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शनिवार, 27 जनवरी 2024

सुमन कल्याणपुर

#28jan 

सुमन कल्याणपुर
पूरा नाम सुमन कल्याणपुर
🎂जन्म 28 जनवरी, 1937
जन्म भूमि ढाका, बंगाल (आज़ादी से पूर्व)

अभिभावक पिता- शंकर राव हेमाडी
पति/पत्नी रामानंद कल्याणपुर
कर्म भूमि मुम्बई
कर्म-क्षेत्र गायन
विषय भारतीय शास्त्रीय संगीत, लोक संगीत, भजन, गज़ल
पुरस्कार-उपाधि दादा साहब फाल्के पुरस्कार, 1961
पद्म भूषण, 2023
मियां तानसेन पुरस्कार, 1965 और 1970
लता मंगेशकर पुरस्कार, 2009

प्रसिद्धि पार्श्वगायिका
नागरिकता भारतीय
मुख्य गीत इक जुर्म करके हमने चाहा था मुस्कुराना, परबतों के पेड़ों पर, ये मौसम रंगीन समां, आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे हर जुबान पर
सक्रिय वर्ष 1954–1988
अन्य जानकारी करीब 28 साल के अपने करियर में सुमन कल्याणपुर ने पार्श्वगायन के क्षेत्र में अपना एक सम्मानजनक स्थान बनाया।
सुमन कल्याणपुर
जन्म- 28 जनवरी, 1937, ढाका, बंगाल) भारतीय पार्श्वगायिका हैं। इनकी हिन्दी फ़िल्म संगीत में दशा दोधारी चाकू की तरह रही है, जो दोनों ओर से चीजों को काटता है। अपनी अच्छी आवाज के बावजूद सुमन कल्याणपुर को फ़िल्मों में संगीतकारों ने अधिक अवसर इसलिए नहीं दिए क्योंकि उनकी आवाज हूबहू लता जी से मिलती थी। जब बाज़ार में ऑरिजिनल आवाज उपलब्ध हो, तो डुप्लिकेट को कोई क्यों कर मौका देने लगे। सुमन कल्याणपुर का फ़िल्मों में आगमन भी ऐसे दौर में हुआ, जब लता जी के खनकते कलदार सिक्के चलते थे। कोई संगीतकार लता जी के विरुद्ध सुमन कल्याणपुर से गवाने की हिमाकत कैसे कर सकता था। इसलिए सुमन कल्याणपुर चुपचाप हमेशा दूसरी कतार में खड़ी रहकर अपने नियति को दबे होंठ ताउम्र स्वीकारती रहीं। उन्हें लता जी का क्लोन बना दिया गया।

सुमन का जन्म
🎂28 जनवरी 1937 को ढाका (बंगला देश की वर्तमान राजधानी) में हुआ। पिता बैंक अधिकारी थे। 1943 में मुंबई आने पर पढ़ाई तथा संगीत का प्रशिक्षण यही लिया। अपने गुरु यशवंत देव से बाकायदा संगीत सीखा। उन्होंने ही मराठी फ़िल्म शुक्राची चांदनी में पहली बार गवाया। किस्मत यहां भी दगा दे गई। यह फ़िल्म में शामिल नहीं हुआ। लेकिन संगीतकार मोहम्मद शफी ने सुमन को फ़िल्म मंगू में गाने के अवसर दिए। सन था 1954 और सुमन की उम्र थी 17 साल। फिर किस्मत ने झपट्टा मारा, निर्माता ने संगीतकार को फ़िल्म के अधबीच में बदल लिया। उनका स्थान ओपी नय्यर ने लिया। ओपी को गीता दत्त, आशा भोंसले तथा शमशाद की मोटी आवाज पसंद थी। उन्होंने सुमन का सिर्फ एक गीत फ़िल्म में रखा-कोई पुकारे धीरे से तुझे। इसी साल संगीतकार नाशाद के निर्देशन में फ़िल्म दरवाजा में पांच गीत गाकर अपना पैर मजबूती से जमाया। इस दौर में वह सुमन हेमाड़ी थी। मुंबई के व्यापारी रामानंद कल्याणपुर से शादी के बाद वह सुमन कल्याणपुर हो गईं।

कॅरियर
मुख्य लेख : सुमन कल्याणपुर का फ़िल्मी कॅरियर
एक समय एचएमवी ने 50 प्रेम-गीतों के चार कैसेट्स जारी किए थे। उनमें अधिकतम सात गीत सुमन द्वारा गाए हुए थे। किशोर, रफी, तलत, मन्ना डे, गीता दत्त, हेमंत कुमार सब उनके पीछे थे। कैसेट कवर पर सबके फोटो छापे गए मगर सुमन का फोटो एक कैसेट पर भी नहीं था। यह कुछ उसी तरह की घटना है कि जायज टिकट के बावजूद बस कण्डक्टर मुसाफिर को सरे राह उतार दे। सुमन के पार्श्वगायन के करियर में सत्तर के दशक में बसंती बयार ने शीतल हवा के झोंकों से उन्हें शांति प्रदान की थी। गीतों की रायल्टी को लेकर रफी-लता में मनमुटाव चल रहा था। दोनों ने साथ गाना छोड़ दिया था। सुमन को इस दशक में 170 फ़िल्मों में गाने का मौका मिला। इस दौर में सुमन के उम्दा गीत सामने आए। जैसे- दिल एक मंदिर है (दिल एक मंदिर), अगर तेरी जलवानुमाई न होती (बेटी-बेटे), तुमने पुकारा और हम चले आए (राजकुमार), अजहुं न आए बालमा सावन बीता जाए (सांझ और सबेरा) तथा आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे हर जुबान पर (ब्रह्मचारी), लेकिन बाद में रफी-लता में समझौता होते ही पुरानी स्थिति लौट आई।

मलाल
संगीतकार नौशाद के निर्देशन में फिल्म 'दरवाजा' में सुमन कल्याणपुर को पांच गीत गाने का मौका मिला, जिसके बाद सुमन ने इंडस्ट्री में मजबूती से अपने पैर जमाए। हालांकि, 'ए मेरे वतन के लोगों' न गा पाने का उन्हें मलाल रहा। एक बार एक एक बातचीत के दौरान सुमन कल्याणपुर ने खुद 'ए मेरे वतन के लोगो' गीत को लेकर बड़ा खुलासा किया था।

उन्होंने बताया था कि पंडित जवाहरलाल नेहरू के सामने यह गीत गाने के लिए मुझे बुलाया गया था, रिहर्सल भी हुई थी, लेकिन मंच के पास पहुंचते ही मुझे इस गाने की बजाय दूसरा गाना गाने के लिए कहा गया। सुमन कल्याणपुर ने यह भी कहा कि इस बात का अब तक पता नहीं लगा कि आखिर यह गाना उनसे क्यों छीना गया? उनका कहना था कि 'पंडित नेहरू के सामने 'ए मेरे वतन के लोगो' गीत गाने का मौका मिला तो खुशी का ठिकाना नहीं रहा। लेकिन जब कार्यक्रम के दौरान गाना गाने के लिए मंच के पास पहुंची तो मुझे रोका गया और कहा गया कि वे इस गाने की बजाय दूसरा गाना गाएं। यह गाना मुझसे छीन लिया गया था, यह मेरे लिए बड़ा सदमा था। वह बात आज भी चुभती है।

पुरस्कार
मुख्य लेख : सुमन कल्याणपुर को पुरस्कार
करीब 28 साल के अपने कॅरियर में सुमन कल्याणपुर ने न सिर्फ पार्श्वगायन के क्षेत्र में अपना एक सम्मानजनक स्थान बनाया बल्कि 'रसरंग' (नासिक) का 'फाल्के पुरस्कार' (1961), सुर सिंगार संसद का 'मियां तानसेन पुरस्कार' (1965 और 1970) आदि हासिल किए।

पद्म भूषण, 2023

सोमवार, 15 जनवरी 2024

ओपी नयर

#16jan
#28jan 
ओंकार प्रसाद नैय्यर
प्रसिद्ध नाम ओ.पी. नैय्यर
अन्य नाम ओपी

🎂जन्म 16 जनवरी, 1926
जन्म भूमि लाहौर (पाकिस्तान)
⚰️मृत्यु 28 जनवरी, 2007
मृत्यु स्थान मुम्बई, महाराष्ट्र

कर्म भूमि मुम्बई
कर्म-क्षेत्र संगीतकार
मुख्य फ़िल्में 'आर-पार', 'नया दौर', 'तुमसा नहीं देखा', 'कश्मीर की कली', 'सी. आई. डी' आदि।
नागरिकता भारतीय
प्रसिद्ध गीत 'लेके पहला पहला प्यार', 'ये चांद-सा रोशन चेहरा', 'ये है रेशमी ज़ुल्फ़ों का', 'चल अकेला', 'ये देश है वीर जवानों का' आदि।
अन्य जानकारी सिने जगत् के लोगों ने आशा भोंसले को ओ. पी. नैय्यर की ही खोज बताया। ओ. पी. नैय्यर ने लता मंगेशकर जैसी सुर सम्राज्ञी के साथ कभी काम नहीं किया।
हिन्दी फ़िल्मों के एक प्रसिद्ध संगीतकार थे। अपने सुरों के जादू से आशा भोंसले और मोहम्मद रफ़ी जैसे कई पार्श्वगायक और पार्श्वगायिकाओं को कामयाबी के शिखर पर पहुंचाने वाले महान् संगीतकार ओ. पी. नैय्यर के संगीतबद्ध गीत आज भी लोकप्रिय है।

जीवन परिचय

16 जनवरी 1926 को लाहौर (पाकिस्तान) के एक मध्यम वर्गीय परिवार में जन्मे ओंकार प्रसाद नैय्यर उर्फ ओ.पी. नैय्यर का रुझान बचपन से ही संगीत की ओर था। वह पार्श्वगायक बनना चाहते थे। भारत विभाजन के पश्चात् उनका पूरा परिवार लाहौर छोड़कर अमृतसर चला आया। ओंकार प्रसाद ने संगीत की सेवा करने के लिए अपनी पढ़ाई बीच में छोड़ दी। अपने संगीत के सफ़र की शुरूआत इन्होंने आल इंडिया रेडियो से की।

फ़िल्मी सफर

बतौर संगीतकार फ़िल्म इंडस्ट्री में पहचान बनाने के लिये ओ. पी. नैय्यर वर्ष 1949 में मुंबई आ गये। मुंबई मे उनकी मुलाकात जाने माने निर्माता निर्देशक कृष्ण केवल से हुई जो उन दिनों फ़िल्म 'कनीज़' का निर्माण कर रहे थे। कृष्ण केवल उनके संगीत बनाने के अंदाज़से काफ़ी प्रभावित हुये और उन्होंने फ़िल्म के बैक ग्राउंड संगीत देने की पेशकश की। इस फ़िल्म के असफल होने से ओ. पी. नैय्यर बतौर संगीतकार अपनी पहचान बनाने मे भले ही सफल न हो सके लेकिन फ़िल्म इंडस्ट्री मे उनका कैरियर अवश्य ही शुरू हो गया।

वर्ष 1951 में अपने एक मित्र के कहने पर वह मुंबई से दिल्ली चले गये और बाद में उसी मित्र के कहने पर उन्होंने निर्माता पंचोली से मुलाकात की जो उन दिनों फ़िल्म नगीना का निर्माण कर रहे थे। बतौर संगीतकार उन्होंने फ़िल्म 'आसमान' से अपने सिने कैरियर की शुरूआत की। इस फ़िल्म के लिये उन्होंने सी. एच. आत्मा की आवाज में अपना पहला गाना रिकार्ड करवाया। गाने के बोल कुछ इस प्रकार थे 'इस बेवफा जहां में वफा ढूंढते हैं' । इस बीच उनकी छमा छम छम और बाज जैसी फ़िल्में भी प्रदर्शित हुई लेकिन इन फ़िल्मों के असफल होने से उन्हें गहरा सदमा पहुंचा और उन्होंने फ़िल्म इंडस्ट्री छोड़ वापस अमृतसर जाने का निर्णय कर लिया।
वर्ष 1953 पार्श्वगायिका गीता दत्त ने ओ.पी. नैय्यर को गुरुदत्त से मिलने की सलाह दी। वर्ष 1954 में गुरुदत्त ने अपनी निर्माण संस्था शुरू की और अपनी फ़िल्म आरपार के संगीत निर्देशन की जिम्मेदारी ओ. पी. नैय्यर को सौंप दी। फ़िल्म आरपार के ओ .पी.नैय्यर के निर्देशन में संगीतबद्ध गीत सुपरहिट हुए और इस सफलता के बाद ओ. पी. नैय्यर अपनी पहचान बनाने में सफल हो गये। उन्होंने वापस अपने घर जाने का इरादा छोड दिया। इसके बाद गुरुदत्त की ही फ़िल्म 'मिस्टर एंड मिसेज 55' के लिये भी ओ.पी. नैय्यर ने संगीत दिया। फ़िल्म में उनके संगीत निर्देशन में बने गाने 'जाने कहां मेरा जिगर गया जी' और 'ठंडी हवा काली घटा' काफ़ी लोकप्रिय हुए।
आर−पार, सी. आई. डी., तुमसा नहीं देखा आदि एक के बाद एक लगातार हिट फ़िल्में देते हुए ये सिने जगत् में सबसे महंगे संगीतकार बने। 1950 में एक फ़िल्म में संगीत देने के 1 लाख रुपये लेने वाले पहले संगीतकार थे। “नया दौर” इनकी सबसे लोकप्रिय फ़िल्म रही। इस फ़िल्म के लिए उन्हें 1957 में फ़िल्म फेयर अवॉर्ड भी मिला। सिर्फ़ कुछ ही फ़िल्मों में अपनी कला का लोहा मनवा देने वाले ये संगीतकार ज़िद्दी और एकांतप्रिय स्वभाव के कारण भी चर्चा में रहे। कुछ लोग इन्हें घमंडी, दबंग और निरंकुश स्वभाव के भी कहते थे, हालाँकि नये एवं जूझते हुए गायकों के साथ ये बहुत उदार रहे। पत्रकार हमेशा से ही इनके ख़िलाफ़ रहे और इनको हमेशा ही बागी संगीतकार के रूप में पेश किया गया। पचास के दशक के दौरान आल इंडिया रेडियो ने इनके संगीत को आधुनिक कहते हुए उस पर प्रतिबंध लगा दिया और इनके गाने रेडियो पर काफ़ी लंबे समय तक नहीं बजाए गये। इस बात से उन्हें कोई आश्चर्य नहीं हुआ बल्कि वे अपनी धुन बनाते रहे और वे सभी देश में बड़ी हिट रही। उस समय सिर्फ़ श्रीलंका के रेडियो पर ही इनके नये गाने सुने जा सकते थे। बहुत जल्दी ही अंग्रेज़ी अख़बारों में इनकी तारीफ के चर्चे शुरू हो गये और इन्हें हिन्दी संगीत में उस्ताद कहा जाने लगा, तब ये बहुत जवान थे।
गीता दत्त, आशा भोंसले और मोहम्मद रफ़ी के साथ इन्होंने सबसे ज़्यादा काम किया। मोहम्मद रफ़ी से अलग होने के बाद ओपी महेंद्र कपूर के साथ काम करने लगे। महेंद्र कपूर जी ओपी के लिए दिल से गाते थे। उनकी आवाज़ और एहसास की गहराई ने ओपी के गानों में भावनाओं को उभारा और लोगों के दिलों तक ओपी के विचारों की गहराई पहुँचाई। आशा भोंसले के साथ ओपी ने लगभग सत्तर फ़िल्मों में काम किया। सिने जगत् के लोगों ने आशा भोंसले को उनकी ही खोज बताया। ऐसा लगता था कि नैय्यर साहब आशा जी के लिए विशेष धुन बनाते हों, जिन्हें आशा बिना किसी मेहनत के गा लेती। ओपी ने लता मंगेशकर जैसी सुर सम्राज्ञी के साथ कभी काम नहीं किया। ये सिने जगत् में हमेशा ही चर्चा का विषय रहा। ओपी कहते थे कि उनके गाने लता की आवाज़ से मेल नहीं खाते। वे ज़्यादातर पंजाबी धुन के साथ मस्ती भरे गाने बनाते थे। लेकिन मुकेश के द्वारा गाया हुआ बहुत गंभीर गाना ‘चल अकेला, चल अकेला, चल अकेला’ ओ. पी नैय्यर की चहुँमुखी प्रतिभा को दर्शाता है।
📽️
आर-पार
नया दौर
तुमसा नहीं देखा
कश्मीर की कली
मेरे सनम
एक मुसाफिर एक हसीना
फिर वो ही दिल लाया हूँ
सी. आई. डी
सावन की घटा
रागिनी
किस्मत
फागुन
हावड़ा ब्रिज
प्राण जाए पर वचन ना जाए
बहारें फिर भी आयेंगी
संबंध
सोने की चिड़िया
कहीं दिन कहीं रात
ये रात फिर ना आयेगी
मि. & मिसेज 55
नया अन्दाज़

शनिवार, 16 दिसंबर 2023

पंडित जसराज

#28jan
#17jeb 
पंडित जसराज भारतीय शास्त्रीय संगीत के विश्व विख्यात गायक है।

🎂जन्म 28 जनवरी 1930 को हिसार, हरियाणा फतेहाबाद के गाँव पीली मंदोरी
⚰️17 अगस्त 2020

हमारे देश में शास्त्रीय संगीत कला सदियों से चली आ रही है।
इस कला को न केवल मनोरंजन का, बल्कि ईश्वर से जुड़ने का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत भी माना गया है।
ऐसे ही एक आवाज़ जिन्होंने सिर्फ 3 वर्ष की छोटी आयु में कठोर वास्तविकताओं की इस ठंडी दुनिया में अपने दिवंगत पिता से विरासत के रूप में मिले और केवल सात स्वरों के साथ क़दम रखा, आज वही सात स्वर उनकी प्रतिभा का इन्द्रधनुष बनकर विश्व-जगत में उन्हें प्रसिद्धि दिला रहे हैं।
उनका जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ जिसे 4 पीढ़ियों तक हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत को एक से बढ़कर एक शिल्पी देने का गौरव प्राप्त है। उनके पिता का नाम पंडित मोतीराम जी था, जो स्वयं मेवाती घराने के एक विशिष्ट संगीतज्ञ थे।

पंडित जी के परिवार में उनकी पत्नी मधु जसराज, बेटा सारंग देव और बेटी दुर्गा हैं।

शिक्षा – पण्डित जसराज की जीवनी
पंडित जसराज को संगीत की प्राथमिक शिक्षा अपने पिता से ही मिली लेकिन जब वे सिर्फ 3साल के थे, तो प्रकृति ने उनके पिता का देहांत हो गया । पंडित मोतीराम जी का देहांत उसी दिन हुआ जिस दिन उन्हें हैदराबाद और बेरार के आखिरी निज़ाम उस्मान अली खाँ बहादुर के दरबार में राज संगीतज्ञ घोषित किया जाना था। उनके बाद परिवार के पालन-पोषण का भार संभाला उनके बडे़ बेटे संगीत महामहोपाध्याय पं० मणिराम जी ने।

इन्हीं की छत्रछाया में पंडित जसराज ने संगीत शिक्षा को आगे बढ़ाया तथा तबला वादन सीखा।

मणिराम जी अपने साथ जसराज को तबला वादक के रूप में ले जाया करते थे।

लेकिन उस समय सारंगी वादकों की तरह तबला वादकों को भी तुच्छ माना जाता था और 14 वर्ष की किशोरावस्था में इस प्रकार के नीच बर्ताव से अप्रसन्न होकर जसराज ने तबला त्याग दिया और प्रण लिया कि जब तक वे शास्त्रीय गायन में निपुणता प्राप्त नहीं कर लेते, अपने बाल नहीं कटवाएँगे। इसकेबाद में उन्होंने मेवाती घराने के दिग्गज महाराणा जयवंत सिंह वाघेला से और आगरा के स्वामी वल्लभदास जी से संगीत विशारद प्राप्त किया।

आवाज़ की विशेषता
पंडित जसराज के आवाज़ का फैलाव साढ़े तीन सप्तकों तक है।

उनके गायन में पाया जाने वाला शुद्ध उच्चारण और स्पष्टता मेवाती घराने की ‘ख़याल’ शैली की विशेषता को दर्शाता है। उन्होंने बाबा श्याम मनोहर गोस्वामी महाराज के सान्निध्य में ‘हवेली संगीत’ पर व्यापक अनुसंधान कर कई नवीन बंदिशों की रचना भी की है।

भारतीय शास्त्रीय संगीत में उनका सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान है।

उनके द्वारा अवधारित एक अद्वितीय एवं अनोखी जुगलबन्दी, जो ‘मूर्छना’ की प्राचीन शैली पर आधारित है।

इसमें एक महिला और एक पुरुष गायक अपने-अपने सुर में कई रागों को एक साथ गाते हैं।

पंडित जसराज के सम्मान में इस जुगलबन्दी का नाम ‘जसरंगी’ रखा गया है।

योगदान
दिग्गज शास्त्रीय गायक पंडित जसराज ने अनूठी उपलब्धि हासिल की है।शास्त्रीय गायक ने हाल में अंटार्कटिका के दक्षिणी ध्रुव पर अपनी प्रस्तुति दी थी । इसके साथ ही वह सातों महाद्वीपों में कार्यक्रम पेश करने वाले पहले भारतीय बन गए हैं। पद्म विभूषण से सम्मानित पंडित जसराज ने बीती 8 जनवरी को अंटार्कटिका तट पर ‘सी स्प्रिट’ नामक क्रूज पर गायन कार्यक्रम पेश किया।।

मशहूर शास्त्रीय गायक पंडित जसराज ने पहली बार सन 2008 में रिलीज़ हिंदी फ़िल्म के एक गीत को अपनी आवाज दी है।  विक्रम भट्ट द्वारा निर्देशित फ़िल्म ‘1920’ के लिए उन्होंने अपनी जादुई आवाज में एक गाना गाया है। पंडित जसराज ने इस फ़िल्म के प्रचार के लिए बनाए गए वीडियो के गीत ‘वादा तुमसे है वादा’ को अपनी दिलकश आवाज दी है।

गाने की शूटिंग मुम्बई के जोगेश्वरी स्थित विसाज स्टूडियो में हुई।

इस गाने को संगीत से सजाया अदनान सामी ने और बोल समीर ने लिखे हैं।

वीडियो के गानों की कोरियोग्राफी राजू खान ने की है।

ए.एस.ए. प्रोडक्शन एंड एंटरप्राइजेज लिमिटेड के निर्माण में बनाई जा रही फ़िल्म ‘1920’ में नए कलाकार काम कर रहे हैं। 1920 के दौर में सजी यह फ़िल्म एक भारतीय लड़के और एक अंग्रेज लड़की की प्रेम कहानी है।

ये दोनों लोगों के भारी विरोधों के बावजूद दोनों एक-दूसरे से शादी कर लेते हैं।

जीवन के 75वें सोपान
“रानी तेरो चिरजियो गोपाल….” 28 जनवरी, 2005 की भोर से ही “रसराज” कहे जाने वाले संगीत मार्तण्ड पं. जसराज के चाहने वालों के होठों पर उनके इस भजन के बोल तैर रहे थे। “रसराज” जसराज ने ऋतुराज की दस्तक के साथ ही अपने जीवन के 75 सोपान तय किए। 75 दीपों की मालिका के साथ दिल्ली के कमानी सभागार में पंडित जसराज के ज्योतिर्मय जीवन की कामना की गई।

पांच साल पहले जब पंडित जी के दिल की सर्जरी हुई थी, तब सबको लगता था कि पता नहीं, उनके मधुर स्वरों की गंगा उसी प्रकार प्रवाहित होती रहेगी या फिर….। पंडित जी के शब्दों में -“वह तो बिल्कुल वैसा ही था, जैसे किसी सितार के तारों में जंग लग जाए और फिर आप उन तारों को बदल दें या मिट्टी के तेल में रुई डुबोकर साफ कर दें।

“बाईपास सर्जरी” से पहले कुछ तकलीफें रहती थीं, उसके बाद सब एकदम निर्मल जल-सा हो गया।”

29 जनवरी को पंडित जसराज अपने अभिनंदन में आयोजित समारोह के लिए दिल्ली पधारे थे।

इस अवसर पर प्रशंसकों से घिरे पंडित जी से उनकी जीवन-यात्रा के अनुभव जानने चाहे तो थोड़ा गंभीर होकर कहा , “सोचता हूं कि आज अगर 35 बरस का होता और 75 बरस के ये अनुभव साथ होते, और उससे आगे 35 बरस की यात्रा करता तो कितना फ़र्क़ होता। संगीत के प्रति यही भावनाएं, श्रद्धा और भक्ति होती तो जीवन कितना सौभाग्यशाली होता।”

सम्मान और पुरस्कार
पंडित जसराज को कई सम्मान और पुरस्कारों से सम्मानित हो किया जा चुका हैं। वे है-

पद्म विभूषण (2001)
पद्म भूषण
पद्म श्री
संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार
मास्टर दीनानाथ मंगेशकर अवार्ड
लता मंगेशकर पुरस्कार
महाराष्ट्र गौरव पुरस्कार
मृत्यु – पण्डित जसराज की नमृत्यु 90 वर्ष की उम्र में 17 अगस्त 2020 को कार्डियक के कारण  हुई।

बुधवार, 1 नवंबर 2023

सोहराब मोदी

सोहराब मोदी

🎂जन्म 02 नवम्बर, 1897
जन्म भूमि बम्बई
⚰️मृत्यु 28 जनवरी, 1984

कर्म भूमि मुम्बई
कर्म-क्षेत्र अभिनेता, निर्माता व निर्देशक
मुख्य फ़िल्में 'रज़िया सुल्तान', 'घर की लाज', 'कुंदन' आदि।
पुरस्कार-उपाधि दादा साहब फाल्के पुरस्कार
प्रसिद्धि अभिनेता और फ़िल्म निर्माता-निर्देशक
जीवन परिचय
सोहराब मोदी का जन्म 2 नवम्बर, 1897 में बम्बई में हुआ था। सोहराब मोदी अपनी स्कूली शिक्षा खत्म करने के बाद वह अपने भाई केकी मोदी के साथ यात्रा प्रदर्शक का कार्य किया। सोहराब मोदी ने कुछ मूक फ़िल्मों के अनुभव के साथ एक पारसी रंगमंच से बतौर अभिनेता के रूप में शुरुआत की थी। सोहराब मोदी का बचपन रामपुर में बीता, जहां उनके पिता नवाब के यहां अधीक्षक थे। नवाब रामपुर का पुस्तकालय बहुत समृद्ध था। रामपुर में ही सोहराब मोदी ने फर्राटेदार उर्दू सीखी। अभिनय की प्रारंभिक शिक्षा उन्हें अपने भाई रुस्तम की नाटक कंपनी सुबोध थिएट्रिकल कंपनी से मिली, जिसमें उन्होंने 1924 से काम करना शुरू कर दिया था। वहीं उन्होंने संवाद को गंभीर और सधी आवाज में बोलने की कला सीखी, जो बाद में उनकी विशेषता बन गयी। कुछ ही समय में वे नाटकों में उन्होंने प्रमुख भूमिका निभाने लगे। ‘हैमलेट’ और ‘द सोल ऑफ़ डाटर’ उनके लोकप्रिय नाटक थे जिनमें उन्होंने अभिनय किया। बाद में उनका परिवार रामपुर से बंबई चला आया। वहां उन्होंने परेल के न्यू हाईस्कूल से मैट्रिक पास किया। जब ये अपने प्रिंसिपल से यह पूछने गये कि भविष्य में क्या करें, तो उनके प्रिंसिपल ने कहा,-‘तुम्हारी आवाज सुन कर तो यही लगता है कि तुम्हे या तो नेता बनना चाहिए या अभिनेता।’ और सोहराब अभिनेता बन गये। उनकी आवाज की तरह बुलंद थी। अंधे तक उनकी फ़िल्मों के संवाद सुनने जाते थे।

आरम्भिक जीवन

16 वर्ष की उम्र में सोहराब मोदी ग्वालियर के टाउनहाल में फ़िल्मों का प्रदर्शन करते थे। बाद में अपने भाई रुस्तम की मदद से उन्होंने ट्रैवलिंग सिनेमा का व्यवसाय शुरू किया। फिर अपने भाई के साथ ही उन्होंने बंबई में स्टेज फ़िल्म कंपनी की स्थापना की। इस कंपनी की पहली फ़िल्म 1953 में बनी ‘खून का खून’ थी, जो उनके नाटक ‘हैमलेट’ का फ़िल्मी रूपांतर थी। इसमें सायरा बानो की माँ नसीम बानो पहली बार परदे पर आयीं। ‘सैद –ए-हवस’ (1936) भी नाटक ‘किंग जान’ पर आधारित थी। सोहराब मूलतः नाटक से आये थे, यही वजह है कि उनकी पहले की फ़िल्मों में पारसी थिएटर की झलक मिलती है। ऐतिहासिक फ़िल्में बनाने में वे सबसे आगे थे।

सोहराब मोदी ने सन 1935 में स्टेज फ़िल्म कंपनी की स्थापना की थी। 1936 में स्टेज फ़िल्म कंपनी मिनर्वा मूवीटोन हो गयी और इसका प्रतीक चिह्न शेर हो गया। अपने इस बैनर में उन्होंने जो फ़िल्में बनायीं वे थीं-

आत्म तरंग (1937)
खान बहादुर (1937)
डाइवोर्स (1938)
जेलर (1938)
मीठा जहर (1938)
पुकार (1939)
भरोसा (1940)
सिकंदर (1941)
फिर मिलेंगे (1942)
पृथ्वी वल्लभ ((1943)
एक दिन का सुलतान (1945)
मंझधार (1947)
दौलत (1949)
शीशमहल (1950)
झांसी की रानी (1953)
मिर्जा गालिब (1954)
कुंदन (1955)
राजहठ (1956)
नौशेरवा-ए-आदिल (1957)
मेरा घर मेरे बच्चे (1960)
समय बड़ा बलवान (1969)
इनके अलावा उन्होंने सेंट्रल स्टूडियो के लिए ‘परख’ और शैली फ़िल्म्स के लिए ‘मीनाकुमारी की अमर कहानी’ बनायी। 

भारत की पहली रंगीन फ़िल्म

भारत की पहली टेकनीकलर फ़िल्म ‘झांसी की रानी’ उन्होंने बनायी थी। इसके लिए वे हालीवुड से तकनीशियन और साज-सामान लाये थे। इसमें 'झांसी की रानी' बनी थीं उनकी पत्नी महताब। सोहराब मोदी राजगुरु बने थे। इस फ़िल्म को उन्होंने बड़ी लगन से बनाया था, लेकिन फ़िल्म फ़्लॉप हो गयी। इस विफलता से उबरने के लिए उन्होंने ‘मिर्जा गालिब’ (सुरैया-भारतभूषण) बनायी। यह फ़िल्म व्यावसायिक तौर पर तो सफल रही बल्कि इसे राष्ट्रपति का स्वर्ण पदक भी मिला। उन्होंने सामाजिक समस्याओं पर भी कुछ यादगार फ़िल्में बनायीं। इनमें शराबखोरी की बुराई पर बनायी गयी फ़िल्म ‘मीठा जहर’ और तलाक की समस्या पर ‘डाईवोर्स’ उल्लेखनीय हैं। उनकी सर्वाधिक चर्चित और सफल ऐतिहासिक फ़िल्म थी ‘पुकार’। इसमें चंद्रमोहन (जहांगीर), नसीम बानो (नूरजहां), सोहराब मोदी (संग्राम सिंह) और सरदार अख्तर की प्रमुख भूमिकाएँ थीं। इस फ़िल्म को न सिर्फ प्रेस बल्कि दर्शकों से भी भरपूर प्रशंसा मिली। ‘सिकंदर’ में पोरस और ‘पुकार’ में संग्राम सिंह की भूमिका में सोहराब मोदी के अभिनय की बड़ी प्रशंसा हुई।

पारिवारिक जीवन

महताब से उनकी शादी 21 अप्रैल 1946 को हुई, लेकिन मोदी का परिवार उन्हें बहू के रूप में स्वीकारने को तैयार नहीं था इसलिए कई साल उन्हें अलग रहना पड़ा। 1950 में उनके परिवार ने उनकी शादी को स्वीकार कर लिया।

पुरस्कार
सोहराब मोदी को सन 1980 में दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। भारत में ऐतिहासिक फ़िल्मों को प्रतिष्ठा दिलाने का श्रेय उन्हें ही जाता है।

निधन
1978 तक आते-आते 80 साल के मोदी साहब को चलने-फिरने में छड़ी का सहारा लेना पड़ गया था। उनकी बड़ी ख्वाहिश थी ‘पुकार’ को फिर से बनाने की। लेकिन बीमारी ने ऐसा नहीं करने दिया। 1984 में डॉक्टरों ने यह घोषित कर दिया कि उन्हें कैंसर है। तब तक उन्हें खाना निगलने में भी तकलीफ होने लगी थी। 1983 में उन्होंने अपनी आखिरी फ़िल्म ‘गुरुदक्षिणा’ का मुहूर्त किया था। उसे अधूरा छोड़ 28 जनवरी 1984 को मोदी हमेशा के लिए चिरनिद्रा में निमग्न हो गये। वे बड़े आला तबीयत के इंसान थे। उनका धैर्य भी अपार था। कई बार कलाकार कई रिटेक देते, पर मोदी साहब के चेहरे पर शिकन तक नहीं पड़ती।

बुधवार, 16 अगस्त 2023

पंडित जसराज

पंडित जसराज
प्रसिद्धि शास्त्रीय गायक
🎂जन्म 28 जनवरी, 1930
जन्म भूमि पिली मंडोरी, ज़िला हिसार (अब फ़तेहाबाद, हरियाणा)
⚰️मृत्यु 17 अगस्त, 2020
मृत्यु स्थान न्यू जर्सी, संयुक्त राज्य अमेरिका
अभिभावक पंडित मोतीराम जी
पति/पत्नी मधु जसराज
संतान पुत्र सारंग देव और पुत्री दुर्गा
कर्म भूमि भारत
पुरस्कार-उपाधि पद्म विभूषण (2000), पद्म भूषण (1990) और पद्मश्री (1975)
प्रसिद्धि शास्त्रीय गायक
विशेष योगदान इनके द्वारा अवधारित एक अद्वितीय एवं अनोखी जुगलबन्दी, जो 'मूर्छना' की प्राचीन शैली पर आधारित है। इसमें एक महिला और एक पुरुष गायक अपने-अपने सुर में भिन्न रागों को एक साथ गाते हैं।
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी पंडित जसराज ने बाबा श्याम मनोहर गोस्वामी महाराज के सान्निध्य में 'हवेली संगीत' पर व्यापक अनुसंधान कर कई नवीन बंदिशों की रचना भी की थी।
पंडित जसराज (अंग्रेज़ी: Pandit Jasraj, जन्म- 28 जनवरी, 1930, हिसार; मृत्यु- 17 अगस्त, 2020, न्यू जर्सी, संयुक्त राज्य अमेरिका) भारतीय शास्त्रीय संगीत के विश्वविख्यात गायक थे। हमारे देश में शास्त्रीय संगीत कला सदियों से चली आ रही है। इस कला को न केवल मनोरंजन का, अपितु ईश्वर से जुड़ने का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत माना गया है। ऐसे ही एक आवाज़ थे ख्यातिप्राप्त पंडित जसराज जी, जिन्होंने मात्र 3 वर्ष की अल्पायु में कठोर वास्तविकताओं की इस ठंडी दुनिया में अपने दिवंगत पिता से विरासत के रूप में मिले केवल सात स्वरों के साथ क़दम रखा था। उनका संबंध मेवाती घराने से था। शास्‍त्रीय संगीत के क्षेत्र में उल्‍लेखनीय योगदान के लिए उन्‍हें पद्म विभूषण (2000), पद्म भूषण (1990) और पद्मश्री (1975) जैसे सम्मान से नावाजा गया था।

जीवन परिचय
पंडित जसराज का जन्म 28 जनवरी, 1930 को हिसार के एक ऐसे परिवार में हुआ जिसे 4 पीढ़ियों तक हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत को एक से बढ़कर एक शिल्पी देने का गौरव प्राप्त है। उनके पिताजी पंडित मोतीराम जी स्वयं मेवाती घराने के एक विशिष्ट संगीतज्ञ थे। पं. जसराज को संगीत की प्राथमिक शिक्षा अपने पिता से ही मिली, परन्तु जब वे मात्र 3 वर्ष के थे, प्रकृति ने उनके सर से पिता का साया छीन लिया। पंडित मोतीराम जी का देहांत उसी दिन हुआ जिस दिन उन्हें हैदराबाद और बेरार के आखिरी निज़ाम उस्मान अली खाँ बहादुर के दरबार में राज संगीतज्ञ घोषित किया जाना था। उनके बाद परिवार के लालन-पालन का भार संभाला उनके बडे़ सुपुत्र अर्थात् पं. जसराज के अग्रज, संगीत महामहोपाध्याय पं. मणिराम जी ने। इन्हीं की छत्रछाया में पं. जसराज ने संगीत शिक्षा को आगे बढ़ाया तथा तबला वादन सीखा।
मणिराम जी अपने साथ बालक जसराज को तबला वादक के रूप में ले जाया करते थे। परंतु उस समय सारंगी वादकों की तरह तबला वादकों को भी क्षुद्र माना जाता था तथा 14 वर्ष की किशोरावस्था में इस प्रकार के निम्न बर्ताव से अप्रसन्न होकर जसराज ने तबला त्याग दिया और प्रण लिया कि जब तक वे शास्त्रीय गायन में विशारद प्राप्त नहीं कर लेते, अपने बाल नहीं कटवाएँगे। इसके पश्चात् उन्होंने मेवाती घराने के दिग्गज महाराणा जयवंत सिंह वाघेला से तथा आगरा के स्वामी वल्लभदास जी से संगीत विशारद प्राप्त किया। पंडित जी के परिवार में उनकी पत्नी मधु जसराज, पुत्र सारंग देव और पुत्री दुर्गा हैं।

आवाज़ की विशेषता
पं. जसराज के आवाज़ का फैलाव साढ़े तीन सप्तकों तक था। उनके गायन में पाया जाने वाला शुद्ध उच्चारण और स्पष्टता मेवाती घराने की 'ख़याल' शैली की विशिष्टता को झलकाता है। उन्होंने बाबा श्याम मनोहर गोस्वामी महाराज के सान्निध्य में 'हवेली संगीत' पर व्यापक अनुसंधान कर कई नवीन बंदिशों की रचना भी की थी। भारतीय शास्त्रीय संगीत में उनका सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। उनके द्वारा अवधारित एक अद्वितीय एवं अनोखी जुगलबन्दी, जो 'मूर्छना' की प्राचीन शैली पर आधारित है। इसमें एक महिला और एक पुरुष गायक अपने-अपने सुर में भिन्न रागों को एक साथ गाते हैं। पंडित जसराज के सम्मान में इस जुगलबन्दी का नाम 'जसरंगी' रखा गया।

अंटार्कटिका में गायन
दिग्गज शास्त्रीय गायक पंडित जसराज ने एक अनूठी उपलब्धि भी हासिल की थी। इस शास्त्रीय गायक ने अंटार्कटिका के दक्षिणी ध्रुव पर अपनी प्रस्तुति दी थी। इसके साथ ही वह सातों महाद्वीपों में कार्यक्रम पेश करने वाले पहले भारतीय बन गए थे। पद्म विभूषण से सम्मानित पंडित जसराज ने 8 जनवरी को अंटार्कटिका तट पर 'सी स्प्रिट' नामक क्रूज पर गायन कार्यक्रम पेश किया था। जसराज जी ने इससे पहले वर्ष 2010 में पत्नी मधुरा के साथ उत्तरी ध्रुव का दौरा किया था।

फ़िल्म में गायन
शास्त्रीय गायन के इतर पंडित जसराज ने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में भी गाने गाए थे। उन्होंने पहली बार साल 1966 में आई फिल्म 'लड़की सह्याद्रि' में अपनी आवाज दी थी। डायरेक्टर वी शांताराम की इस फिल्म में उन्होंने 'वंदना करो अर्चना करो' भजन को राग अहीर भैरव में गाया था। उन्होंने दूसरा गाना साल 1975 में आई फिल्म 'बीरबल माय ब्रदर' में गाया था। इसमें उन्होंने और भीमसेन जोशी ने राग मालकौन में जुगलबंदी की थी।

मशहूर शास्त्रीय गायक पंडित जसराज ने पहली बार सन 2008 में रिलीज़ किसी हिंदी फ़िल्म के एक गीत को अपनी आवाज दी थी। विक्रम भट्ट निर्देशित फ़िल्म ‘1920’ के लिए उन्होंने अपनी जादुई आवाज में एक गाना गाया। पंडित जसराज ने इस फ़िल्म के प्रचार के लिए बनाए गए वीडियो के गीत ‘वादा तुमसे है वादा’ को अपनी दिलकश आवाज दी थी। गाने की शूटिंग मुम्बई के जोगेश्वरी स्थित विसाज स्टूडियो में हुई। इस गाने को संगीत से सजाया अदनान सामी ने और बोल लिखे समीर ने। वीडियो के गानों की कोरियोग्राफी की थी राजू खान ने। ए.एस.ए. प्रोडक्शन एंड एंटरप्राइजेज लिमिटेड के निर्माण में बनाई जा रही फ़िल्म ‘1920’ में नए कलाकार काम कर रहे थे। वर्ष 1920 के दौर में सजी यह फ़िल्म एक भारतीय लड़के और एक अंग्रेज़ लड़की की प्रेम कहानी है। ये दोनों लोगों के भारी विरोधों के बावजूद दोनों एक-दूसरे से शादी कर लेते हैं।

इनके अलावा उन्होंने दो भक्ति गीत श्री मधुराष्टकम् और गोविन्द दामोदर माधवेति भी गाए, जिन्हें बेहद पसंद किया गया।
पंडित जसराज की ⚰️मृत्यु 17 अगस्त, 2020 को दिल का दौरा पड़ने से न्यू जर्सी, अमेरिका में हुई।
गीत - वादा तुमसे है वादा
फ़िल्म - 1920
गीतकार - समीर
संगीत निर्देशक अदनान सामी -
कलाकार - रजनीश दुग्गल, अदा शर्मा
म्यूजिक ऑन - टी-सीरीज़

नया
पंडित जसराज

🎂 जन्म 28 जनवरी, 1930
जन्म भूमि पिली मंडोरी, ज़िला हिसार (अब फ़तेहाबाद, हरियाणा)
⚰️मृत्यु 17 अगस्त, 2020
मृत्यु स्थान न्यू जर्सी, संयुक्त राज्य अमेरिका

अभिभावक पंडित मोतीराम जी
पति/पत्नी मधु जसराज
संतान पुत्र सारंग देव और पुत्री दुर्गा
कर्म भूमि भारत
पुरस्कार-उपाधि पद्म विभूषण (2000), पद्म भूषण (1990) और पद्मश्री (1975)
प्रसिद्धि शास्त्रीय गायक
विशेष योगदान इनके द्वारा अवधारित एक अद्वितीय एवं अनोखी जुगलबन्दी, जो 'मूर्छना' की प्राचीन शैली पर आधारित है। इसमें एक महिला और एक पुरुष गायक अपने-अपने सुर में भिन्न रागों को एक साथ गाते हैं।
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी पंडित जसराज ने बाबा श्याम मनोहर गोस्वामी महाराज के सान्निध्य में 'हवेली संगीत' पर व्यापक अनुसंधान कर कई नवीन बंदिशों की रचना भी की थी।
हमारे देश में शास्त्रीय संगीत कला सदियों से चली आ रही है। इस कला को न केवल मनोरंजन का, अपितु ईश्वर से जुड़ने का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत माना गया है। ऐसे ही एक आवाज़ थे ख्यातिप्राप्त पंडित जसराज जी, जिन्होंने मात्र 3 वर्ष की अल्पायु में कठोर वास्तविकताओं की इस ठंडी दुनिया में अपने दिवंगत पिता से विरासत के रूप में मिले केवल सात स्वरों के साथ क़दम रखा था। उनका संबंध मेवाती घराने से था। शास्‍त्रीय संगीत के क्षेत्र में उल्‍लेखनीय योगदान के लिए उन्‍हें पद्म विभूषण (2000), पद्म भूषण (1990) और पद्मश्री (1975) जैसे सम्मान से नावाजा गया था।
मणिराम जी अपने साथ बालक जसराज को तबला वादक के रूप में ले जाया करते थे। परंतु उस समय सारंगी वादकों की तरह तबला वादकों को भी क्षुद्र माना जाता था तथा 14 वर्ष की किशोरावस्था में इस प्रकार के निम्न बर्ताव से अप्रसन्न होकर जसराज ने तबला त्याग दिया और प्रण लिया कि जब तक वे शास्त्रीय गायन में विशारद प्राप्त नहीं कर लेते, अपने बाल नहीं कटवाएँगे। इसके पश्चात् उन्होंने मेवाती घराने के दिग्गज महाराणा जयवंत सिंह वाघेला से तथा आगरा के स्वामी वल्लभदास जी से संगीत विशारद प्राप्त किया। पंडित जी के परिवार में उनकी पत्नी मधु जसराज, पुत्र सारंग देव और पुत्री दुर्गा हैं।

आवाज़ की विशेषता
पं. जसराज के आवाज़ का फैलाव साढ़े तीन सप्तकों तक था। उनके गायन में पाया जाने वाला शुद्ध उच्चारण और स्पष्टता मेवाती घराने की 'ख़याल' शैली की विशिष्टता को झलकाता है। उन्होंने बाबा श्याम मनोहर गोस्वामी महाराज के सान्निध्य में 'हवेली संगीत' पर व्यापक अनुसंधान कर कई नवीन बंदिशों की रचना भी की थी। भारतीय शास्त्रीय संगीत में उनका सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। उनके द्वारा अवधारित एक अद्वितीय एवं अनोखी जुगलबन्दी, जो 'मूर्छना' की प्राचीन शैली पर आधारित है। इसमें एक महिला और एक पुरुष गायक अपने-अपने सुर में भिन्न रागों को एक साथ गाते हैं। पंडित जसराज के सम्मान में इस जुगलबन्दी का नाम 'जसरंगी' रखा गया।
फ़िल्म में गायन
शास्त्रीय गायन के इतर पंडित जसराज ने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में भी गाने गाए थे। उन्होंने पहली बार साल 1966 में आई फिल्म 'लड़की सह्याद्रि' में अपनी आवाज दी थी। डायरेक्टर वी शांताराम की इस फिल्म में उन्होंने 'वंदना करो अर्चना करो' भजन को राग अहीर भैरव में गाया था। उन्होंने दूसरा गाना साल 1975 में आई फिल्म 'बीरबल माय ब्रदर' में गाया था। इसमें उन्होंने और भीमसेन जोशी ने राग मालकौन में जुगलबंदी की थी।

मशहूर शास्त्रीय गायक पंडित जसराज ने पहली बार सन 2008 में रिलीज़ किसी हिंदी फ़िल्म के एक गीत को अपनी आवाज दी थी। विक्रम भट्ट निर्देशित फ़िल्म ‘1920’ के लिए उन्होंने अपनी जादुई आवाज में एक गाना गाया। पंडित जसराज ने इस फ़िल्म के प्रचार के लिए बनाए गए वीडियो के गीत ‘वादा तुमसे है वादा’ को अपनी दिलकश आवाज दी थी। गाने की शूटिंग मुम्बई के जोगेश्वरी स्थित विसाज स्टूडियो में हुई। इस गाने को संगीत से सजाया अदनान सामी ने और बोल लिखे समीर ने। वीडियो के गानों की कोरियोग्राफी की थी राजू खान ने। ए.एस.ए. प्रोडक्शन एंड एंटरप्राइजेज लिमिटेड के निर्माण में बनाई जा रही फ़िल्म ‘1920’ में नए कलाकार काम कर रहे थे। वर्ष 1920 के दौर में सजी यह फ़िल्म एक भारतीय लड़के और एक अंग्रेज़ लड़की की प्रेम कहानी है। ये दोनों लोगों के भारी विरोधों के बावजूद दोनों एक-दूसरे से शादी कर लेते हैं।

इनके अलावा उन्होंने दो भक्ति गीत श्री मधुराष्टकम् और गोविन्द दामोदर माधवेति भी गाए, जिन्हें बेहद पसंद किया गया।

जीवन के 75वें सोपान पर

पं. जसराज
"रानी तेरो चिरजियो गोपाल...." 28 जनवरी, 2005 की भोर से ही "रसराज" कहे जाने वाले संगीत मार्तण्ड पं. जसराज के चाहने वालों के होठों पर उनके इस भजन के बोल तैर रहे थे। "रसराज" जसराज ने ऋतुराज की दस्तक के साथ ही अपने जीवन के 75 सोपान तय किए थे। 75 दीपों की मालिका के साथ दिल्ली के कमानी सभागार में पंडित जसराज के ज्योतिर्मय जीवन की कामना की गई। जब पंडित जी के हृदय की शल्य चिकित्सा हुई थी, तब सबको लगता था कि पता नहीं, उनके मधुर स्वरों की गंगा उसी प्रकार प्रवाहित होती रहेगी या फिर....। पंडित जी के शब्दों में -

"वह तो बिल्कुल वैसा ही था, जैसे किसी सितार के तारों में जंग लग जाए और फिर आप उन तारों को बदल दें या मिट्टी के तेल में रुई डुबोकर साफ कर दें। "बाईपास सर्जरी" से पहले कुछ तकलीफें रहती थीं, उसके बाद सब एकदम निर्मल जल-सा हो गया।"

29 जनवरी को पंडित जसराज अपने अभिनंदन में आयोजित समारोह के लिए दिल्ली पधारे थे। इस अवसर पर प्रशंसकों से घिरे पंडित जी से उनकी जीवन-यात्रा के अनुभव जानने चाहे तो थोड़ा गंभीर होकर बोले, "सोचता हूं कि आज अगर 35 बरस का होता और 75 बरस के ये अनुभव साथ होते, और उससे आगे 35 बरस की यात्रा करता तो कितना फ़र्क़ होता। संगीत के प्रति यही भावनाएं, श्रद्धा और भक्ति होती तो जीवन कितना धन्य होता।

सम्मान और पुरस्कार
पंडित जसराज नीचे दिये गये सम्मान और पुरस्कारों से सम्मानित हो चुके हैं।

पद्म विभूषण (2000)
पद्म भूषण (1990)
पद्म श्री (1975)
संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार
मास्टर दीनानाथ मंगेशकर अवार्ड
लता मंगेशकर पुरस्कार
महाराष्ट्र गौरव पुरस्कार
मृत्यु
पंडित जसराज की मृत्यु 17 अगस्त, 2020 को दिल का दौरा पड़ने से न्यू जर्सी, अमेरिका में हुई। जनवरी 2020 में अपना 90वां जन्मदिन मनाने वाले पंडित जसराज ने आखिरी प्रस्तुति 9 अप्रैल, 2020 को हनुमान जयंती पर फेसबुक लाइव के जरिये वाराणसी के संकटमोचन हनुमान मंदिर के लिए दी थी। कोरोना वायरस महामारी के कारण लॉकडाउन के बाद से वह न्यूजर्सी में ही थे।

राष्‍ट्रपति रामनाथ कोविंद ने पंडित जसराज के निधन पर शोक जताते हुए कहा, 'संगीत दिग्‍गज और अद्वितीय शास्त्रीय गायक पंडित जसराज के निधन से दु:खी हूं। 8 दशकों से भी अधिक समय के करियर में पद्म विभूषण पंडित जसराज ने जीवंत व भावपूर्ण प्रस्तुतियां दीं। उनके परिवार, दोस्तों और संगीत गुणज्ञ के प्रति मेरी संवेदना।'

पीएम मोदी ने ट्वीट कर कहा, 'पंडित जसराज जी के निधन से भारतीय सांस्कृतिक क्षेत्र में एक गहरी रिक्‍तता आ गई है। न केवल उनकी प्रस्तुतियां उत्कृष्ट थीं, बल्कि वह कई अन्य गायकों के लिए भी एक असाधारण गुरु साबित हुए। उनके परिवार और दुनिया भर में उनके प्रशंसकों के प्रति मैं संवेदना व्‍यक्त करता हूं। ओम शांति।'

गृहमंत्री अमित शाह ने पंडित जसराज को श्रद्धांजलि देते हुए ट्वीट किया, 'संगीत मार्तंड पंडित जसराज जी एक असाधारण कलाकार थे, जिन्होंने अपनी जादुई आवाज से भारतीय शास्त्रीय संगीत को समृद्ध किया। उनका निधन व्यक्तिगत क्षति की तरह लगता है। वह अपनी बेमिसाल रचनाओं के माध्यम से हमारे दिलों में हमेशा रहेंगे। उनके परिवार और समर्थकों के प्रति संवेदना। ओम शांति।'

रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने अपने ट्वीट में कहा, 'सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायक पंडित जसराज के निधन से मुझे गहरा दुःख हुआ है। मेवाती घराना से जुड़े पंडितजी का सम्पूर्ण जीवन सुर साधना में बीता। सुरों के संसार को उन्होंने अपनी कला से नए शिखर दिए। उनके जाने से संगीत का बड़ा स्वर मौन हो गया है। ईश्वर उन्हें अपने श्रीचरणों में स्थान दें।'

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