दृष्टिको (विषयोंकी ओरसे रोककर) वहां स्थापना करना ही इष्ट है। वह (इस तरह दृष्टि स्थापित करना) भी अन्तःकरण समाधानके लिए आवश्यक होने के कारण भी अभी भी मौजूद है। क्योंकि अगर अपने नासिकाके अग्रभागको को देखना ही विधेय माना जाए तो फिर मन कहीं स्थित होगा आत्मा में नहीं। परंतु (आगे की ओर) आत्मसंस्थं मनः कृत्वा इस पदसे आत्मा में ही मन को स्थित करना बताया जाएगा। इसलिए इव शब्दके लोपद्वारा अवलोकनोंकी दृष्टिकोसाँसाकेअग्रभागपर लगाना ही संप्रेक्ष्य यह पदसे कहा गया है। इस प्रकार
(नक्षत्रों की दृष्टि को नासाके अग्रभाग पर लगाना)
और अन्य दिशाओं को कोई दृश्य नहीं हुआ अर्थात समुद्र तट में दिशाओं की ओर से कोई दृश्य नहीं हुआ।
👉इसी त्राटक योग को मिस्मरेजम हिप्नोटिज्म का आज कल नाम दिया जाता है। और इसी योग को किया करवाया भी जाता है।
सरल भाषा में:
"ध्यानाभ्यास के लिए शरीर की स्थिति कैसी होनी चाहिए?"
उत्तर:
👉शरीर को स्थिर और समान भाव से बैठें।
👉सिर और गर्दन को अचल और सीधा रखें।
👉नाक के अग्रभाग पर दृष्टि रखें, लेकिन विषयों की ओर नहीं देखें।
👉 दृष्टि को स्थिर और एकाग्र रखें, आत्मा में मन को स्थित करने के लिए।
सुझाव:
👉ध्यानाभ्यास के लिए आरामदायक और स्थिर आसन में बैठें।
👉शरीर को सीधा और अचल रखें।
👉दृष्टि को नाक के अग्रभाग पर रखें, लेकिन विचारों को विषयों की ओर नहीं जाने दें।
👉इस प्रकार ध्यानाभ्यास से आत्मसंयम और शांति प्राप्त होती है।
6 ॥13॥
भगवद गीता अध्याय: 6
श्लोक 14
श्लोक:
प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः।
मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः॥
भावार्थ:
ब्रह्मचारी के व्रत में स्थित, भयरहित तथा भलीभाँति शांत अन्तःकरण वाला सावधान योगी मन को रोककर मुझमें चित्तवाला और मेरे परायण होकर स्थित होए
6॥14॥
प्रशांतात्मा शुभ प्रकार से शांत हुए अंतःकरणवाला विगत् निर्भय और ब्रह्मचारियोंके व्रतमें स्थित हुए अर्थात् ब्रह्मचर्य गुरुसेवा भिक्षाभोजन आदि जो ब्रह्मचारीके व्रत हैं, वे स्थित हुए उनके अनुष्ठान करनेवाला और मनका संयम देकर अर्थात् मनकी वृत्तियोंका उपसंहार करके और मूमें चित्तवाला अर्थात भगवान। ही जिसका उल्लेख किया गया है ऐसा माचित्त एक पात्र और सम्मिलितचित्त मामला और मुझे ही सर्वोत्तम पैरामीटर वाला अर्थात मैं ही जिससे मतमें सबसे श्रेष्ठ हूँ ऐसा खाया बैठा। कोई भी स्त्रीप्रेमी स्त्री में चित्तवाला हो सकता है लेकिन वह स्त्रीको सबसे श्रेष्ठ नहीं है। तो किसको पता है कि वह राजाको या महादेवको स्त्री की सर्वोच्च श्रेष्ठ पद है, लेकिन यह शिक्षक तो चित्त भी मुझमें ही है और मुझे ही सबसे अधिक श्रेष्ठ पद प्राप्त है।
व्याख्या:
कुछ काल तक ध्यान का वैज्ञानिक अभ्यास करने के बाद साधक को अधिकाधिक शांति और संतोष का अनुभव होता है अत्यंत सूक्ष्म आन्तरिक शांति को प्राप्त करने वाले पुरुष को यहाँ प्रशांतात्मा कहा गया है। आत्मा को अपने शुद्ध और दिव्य स्वरूप में व्यक्त करने के लिए प्रशांत अंतकरण ही अत्यंत उपयुक्त माध्यम है। ईशानै योगी अपने मन की वैश्य भावनाओं से मुक्त होता है और तदुपरांत यदि आवश्यक हो तो साधना की साधना न हो तो वह इस मन के अतीत आत्मतत्त्व के अनुभव से स्वस्थ हो जाता है। उसे लगता है कि वह शून्य में विलीन हो रही है। अनादि काल से डिग्रीयों के साथ तादात्म्य बनाकर जीवभाव में बने रहने से उसे भी विश्वास नहीं होता कि इन डिग्रीयों से परे किसी तत्व का अनुभव भी हो सकता है।
प्रत्यक्ष ज्ञान:
यहां एक मछली वाली मछली की कहानी का स्मरण होता है, जिसमें किसी कारण से फूलों की दुकान में एक रात का नाटक करना शामिल है। मछली की दुर्गन्ध की अभ्यस्त होने से वे फूलों की सुगंध के कारण तब तक नहीं सो पाते जब तक कि मछली की टोकरियों को उन्होंने अपने सिरहाने नहीं रख लिया दुगन्ध की अभ्यस्त होने से लेकर सुदूर अनंत आनंद में प्रवेश करने से हम मित्र हो जाते हैं। आध्यात्मवादी विचारधारा का मार्ग ही अरूद्ध हो जाता है। यदि सफलता भी मिलती है तो इसी प्रकार मानसिक भय उत्पन्न होने पर उसकी अनदेखी कर दी जाती है। प्रशांतचित्त शास्त्र शास्त्राध्ययन के द्वारा निर्भय मन में नित्य ध्यान का अभ्यास करने पर भी यदि ब्रह्मचर्य व्रत में दृढ़ स्थिति न हो तो सफलता प्राप्त नहीं हो सकती। ब्रह्मचर्य व्रत औपनिषदिक अर्थ के साथ इस शब्द का यहां विशिष्ट अर्थ भी है। सामान्य ब्रह्मचर्य का अर्थ है धर्म का त्याग। परन्तु इस शब्द का अर्थ अधिक व्यापक है। केवल संगति की प्रवृत्ति का संयम ही ब्रह्मचर्य नहीं है, बल्कि संपूर्ण इन्द्रियों की प्रवृत्तियों पर संयम होना ही ब्रह्मचर्य है। परन्तु यह संयम विवेक का निषेध होना चाहिए। इन्द्रिय संयम के इस सामान्य अर्थ के अतिरिक्त भी ब्रह्मचर्य का विशेष विवरण है। संस्कृत में भाषा ब्रह्मचारी का अर्थ है वह पुरुष स्वभाव ब्रह्म में विचरण करने का हो। इस दृष्टि से ब्रह्मचर्य का अर्थ अपने मन को शाश्वत ब्रह्मविचार और निदिध्यासन में स्थिर करने का प्रयास करना होगा। यही एकमात्र मुख्य उपाय है जिससे हम मन की बहिर्मुखी प्रवृत्ति को एवं शांत संयमित कर सकते हैं।मन का स्वभाव ही किसी भी विषय का चिंतन करना है। जब तक उसे उत्कृष्ट उत्कृष्टता का ज्ञान नहीं मिलता तब तक उसकी विषयवस्तु अभिरुचि में विमुख नहीं हो पाती। पूर्ण ब्रह्मचर्य की सफलता का रहस्य भी यही है। किसी भी योगी की ओर से चमत्कारी कहानियाँ देखने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि हममें से प्रत्येक व्यक्ति को उस योगी की सफलता प्राप्त हो सकती है। उस सफलता के लिए आत्मसंयम की आवश्यकता है। इंद्रियों के विषयों के आकर्षण से स्वयं को सुरक्षित रखने के उपाय का ज्ञान न होने से ही मनुष्य अपने लक्ष्य में भटक जाता है और लोभ संवरण नहीं कर पाता। प्रशांति निर्भयता और ब्रह्मचर्य की प्राप्ति बुद्धि, मन और शरीर पर ध्यान देने योग्य है। इन तीन के सुसंगठित होने परसाधक को अधिकतम शक्ति एवं शांति प्राप्त होती है जिसका उपयोग ध्यान के लिए किया जा सकता है। इस प्रकार नवशक्ति उपकरण सहायक क्षमतावान होती है। वह अपने भटकने वाले मन को सहज ही विषयों परावृत्त करके आत्मतत्त्व का ध्यान कर सकता है। इस श्लोक में दिया गया यह निर्देश अत्यंत महत्वपूर्ण है कि साधक को मुझे ही परम लक्ष्य समझकर ध्यान देना चाहिए। यह हम अपने अनुभव से जानते हैं कि जिस वस्तु को हम सर्वोच्च महत्व देते हैं वह है उसकी प्राप्ति के लिए सर्व प्रथम प्रयास करना। इसलिए जो पुरुष परमात्मा को ही सर्वोच्च लक्ष्य समझकर धार्मिक साधनारत रहता है वह शीघ्र ही अपने अनंत सनातन शांति और आनंद स्वरूप का साक्षात् अनुभव करता है।
6।।14।।
भगवद गीता अध्याय: 6
श्लोक 15
श्लोक:
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः।
शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति॥
भावार्थ:
वश में किए हुए मनवाला योगी इस प्रकार आत्मा को निरंतर मुझ परमेश्वर के स्वरूप में लगाता हुआ मुझमें रहने वाली परमानन्द की पराकाष्ठारूप शान्ति को प्राप्त होता है
6॥15॥
भाव: भगवान का कहना है जो मुझमें स्थित है मेरे कार्यालय में ऐसी शांति प्राप्त होती है।
व्याख्या:
शरीर का आसन, मन का भाव, बुद्धि के द्वारा चिंतन का वर्णन करने के लिए अब भगवान ध्यान विधि के अंतिम चरण का वर्णन अपने प्रिय मित्र अर्जुन के लिए करते हैं। क्वॉथ से पुरालेख साधक ने अपने अंतरिक्षीय और आकर्षक जीवन में सामंजस्य स्थापित करके एक अलौकिक क्षमता प्राप्त की है। ऐसा संयमित मन का पुरुष सतत साधना से परम पद प्राप्त होता है। सदा का अर्थ यह नहीं है कि साधक को अपने परिवार और समाज की प्रतिष्ठा की अनुभूति करने की सीख यहां दी गई है। ऐसा करना समाज के प्रति अपराध होगा। सदा का दैनिक मशीनरी के ध्यान के अभ्यास के समय से है। संपूर्ण लग्न से ध्यान करने पर साधक को पूर्ण शांति का अनुभव होता है। यह शांति ही परमात्मा का स्वरूप है क्योंकि आत्मा में शरीर, मन और बुद्धि की तीव्र चंचलता और विक्षेपों की सर्वथा कमी है। आत्मा इन डिग्रीयों से परे है। भगवान के इस कथन से कि योगी मुझमें स्थित परम शांति को प्राप्त करते हैं, ऐसा अनोखा अनुभव होता है कि यहां श्रीकृष्ण द्वैतवाद के मत का प्रतिपादन कर रहे हैं। परन्तु परम सत्य को गुण युक्त अल्कोहल का अर्थ उसे एक द्रव्य पदार्थ सागा जो कि परिच्छिन और विकारी होगा। उसी प्रकार शांति की प्राप्ति एक विषय की प्राप्ति के समान होगी। भगवान श्रीकृष्ण तत्त्व का ज्ञान, भाषा की विशिष्टता और सीमित योग्यता को जानते हैं इसलिए वे दोष का परिहार करने के लिए शांति को एक विशेष विषय देते हैं, निर्वाण परम अर्थात् मोक्ष स्वरूप। शांति। तात्पर्य यह है कि जब योगी के मन के विषयों से पूर्णता निवृत्त होती है तब वह शांति का अनुभव करता है जो उसे जगत् में कभी अनुभव नहीं होता। शीघ्र ही वह पुरुष परम सत्य स्वरूप के साथ एक सुगंध पूर्वअनुभूत शांति होती है। ध्यान के अंतिम चरण में योगी अपने शुद्ध स्वरूप का साक्षात् अनुभव तद्रूप ही करते हैं। इसी अद्वैतानुभूति का वर्णन संपूर्ण गीता में किया गया है।
सरल व्याख्या:
भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को ध्यान विधि के अंतिम चरण का वर्णन करते हैं।
ध्यान के अंतिम चरण में:
👉 साधक अपने अंतरिक्षीय और आकर्षक जीवन में सामंजस्य स्थापित करता है।
👉वह एक अलौकिक क्षमता प्राप्त करता है।
👉वह परम पद प्राप्त करता है।
👉वह सदा के लिए ध्यान में लीन रहता है।(सोते,जागते,उठते,बैठते, खाते,पीते,चलते ,फिरते, भी राम राम में लीन रहता है।)
👉वह पूर्ण शांति का अनुभव करता है।
👉वह परमात्मा का स्वरूप बन जाता है।
🌹भगवान श्रीकृष्ण का कथन:🌹
👉योगी मुझमें स्थित परम शांति को प्राप्त करते हैं।
👉यह शांति एक विशेष विषय है, निर्वाण परम अर्थात् मोक्ष स्वरूप।
👉जब योगी के मन के विषयों से पूर्णता निवृत्त होती है तब वह शांति का अनुभव करता है।
👉वह पुरुष परम सत्य स्वरूप के साथ एक सुगंध पूर्वअनुभूत शांति होती है।
6॥15॥
भगवद गीता अध्याय: 6
श्लोक 16
श्लोक:
नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः।
न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन॥
भावार्थ:
हे अर्जुन! यह योग न तो बहुत खाने वाले का, न बिलकुल न खाने वाले का, न बहुत शयन करने के स्वभाव वाले का और न सदा जागने वाले का ही सिद्ध होता है
6॥16॥
व्याख्या:
अब योगीके आहार आदिके नियम कहे जाते हैं अधिक खानेवालेका अर्थात अपनी शक्तिका उल्लघन करके शक्तिसे अधिक भोजन करनेवालाका योग सिद्ध नहीं होता और बिल्कुल नवाले भी योग सिद्ध नहीं होता क्योंकि यह श्रुति है कि जो आपके शरीर की शक्तिके अन्न को खा जाता है। वह जिसकी रक्षा करता है वह उसकी रक्षा नहीं करता (करता नहीं) इसलिए योगीको जन्मतिथि कि आपके लिए धीरे-धीरे उपयुक्त हो उन्हें कम या ज्यादा अन्न न खाय। या यह अर्थ समझो कि योगिके के लिए योगशास्त्र में बताया गया है जो अन्नका परिमाण है उससे अधिकवालेका योग सिद्ध नहीं होता। वहां यह पैमाने बताया गया है कि पेटका आधा भाग अर्थात दो भाग तो शक्तिपात आदि व्यंजनोंसहित भोजन से और तीसरा भाग जलसे पूर्ण करना भाग और चौथा वायुके आने जानेके लिए खाली रखे हुए टुकड़े शेष। तथापि हे अर्जुन न तो बहुत सोनेवालेका ही योग सिद्ध होता है और न अधिक जगनेवालेको ही योगसिद्धि प्राप्त होती है।
6॥16॥
भगवद गीता अध्याय: 6
श्लोक 17
श्लोक:
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा॥
भावार्थ:
दुःखों का नाश करने वाला योग तो यथायोग्य आहार-विहार करने वाले का, कर्मों में यथायोग्य चेष्टा करने वाले का और यथायोग्य सोने तथा जागने वाले का ही सिद्ध होता है
6॥17॥
व्याख्या:इस प्रकार यथोचित आहार, विहार आदि करनेवाला ध्यानयोगिका दुःखों का अत्यधिक अभाव करनेवाला योग सिद्ध हो जाता है। योग और भोग में अद्भुत अंतर है। योग में तो भोग का अत्यधिक अभाव है, योग में तो भोग का अत्यधिक अभाव नहीं है। क्योंकि जिस भोग में सुख होता है, वह सुखानुभूति भी असत्के संयोग वियोगसे होता है। लेकिन मनुष्य का वह दृष्टिकोण न शेष असत्केपर संयोग से ही दृष्टि रहता है। वस्तुतः मनुष्यके भोग से ही सुखको संयोगवश ही मनुष्य जन्म लेता है और ऐसे ही मनुष्यके भोग से ही मनुष्य का जन्म होता है। इसलिए दुःखों का नशा करने वाला योगा का अनुभव नहीं होता। दुखों का नशा करने वाला योग वही होता है, जिसमें भोग का अत्यधिक अभाव होता है।
"अभिप्राय": यथायोग्य तो होता ही ऐसा है कि यथायोग्य आहार विहारवाले और कर्मों में यथायोग्य चेष्टा करनेवाले तथा यथायोग्य सोने और जगनेवाले योगिका दुःखनाशक योग सिद्ध हो जाते हैं। सब दुःखों को हरनेवाले का नाम दुःख है। ऐसा सब संसाररूप दुखों का नाश करने वाला योग (वह योगिका) सिद्ध होता है ऐसा अभिप्राय है।
6॥17॥
भगवद गीता अध्याय: 6
श्लोक 18
श्लोक:
यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते।
निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा॥
भावार्थ:
अत्यन्त वश में किया हुआ चित्त जिस काल में परमात्मा में ही भलीभाँति स्थित हो जाता है, उस काल में सम्पूर्ण भोगों से स्पृहारहित पुरुष योगयुक्त है, ऐसा कहा जाता है
6॥18॥
अब यह बताते हैं कि (साधक पुरुष) जब समाधिस्थ हो जाता है तो उसे वश में कर लिया जाता है, विशेष रूप से अर्थात् रूपसे एकाग्रता को प्राप्त हुआ चित्त, जब बाह्य चिंतन से केवल आत्मा ही स्थित होती है, अपने स्वरूप में स्थिति का लाभ मिलता है। तब उस समय सभी भोगों की लालसा से अनुपयुक्त हुआ योगी अर्थात् दृष्ट और अदृष्ट सभी भोगों से तृष्णा नष्ट हो गई है ऐसा योगी युक्त है समाधिस्थ (परमात्मा में स्थितिवाला) ऐसा कहा गया है।
6॥18॥
भगवद गीता अध्याय: 6
श्लोक 19
श्लोक:
यथा दीपो निवातस्थो नेंगते सोपमा स्मृता।
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः॥
भावार्थ:
जिस प्रकार वायुरहित स्थान में स्थित दीपक चलायमान नहीं होता, वैसी ही उपमा परमात्मा के ध्यान में लगे हुए योगी के जीते हुए चित्त की कही गई है
6॥19॥
उस योगिका जो समाधिस्थ चित्त में स्थित है, उसकी उपमा कही जाती है। जिससे किसी की भलाई की जाय उसका नाम उपमा है।वायु का वेग ना (हो एकाग्रता हो)
जैसे दीपक🪔 की लो इधर उधर नहीं हिलती(वैसे ही योगी भी दृढ़ हो जाता है)
6॥19॥
भगवद गीता अध्याय: 6
श्लोक 20
श्लोक:
यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया।
यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति॥
भावार्थ:
योग के अभ्यास से निरुद्ध चित्त जिस अवस्था में उपराम हो जाता है और जिस अवस्था में परमात्मा के ध्यान से शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धि द्वारा परमात्मा को साक्षात करता हुआ सच्चिदानन्दघन परमात्मा में ही सन्तुष्ट रहता है
6॥20॥
व्याख्या:
इस प्रकार योगाभ्यासके बलसे वायुराधन स्थानमें रखे गए दीपककी भाँति एकाग्र हुआ योगसाधनसे निरुद्ध किया गया सब ओरसे चंचलतारहित किया गया चित्त जिस समय उपरत होता है उपराटिको प्राप्त होता है। तथा जिस काल में समाधि दायक अति निर्मल (स्वच्छ) हुए अंतःकरण से परम चैतन्य ज्योतिःस्वरूप आत्माका साक्षात् होता है वह आपके भीतर ही हो जाता है तृप्ति लाभ कर लेता है।(अब वो सुनी सुनाई बातों को अपने भीतर ही परख लेता है)। 6॥20॥
भगवद गीता अध्याय: 6
श्लोक 21
श्लोक:
सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्।
वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः॥
भावार्थ:
इन्द्रियों से अतीत, केवल शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धि द्वारा ग्रहण करने योग्य जो अनन्त आनन्द है, उसको जिस अवस्था में अनुभव करता है, और जिस अवस्था में स्थित यह योगी परमात्मा के स्वरूप से विचलित होता ही नहीं
6॥21॥
व्याख्या:
सरल भाव:
जो सुख अत्यंत गहरा में है , वास्तव में उस का नाश नहीं होता है।
"इसको प्रत्यक्ष ज्ञान से ऐसे समझें":
मछुआरा मछली पकड़ने को अपना जाल पानी की झील में नदी में बिछाता है। जो मछलियां पानी की उपरली सतह में रहती हैं वहीं फंसती है। गहरे (ज्ञान सागर में उतरा ज्ञानी) और गहरे पानी में उतर गई मछली मछुआरे रूपी (सांसारिक गुरु)के जाल में नहीं आतीं
और जो व्यक्ति इंद्रियों की चाहता को नहीं मानता और केवल बुद्धि से ही ग्रहण करता है, वह ज्ञानी होता है।
वह ज्ञानी अपने स्वरूप में स्थित होता है और समय के साथ भी अपने वास्तविक स्वरूप से नहीं हटता है। अर्थात् वह ज्ञानी हमेशा अपने आत्मस्वरूप में स्थित रहता है और समय के साथ भी अपने स्वरूप में स्थिर ही रहता है।
6॥21॥
भगवद गीता अध्याय: 6
श्लोक 22
श्लोक:
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः।
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते॥
भावार्थ:
परमात्मा की प्राप्ति रूप जिस लाभ को प्राप्त होकर उसे अधिक दूसरा कुछ भी लाभ नहीं मानता और परमात्मा प्राप्ति रूप जिस अवस्था में स्थित योगी बड़े भारी दुःख से भी चलायमान नहीं होता
6॥22॥
जिस को परमात्मा की प्राप्ति का लाभ हो जाता है फिर कुछ और प्राप्ति का कोई महत्व ही नहीं बचता
प्रत्यक्ष: परमात्मा रूपी हाथी के पांव में उसे सब के पांव नजर आते है।फिर उसे यंत्र, मंत्र,तंत्र धागा ,ताबीज , नग, मणि की शरण की आवश्यकता ही क्या है?6॥22॥
भगवद गीता अध्याय: 6
श्लोक 23
श्लोक:
तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम्।
स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा॥
भावार्थ:
जो दुःखरूप संसार के संयोग से रहित है तथा जिसका नाम योग है, उसको जानना चाहिए। वह योग न उकताए हुए अर्थात धैर्य और उत्साहयुक्त चित्त से निश्चयपूर्वक करना कर्तव्य है
अर्थात दु:ख के संयोग से वियोग है, उसी को 'योग' नाम से जाना जाता है। (वह योग जिसका ध्यानयोग लक्ष्य है,) वह ध्यानयोग अभ्यास न उकताए गए चित्तसे दृढ़ संकल्प करना।।
6॥23॥
संकल्प से उत्पन्न समस्त कामनाओं को निःशेष रूप से परित्याग कर मन के इन्द्रिय समुदाय द्वारा सब ओर से सम्यक् प्रकार वश में करके चलो आगे बढ़ते है।
भगवद गीता अध्याय: 6
श्लोक 24
श्लोक:
सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः।
मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः॥
भावार्थ:
संकल्प से उत्पन्न होने वाली सम्पूर्ण कामनाओं को निःशेष रूप से त्यागकर और मन द्वारा इन्द्रियों के समुदाय को सभी ओर से भलीभाँति रोककर चलो आगे बढ़ते है
6॥24॥
भगवद गीता अध्याय: 6
श्लोक 25
श्लोक:
शनैः शनैरुपरमेद्बुद्धया धृतिगृहीतया।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत्॥
भावार्थ:
क्रम-क्रम से अभ्यास करता हुआ उपरति को प्राप्त हो तथा धैर्ययुक्त बुद्धि द्वारा मन को परमात्मा में स्थित करके परमात्मा के सिवा और कुछ भी चिन्तन न करे
6॥25॥
(पौड़ी पौड़ी चढ़ता जा)
शनैःशनैः अर्थात् सहसा नहीं क्रम क्रमसे ऊपरतिको प्राप्त करे। जाति द्वारा बुद्धि द्वारा। कैसी बुद्धि-युक्ति धैर्यसे सहनशीलता की हुई अर्थात् धैर्ययुक्त बुद्धि-शक्ति। तथा मनको आत्मामें स्थित होकर अर्थात यह सब कुछ आत्मा ही है इसके अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है इस प्रकार मनको आत्मामें अचल रखकर अन्य किसी वस्तु का भी चिंतन न करें। यह योगकी परम श्रेष्ठ विधि है।
6॥25॥
भगवद गीता अध्याय: 6
श्लोक 26
श्लोक:
यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्॥
भावार्थ:
यह स्थिर न रहने वाला और चंचल मन जिस-जिस शब्दादि विषय के निमित्त से संसार में विचरता है, उस-उस विषय से रोककर यानी हटाकर इसे बार-बार परमात्मा में ही निरुद्ध करे
6॥26॥
इस प्रकार मनको आत्मा में स्थित होने से हुआ योगी स्वाभाविक दोषके कारण जो अत्यंत चंचल है तथा इसीलिये जो अस्थिर है ऐसा मन जिस शब्दादि विषयके निमित्तसे उत्पन्न होता है बाहर जाता है उसउस शब्दादि विषयरूप निमित्तसे ( इस मनको ) रोककर एवं उसुस विषयरूप निमित्तको यथार्थ तत्त्वनिरूपणद्वार आभासमात्र की अनुभूति वैराग्यकी भावनासे इस मनका (बारंबार) आत्मामें निरोध ही अर्थात इसे आत्माके ही वशीभूत करे। इस प्रकार योगाभ्यास बलसे योगिका मन आत्मा में ही शांति होती है।यह चंचल और अस्थिर मन जिन वस्तुओं से (विषयों में) विचरण करता है, उसे आत्मा के द्वारा संयमित किया जाता है।
6॥26॥
भगवद गीता अध्याय: 6
श्लोक 27
श्लोक:
प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम्।
उपैति शांतरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम्॥
भावार्थ:
क्योंकि जिसका मन भली प्रकार शांत है, जो पाप से रहित है और जिसका रजोगुण शांत हो गया है, ऐसे इस सच्चिदानन्दघन ब्रह्म के साथ एकीभाव हुए योगी को उत्तम आनंद प्राप्त होता है
6॥27॥
जिसके भूत सम्पूर्ण पाप नष्ट हो गए हैं, अर्थात् तमोगुण और तमोगुणकी अप्रकाश अप्रवृत्ति, प्रमाद और मोह (गीता 14। 13)--ये वृत्तियाँ नष्ट हो गई हैं, ऐसे योगियों को जिसके रजोगुण और रजोगुणकी लोभ, प्रवृत्ति, नये-नये कर्मों में लगना, अशांति और स्पृहा (गीता 14। 12)--ये वृत्तियां शांत हो गयी हैं, ऐसे योगियों ने यह बताया है।योगी सबसे उपराम हो गया है, उसे उत्तम सुख की खोज नहीं करनी पड़ती है, उस सुख की प्राप्ति के लिए उद्योग, परिश्रम आदि नहीं करना पड़ता है, प्रत्युत वह उत्तम सुख स्वतः-स्वाभाविक ही प्राप्त हो जाता है।जिसका मन भलीभाँति शान्त है उसका रजोगुण शान्त हो गया है अर्थात् जिसका मोहादि क्लेशरूप रजोगुण शान्त हो गया है जो ब्रह्मरूप जीवनमुक्त है यानी यह सब कुछ ब्रह्म ही है ऐसे ही सत्यवाला है और जो अधर्मादि दोषों से रहित है वह योगिको निर्तिशय उत्तम सुख प्राप्त होता है।
6॥27॥
भगवद गीता अध्याय: 6
श्लोक 28
श्लोक:
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः।
सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते॥
भावार्थ:
वह पापरहित योगी इस प्रकार निरंतर आत्मा को परमात्मा में लगाता हुआ सुखपूर्वक परब्रह्म परमात्मा की प्राप्ति रूप अनन्त आनंद का अनुभव करता है
॥28॥
भगवद गीता अध्याय: 6
श्लोक 29
श्लोक:
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः॥
भावार्थ:
सर्वव्यापी अनंत चेतन में एकीभाव से स्थिति रूप योग से युक्त आत्मा वाला तथा सब में समभाव से देखने वाला योगी आत्मा को सम्पूर्ण भूतों में स्थित और सम्पूर्ण भूतों को आत्मा में कल्पित देखता है
6॥29॥
(इस प्रकार अपने- तुम्हें सदा परमात्मा में स्थापित पापरहित योगी सुख निर्बल ब्रह्म प्राप्तिरूप अत्यंत सुख प्राप्त होता है।)
योगका फल जो संपूर्ण संसार का विच्छेद करा लेने वाला ब्रह्मके साथ एकता का दर्शन करता है वह अखिलाया जाता है जिसमें सम्मिलित अंतःकरण से युक्त और सब जगह समदृष्टि वाला योगी है जिसका ब्रह्म और आत्माकी एकता को विषय करनेवाला ज्ञान ब्रह्मासे लेकर स्थावरपर्यंत संपूर्ण विभक्त संप्रदायमें भेद से अपूर्ण सम हो ऐसा पुरुष अपनी आत्मा को सभी भूतों में स्थित देखता है और आत्मा में सभी भूतों को देखता है। अर्थात् ब्रह्मासे लेकर स्तम्भपर्यन्त समस्त साध्वियों को आत्मा में एकता को प्राप्त दृष्टि है।(सब की आत्मा एक रूप नजर आती है)
6॥29॥
भगवद गीता अध्याय: 6
श्लोक 30
श्लोक:
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥
भावार्थ:
जो पुरुष सम्पूर्ण भूतों में सबके आत्मरूप मुझ वासुदेव को ही व्यापक देखता है और सम्पूर्ण भूतों को मुझ वासुदेव के अन्तर्गत (गीता अध्याय 9 श्लोक 6 में देखना चाहिए।) देखता है, उसके लिए मैं अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिए अदृश्य नहीं होता
6॥30॥
भगवान बताते है
इस प्रकार का योगी आत्मा की एकता दर्शन का फल कहा जाता है। जो प्रत्येक आत्मा मुझ वासुदेव को सब जगह अर्थात सभी भूतों में (व्यापक) दृष्टि देता है और ब्रह्मा आदि सभी प्राणियों को मुझ सर्वात्मा (भगवान) में देखता है इस प्रकार आत्मा की एकता को देखने वाले उस ज्ञानी के लिए मैं ईश्वर कभी भी अदृश्य नहीं होता अर्थात कभी-कभी अदृश्य होता है और वह ज्ञानी भी कभी-कभी मुझे वासुदेव से अदृश्य परोक्ष नहीं होता क्योंकि उसका और मेरा स्वरूप एक ही है। निःसंदेह अपनी आत्मा अपना प्रिय ही होती है और जो सर्वात्मभावसे एकताको देखनेवाला है वह मैं ही हूं।
6॥30॥
भगवद गीता अध्याय: 6
श्लोक 31
श्लोक:
सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः।
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते॥
भावार्थ:
जो पुरुष एकीभाव में स्थित होकर सम्पूर्ण भूतों में आत्मरूप से स्थित मुझ सच्चिदानन्दघन वासुदेव को भजता है, वह योगी सब प्रकार से बरतता हुआ भी मुझमें ही बरतता है
॥31॥
वह पूर्ण ज्ञानी योगी ही मुझ भगवान में ही घूमता है अर्थात वह सदा मुक्त ही है उसके मोक्ष पर कोई रोक नहीं लगा सकता।
भगवद गीता अध्याय: 6
श्लोक 32
श्लोक:
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन।
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः॥
भावार्थ:
हे अर्जुन! जो योगी अपनी भाँति (जैसे मनुष्य अपने मस्तक, हाथ, पैर और गुदादि के साथ ब्राह्मण, क्षत्रिय, शूद्र और म्लेच्छादिकों का-सा बर्ताव करता हुआ भी उनमें आत्मभाव अर्थात अपनापन समान होने से सुख और दुःख को समान ही देखता है, वैसे ही सब भूतों में देखना 'अपनी भाँति' सम देखना है।) सम्पूर्ण भूतों में सम देखता है और सुख अथवा दुःख को भी सबमें सम देखता है, वह योगी परम श्रेष्ठ माना गया है
6॥32॥
मन,वचन,कर्म,बुद्धि , द्वारा सम्पूर्ण प्राणियों को एक नजर से देखता है कोई भेद भाव नहीं करता और सुख अथवा दुःख को भी सबमें सम देखता है समझता है, वही योगी परम श्रेष्ठ माना गया है।(मेरे को तो अभी तक सिवाए एक कोई ओर अभी तक ऐसा नजर नहीं आया जो सब का साथ सब का विकास सब का भला चाहता हो)
6॥32॥
भगवद गीता अध्याय: 6
श्लोक 33
श्लोक:
( मन के निग्रह का विषय )
अर्जुन उवाच
योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन।
एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम्॥
भावार्थ:
अर्जुन बोले- हे मधुसूदन! जो यह योग आपने समभाव से कहा है, मन के चंचल होने से मैं इसकी नित्य स्थिति को नहीं देखता हूँ
6॥33॥
व्याख्या:
असाधारण बुद्धि का पुरुष होने के गुण वाला अर्जुन तो क्रियाशील स्वभाव का था। इसलिए उन्हें किसी काव्यमय सुंदरमयता के पूर्ण दर्शन में कोई आकर्षण नहीं था। इसमें जीवन की प्रार्थना थी इसलिए ध्यानयोग में उसकी रुचि नहीं थी। अस्तु वह ही प्रश्न पूछता है क्योंकि भगवान ने अब तक बताया है कि उसे अव्यावहारिक सा प्रतीत होता है। इस अध्याय में श्रीकृष्ण ने सिद्ध किया है कि दुःखयोगवियोग ही योग है। तत्त्वति का उपाय मन को विषयों से परावृत्त करके आत्मानुसंधान में प्रवृत्त करना है। सिद्धांत यह है कि आत्मस्वरूप में मन स्थिर होना पर सत्य के अज्ञान से उत्पन्न होना और सभी विपरीत धारणाओं को छोड़कर साधक मुक्त हो जाता है। ऐसा प्रतीत होता है कि उसकी साधन विधि जीवन की वस्तुस्थिति से सर्वथा भिन्न है, क्योंकि काव्यकल्पना के समान अव्यावहारिक है। श्रीकृष्ण ने उल्लेख किया है कि उन्हें कोई सीक्वल खोई हुई दिखाई नहीं देता है। वह इस विश्वास के साथ भगवान से प्रश्न पूछता है मानो उनके तत्त्वज्ञान के उद्देश्य को पूरा करता है। वह इस समत्व योग की व्यावहारिकता के विषय में सन्देह प्रगट करता है। वेदांत के छात्रों का यही लक्षण है कि अंधविश्वास से वह किसी की कही हुई बात को स्वीकार नहीं करते। शिष्यों का विश्वास गुरु का कर्तव्य है। परंतु यदि शिष्य को गुरु के उपदेश में कोई कमी या दोष उत्पन्न होता है तो प्रश्न उसे समय-समय पर अपने कारण बताना भी अनिवार्य होता है। अर्जुन को समत्व योग का अभ्यास दुष्कर दिखाई दिया, जिसका कारण बताया गया है कि मनुष्य के मन के चंचल स्वभाव के कारण योग की चिरस्थयी स्थिति नहीं रह सकती। वह यह नहीं कहता कि मन का समत्व सर्वथा अप्रभावी है आपका यह संदेह है कि वह स्थिति चिरस्थयी नहीं हो सकता। धारा यह है कि कई वर्षों की साधना के दिव्य आत्मानुभव भी प्राप्त होता है तो भी क्षण वहिक ही होगा। हालाँकि वह क्षणिक अनुभव भी आत्मा की पूर्णता में हो सकता है तथापि मन के चंचल स्वभाव के कारण ज्ञानी पुरुष उस अनुभव को स्थायी नहीं बना पाता है। अपने प्रश्नों को और अपनी शंका कोअधिक स्पष्ट करने के लिए ही अर्जुन प्रश्न पर प्रश्न करते हैं।
*❖════❃≛⃝❈⬤🪷
नोट;_ अर्जुन जैसे चेले बने और अपने गुरु से प्रश्न पर प्रश्न करोगे तो ही वो बताए गे अविनाशी गुरु भगवान तो अपना यश भी चेले को पकड़ा देते है जो किसी साधारण मनुष्य के बस की तो बात ही नहीं।
⬤≛⃝❈❃════❖*
6॥33॥
भगवद गीता अध्याय: 6
श्लोक 34
श्लोक:
चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्॥
भावार्थ:
क्योंकि हे श्रीकृष्ण! यह मन बड़ा चंचल, प्रमथन स्वभाव वाला, बड़ा दृढ़ और बलवान है। इसलिए उसको वश में करना मैं वायु को रोकने की भाँति अत्यन्त दुष्कर मानता हूँ
6॥34॥
अर्जुन का प्रश्न है
क्योंकि हे कृष्ण यह मन बड़ा है चंचल है। विलेखनके अर्थ में जो कृष्ण धातु है उसका रूप कृष्ण है। भक्तोंके पापादि दोषोंको निवृत्त करनेवाले होनेके कारण भगवानका नाम कृष्ण है। यह मन केवल अत्यंत चंचल है, इतना ही नहीं, प्रयोगशाला प्रमाणन भी है अर्थात् शरीरको क्षुधा और इन्द्रियोंको विक्षिप्त अर्थात प्रकाश कर देता है। और बड़ा बलवान है किसी से भी वश में किया जाना अश्क्य है। साथ ही ये बड़ा दीवाने भी है। अर्थात तंतुनाग (गोह) नामक जलचर जीवकी भाँति अच्छाद्य है। ऐसे मोटरसाइकिलवाले इस मनका विरोध करना मैं वायुकी भाँति दुष्कर वर्गीकरण हूँ। अभिप्राय यह है कि जैसे वायुका लाभ दुष्कर है उससे भी अधिक दुष्कर मैं मनका लाभ संकेत हूँ।
व्याख्या सहित
आधुनिक अधर्म का मानव सभी पवित्र शास्त्रों की केवल निंदा करता है जबकि एक जिज्ञासु साधक भी प्रत्येक शास्त्र सिद्धांत को अंध विश्वास से स्वीकार नहीं करता है।
वह भी प्रश्न पूछता है। लेकिन आधुनिक व्यक्ति की निंदा और जिज्ञासु द्वारा पूछे गए प्रश्न में भू-आकाश का अंतर है।
जिज्ञासु का प्रयास होता है कि शास्त्र के सागर को पूर्ण रूप से समझा जाए।
यहां अर्जुन अपने मन को सम्यक् सभी प्रकारों से जानते हैं कि वह अतिप्रचारित पॉपुलर हैं। प्रमाथि बलवान और दृढ़ ये तीन शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण और अर्थपूर्ण हैं। प्रमाथी शब्द से वृत्ति की द्रुत गति और उसके उत्पन्न विक्षेपों द्वारा बहती लहरें भी दृश्यमान हो गई हैं। अर्जुन का कथन है कि यह मन प्रमाति के साथ बलवान भी है। द्रुत गति का वृत्ति प्रवाह इस विषय की ओर से उसे प्राप्त होता है उस विषय के साथ दृढ़ आशक्ति से बंधक इतना बलवान हो जाता है कि उस विषय से विलग करना दुष्कर कार्य हो जाता है। उनका तीसरा लक्षण है दृढ़ता अर्थात् एक बार जब यह व्यापारी मन में किसी भी विषय का चिन्तन कर दे तो उसे सरल कार्य नहीं करना पड़ता। इन प्रयोगशालाओं से युक्त मन को किस प्रकार विषय पराङ्मुख बनाकर आत्मा में स्थिर किया जा सकता है जैसे कि ध्यान विधि में बताया गया है मन की शक्ति और गति भेदक और व्यापकता को यहाँ सुसंगत वायु की उपमा से अधिक सुन्दर और विस्तृत शैली में वाणी नहीं दी जा सकती था. अर्जुन यहां श्रीकृष्ण से उन मंचों को जानना चाहते हैं जहां प्रचंड वायु के समान वेग वाले मन को पूर्णतया वश में किया जा सकता है। भगवान अर्जुन को उनका अतिसुपरिचिट नाम कृष्ण द्वारा चित्रित किया गया है जो परम पूजनीय है क्योंकि कृष्ण धातु से कृष्ण शब्द का अर्थ है जो आत्मानुभवी भक्तों के सभी दोष अर्थात् भावनाओं का आकर्षण नष्ट कर देता है। हत्या करने वाला स्वप्नदृष्टा जैसे ही जाग्रत अवस्था में आता है रक्तरंजित हाथ और कलंक की कालिमा जागृत ही निर्मलता हो जाती है। इसी प्रकार जब आत्मा के वास्तविक रूप की पहचान हो जाती है तब मन और उसकी आक्रामक प्रवृत्ति वाले वासनाएं और उसकी दुष्टता बुद्धि और उसकी खोज की उग्र शरीर और उसके ब्लॉग ये सभी नष्ट हो जाते हैं। इसके लिए ज्योतिषी कवि महर्षि व्यासजी ने महाभारत में इस अन्तर्ात्मा का चित्रण वृन्दावन के मनोहर श्याम कृष्ण के रूप में किया है। प्रकरण के सन्दर्भ में किसी विशेष गुण को दर्शन देने के लिए व्यक्ति को एक विशेष उल्लेख प्रदान किया जाता है कि कला, संस्कृत भाषा की अपनी सुविधा है जो विश्व के अन्य समुद्रों में नहीं है। अर्जुन के तर्क को स्वीकार करते हुए भगवान कहते हैं।
6॥34॥
भगवद गीता अध्याय: 6
श्लोक 35
श्लोक:
श्रीभगवानुवाच
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥
भावार्थ:
श्री भगवान बोले- हे महाबाहो! निःसंदेह मन चंचल और कठिनता से वश में होने वाला है। परन्तु हे कुंतीपुत्र अर्जुन! यह अभ्यास (गीता अध्याय 12 श्लोक 9 की टिप्पणी में इसका विस्तार देखना चाहिए।) और वैराग्य से वश में होता है
6॥35॥
श्रीभगवान बोले कि ठीक है ऐसा ही है हे महाबाहो मन चंचल और कठिनासे वश में होनेवाला इसमें (कोई यह) संदेह नहीं। वैज्ञानिक अभ्यासों का अर्थ है किसी भी चित्तभूमि में एक समान वृत्तिकी बारंबार कलाकृति और दृष्टांत तथा अदृष्ट प्रिय भोगों में बारंबार दोषदर्शनके अभ्यास से उत्पन्न अनिच्छारूप वैराग्यसे चित्त विकेन्द्रीकरण प्रेरणा (चंचलता) को स्थापित किया जा सकता है। अर्थात इस प्रकार मनका निग्रह निरोध किया जा सकता है।
भगवान श्रीकृष्ण ओर अर्जुन के बारे में पूरी जानकारी से पता चलता है कि वह एक वीर योद्धा कर्मशील डेलिअरी और यथार्थवादी पुरुष थे। ऐसे असामान्य व्यक्तित्व का पुरुष जब गुरु के उपदिष्ट तत्त्वज्ञान से उसकी सत्यता या व्यावहारिकता के विषय में सन्देह करता है तब गुरु में भी मन की शांति और शिष्य की विद्रोही बुद्धि को समझने और सिद्धांतों की असाधारण क्षमता का होना आवश्यक हो जाता है।
गीता में इस स्थान पर संक्षेप में स्थिति यह है कि भगवान के उपदेश देने वाले मन के स्थिर होने पर आत्मानुभूति होती है जबकि अर्जुन का कहना है कि चंचल मन स्थिर नहीं हो सकता पर आत्मानुभूति भी अप्रभावी होती है।
मन में दृढ़ कर लेता है तो उसे मोशन पिक्चर्स का सबसे अच्छा उपाय है कि उसके विचार को मन में ले लें। विजय के लिए सन्धि सैद्धांतिक शास्त्रार्थ में सफलता का रहस्य है और इस प्रकार के सिद्धांतों से पूर्ण स्थिति में जो अज्ञानी के लिए स्वाभाविक है। इस प्रकार महान मनोविज्ञानी श्रीकृष्ण प्रश्न के उत्तर में असंशयं रहस्य प्रथम शब्द से ही अपने शक्तिशाली प्रतिद्वंद्वी को निशस्त्र कर देते हैं और फिर महाबाहो के सम्बोधन से उनके अभिमान को जाग्रत करते हैं। भगवान की स्वीकृति से मन का निग्रह करना कठिन है और इसलिए मन की प्रतिष्ठित शांति और समता सरलता से प्राप्त नहीं हो सकती है।
इस स्वीकृति से अर्जुन प्रशंसित होता है। महाबाहो शब्द से उनका स्मरण करते हुए कहा जाता है कि वह एक वीर योद्धा हैं। भगवान के वर्णन में दुष्कर और असाध्य कार्यों को स्पष्ट रूप से दर्शाया गया है, जिसमें एक शक्तिशाली पुरुष की महानता है, न कि उसके ही मंदिर के उपवन के कुछ फूलों की सजावट में निसंदेह मन का एक शक्ति रूपी शत्रु भी तो है।
लेकिन वह केवल एक शक्तिशाली पुरुष की महानता है। शत्रु ने उस पर विजय प्राप्त की, साथ ही बहुत ही श्रेष्ठ होगा। दूसरी पंक्ति में भगवान श्री कृष्ण ने समान शब्दों का प्रयोग किया, जिससे अर्जुन का मन शांत और स्थिर हो सके।
अभ्यास और वैराग्य के द्वारा उसे वश में करके पूर्णतया आत्मसंस्थ कर सकते हैं। इसके कारण मन का संयमन कठिन हो जाता है। यहां वैराग्य शब्द से इनका ही त्याग बताया गया है। श्री शिष्य के अनुसार अभ्यास का अर्थ है ध्येय विषयक चित्तवृत्ति की दीक्षा। सामान्यतः ध्यानाभ्यास में अध्ययन के बारम्बार पुनर्स्थापना से यह समान प्रत्यय आरती खण्डित रहती है। परिणाम यह होता है कि पुनपुन मन ध्येय वस्तु के अतिरिक्त अन्य विषयों का विचरण करने लगता है और मनुष्य का आंतरिक सन्तुलन एवं व्यक्तित्व भी भिन्न हो जाता है। इस दृष्टि से अभ्यास वैराग्य को दृढ़ करता है और वैराग्य अभ्यास को। दोनों के दृढ़ होने से सफलता निश्चित होती है। कभी-कभी साधकों के मन में यह प्रश्न सामने आता है कि क्या वह मन में स्वाभाविक वैराग्य की प्रतीक्षा करता है या ध्यान का अभ्यास कर पाता है। अधिकांश लोग वैराग्य की प्रतीक्षा करते रहते हैं। अभ्यास को परम वैराग्य में यह स्पष्ट किया गया है कि अभ्यास के पूर्व वैराग्य की प्रतीक्षा करना गीता ही मजाक है बिना बीज बोये असफलता की प्रतीक्षा करना। हमको जीवन का विश्लेषण और मूल्यांकन करना चाहिए और इस प्रकार जानना चाहिए कि हमें जीवन में क्या और कितना जानना चाहिए। यदि ज्ञात होता है कि लाभ से अधिक हानि हुई है तो नैतिकता ही हम विचार करते हैं कि किस प्रकार के जीवन को सुव्यवस्थित रूप से सुरक्षित किया जा सकता है और अधिक से अधिक आनंद प्राप्त किया जा सकता है। इसी क्रम में फिर से शास्त्र के अध्ययनकर्ता होंगे जो हमें जीवनदर्शन के अद्भुत नैतिक मूल्यों की शांति आत्मसंयम के आनंद आत्मविकास के रोमन और व्यवहार के परिच्छिन्न जीवन के घुटन निश्चित दुखों का ज्ञान सिखाएंगे। इंस्टीट्यूशनल प्रैक्टिस की शुरुआत होनी चाहिए। इसके मूल सहज स्वाभाविक रूप से जो अनासक्ति का भाव उत्पन्न होता है वही वास्तविक और स्थिर वैराग्य है। अन्यथा वैराग्य तो मूढ़ तापसी जीवन का मिथ्या प्रदर्शित करता है जो मनुष्य को क्रूर प्रवृत्ति का बना देता है न कि उसकी बुद्धि को इस प्रकार विकृत कर देता है कि वह उन्माद और अन्य पीड़ादायक मनोरोगों का शिकार बन जाता है। विवेक के अभ्यास से उत्पन्न वैराग्य ही आत्मिक विकास का साधन है। पुरातात्विक एवं श्रेष्ठतर लक्ष्य के ज्ञान से तथा वस्तुस्थिति एवं जीवन की घटनाओं के सही आकलन के आधार पर विषयों के प्रति हमारी अशक्ति से मुक्ति मिलनी चाहिए। जीवन में सम्यक् अभ्यास और स्थिर वैराग्य के आ जाने पर अन्य विक्षेपों के गुणों के अभाव में मन अपने वश में आ जाता है और वह एक ही संसार को जानता है और वह सन्तुलन और समता का संसार है। तब फिर आत्मसंयमरहित पुरुष का क्या होगा
6॥35॥
भगवद गीता अध्याय: 6
श्लोक 36
श्लोक:
असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः।
वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः॥
भावार्थ:
जिसका मन वश में किया हुआ नहीं है, ऐसे पुरुष द्वारा योग दुष्प्राप्य है और वश में किए हुए मन वाले प्रयत्नशील पुरुष द्वारा साधन से उसका प्राप्त होना सहज है- यह मेरा मत है
6॥36॥
व्याख्या-- मेरे मतमें तो जिसका मन वश में नहीं है उसके द्वारा योग सिद्ध होना कठिन है। क्योंकि योग की सिद्धि में मनका वश में न रहना, इतना मन की चंचलता को बढ़ाना नहीं है। जैसे पतिव्रता स्त्री मनको वश में तो लिखती है पर उसे एकाग्र नहीं करती। मूलतः ध्यानयोगिको अपना मन वश में करना नक्षत्र। मन वषेंपर वह मनको जहां भी सोने का सामान ले सकता है, वहां पर लंबा लंबा टुकड़ा लगा रह सकता है और जहां पर शेयर के अवशेष को हटाया जा सकता है। साधक में संयम नहीं रहता अर्थात मन इंद्रियां अंतःकरणका पूर्णतया संयम नहीं होता। इसलिए योगकी प्राप्ति में कठिनता होती है अर्थात् भगवान सदासर्वत्र का जन्म भी जल्दी प्राप्त नहीं होता। कारण कि विषयभोगोंका अधिकांश अभ्यास होनासेउनका मांस आदिकी प्रकार ग्लानि नहीं होता। मांस आदि सर्वथा प्लास्टिक वस्तु खाने से गिरना तो उसी पर होता है जिस पर भी सबसे ज्यादा गिरावट होती है राग अहंकार विषयभोगोंको भोगनेसे। कारण कि मांस आदि में यह रेतीला पदार्थ है ऐसी भावना नहीं रहती है। इसलिए भोगोंके जो संस्कार अंदर बैठते हैं उनमें बड़ी भयंकरता होती है। बारूद है मांस आदि खाने से जो पाप लगता है वह दंड भोगकर नष्ट हो जाएगा। वह पाप आगे नये पापों में नहीं रहेगा। लेकिन राग अहंकार विषयभोगों का सेवन करने से जो संस्कार चित्रित होते हैं वे जन्मजन्मांतरक विषयभोगों में और उनकी रुचि के परिणामस्वरूप पापों में रहते हैं। इसलिए योग की सिद्धि में अर्थात ध्यानयोग की सिद्धि कठिन होती है।परंतु जो तत्परता वशीकरण साधन में लगी है अर्थात जो ध्यानयोगकी सिद्धि जैसे ध्यानयोगके उपयोगी आहारविहार सोनाजागना आदि उपाये का अर्थ है शिष्यका नियतिरूपसे और दृढ़ता का पालन करना और जिसका मन सर्वथा वश में है ऐसे वश्यात्मा साधक योग से प्राप्त कर सकते हैं अर्थात् ध्यानयोगकी सिद्धि मिल सकती है ऐसा मेरा मत है--
वश्यात्मा का उपाय है--सबसे पहले अपने- आप यह समझें कि 'मैं भागी नहीं हूं।' मैं जिज्ञासु हूँ तो केवल तत्त्वको जानना ही मेरा काम है; मैं भगवान्का हूँ तो केवल भगवानके जैसा होना ही मेरा काम है; मैं नौकर हूं तो केवल सेवा करना ही मेरा काम है। किसी से कुछ भी चाहना मेरा काम नहीं है'--इस तरह अपना अहंताका परिवर्तन कर दिया जाए तो मन बहुत जल्दी वशीकरण हो जाता है। जब मन शुद्ध हो जाता है, तब वह स्वतः वशीकरण हो जाता है। मन में उत्पत्ति-विनाशकारी वस्तुका राग ही मनकी कर्ता है। जब साधक एक परमात्मिका दृढ़ उद्देश्य हो जाता है तब उत्पत्ति विनाशशील पदार्थ का राग हट जाता है और मन शुद्ध हो जाता है। अभ्यास में साधक यह सावधानी रखता है कि कभी किसी अंश में पराया हक न आ जाए; क्योंकि पराया हक लेने से मन पराया हो जाता है। कहिँ नौकरी, उधार न करे, तो मिलते हैं उनसे, अधिक काम करे। व्यापार करे तो वस्तु का तौलिया नप या गिनती और क्षमताएं ज्यादा अच्छी ही हो जाये, पर कम न हो। मजदूर आदिको पैसे दे तो उसके काम करने वाले को पैसे दे, उसे कुछ और पैसे दे। इस प्रकार व्यवहार करने से मन शुद्ध हो जाता है।
मार्मिक बात
ध्यानयोगमें अर्जुनने मनकी चंचलताको बाधक माना और लाभकारी वायुको रोककी तरह असम्भव बताया गया। इसपर भगवान मनके निग्रहके लिए अभ्यास और वैराग्य--ये दो उपाय बताएं। इन दोनों में भी ध्यानयोग के लिए 'अभ्यास' मुख्य है (गीता 6। 26)। 'वैराग्य' ज्ञानयोगके लिए विशेष उपयोगी है। हालाँकि वैराग्य ध्यानयोग में भी सहायक है, तथापि ध्यानयोग में रागके रहते हुए भी मन को सिखाया जा सकता है। अगर ये कहा जाए कि रागे रहते थे मन नहीं रुकता, तो एक कहानी आती है। पातंजलयोगदर्शनके अनुसार चित्तवृत्तियों का निरोध अभ्यास ही हो सकता है। यदि वैराग्य ही कारण हो, तो सिद्धियों की प्राप्ति कैसे होगी? (जिसका वर्णन पतंजलयोगदर्शनके विभूतिपाद में किया गया है।) प्रकृति में यदि राग रहता है तो चित्त एकाग्र और निरुद्ध होता है, तो रागके कारण सिद्धियाँ प्रकट होती हैं। क्योंकि संयम (धारणा, ध्यान और समाधि) किसी-न-कोई सिद्धिके लिए जाता है और जहां सिद्धिका उद्देश्य है, वहां राग का अभाव कैसे हो सकता है? लेकिन जहां केवल परमात्मतत्त्वका उद्देश्य होता है, वहां यह धारणा, ध्यान और समाधि भी परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति में सहायक हो जाती है। एकाग्रताके बाद जब चित्तकी निरुद्ध-अवस्था आती है, तब समाधि होती है। समाधि कारण शरीर में होता है और समाधि से भी व्युत्थान होता है। जबतक समाधि और व्युत्थान--ये दो अवस्थाएं हैं, तबतक प्रकृतिके साथ संबंध है। प्रकृतिसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेदित होनेपर तो सहजावस्था होती है, जिससे व्युत्थान होता ही नहीं। मूलतः चित्तकी चंचलताको निषेधके विषय में भगवान अधिकांश नहीं बोले; क्योंकि चित्त को निरुद्ध करना भगवान्का ध्येय नहीं है अर्थात भगवान ने जिस ध्यान का वर्णन किया है, वह ध्यान साधन है, ध्येय नहीं। भगवानके मतमें संसार में जो राग है, यही विशेष बाधा है और अन्यत्र दूर करना ही भगवान का उद्देश्य है। ध्यान तो एक शक्ति है, एक शिखर है, जिसे लौकिक-पारलौकिक सिद्धियों आदि में सम्यक् प्रयोग किया जा सकता है। अपनापन निकालना है। मूलतः जब समाधिसे भी ऊपरति हो जाती है, तब सर्वातीत तत्त्वकी प्राप्ति होती है। ताबतक में एक आकर्षण रहता है। जब वह आधिकारिक तौर पर प्राप्त हो जाता है, तब आकर्षण न रहने वाले साधक जिज्ञासु को ऊपरति हो जाता है। ऊपरति होनेसे अर्थात् राज्यमात्रमातृसे संबंध-विच्छेदसे राज्यातीत चिन्मय-तत्त्वकी भावना स्वतः हो जाती है। यही योगकी सिद्धि है। चिन्मय-तत्त्वके साथ स्वयंका नित्ययोग अर्थात् नित्य-सम्बन्ध है।
संबंध-- पूर्वश्लोक में भगवान ने कहा है कि जिसका अंतःकरण वशीकरण नहीं है, अर्थात जो पूरा सांकेतिक प्रयास करने वाला है, उसे प्राप्त करना कठिन है। इसके आगे अर्जुनके दो श्लोक प्रश्नचिन्ह हैं।
जिस मनको वशीकरण अभ्यास और वैराग्यसंयत् नहीं हुआ है उस मनको वशीकरण न करनेवाले पुरुष को प्राप्त करना कठिन है। ।। लेकिन जो स्वाधीन मनवाला है उसका मन अभ्यास वैराग्य द्वारा वश में किया गया है और जो फिर भी बारंबार यत्न करता है वह ऐसे पुरुष चालित पूर्व उपायों से यह योग प्राप्त कर सकता है।
6॥36॥
भगवद गीता अध्याय: 6
श्लोक 37
श्लोक:
( योगभ्रष्ट पुरुष की गति का विषय और ध्यानयोगी की महिमा )
अर्जुन उवाच
अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः।
अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति॥
भावार्थ:
अर्जुन बोले- हे श्रीकृष्ण! जो योग में श्रद्धा रखने वाला है, किन्तु संयमी नहीं है, इस कारण जिसका मन अन्तकाल में योग से विचलित हो गया है, ऐसा साधक योग की सिद्धि को अर्थात भगवत्साक्षात्कार को न प्राप्त होकर किस गति को प्राप्त होता है?
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स्पष्ट नजर आता है श्रद्धा तो अर्जुन में है विश्वास नहीं तभी तो प्रश्न पर प्रश्न करते है
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इस स्थान पर वेद व्यासजी अर्जुन के मुख से एक अत्यंत सराहनीय प्रश्न चिह्न है जिससे भगवान को वेदांत के महान आशावादी तत्वज्ञान को प्रकाश में लाने का पुन: एक अवसर प्राप्त होता है। योग के दिव्य मार्ग पर चलने वाला कोई भी साधक कदापि नष्ट नहीं होता जो कोई भी उपलब्धि या सफलता प्राप्त कर चुकता है वह खड़िया के रूप में उसके साथ इहलोक और परलोक में भी उपलब्ध रहता है। विभिन्न प्रकार के हुए कल की दीर्घश्रृंखला में हर आज एक सीक्वेल के रूप में जुड़ता है। इस प्रकार यह श्रृखंला जनजातीय बहुलता ही पाई जाती है। जीव की अनुभूति काल की व्युत्पत्ति में मृत्यु भी एक घटना है और आने वाला कल न कोई आकस्मिक घटना होगी और न कोई एक पात्र होगा। वर्तमान के सिद्धांतों और प्रयासों से प्रभावित और परिवर्तित भूतकाल ही भविष्य के रूप में प्रकट होता है। अर्जुन के भगवान से सावधानी के बारे में कुछ अज्ञात सा प्रश्न पूछा गया है कि जो पुरुष पूर्ण श्रद्धा से योग साधना करता है वह अपने जीवन काल में पूर्ण आत्मसंयम करता है। प्राप्त नहीं होता है या योगाभ्यास में प्रयास के अभाव से उसके मन में सफलता नहीं मिलती है, लेकिन योगाभ्यास का त्याग करने से उसे विषयों का सुख नहीं मिलता है और उसी प्रकार योग में सफलता और मिलन के कारण योग होता है। का अनंत आनंद भी प्राप्त हुआ नहीं होगा. हालाँकि वेदांती केवल विषय भोग के जीवन की निंदा करते हैं तथापि वे इस तथ्य को कभी भी प्रमाणित नहीं कर पाते हैं कि विषयों में क्षणिक सुख ही होता है। लेकिन उनका मैट ऑफर विषयानंद भी वस्तुत ब्रह्मानंद का ही हिस्सा है या आभास है। अर्जुन को भय है कि संभावित श्रीकृष्ण द्वारा उपदिष्ट योग के पालन में मनुष्य अल्पविषयानंद और अनंत ब्रह्मानंद दोनों से आलोचना ही रह जाएगी। परंतु यदि साधना में रत उस योगी के जीवनसूत्र को अनिश्चित काल की कैंची काट दिया जाता है तो वह ब्रह्मानंद को पाने का अवसर खो देता है जिसे गीता में जीवन के लक्ष्य के रूप में निर्देशित किया गया है। या हो सकता है कि योगी का मन किसी कारण से बेकार हो जाए। योग में सफलता पाना निसंदेह ही महान विजय है सर्वोत्कृष्ट उपलब्धि है। परन्तु यदि अदृश्य उचक वृत्ति रूपी गदा के द्वारा साधक धराशयी हो जाए तो उसे इहलोक और परलोक का भी सुख नहीं मिलेगा। अत अर्जुन ऐसे साधक की गति जानना चाहता है। इस श्लोक में कथित श्रद्धा को अंधविश्वास नहीं चाहिए। बुद्धि की उस क्षमता को श्रद्धा से कहा जाता है जिसे शास्त्रों और आचार्यों के उपदेशों से समझा जा सकता है। बुद्धि के निर्धारण से हृदय में चमकने वाली भक्ति की उस प्रबल शक्ति को श्रद्धा कहती है जो पर्वतों को धारण कर सकती है और जो स्वर्ग को पृथ्वी पर उद्घाटित कर सकती है। योगभ्रष्ट पुरुष के चित्रों को और अधिक स्पष्ट करने के लिए अर्जुन आगे कहते हैं।रुकते ही नहीं और गुरु भी तंग नहीं पड़ते।
6॥37॥
भगवद गीता अध्याय: 6
श्लोक 38
श्लोक:
कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति।
अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि॥
भावार्थ:
हे महाबाहो! क्या वह भगवत्प्राप्ति के मार्ग में मोहित और आश्रयरहित पुरुष छिन्न-भिन्न बादल की भाँति दोनों ओर से भ्रष्ट होकर नष्ट तो नहीं हो जाता?
6॥38॥
संभव है कि ब्रह्म प्राप्ति के मार्ग पर कोई श्रद्धावान साधक मृत्यु का ग्रास बन जाए या संयम के अभाव में योग से पतित हो जाए। उनके पतन को दर्शन देने के लिए जो अति सुंदर और प्रभावोत्पादक दृष्टान्त अर्जुन के मुख से महर्षि व्यासजी ने दिया है, वह उन्हें प्राथमिक वैज्ञानिक क्षेत्र में उद्धृत करता है। ।। तीव्र वेग से प्रवाहित वायु के स्पर्श से वह मेघ खण्डों में अनेक छोटे छोटे मेघ खण्डों में विभक्त हो जाता है। ये मेघखंड पूर्णतया प्रबल वायु की दया पर सहयोगी इतस्तत लक्ष्यहीन भ्रमण करते हैं। ग्रीष्म ऋतु के ये मेघ नृवंशों की यात्राएं पूर्ण कर सकते हैं और न त्रिशितों की पिपासा को ही शांत कर सकते हैं। किसी भी सुरक्षित स्थान को न प्राप्त कर अंत में वे स्वयं भी नष्ट हो जाते हैं। अर्जुन का प्रश्न है कि योगभ्रष्ट पुरुष की गति भी उस मेघ के समान ही नहीं होगीअर्जुन का यह प्रश्न क्यों पूछता है वह स्वयं ही इसका कारण बताता है।
6॥38॥
भगवद गीता अध्याय: 6
श्लोक 39
श्लोक:
एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः।
त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते॥
भावार्थ:
हे श्रीकृष्ण! मेरे इस संशय को सम्पूर्ण रूप से छेदन करने के लिए आप ही योग्य हैं क्योंकि आपके सिवा दूसरा इस संशय का छेदन करने वाला मिलना संभव ही नहीं है
6॥39॥
इस प्रकरण के अंतिम श्लोक में अर्जुन ने स्पष्ट कहा है कि हे कृष्ण आप मेरे इस संशय को दूर कर सकते हैं। इस प्रश्न से यह स्पष्ट हो गया है कि उसकी पूर्व पत्नी का विश्वास पूर्णतया निवृत्त हो गया था। उनके पूर्व साध्य समत्वयोग की अशक्तता के संबंध में था जिसका मुख्य कारण मन का चंचल स्वभाव था। संशयनिवृत्ति का उपाय है मनन।
सत्संग से भी विचार प्राप्त कर संशय दूर हो जाते हैं। प्रत्येक साधक की साधना एवं भावना के आधार पर उसे देहत्याग के आदर्श श्रेष्ठ जीवन का ज्ञान भगवान देते हैं। पूर्ण राह होती है या मन की बहिर्मुखी प्रवृत्ति के कारण वे योग से पतित हो जाते हैं।6॥39॥
भगवद गीता अध्याय: 6
श्लोक 40
श्लोक:
श्रीभगवानुवाच
पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते।
न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति॥
भावार्थ:
श्री भगवान बोले- हे पार्थ! उस पुरुष का न तो इस लोक में नाश होता है और न परलोक में ही क्योंकि हे प्यारे! आत्मोद्धार के लिए अर्थात भगवत्प्राप्ति के लिए कर्म करने वाला कोई भी मनुष्य दुर्गति को प्राप्त नहीं होता
6॥40॥
श्रीभगवान् बोले हे पार्थ उस योगभ्रष्ट पुरुषका इस लोक या परलोक में कहीं भी नाश नहीं होता। पहलेकी अंतिम हीनजन्मकी प्राप्तिका नाम नाश है इसलिए ऐसी अवस्था में योगभ्रष्टकी नहीं होती। क्योंकि यह शुभ कार्य करने वाला है, कोई भी मनुष्य दुर्गतिको अर्थात् गति को नीचा नहीं पाता। पिता पुत्ररूपसे आत्मा का विस्तार होता है मूलतः पुत्ररूपसे कहा जाता है और पिता ही पुत्ररूपसे उत्पन्न होता है मूलतः पुत्रको भी तात कहा जाता है। शिष्य भी पुत्रके तुल्य है इसलिए उसे भी तात कहते हैं।
अपने उत्तर के नामों में ही भगवान स्पष्ट बातें कहते हैं कि कोई भी शुभ कर्म करने वाला न इहलोक में और न ही परलोक में दुर्गति को प्राप्त होता है। दैवी आदेश से जिसे धर्मपारायण लोगों ने स्वीकार करना शुरू कर दिया है। मनुष्य की बुद्धि एवं तर्क के विरुद्ध कोई भी मत को हिन्दू स्वीकार न करे, वह किसी देवता का मत क्यों न हो। धर्म जीवन विज्ञान है और इसी के साथ प्रतिपादित सिद्धांत और साधनाओं का युक्ति विवेचन भी आवश्यक है। होता है। वर्तमान पुण्य कर्म करने वाले भविष्य में कभी दुख नहीं मिलेगा क्योंकि भूत और वर्तमान का परिणत रूप ही भविष्य है। अर्जुन को योगभ्रष्ट के नाश का संकट होने का कारण यह था कि जीवन की साख और नियम-सिद्धांत को वह ठीक से समझ नहीं पाया था। जन्म और मृत्यु के साथ ही जीव की मान्यता का कर्ता और नाश हुआ मूर्ति दर्शन की अवस्था में ही संभव है। वस्तुत: ऐसे सिद्धांत के दर्शन भी नहीं किए जा सकते।साहसिक बुद्धि के जो जिज्ञासु साधक जीवन के नियम और अर्थ और विश्व के दृष्टिकोण को जानना चाहते हैं उन्हें यह स्वीकार करना चाहिए कि मनुष्य का वर्तमान जीवन सत्य के दर्शन को सुशोभित करने वाले अनंत सौन्दर्य के कण्ठभरण हैं। का एक मुक्ता है. भूत का परिणाम वर्तमान में है और प्रत्येक विचार ज्ञान कर्म के द्वारा हम भविष्य की ओर आकर्षित हो रहे हैं। डेमोक्रेसी में देहधारी जीव के पूर्वजन्म और पुनर्जन्म में विश्वास किया जाता है। इसी को पुनर्जन्म का सिद्धांत कहते हैं। इसी सिद्धांत के आधार पर श्रीकृष्ण हैं यहां योगी के विनाश या दुर्गति की परिकल्पना को मंजूरी मिलती है। ऐसा हो सकता है कि कभी-कभी साधक का पतन हो जाए या मृत्यु घटित हो जाए, जिससे उसका विनाश न हो। आज का परिणत रूप भविष्य है।पुत्रों को संस्कृत में तात कहा गया है। उपनिषदों में भी शिष्य का पुत्र रूप में वर्णन किया गया है। उसी परंपरा के अनुसार अर्जुन को तात कलंक दिखाने में उनके प्रति भगवान का पुत्रवत भाव स्पष्ट हो जाता है। कोई भी व्यक्ति अन्य लोगों के प्रति बहुत ही दुष्ट होता है और वंचना का भाव क्यों नहीं होता है लेकिन अपने ही पुत्र को प्रभावित करने वाले व्यक्ति का विचार उसके मन में कभी नहीं आता है। इसी पितृप्रेम से श्रीकृष्ण अर्जुन का चित्रण करते हैं कि साधक का कभी वास्तविक पतन नहीं होता। आत्मिक विकास की सीढ़ी पर एक भी सोपान औषधि का अर्थ पूर्णत्व की ओर है। योगसिद्धि जिसे प्राप्त नहीं हुई उसका निश्चित रूप से क्या गति होती है, भगवान कहते हैं।
6॥40॥
भगवद गीता अध्याय: 6
श्लोक 41
श्लोक:
प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः।
शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते॥
भावार्थ:
योगभ्रष्ट पुरुष पुण्यवानों के लोकों को अर्थात स्वर्गादि उत्तम लोकों को प्राप्त होकर उनमें बहुत वर्षों तक निवास करके फिर शुद्ध आचरण वाले श्रीमान पुरुषों के घर में जन्म लेता है
6॥41॥
परलोक की गति इहलोक में मिले कर्मों और उनके अनुयायियों पर प्रतिबंध है। कर्म मुख्यत: दो प्रकार के होते हैं पाप और पुण्य। पापकर्म का आचरण करने वालों की अधोगति होती है केवल पुण्यकर्म का आश्रय लेने वाले ही आध्यात्मिक विकास करते हैं। हमारे शास्त्रों में पुण्यकर्मों को भी दो टुकड़ों में बाँटा गया है
(क) सकाम कर्म अर्थात् इच्छा से प्रेरित कर्म और
(ख) निष्काम कर्म अर्थात् भावना से ईश्वर की पूजा समझकर किया गया कर्म।
कर्म का फल कर्ता के उद्देश्य के अनुसार अलग-अलग होते हैं इसलिए सकाम और निष्काम कर्मों के फल निर्धारित ही अलग-अलग होते हैं। पूर्णत्व के चरम लक्ष्य तक की प्रकृति में पवित्रता का मार्ग भी भिन्न है। जो लोग स्वर्गादि लोकों को ईश्वर के स्वर्ग यज्ञगादि तथा अन्य पुण्य कर्म से प्राप्त करते हैं उन्हें देहत्याग के बाद छोड़ दिया जाता है ऐसे ही लोकों की प्राप्ति होती है जो उनकी प्रतिज्ञा को पूर्ण करने के लिए उपयुक्त हैं हो। उस लोक में वास करके वे पुन: इस लोक में शुद्ध आचरण करने वाले धनवान पुरुषों के घर जन्म लेते हैं। संक्षेप में यदि दृढ़ इच्छा और प्राकृतिक प्रयास हो तो मनुष्य की कोई भी इच्छा हो वह यथासमय पूर्ण होती है। परंतु निष्काम भाव से पुण्य कर्म करने वालों की क्या गति होती है भगवान कहते हैं
6॥41॥
भगवद गीता अध्याय: 6
श्लोक 42
श्लोक:
अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम्।
एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम्॥
भावार्थ:
अथवा वैराग्यवान पुरुष उन लोकों में न जाकर ज्ञानवान योगियों के ही कुल में जन्म लेता है, परन्तु इस प्रकार का जो यह जन्म है, सो संसार में निःसंदेह अत्यन्त दुर्लभ है
6॥42॥
इस श्लोक में ऐसे निष्काम साधक की गति दिव्य दी गई है जिसकी स्वर्गादि लोकों की कोई आवश्यकता नहीं रहती। निष्काम भाव से की गई उपासना से योगी को शुद्धान्तकरण और एकाग्रता प्राप्त होती है जिससे वह ध्यान की उच्च साधना करने योग्य बन जाता है। इस प्रकार के श्रेष्ठ साधकों को ऐसा अवसर प्रदान करना चाहिए कि वह देहत्याग की भूमिका को सीधे ही पुन: इस लोक में जन्म लेकर अपने मार्ग पर निर्जीव हो सकें। उसे स्वर्ग जाने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि वह वैराग्यवान है जबकि स्वर्ग भोग भूमि है। भगवान कहते हैं कि ऐसा निष्काम साधक मृत्यु के अवशेष ही ज्ञानवान योगियों के कुल में पैदा होते हैं जहां वह अपनी साधना को निर्विघ्न पूर्ण कर सकते हैं। इसके विरोध में इस्लामिक श्लोकों में कथित सिद्धांत का खंडन किया गया है। क्यों कि इस्लाम युद्ध में मारे जाने पर 72 हूरें मिलती है।क्रिश्चन स्वर्ग से आगे नहीं जाता है।चलो मूल पर आते है
निसानदेह ही मनुष्य एक सीमा तक के दृश्य दर्शन से प्रभावित होता है, लेकिन शास्त्र की दृष्टि से देखने पर पता चलता है कि सभी वर्तमान मनुष्य जिन वातावरण और परिदृश्य में रह रहे हैं। फ़्लोरिडा के परिवर्तन से व्यक्तिगत रूप से वास्तविक सुधार नहीं हो सकता है। यदि खुरपान के अभ्यासी व्यक्ति को किसी ऐसे नगर में ले जाएं जहां सुरपान की अनुपस्थिति है तो वह व्यक्ति वहां भी छिपकर आतंकपान करता है। श्रीशंकराचार्य ईसामसीह गौतम बुद्ध और कई अन्य महापुरुषों के उदाहरण विचार अनुशासन श्लोक में कथित सिद्धांत की पुष्टि करते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि ऐसे मेधावी पुरुष विरले ही होते हैं जिनमें कुमार राज्य में ही अलौकिक अलौकिक एवं ईश्वरीय ज्ञान के दर्शन होते हैं। भगवान स्वयं कहते हैं कि इस प्रकार का जन्म लोक में अति दुर्लभ है। पूर्व श्लोक में कहा गया है कि राग योगी स्वर्ग के चित्र का जन्म होता है जबकि यहां वैराग्यवान योगभ्रष्ट के विषय में कहा गया है कि वह सीधे ही ज्ञानी योगी के घर में जन्म लेकर पूर्णत्व प्राप्ति के मार्ग पर उद्बोधन होता है। साबुत हुए योगभ्रष्ट की स्थिति में भगवान पुरुष को क्या कहा जाता है
6॥42॥
भगवद गीता अध्याय: 6
श्लोक 43
श्लोक:
तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम्।
यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन॥
भावार्थ:
वहाँ उस पहले शरीर में संग्रह किए हुए बुद्धि-संयोग को अर्थात समबुद्धिरूप योग के संस्कारों को अनायास ही प्राप्त हो जाता है और हे कुरुनन्दन! उसके प्रभाव से वह फिर परमात्मा की प्राप्तिरूप सिद्धि के लिए पहले से भी बढ़कर प्रयत्न करता है
6॥43॥
किसी को भी यह खतरा हो सकता है कि उस साधक को पुन:प्राप्ति के लिए साधना का अभ्यास करना पड़े। यह आपदा निर्मूल है। भगवान कहते हैं कि योग के अनुकूल वातावरण में जन्म लेने के लक्षण वह पुरुष पूर्व देह में लेखन ज्ञान से संकलित हो जाते हैं, जहां अन्य लोगों की आवश्यकता होती है, वह अपनी शिक्षा को अधिक सरलता से पूर्ण कर लेता है। कारण यह है कि उसके लिए यह कोई नवीन अध्ययन नहीं है, जो कि वर्ण पूर्वअर्जित ज्ञान की मात्रा प्रारंभ या सिंहावलोकन ही होता है। अल्पकाल में ही वह अपने हृदय में ही ज्ञान को सिद्ध करता है, जो अव्यक्त रूप में पूर्व में ही निहित था। इसमें उत्साह क्षमता और प्रयास की कमी शामिल नहीं है। प्रयास करें अनुपयोगी ज्ञान साधक के लिए दुःखद भार ही बनता है। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि हे कुरुन्नंदन योगभ्रष्ट पुरुष संसिद्धि के लिए और भी अधिक प्रयास करते हैं।
6॥43॥
भगवद गीता अध्याय: 6
श्लोक 44
श्लोक:
पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः।
जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते॥
भावार्थ:
वह (यहाँ 'वह' शब्द से श्रीमानों के घर में जन्म लेने वाला योगभ्रष्ट पुरुष समझना चाहिए।) श्रीमानों के घर में जन्म लेने वाला योगभ्रष्ट पराधीन हुआ भी उस पहले के अभ्यास से ही(जहां से उस का योग छुटा था आगे बढ़ता है)
निःसंदेह भगवान की ओर आकर्षित किया जाता है तथा समबुद्धि रूप योग का जिज्ञासु भी वेद में कहे हुए सकाम कर्मों के फल को उल्लंघन कर जाता है
6॥44॥
भगवद गीता अध्याय: 6
श्लोक 45
श्लोक:
प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः।
अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो यात परां गतिम्॥
भावार्थ:
परन्तु प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करने वाला योगी तो पिछले अनेक जन्मों के संस्कारबल से इसी जन्म में संसिद्ध होकर सम्पूर्ण पापों से रहित हो फिर तत्काल ही परमगति को प्राप्त हो जाता है
नोट:
हिंदू धर्म और गीता में कर्म को मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है:
1. *निष्काम कर्म (निस्वार्थ कर्म)*: यह वह कर्म है जो बिना किसी व्यक्तिगत लाभ या फल की अपेक्षा के किया जाता है। इसमें कर्ता का ध्यान केवल कर्म पर होता है, न कि उसके परिणाम पर।
2. *सकाम कर्म (स्वार्थी कर्म)*: यह वह कर्म है जो व्यक्तिगत लाभ या फल की अपेक्षा से किया जाता है। इसमें कर्ता का ध्यान कर्म के परिणाम पर होता है, जैसे कि धन, प्रतिष्ठा, या सुख।
3. *अकर्म (निष्क्रियता)*: यह वह स्थिति है जब व्यक्ति किसी भी प्रकार का कर्म नहीं करता है। यह निष्क्रियता हो सकती है, जो अक्सर आलस्य या असफलता की भावना से जुड़ी होती है।
इन तीनों श्रेणियों के अलावा, कर्म को और भी कई तरीकों से वर्गीकृत किया जा सकता है, जैसे कि:
- *प्रारब्ध कर्म*: यह वह कर्म है जो पिछले जन्मों के कर्मों के परिणामस्वरूप इस जन्म में किया जाता है।
- *संचित कर्म*: यह वह कर्म है जो वर्तमान जन्म में किया जाता है और जिसके परिणाम भविष्य में मिलते हैं।
- *आगामी कर्म*: यह वह कर्म है जो भविष्य में किया जाएगा और जिसके परिणाम उस समय मिलेंगे।
नित्य कर्म वह कर्म होते हैं जो नियमित रूप से और बिना किसी विशेष अवसर या उद्देश्य के किए जाते हैं। ये कर्म आमतौर पर दैनिक जीवन के हिस्से होते हैं और इन्हें करने से व्यक्ति को शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक लाभ मिलते हैं।
नित्य कर्म के उदाहरण:
सुबह और शाम को स्नान करना
दैनिक पूजा-पाठ करना
योग और ध्यान करना
स्वस्थ आहार लेना
नियमित व्यायाम करना
समय पर सोना और उठना
नित्य कर्म करने से व्यक्ति को कई लाभ मिलते हैं, जैसे कि:
शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार
मानसिक शांति और स्थिरता
आध्यात्मिक विकास और आत्म-साक्षरता
दैनिक जीवन में अनुशासन और समय प्रबंधन
आत्मविश्वास और आत्म-सम्मान में वृद्धि
6॥45॥
भगवद गीता अध्याय: 6
श्लोक 46
श्लोक:
तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः।
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन॥
भावार्थ:
योगी तपस्वियों से श्रेष्ठ है, शास्त्रज्ञानियों से भी श्रेष्ठ माना गया है और सकाम कर्म करने वालों से भी योगी श्रेष्ठ है। इससे हे अर्जुन! तू योगी हो
6॥46॥
आत्मिक विकास के अनेक साधकों में ध्यान की महत्ता के लिए भगवान के दर्शन होते हैं, यहां विभिन्न प्रकार के साधकों के निर्देश देकर वे योगी को सर्वश्रेष्ठ शिष्य होते हैं। मंदबुद्धि के वे लोग जो केवल शारीरिक तप के बारे में विचार करते हैं उन तपस्वियों से निश्चित ही योगी श्रेष्ठ हैं। ज्ञानियों से भी योगी को श्रेष्ठ माना जाता है। यहां ज्ञानी से समुद्र शास्त्र पंडित्य रखने वाले पुरुष से हैं। सकाम या निष्काम कर्म करने वालों से भी योगी श्रेष्ठ है। निष्काम भाव से कर्म और उपासना करने वाले अनेक साधकों की यह धारणा है कि इनका ही परम लक्ष्य है। भगवान कहते हैं कि जो योगी अपने शरीर, मन और बुद्धि के साथ मिथ्या तादात्म्य को दूर करके आत्मानुसंधान करता है वह तपस्वी है। ज्ञानी और साम्यवादी से श्रेष्ठ है क्योंकि वह सत्य के अत्यंत निकट है। इसलिए हे अर्जुन तुम योगी बनो। योगी के भी कई प्रकार होते हैं जिनमें हर एक का ध्येय अलग-अलग हो सकता है। अत: उन सब में श्रेष्ठ योगी किसे भगवान कहते हैं?
सकामभाववाले) तपस्वियों से भी योगी श्रेष्ठ है, ज्ञानियों से भी योगी श्रेष्ठ है और संतों से भी योगी श्रेष्ठ है -- ऐसा मेरा मत है। मूलतः हे अर्जुन ! तू योगी हो जा।
6॥46॥
भगवद गीता अध्याय: 6
श्लोक 47
श्लोक:
योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना।
श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः॥
भावार्थ:
सम्पूर्ण योगियों में भी जो श्रद्धावान योगी मुझमें लगे हुए अन्तरात्मा से मुझको निरन्तर भजता है, वह योगी मुझे परम श्रेष्ठ मान्य है
6॥47॥
पूर्व श्लोक में आध्यात्मिक साधनाओं का तुलनात्मक आकलन करके ध्यानयोग को सर्वोत्तम सिद्ध किया गया है। अब इस श्लोक में सभी योगियों में भी सर्वश्रेष्ठ योगी कौन है यह स्पष्ट हो गया है। ध्यानाभ्यास की स्थिर अवस्था में साधकों को प्रयास करना चाहिए ध्येय विषयक वृत्ति बनाये रखें, और मन को बारम्बार वी. ध्यान अभ्यास से परावृत्त करना है। स्वाभाविकता ही है कि विशिष्टता में ध्यान का प्रयास करना ही सहज नहीं होगा। ध्यान (ध्यान का विषय) के स्वरूप और मन को स्थिर करने की विधि के आधार पर ध्यान के विभिन्न प्रकारों से अभ्यास किया जा सकता है। इस दृष्टि से हमारी परंपरा में प्रतीकोपासना ईश्वर के सगुण साकार रूप का ध्यान गुरु की आराधना कुंडलिनी पर ध्यान या मंत्र के जपरूप ध्यान आदि का उपदेश दिया गया है। इसी आधार पर कहा जाता है कि योगी भी अनेक प्रकार के होते हैं। यहां भगवान स्पष्ट करते हैं कि आध्यात्मिक योगियों में श्रेष्ठ और सफल योगी कौन है। जो श्रद्धावान योगी मुझसे एक रूप हो गए हैं और मुझे भजता है वह युक्ततम है। यह श्लोक संपूर्ण योगशास्त्र का सार है और इस कारण इसके गूढ़ अभिप्राय को स्पष्ट करने के लिए अनेक ग्रंथों की रचनाएँ उपलब्ध हैं। यही कारण है कि भगवान आगामी संपूर्ण अध्याय में इस मंत्र रूप श्लोक का वर्णन करते हैं। लीन करके शुद्ध स्वरूप की भावना में है। यह कार्य वही पुरुष कल्पित कर सकता है जो श्रद्धायुक्त आपका अर्थात् आत्मस्वरूप का ही भजन करता है। ऐसी पूजा का न पुजारी के लिए विशेष अर्थ होता है और न उन भक्तों को जो पूजा कर्म को देखते हुए रहते हैं। कभी-कभी भजन का अर्थ होता है वाद्यों के साथ उच्च स्वर में कीर्तन करना जिसमें भावुक प्रवृत्ति के लोगों को बड़ा रस आता है और वे भावों में उधम मचाते हैं। यदा कदा ही उन्हें आत्मानन्द का अज्ञात सा भान होगा। वेदांत शास्त्र में भजन का अर्थ है जीव का कर्तव्य सेवा कर्म बताया गया है। पूर्ण भक्ति समर्पण से उस साधक को मन से परे आत्मतत्त्व का साक्षात् अनुभव होता है। इस प्रकार जो योगी आत्मानुसंधान रूप भजन करता है वह परमात्मस्वरूप में एक हो जाता है। ऐसे ही योगी को यहां सर्वश्रेष्ठ कहा गया है
। ब्रह्मविद्या और योगशास्त्र स्वरूप के रूप में श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद् का ध्यानयोग नामक छठवाँ अध्याय समाप्त होता है।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे आत्मसंयमयोगो नाम षष्ठोऽध्यायः
॥6॥