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शुक्रवार, 5 जनवरी 2024

सी.रामचन्द्ररामचन्द्र नरहर चितलकर

#12jan
#05jan 
सी.रामचन्द्ररामचन्द्र नरहर चितलकर

🎂12 जनवरी 1918
पुणतांबा , अहमदनगर जिला , बॉम्बे प्रेसीडेंसी , ब्रिटिश भारत
⚰️मृत05 जनवरी 1982 (आयु 63 वर्ष)
मुंबई , महाराष्ट्र , भारत

अन्य जिन नामों से पहिचान बनाई सी. रामचन्द्र, चितलकर, अन्ना साहब
व्यवसाय फ़िल्म संगीतकार , फ़िल्म निर्माता

प्रसिद्ध संगीतकार, गायक, फ़िल्म निर्माता सी रामचन्द्र
चितळकर रामचन्द्र न केवल संगीत निर्देशन की प्रतिभा से परिपूर्ण थे, अपितु उन्होंने अपनी गायकी, फ़िल्म निर्माण, निर्देशन और अभिनय से भी सिने प्रेमियों को अपना दीवाना बनाए रखा।

 फ़िल्म जगत में 'अन्ना साहब' के नाम से मशहूर सी. रामचन्द्र से फ़िल्मों से जुड़ी कोई भी विधा अछूती नहीं रही थी। वह ऐसे हंसमुख इंसान थे, जिनकी उपस्थिति मात्र से ही माहौल खुशनुमा हो जाता था। हँसते-हँसाते रहने की प्रवृत्ति को उन्होंने अपने संगीत निर्देशन और गायकी में भी खूब बारीकी से उकेरा था। सी. रामचन्द्र का यह अंदाज आज भी उनके चहेतों की यादों में बसा हुआ है।

सी. रामचन्द्र का जन्म 12 जनवरी, सन 1918 में महाराष्ट्र के अहमदनगर ज़िले के एक छोटे-से गांव 'पुंतबा' में हुआ था। बाल्यकाल से ही उनका रुझान संगीत की ओर था। हिन्दी फ़िल्म संगीत को सुरों से नहलाने वाले संगीतकार सी. रामचन्द्र के नाम से उनके तमिल भाषी होने का अनुमान लगाया जाता है, किंतु वे तमिल भाषी नहीं थे। वे पुणे के पास एक गाँव के मराठी देशरथ ब्राह्मण थे। हालांकि यह बात उल्लेखनीय है कि उन्हें सबसे पहले एक तमिल फ़िल्म में ही संगीत देने का मौंका मिला था। संक्रान्ति से दो दिन पहले जन्म लेने वाले सी. रामचन्द्र को असल में कृष्ण की तरह दो माताएँ मिली थीं। जन्म देने वाली माँ के हिस्से का प्यार उन्होंने सौतेली माँ से पाया था। उनके पिता रेलवे में सरकारी कर्मचारी थे। दिन-रात रेल के इंजनों की कर्कश आवाज़ सुनकर भी रामचन्द्र संगीतकार बने। घर में भी संगीत के नाम पर केवल संस्कृत के श्लोक ही गूंजते थे।

सी. रामचन्द्र का पढ़ाई में मन नहीं लगता था। उन्होंने पहली बार एक नाटक में काम किया और उसके लिए गाया भी। इस पर उन्हें वाहवाही मिली थी। इसी दौरान उन्हें सिनेमा देखने और उसमें काम करने का शौक़ लगा। लेकिन नागपुर में फ़िल्मों का निर्माण होता ही नहीं था। इसीलिए वे पुणे आ गये। यहाँ उन्होंने संगीत की प्रारंभिक शिक्षा 'गंधर्व महाविद्यालय', महाराष्ट्र के विनायकबुआ पटवर्धन से प्राप्त की। बाद में नागपुर के 'श्रीराम संगीत विद्यालय' में शंकरराव से भी संगीत की शिक्षा ग्रहण की।

सी.रामचन्द्र ने अपने सिने कैरियर की शुरुआत बतौर अभिनेता यू. बी. राव की फ़िल्म 'नागानंद' से की। इस बीच सी. रामचन्द्र को 'मिनर्वा मूवीटोन' की निर्मित कुछ फ़िल्मों में भी अभिनय करने का मौका मिला। इसी समय उनकी मुलाकात महान् निर्माता-निर्देशक सोहराब मोदी से हुई। सोहराब मोदी ने सी. रामचन्द्र को सलाह दी कि यदि वह अभिनय के बजाए संगीत की ओर ध्यान दें तो फ़िल्म इंडस्ट्री में सफल कामयाब हो सकते हैं। इसके बाद सी. रामचन्द्र 'मिनर्वा मूविटोन' के संगीतकार बिन्दु ख़ान और हबीब ख़ान के ग्रुप में शामिल हो गए। अब वे ग्रुप में बतौर हारमोनियम वादक काम करने लगे थे। बतौर संगीतकार सी. रामचन्द्र को सबसे पहले एक तमिल फ़िल्म में काम करने का मौका मिला

1942 में प्रदर्शित फ़िल्म 'सुखी जीवन' की सफलता के बाद सी. रामचन्द्र कुछ हद तक बतौर संगीतकार फ़िल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने में सफल हो गए। चालीस के दशक में सी. रामचन्द्र ने एक संगीतकार के रूप में जिन फ़िल्मों को संगीतबद्ध किया था, उनमें 'सावन' (1945), 'शहनाई' (1947), 'पतंगा' (1949) और 'समाधि' एवं 'सरगम' (1950) जैसी फ़िल्में उल्लेखनीय हैं। सन 1951 में सी. रामचन्द्र को भगवान दादा की निर्मित फ़िल्म 'अलबेला' में संगीत देने का मौका मिला। 1951 में प्रदर्शित फ़िल्म 'अलबेला' में अपने संगीतबद्ध गीतों की कामयाबी के बाद सी. रामचन्द्र एक सफल संगीतकार के रूप में फ़िल्मी दुनिया में जम गए। वैसे तो फ़िल्म 'अलबेला' में उनके संगीतबद्ध सभी गाने सुपरहिट हुए, लेकिन ख़ासकर "शोला जो भड़के दिल मेरा धड़के", "भोली सूरत दिल के खोटे नाम बड़े और दर्शन छोटे", "मेरे पिया गए रंगून, किया है वहाँ से टेलीफोन" आदि गीतों ने भारत में धूम मचा दी।

सन 1953 में प्रदीप कुमार और बीना राय अभिनीत फ़िल्म 'अनारकली' की सफलता के बाद सी. रामचन्द्र शोहरत की बुंलदियों पर पहुँच गये। फ़िल्म 'अनारकली' में उनके संगीत से सजे ये गीत "जाग दर्द-ए-इश्क जाग..", "ये ज़िंदगी उसी की है.. ", श्रोताओं के बीच बहुत लोकप्रिय हुए। 1953 में सी. रामचन्द्र ने फ़िल्म निर्माण के क्षेत्र में भी कदम रख दिया और 'न्यू सांई प्रोडक्शन' का निर्माण किया, जिसके बैनर तले उन्होंने 'झांझर', 'लहरें' और 'दुनिया गोल है' जैसी फ़िल्मों का निर्माण किया। लेकिन ये उनका दुर्भाग्य ही था कि इनमें से कोई भी फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं सकी। इसके बाद सी. रामचन्द्र ने फ़िल्म निर्माण से तौबा कर ली और अपना ध्यान संगीत की ओर जी लगाना शुरू कर दिया। वर्ष 1954 में प्रदर्शित फ़िल्म 'नास्तिक' में उनके संगीतबद्ध गीत "देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान, कितना बदल गया इंसान", समाज में बढ़ रही कुरीतियों के उपर उनका सीधा प्रहार था। इस गीत की प्रसिद्धि ने उन्हें फिर से लोकप्रिय बना दिया

सी. रामचन्द्र के सिने कैरियर में उनकी जोड़ी गीतकार राजेन्द्र कृष्ण के साथ बहुत चर्चित रही। उनकी और राजेन्द्र कृष्ण की जोड़ी वाली फ़िल्मो में 'पतंगा' (1949), 'ख़ज़ाना' (1951), 'अलबेला' (1951), 'साकी' (1952), 'अनारकली' (1953), 'कवि' (1954), 'तीरंदाज' (1955), 'शतरंज' (1956), 'शारदा' (1957), 'आशा' (1957) और 'अमरदीप' (1958) जैसी फ़िल्में शामिल हैं। पचास के दशक में स्वरों के लिए विख्यात लता मंगेशकर ने संगीतकार सी. रामचन्द्र की धुनों पर कई गीत गाए, जिनमें फ़िल्म 'अनारकली' के गीत "ये ज़िंदगी उसी की है...", "जाग दर्दे-ए-इश्क जाग.." जैसे गीत इन दोनों फनकारों की जोड़ी की बेहतरीन मिसाल हैं।

साठ का दशक सी. रामचन्द्र के लिए बुरा वक़्त था। इस दशक में पाश्चात्य गीत-संगीत की चमक से निर्माता-निर्देशक स्वयं को नहीं बचा सके और धीरे-धीरे निर्देशकों ने सी. रामचन्द्र की ओर से अपना मुख मोड़ लिया। लेकिन 1958 में प्रदर्शित फ़िल्म 'तलाक' और '1959' में प्रदर्शित फ़िल्म 'पैग़ाम' में उनके संगीतबद्ध गीत "इंसान का इंसान से हो भाईचारा.." की कामयाबी के बाद सी. रामचन्द्र एक बार फिर से अपनी खोयी हुई लोकप्रियता पाने में सफल हो गए।

भारत के वीर जवानों को श्रद्धाजंलि देने के लिए कवि प्रदीप ने 1962 में "ऐ मेरे वतन के लोगों, ज़रा आँख में भर लो पानी.." गीत की रचना की। इस गीत का संगीत तैयार करने की जिम्मेंदारी उन्होंने सी. रामचन्द्र को सौंप दी। सी. रामचन्द्र के संगीत निर्देशन में एक कार्यक्रम के दौरान स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर से देशभक्ति की भावना से परिपूर्ण इस गीत को सुनकर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की आँखों में आँसू छलक आए थे। "ऐ मेरे वतन के लोगों.." गीत को संगीत देकर सी. रामचन्द्र ने जैसे इस गीत को अमर बना दिया। आज भी भारत के महान् देशभक्ति गीत के रूप में याद किया जाता है

साठ के दशक में सी. रामचन्द्र ने 'धनंजय' और 'घरकुल' जैसी मराठी फ़िल्मों का निर्माण किया। उन्होंने इन फ़िल्मों में अभिनय और संगीत निर्देशन भी किया। संगीत निर्देशन के अतिरिक्त सी. रामचन्द्र ने अपने पा‌र्श्वगायन से भी श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया। इन गीतों में "मेरी जान मेरी जान संडे के संडे.." (शहनाई, 1947), "कदम कदम बढ़ाए जा खुशी के गीत गाए जा.." (समाधि, 1950), "भोली सूरत दिल के खोटे नाम बड़े और दर्शन छोटे..", "शोला जो भड़के दिल मेरा धड़के.." (अलबेला, 1951), "कितना हसीं है मौसम कितना हसीं सफर है..." (आजाद, 1955), "आ जा रे नटखट ना छू रे मेरा घूंघट.." (नवरंग, 1959) जैसे न भूलने वाले गीत भी शामिल है। सी. रामचन्द्र ने अपने चार दशक के लंबे सिने करियर में लगभग 150 फ़िल्मों को संगीतबद्ध किया। हिन्दी फ़िल्मों के अतिरिक्त उन्होंने तमिल, मराठी, तेलुगू और भोजपुरी फ़िल्मों को भी संगीतबद्ध किया।

सी. रामचन्द्र के कुछ संगीतबद्ध गीत निम्नलिखित हैं-

मेरी जान मेरी जान संडे के संडे - शहनाई (1947)
कदम कदम बढ़ाए जा खुशी के गीत गाए जा - समाधि (1950)
शोला जो भड़के दिल मेरा धड़के - अलबेला (1951)
भोली सूरत दिल के खोटे नाम बड़े और दर्शन छोटे - अलबेला
मेरे पिया गए रंगून, किया है वहाँ से टेलीफोन - अलबेला
बलमा बड़ा नादान - अलबेला
ये ज़िंदगी उसी की है, जो किसी का हो गया - अनारकली (1953)
जाग दर्द इश्क जाग - अनारकली (1953)
देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान - नास्तिक (1954)
कितना हसीं है मौसम कितना हसीं सफर है - आजाद (1955)
देखो जी बहार आई - आजाद (1955)
आ जा रे नटखट ना छू रे मेरा घूंघट - नवरंग, (1959
ऐ मेरे वतन के लोगों, जरा आँख में भर लो पानी - (1962)

अपने संगीतबद्ध गीतों से श्रोताओं के दिलों पर राज करने वाले महान् संगीतकार सी. रामचन्द्र ने 5 जनवरी, 1982 को इस दुनिया से विदा ली। लेकिन उनके संगीतबद्ध गीत आज भी हर किसी की जुबान पर आते रहते हैं।

गुरुवार, 4 जनवरी 2024

उदय चोपड़ा

#05jan 
उदय चोपड़ा 

🎂जन्म: 05 जनवरी, 1973

मुंबई, महाराष्ट्र, भारत
पेशा
अभिनेता, निर्माता और निर्देशक

माता-पिता
यश चोपड़ा
पामेला चोपड़ा
संबंधी
आदित्य चोपड़ा (भाई)
हिन्दी फ़िल्मों के एक अभिनेता, निर्माता, पटकथा लेखक और सहायक निर्देशक हैं। ये यश चोपड़ा के बेटे और आदित्य चोपड़ा के भाई हैं। इन्होंने अपने पिता और भाई के कुछ फिल्मों में सहायक निर्देशक के रूप में भी काम किया था। ये वाईआरएफ़ एंटरटैनमेंट के सीईओ और यश राज फिल्म्स में अपनी माँ, पामेला चोपड़ा और अपने भाई के साथ मैनेजर रहे हैं।
1994 में इन्होंने ये दिल्लगी फिल्म का निर्माण किया था, जिसमें अक्षय कुमार, काजल और सैफ अली खान मुख्य भूमिका में थे। इन्होंने अभिनय की शुरुआत मोहब्बतें (2000) के साथ शुरू किया था। इन्होंने ज्यादातर अपने पिता के कंपनी की निर्मित फिल्मों में ही अभिनय किया था।

2004 में इन्होंने अभिषेक बच्चन और जॉन अब्राहम के साथ धूम फिल्म में काम किया था। इसके बाद इन्होंने इसकी आगे की कड़ी, धूम 2 में और धूम 3 में भी काम किया।

निर्देशक यश चोपड़ा और पामेला चोपड़ा के बेटे हैं । उनकी भाभी अभिनेत्री रानी मुखर्जी हैं । चोपड़ा ने यशराज फिल्म्स बैनर के तहत अपने पिता और भाई की कई फिल्मों में सहायक निर्देशक के रूप में काम किया ।1994 में, चोपड़ा ने अक्षय कुमार , काजोल और सैफ अली खान अभिनीत ये दिल्लगी का निर्माण किया । उन्होंने अपने अभिनय करियर की शुरुआत फिल्म मोहब्बतें से की थी । [1] चोपड़ा ने ज्यादातर अपने पिता के प्रोडक्शन हाउस की फिल्मों में अभिनय किया है।

उन्होंने क्रमशः 2006 और 2013 में रिलीज़ एक्शन थ्रिलर धूम और इसके सीक्वल धूम 2 और धूम 3 में अभिनय किया। हालाँकि पहली किस्त में अली अकबर फ़तेह खान के रूप में उनके प्रदर्शन की सराहना की गई, लेकिन दोनों सीक्वल में उन्होंने वही भूमिका दोहराई, लेकिन सीक्वल को मिश्रित समीक्षा मिली।
2011 में, वह यूसीएलए में एक प्रोडक्शन वर्क शॉप में शामिल होने के लिए लॉस एंजिल्स गए ।

2014 में, चोपड़ा ने दो फिल्मों का निर्माण किया। ग्रेस ऑफ मोनाको ग्रेस केली की जीवनी पर आधारित फिल्म थी जिसमें निकोल किडमैन ने मुख्य भूमिका निभाई थी । उन्होंने ओलिविया वाइल्ड और जेसन बेटमैन अभिनीत एक कॉमेडी ड्रामा हॉलीवुड फिल्म द लॉन्गेस्ट वीक का निर्माण किया । यह यशराज फिल्म की सहायक हॉलीवुड प्रोडक्शन हाउस YRF एंटरटेनमेंट की पहली परियोजना है । 

जुलाई 2012 में, चोपड़ा ने अपनी खुद की कंपनी, "योमिक्स" की स्थापना की, जो यशराज फिल्म्स पर आधारित कॉमिक्स बनाती है।

📽️
2006 धूम 2
2005 नील एन निक्की
2004 धूम 
2002 मेरे यार की शादी है
2002 मुझसे दोस्ती करोगे 
2000 मोहब्बतें
📺
2023 रोमैंटिक्स वह स्वयं दस्तावेज़ी; कार्यकारी निर्माता भी

रविवार, 3 सितंबर 2023

मुकरी

उरण में कोकानी मुस्लिम परिवार में मुहम्मद उमर मुकरी के रूप में जन्मे । उन्होंने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत 1945 में प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता दिलीप कुमार के साथ फिल्म प्रतिमा से की । वे पहले एक साथ स्कूल के साथी थे। इसके बाद 50 साल के करियर में उन्होंने 600 से ज्यादा फिल्मों में काम किया। 

जन्म
🎂05 जनवरी 1922
उरण , बॉम्बे प्रेसीडेंसी , ब्रिटिश भारत
मृत
⚰️04 सितम्बर 2000 (आयु 78 वर्ष)
मुंबई , महाराष्ट्र , भारत
पेशा
अभिनेता
जीवनसाथी
मुमताज
रिश्तेदार
नसीम मुकरी (बेटी)
भारतीय सिनेमा में छह दशकों से भी अधिक समय में मुकरी ने अपनी दंतहीन मुस्कान, छोटे कद और बेहतरीन कॉमिक टाइमिंग से 600 से अधिक फिल्मों में दर्शकों का मनोरंजन किया । 

उनकी उल्लेखनीय फ़िल्में हैं मदर इंडिया (1957), शराबी (1984), अमर अकबर एंथोनी (1977), लावारिस (1981), बॉम्बे टू गोवा (1972), गोपी (1970), कोहिनूर (1960) और कई अन्य।

फिल्मों में उनका करियर दिलीप कुमार के समानांतर चला , जो उनके सहपाठी थे। उन्होंने बॉम्बे टॉकीज की फिल्म प्रतिमा से अपनी शुरुआत की, जो अभिनेता पी. जयराज के निर्देशन में बनी पहली फिल्म भी थी । फिल्म उद्योग में आने से पहले मुकरी ने काजी के रूप में काम किया था।
मुकरी का 4 सितंबर 2000 को 78 साल की उम्र में दिल का दौरा और किडनी फेल होने के कारण मुंबई के लीलावती अस्पताल में निधन हो गया। उनके आजीवन मित्र और सहपाठी अभिनेता दिलीप कुमार और उनकी पत्नी सायरा बानो उनके निधन के समय मौजूद थे। अभिनेता सुनील दत्त भी कभी-कभार मुकरी से मिलने अस्पताल जाते रहे हैं। मुकरी की सबसे बड़ी बेटी नसीम मुकरी भी वहां मौजूद थीं और उन्होंने अपने पिता के अंतिम संस्कार की व्यवस्था की। 

जॉनी वॉकर, जिन्होंने कम से कम 15 फिल्मों में मुकरी के साथ काम किया, याद करते हुए कहते हैं, "शेख मुख्तार के साथ उनकी बहुत अच्छी जोड़ी थी - एक बहुत लंबी थी और एक बहुत छोटी थी - वे एक साथ बहुत अच्छे लगते थे और एक अच्छी जोड़ी बनाते थे। उन्हें लॉरेल और के नाम से जाना जाता था हार्डी।"

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...