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रविवार, 10 दिसंबर 2023

दलीप कुमार

जन्म
मुहम्मद युसुफ खान
*🎂11 दिसम्बर 1922*
पेशावर, ब्रिटिश भारत
मृत्यु
*⚰️07 जुलाई 2021 (उम्र 98)
हिंदूजा हॉस्पिटल मुंबई, महाराष्ट्र, भारत
मृत्यु का कारण
उम्र संबधी बीमारी
राष्ट्रीयता
भारतीय
व्यवसाय
अभिनेता
कार्यकाल
१९४४-१९९९
धार्मिक मान्यता
इस्लाम
जीवनसाथी
सायरा बानो (वि॰ 1966–2021) (मृत्यु तक)
असमा रहमान (वि॰ 1981; वि॰वि॰ 1983)
माता-पिता
पिता:- लाला गुलाम सरवर (जमींदार और फल विक्रेता)

मां:- आयशा
संबंधी
नासिर ख़ान (अभिनेता) (भाई)
बेगम पारा (भाभी)
अयूब खान (अभिनेता) (भतीजा)
पुरस्कार
सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार (सर्वोत्तम 8 बार)
दादासाहेब फाल्के पुरस्कार (1994)

अपने करियर के शुरुआती वर्षों में कई सफल त्रासद या दु:खद भूमिकाएं करने के कारण उन्हें मीडिया में 'ट्रेजिडी किंग' भी कहा जाता था। व्यापार विश्लेषकों के अनुसार उनकी बहुत सी फ़िल्में इसलिए भी कामयाब हुईं क्योंकि जनता सिर्फ़ उनकी अदाकारी देखने आया करती थी फिर चाहे उन चलचित्रों में खास मनोरंजन के तत्व ना भी हों। इस प्रकार के वाक्या और किसी भी अदाकार के साथ नही हुएं हैं। उन्होंने बहुत सी बड़े पैमाने पर कामयाब फ़िल्मों में अदाकारी की है जो आजतक सबसे सफल चलचित्रों में गिनी जातीं हैं जैसे मुग़ल-ए-आज़म (१९६०), गंगा जमना (१९६१), इत्यादि। उन्होंने अपने करियर के दूसरे पड़ाव में भी कई अत्यंत कामयाब फिल्में दीं जब वह वृद्ध किरदार की भूमिका में भी प्रमुख किरदार निभा रहे थे। ऐसा वाक्या भी उनके अतिरिक्त किसी अदाकार के साथ नहीं हुआ है। उन्होंने फिल्मों में अदाकारी को रंगमंच से अलग किया और उसे नई परिभाषा दी जिसका प्रभाव उनके बाद के कलाकारों पर रहा।१९९८ में आई किला उनके करियर की आखिरी फ़िल्म थी। उन्हें वर्ष १९९४ में भारतीय सिनेमा का सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। अपने अभिनय और भारत-पाकिस्तान के रिश्तों में सुधार लाने के लिए उन्हें पाकिस्तान का सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार निशान-ए-इम्तियाज़ दिया गया जिसे प्राप्त करने वाले वे इकलौते भारतीय हैं।

दिलीप कुमार के जन्म का नाम मुहम्मद युसुफ़ खान था। उनका जन्म ब्रिटिश भारत के पेशावर (अब पाकिस्तान मे) में हुआ था। उनके पिता मुंबई आ बसे थे, जहाँ उन्होने हिन्दी फ़िल्मों में काम करना शुरू किया। उनका नाम उस वक्त के चलन के अनुसार बदल कर दिलीप कुमार कर दिया गया ताकि उन्हे हिन्दी फिल्मों में ज़्यादा पहचान मिले और उनका नाम एक हीरो की छवि के ऊपर जच सके।

दिलीप कुमार का 7 जुलाई 2021 को 98 वर्ष की आयु में सुबह 7:30 बजे हिंदुजा अस्पताल, मुंबई में निधन हो गया। लंबी बीमारी के बाद उनका निधन हो गया। वह टेस्टिकुलर कैंसर और फुफ्फुस बहाव के अलावा कई उम्र से संबंधित बिमारियों से पीड़ित थे। महाराष्ट्र सरकार ने उसी दिन जुहू मुस्लिम कब्रिस्तान में राजकीय सम्मान के साथ उनके अंतिम संस्कार को मंजूरी दी।

अपनी संवेदना व्यक्त करते हुए, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक ट्वीट में कहा कि कुमार को एक सिनेमाई किंवदंती के रूप में याद किया जाएगा, जबकि राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने कहा कि "उन्हें उपमहाद्वीप में प्यार किया गया था"। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने भी उनके निधन पर शोक व्यक्त किया और शौकत खानम मेमोरियल कैंसर अस्पताल के लिए एक ट्वीट में धन जुटाने के उनके प्रयासों को याद किया। अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई और बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने भी कुमार और उनके परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त की।

शुक्रवार, 7 जुलाई 2023

चंद्रशेखर

अभिनेता चन्द्रशेखर के जन्मदिन पर हार्दिक श्रद्धांजलि

🎂जन्म 7 जुलाई, 1922

⚰️ 16 जून, 2021
चंद्रशेखर वैद्य भारतीय सिने अभिनेता थे। उन्हें मुख्यत: चंद्रशेखर के नाम से ही जाना जाता था। वैसे तो उन्होंने कई फ़िल्मों में अभिनय किया लेकिन उन्हें मुख्य पहचान रामानंद सागर के टीवी धारावाहिक 'रामायण' में अपने किरदार आर्य सुमंत के कारण मिली। रामायण की कथा के अनुसार सुमंत महाराजा दशरथ के महामंत्री थे। धारावाहिक में चंद्रशेखर ने सुमंत की भूमिका में जान डाल दी थी। चंद्रशेखर का अभिनय कॅरियर सिर्फ रामायण तक सीमित नहीं रहा। उन्‍होंने 100 से अध‍िक फिल्‍मों में छोटे-बड़े रोल किए। उन्होंने 50 से लेकर 90 के दशक तक 'गेटवे ऑफ इंडिया', 'बरसात की रात', 'कटी पतंग', 'द बर्निंग ट्रेन', 'नमक हलाल', 'डिस्को डांसर', 'शराबी', 'त्रिदेव' जैसी फिल्मों में काम किया।

परिचय

चंद्रशेखर वैद्य का जन्म 7 जुलाई, 1922 को हैदराबाद में हुआ था। उनके पिता सरकारी अस्पताल में डॉक्टर थे। चंद्रशेखर जब छोटे थे, तब उनकी मां गुजर गई। इसके बाद पिता ने दूसरी शादी कर ली। उनकी सौतेली मां इनसे छोटी थी। चंद्रशेखर वैद्य को आर्थिक तंगी के कारण स्कूल छोड़ना पड़ा। सन 1940 में वह अपनी दादी के साथ बैंगलोर चले गए। इस दौरान उनकी पत्नी उनके साथ नहीं थीं। एक वक्त ऐसा भी आया, जब उन्होंने चौकीदार का भी काम किया। साल 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन का हिस्सा भी बने।

घर लौटने के बाद चंद्रशेखर वैद्य ने राम गोपाल मिल्स में काम किया। इसके बाद दोस्तों के कहने पर फिल्मों में किस्मत आजमाने मुंबई आ गए। उस वक्त इनकी जेब में केवल 40 रुपए थे। कई वक्त तक उन्होंने स्टूडियो के चक्कर काटे और आखिर में एक पार्टी सीन में छोटा-सा रोल मिल गया। चंद्रशेखर कुछ वक्त जूनियर आर्टिस्ट काम करने के बाद मुंबई छोड़कर पुणे में बतौर सिंगर काम किया। इसके बाद इन्होंने भारत भूषण के साथ मिलकर तीन फिल्में बनाई। साल 1950 में फिल्म 'बेबस' से अपने कॅरियर की शुरुआत की।

इसके अलावा 'बारादरी', 'काली टोपी लाल रुमाल', 'स्ट्रीट सिंगर' में वह लीड रोल में नजर आए। इसके अलावा वह 'नमक हलाल', 'डिस्को डांसर', 'शराबी', 'हुकूमत', 'अनपढ़', 'साजन बिना सुहागन', 'संसार' जैसी कई फिल्मों में कैरेक्टर रोल में नजर आए। 65 साल की उम्र में वह रामायण में आर्य सुमंत के रोल में नजर आए थे। चंद्रेशेखर वैद्य रामायण सीरियल के सबसे बुजुर्ग एक्टर थे। दरअसल वह और रामानंद सागर दोनों अच्छे दोस्त थे। उनके कहने पर ही चंद्रेशेखर ने आर्य सुमंत का किरदार निभाया था। 78 साल की उम्र में 'खौफ' के बाद वह इंडस्ट्री से रिटायर हो गए। वह 1964 में आई फिल्म 'चा चा चा' और 'स्ट्रीट सिंगर' (1966) के प्रोड्यूसर और डायरेक्टर भी रहे।

मृत्यु

राजा दशरथ के महामंत्री सुमंत का किरदार निभाने वाले अभिनेता चंद्रशेखर वैद्य का उम्र संबंधी दिक्कतों के चलते 16 जून, 2021 को निधन हुआ।

महान संगीतकार अनिल बिस्वास

महान संगीतकार अनिल बिस्वास के जन्मदिन पर हार्दिक श्रद्धांजलि
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*अनिल बिस्वास*
 *🎂जन्म: 7 जुलाई, 1914; 
⚰️मृत्यु: 31 मई, 2003*
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 बॉलीवुड के प्रसिद्ध संगीतकार थे। हिन्दी फ़िल्मों के गीत-संगीत के स्वर्ण-युग के सारथी अनिल बिस्वास रहे हैं। उन्होंने न सिर्फ अपने संगीत से फ़िल्म संगीत को शास्त्रीय, कलात्मक और मधुर बनाया बल्कि अनेक गायक-गायिकाओं को तराशकर हीरे-जवाहरात की तरह प्रस्तुत किया। इनमें तलत महमूद, मुकेश, लता मंगेशकर, सुरैया के नाम प्रमुखता से गिनाए जा सकते हैं। अनिल बिस्वास शास्त्रीय संगीत के निष्णात होने के साथ लोक-संगीत के अच्छे जानकार थे। उनकी धुनों में जो संगीत है, वह अब हमारी विरासत बन गया है।

जीवन परिचय

अनिल बिस्वास का जन्म बारीसाल, पूर्वी बंगाल में 7 जुलाई, 1914 को हुआ था, जो अब बांग्लादेश है। वे स्वतंत्रता संग्राम में भी शामिल हुए और बंगाल के महान् कवि और संगीतकार काज़ी नज़रुल इस्लाम के भी संपर्क में रहे। वे काफ़ी कम उम्र में कोलकाता चले आए और उसके बाद वहाँ से 1934 में मुंबई चले गए। मुंबई की फ़िल्मी दुनिया में आकर उन्होंने देखा कि यहाँ तो हर प्रांत का संगीत मौजूद है। अनिल दा ने अपने प्रयत्नों से इसे और अधिक विस्तार दिया। मुंबई पहुँचते ही उन्हें 'धर्म की देवी' नाम की फ़िल्म में संगीत देने का अवसर मिला और उसके बाद यह सिलसिला बरसों तक चलता रहा।

'दिल जलता है तो जलने दे...' से मुकेश ने अपने करियर की शुरूआत की और उसके बाद अनेक हिट गाने गए। अनिल बिस्वास को हिंदी फ़िल्म संगीत में पहली बार ऑर्केस्ट्रा का इस्तेमाल करने का श्रेय भी दिया जाता है। 1949 में उन्होंने तलत महमूद से आरज़ू फ़िल्म में पहली बार गाना गवाया जो सुपरहिट रहा--'ऐ दिल मुझे ऐसी जगह ले चल.

स्व #अनिल_बिस्वास अपनी पत्नी के साथ घर में मजे से कुछ पका रहे हैं और स्व #लता_मंगेशकर बगल में बैठे हुए ध्यान से देख रही हैं, कोयले की सिगड़ी जल रही है, डालडे का डिब्बा रखा हुआ है

अनिल बिस्वास का लता, तलत महमूद और दिलीप कुमार से पारिवारिक संबंध था। 
ये संगीतकार होने के साथ मजबूत कद काठी के अत्यंत ताकतवर और पहलवान किस्म के आदमी थे। 
कलकत्ता से मुंबई आए अनिल दा का सफर फिल्म जगत में सिर्फ 26 साल रहा। 1961 में बीस दिनों में छोटे भाई सुनील और बड़े बेटे के निधन ने अनिल दा को भीतर से तोड़ दिया। 
वे मुंबई से दिल्ली चले गए और मृत्युपर्यंत साउथ एक्सटेंशन में रहे। यहाँ रहते हुए भी उन्होंने आकाशवाणी को अपनी सेवाएँ दीं और "हम होंगे कामयाब एक दिन" जैसा गीत युवा पीढ़ी को दिया। इस गीत की शब्द रचना में उन्होंने कवि गिरिजा कुमार माथुर से सहयोग किया था।

अनिल बिस्वास की पत्र-पत्रिका और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में चर्चा 1994 में हुई, जब म.प्र. शासन के संस्कृति विभाग ने उन्हें लता मंगेशकर अलंकरण से सम्मानित किया। लता मंगेशकर अपने गायन के आरंभिक चरण में गायिका नूरजहाँ से प्रभावित थीं। अनिल दा ने लता को इस 'प्रेत बाधा' से मुक्ति दिलाकर शुद्ध-सात्विक लता मंगेशकर बनाया। अनिल दा के संगीत में लताजी के कुछ उम्दा गीतों की बानगी देखिए- मन में किसी की प्रीत बसा ले (आराम), बदली तेरी नजर तो नजारे बदल गए (बड़ी बहू), रूठ के तुम तो चल दिए (जलती निशानी)।

स्वयं लताजी ने इस बात को स्वीकार किया है कि अनिल दा ने उन्हें समझाया कि गाते समय आवाज में परिवर्तन लाए बगैर श्वास कैसे लेना चाहिए। यह आवाज तथा श्वास प्रक्रिया की योग कला है। अनिल दा उन्हें लतिके कहकर पुकारते थे। इसी तरह मुकेश को सहगल की आवाज के प्रभाव से मुक्त कराकर उसे मुकेशियाना शैली प्रदान करने में अनिल दा का हाथ है।

तलत महमूद की मखमली आवाज पर अनिल दा फिदा थे। तलत की आवाज के कम्पन और मिठास को अनिल दा ने रेशम-सी आवाज कहा था। किशोर कुमार से फिल्म 'फरेब' (1953) में अनिल दा ने संजीदा गाना क्या गवाया, आगे चलकर इस शरारती तथा नटखट गायक के संजीदा गाने देव आनंद-राजेश खन्ना के प्लस-पाइंट हो गए।
संगीतकार नौशाद ने कहा था "अनिल बिस्वास एकमात्र ऐसे बंगाली संगीतकार हैं, जो पंजाबी फिल्म में पंजाबी, गुजराती फिल्म में गुजराती, मुगल फिल्म में मुगलिया संगीत देने में माहिर हैं। वे कीर्तन, जत्रा और रवीन्द्र संगीत के अलावा भी हिन्दुस्तानी संगीत को बखूबी जानते हैं "
अनिल विश्वास का जन्म बरीसाल (पूर्वी बंगाल) में 7 जुलाई 1914 को हुआ था। चार साल की उम्र से वे गाने लगे थे। किशोर उम्र में देशभक्ति जागी और स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गए। जेल गए और यातनाएँ सही। 16 साल की उम्र में नवंबर 1930 में कलकत्ता में महान बाँसुरी वादक पन्नालाल घोष के घर शरण ली। अनिल दा की बहन पारुल घोष ने पन्नालालजी से विवाह रचाया था। युवा अनिल ने यहाँ ट्यूशनें की। काजी नजरूल इस्लाम के कहने पर मेगा फोन रिकॉर्ड कंपनी में काम किया। उनका पहला रिकॉर्ड उर्दू में जारी हुआ था। यहीं पर उनकी मुलाकात कुंदनलाल सहगल और सचिन देव बर्मन से हुई थी। हीरेन बोस के साथ मुंबई आए और 26 साल संगीत सृजन किया। अभिनेत्री मीना कपूर से उन्होंने शादी की थी।

अनिल विश्वास के संगीत निर्देशन की पहली फिल्म 'धर्म की देवी' (1935) थी और अंतिम 'छोटी-छोटी बातें'(1965)। 
इसे अभिनेता मोतीलाल ने बनाया था। अनिल विश्वास संगीत को स्वतंत्र पहचान देने वाले प्रथम संगीतकार हैं। 
"आज हिमालय की चोटी से फिर हमने ललकारा है/ दूर हटो, दूर हटो, दूर हटो ऐ दुनिया वालो, हिन्दुस्तान हमारा है'  भारत की आजादी के 4 साल पहले देशभक्ति का यह तराना गली-गली गूँजा था। बच्चे-बच्चे की जबान पर था। फिल्म किस्मत (1943) के इस गीत को बड़नगर (म.प्र.) के गीतकार कवि प्रदीप ने लिखा था और पूर्वी बंगाल के संगीतकार अनिल बिस्वास ने जोशीले संगीत से सँवारा था। इस गीत को सुनकर देशभक्तों की रगों में खून की रफ्तार तेज हो जाती थी

कार्यक्षेत्र

कलकत्ता से मुंबई आए अनिल दा का सफर फ़िल्म जगत् में सिर्फ 26 साल रहा। 1961 में बीस दिनों में छोटे भाई सुनील और बड़े बेटे के निधन ने अनिल दा को भीतर से तोड़ दिया। वे मुंबई से दिल्ली चले गए और मृत्युपर्यंत साउथ एक्सटेंशन में रहे। यहाँ रहते हुए भी उन्होंने आकाशवाणी को अपनी सेवाएँ दीं और 'हम होंगे कामयाब एक दिन' जैसा कौमी तराना युवा पीढ़ी को दिया। इस गीत की शब्द रचना में उन्होंने कवि गिरिजाकुमार माथुर से सहयोग किया था। अनिल बिस्वास की पत्र-पत्रिका और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में चर्चा 1994 में हुई, जब मध्य प्रदेश शासन के संस्कृति विभाग ने उन्हें लता मंगेशकर अलंकरण से सम्मानित किया। लता मंगेशकर अपने गायन के आरंभिक चरण में गायिका नूरजहाँ से प्रभावित थीं। अनिल दा ने लता को इस 'प्रेत बाधा' से मुक्ति दिलाकर शुद्ध-सात्विक लता मंगेशकर बनाया। अनिल दा के संगीत में लताजी के कुछ उम्दा गीतों की बानगी निम्नलिखित गीतों में सुनी जा सकती है-

मन में किसी की प्रीत बसा ले (आराम)
बदली तेरी नज़र तो नज़ारे बदल गए (बड़ी बहू)
रूठ के तुम तो चल दिए (जलती निशानी)।

लोकप्रियता

'आज हिमालय की चोटी से फिर हमने ललकारा है दूर हटो, दूर हटो, दूर हटो ऐ दुनिया वालो, हिन्दुस्तान हमारा है'।

भारत की आजादी के 4 साल पहले देशभक्ति का यह तराना गली-गली गूँजा था। बच्चे-बच्चे की जबान पर था। फ़िल्म किस्मत (1943) के इस गीत को बड़नगर (मध्य प्रदेश) के गीतकार कवि प्रदीप ने लिखा था और पूर्वी बंगाल के संगीतकार अनिल बिस्वास ने जोशीले संगीत से सँवारा था। इस गीत को सुनकर देशभक्तों की रगों में ख़ून की रफ्तार तेज हो जाती थी।

संगीत के पितामह

हिंदी सिने संगीत के पितामह कहे जाने वाले दादा अनिल बिस्वास की सबसे बड़ी ख़ासियत थी उनका ज्ञान और उनका समर्पण। उन्‍होंने ऐसा कोई गाना नहीं बनाया जो उनकी मरज़ी के ख़िलाफ़ हो। अनिल बिस्वास की संगीत-यात्रा पर कुबेर दत्‍त की एक महत्‍त्‍वपूर्ण पुस्‍तक भी आई है। अनिल दा ही वो संगीतकार हैं जिन्‍होंने तलत महमूद को विश्‍वास दिलाया कि उनकी आवाज़ की लरजिश ही उनकी दौलत है। अनिल दा ही वो संगीतकार हैं जिन्‍होंने डांट-डपटकर कई प्रतिभाओं को संवारा और लता मंगेशकर भी उन्‍हीं प्रतिभाओं में से एक हैं। लता जी बड़े ही सम्‍मान के साथ अनिल बिस्‍वास का ज़िक्र करती हैं। स्वयं लताजी ने इस बात को स्वीकार किया है कि अनिल दा ने उन्हें समझाया कि गाते समय आवाज़ में परिवर्तन लाए बगैर श्वास कैसे लेना चाहिए। यह आवाज़ तथा श्वास प्रक्रिया की योग कला है। अनिल दा उन्हें लतिके कहकर पुकारते थे। इसी तरह मुकेश को सहगल की आवाज़ के प्रभाव से मुक्त कराकर उसे मुकेशियाना शैली प्रदान करने में अनिल दा का हाथ है। तलत महमूद की मखमली आवाज़ पर अनिल दा फिदा थे। तलत की आवाज़ के कम्पन और मिठास को अनिल दा ने रेशम-सी आवाज़ कहा था। किशोर कुमार से फ़िल्म 'फरेब' (1953) में अनिल दा ने संजीदा गाना क्या गवाया, आगे चलकर इस शरारती तथा नटखट गायक के संजीदा गाने देव आनंद और राजेश खन्ना के प्लस-पाइंट हो गए।

प्रतिभाओं की प्रतिस्पर्धा

अनिल बिस्वास के दौर में एक से बढ़कर एक संगीतकार रहे। इसका लाभ यह हुआ कि संगीतकारों की स्वस्थ स्पर्धा के चलते श्रोताओं को मधुर से मधुरतम गीत मिले। उस दौर में नरेन्द्र शर्मा, कवि प्रदीप, गोपालसिंह नेपाली, इंदीवर, डी.एन. मधोक जैसे गीतकार भी हुए, जिनके गीत कविता की तरह भावपूर्ण और सार्थक होते थे। नौशाद, रोशन, मदन मोहन, सचिन देव बर्मन, सज्जाद, ग़ुलाम हैदर, वसंत देसाई, हेमंत कुमार, शंकर-जयकिशन और खय्याम जैसे संगीतकारों के तालाब में अनिल दा सदैव कमल की भाँति रहते हुए सबका मार्गदर्शन करते रहे। सी. रामचंद्र अपने को अनिल दा का शिष्य मानते थे। ये तमाम संगीतकार एक-दूसरे की इज्जत करते हुए फ़िल्म-संगीत के खजाने में अपना विनम्र योगदान करते रहे।

सम्मान और पुरस्कार

1986 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार

निधन

अनिल बिस्वास का दिल्ली में 31 मई, 2003 को निधन हो गया। वे 89 वर्ष के थे और कुछ समय से बीमार चल रहे थे।

यूसुफ खान उर्फ दलीप कुमार

🎂जन्म की तारीख और समय: 11 दिसंबर 1922, Qissa Khwani Bazaar, पेशावर, पाकिस्तान
⚰️मृत्यु की जगह और तारीख: 7 जुलाई 2021, Hinduja Hospital OPD Building, मुम्बई
पत्नी: अस्मा रहमान (विवा. 1981–1983), सायरा बानो (विवा. 1966–2021)
भाई: नासिर ख़ान, एहसान खान, फ़ौज़िया खान, सईदा खान
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*अपनी संवेदना व्यक्त करते हुए, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक ट्वीट में कहा कि कुमार को एक सिनेमाई किंवदंती के रूप में याद किया जाएगा,* 

*जबकि राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने कहा कि "उन्हें उपमहाद्वीप में प्यार किया गया था"।* 
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दिलीप कुमार 🎂11 दिसंबर, 1922 - ⚰️7 जुलाई, 2021
जन्म का नाम: मुहम्मद यूसुफ़ ख़ान, हिन्दी फ़िल्मों के एक प्रसिद्ध अभिनेता थे जो भारतीय संसद के उच्च सदन राज्य सभा के सदस्य रह चुके है। दिलीप कुमार को भारत तथा दुनिया के सर्वश्रेष्ठ अभिनेताओं में गिना जाता है, उन्हें दर्शकों द्वारा 'अभिनय सम्राट' के नाम से पुकारा जाता है, वे आज़ादी से लेकर 60 के दशक तक भारत के सबसे लोकप्रिय अदाकार थे। वे हिंदी सिनेमा के आज तक के सबसे कामयाब अदाकार हैं। उनके फ़िल्मों की कामयाबी दर लगभग अस्सी (८०) फ़ीसदी से ऊपर रही है छह दशकों के कार्यकाल में।उन्हें दुनिया में पहली बार परदे पर 'मेथड एक्टिंग' को इजाद करने का श्रेय भी दिया जाता है जिसके कारण वे तमाम पीढ़ियों के अदाकार के प्रेरणाश्रोत रहे।दिलीप कुमार को भारत का दूसरा एवं तीसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण और पद्म भूषण प्राप्त है । उन्हें पाकिस्तान का सर्वोच्च नागरिक सम्मान निशान-ए-इम्तियाज़ भी प्राप्त है। अभिनेेत्री और निर्माता देविका रानी ने उन्हें फिल्मों में काम दिया और उन्हीं के सुझाव पर उन्होंने अपना स्टेज नाम *'दिलीप कुमार'* रखा। इसका एक कारण उस वक्त तक सिनेमा की बदनाम स्थिति थी और पिता का डर भी था।
अपने करियर के शुरुआती वर्षों में कई सफल त्रासद या दु:खद भूमिकाएं करने के कारण उन्हें मीडिया में 'ट्रेजिडी किंग' भी कहा जाता था। व्यापार विश्लेषकों के अनुसार उनकी बहुत सी फ़िल्में इसलिए भी कामयाब हुईं क्योंकि जनता सिर्फ़ उनकी अदाकारी देखने आया करती थी फिर चाहे उन चलचित्रों में खास मनोरंजन के तत्व ना भी हों। इस प्रकार के वाक्या और किसी भी अदाकार के साथ नही हुएं हैं। उन्होंने बहुत सी बड़े पैमाने पर कामयाब फ़िल्मों में अदाकारी की है जो आजतक सबसे सफल चलचित्रों में गिनी जातीं हैं जैसे मुग़ल-ए-आज़म (१९६०), गंगा जमना (१९६१), इत्यादि। उन्होंने अपने करियर के दूसरे पड़ाव में भी कई अत्यंत कामयाब फिल्में दीं जब वह वृद्ध किरदार की भूमिका में भी प्रमुख किरदार निभा रहे थे। ऐसा वाक्या भी उनके अतिरिक्त किसी अदाकार के साथ नहीं हुआ है।उन्होंने फिल्मों में अदाकारी को रंगमंच से अलग किया और उसे नई परिभाषा दी जिसका प्रभाव उनके बाद के कलाकारों पर रहा। १९९८ में आई किला उनके करियर की आखिरी फ़िल्म थी। उन्हें वर्ष १९९४ में भारतीय सिनेमा का सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। अपने अभिनय और भारत-पाकिस्तान के रिश्तों में सुधार लाने के लिए उन्हें पाकिस्तान का सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार निशान-ए-इम्तियाज़ दिया गया जिसे प्राप्त करने वाले वे इकलौते भारतीय हैं।

↔️तराना की शूटिंग के दौरान कुमार को मधुबाला से प्यार हो गया था। वे सात साल तक रिश्ते में रहे लेकिन नया दौर अदालत के मामले में कुमार ने मधुबाला और उसके पिता के खिलाफ गवाही दी, जिससे उनका रिश्ता खत्म हो गया। मुगल-ए-आजम (1960) के बाद उन्होंने फिर कभी साथ काम नहीं किया। 1950 के दशक के उत्तरार्ध में, वैजयंतीमाला को पत्रिकाओं द्वारा कुमार से जोड़ा गया, जिन्होंने उनके साथ किसी भी अन्य अभिनेत्री की तुलना में सबसे अधिक अभिनय किया, जिसके परिणामस्वरूप उनके बीच शानदार ऑन-स्क्रीन केमिस्ट्री हुई। अपने होम प्रोडक्शन गंगा जमना (1961) के लिए काम करते हुए, कुमार ने कथित तौर पर साड़ी के उस शेड को चुना जिसे वैजयंतीमाला हर दृश्य में पहनती थी।
❤️दिलीप कुमार ने अभिनेत्री सायरा बानो से 1966 में विवाह किया। सायरा बचपन से ही अपने पसंदीदा अभिनेता दिलीप कुमार से विवाह करना चाहती थीं। विवाह के समय दिलीप कुमार 44 वर्ष और सायरा बानो 22 वर्ष की थीं। 1981 में कुछ समय के लिए असमा रहमान से दूसरी शादी भी की थी। असमा हैदराबाद की रहने वाली थीं। दिलीप कुमार की मुलाकात उनसे एक क्रिकेट मैच के दौरान उनकी बहनों ने कराई थी। वर्ष 2000 से 2006 तक वे राज्य सभा के सदस्य रहे। 1980 में उन्हें सम्मानित करने के लिए मुंबई का शेरिफ घोषित किया गया। 1991 में भारत सरकार ने उन्हें तीसरे सर्वाेच्च नागरिक सम्मान पद्म भूषण और 2015 में दूूसरे सर्वाेच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया। 1995 में उन्हें दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 1998 में उन्हे पाकिस्तान का सर्वोच्च नागरिक सम्मान निशान-ए-इम्तियाज़ भी प्रदान किया गया।
⚰️दिलीप कुमार का 7 जुलाई 2021 को 98 वर्ष की आयु में सुबह 7:30 बजे हिंदुजा अस्पताल, मुंबई में निधन हो गया। लंबी बीमारी के बाद उनका निधन हो गया। वह टेस्टिकुलर कैंसर और फुफ्फुस बहाव के अलावा कई उम्र से संबंधित बिमारियों से पीड़ित थे। महाराष्ट्र सरकार ने उसी दिन जुहू मुस्लिम कब्रिस्तान में राजकीय सम्मान के साथ उनके अंतिम संस्कार को मंजूरी दी।

*अपनी संवेदना व्यक्त करते हुए, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक ट्वीट में कहा कि कुमार को एक सिनेमाई किंवदंती के रूप में याद किया जाएगा,* 

*जबकि राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने कहा कि "उन्हें उपमहाद्वीप में प्यार किया गया था"।* 

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने भी उनके निधन पर शोक व्यक्त किया और शौकत खानम मेमोरियल कैंसर अस्पताल के लिए एक ट्वीट में धन जुटाने के उनके प्रयासों को याद किया। अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई और बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने भी कुमार और उनके परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त की।

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भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...