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सोमवार, 19 फ़रवरी 2024

खुमार बारंकवी


#15sep
#19feb
खुमार बाराबंकवी

🎂जन्म: 15 सितंबर 1919, बाराबंकी
⚰️मृत्य: 19 फ़रवरी 1999

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*Ş₳ŦเŞ𝓱👸🏻◣🍁💜⃝🇱♥︎2*
एक पल में एक सदी का मजा हमसे पूछिए
दो दिन की जिंदगी का मजा हमसे पूछिए।

भूले हैं रफ्ता-रफ्ता उन्हें मुद्दतों में हम
किश्तों में खुदकुशी का मजा हमसे पूछिए।

मुझको शिकस्त-ए-दिल का मजा याद आ गया
तुम क्यों उदास हो गए क्या याद आ गया।

कहने को जिंदगी थी बहुत मुख्तसर मगर
कुछ यूं बसर हुई कि खुदा याद आ गया।

बरसे बगैर ही जो घटा घिर के खुल गई
इक बेवफा का अहद-ए-वफा याद आ गया।

हैरत है तुमको देख के मस्जिद में ऐ 'खुमार'
क्या बात हो गई जो खुदा याद आ गया।
●▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬●

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खुमार बाराबंकवी से उर्दू के प्रख्यात शायर थे। 15 सितम्बर 1919 को जन्मे खुमार बाराबंकवी का मूल नाम मोहम्मद हैदर खान था। बाराबंकी जिले को अन्तर्राष्ट्रीय पटल पर पहचान दिलाने वाले अजीम शायर खुमार बाराबंकवी को प्यार से बेहद करीबी लोग 'दुल्लन' भी बुलाते थे।

खुमार" ने शहर के सिटी इंटर कालेज से आठवीं तक शिक्षा ग्रहण की। इसके पश्चात वह राजकीय इंटर कालेज बाराबंकी जिसकी मान्यता उस समय हाईस्कूल तक ही थी वहां से कक्षा 10 की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके पश्चात लखनऊ के जुबली इंटर कालेज में उन्होंने दाखिला लिया लेकिन उनका मन पढ़ाई में नहीं लगा।

वर्ष 1938 से ही उन्होंने मुशायरों में भाग लेना शुरू कर दिया। खुमार ने अपना पहला मुशायरा बरेली में पढ़ा। उनका प्रथम शेर 'वाकिफ नहीं तुम अपनी निगाहों के असर से, इस राज़ को पूछो किसी बरबाद नजर से' था। ढाई वर्ष के अंतराल में ही वे पूरे मुल्क में प्रसिद्ध हो गये। उस दौर में जिगर मुरादाबादी उच्च कोटि के शायर माने जाते थे चूंकि खुमार ने 'तरन्नुम' से ही शुरूआत की, इसलिये शीघ्र ही वे जिगर मुरादाबादी के समकक्ष पहुंच गये। मुशायरों में अगर मजरूह सुलतानपुरी साहब के बाद अगर किसी को तवज्जो दी जाती थी तो वो "खुमार साहब" ही थे |

महान शायर और गीतकार मजरूह सुलतानपुरी आपके अज़ीज़ दोस्त थे। जितना बड़ा क़द विनम्रता की उतनी ही बड़ी मूरत, कभी-कभी तो मुशायरों में आपको घंटों तक ग़ज़ल पढ़नी पड़ती थी, लोग उठने ही नहीं देते थे | हर मिसरे के बाद "आदाब" कहने की इनकी अदा इन्हें बाकियों से मुख्तलिफ़ (अलग) करती है। आपका अंदाज- ए- बयां भी औरों से अलग था जो इनकी ख़ूबसूरत ग़ज़लों में और भी चार-चाँद लगाता था ।

वैसे तो खुमार साहब मुशायरों को ही तवज्जो देते थे, लेकिन फिर भी उन्होंने कुछ फ़िल्मों के गीत भी लिखे, जो उनकी ग़ज़लों की तरह ही उम्दा हैं। हर दिल अजीज 'खुमार बाराबंकवी' को वर्ष 1942-43 में प्रख्यात फिल्म निर्देशक एआर अख्तर ने मुम्बई बुला लिया। यहाँ से शुरू हुआ उनका फ़िल्मी सफ़र और वे फ़िल्मी दुनिया में एक सफल गीतकार के रूप में जुड़ गए।

आपने 1955 में फिल्म "रुख़साना" के लिये " शकील बदायूँनी " के साथ गाने लिखे थे। उससे पहले 1946 में फ़िल्म "शहंशाह " के एक गीत "चाह बरबाद करेगी" को "खुमार" साहब ने हीं लिखा था, जिसे संगीत से सजाया था "नौशाद" ने और अपनी आवाज़ दी थी गायकी के बेताज बादशाह कुंदन लाल सहगल साहब ने |

फ़िल्म 'बारादरी' के लिये लिखा गया उनका यह गीत 'तस्वीर बनाता हूँ, तस्वीर नहीं बनती' आज भी लोगों के दिलों में बसा है। उन्होंने तमाम फ़िल्मों के लिये 'अपने किये पे कोई परेशान हो गया', 'एक दिल और तलबगार है बहुत', 'दिल की महफ़िल सजी है चले आइए', 'साज हो तुम आवाज़ हूँ मैं','भुला नहीं देना', 'दर्द भरा दिल भर-भर आए', 'आग लग जाए इस ज़िन्दगी को, मोहब्बत की बस इतनी दास्ताँ है', 'आई बैरन बयार, कियो सोलह सिंगार', जैसे गीत लिखे जो खासे लोकप्रिय हए। खुमार के ये गीत आज भी हमारी ज़िन्दगी में रस घोल देते हैं।

खुमार साहब ने चार पुस्तकें भी लिखीं ये पुस्तकें शब-ए-ताब, हदीस-ए-दीगर, आतिश-ए-तर और रख्स-ए-मचा हैं।

खुमार की पुस्तकें कई विश्वविद्यालयों के पाठयक्रम में शामिल की गई। उन्हें उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी, जिगर मुरादाबादी, उर्दू अवार्ड, उर्दू सेंटर कीनिया और अकादमी नवाये मीर उस्मानिया विश्वविद्यालय हैदराबाद, मल्टी कल्चरल सेंटर ओसो कनाडा, अदबी संगम न्यूयार्क, दीन दयाल जालान सम्मान वाराणसी, कमर जलालवी एलाइड्स कालेज पाकिस्तान आदि ने सम्मानित किया।

वर्ष 1992 में दुबई में खुमार की प्रसिद्धि और कामयाबी के लिये जश्न मनाया गया। 25 सितम्बर 1993 को बाराबंकी जिले में जश्न-ए-खुमार का आयोजन किया गया। जिसमें तत्कालीन गवर्नर मोतीलाल वोरा ने एक लाख की धनराशि व प्रशस्ति पत्र उन्हें देकर सम्मानित किया।

खुमार का अंतिम समय काफी कष्टप्रद रहा। मृत्यु के एक वर्ष पूर्व से ही उन्होंने खाना पीना छोड़ दिया था। 13 फ़रवरी 99 को उनकी हालत गंभीर हो गई। उन्हें लखनऊ के मेडिकल कालेज में भर्ती कराया गया। जहाँ 19 फ़रवरी की रात उन्होंने आखिरी साँस ली।

शुक्रवार, 15 सितंबर 2023

डाली सोही

डॉली सोही धनोवा एक भारतीय टेलीविजन अभिनेत्री हैं, जिन्हें भाभी, कलश जैसे शो में मुख्य भूमिका निभाने के लिए जाना जाता है।मेरी आशिकी तुम से ही और खूब लड़ी मर्दानी झाँसी की रान जैसे शो के साथ डॉली ने टेलीविजन पर वापसी की।
🎂जन्म की तारीख और समय: 15 सितंबर 1975 

KK कृष्ण कांत

पुराने जमाने के चरित्र अभिनेता कृष्कान्त उर्फ़ के.के 
के जन्मदिन पर हार्दिक श्रद्धांजलि
🎂जन्म 15 सितंबर 1922
⚰️मृत्यु24 अक्टूबर 2016
कृष्कान्त उर्फ़ के के एक चरित्र अभिनेता थे जिन्होंने  पतिता(1953), डिटेक्टिव (1958) और शर्मीली (1971) जैसी यादगार फिल्मों में काम किया 

कृष्णकांत का जन्म 15 सितंबर 1922 को हावड़ा, बंगाल में हुआ था। जिन्होंन गुजराती और हिंदी सिनेमा दोनों में कई दशकों तक काम किया।  वह फिल्मों से संन्यास लेने के बाद सूरत में रहते थे और उन्हें शहर के गौरव के रूप में जाना जाता था।

1940 में अपनी इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल करने के बाद, कृष्णकांत नवंबर 1942 में बॉम्बे आए और साउंड डिपार्टमेंट में रूपतारा स्टूडियो से जुड़ गए।  उनका इरादा एक अभिनेता बनने का था और कई चरित्र भूमिकाएं कीं, विशेषकर पिता के रूप में।

उन्होंने फिल्म निर्माता नितिन बोस (न्यू थियेटर्स से) के साथ पांच साल तक सहायक के रूप में काम किया  हावड़ा में पले-बढ़े होने के कारण नितिन बोस कृष्कान्त पर काफी  विश्वास करते थे।  बोस ने कृष्णकांत को अपनी फिल्म मशाल (1950) में एक छोटी सी भूमिका दी, फनी मजुमदार के आंदोलन (1951) में किशोर कुमार के साथ काम किया जिससे कृष्कान्त को एक अभिनेता के रूप में पहचान मिली

उन्होंने कई सुपरहिट हिंदी फिल्मों जैसे पतिता (1953), हावड़ा ब्रिज (1958), हाथी मेरे साथी (1971) और शर्मीली(1971) में काम किया।  कृष्णकांत की गुजराती फिल्मों में भी महत्वपूर्ण भूमिकाएँ थीं जैसे गण सुंदरी  घर संसार (1972)।  उन्होंने गुजराती मंच पर काम करने के साथ-साथ भारतीय राष्ट्रीय रंगमंच पर मंच के दिग्गज प्रवीण जोशी के साथ काम किया।  उनके सबसे प्रसिद्ध नाटकों में से एक था कारागार(मनुष्य की मानसिक जेल)।

वयोवृद्ध अभिनेत्री सरिता जोशी, जिन्होंने मानसिक शरण अधीक्षक के डॉक्टर के रूप में dhummasनाटक में उनके साथ काम किया, ने याद किया कि वह फिल्मों में अपने काम के साथ-साथ थिएटर में भी काफी सक्रिय थे उन्होंने दिवंगत अभिनेता के बारे में कहा, “केके बहुत खास थे, वह एक बेहतरीन अभिनेता थे।  वह सभ्य और शिक्षित इंसान थे।  आपने कभी नहीं सोचा होगा कि वह शो व्यवसाय से है। सरिता जोशी की बेटी केतकी दवे ने कृष्णकांत द्वारा निर्देशित फ़िल्म प्रेम लगन (1982) अपने सिने कैरियर की शुरुआत की 

कृष्णकांत ने गुजराती सिनेमा में अपने निर्देशन की शुरुआत की, जिसमें लेखक हरकृष्णा मेहता के उपन्यास प्रवाहा पलताव्यो पर आधारित फिल्म डाकुरानी गंगा (1976) बनाई जिसमे उन्होंने नई अभिनेत्री रागिनी शाह को इंट्रोड्यूस किया।  उन्होंने सुपरहिट Visamo(1977) को अपने करियर की सर्वश्रेष्ठ फिल्म बताया।  अमिताभ बच्चन अभीनीत रवि चोपड़ा द्वारा निर्देशित फिल्म  बागबान (2003) भी इसी नाटक पर आधारित फिल्म थी

बाद के वर्षों में, उन्होंने अंग्रेजी और हिंदी दोनों में टेलीविजन शो में काम किया।  सरिता जोशी बताया  कि कृष्णकांत ने एक टेलीविजन धारावाहिक में अपनी पहली प्रस्तुति में युवा माधुरी दीक्षित को निर्देशित किया था।  बीरेन कोठारी द्वारा संकलित कृष्णकांत के संस्मरणों को उनके जीवन और कैरियर का एक बड़ा वृतांत माना जाता है।

 24 अक्टूबर 2016 में सूरत में उनका निधन हो गया

शरत चंद्र चटोपाध्या

देवदास जैसे उपन्यास के लेखक शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय के जन्मदिन पर हार्दिक श्रधांजलि
🎂जन्म 15 सितम्बर सन् 1876ई 
⚰️मृत्यु 16 जनवरी सन् 1938 ई
शरत चंद्र चट्टोपाध्याय बांग्ला के अमर कथाशिल्पी और सुप्रसिद्ध उपन्यासकार थे। इनका जन्म 15 सितम्बर सन् 1876 ई. को हुगली ज़िले के एक देवानंदपुर गाँव में हुआ था। शरतचंद्र अपने माता-पिता की नौ संतानों में एक थे। शरतचंद्र ने अठ्ठारह साल की उम्र में बारहवीं पास की थी। शरतचंद्र ने इन्हीं दिनों 'बासा' (घर) नाम से एक उपन्यास लिख डाला, पर यह रचना प्रकाशित नहीं हुई कॉलेज की पढ़ाई को बीच में ही छोड़कर वे तीस रुपए मासिक के क्लर्क होकर बर्मा (वर्तमान म्यांमार) पहुँच गए। शरत चंद्र चट्टोपाध्याय की कथा-साहित्य की प्रस्तुति जिस रूप-स्वरूप में हुई, लोकप्रियता के तत्त्व ने उनके पाठकीय आस्वाद में वृद्धि ही की है। शरत चंद्र चट्टोपाध्याय अकेले ऐसे भारतीय कथाकार भी हैं, जिनकी अधिकांश कालजयी कृतियों पर फ़िल्में बनीं तथा अनेक धारावाहिक सीरियल भी बने। इनकी कृतियाँ देवदास, चरित्रहीन और श्रीकान्त के साथ तो यह बार-बार घटित हुआ है।

शरत चंद्र चट्टोपाध्याय यथार्थवाद को लेकर साहित्य क्षेत्र में उतरे थे। यह लगभग बंगला साहित्य में नई चीज़ थी। शरत चंद्र चट्टोपाध्याय ने अपने लोकप्रिय उपन्यासों एवं कहानियों में सामाजिक रूढ़ियों पर प्रहार किया था, पिटी-पिटाई लीक से हटकर सोचने को बाध्य किया था।

शरतचंद्र की प्रतिभा उपन्यासों के साथ-साथ उनकी कहानियों में भी देखने योग्य है। उनकी कहानियों में भी उपन्यासों की तरह मध्यवर्गीय समाज का यथार्थ चित्र अंकित है। शरतचंद्र प्रेम कुशल के चितेरे थे। शरतचंद्र की कहानियों में प्रेम एवं स्त्री-पुरुष संबंधों का सशक्त चित्रण हुआ है। इनकी कुछ कहानियाँ कला की दृष्टि से बहुत ही मार्मिक हैं। ये कहानियाँ शरत के हृदय की सम्पूर्ण भावनाओं का प्रतिनिधित्व करती हैं। उन्होंने कहानियाँ अपने बालपन के संस्मरण से और अपने संपर्क में आये मित्र व अन्य जन के जीवन से उठाई हैं। ये कहानियाँ जैसे हमारे जीवन का एक हिस्सा है ऐसा प्रतीत होता है।

महात्मा गांधी ने कहा था- "पाप से घृणा करो, पापी से नहीं।" विश्वविख्यात बांग्ला कथाशिल्पी शरत चंद्र चट्टोपाध्याय ने गांधी जी के उपरोक्त कथन को अपने साहित्य में उतारा था। उन्होंने पतिता, कुलटा, पीड़ित दहबी-कुचली और प्रताड़ित नारी की पीड़ा को अपनी रचनाओं में स्वर दिया

शरतचंद्र के मन में नारियों के प्रति बहुत सम्मान था वे नारी हृदय के सच्चे पारख़ी थे। उनकी कहानियों में स्त्री के रहस्यमय चरित्र, उसकी कोमल भावनाओं, दमित इच्छाओं, अपूर्ण आशाओं, अतृप्त आकांक्षाओं, उसके छोटे-छोटे सपनों, छोटी-बड़ी मन की उलझनों और उसकी महत्त्वकांक्षाओं का जैसा सूक्ष्म, सच्चा और मनोवैज्ञानिक चित्रण-विश्लेषण हुआ है, वह अन्यत्र दुर्लभ है

शरतचंद्र का सम्पूर्ण साहित्य नारी के उत्थान से पतन और पतन से उत्थान की करुण कथाओं से भरा पड़ा है। शरतचंद्र अपनी कहानियों में केवल पीडित-प्रताड़ित नारी की पतनगाथा नहीं गाते, सिर्फ़ उसके पतिता और कुलटा हो जाने की कथा नहीं कहते, उसके स्नेह, त्याग, बलिदान ममता और प्रेम की पावन-कथा भी सुनाते हैं। शरतचंद्र की कहानियों में नारी के नीचतम और महानतम दोनों रूपों के एक साथ दर्शन होते हैं। जब शरतचंद्र नारी के अधोपतन की कथा कहते-कहते उसी नारी के उदात्त और उज्ज्वल चरित्र को उद्घाटित करते हैं, तो पाठक सन्न रह जाता है। उसने मन में यह प्रश्न कहीं गहरे घर कर जाता है कि एक ही स्त्री के दो रूप कैसे हो सकते हैं और वह यह नहीं समझ पाता कि आख़िर वह नारी के किस रूप को स्वीकार करे। शरतचंद्र अपनी कहानियों में नारी हृदय की गांठों और गुत्थियों को जिस कुशलता से खोलते हैं, उनकी रचनाओं में नारी का जो बहुरूप सामने आता है, वैसी झलक विश्व-साहित्य में कहीं नहीं मिलती

शरतचंद्र ने अनेक उपन्यास लिखे हैं जिनमें पंडित मोशाय, बैकुंठेर बिल, मेज दीदी, दर्पचूर्ण, अभागिनी का स्वर्ग, श्रीकांत, अरक्षणीया, निष्कृति, मामलार फल, अनुपमा का प्रेम, गृहदाह, शेष प्रश्न, दत्ता, देवदास, ब्राह्मण की लड़की, सती, विप्रदास, देना पावना आदि प्रमुख हैं। इन्होंने बंगाल के क्रांतिकारी आंदोलन को लेकर 'पथेर दावी' उपन्यास लिखा था। कई भारतीय भाषाओं में शरत के उपन्यासों के अनुवाद हुए हैं। शरतचंद्र के कुछ उपन्यासों पर आधारित हिन्दी फ़िल्में भी कई बार बनी हैं। 1974 में इनके उपन्यास 'चरित्रहीन' पर आधारित फ़िल्म बनी थी। उसके बाद देवदास को आधार बनाकर देवदास फ़िल्म का निर्माण तीन बार हो चुका है। पहली देवदास (1936) कुन्दन लाल सहगल द्वारा अभिनीत, दूसरी देवदास (1955) दिलीप कुमार, वैजयन्ती माला द्वारा अभिनीत तथा तीसरी देवदास (2002) शाहरुख़ ख़ान, माधुरी दीक्षित, ऐश्वर्या राय द्वारा अभिनीत है। इसके अतिरिक्त 1974 में चरित्रहीन, परिणीता 1953 और 2005 में भी बनी थी, बड़ी दीदी (1969) तथा मँझली बहन, आदि पर भी चलचित्रों के निर्माण हुए हैं।

शरतचंद्र बाबू ने मनुष्य को अपने विपुल लेखन के माध्यम से उसकी मर्यादा सौंपी और समाज की उन तथाकथित परम्पराओं को ध्वस्त किया, जिनके अन्तर्गत नारी की आँखें अनिच्छित आँसुओं से हमेशा छलछलाई रहती हैं। शरत बाबू ने समाज द्वारा अनसुनी रह गई वंचितों की विलख-चीख और आर्तनाद को परख़ा और यह जाना कि जाति, वंश और धर्म आदि के नाम पर एक बड़े वर्ग को मनुष्य की श्रेणी से ही अपदस्थ किया जा रहा है। उन्होंने अपने लेखन के माध्यम से इस षड्यन्त्र के अन्तर्गत पनप रही तथाकथित सामाजिक 'आम सहमति' पर रचनात्मक हस्तक्षेप किया, जिसके चलते वह लाखों करोड़ों पाठकों के चहेते शब्दकार बने। नारी और अन्य शोषित समाजों के धूसर जीवन का उन्होंने चित्रण ही नहीं किया, बल्कि उनके आम जीवन में आच्छादित इन्दधनुषी रंगों की छटा भी बिखेरी थी। शरत का प्रेम को आध्यात्मिकता तक ले जाने में विरल योगदान है। शरत-साहित्य आम आदमी के जीवन को जीवंत करने में सहायक जड़ी-बूटी सिद्ध हुआ है

प्रसिद्ध उपन्यासकार शरत चंद्र चट्टोपाध्याय की मृत्यु 16 जनवरी सन् 1938 ई. को हुई थी। शरतचंद्र चट्टोपाध्याय को यह गौरव हासिल है कि उनकी रचनाएँ हिन्दी सहित सभी भारतीय भाषाओं में आज भी चाव से पढ़ी जाती हैं। लोकप्रियता के मामले में बंकिम चंद्र चटर्जी और शरतचंद्र रवीन्द्रनाथ टैगोर से भी आगे हैं।

मुनवर सुल्ताना

फ़िल्म अभिनेत्री मुनव्वर सुल्ताना की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि
🎂जन्म : 08 नवंबर 1924, पाकिस्तान लाहौर
⚰️मृत्यु : 15 सितंबर 2007, पालीहिल , मुंबई

मुनव्वर सुल्ताना  एक भारतीय सिनेमा अभिनेत्री थीं, जिन्होंने हिंदी / हिंदुस्तानी फिल्मों में अभिनय किया था।  उन्हें 1940 के दशक के उत्तरार्ध में "नूरजहाँ, स्वर्णलता और रागिनी" जैसी अभिनेत्रियों के साथ शुमार किया जाता है।

वह मजहर खान की फ़िल्म  पहली नज़र (1945) से अपने फिल्मी कैरियर की शुरुआत की  मुनव्वर सुल्ताना अभिनेता-निर्माता-निर्देशक मज़हर खान की  खोज, थी वह 1949 तक सबसे व्यस्त अभिनेत्रियों में से एक बन गई, साथ ही अन्य प्रमुख अभिनेत्रियों जैसे कि सुरैया और नरगिस के साथ उनका नाम लिया जाने लगा 
उनकी कुछ सफल फिल्में पहली नज़र, दर्द (1947), एलान (1947) कनीज़ (1947) और बाबुल (1950) थीं।

मुनव्वर सुल्ताना का जन्म 8 नवंबर 1924 को लाहौर, ब्रिटिश भारत में एक सख्त पंजाबी मुस्लिम परिवार में हुआ था पुत्र सरफराज और बेटी शाहीन के साक्षात्कार के अनुसार, मुनव्वर के पिता एक रेडियो उद्घोषक थे मुनव्वर एक डॉक्टर बनना चाहती थी, लेकिन फिल्मों में एक प्रस्ताव ने उन्हें अभिनेत्री बना दिया  दलसुख पंचोली की फ़िल्म खजांची (1941) में उन्होंने बारमैड कि एक छोटी सी भूमिका निभाई थी और उन पर एक गीत "पीने के दिन आये" फिल्माया गया था मुनव्वर 1945 में अभिनेता-निर्देशक मज़हर खान के कहने से लाहौर से बॉम्बे आयी थी । वह अपनी फिल्म पहली नज़र के साथ ही लोकप्रिय हो गयी 

1945 में, उन्हें निर्माता-अभिनेता-निर्देशक मज़हर खान ने लाहौर का दौरा किया वहाँ उन्होने मुनव्वर सुल्ताना को 4000  मासिक वेतन पर बॉम्बे ले आये  मजहर के साथ मुनव्वर की पहली फिल्म पहली नज़र थी, जहाँ उन्होंने  अभिनेता मोतीलाल के साथ काम किया था   मोतीलाल के लिए गायक मुकेश द्वारा गाए गीत  "दिल जलता है तो जलने दे " काफी लोकप्रिय हुआ इस फ़िल्म के दौरान मज़हर खान  मुनव्वर सुल्ताना की नज़दीकियों काफी बढ़ गयी

पहली नज़र के बाद, उन्हें 1947 से 1949 तक कई फिल्मों में काम किया बाबूराव पटेल ने सिने-पत्रिका फिल्मइंडिया 1949 में उनके बारे में लिखा की  सुरैया और नरगिस के बाद मुनव्वर सुल्ताना  सबसे अधिक काम करने वाली अभिनेत्रियों में से एक थीं

1947 में, मुनव्वर ने चार फिल्मों दर्द, एलान, अंधों की दुनीया और नैय्या में अभिनय किया। कारदार प्रोडक्शंस के तहत दर्द को अब्दुल रशीद कारदार ने निर्देशित किया था।  फिल्म में कोई बड़ा कलाकार नहीं होने के बावजूद, यह बॉक्स ऑफिस पर एक आश्चर्यजनक "संगीतमय हिट" निकली  फ़िल्म के नायक कारदार के भाई नुसरत (कारदार) थे, जबकि सुरैया ने मुख्य नायिका के रूप में मुनव्वर सुल्ताना के साथ दूसरी मुख्य भूमिका निभाई थी मुनव्वर सुल्ताना पर तीन गाने फिलामये गये जिसे उमा देवी ने गाया था   "अफसाना लख रही हूं" गीत बहुत लोकप्रिय हुआ  
फिल्म "एलान" ने मुनव्वर सुलताना को और अधिक लोकप्रिय बना दिया एक मुस्लिम सामाजिक, फिल्म को शिक्षा की आवश्यकता के प्रति अपने "प्रगतिशील रवैये" के लिए सराहा गया।  इसका निर्देशन महबूब खान ने किया था और सुरेंद्र ने नायक की भूमिका निभाई थी

1948 में मुनव्वर को चार और फिल्मों में में काम किया "पराई आग" को ग्रेट इंडिया पिक्चर्स बैनर तले और नजम नकवी द्वारा निर्देशित किया गया था  फिल्म में मुनव्वर के साथ मधुबाला और उल्हास थे 
"सोना" (गोल्ड) मजहर कला प्रोडक्शन लि के तहत सोना 
मजहर खान द्वारा निर्देशित फिल्म थी
बॉम्बे टॉकीज प्रोडक्शन के बैनर तले नज़ीर अजमेरी द्वारा निर्देशित "मजबूर" एक और फ़िल्म थी इसमें श्याम इनके साथ नायक की भूमिका में थे इस फ़िल्म में गुलाम हैदर का संगीत था बॉम्बे टॉकीज़ हिमांशु राय की मृत्यु के बाद कई बदलावों से गुज़रा  और एस मुखर्जी के साथ देविका रानी की साझेदारी ने बॉक्स ऑफिस पर कई हिट फ़िल्में दी  पहले एस मुखर्जी और फिर देविका रानी ने बॉम्बे टॉकीज़ को छोड़ दिया, अशोक कुमार और एस वाचा ने बॉम्बे टॉकीज़ को अपने नियंत्रण में लिया   उनकी पहली फिल्म "मजबूर" थी  यह कहानी एक "अंतर-सांप्रदायिक" प्रेम कहानी थी, जिसमें एक मुस्लिम लड़के एक हिंदू लड़की का प्यार दिखाया गया था मुनव्वर ने इस फिल्म में श्याम के साथ "हिट-जोड़ी" बनाई, जबकि लता मंगेशकर ने गुलाम हैदर के संगीत निर्देशन में कई बेहतरीन गाने गाये
"मेरी कहानी" को कैमरामैन केकी मिस्त्री द्वारा निर्देशित किया गया था और सुपर टीम फेडरल प्रोडक्शंस (बॉम्बे) के लिए शराफ द्वारा निर्मित किया गया था  फिल्म में सुरेंद्र के साथ मुनव्वर और मधुबाला ने अभिनय किया था

1949 सात रिलीज के साथ मुनव्वर का सबसे व्यस्त वर्ष रहा फ़िल्म "दिल की दुनीया" को  नोबल आर्ट्स प्रोडक्शन के लिए मजहर खान द्वारा निर्देशित किया गया था  इस फ़िल्म में मुनव्वर के साथ गीता बाली और मज़हर की सह-भूमिका निभाई  फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर बड़ी हिट साबित हुई 
उस साल उनकी स्टैंडआउट फिल्म थी "कनीज़", जिसका निर्देशन कृष्ण कुमार ने कारवां पिक्चर्स के लिए किया था इसमें श्याम के साथ मुनव्वर और कुलदीप कौर सहकलाकार थे

1950 में रिलीज़ उनकी चार फिल्मों में से, मुनव्वर की सबसे उल्लेखनीय फिल्म "बाबुल" थी उन्होंने इस प्रेम त्रिकोण में दिलीप कुमार और नरगिस के साथ अभिनय किया फ़िल्म एस यू सनी द्वारा निर्देशित नौशाद द्वारा संगीतबद्ध किया गया था फिल्म बॉक्स ऑफिस मेगा हिट साबित हुई  उन्होंने 1956 तक कुछ और फिल्मों में अभिनय किया फ़िल्म "जल्लाद" उनकी अंतिम फ़िल्म थी

1950 से, मुनव्वर का कैरियर धीमा हो गया, और उन्होंने कम फिल्मों में अभिनय किया  वह अपने पति शरीफ अली भगत से मिली, जो एक व्यवसायी थे, एक फिल्म के सेट पर जिसके लिए उन्होंने फर्नीचर प्रदान किया था उन्होंने मुनव्वर के साथ दो फिल्में, मेरी कहानी (1948) और प्यार की मंजिल (1950) का निर्माण किया
1966 में अपने पति की आकस्मिक मृत्यु के बाद, मुनव्वर ने अपने चार बेटों और तीन बेटियों के परिवार को अकेले संभाला

अपने जीवन के अंतिम आठ वर्षों में, मुनव्वर अल्जाइमर रोग से पीड़ित रहे 15 सितंबर 2007 को अंबेडकर रोड स्थित पॉली हिल मुम्बई में उनके घर पर उनका निधन हो गया

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...