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सोमवार, 25 दिसंबर 2023

यशपाल

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यशपाल

 03 दिसंबर 1903
 26 दिसंबर 1976

एक हिंदी लेखक , उपन्यासकार और कहानीकार थे । उन्होंने हिंदी गद्य की लगभग हर विधा में लिखा । वह जर्मन दार्शनिक कार्ल मार्क्स के विचारों से प्रभावित एक वैज्ञानिक समाजवादी थे।

🎂03 दिसंबर 1903
कांगड़ा पहाड़ , ब्रिटिश भारतीय
मौत⚰️26 दिसंबर 1976 (आयु 73 वर्ष)
पेशा लेखक, उपन्यासकार, कहानीकार
भाषा हिंदी
राष्ट्रीयता ब्रिटिश भारतीय , भारत गणराज्य
यशपाल का जन्म 3 दिसंबर 1903 को फिरोजपुर के एक खत्री परिवार में हुआ था। वह मूल रूप से कांगड़ा के रहने वाले थे लेकिन उनकी मां प्रेम देवी फिरोजपुर के एक स्कूल में पढ़ाती थीं। अतः उनका बचपन फिरोजपुर छावनी में बीता। उनकी प्राथमिक शिक्षा फिरोजपुर कैंट और लाहौर में हुई। वह भगत सिंह के साथी थे । उन्होंने देश के स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया।

उपन्यास

दादा कॉमरेड
गद्दार
दिव्या
पार्टी कॉमरेड
मानव रूप
अमिता
झूठा सच
बारह घंटे
अप्सरा का श्राप
तुम मेरे लिए क्या मतलब रखते हो?

कहानी संग्रह

प्रबोधन
अभिशापत
तर्क का तूफान
नष्ट किया हुआ
चिंगारी
वाह रे दुनिया!
फूल बनाने वाला
धर्मयुद्ध
उत्तराधिकारी
छवि शीर्षक
मैं सुंदर हूँ

गद्य के क्षेत्र में

न्याय के लिए संघर्ष
चक्र क्लब
बात करो बात करो बात करो
देखो, सोचो, समझो
गांधीवाद क्या है?
मार्क्सवाद
अवलोकन

नौशाद अली

#26dic
#05may 
नौशाद अली
🎂: 26 दिसंबर 1919, लखनऊ
⚰️मृत्यु: 05 मई 2006, मुम्बई
बच्चे: वहीदा अली, रेहमान नौशाद, राजू नौशाद, फ़हमीदा अली, रशीदा अली, ज़्यादा
माता-पिता: वाहिद अली
नौशाद अली हिन्दी फिल्मों के एक प्रसिद्ध संगीतकार थे। पहली फिल्म में संगीत देने के 64 साल बाद तक अपने साज का जादू बिखेरते रहने के बावजूद नौशाद ने केवल 67 फिल्मों में ही संगीत दिया, लेकिन उनका कौशल इस बात की जीती जागती मिसाल है कि गुणवत्ता संख्याबल से कहीं आगे होती है
नौशाद अली (1919-2006) हिन्दी फिल्मों के एक प्रसिद्ध संगीतकार थे। पहली फिल्म में संगीत देने के 64 साल बाद तक अपने साज का जादू बिखेरते रहने के बावजूद नौशाद ने केवल 67 फिल्मों में ही संगीत दिया, लेकिन उनका कौशल इस बात की जीती जागती मिसाल है कि गुणवत्ता संख्याबल से कहीं आगे होती है।

नौशाद का जन्म 25 दिसम्बर 1919 को लखनऊ में मुंशी वाहिद अली के घर में हुआ था। वह 17 साल की उम्र में ही अपनी किस्मत आजमाने के लिए मुंबई कूच कर गए थे। शुरुआती संघर्षपूर्ण दिनों में उन्हें उस्ताद मुश्ताक हुसैन खां, उस्ताद झण्डे खां और पंडित खेम चन्द्र प्रकाश जैसे गुणी उस्तादों की सोहबत नसीब हुयी।

संगीत

उन्हें पहली बार स्वतंत्र रूप से 1940 में 'प्रेम नगर' में संगीत देने का अवसर मिला, लेकिन उनकी अपनी पहचान बनी 1944 में प्रदर्शित हुई 'रतन' से जिसमें जोहरा बाई अम्बाले वाली, अमीर बाई कर्नाटकी, करन दीवान और श्याम के गाए गीत बहुत लोकप्रिय हुए और यहीं से शुरू हुआ कामयाबी का ऐसा सफर जो कम लोगों के हिस्से ही आता है।

उन्होंने छोटे पर्दे के लिए 'द सोर्ड ऑफ टीपू सुल्तान' और 'अकबर द ग्रेट' जैसे धारावाहिक में भी संगीत दिया। बहरहाल नौशाद साहब को अपनी आखिरी फिल्म के सुपर फ्लाप होने का बेहद अफसोस रहा। यह फिल्म थी सौ करोड़ की लागत से बनने वाली अकबर खां की ताजमहल जो रिलीज होते ही औंधे मुंह गिर गई। मुगले आजम को जब रंगीन किया गया तो उन्हें बेहद खुशी हुई।

फिल्मी सफ़र

अंदाज, आन, मदर इंडिया, अनमोल घड़ी, बैजू बावरा, अमर, स्टेशन मास्टर, शारदा, कोहिनूर, उड़न खटोला, दीवाना, दिल्लगी, दर्द, दास्तान, शबाब, बाबुल, मुग़ल-ए-आज़म, दुलारी, शाहजहां, लीडर, संघर्ष, मेरे महबूब, साज और आवाज, दिल दिया दर्द लिया, राम और श्याम, गंगा जमुना, आदमी, गंवार, साथी, तांगेवाला, पालकी, आईना, धर्म कांटा, पाक़ीज़ा (गुलाम मोहम्मद के साथ संयुक्त रूप से), सन ऑफ इंडिया, लव एंड गाड सहित अन्य कई फिल्मों में उन्होंने अपने संगीत से लोगों को झूमने पर मजबूर किया।

मारफ्तुन नगमात जैसी संगीत की अप्रतिम पुस्तक के लेखक ठाकुर नवाब अली खां और नवाब संझू साहब से प्रभावित रहे नौशाद ने मुम्बई में मिली बेपनाह कामयाबियों के बावजूद लखनऊ से अपना रिश्ता कायम रखा। मुम्बई में भी नौशाद साहब ने एक छोटा सा लखनऊ बसा रखा था जिसमें उनके हम प्याला हम निवाला थे- मशहूर पटकथा और संवाद लेखक वजाहत मिर्जा चंगेजी, अली रजा और आगा जानी कश्मीरी (बेदिल लखनवी), मशहूर फिल्म निर्माता सुलतान अहमद और मुगले आजम में संगतराश की भूमिका निभाने वाले हसन अली 'कुमार'।

यह बात कम लोगों को ही मालूम है कि नौशाद साहब शायर भी थे और उनका दीवान 'आठवां सुर' नाम से प्रकाशित हुआ। पांच मई को 2006 को इस फनी दुनिया को अलविदा कह गए नौशाद साहब को लखनऊ से बेहद लगाव था और इससे उनकी खुद की इन पंक्तियों से समझा जा सकता है-

रंग नया है लेकिन घर ये पुराना है

ये कूचा मेरा जाना पहचाना है

क्या जाने क्यूं उड़ गए पंक्षी पेड़ों से

भरी बहारों में गुलशन वीराना है

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...