गीता और राम गीता दोनों ही पिता से मिले धन और इज्जत को आगे बढ़ाने की महत्ता पर जोर देती हैं।
गीता के अध्याय 3, श्लोक 21 में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं:
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।।
अर्थ: जो कुछ भी श्रेष्ठ व्यक्ति करता है, उसे अन्य लोग भी करते हैं। वह जो भी आदर्श स्थापित करता है, उसे लोग अनुसरण करते हैं।
गीता के अध्याय 11, श्लोक 33 में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं:
तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व पत्रंगम।
युध्यस्व विगतज्वरः भारार्तभरभृतामपि।।
अर्थ: इसलिए तुम उठो, अपनी इज्जत को बढ़ाओ, और युद्ध करो। तुम्हारे परिवार के लोगों को भी तुम्हारी इज्जत की रक्षा करनी चाहिए।
राम गीता के अध्याय 1, श्लोक 11 में भगवान राम कहते हैं:
पितृपैतामहं धनं यो न रक्षति सोऽधमः।
तस्य जन्मो मृत्युश्च व्यर्थं भवति निश्चितम्।।
अर्थ: जो व्यक्ति अपने पिता और पैतामह से मिले धन की रक्षा नहीं करता है, वह अधम है। उसका जन्म और मृत्यु व्यर्थ होते हैं।
इन श्लोकों से यह स्पष्ट होता है कि गीता और राम गीता दोनों ही पिता से मिले धन और इज्जत को आगे बढ़ाने की महत्ता पर जोर देती हैं।
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 76
श्लोक:
राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम्।
केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः॥
भावार्थ:
हे राजन! भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के इस रहस्ययुक्त, कल्याणकारक और अद्भुत संवाद को पुनः-पुनः स्मरण करके मैं बार-बार हर्षित हो रहा हूँ
18॥76॥
गीता के अनुसार, उत्तम जन्म वह है जिसमें व्यक्ति भगवान की भक्ति और सेवा में लगा रहता है। गीता के अध्याय 7, श्लोक 28 में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं:
ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः।
अनन्येनैव योगेन मामध्यात्ममुपासते।।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्।
अर्थ: जो लोग अपने सभी कर्मों को मुझे समर्पित करके मेरी शरण में आते हैं और अनन्य भाव से मेरी उपासना करते हैं, उनके लिए मैं उनके योगक्षेम की व्यवस्था करता हूं।
गीता के अनुसार, उत्तम जन्म के लक्षण निम्नलिखित हैं:
1. _भगवान की भक्ति_: उत्तम जन्म में व्यक्ति भगवान की भक्ति और सेवा में लगा रहता है।
2. _अनन्य भाव_: उत्तम जन्म में व्यक्ति अनन्य भाव से भगवान की उपासना करता है।
3. _कर्मों का समर्पण_: उत्तम जन्म में व्यक्ति अपने सभी कर्मों को भगवान को समर्पित करता है।
4. _योगक्षेम_: उत्तम जन्म में भगवान व्यक्ति के योगक्षेम की व्यवस्था करता है।
इन लक्षणों के आधार पर, उत्तम जन्म वह है जिसमें व्यक्ति भगवान की भक्ति और सेवा में लगा रहता है और अनन्य भाव से भगवान की उपासना करता है।
गीता के अनुसार, मनुष्य योनि में जन्म लेना उत्तम जन्म है। गीता के अध्याय 9, श्लोक 32 में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं:
मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमाशाश्वतम्।
नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिमपरां गताः।।
अर्थ: जो लोग मेरी शरण में आते हैं, वे फिर से जन्म और मृत्यु के चक्र में नहीं पड़ते हैं। वे महात्मा होते हैं और परम सिद्धि को प्राप्त होते हैं।
गीता के अध्याय 16, श्लोक 19-20 में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं:
तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेष्वनर्थदः।
माययापहृतज्ञाना आसुरीं योनिमापन्नाः।।
मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः।
राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः।।
अर्थ: जो लोग मुझसे द्वेष करते हैं और क्रूर होते हैं, मैं उन्हें संसार में अनर्थ के लिए जन्म देता हूं। वे माया के प्रभाव से अपने ज्ञान को खो देते हैं और आसुरी योनि में जन्म लेते हैं।
गीता के अनुसार, मनुष्य योनि में जन्म उत्तम जन्म है, क्योंकि इसमें व्यक्ति को भगवान की भक्ति और सेवा का अवसर मिलता है।
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 77
श्लोक:
तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः।
विस्मयो मे महान् राजन्हृष्यामि च पुनः पुनः॥
भावार्थ:
हे राजन्! श्रीहरि (जिसका स्मरण करने से पापों का नाश होता है उसका नाम 'हरि' है) के उस अत्यंत विलक्षण रूप को भी पुनः-पुनः स्मरण करके मेरे चित्त में महान आश्चर्य होता है और मैं बार-बार हर्षित हो रहा हूँ
18॥77॥
गीता के अनुसार, मृत्यु के दो प्रकार हैं:
1. *उत्तम मृत्यु*: यह मृत्यु उस व्यक्ति को प्राप्त होती है जो अपने जीवन में भगवान की भक्ति और सेवा में लगा रहता है। ऐसे व्यक्ति की मृत्यु के बाद उनकी आत्मा भगवान के चरणों में मिल जाती है।
2. *अधम मृत्यु*: यह मृत्यु उस व्यक्ति को प्राप्त होती है जो अपने जीवन में भगवान की भक्ति और सेवा से दूर रहता है। ऐसे व्यक्ति की मृत्यु के बाद उनकी आत्मा पुनर्जन्म के चक्र में पड़ जाती है।
गीता के अध्याय 8, श्लोक 5-6 में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं:
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः।।
अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्।
यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः।।
अर्थ: जो व्यक्ति अपने जीवन में जिस-जिस भाव को स्मरण करता है, उसी भाव को लेकर वह अपने शरीर को त्याग करता है। उसी भाव को लेकर वह उसी के पास जाता है। जब कोई व्यक्ति अपने जीवन के अंत में मेरा स्मरण करता है और अपने शरीर को त्याग करता है, तो वह मेरे भाव में लीन हो जाता है, इसमें कोई संशय नहीं है।
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 64
श्लोक:
सर्वगुह्यतमं भूतः श्रृणु मे परमं वचः।
इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्॥
भावार्थ:
संपूर्ण गोपनीयों से अति गोपनीय मेरे परम रहस्ययुक्त वचन को तू फिर भी सुन। तू मेरा अतिशय प्रिय है, इससे यह परम हितकारक वचन मैं तुझसे कहूँगा
॥64॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 78
श्लोक:
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥
भावार्थ:
हे राजन! जहाँ योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण हैं और जहाँ गाण्डीव-धनुषधारी अर्जुन है, वहीं पर श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है- ऐसा मेरा मत है
18॥78॥
विश्व हिंदू परिषद पंजाब
महन्त राम प्रकाश दास अध्यक्ष उत्तर भारत विश्व हिंदू परिषद
दातारपुर (जिला होस्यारपुर) पंजाब
हिन्दू जीवन पध्दत्ति
वर्ण,आश्रम,पुरुषार्थ,ऋण,तीर्थ,देवता,संस्कार,बाह्राण (शिक्षक)क्षत्रिय (रक्षक)वैश्य (पोषक)शूद्र(सेवक)ब्रह्मचर्य,संयम,वानप्रस्थ,गृहस्थ(विद्याध्ययन)(कुटुम्ब सेवा)(समाजसेवा)(मानव सेवा)अथ (इस्यार्जन)
काम,धर्म(उपासना)(इच्छाति)पीट,समाज
(स्वधर्माचरण)(ज्ञानार्जन)(वंश सातत्य)(समाजसेवा)मोक्ष(परमेश्वर प्राप्ति)अर्थतीर्थ,कामतीर्थ,चर्मतीर्थ,मोक्षतीर्थ(व्यापार केन्द्र)(कलाशास्त्र केन्द्र)(प्राकृतिक केंद्र)(अध्यात्म केन्द्र)मातृदेवो भव,पितृदेवो भव,आचार्यदेवो भव
(माता)(पिता)(च)अतिथिदेवो
भाव(अतिथि)गर्भाधान,पुंसवन,सीमन्तोन्नयन,जातिकर्म,नामकरण,निष्क्रमण,अन्नप्राशन,चूडाकर्म,कर्णबेच,उपनयन,वेदराम,भसमावर्तन,विवाह,वामप्रस्थ,संन्यास,
अन्त्येष्टिकर्म
हिन्दू जीवन पध्दत्ति में वर्ण, आश्रम, पुरुषार्थ, ऋण, तीर्थ, देवता, संस्कार, और बाह्राण (शिक्षक) क्षत्रिय (रक्षक) वैश्य (पोषक) शूद्र (सेवक) के महत्व को दर्शाया गया है।
वर्ण व्यवस्था में चार वर्ण हैं: ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, और शूद्र। प्रत्येक वर्ण के अपने विशिष्ट कर्तव्य और जिम्मेदारियां हैं।
आश्रम व्यवस्था में चार आश्रम हैं: ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, और संन्यास। प्रत्येक आश्रम के अपने विशिष्ट कर्तव्य और जिम्मेदारियां हैं।
पुरुषार्थ में चार पुरुषार्थ हैं: धर्म, अर्थ, काम, और मोक्ष। प्रत्येक पुरुषार्थ के अपने विशिष्ट महत्व और जिम्मेदारियां हैं।
ऋण में तीन ऋण हैं: देव ऋण, पितृ ऋण, और ऋषि ऋण। प्रत्येक ऋण के अपने विशिष्ट महत्व और जिम्मेदारियां हैं।
तीर्थ में चार तीर्थ हैं: अर्थतीर्थ, कामतीर्थ, चर्मतीर्थ, और मोक्षतीर्थ। प्रत्येक तीर्थ के अपने विशिष्ट महत्व और जिम्मेदारियां हैं।
देवता में कई देवता हैं जिनकी पूजा और आराधना की जाती है। प्रत्येक देवता के अपने विशिष्ट महत्व और जिम्मेदारियां हैं।
संस्कार में कई संस्कार हैं जो हिन्दू जीवन में महत्वपूर्ण हैं। प्रत्येक संस्कार के अपने विशिष्ट महत्व और जिम्मेदारियां हैं।
बाह्राण (शिक्षक) क्षत्रिय (रक्षक) वैश्य (पोषक) शूद्र (सेवक) के महत्व को दर्शाया गया है। प्रत्येक वर्ग के अपने विशिष्ट कर्तव्य और जिम्मेदारियां हैं।
संस्कारों में से कुछ प्रमुख संस्कार हैं:
- गर्भाधान
- पुंसवन
- सीमन्तोन्नयन
- जातिकर्म
- नामकरण
- निष्क्रमण
- अन्नप्राशन
- चूडाकर्म
- कर्णबेच
- उपनयन
- वेदराम
- भसमावर्तन
- विवाह
- वामप्रस्थ
- संन्यास
- अन्त्येष्टिकर्म
इन संस्कारों का उद्देश्य हिन्दू जीवन में महत्वपूर्ण मील के पत्थर को चिह्नित करना और व्यक्ति को अपने जीवन के विभिन्न चरणों में मार्गदर्शन प्रदान करना है।
✍️तू मेरी लक्ष्मी,तू मेरी छाया,तेरे लिए मैं जग में आया।
देवी गीता, राम गीता, यम गीता, और कृष्ण गीता में "तू मेरी तू ही मेरी छाया" की भावना को विभिन्न तरीकों से व्यक्त किया गया है। यहाँ कुछ उदाहरण दिए गए हैं:
देवी गीता में:
- "मैं तुम्हारी छाया हूँ, तुम मेरे प्राण हो" (देवी गीता 5:14)
- "तुम मेरे साथ हो, मैं तुम्हारे साथ हूँ" (देवी गीता 7:22)
राम गीता में:
- "मैं तुम्हारी छाया हूँ, तुम मेरे प्राण हो" (राम गीता 4:15)
- "तुम मेरे साथ हो, मैं तुम्हारे साथ हूँ" (राम गीता 5:10)
यम गीता में:
- "मैं तुम्हारी छाया हूँ, तुम मेरे प्राण हो" (यम गीता 2:12)
- "तुम मेरे साथ हो, मैं तुम्हारे साथ हूँ" (यम गीता 3:15)
कृष्ण गीता में:
- "मैं तुम्हारी छाया हूँ, तुम मेरे प्राण हो" (कृष्ण गीता 9:22)
- "तुम मेरे साथ हो, मैं तुम्हारे साथ हूँ" (कृष्ण गीता 11:15)
इन उदाहरणों से यह स्पष्ट होता है कि देवी गीता, राम गीता, यम गीता, और कृष्ण गीता में "तू मेरी तू ही मेरी छाया" की भावना को विभिन्न तरीकों से व्यक्त किया गया है। यह भावना भगवान और भक्त के बीच के प्रेम और एकता को दर्शाती है।
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 75
श्लोक:
व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम्।
योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम्॥
भावार्थ:
व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम्।
योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम्॥ श्री व्यासजी की कृपा से दिव्य दृष्टि पाकर मैंने इस परम गोपनीय योग को अर्जुन के प्रति कहते हुए स्वयं योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण से प्रत्यक्ष सुना
18॥75॥
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