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शुक्रवार, 20 दिसंबर 2024

शिव गीता अध्याय 6

शिव गीता अध्याय 6

शिव का छठा अध्याय श्री रामचंद्र बोली हे भगवन आप कहते हो कि मैं ही जगत की उत्पत्ति और पालन करता हूं इसलिए मुझे बड़ा आश्चर्य है
स्फटिक मणि के समान जिनका शरीर और टीम ने तरह मस्तक पर चंद्रमा ऐसे पर झील और उड़ीसा करते मूर्ति धारण करती हो और पार्वती सहित प्रमुख ही घरों के साथ यही विहार करती हो फिर आपने
होता है भी इस चराचर जगत कैसे उत्पन्न किया है
जगपती जो आपके मुझ पर कृपा हो तो आप इसे कहीं श्री भगवान बोली हे महाभाग रामचंद्र शुरू जो देवताओं की भी बुद्धि में नहीं आता मैं में यत्न पूर्वक तुम से कहता हूं
जिस बिंदु अनायास ही संसार के बाहर जाओ कि जो कुछ ये पंच महाभूत चौदह ओवर समुद्र पर वास्तु देवता राक्षस और ऐसी दिखती ही चौदह वन भू भुव हा हा हा
जंहा तरफा सत्य ईसा पूर्व के लोग धन विठ्ठल सुतल रसातल तलाश दल महानता और पाता था तो अधोलोक मिलकर चौदह लोग भी तथा और स्थावर जंगम गणधर
थी और लाभ देखते ही ये सब मेरी बुद्धि प्रथम ब्रह्मा आदि देवता मेरा रूप देखने की लिमिट मेरे प्रिय मंदराचल पर ही देवता हाथ जो मेरे आगे स्थित हुई तब मैंने देवताओं को लीला
से व्याकुल चित्त जानकर और ब्रह्मा आदि देवताओं का ज्ञान लिया वे तत्काल ही ज्ञान रहे हो हम से बोली तुम कौन हो तुम मैंने देवताओं से कहा मेरी ही पुरातन ही
दृष्टि से पहले में ही था वर्तमान में ही हूं और अंत में भी मैं इन होगा इस लोक में मेरे सिवाय और कुछ नहीं रेशे मुझसे अतिरिक्त और कुछ वस्तु नहीं नृत्य अमित भी नहीं
तथा में पाप रहित जी और ब्रह्मा का भी थी
मैं ही लक्ष्य होता है
पश्चिम हूं
ऊपर नीचे दिशा विदिशा में ही सावित्री गायत्री इस स्त्री पुरुष नपुंसक दृश्यों को जगती अनुस्यूत और पंक्ति छंद भी ने
धर्म में ही तीनों वेदों में वर्णन किया गया हूँ मैं भी सत्यस्वरूप माया के विकास से रहित जो शब्द शाम दक्षिणा दक्षिण घर पर रहते हुए भी यही तीन अगली स्वरूप हो
घर गुरु में गुप्ता वाणी कर रहे थे
हक और जगत का पति में ही में सबसे श्रेष्ठ सब देवताओं से श्रेष्ठ ज्ञानियों में पहुंचे कर्मचारियों का पति सागर भी में ही में अर्थों के योग की शर्त घूम ऐश्वर्य संपन्न थी
टॉप और उसकी आठ वायु भी मैं ही हूँ मैं ही ऋग्वेद यजुर्वेद सामवेद और अथर्ववेद में ही हो
भारत आदि इतिहास ब्रह्मपुरा आदि को रहा हूँ
उनका प्रवर्तक बोधायन आदि रिशी नासमझी नामक रुद्र की प्रतिपादक मुख्य तत्व की उत्पादन करने वाली का था उपासना कहा उपनिषद ये सब
में ही लोग सांख्य योग आदि सूत्र व्याख्यान अनु व्याख्या गंधर्व का विद्यार्थी यज्ञ में आहुति गाय हाथी दान के प्रधान देना ये लोग अविनाशी पर लोग छड़ प्राणिमात्र के
हृदय में वास करने वाला इंद्रिय निग्रह मनो लिखे ख़त जीवन भी नहीं सफेद
शो में घूमने भी में ही निर्जन स्थान वासी भी मैं हूं
जन्म रहित भी में ही पवित्र पुष्कर सबके मन थे और बाहर भीतर अविनाशी मैं ही हूँ
तेज अंधकार इन्द्रिय इन्द्री के गुण बुद्धि अहंकार और शब्द आदि विषय में ही ब्रह्मा विष्णु महेश उमा
घर पति ए हिंद
बिंदु या निकलती हूँ भाई को भी ईशा भू गोवा चूहा महा जंहा टप्पा सकते ये सात लोग पृथ्वी जल वायु आकाश सोनी चंद्र नक्षत्र गिरे हैं
फिलहाल कारण मृत्यु अमरत भूत प्राणी ये सब ने ही भूत वर्तमान और भविष्य में ही सम्पूर्ण विश्व सवरूप भी मैं ही हूँ ओमकार के आदि और मंत्री बुआ सोहा में ही
गायत्री शीशी जपने वालों का विनाश यूं भी में ही भक्त हैं वहां रथ अकरा ते तरफ पर अखबार में ही और सबका आश्रय में ही को में ही रखा है
अक्षर सूक्ष्म ढिबरी प्रजापति पवित्र देव था
तिराहे पर तो का अर्थ नहीं हूं मैं ही सबका उपचार करने वाला में ही परमभक्त सागर इत्यादि गुरु वस्तु और पहले कालिख अगली सूर्य आदित्य इंसा पदार्थों में विद्यमान हूँ मैं ही सब प्राणियों के
हृदय भी ढेर था और पुराना रूप से स्थित हो जिसका अर्थ है इस पर संजय वन उत्तर को और जिसके पास हो कोशी संख्या में व दक्षिण को और जिसके अंतर्गत अंतर संघर्ष हुआ
मध्य में है
ऐसा फिल्म देखकर साक्षात ओम का मैं हूं
जिस कारण से के में जब करने वालों को सजाती लोग को में जाता हूं
पोलिथीन पुरुषों को नीचे नहीं जाता इस कारण में एक निरंतरता नहीं थी सनातन कारण हो या के कारण भी ब्रह्मा नामक प्रेरित होकर रह है
और शाम के मंत्र को देखता हूँ इस कारण में ही पूर्ण सहयोग को तात्पर्य है कि सब कुछ मैं ही हूँ
झील से घनत्व तेल आदि दिन ही ग्राम से महफ़िल में व्याप्त होकर भक्षण करने वाले की सकते हैं को व्याप्त करते ही इसी का सब लोकों में अधिष्ठान रूप से व्याप्त होकर मैं सर्वव्यापी लोग ब्रह्मा हर ही
वहां और वो दूसरे जे वो भी मेरा आठ आदि और अंत नहीं जानते इस कारण से में अनंत हो घर वहां जन ज्यादा मृत्यु से भरे संसार सागर से ही में भक्तों को चाहता हूँ इस कारण मेरा नाम था
रखें
ज़रा इंच से ढांचे अंदाजे अधिक जी इन चार प्रकार के देशों में में जीव रूप से वास करता हूं
और इनके हृदय काशी सूक्ष्म रूप होकर वास करता हूं
इससे ने सूक्ष्म कहलाता हूँ
महान कार्य में मगन हुए भक्तों को उद्धार करने के निमित्त बिजली के समान दीप्तिमान निरुपम तेज हो प्रकट करता हूं
इस कारण में विशिष्ट रूप हो
जिस कारण थी कि में एक ही लोगों को पं
अनुसार करके लोग का अंतर है पहुंचाता हूं और ग्रहण करता हूं
इस कारण से मुझे स्वतंत्र और एक ईश्वर कहती प्रलय काल में कोई दूसरा स्थित नहीं रहता केवल मैं ही तीन गुणों से परे सोएं ड्रम रुद्र स्वरूप सब प्राणियों को अपने में लेकर कि इससे होता हूँ जो कि
सब लोग होगी इसलिए अर्थात सब लोकों को स्वाधीन रखने वाली शक्तियों से साथ ही लगता हूँ
कौन भूल सकता चलाता हूं
इसी का सिर्फ रिश्ता सबका शो में ईशा कहलाता हूँ
में थे और सब प्राणियों का सरदारशहर सब
विद्याओं का अधिपति अर्थात सर्व ईश्वर शक्ति संपन्न हो इससे महिला की शान आना सार्थक है
थे और अदालत पदार्थों को आत्म ज्ञान से देखता हूं
इसी का साधन संपन्न पुरुषों आत्मज्ञान रूप में योग का उपदेश करता हूं
पर में व्याप्त नहीं थी मैं भगवान हूँ ऐश्वर्य वाहन को मिली है था सब लोकों की उत्पत्ति पालन और संहार करता हूं
इस कारण मुझे महेश खेती ही महज पुरुषों में आत्मदया और अष्टांग योग से जो महिमा विधान के
जब पदार्थों को उत्पन्न कर की रक्षा करता है
मैं वहां से में ही में शुद्ध प्रतिपादित एक भी संपूर्ण दिशा में वर्तमान में सबसे प्रथम घर में वास करने वाला घर से निकलने वाला और पीछे उत्पन्न होने वाला हूँ
मैं ही सम्पूर्ण लोकों पर सब दिशाओं में भी ना ही भूखे सर्वत्र मेरे मित्र सर्वत्र मेरा मुख सर्वत्र मेरी भुजा और सर्वत्र में चरण ही में ही भोजन और चेहरों से शहर और भूमि को
कटा हुआ एक देश को के अग्रभाग की संभावना सूक्ष्म रूप हृदय में रहने वाला विश्व व्यापक प्रकाश श्रेष्ठ आत्मस्वरूप ने
जो पुरुष तत्व मनुष्य आदि वाक्यों के ज्ञान से कि वे है
ऐसी उपाधि क्या कर जीव और ब्रह्म को एकता से देखते ही अर्थ था एक स्वरूप जानते ही वहीं निरंतर मोक्ष को प्राप्त होते ही दूसरी नहीं
पीसीबी जो रजत बुद्धि है वे भ्रम ही है
परंतु ग्रह के भ्रम का आधार शक्ति यथार्थ थे
उसी प्रकार मेरे तरफ घूमी रोकने वाला जगत मिथ्या है परन्तु उसका आधा में तथा एक रूप में ही ये पंचभूत आत्मक जगत धारण ही
मुझे ईश्वर के स्वरूप में जो विवेक करेगा उसको अनंत शांति और था मुक्ति की प्राप्ति होगी
ग्रहण का ही अंतर मन है वहां छुडा पिपासा और तृष्णा ही इसी से शुभ अशुभ फल प्राप्ति का कारण जो धर्म अधर्म है उसके कारण विशेष कृष्णा को कर और निश्चयात्मक थी मुझे अंतः
रंग लगाकर जो मेरा ध्यान करते हैं
उनको निरंतर शांति और मोक्ष प्राप्त होता है
दूसरों को नहीं जहां वीणा की गति नहीं जहाँ मन नहीं पहुँच सकता इसी प्रकार धमके
ब्राह्मणों को मेरी जानने वाले को कई से रहे प्राप्त नहीं होता इस कारण था मेरे वचन जो कि आत्म ज्ञान के दिन ही ठीक है
मेरे नाम का जप करके मेरे ज्ञान पर आए हैं वे देहांत मिली जिसका हो मेरे स्टाइल को प्राप्त हो गई
जो खुशी यह प्रधान देखते ही ये सब मेरी होती है
यह सब बस तो मुझसे ही पहनने और मुझे नहीं प्रतिष्ठित थे
और अंत में मुझे में ही ले जाती है
मैं अद्वैत ब्रह्म हो ने सूची से भी अति सूक्ष्म महान से महान में ही भविष्य निधि पुरातन पुरुष सर्वेक्षण में और सिद्धू को मेरे हरचरण ही और सब कुछ कर सकता हूं
मेरी शक्ति किसी के ध्यान में नहीं आती मेरे भौतिक नेत्र नहीं है तथापि सब कुछ लिखता हूँ
कान नहीं ही सब कुछ था
अपने था तब तक तो सब विचार को जानता हूं मेरा एकांत रूप से मेरा जानने वाला कोई नहीं मैं सदा चिंतन
संपूर्ण वेदों में में ही योग्य होगी
वेदान्त का करता और वेद का जानने वाला भी नहीं मुझे पाप और पुण्य नहीं मेरा नाशी तथा जल नहीं मैं सदा चैतन्य को संपूर्ण जो भी में ही जानने योग्य वेदान्त का करता
और वैध का जानने वाला हूँ मैं ही हूँ
मुझे भी पाप और पुण्य नहीं मेरा नाशी तथा पूजन में ही मुझे दे ही रहे और बुद्धि का संबंध नहीं है
भूमि जल तेज वायु आकाश विषय में लिप्त नहीं हूं
प्रकाश सिंह पंच को शासनों गुहा में निवास करने वाला निर्विकार संग्रहित सर्व साक्षी कार्य कारण भेद ने परमात्मा जो मुझको इस प्रकार से जानते हैं वे मेरी शील्ड परमार्थ चेहरों को मिला
थी
हे महाबाहो बुद्धिमान रामचंद्र इस प्रकार जो मुझे तब तो से झांकता थे वहीं संसार से मुक्त होता है
दूसरा नहीं

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भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...