गुरुवार, 19 दिसंबर 2024

शिव गीता अध्याय 3



शिव गीता अध्याय 3
अगस्त जी कहते है काम क्रोध आदि से पीड़ित मनुष्य हितकारी वचन नहीं सुनता
उसको एक कार्य बच्चन ऐसे अच्छी नहीं लगती जैसे मरणशील को औषधि अच्छी नहीं लगती है
जिस गीता को मायावी रहते टावर के बीच में ले गया है
जहां वे तुम्हारे निकट अब किस प्रकार से आ सकती है
जिसके द्वार पर मामलों के युद्धों के तमाम सब देवता बांध ली गई थी
देवताओं की स्त्रियां जिसकी यहां शर्मा होती हैं जो शिव जी के वर्ष से गड़बड़ी को संपूर्ण लौकी को भोगता और वह से रहे थे
उसे तू कैसी भी इंद्रजीत भी उसका पुत्र शिव के वरदान के घर फिर थे
उसके आगे से देव का संग्राम में बहुत बड़ा भाग गए हैं
देवताओं को भय देने वाला जिसका भाई कुंभकरण बड़ा कर और अनेक प्रकार के दिव्यास्त्र धारण करने वाला जीत भी दिलाई शनि देव और दानवों के लिए दुर्गम जिसका लंका न हो चुके हैं
और करून जिसके यहाँ चतुरंगिणी सेना ही ही राज फिर अकेले तुम उसे कैसे जी तो कि तुम्हारी यह बात ऐसी है कि जैसे कोई बालक चंद्रमा को हां से लेना चाहिए
इसी प्रकार तो काम से मोहित होकर उस को जीतने की इच्छा करती है
श्री रामचन्द्रजी बोली हे मुनिश्रेष्ठ में क्षत्रिय हूँ और मेरी भारिया राक्षस ने हरण कर ली है
जो में उसे न मारूंगा तुम मेरे जीबी से क्या फल ही इस कारण तुम्हारे तब तो बोध से मुझे कुछ भी प्रयोजन नहीं है एक काम क्रोध आदि मेरे शरीर को भस्म डालते ही और अपनी प्रिया की हरण होने और शत्रु
से ही पराभव होने से भी अहंकार भी मिलते मेरे जीवन को हरण करने को फिर से हे मुनिश्रेष्ठ जिसको तत्व ज्ञान की इच्छा हो या लोग के पुरुषों में नहीं है
इसी कारण सागर को लांघकर युद्ध में उसको मारने के उपाय को आप कहीं आप से श्रेष्ठ और कोई मेरा ही अगस्त मोदी जो ऐसी इच्छा है तो पार्वती पति भगवान से उन अविनाशी की शरण में जाओ
मैं भगवान प्रसन्न होकर तुम को मनोवांछित फल की इन्द्रादि देवता हर ही और ब्रह्मा भी जिसको नहीं जीत सकी में शिव जी के अनुग्रह के बिना तुम भी कैसे मारा जाएगा इस कारण वीजा मार्ग से मैं तुमको
दीक्षा रहता हूं
इस मार्ग से तो मनुष्य छोड़कर तेजोमय होगी
जिसके प्रताप से युद्ध में शत्रुओं को मारकर सम्पूर्ण कामनाओं को प्राप्त हो जाओगी और संपूर्ण द्वारा मंडल को भोग का अंत में शिव कुछ होगी
टू जी कहते हैं तब रामचन्द्रजी मुनिश्रेष्ठ को दंडवत प्रणाम करके दुख के आप प्रसन्न होकर भी श्री रामचन्द्रजी होती है मुन्नी मैं कृतार्थ हो गया मेरे कार्य सिद्ध हो गई
समुद्र पीने वाले आपको मेरे ऊपर प्रसन्न हो तो मुझे क्या मतलब है
यही कारण हे मुनिश्रेष्ठ आप मुझसे गुरु दीक्षा की विधि रही अगर झोली शुक्ल पक्ष की चौदस अष्टमी या एकादशी सोमवार अथवा आर्द्रा नक्षत्र में यह का आरंभ करना झुंड
को वायु श्रेष्ठ रुद्र अभी परमेश्वर निरंतर जगत के नियंता सर्वश्रेष्ठ ब्रह्मा आदि से भी परे शिव कहते ही जो ब्रह्मा विष्णु अग्नि वायु इनको भी उत्पन्न करने वाली ही इसी प्रकार
सदा शिव का ध्यान करके अग्नि बीच से ही गिरावट नहीं का ध्यान कर भी उत्पत्ति के कारण भूत जो पंच महाभूत ही व वायु बीच से पृथक ही इस फिल्म का भाव कर की उन महाभूतों के गुण का क्रम से ध्यान करें
कि की राजनीति दर्द होने वाली भावना कराई उसका प्रकार रहा था
पंच महाभूतों के घोर रूप रस गंध इस पर और शहद ये पाँच ही पृथ्वी ने पांचों ही कौन है
जल शब्द स्पर्श रूप रस ये चार पेज में शब्द इस पर रूम को यह भी वायु में तेजी से जल जल से पृथ्वी उत्पन्न होती है
और इसके विपरीत अर्थात पृथ्वी जल में जल तेज वायु में वायु आकाश में ले जाता है अधिक अधिक के भूत न्यूज न्यून गुरु वालो भूतों में ले हो जाती और इनकी सबकी मात्रा जिसका गोद में ही
उन अहंकार आदि को लेकर पंच महाभूतों को अहंकार नहीं अहंकार का महत्व तो में में तहत कमाया में माया का सबके आधारभूत परमात्मा में लेकर फिर अमृत रजिस्ट्री थी के विपरीत क्रम कर
कि यह उत्पत्ति विषय में रिलीज से ऐसी भावना करके में दिव्य देह गेहूं और पूर्व ही कि उत्पन्न करने वाली सब घरों और द्रव्य का अग्निवेश ढहाकर कि उसका परमात्मा में लेकर की अमृत
जिससे पुनर्जीवन करके यह ही अमरत और वे ऐसी भावना करें इस प्रकार भूत शुद्धि करके पाशुपत व्रत का आरंभ करें फिर प्रातः काल में ही पाशुपत को करूंगा ऐसा संक्षेप से निकल कर
की अपनी शाखा तरह गृह्यसूत्र से अग्नि था उस दिन व्रत रखकर पवित्र रूप श्वेत वस्त्र धारण करें
शुक्र यज्ञोपवीत और शुक्ल माला पहनी अन्तः करण एकाग्र कर भेजा
के अनुवाद पर्यंत संविदा अच्छे आचरण से हवन करें
हवन के अनन्तर मंत्र से अग्नि को आत्मा में आरोप बढ़कर अग्नि के महत्व को मंत्रों से अभिमंत्रित कर ललाट आदि अंगों में धारण कर जिस ब्राह्मण के शरीर में भस्म लगी होती है वे माह पाठकों से भी छूट जाता थी
इसमें संदेह नहीं कि क्योंकि भसीन अग्नि का भी ले गए
मैं भी अगली है कि धारण करने से बलवान हो जाऊंगा
इसी प्रकार की नीति भ्रष्ट विश्राम करता जितेन्द्रिय हो तुम पर कर था
वे सब पाप से मुक्त होकर शिव लोक को प्राप्त था
ही रहा चाहिए तुम इस प्रकार करो और शिव सहस्त्रनाम मैं तुमको देता हूं
इससे तुम्हारी मनोरथ पूर्ण होंगी
सूची कहते हैं ऐसा कहकर अगर झेली रामचंद्र का शिव सहस्त्रनाम का उपदेश या झुग्गी सब में कर हर भी जो शिव जी को प्रत्यक्ष करने वाला है
उसको देखकर अगर जी ने कहा क्या तुम इसी दिन रात को तब भगवान शिवजी प्रसन्न होकर पाशुपत अस्त्र तुम को देंगे
जिससे तुम शत्रुओं को मारकर क्रिया को प्राप्त भी उसी एक्ट के प्रभाव से सागर को धातु सकोगी शहर घालमेल शिव भी इसे ही अस्त्र से जगत का हक थी उसको भी बिना पाए दानवों से ही जय पाना
बड़ा लंबे इस कारण इस राष्ट्र के पानी के निमित्त

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...