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शनिवार, 13 जनवरी 2024

पंडित शिव कुमार शर्मा

#10may
#13jan 
पंडित शिवकुमार शर्मा 

 🎂13जनवरी, 1938 जम्मू, 
⚰️10 मई 2022
भारत प्रख्यात भारतीय संतूर वादक हैं।संतूर एक कश्मीरी लोक वाद्य होता है।इनका जन्म जम्मू में गायक पंडित उमा दत्त शर्मा के घर हुआ था।1999में रीडिफ.कॉम को दिये एक साक्षातकार में उन्होंने बताया कि इनके पिता ने इन्हें तबला और गायन की शिक्षा तब से आरंभ कर दी थी, जब ये मात्र पाँच वर्ष के थे।इनके पिता ने संतूर वाद्य पर अत्यधिक शोध किया और यह दृढ़ निश्चय किया कि शिवकुमार प्रथम भारतीय बनें जो भारतीय शास्त्रीय संगीत को संतूर पर बजायें। तब इन्होंने 13 वर्ष की आयु से ही संतूर बजाना आरंभ कियाऔर आगे चलकर इनके पिता का स्वप्न पूरा हुआ। इन्होंने अपना पहला कार्यक्रम बंबई में 1955 में किया था।

शर्मा जी को कई राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय सम्मान एवं पुरस्कार मिल चुके हैं। इन्हें १९८५ में बाल्टीमोर, संयुक्त राज्य की मानद नागरिकता भी मिल चुकी है।इसके अलावा इन्हें 1986 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 1999 में पद्मश्री, एवं 2001 में पद्म विभूषण से भी अलंकृत किया गया था।
शिवकुमार शर्मा का निधन 84 वर्ष के थे। शिवकुमार पिछले छह महीने से किडनी संबंधी समस्याओं से पीड़ित थे और डायलिसिस पर थे। कार्डियक अरेस्ट के कारण उनका निधन हो गया।

मनदीप बेनीपाल

#13jan
मंदीप बेनीपाल

🎂13 जनवरी 1976 , पटियाला, पटियाला

राष्ट्रीयता भारतीय
पेशा फ़िल्म निर्देशक

साड़ा हक
उल्लेखनीय कार्य
मनदीप बेनीपाल ने अपने करियर की शुरुआत सहायक निर्देशक के रूप में की थी। उन्होंने गुरदास मान , दिव्या दत्ता अभिनीत फिल्म शहीद-ए-मोहब्बत बूटा सिंह ( 1999) और गुरदास मान , जूही चावला अभिनीत देस होया परदेस (2004) के लिए निर्देशक मनोज पुंज की सहायता की । उन्होंने बब्बू मान अभिनीत फिल्म हशर (2008) के लिए गौरव त्रेहान की सहायता भी की ।

मनदीप बेनीपाल ने निर्देशक के रूप में अपनी शुरुआत वर्ष 2010 में पंजाबी फिल्म एकम - सन ऑफ सॉइल से की, जिसमें बब्बू मान , मैंडी तखर ने अभिनय किया था । फिल्म को बॉक्स ऑफिस पर अच्छा रिस्पॉन्स मिला।

2013 में मनदीप बेनीपाल फिल्म साड्डा हक लेकर आए। साड्डा हक 1980 और 1990 के दशक की घटनाओं पर आधारित है जब राज्य उग्रवाद से पीड़ित था, इसमें कई मुद्दों को दर्शाया गया है; जिसमें एक मानवाधिकार कार्यकर्ता की हत्या, कथित पुलिस यातना, फर्जी मुठभेड़, जेल से भागना और एक राजनेता की हत्या शामिल है। इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर काफी अच्छा प्रदर्शन किया था. यह यूके में भी हिट रही।  सद्दा हक को पीटीसी पंजाबी फिल्म अवार्ड्स 2014 में 10 अलग-अलग श्रेणियों में नामांकित किया गया था और फिल्म उनमें से तीन जीतने में सफल रही। साडा हक पर शुरुआत में पंजाब सरकार द्वारा प्रतिबंध लगाया गया था , जिसमें कहा गया था कि "राज्य में सांप्रदायिक सद्भाव बनाए रखने के लिए फिल्म की रिलीज पर प्रतिबंध लगाया गया था"। बाद में सुप्रीम कोर्ट के बैन हटाने के आदेश के बाद ये फिल्म रिलीज हुई . इस फिल्म को सेंसर बोर्ड ऑफ इंडिया ने ए सर्टिफिकेट दिया है।
2014 में, वह फिल्म योद्धा - द वॉरियर लेकर आए, जिसमें कुलजिंदर सिंह सिद्धू मुख्य भूमिका में थे। यह फिल्म एक साधारण व्यक्ति के जीवन पर आधारित है जो परिस्थितियों के कारण योद्धा बन जाता है। योद्धा को पीटीसी पंजाबी फिल्म अवार्ड्स 2015 में 6 श्रेणियों के लिए नामांकित किया गया था। 

2018 में, उन्होंने आगामी फिल्म डाकुआन दा मुंडा का निर्देशन किया 
📽️
एकम - मिट्टी का बेटा (2010)
सद्दा हक (2013)
योद्धा (2014)
डाकुआँ दा मुंडा (2018)
काका जी (2019)
डीएसपी देव (2019)
डाकुआं दा मुंडा 2 (2022)
डीजे वाले बाबू (2022)

शक्ति सामंत

#13jan
#09april
शक्ति सामंत
🎂जन्म 13 जनवरी, 1926
जन्म भूमि बर्धमान नगर, बंगाल
⚰️मृत्यु 09 अप्रैल, 2009
मृत्यु स्थान मुम्बई, महाराष्ट्र
कर्म भूमि मुम्बई
कर्म-क्षेत्र निर्माता-निर्देशक
मुख्य फ़िल्में हावड़ा ब्रिज, अमर प्रेम, आराधना, कटी पतंग, कश्मीर की कली, अमानुष आदि
पुरस्कार-उपाधि फ़िल्मफेयर पुरस्कार (तीन बार) सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म बनाने के लिए
नागरिकता भारतीय
उनके पिता एक इंजीनियर थे जिनकी एक दुर्घटना में मृत्यु हो गई। उस वक़्त शक्ति सामंत केवल डेढ़ साल के थे। पढ़ाई के लिए उन्हें उत्तर प्रदेश के बदायूँ में उनके चाचा के पास भेज दिया गया। देहरादून से अपनी 'इंटरमिडीयट' पास करने के बाद उन्होंने कलकत्ता (अब कोलकाता) जाकर 'इंजिनीयरिंग एंट्रान्स' की परीक्षा दी और अव्वल भी आये। लेकिन जब वो भर्ती के लिए गये तो उन्हें यह कह कर वापस कर दिया गया कि वह परीक्षा केवल बंगाल, बिहार और ओड़िशा के छात्रों के लिए थी और वो उत्तर प्रदेश से आये हुए थे। दुर्भाग्य यहीं पे ख़तम नहीं हुई। जब वो वापस उत्तर प्रदेश गये तो वहाँ पर सभी कालेजों में भर्ती की प्रक्रिया समाप्त हो चुकी थी। उनका एक साल बिना किसी वजह के बरबाद हो गया। उनके चाचा के कहने पर शक्ति उनके साथ उनके काम में हाथ बँटाने लग गये। साथ ही साथ वो थियटर और ड्रामा के अपने शौक़ को भी पूरा करते रहे। एक रात जब वो थियटर के रिहर्सल से घर देर से लौटे तो उनके चाचा ने उन्हें कुछ भला बुरा सुनाया। इन्हें उनका वह बर्ताव पसंद नहीं आया और उन्होंने अपने चाचा का घर हमेशा के लिए छोड़ दिया।
कैरियर की शुरूआत
अपने चाचा के घर से निकलने के बाद शक्ति मुंबई के आस-पास काम की तलाश कर रहे थे क्योंकि उन्हें पता था कि उनका अंतिम मुक़ाम यह कला-नगरी ही है। उन्हें दापोली में एक 'ऐंग्लो हाई स्कूल' में नौकरी मिल गई। यहाँ से मुंबई स्टीमर से एक घंटे में पहुँची जा सकती थी। उस स्कूल के छात्र ज़्यादातर अफ़्रीकन मुस्लिम थे और 23-24 साल की आयु के थे, जब कि वो ख़ुद 21 साल के थे। शक्ति ने देखा कि स्कूल में छात्रों की चहुँमुखी विकास के लिए साज़-ओ-सामान का बड़ा अभाव है। उन्होंने स्कूल के प्राधानाचार्य से इस बात का ज़िक्र किया और छात्रों के लिए खेल-कूद के कई चीज़ें ख़रीदवाये। छात्र शक्ति के इस अंदाज़ से मुखातिब हुए और उनके अच्छे दोस्त बन गये। अपने चाचा के साथ काम करते हुए शक्ति को महीने के 3000 रुपये मिलते थे, जबकि यहाँ उन्हें केवल 130 रुपये मिलते। उसमें से 30 रुपये खर्च होते और 100 रुपय वो बचा लेते। फ़िल्म जगत में कुछ करने की उनकी दिली तमन्ना उन्हें हर शुक्रवार मुंबई खींच ले जाती। शुक्रवार शाम को वो स्टीमर से मुंबई जाते, वहाँ पर काम ढ़ूंढ़ते और फिर सोमवार की सुबह वापस आ जाते। वो कई फ़िल्म निर्माताओं से मिले, लेकिन वह राजनीतिक हलचल का समय था। देश के बँटवारे के बाद बहुत सारे कलाकार पाकिस्तान चले गये थे। फ़िल्म इंडस्ट्री के लिए बुरा वक़्त चल रहा था। शक्ति अंत में जाकर दादा मुनि अशोक कुमार से मिले, जो उनके पसंदीदा अभिनेता भी थे, और जो उन दिनो 'बॉम्बे टॉकीज़' से जुड़े हुए थे। दादामुनि ने उन्हें इस शर्त पर सहायक निर्देशक के तौर पर 'बॉम्बे टॉकीज़' में रख लिया कि उन्हें कोई तनख्वाह नहीं मिलेगी, सिवाय दोपहर के खाने और चाय के। शक्ति राज़ी हो गये। उत्तर प्रदेश में रहने की कारण उनकी हिंदी काफ़ी अच्छी थी। इसलिए वहाँ पर फ़णी मजुमदार के बांग्ला में लिखे चीज़ों को वो हिंदी में अनुवाद किया करते। इस काम के लिए उन्हें पैसे ज़रूर दिये गये। कुछ दिनो के बाद शक्ति ने अशोक कुमार से अपने दिल की बात कही कि वो मुंबई दरसल अभिनेता बनने आये हैं। पर उनकी प्रतिभा और व्यक्तित्व को समझकर दादामुनि ने उनसे अभिनय में नहीं बल्कि फ़िल्म निर्माण के तक़नीकी क्षेत्र में हाथ आज़माने के लिए कहा।
अभिनय और निर्देशन
शक्ति सामंत के दिल में अभिनय करने की चाहत शुरू से ही थी। वो फ़िल्मों में छोटे-मोटे रोल निभाकर इस शौक़ को पूरा कर लेते थे। उनके अनुसार उन्हे हर फ़िल्म में पुलिस इंस्पेक्टर का रोल दे दिया जाता था और एक ही संवाद हर फ़िल्म में उन्हें कहना पड़ता कि "फ़ॉलो कार नम्बर फ़लाना, इंस्पेक्टर फ़लाना स्पीकींग"। फ़िल्म जगत से जुड़े रहने की वजह से कई बड़ी हस्तियों से उनकी जान-पहचान होने लगी थी। दो ऐसे बड़े लोग थे गुरु दत्त और लेखक ब्रजेन्द्र गौड़। गौड़ साहब को फ़िल्म 'कस्तुरी' निर्देशित करने का न्योता मिला, लेकिन किसी दूसरी कंपनी की फ़िल्म में व्यस्त रहने की वजह से इस दायित्व को वो ठीक तरह से निभा नहीं पा रहे थे। इसलिए उन्होंने शक्ति सामंत से उन्हें इस फ़िल्म में उनकी मदद करने को कहा। सामंत साहब ने इस काम के 250 रुपये लिए थे। किसी फ़िल्म से यह उनकी पहली कमाई थी। 'कस्तुरी' (1954) में संगीत पंकज मलिक का था।

पहली फ़िल्म 'इंस्पेक्टर'

गीतकार और निर्माता एस. एच. बिहारी तथा लेखक दरोगाजी 'इंस्पेक्टर' नामक फ़िल्म के निर्माण के बारे में सोच रहे थे। फ़िल्म को 'प्रोड्यूस' करवाने के लिए वो लोग नाडियाडवाला के पास जा पहुँचे। नाडियाडवाला ने कहा कि इस कहानी पर सफल फ़िल्म बनाने के लिए मशहूर और महँगे अभिनेतायों को लेना पड़ेगा। बजट का संतुलन बिगड़ न जाये इसलिए उन लोगों ने इस फ़िल्म के लिए किसी नये निर्देशक को नियुक्त करने की सोची ताकी निर्देशक के लिए ज़्यादा पैसे न खर्चने पड़े। और इस तरह से शक्ति सामंत ने अपनी पहली फ़िल्म 'इंस्पेक्टर' का निर्देशन किया जो सन 1956 में पुष्पा पिक्चर्स के बैनर तले रिलीज़ हुई। फ़िल्म 'हिट' रही और इस फ़िल्म के बाद उन्हें फिर कभी पीछे मुड़कर देखने की ज़रूरत नहीं पड़ी। इस फ़िल्म के गाने भी ख़ासा पसंद किये गये। हेमन्त कुमार इस फ़िल्म के संगीतकार थे। यहाँ यह बताना भी ज़रूरी होगा कि शक्ति सामंत ने काम तो पहले 'इंस्पेक्टर' का ही शुरु किया था लेकिन उनकी दूसरी फ़िल्म 'बहू' (1955) पहले प्रदर्शित हो गई
सम्मान और पुरस्कार
शक्ति सामंत को तीन बार सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म बनाने के लिए फ़िल्मफेयर पुरस्कार मिला। फ़िल्में थीं आराधना (1969), अमानुष (1975) और अनुराग (1972)।

निधन
अपनी कला और प्रतिभा के ज़रिये फ़िल्म जगत में पहचान बनाने वाले सुप्रसिद्ध निर्माता एवं निर्देशक शक्ति सामंत 9 अप्रैल, 2009 को मुंबई में 83 वर्ष की आयु में उन्होंने इस दुनिया-ए-फ़ानी को अलविदा कह कर अपनी अनंत यात्रा पर चले गये।

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