सुत उवाच । अथातः संप्रवक्ष्यामि शुद्धं कैवल्यमुक्तिदम्।। अनुग्रहानमहेशस्य भवदुःखस्य भेषजम् ॥1॥
सूतजी बोले हे शौनकादिको ! इसके बाद अब मैं शुद्ध और कैवल्यमुक्तिदायक संसारके दुःखने में औषधिरूप शिवगीता रत्नको शिवजीके अनुग्रहसे वर्णन करता हूँ।
॥
न कर्मणामनुष्ठानैर्न दानैस्तपसपि वा।। कैवल्यं लभते मर्त्यः साक्षात् ज्ञानेन केवलम् ॥2॥
न कर्मों के अनुष्ठान न दान न तप से मनुष्य मुक्ति को प्राप्त होता है किन्नु ज्ञान से ही प्राप्त होता है।॥ २॥
गीता ५/- 36-38-39/18/-
भगवद गीता अध्याय: 5
श्लोक 18
श्लोक:
विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः॥
भावार्थ:
वे ज्ञानीजन विद्या और विनययुक्त ब्राह्मण में तथा गौ, हाथी, कुत्ते और चाण्डाल में भी समदर्शी (इसका विस्तार गीता अध्याय 6 श्लोक 32 की टिप्पणी में देखना चाहिए।) ही होते हैं
॥18॥
भगवद गीता अध्याय: 6
श्लोक 32
श्लोक:
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन।
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः॥
भावार्थ:
हे अर्जुन! जो योगी अपनी भाँति (जैसे मनुष्य अपने मस्तक, हाथ, पैर और गुदादि के साथ ब्राह्मण, क्षत्रिय, शूद्र और म्लेच्छादिकों का-सा बर्ताव करता हुआ भी उनमें आत्मभाव अर्थात अपनापन समान होने से सुख और दुःख को समान ही देखता है, वैसे ही सब भूतों में देखना 'अपनी भाँति' सम देखना है।) सम्पूर्ण भूतों में सम देखता है और सुख अथवा दुःख को भी सबमें सम देखता है, वह योगी परम श्रेष्ठ माना गया है
॥32॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 36-37
श्लोक:
सुखं त्विदानीं त्रिविधं श्रृणु मे भरतर्षभ।
अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति॥
यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्।
तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम्॥
भावार्थ:
हे भरतश्रेष्ठ! अब तीन प्रकार के सुख को भी तू मुझसे सुन। जिस सुख में साधक मनुष्य भजन, ध्यान और सेवादि के अभ्यास से रमण करता है और जिससे दुःखों के अंत को प्राप्त हो जाता है, जो ऐसा सुख है, वह आरंभकाल में यद्यपि विष के तुल्य प्रतीत (जैसे खेल में आसक्ति वाले बालक को विद्या का अभ्यास मूढ़ता के कारण प्रथम विष के तुल्य भासता है वैसे ही विषयों में आसक्ति वाले पुरुष को भगवद्भजन, ध्यान, सेवा आदि साधनाओं का अभ्यास मर्म न जानने के कारण प्रथम 'विष के तुल्य प्रतीत होता' है) होता है, परन्तु परिणाम में अमृत के तुल्य है, इसलिए वह परमात्मविषयक बुद्धि के प्रसाद से उत्पन्न होने वाला सुख सात्त्विक कहा गया है
॥36-37॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 38
श्लोक:
विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम्।
परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम्॥
भावार्थ:
जो सुख विषय और इंद्रियों के संयोग से होता है, वह पहले- भोगकाल में अमृत के तुल्य प्रतीत होने पर भी परिणाम में विष के तुल्य (बल, वीर्य, बुद्धि, धन, उत्साह और परलोक का नाश होने से विषय और इंद्रियों के संयोग से होने वाले सुख को 'परिणाम में विष के तुल्य' कहा है) है इसलिए वह सुख राजस कहा गया है
॥38॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 39
श्लोक:
यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः।
निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम्॥
भावार्थ:
जो सुख भोगकाल में तथा परिणाम में भी आत्मा को मोहित करने वाला है, वह निद्रा, आलस्य और प्रमाद से उत्पन्न सुख तामस कहा गया है
॥39॥
• कैवल्य मुकित देने वाली हैसी मुकानि जैसे गृह सवामी अपने घर मे रहता है इसी प्रकार ईशपूर को अपना घर बजा उसी में वास करना। स्वप्न के टूटते ही जैसे स्वपन कर शरीर पदार्थ य हो जाते है वैसे प्रभू में लय होना कैवल्य मोक्ष है।
मुक्ति के प्रकार और उनकी पहचान:
शास्त्रों में मुक्ति के मुख्यतः पाँच प्रकार बताए गए हैं, जिन्हें पंचविध मुक्तियाँ कहा जाता है। ये इस प्रकार हैं:
1. सालोक्य मुक्ति
परिभाषा: सालोक्य मुक्ति में साधक अपने आराध्य देव के समान ही दिव्य लोक में निवास करता है।
पहचान: इस मुक्ति में भक्त को भगवान के धाम, जैसे विष्णु भक्त के लिए वैकुंठ, शिव भक्त के लिए कैलाश में निवास प्राप्त होता है। वह भगवान के दिव्य लोक में रहता है और उनसे दूर नहीं होता।
2. सामीप्य मुक्ति
परिभाषा: सामीप्य मुक्ति में साधक को भगवान के निकट रहने का सौभाग्य प्राप्त होता है।
पहचान: इसमें भक्त को अपने आराध्य देव के अत्यंत निकट रहने का अधिकार मिलता है। वह उनके समीप रहकर सेवा और उनके सान्निध्य का लाभ प्राप्त करता है।
3. सारूप्य मुक्ति
परिभाषा: सारूप्य मुक्ति में साधक को भगवान के समान रूप और गुण प्राप्त होते हैं।
पहचान: इसमें भक्त का स्वरूप भी भगवान के समान हो जाता है, जैसे वह भी दिव्य और सुंदर स्वरूप धारण करता है। इसमें भगवान और भक्त में एक जैसी दिव्यता दिखाई देती है, जिससे भक्त भगवान के समान दिखता है।
4. सार्ष्टि मुक्ति
परिभाषा: सार्ष्टि मुक्ति में भक्त को भगवान के समान ऐश्वर्य प्राप्त होता है।
पहचान: इसमें भक्त को भगवान के समान शक्तियाँ और सामर्थ्य मिल जाती हैं। वह भी दिव्य गुणों, शक्तियों और ऐश्वर्य का स्वामी बनता है, जिससे उसे अभाव का अनुभव नहीं होता।
5. कैवल्य मुक्ति (सायुज्य मुक्ति)
परिभाषा: कैवल्य मुक्ति में साधक भगवान में पूर्णतया लीन हो जाता है और द्वैत समाप्त हो जाता है।
पहचान: यह सबसे उच्चतम मुक्ति मानी जाती है। इसमें भक्त का आत्मा भगवान के साथ पूर्णतः एकाकार हो जाता है। इसमें कोई भेद नहीं रह जाता और साधक ब्रह्म रूप हो जाता है, जिससे उसे पुनर्जन्म से पूर्ण मुक्ति प्राप्त होती है। इसे मोक्ष भी कहते हैं।
विशेष:
इन मुक्तियों की मुख्य विशेषता और पहचान यह है कि सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य और सार्ष्टि मुक्ति में भक्त भगवान के धाम और उनके निकट रहता है परन्तु भगवान से अलग रहता है। लेकिन कैवल्य (सायुज्य) में भक्त और भगवान में कोई भेद नहीं रहता, भक्त ब्रह्म में विलीन हो जाता है और उसे जन्म-मरण के चक्र से सदा के लिए मुक्ति प्राप्त होती है।
स्वाभाविक कर्म जिनके द्वारा जीव को परम सिद्धि प्राप्त हो जाती है
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 45
श्लोक:
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः।
स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥
भावार्थ:
अपने-अपने स्वाभाविक कर्मों में तत्परता से लगा हुआ मनुष्य भगवत्प्राप्ति रूप परमसिद्धि को प्राप्त हो जाता है। अपने स्वाभाविक कर्म में लगा हुआ मनुष्य जिस प्रकार से कर्म करके परमसिद्धि को प्राप्त होता है, उस विधि को तू सुन
॥45॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 43
श्लोक:
शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्।
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्॥
भावार्थ:
शूरवीरता, तेज, धैर्य, चतुरता और युद्ध में न भागना, दान देना और स्वामिभाव- ये सब-के-सब ही क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म हैं
॥43॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 44
श्लोक:
कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्।
परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्॥
भावार्थ:
खेती, गोपालन और क्रय-विक्रय रूप सत्य व्यवहार (वस्तुओं के खरीदने और बेचने में तौल, नाप और गिनती आदि से कम देना अथवा अधिक लेना एवं वस्तु को बदलकर या एक वस्तु में दूसरी या खराब वस्तु मिलाकर दे देना अथवा अच्छी ले लेना तथा नफा, आढ़त और दलाली ठहराकर उससे अधिक दाम लेना या कम देना तथा झूठ, कपट, चोरी और जबरदस्ती से अथवा अन्य किसी प्रकार से दूसरों के हक को ग्रहण कर लेना इत्यादि दोषों से रहित जो सत्यतापूर्वक पवित्र वस्तुओं का व्यापार है उसका नाम 'सत्य व्यवहार' है।) ये वैश्य के स्वाभाविक कर्म हैं तथा सब वर्णों की सेवा करना शूद्र का भी स्वाभाविक कर्म है
॥44॥
शम, दम, तप, शौच, क्षान्ति, आर्जव, ज्ञान - विज्ञान तथा आस्तिक्य आदि ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म हैं ।
गीता के अनुसार ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म है.....
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भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं .....
"शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च | ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ||१८:४२||
अर्थात् शम? दम? तप? शौच? क्षान्ति? आर्जव? ज्ञान? विज्ञान और आस्तिक्य ये ब्राह्मण के स्वभाविक कर्म हैं ||
और भी सरल शब्दों में ब्राह्मण के स्वभाविक कर्म हैं ..... मनोनियन्त्रण, इन्द्रियनियन्त्रण, शरिरादि के तप, बाहर-भीतर की सफाई, क्षमा, सीधापन यानि सरलता, शास्त्र का ज्ञान और शास्त्र पर श्रद्धा|
इनकी व्याख्या अनेक स्वनामधन्य आचार्यों ने की है| इनके अतिरिक्त ब्राह्मण के षटकर्म भी हैं, जो उसकी आजीविका के लिए हैं| पर यहाँ हम उन स्वभाविक कर्मों पर ही विचार कर रहे हैं जो भगवान श्रीकृष्ण ने कहे हैं|
जो सिद्धि प्राप्त करवा देते हैं।
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