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गुरुवार, 4 जनवरी 2024

अंजना मुमताज

अभिनेत्री अंजना मुमताज 
#04jan 
अंजना मुमताज़
 जन्म 4 जनवरी 1949 

एक भारतीय अभिनेत्री हैं, जो सौ से अधिक हिंदी, मराठी और गुजराती भाषा की फिल्मों में सहायक भूमिकायें निभा चुकी है अंजना मुमताज़ का बचपन का नाम अंजना मांजरेकर था बाद में उन्होंने एयर इंडिया के अधिकारी साजिद मुमताज से शादी की
अंजना मुमताज (Anjana Mumtaz) का दिल एक्टिंग में लगता था लेकिन 36 साल की उम्र में उन्हें कौन काम देगा यही सोचकर मन मार लिया. लेकिन उनके हस्बैंड साजिद मुमताज ने उन्हें प्रोत्साहित किया. इसी बीच पता चला कि रमेश सिप्पी (Ramesh Sippy) एक धारावाहिक ‘बुनियाद’ (Buniyaad) बनाने जा रहे हैं तो अंजना उनसे मिली. इस तरह 1986 में दूरदर्शन के इस प्रसिद्ध धारावाहिक की वजह उन्हें काफी शोहरत मिली.
इनकी शादी साजिद मुमताज नामक शख्स से हुई तो अपना नाम अंजना मुमताज रख लिया. हिंदू मराठा फैमिली से ताल्लुक रखने वाली अंजना की फैमिली का दूर-दूर तक फिल्म इंडस्ट्री से नाता नहीं था. इनके पिता सरकारी नौकरी में थे जबकि मां एक हाउसवाइफ थीं.
अंजना जब छोटी थीं तो शानदार डांस करती थीं. उनकी डांस टैलेंट को देखते हुए उनकी मां ने उन्हें क्लासिकल डांस की ट्रेनिंग दिलवाई. अंजना अपने डांस की वजह से आस-पास काफी मशहूर थीं. दूरदर्शन को दिए एक इंटरव्यू में अंजना ने बताया था कि मीना कुमारी की वह दीवानी थीं. एक बार उनकी मुलाकात मीना कुमारी से हुई तो उन्होंने कहा कि एक दिन तुम जरूर एक्ट्रेस बनोगी लेकिन अभी मेहनत से पढ़ाई करो. अपनी फेवरेट एक्ट्रेस के मुंह से ऐसी बात सुनकर अंजना का दिल एक्टिंग की तरफ होने लगा.अंजना का मन पढ़ाई-लिखाई में बिलकुल भी नहीं लगता था, बड़ी मुश्किल से मैट्रिक पास किया. हर समय डांस में रमी रहने वाली अंजना को एक दिन पता चला कि फिल्म ‘पाकीजा’ की शूटिंग हो रही है. वह शूटिंग सेट पर पहुंची तो मीना जी ने उनकी मुलाकात अपने हस्बैंड कमाल अमरोही से करवाई. उन्होंने अपनी फिल्म ‘शंकर हुसैन’ में काम देने का वादा किया और काम मिल भी गया लेकिन ये फिल्म रिलीज होने में काफी वक्त लगा और जब रिलीज हुई भी तो उसमें अंजना नदारद थीं.लेकिन इस फिल्म में काम करने के दौरान ही अंजना को ‘मां का आंचल’, ‘संबंध’, ‘महुआ’ जैसी फिल्मों में बतौर लीड एक्ट्रेस काम मिल गया. अंजना ने कई हिंदी फिल्मों में लीड एक्ट्रेस के तौर पर काम किया लेकिन उन्हें खास पहचान नहीं मिली तो उन्होंने मराठी, गुजराती फिल्मों की तरफ रुख किया और वहां स्टार एक्ट्रेस के तौर पर जानी जाने लगीं. हिंदी से अधिक उन्हें मराठी और गुजराती में पसंद किया गया.
इसी बीच अंजना मांजरेकर की शादी साजिद मुमताज से हो गई. साजिद और अजना पड़ोसी थे, घरवालों को इस शादी से कोई ऐतराज नहीं था. लेकिन उस दौर में शादीशुदा एक्ट्रेस को काम मिलना काफी मुश्किल होता था, इसलिए अंजना ने फिल्मों से दूरी बना ली और अपनी घर-गृहस्थी में जम गईं. इनका एक बेटा हुआ रुसलान मुमताज जो जाना-माना एक्टर है.

📽️
2006 जननी 
2003 जोड़ी क्या बनाई वाह वाह रामजी 
2003 कोई मिल गया 
2002 तुम जियो हज़ार साल 
2002 अँखियों से गोली मारे 
2002 ये मोहब्बत है 
2001 कसम 
2000 जोड़ीदार
2000 क्रोध 
2000 धड़कन 
1999 चेहरा
1999 होते होते प्यार हो गया
1999 जय हिन्द
1998 दुल्हे राजा 
1998 आक्रोश 
1998 बरसात की रात
1998 ज़ुल्म-ओ-सितम
1997 शेयर बाज़ार 
1997 दिल के झरोखे में 
1996 भैरवी 
1996 खिलाड़ियों का खिलाड़ी 
1996 ज़ोरदार 
1996 साजन चले ससुराल 
1996 दुश्मन दुनिया का 
1995 सबसे बड़ा खिलाड़ी
1995 हकीकत 
1994 खुद्दार
1994 नज़र के सामने 
1994 साजन का घर
1994 यार गद्दार 
1994 ईना मीना डीका
1994 चीता 
1994 बेटा हो तो ऐसा 
1994 प्रेम योग 
1994 इंसानियत 
1993 बलमा
1993 दिल है बेताब 
1993 प्लेटफॉर्म 
1993 साहिबाँ 
1993 मेरी आन 
1993 शक्तिमान
1993 गुनाह 
1993 दिल तेरा आशिक 
1993 संग्राम 
1993 बड़ी बहन
और
1993 धारावी 
1992 दीदार 
1992 दिल ही तो है
1992 ख़ुदागवाह
1992 साहेबज़ादे
1992 चमत्कार 
1992 युद्धपथ 
1992 बलवान 
1991 पाप की आँधी
1991 शिकारी 
1991 डांसर 
1991 बंजारन 
1991 साजन 
1991 दो मतवाले 
1991 फूल और काँटे 
1991 खून का कर्ज़ 
1991 योद्धा 
1991 त्रिनेत्र 
1991 नम्बरी आदमी 
1990 खतरनाक
1990 आग का गोला 
1990 पत्थर के इंसान
1990 वर्दी 
1989 भ्रष्टाचार 
1989 निगाहें 
1989 दोस्त गरीबों का 
1989 फर्ज़ की जंग
1989 मिट्टी और सोना 
1989 काला बाज़ार 
1989 त्रिदेव
1988 खतरों के खिलाड़ी 
1988 हम तो चले परदेस 
1988 गुनाहों का फ़ैसला 
1988 अग्नि 
1988 वारिस 
1988 विजय
1987 मजाल 
1986 प्यार हो गया 
1986 समुन्दर 
1986 घर संसार
1985 लवर बॉय 
1985 अलग अलग 
1983 तकदीर 
1975 सलाखें
1973 दो फूल 
1973 बंधे हाथ 
1969 संबंध 
📺
1986 बुनियाद
1997-1998 चट्टान
1998-1999 जान
2001 कुदरत
2001-2003 घराने
2002-2004 देवी

गुरदास मान

#04jan 
प्रसिद्ध हिन्दी पंजाबी गायक अभिनेता गुरदास मान
🎂जन्म 04 जनवरी 1957
मुक्तसर, गांव कस्बा गिद्दड़बाहा 
बच्चे: गुरीक मान
पत्नी: मंजीत मान
भाई: परमजीत बहिया, जसवीर कौर, गुरपंथ मान
माता-पिता: एस० गुरदेव सिंह, तेज कौर
एक भारतीय गायक, गीतकार और अभिनेता हैं जो मुख्य रूप से पंजाबी भाषा के संगीत और फिल्मों से जुड़े हैं। उन्होंने 1980 में "दिल दा मामला है" गाने से राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित किया । तब से, उन्होंने 34 से अधिक एल्बम रिकॉर्ड किए और 305 से अधिक गाने लिखे।
गुरदास मान पंजाब के मशहूर लोक गायक अभिनेता हैं। उन्हें पंजाबी गायकी का सम्राट कहा जाता है।

गुरदास मान का जन्म 4 जनवरी 1957 को पंजाब के मुक्तसर जिले में स्थित गिद्दड़बाहा नामक कस्बे में हुआ। प्रारंभिक शिक्षा मलोट में हुई तथा उच्च शिक्षा के लिए आप पटियाला आ गए। पटियाला के नैशनल इंस्टीच्यूट ऑफ स्पोर्टस (एन आई एस) से डिग्री ली।

एक बार जनवरी 2001 को रोपड़ के पास तथा जनवरी 2007 में वे हरियाणा के करनाल जिले के बस्तारा गांव के निकट एक और वाहन दुर्घटना के शिकार हुए जिसमें वह घायल हो गए।

सितम्बर 2010 में ब्रिटेन के वोल्वरहैम्टन विश्वविद्यालय ने पंजाबी गायक गुरदास मान को विश्व संगीत में डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया। मान के साथ इस सम्मान को पाने वालों में सर पॉल मॅक्कार्टनी, बिल कॉस्बी और बॉब डायलन थे।

14 दिसम्बर 2012 को उन्हें पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला के 36वें दीक्षांत समारोह में राज्यपाल ने डाक्टर ऑफ लिटरेचर की मानद उपाधि से सम्मानित किया।
फिल्म देस होया परदेस (2004) में अपने चरित्र के चित्रण के लिए अपने मुख्य अभिनेता गुरदास मान को राष्ट्रपति के राष्ट्रीय पुरस्कार और सर्वश्रेष्ठ अभिनेता ( विशेष जूरी पुरस्कार ) से सम्मानित किया गया।
हीर के अपने गायन के माध्यम से संपूर्ण कथा के निर्माण के लिए फिल्म वारिस शाह-इश्क दा वारिस (2006) के लिए सर्वश्रेष्ठ पुरुष पार्श्वगायक का पुरस्कार भी गुरदास मान को दिया गया।
फिल्म वारिस शाह-इश्क दा वारिस (2006) के लिए बर्लिन एशिया फिल्म महोत्सव में गुरदास मान सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के रूप में पुरस्कार मिला।
एलबम बूटपालिशाँ के लिए ब्रिटेन एशियाई संगीत पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ अंतर्राष्ट्रीय एल्बम।
सुखमनी - होप फॉर लाइफ (2011) के लिए में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता (क्रिटिक्स) का पीटीसी फिल्म अवार्ड।

गुरदास मान जागरण प्रकाशन लिमिटेड के पंजाबी भाषा के समाचार पत्र पंजाबी जागरण के ब्रांड एंबेसडर भी हैं।

पंजाबी गायकी का सबसे बड़ा स्टार होने के बावजूद भी स्टारडम या घमंड मान साहब को छू भी नहीं पाया है। छोटे छोटे गांवों में भी धार्मिक अनुष्ठानों, मेलों आदि में वे अक्सर गाया करते हैं।  वे नकोदर स्थित डेरा बाबा मुराद शाह ट्रस्ट के चेयरमैन भी हैं। इस ट्रस्ट की ओर से उत्तराखण्ड में जून 2013 में आई बाढ़ के लिए प्रधानमंत्री राहत कोष में उन्होंने 11 लाख रूपये का दान दिया।

9 जनवरी 2001 को रोपड़ के पास एक भयानक हादसे में मान बाल बाल बचे किंतु इनके ड्राईवर तेजपाल की मृत्यु हो गई। वे उसे अपना अच्छा दोस्त भी मानते थे, उसे समर्पित करते हुए उन्होंने एक गाना भी लिखा व गाया - "बैठी साडे नाल सवारी उतर गयी"।

मान साहब के व्यक्तित्व का अंदाजा इस घटना से लगाया जा सकता है। म्यूजिक एल्बम "रोटी" की रिलीज पर म्यूजिक वीडियो डायरेक्टर - म्यूजिक डायरेक्टर जतिंदर शाह से जब गुरदास मान के साथ के अनुभव के बारे में पूछा गया तो वह इतने इमोशनल हो गए कि उनकी आंखें भर आई और वह चुप हो गए। तब गुरदास मान अपनी सीट से उठकर आए और जतिंदर को गले से लगा लिया

बुधवार, 3 जनवरी 2024

आर डी बर्मन

#04jan
#27jun 
राहुल देव बर्मन
प्रसिद्ध नाम आर. डी. बर्मन, पंचम दा

🎂जन्म 27 जून, 1939
जन्म भूमि कलकत्ता, पश्चिम बंगाल
⚰️मृत्यु 04 जनवरी, 1994
मृत्यु स्थान मुम्बई, महाराष्ट्र

अभिभावक एस.डी. बर्मन, गायिका मीरा
कर्म भूमि मुंबई
कर्म-क्षेत्र संगीतकार और गायक
मुख्य फ़िल्में 1942 ए लव स्टोरी (1995), तीसरी मंज़िल (1966), यादों की बारात (1974), हम किसी से कम नहीं (1978), कारवाँ (1972) आदि।
विषय भारतीय शास्त्रीय संगीत
पुरस्कार-उपाधि फ़िल्मफेयर पुरस्कार, सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक, सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायक
नागरिकता भारतीय
मुख्य गीत ‘चिंगारी कोई भड़के’, ‘कुछ तो लोग कहेंगे’ 'महबूबा महबूबा', 'पिया तू अब तो आजा' आदि।
अन्य जानकारी आर. डी. बर्मन प्रयोगवादी संगीतकार के रूप में जाने जाते हैं। उन्होंने पश्चिमी संगीत को मिलाकर अनेक नई धुनें तैयार की थीं। उन्होंने अपने करियर के दौरान लगभग 300 फ़िल्मों में संगीत दिया।
आर. डी. बर्मन  R. D. Burman,

भारतीय हिन्दी सिनेमा में एक महान् संगीतकार के रूप में प्रसिद्ध थे। आर. डी. बर्मन का पूरा नाम 'राहुल देव बर्मन' था और फ़िल्मी दुनिया में वे 'पंचम दा' के नाम से विख्यात थे। उन्होंने अपने कॅरियर के दौरान लगभग 300 फ़िल्मों में संगीत दिया। मधुर संगीत से श्रोताओं का दिल जीतने वाले संगीतकार राहुल देव बर्मन के लोकप्रिय संगीत से सजे गीत 'चिंगारी कोई भड़के', 'कुछ तो लोग कहेंगे', 'पिया तू अब तो आजा' आदि हैं।

आर. डी. बर्मन का जन्म 27 जून, 1939 को कलकत्ता, पश्चिम बंगाल में हुआ था। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा बालीगंज गवर्नमेंट हाई स्कूल, कोलकाता से प्राप्त की थी। बाद में उन्होंने उस्ताद अली अकबर खान से सरोद भी सीखा। आर. डी. बर्मन ने आशा भोंसले के साथ विवाह किया था।

संगीतकार
आर. डी. बर्मन के पिता एस. डी. बर्मन (सचिन देव बर्मन) भी जाने माने संगीतकार थे और उन्होंने अपने करियर की शुरुआत उनके सहायक के रूप में की थी। आर. डी. बर्मन प्रयोगवादी संगीतकार के रूप में जाने जाते हैं। उन्होंने पश्चिमी संगीत को मिलाकर अनेक नई धुनें तैयार की थीं। उन्होंने अपने करियर के दौरान लगभग 300 फ़िल्मों में संगीत दिया।

पंचम दा नाम
आर. डी. बर्मन को पंचम नाम से फ़िल्म जगत में पुकारा जाता था। आर. डी. बचपन में जब भी गुनगुनाते थे, 'प' शब्द का ही उपयोग करते थे। यह अभिनेता अशोक कुमार के ध्यान में आई। सा रे गा मा पा में ‘प’ का स्थान पाँचवाँ है। इसलिए उन्होंने राहुल देव को पंचम नाम से पुकारना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे उनका यही नाम लोकप्रिय हो गया।

सफलता का स्वाद

एस.डी. बर्मन हमेशा आर. डी. बर्मन को अपने साथ रखते थे। इस वजह से आर. डी. बर्मन को लोकगीतों, वाद्यों और आर्केस्ट्रा की समझ बहुत कम उम्र में हो गई थी। जब एस.डी. ‘आराधना’ का संगीत तैयार कर रहे थे, तब काफ़ी बीमार थे। आर. डी. बर्मन ने कुशलता से उनका काम संभाला और इस फ़िल्म की अधिकतर धुनें उन्होंने ही तैयार की। आर. डी. बर्मन को बड़ी सफलता मिली ‘अमर प्रेम’ से। ‘चिंगारी कोई भड़के’ और ‘कुछ तो लोग कहेंगे’ जैसे यादगार गीत देकर उन्होंने साबित किया कि वे भी प्रतिभाशाली हैं।

पहला अवसर
एस. डी. बर्मन की वजह से आर. डी. बर्मन को फ़िल्म जगत के सभी लोग जानते थे। पंचम दा को माउथआर्गन बजाने का बेहद शौक़ था। लक्ष्मीकांत प्यारेलाल उस समय ‘दोस्ती’ फ़िल्म में संगीत दे रहे थे। उन्हें माउथआर्गन बजाने वाले की ज़रूरत थी। वे चाहते थे कि पंचम यह काम करें, लेकिन उनसे कैसे कहें क्योंकि वे एक प्रसिद्ध संगीतकार के बेटे थे। जब यह बात पंचम को पता चली तो वे फौरन राजी हो गए। महमूद से पंचम की अच्छी दोस्ती थी। महमूद ने पंचम से वादा किया था कि वे स्वतंत्र संगीतकार के रूप में उन्हें ज़रूर अवसर देंगे। ‘छोटे नवाब’ के ज़रिये महमूद ने अपना वादा निभाया।

पहला एकल गीत
महमूद की फ़िल्म छोटे नवाब बतौर संगीतकार उनकी पहली फ़िल्म थी। लेकिन उन्हें असली पहचान फ़िल्म 'तीसरी मंजिल' और फ़िल्म 'पड़ोसन' से मिली। उन्होंने नासिर हुसैन, रमेश सिप्पी जैसे फ़िल्मकारों के साथ लंबे समय तक काम किया।

प्रयोग के हिमायती

राहुल देव बर्मन
आर. डी. बर्मन को संगीत में प्रयोग करने का बेहद शौक़ था। नई तकनीक को भी वे बेहद पसंद करते थे। उन्होंने विदेश यात्राएँ कर संगीत संयोजन का अध्ययन किया। 27 ट्रैक की रिकॉर्डिंग के बारे में जाना। इलेक्ट्रॉनिक वाद्ययंत्रों का प्रयोग किया। कंघी और कई फ़ालतू समझी जाने वाली चीजों का उपयोग उन्होंने अपने संगीत में किया। भारतीय संगीत के साथ पाश्चात्य संगीत का उन्होंने भरपूर उपयोग किया। आर. डी. बर्मन के बारे में कहा जाता है कि वे समय से आगे के संगीतकार थे। उन्होंने अपने संगीत में वे प्रयोग कर दिखाए थे, जो आज के संगीतकार कर रहे हैं। आर. डी. का यह दुर्भाग्य रहा कि उनके समय में फ़िल्मों में एक्शन हावी हो गया था और संगीत के लिए ज़्यादा गुंजाइश नहीं थी। अपने अंतिम समय में उन्होंने ‘1942 ए लव स्टोरी’ में यादगार संगीत देकर यह साबित किया था कि उनकी प्रतिभा का सही दोहन फ़िल्म जगत नहीं कर पाया। 4 जनवरी 1994 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कहा, लेकिन दुनिया को गुनगुनाने लायक़ ढेर सारे गीत वे दे गए।

युवाओं के संगीतकार
आर. डी. बर्मन द्वारा संगीतबद्ध की गई फ़िल्में ‘तीसरी मंजिल’ और ‘यादों की बारात’ ने धूम मचा दी। राजेश खन्ना को सुपर सितारा बनाने में भी आर. डी. बर्मन का अहम योगदान है। राजेश खन्ना, किशोर कुमार और आर. डी. बर्मन की तिकड़ी ने 70 के दशक में धूम मचा दी थी। आर. डी. का संगीत युवा वर्ग को बेहद पसंद आया। उनके संगीत में बेफ़िक्री, जोश, ऊर्जा और मधुरता है, जिसे युवाओं ने पसंद किया। ‘दम मारो दम’ जैसी धुन उन्होंने उस दौर में बनाकर तहलका मचा दिया था। जब राजेश खन्ना का सितारा अस्त हुआ तो आर. डी. ने अमिताभ के लिए यादगार धुनें बनाईं। आर. डी. बर्मन का संगीत आज का युवा भी सुनता है। समय का उनके संगीत पर कोई असर नहीं हुआ। पुराने गानों को रीमिक्स कर आज पेश किया जाता है, उनमें आर. डी. द्वारा संगीतबद्ध गीत ही सबसे अधिक होते हैं। ऐसा नहीं है कि आर. डी. ने धूम-धड़ाके वाली धुनें ही बनाईं। गीतकार गुलज़ार के साथ राहुल देव एक अलग ही संगीतकार के रूप में नजर आते हैं। ‘आँधी’, ‘किनारा’, ‘परिचय’, ‘खुश्बू’, ‘इजाजत’, ‘लिबास’ फ़िल्मों के गीत सुनकर लगता ही नहीं कि ये वही आर. डी. बर्मन हैं, जिन्होंने ‘दम मारो दम’ जैसा गाना बनाया है।

प्रसिद्ध गीत
जी.पी. सिप्पी के साथ उन्होंने 'सीता और गीता', 'शोले', 'शान' जैसी फ़िल्मों में संगीत दिया। नासिर हुसैन के साथ उनका लंबा साथ रहा और उन्होंने तीसरी मंजिल, कारवाँ, हम किसी से कम नहीं, यादों की बारात जैसी कई फ़िल्मों के गानों को यादगार बना दिया। आर. डी. बर्मन के विविधतापूर्ण गानों में एक ओर जहाँ शास्त्रीय संगीत पर आधारित रैना बीती जाए, मेरा कुछ सामान जैसे गाने है वहीं महबूबा महबूबा, पिया तू अब तो आजा जैसे गाने भी हैं।

लोकप्रियता
1970 के दशक की उनकी लोकप्रियता 1980 के दशक में भी क़ायम रही और इस दौरान भी उन्होंने कई चर्चित फ़िल्मों में संगीत दिया। लेकिन दशक के आखिरी कुछ वर्ष अपेक्षा के अनुरूप नहीं रहे और उनकी कई फ़िल्में नाकाम रहीं। '1942 ए लव स्टोरी' उनके निधन के बाद प्रदर्शित हुई। इस फ़िल्म के गानों में नई ताजगी थी और उन्हें खूब पसंद किया गया। उनका 4 जनवरी, 1994 को निधन हो गया। उनके निधन के बाद रिमिक्स गानों का दौर शुरू हुआ। दिलचस्प है कि रीमिक्स किए गए अधिकतर गाने आर. डी. बर्मन के ही स्वरबद्ध हैं। आर डी बर्मन ने लगभग 300 फ़िल्मों में संगीत दिया जिनमें 292 हिंदी फ़िल्में थीं। इसके अलावा उन्होंने बंगाली, तमिल, तेलुगू और उड़िया फ़िल्मों के लिए भी संगीत दिया।

निधन
4 जनवरी 1994 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कहा, लेकिन दुनिया को गुनगुनाने लायक़ बहुत सारे गीत दे गए। अपने अंतिम समय में उन्होंने ‘1942 ए लव स्टोरी’ में यादगार संगीत देकर यह साबित किया था कि उनकी प्रतिभा का सही दोहन फ़िल्म जगत नहीं कर पाया।

निरूपा रॉय

#04jan
#13oct

निरूपा राय

कोकिला किशोरचंद्र बुलसारा

🎂04 जनवरी 1931
बुलसर , बॉम्बे प्रेसीडेंसी , ब्रिटिश भारत , अब यह वलसाड , गुजरात है
⚰️मृत13 अक्टूबर 2004 (आयु 73 वर्ष)
मुंबई , महाराष्ट्र , भारत
राष्ट्रीयता भारतीय

यह अभिनेत्री दुख की रानी के नाम से जानी जाती थी.उन्होंने 15 साल की उम्र में कमल रॉय से शादी की और मुंबई चली गईं । जब उन्होंने फिल्म उद्योग में प्रवेश किया तो उन्होंने अपना विवाहित नाम निरूपा रॉय इस्तेमाल किया।
निरूपा रॉय 
1946-1999 तक सक्रिय रही
जीवनसाथी कमल रॉय (जन्म 1946)
बच्चे2
पुरस्कार
मुनीमजी के लिए फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री पुरस्कार (1956) छाया के लिए
फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री का पुरस्कार (1962) शहनाई के लिए फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री का पुरस्कार (1965) फ़िल्मफ़ेयर लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार (2004)

1946 में, रॉय और उनके पति ने एक गुजराती अखबार में अभिनेताओं की तलाश के एक विज्ञापन का जवाब दिया। उनका चयन हो गया और उन्होंने गुजराती फिल्म रणकदेवी (1946) से अपने अभिनय करियर की शुरुआत की। उसी वर्ष उन्होंने अपनी पहली हिंदी फिल्म अमर राज में अभिनय किया । उनकी लोकप्रिय फिल्मों में से एक दो बीघा ज़मीन (1953) थी। उन्होंने 1940 और 50 के दशक की फिल्मों में बड़े पैमाने पर पौराणिक किरदार निभाए। हर हर महादेव में उन्होंने त्रिलोक कपूर के साथ पार्वती देवी की भूमिका निभाई, जिन्होंने शिव की भूमिका निभाई और यह फिल्म साल की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म थी। उनकी देवी की छवि बहुत मजबूत थी और लोग उनके घर आते थे और उनका आशीर्वाद लेते थे। उनके सह-कलाकारों में त्रिलोक कपूर (जिनके साथ उन्होंने अठारह फिल्मों में अभिनय किया),भारत भूषण , बलराज साहनी और अशोक कुमार थे ।

1970 के दशक में, अमिताभ बच्चन और शशि कपूर द्वारा निभाए गए पात्रों की मां की भूमिका ने उनके नाम को गरीब पीड़ित मां का पर्याय बना दिया। दीवार (1975) में उनकी भूमिका और माँ और बेटे के संदर्भ में इसके संवाद घिसी-पिटी बातों की तरह इस्तेमाल किये जाते हैं।
कमल रॉय के साथ उनकी शादी से उनके दो बच्चे हुए, जिनका नाम योगेश और किरण रॉय है।उनकी मृत्यु के बाद के वर्षों में, वे रॉय की संपत्ति और सामान पर विवाद में उलझ गए, जिसने पूरे समाचार और मीडिया में बहुत ध्यान आकर्षित किया है।
13 अक्टूबर 2004 को, रॉय को मुंबई में दिल का दौरा पड़ा और 73 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया । 

रॉय की स्मृति में कई श्रद्धांजलि और लेख बनाए गए हैं।  फिल्म दीवार से उनके संवाद प्रतिष्ठित हो गए,  और फिल्म में उनके अभिनय के साथ-साथ उनकी अन्य उल्लेखनीय फिल्मों को हिंदी सिनेमा में एक मील का पत्थर माना जाता है
📽️
1946 रणकदेवी
1946 अमर राज 
1949 उद्धार
1950 गडानो बेल 
1951 राम जन्म 
1953 दो बिगहा जमीन 
नौलखा हार 
1954 चक्रधारी 
दुर्गा पूजा 
1955 गरम कोट 
मुनीमजी 
तांगा-वाली 
1956 भाई-भाई 
1957 मोहिनी 
मुसाफिर 
1958 चालबाज़ 
दुल्हन 
1960 आंचल 
1961 छाया 
1962 बेज़ुबान 
1963 कौन अपना कौन पराया 
मुझे जीने दो 
ग्रहस्थि 
1964 बेनजीर 
शहनाई 
फूलों की सेज 
1965 शहीद 
1967 राम और श्याम 
जाल 
1968 आबरू 
एक कली मुस्काई 
राजा और रंक 
1969 आंसू बन गए फूल 
प्यार का मौसम 
राहगीर 
1970 अभिनेत्री 
माँ और ममता 
घर घर की कहानी 
महाराजा (1970 फ़िल्म) 
आन मिलो सजना 
पूरब और पश्चिम 
1971 गंगा तेरा पानी अमृत 
1972 जवानी दीवानी 
1973 कच्चे धागे 
1975 दीवार 
1976 मां 
1977 अमर अकबर एंथोनी 
अनुरोध 
1978 आँख का तारा 
1979 सुहाग 
1981 आस पास 
1982 बदले की आग 
1982 [[तीसरी आंख
(1982 फ़िल्म)|तीसरी आंख]] ||

1983 बेताब 
1985 सरफ़रोश 
गिरफ्तार 
मर्द 
1986 अंगाराय 
1988 गंगा जमुना सरस्वती 
इन्तेक़म 
1991 Pratikar 
1993 आसू बने अंगारे 
1996 नमक 
1999 जहां तुम ले चलो 
लाल बादशाह

मंगलवार, 2 जनवरी 2024

तुनिषा शर्मा

तुनिषा शर्मा
#04jan
#24dic 
🎂जन्म04 जनवरी 2002
चण्डीगढ़
⚰️मौत24 दिसम्बर 2022 
मुम्बई
राष्ट्रीयता भारतीय
पेशा अभिनेत्री, मॉडल
शर्मा का जन्म 04 जनवरी 2002 को चंडीगढ़ में वनिता शर्मा के घर हुआ था।
एक भारतीय टेलीविजन और फिल्म अभिनेत्री थे। उन्होंने सोनी टीवी के धारावाहिक, महाराणा प्रताप के साथ चंद कंवर के रूप में अपना करियर शुरू किया। उसके बाद वह कलर्स टीवी के चक्रवर्तीं अशोक सम्राट में राजकुमारी अहिंकारा की भूमिका में नज़र आयी। 2016 में, उन्होंने फिल्म फितूर में कटरीना कैफ के बचपन की भूमिका का अभिनय किया। उसी वर्ष, उन्होंने बार बार देखो में नन्ही दीया, और कहानी 2: दुर्गा रानी सिंह में मिनी के रूप में भी अभिनय किया। इसके बाद वह शेर-ए-पंजाब: महाराजा रणजीत सिंह में मेहताब कौर की भूमिका में दिखाई दी। वर्तमान में वह कलर्स टीवी के इंटरनेट वाला लव में अध्या वर्मा की भूमिका निभा रही थी।

शर्मा ने सोनी टीवी के महाराणा प्रताप के साथ चंद कंवर के रूप में अपना करियर शुरू किया। उन्होंने कलर्स टीवी के चक्रवर्ती अशोक सम्राट में राजकुमारी अहंकारा की भूमिका निभाई। 2016 में, उन्होंने फितूर में युवा फिरदौस के रूप में अपनी पहली फिल्म की। उसी वर्ष, उन्होंने बार बार देखो में युवा दीया और कहानी 2: दुर्गा रानी सिंह में मिनी की भूमिका निभाई।

2017 में, शर्मा ने शेर-ए-पंजाब: महाराजा रणजीत सिंह में मेहताब कौर की भूमिका निभाई। 2018 से 2019 तक, उन्होंने कलर्स टीवी के इंटरनेट वाला लव में आराध्या वर्मा की भूमिका निभाई।

2019 में, वह ज़ी टीवी के इश्क सुभान अल्लाह में ज़ारा / बबली के रूप में दिखाई दीं। 2021 में, वह सब टीवी के हीरो - गायब मोड ऑन के सीज़न 2 में एएसपी अदिति के रूप में देखी गई थीं। 2022 में, उन्होंने सोनी सब के शो अली बाबा: दास्तान-ए-काबुल में शीजान मोहम्मद खान के साथ मुख्य भूमिका निभाई ।

⚰️24 दिसंबर 2022 को, शर्मा ने अपने टेलीविजन धारावाहिक अली बाबा: दास्तान- ए- काबुल के सेट पर फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। उसे अस्पताल ले जाया गया जहां पहुंचने पर उसे मृत घोषित कर दिया गया। वह 20 वर्ष की थी।सह-कलाकार शीजान मोहम्मद खान पर आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला दर्ज किया और गिरफ्तार गया।

शनिवार, 4 नवंबर 2023

हकीम अहमद शुजा

हकीम अहमद शाद

🎂जन्म : 04 नवंबर 1893, लाहौर, पाकिस्तान
⚰️मृत्यु: 04जनवरी 1969, लाहौर, पाकिस्तान

बच्चे: अनवर कमल पाशा
माता-पिता: हाकिम शुजा-एद-दीन

हकीम अहमद शुजा एमबीई, पूर्व ब्रिटिश भारत, बाद में पाकिस्तान के एक प्रसिद्ध उर्दू और फारसी कवि, नाटककार, लेखक, फिल्म लेखक और गीतकार, विद्वान और रहस्यवादी थे।

कभी-कभी 'हकीम अहमद शुजा' और 'हकीम अहमद शुजा पाशा' के रूप में लिखा जाता है।

हकीम अहमद शुजा अपने माता-पिता का इकलौता बेटा था, जब वह नाबालिग था तब दोनों की मृत्यु हो गई थी,  और उसका पालन-पोषण बड़े चचेरे भाई, हकीम अमीन-ए-दीन, एक बैरिस्टर ने किया था । घर पर अरबी और कुरान की पढ़ाई में बुनियादी शिक्षा प्राप्त करने और चिश्ती और कादिरी दोनों चिश्ती और कादिरी दोनों परंपराओं में विभिन्न फकीरों के तहत प्रारंभिक सूफी प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद , उन्हें 'अंग्रेजी शिक्षा' के लिए पुराने सेंट्रल मॉडल स्कूल, लाहौर में भर्ती कराया गया और बाद में प्रसिद्ध अलीगढ़ चले गए। मुस्लिम विश्वविद्यालय , जहाँ से उन्होंने सम्मान के साथ स्नातक की उपाधि प्राप्त की।

कुछ समय के लिए, अहमद शुजा ने हैदराबाद राज्य ( डेक्कन ) में उस्मानिया विश्वविद्यालय में व्याख्याता के रूप में काम किया, लेकिन खुश नहीं थे और वहां रोजगार की तलाश में लाहौर लौट आए। 1922-23 में उर्दू साहित्यिक पत्रिका हज़ार दास्तान के संपादक सहित कई पत्रकारिता और अकादमिक उपक्रमों के बाद, अंततः वह पंजाब विधान सभा के सचिवालय में नियमित सेवा में लग गए , अंततः पंजाब विधानसभा के सचिव के रूप में सेवानिवृत्त हुए। 1950 में।

लेखन

हकीम अहमद शुजा वास्तव में एक बहुत ही विपुल और बहु-लेखक थे, उन्होंने उर्दू और फ़ारसी कविताओं के कई संग्रह तैयार किए, अनगिनत निबंध और बेले-पत्र पूरे भारत में (और बाद में पाकिस्तान में) समाचार मित्रों और पुरालेखों में प्रकाशित, जो पंजाबी में प्रकाशित हुए कुरान के प्रारंभिक अनुवादों में से एक थे। इम्तियाज़ अली ताज , आगा हशर स्टूडियो और अन्य नाट्य कलाकारों के सहयोग से कई नाटकीय कार्य, और बाद में, प्रारंभिक भारत-पाकिस्तान सिनेमा के लिए स्क्रिप्ट और गीत। हालाँकि, आज उनके संयुक्त मुख्य रूप से इन प्रसिद्ध कार्यों पर टिकी हुई है: "लाहौर का चेल्सी" (1967; 1989 पुनर्मुद्रण), पुराने लाहौर के स्मारकों का संग्रह;  "खून-बहा" (1962), उनकी कुछ अन्य निजी यादगारें; "गार्ड-ए-कारवां" (1950; पुनर्मुद्रण 1960), इस्लामी पैगंबर मोहम्मद और 'आदर्श' मुस्लिम चरित्र के उदाहरण के रूप में 'अहल इ बेत' (पैगंबर के परिवार के सदस्य) की प्रशंसा में दस्तावेजों और निबंधों का एक संग्रह ; और उनकी प्यारी, गीतात्मक कविताएँ, जिनमें से कुछ को बाद में फिल्मी चॉकलेट के लिए बेहोशी के रूप में प्रस्तुत किया गया। ये रचनाएँ उनके आदर्शवाद और मानवता और गहन रहस्यमय विश्वास और रोमांटिकतावाद को नष्ट कर देती हैं, जो विशिष्ट उर्दू और फ़ारसी काव्य के साथ-साथ शेली , थॉमस कार्लाइल , गोएथे और विक्टर ह्यूगो जैसे पश्चिमी लेखकों के प्रभाव को दर्शाते हैं। 

बाद का जीवन और विरासत

हकीम अहमद शुजा ने 1969 में अपनी मृत्यु के समय तक भी लिखना जारी रखा। 1950 और 1960 के दशक के बीच, उन्हें फिल्म निर्माण और सिनेमा की संभावनाओं में विशेष रुचि हो गई । शायद उनके बेटे अनवर कमाल पाशा की इस शैली में भागीदारी के कारण, जो दक्षिण एशिया के शुरुआती और सबसे प्रसिद्ध फिल्म निर्देशकों में से एक थे । उनकी लोकप्रिय फिल्मों के कई प्रसिद्ध गीत और गाने, जैसे कि तू लाख चलले री गोरी और हम भी पराए हैं राहों में , वास्तव में मूल रूप से शुजा द्वारा कविताओं के रूप में लिखे गए थे और बाद में उनके और उनके सहायकों की टीम द्वारा फिल्म के लिए अनुकूलित किए गए थे। इनमें से कुछ गीत/गीत कभी-कभी गलत तरीके से इनमें से कुछ सहायकों, जैसे कवि कतील शिफाई , के बताए जाते हैं । हालाँकि, शूजा पहले से ही कुछ हद तक उर्दू/हिंदी सिनेमा के लिए गीत/गीत और कहानियाँ लिखने में शामिल थे, इसका पता उनके गाए गीत "हैरात-ए-नज़्ज़ारा आकिर" के शुरुआती गीतों से चलता है। कुन्दन लाल सहगल द्वारा , और उन्होंने बेहराम खान , शीश महल और 1949 की शुरुआती पाकिस्तानी फिल्म शाहिदा जैसी भारतीय बॉलीवुड फिल्मों की कहानियों का लेखन भी किया। इस प्रकार, कई मायनों में, विकास पर उनका सीधा प्रभाव और असर था। प्रारंभिक भारतीय और पाकिस्तानी साहित्य और सिनेमा दोनों का। इसके अलावा , उन्होंने स्थायी सचिव और पाकिस्तान की राजभाषा समिति, 1949 के मुख्य संकलनकर्ताओं/संपादकों में से एक के रूप में उर्दू भाषा , भाषा विज्ञान और व्युत्पत्ति विज्ञान के प्रारंभिक विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया, जो आधिकारिक और अदालती शर्तों के मानकीकरण के लिए जिम्मेदार थे। अंग्रेजी से उर्दू.

बुधवार, 19 जुलाई 2023

नीरज

गोपालदास सक्सैना 'नीरज'
अन्य नाम नीरज
🎂जन्म 4 जनवरी, 1925
जन्म भूमि पुरावली, इटावा, उत्तरप्रदेश
⚰️मृत्यु 19 जुलाई, 2018
मृत्यु स्थान दिल्ली
अभिभावक बाबू ब्रजकिशोर
पति/पत्नी मनोरमा शर्मा
संतान एक पुत्र
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र साहित्य
मुख्य रचनाएँ दर्द दिया है, प्राण गीत, आसावरी, गीत जो गाए नहीं, बादर बरस गयो, दो गीत, नदी किनारे, नीरज की गीतीकाएँ, नीरज की पाती, लहर पुकारे, मुक्तकी, गीत-अगीत, विभावरी, संघर्ष, अंतरध्वनी, बादलों से सलाम लेता हूँ, कुछ दोहे नीरज के
विषय कविता, अनुवाद
भाषा हिन्दी
शिक्षा स्नातकोत्तर
पुरस्कार-उपाधि पद्म श्री, पद्म भूषण
हिन्दी साहित्यकार, शिक्षक, एवं कवि सम्मेलनों के मंचों पर काव्य वाचक एवं फ़िल्मों के गीत लेखक थे। वे पहले व्यक्ति थे जिन्हें शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में भारत सरकार ने दो-दो बार सम्मानित किया, पहले पद्म श्री से, उसके बाद पद्म भूषण से। यही नहीं, फ़िल्मों में सर्वश्रेष्ठ गीत लेखन के लिये उन्हें लगातार तीन बार फिल्म फेयर पुरस्कार भी मिला।कवि सम्मेलनों में अपार लोकप्रियता के चलते नीरज को बम्बई के फिल्म जगत ने गीतकार के रूप में नई उमर की नई फसल के गीत लिखने का निमन्त्रण दिया जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया। पहली ही फ़िल्म में उनके लिखे कुछ गीत जैसे कारवाँ गुजर गया गुबार देखते रहे और देखती ही रहो आज दर्पण न तुम, प्यार का यह मुहूरत निकल जायेगा बेहद लोकप्रिय हुए जिसका परिणाम यह हुआ कि वे बम्बई में रहकर फ़िल्मों के लिये गीत लिखने लगे। फिल्मों में गीत लेखन का सिलसिला मेरा नाम जोकर, शर्मीली और प्रेम पुजारी जैसी अनेक चर्चित फिल्मों में कई वर्षों तक जारी रहा।

किन्तु बम्बई की ज़िन्दगी से भी उनका मन बहुत जल्द उचट गया और वे फिल्म नगरी को अलविदा कहकर फिर अलीगढ़ वापस लौट आये।

पद्म भूषण से सम्मानित कवि, गीतकार गोपालदास 'नीरज' ने दिल्ली के एम्स में 19 जुलाई 2018 की शाम लगभग 8 बजे अन्तिम सांस ली।

मंगलवार, 27 जून 2023

आर.डी.बर्मन

आर. डी बर्मन
आर.डी.बर्मन
🎂जन्मतिथि: 27-जून -1939

जन्म स्थान: कोलकाता, पश्चिम बंगाल, भारत

⚰️मृत्यु तिथि: 04-जनवरी-1994

व्यवसाय: संगीतकार, फ़िल्म स्कोर संगीतकार
राहुल देव बर्मन (27 जून 1939 - 4 जनवरी 1994) एक भारतीय संगीत निर्देशक और अभिनेता थे, जिन्हें हिंदी संगीत उद्योग के सबसे महान और सबसे सफल संगीत निर्देशकों में से एक माना जाता है। 1960 से 1990 के दशक तक, बर्मन ने 331 फिल्मों के लिए संगीत रचना की, और अपनी रचनाओं से संगीत समूह को एक नया स्तर दिया। बर्मन ने अपना प्रमुख काम महान गायिका लता मंगेशकर , आशा भोसले और किशोर कुमार के साथ किया ।  उन्होंने गीतकार गुलज़ार के साथ भी बड़े पैमाने पर काम किया , जिनके साथ उनके करियर के कुछ सबसे यादगार गाने हैं। उपनाम पंचम , वह संगीतकार का इकलौता बेटा थासचिन देव बर्मन और बंगाली गायिका-गीतकार मीरा देव बर्मन ।

वह मुख्य रूप से हिंदी फिल्म उद्योग में एक संगीतकार के रूप में सक्रिय थे, और उन्होंने कुछ रचनाओं के लिए स्वर भी दिए। उन्होंने भारतीय संगीत निर्देशकों की अगली पीढ़ी पर प्रभाव डाला,  और उनके गाने भारत और विदेशों में भी आज तक लोकप्रिय बने हुए हैं।

↔️बर्मन का जन्म हिंदी फिल्म संगीतकार और गायक, सचिन देव बर्मन और उनकी गीतकार पत्नी मीरा देव बर्मन (नी दासगुप्ता) के घर कलकत्ता में हुआ था। प्रारंभ में, उनकी नानी ने उनका उपनाम टुबलू रखा था, हालाँकि बाद में उन्हें पंचम उपनाम से जाना जाने लगा। कुछ कहानियों के अनुसार, उन्हें पंचम उपनाम दिया गया था , क्योंकि एक बच्चे के रूप में, जब भी वह रोते थे, तो यह संगीत संकेतन के पांचवें स्वर ( पा ), सी प्रमुख पैमाने पर जी नोट में बजता था; हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में, पंचम पांचवें पैमाने की डिग्री का नाम है: (आईएएसटी: शाजा, ऋषभ, गांधार, मध्यमा, पंचम, धैवत, निषाद)। एक अन्य सिद्धांत कहता है कि बच्चे का उपनाम पंचम रखा गया क्योंकि वह पांच अलग-अलग स्वरों में रो सकता था। एक और संस्करण यह है कि जब अनुभवी भारतीय अभिनेता अशोक कुमार ने नवजात राहुल को बार-बार पा शब्द का उच्चारण करते देखा , तो उन्होंने लड़के का नाम पंचम रख दिया । 

बर्मन ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा पश्चिम बंगाल में कोलकाता के तीर्थपति संस्थान से प्राप्त की। उनके पिता एसडी बर्मन मुंबई स्थित हिंदी फिल्म उद्योग , हिंदी भाषा की फिल्मों में एक प्रसिद्ध संगीत निर्देशक थे । जब वह सत्रह वर्ष के थे, तब आरडी बर्मन ने अपना पहला गीत, ऐ मेरी टोपी पलट के आ , लिखा था, जिसे उनके पिता ने फिल्म फंटूश (1956) में इस्तेमाल किया था। 'सर जो तेरा चकराए' गाने की धुन भी उन्होंने बचपन में ही बनाई थी; उनके पिता ने इसे गुरु दत्त की प्यासा (1957) के साउंडट्रैक में शामिल किया ।

मुंबई में , बर्मन को उस्ताद अली अकबर खान ( सरोद ) और समता प्रसाद ( तबला ) द्वारा प्रशिक्षित किया गया था । वे सलिल चौधरी को अपना गुरु भी मानते थे। वह अपने पिता के सहायक के रूप में काम करते थे और अक्सर उनके ऑर्केस्ट्रा में हारमोनिका बजाते थे।

कुछ उल्लेखनीय फिल्में जिनमें बर्मन को संगीत सहायक के रूप में श्रेय दिया जाता है, उनमें चलती का नाम गाड़ी (1958), कागज के फूल (1959), तेरे घर के सामने (1963), बंदिनी (1963), जिद्दी (1964), गाइड ( 1965) और टीन डेवियन (1965)। बर्मन ने अपने पिता की हिट रचना "है अपना दिल तो आवारा" के लिए माउथ ऑर्गन भी बजाया था, जिसे फिल्म सोलवा साल में दिखाया गया था और इसे हेमंत मुखोपाध्याय ने गाया था ।

1959 में, बर्मन ने गुरु दत्त के सहायक निरंजन द्वारा निर्देशित फिल्म राज़ के लिए संगीत निर्देशक के रूप में अनुबंध किया। हालाँकि, फिल्म कभी पूरी नहीं हुई। गुरुदत्त और वहीदा रहमान अभिनीत इस फिल्म के गीत शैलेन्द्र ने लिखे थे । बर्मन ने फिल्म बंद होने से पहले इसके लिए दो गाने रिकॉर्ड किए। पहला गाना गीता दत्त और आशा भोसले ने गाया था और दूसरे गाने को शमशाद बेगम ने गाया था ।

स्वतंत्र संगीत निर्देशक के रूप में बर्मन की पहली रिलीज़ फिल्म छोटे नवाब (1961) थी। जब प्रसिद्ध हिंदी फिल्म हास्य अभिनेता महमूद ने छोटे नवाब का निर्माण करने का फैसला किया , तो उन्होंने संगीत के लिए सबसे पहले बर्मन के पिता सचिन देव बर्मन से संपर्क किया। हालाँकि, एसडी बर्मन ने यह कहते हुए प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया कि वह उपलब्ध नहीं हैं। इस मीटिंग में महमूद ने राहुल को तबला बजाते हुए देखा और उन्हें छोटे नवाब के लिए संगीत निर्देशक के रूप में साइन कर लिया । बाद में बर्मन ने महमूद के साथ घनिष्ठ संबंध विकसित किया और महमूद की भूत बंगला (1965) में एक छोटी सी भूमिका निभाई।

↔️❤️फिल्म संगीत निर्देशक के रूप में बर्मन की पहली हिट फिल्म तीसरी मंजिल (1966) थी। बर्मन ने फिल्म के निर्माता और लेखक नासिर हुसैन से उनकी सिफारिश करने का श्रेय गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी को दिया। [10] विजय आनंद ने यह भी कहा कि उन्होंने नासिर हुसैन से पहले बर्मन के लिए एक संगीत सत्र की व्यवस्था की थी। [11] तीसरी मंजिल में छह गाने थे, जो सभी मजरूह सुल्तानपुरी द्वारा लिखे गए थे और मोहम्मद रफ़ी द्वारा गाए गए थे। इनमें से चार आशा भोसले के साथ युगल गीत थे , जिनसे बर्मन ने बाद में शादी की। नासिर हुसैन ने बहारों के सपने (1967), प्यार का मौसम सहित अपनी छह फिल्मों के लिए बर्मन और गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी को साइन किया। (1969) और यादों की बारात (1973)। पड़ोसन (1968) के लिए बर्मन का स्कोर खूब सराहा गया। इस बीच, उन्होंने ज्वेल थीफ (1967) और प्रेम पुजारी (1970) सहित फिल्मों के लिए अपने पिता के सहायक के रूप में काम करना जारी रखा।

❤️बर्मन की पहली पत्नी रीता पटेल थीं, जिनसे उनकी मुलाकात दार्जिलिंग में हुई थी । एक प्रशंसक रीता ने अपने दोस्तों से शर्त लगाई थी कि वह बर्मन के साथ फिल्म-डेट करने में सक्षम होगी। दोनों ने 1966 में शादी की और 1971 में तलाक हो गया। परिचय (1972) का गाना मुसाफिर हूं यारों ("मैं एक यात्री हूं") तब लिखा गया था जब वह अलग होने के बाद एक होटल में थे। 

बर्मन ने 1980 में आशा भोंसले से शादी की। साथ में, उन्होंने कई हिट गाने रिकॉर्ड किए और कई लाइव प्रदर्शन भी किए। हालाँकि, अपने जीवन के अंत तक, वे एक साथ नहीं रहे।बर्मन को वित्तीय कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, विशेषकर अपने जीवन के उत्तरार्ध में। उनकी मृत्यु के तेरह साल बाद 2007 में उनकी माँ मीरा की मृत्यु हो गई।वह अपने बेटे की मृत्यु से पहले ही अल्जाइमर से पीड़ित थी। उनकी मृत्यु से ठीक पहले उन्हें एक वृद्धाश्रम में ले जाया गया था, और मामला विवाद बन जाने के बाद वह वापस अपने बेटे के निवास पर चली गईं।
❤️❤️1970 के दशक में, बर्मन राजेश खन्ना अभिनीत फिल्मों में किशोर कुमार के गीतों से अत्यधिक लोकप्रिय हो गए। [5] कटी पतंग (1970), एक संगीतमय हिट, आराधना प्रसिद्धि के शक्ति सामंत द्वारा निर्देशित 1970 के दशक की फिल्मों की श्रृंखला की शुरुआत थी। किशोर कुमार द्वारा गाए गए इसके गाने "ये शाम मस्तानी" और "ये जो मोहब्बत है" तुरंत हिट हो गए। किशोर कुमार के अलावा, बर्मन ने लता मंगेशकर , मोहम्मद रफ़ी और आशा भोसले द्वारा गाए कई लोकप्रिय गीतों की भी रचना की ।

1970 में, बर्मन ने देव आनंद की हरे रामा हरे कृष्णा (1971) के लिए संगीत तैयार किया ।इस फिल्म का आशा भोंसले का गीत " दम मारो दम " हिंदी फिल्म संगीत में एक मौलिक रॉक नंबर साबित हुआ।  फिल्म निर्माता देव आनंद ने "दम मारो दम" का पूरा संस्करण फिल्म में शामिल नहीं किया, क्योंकि उन्हें चिंता थी कि यह गाना फिल्म पर भारी पड़ जाएगा।उसी वर्ष, बर्मन ने अमर प्रेम के लिए संगीत तैयार किया । इस साउंडट्रैक से लता मंगेशकर का गीत "रैना बीती जाए" को हिंदी फिल्म संगीत में शास्त्रीय संगीत रत्न माना जाता है। 1971 में बर्मन की अन्य हिट फिल्मों में बुद्ध मिल गया का रोमांटिक गाना "रात कली एक ख्वाब में" और कारवां का हेलेन अभिनीत कैबरे गाना " पिया तू अब तो आजा " शामिल हैं । उन्हें कारवां के लिए अपना पहला फिल्मफेयर पुरस्कार नामांकन मिला ।

1972 में, बर्मन ने कई फिल्मों के लिए संगीत तैयार किया, जिनमें सीता और गीता , रामपुर का लक्ष्मण , मेरे जीवन साथी , बॉम्बे टू गोवा , अपना देश और परिचय शामिल हैं । यादों की बारात (1973), आप की कसम (1974), शोले (1975) और आंधी (1975) जैसी हिट फिल्मों के साथ उनकी सफलता जारी रही । उन्होंने 1975 में मां की पुकार नामक एक छोटी डॉक्यूमेंट्री फिल्म के लिए एक गीत भी लिखा था। अपने पिता एसडी बर्मन के कोमा में चले जाने के बाद, बर्मन ने मिली (1975) का संगीत भी पूरा किया।

बर्मन द्वारा रचित हम किसी से कम नहीं (1977) के गीत "क्या हुआ तेरा वादा" के लिए मोहम्मद रफी को सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायक का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला । उन्होंने कस्मे वादे (1978), घर (1978), गोल माल (1979) और खुबसूरत (1980) जैसी फिल्मों के लिए कई लोकप्रिय गीतों की रचना जारी रखी । उन्हें अपना पहला फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक पुरस्कार सनम तेरी कसम (1981) के लिए मिला। 1981 में, उन्होंने रॉकी , सत्ते पे सत्ता और लव स्टोरी के लिए हिट संगीत भी तैयार किया ।

अभिजीत को बर्मन ने आनंद और आनंद (1984) में बड़ा ब्रेक दिया था । हालाँकि उन्होंने बहुत समय पहले अपनी शुरुआत की थी, हरिहरन को पहली बार बॉक्सर (1984) के है मुबारक आज का दिन में कविता कृष्णमूर्ति के साथ युगल गीत में देखा गया था , जिसे बर्मन ने संगीतबद्ध किया था। 1985 में, मोहम्मद अजीज ने बर्मन के नेतृत्व में शिवा का इन्साफ (1985) से अपनी शुरुआत की ।

किशोर कुमार-राजेश खन्ना-आरडीबर्मन की तिकड़ी ने 32 फिल्मों में एक साथ काम किया है और ये फिल्में और गाने आज भी लोकप्रिय हैं।  तीनों घनिष्ठ मित्र थे। आर.डी.बर्मन ने राजेश खन्ना के लिए 40 फिल्मों के लिए संगीत दिया।

❤️❤️❤️1980 के दशक के अंत में, उन पर लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल , बप्पी लाहिड़ी और अन्य डिस्को संगीतकारों का प्रभाव पड़ा। कई फिल्म निर्माताओं ने उन्हें संरक्षण देना बंद कर दिया, क्योंकि उनकी रचनाओं वाली फिल्में एक के बाद एक बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप हो गईं।  नासिर हुसैन , जिन्होंने तीसरी मंजिल (1966) के बाद से उन्हें अपनी हर प्रस्तुति के लिए साइन किया था , ने उन्हें कयामत से कयामत तक (1988) के लिए साइन नहीं किया। [4] हुसैन ने प्रेस में बर्मन का बचाव करते हुए कहा कि बर्मन ने ज़माने को दिखाना है (1982) और मंजिल मंजिल में कमजोर संगीत नहीं दिया।(1984)। उन्होंने यह भी कहा कि संगीतकार ज़बरदस्त (1985) की रिकॉर्डिंग के दौरान दुबलेपन के दौर से गुजर रहे थे। लेकिन इन तीन फिल्मों के फ्लॉप होने के बाद, हुसैन ने निर्देशक के रूप में पद छोड़ दिया, और उनके बेटे और उत्तराधिकारी मंसूर खान ने अन्य संगीतकारों की ओर रुख किया। फिल्म निर्माता सुभाष घई ने बर्मन को राम लखन (1989) देने का वादा किया, लेकिन इसकी जगह लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल को दे दी । 1986 में, बर्मन ने इजाज़त के लिए गाने बनाये ; यह स्कोर उनके सर्वश्रेष्ठ में से एक माना जाता है। हालाँकि, यह फ़िल्म समानांतर सिनेमा शैली ( कला फ़िल्में ) से संबंधित थी , इसलिए इसने बर्मन के व्यावसायिक फ़िल्म करियर की गिरावट को नहीं रोका। सभी चार गानेइजाज़त को आशा भोसले ने गाया था और गुलज़ार ने लिखा था। " मेरा कुछ सामान " गीत के गैर तुकबंदी वाले बोल को संगीत में ढालने के लिए आलोचकों द्वारा बर्मन की काफी सराहना की गई। जबकि आशा भोसले ( सर्वश्रेष्ठ महिला पार्श्वगायक ) और गुलज़ार ( सर्वश्रेष्ठ गीत ) दोनों को इस गीत के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिला, बर्मन को कोई नहीं मिला। बर्मन को 1988 में दिल का दौरा पड़ा और एक साल बाद लंदन के द प्रिंसेस ग्रेस हॉस्पिटल में उनकी दिल की बाईपास सर्जरी हुई। इस अवधि के दौरान उन्होंने कई धुनें बनाईं, जो कभी रिलीज़ नहीं हुईं। उन्होंने विधु विनोद चोपड़ा की फिल्म परिंदा के लिए संगीत तैयार किया1989 में। उन्होंने "छोड़ के ना जाना" नामक एक गीत की रचना की, जिसे आशा भोसले ने फिल्म गैंग के लिए गाया था । लेकिन चूंकि फिल्म को रिलीज़ होने में बहुत समय लगा और उनकी असामयिक मृत्यु के कारण, निर्देशक मज़हर खान ने उस समय कम चर्चित अनु मलिक को फिल्म के संगीत के लिए साइन किया। मजहर खान के निधन के बाद भी यह फिल्म 2000 में रिलीज हुई। प्रियदर्शन की मलयालम फिल्म थेनमाविन कोम्बाथ , उनके द्वारा साइन की गई आखिरी फिल्म थी, लेकिन फिल्म के लिए संगीत देने से पहले ही उनकी मृत्यु हो गई। 1942: ए लव स्टोरी (1994) का संगीत , जो उनकी मृत्यु के बाद रिलीज़ हुआ, अत्यधिक सफल रहा। इसने उन्हें मरणोपरांत तीसरा और आखिरी फिल्मफेयर पुरस्कार दिलाया । के अनुसारलता मंगेशकर , बर्मन अपने अंतिम वर्षों में काफी दुखी थे क्योंकि उनके कुछ संगीत बॉक्स ऑफिस पर अच्छा प्रदर्शन नहीं करने के बाद उन्हें इंडस्ट्री से ज्यादा काम नहीं मिल रहा था।

☑️दुर्गा पूजा गीत

आरडी बर्मन का दुर्गा पूजा उत्सव के लिए गीत लिखने की बंगाली परंपरा में एक महत्वपूर्ण योगदान था, जिनमें से कई को उन्होंने बाद में हिंदी फिल्मों के लिए रूपांतरित किया। इसमें फिल्म अनामिका का "मेरी भीगी भीगी सी" (बंगाली संस्करण: मोने पोरे रूबी रॉय), कटी पतंग का "प्यार दीवाना होता है" (बंगाली संस्करण: आज गुन गुन गुन कुंजे अमर) और "तेरे बिना" जैसे हिट गाने शामिल हैं। जिंदगी से कोई'' आंधी से (बंगाली संस्करण: जेटे जेटे पथे होलो)।यहां तक ​​कि उनके द्वारा गाए गीत "फिरे एसो अनुराधा" का सीक्वल भी था। हालाँकि, सीक्वल में आशा भोंसले की आवाज़ "फिरे एलम दुरे गिये" भी थी। दोनों ही वर्जन सुपरहिट रहे.

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...