बुधवार, 4 दिसंबर 2024

अध्याय 11



अर्जुन की भक्ति को बढ़ाने और उसे बढ़ाने के लिए श्री कृष्ण ने पिछले अध्याय में अपनी दिव्य विभूतियों का वर्णन किया था । अंत में उन्होंने कहा था कि सारी सुंदरता, महिमा और शक्ति उनके अपार तेज की एक चिंगारी मात्र है। यह सुनकर अर्जुन उत्सुक हो गया।

इस अध्याय में, वह भगवान से अपने विश्वरूप , या अनंत ब्रह्मांडीय रूप के दर्शन कराने का अनुरोध करते हैं। श्रीकृष्ण अर्जुन को अपने अनंत रूप को देखने के लिए दिव्य दृष्टि प्रदान करते हैं, जिसमें सभी ब्रह्मांड शामिल हैं। अर्जुन देवों के देव के शरीर में संपूर्ण सृष्टि को देखता है, जिसमें असीमित भुजाएं, मुख और उदर हैं। इसका न तो कोई आदि है, न ही अंत और यह सभी दिशाओं में अथाह रूप से फैला हुआ है। उनकी चमक आकाश में एक साथ चमकते हुए हजारों सूर्यों के समान है। यह दृश्य अर्जुन को चकाचौंध कर देता है और उसके रोंगटे खड़े हो जाते हैं। वह तीनों लोकों को भगवान के नियमों के भय से कांपते हुए और स्वर्ग के देवताओं को उनकी शरण में जाते हुए देखता है। वह कई ऋषियों को प्रार्थना करते और भगवान की स्तुति करते हुए भजन गाते हुए देख सकता है। तब अर्जुन कौरवों को अपने सहयोगियों के साथ इस विकट रूप के मुख में भागते हुए देखता है, जो भस्म होने के लिए अग्नि की ओर तीव्र गति से भागते हुए पतंगों के समान दिखते हैं।

इस विश्वरूप को देखकर अर्जुन ने स्वीकार किया कि उसका हृदय और मन भय से अस्थिर है। यद्यपि इस रूप से भयभीत होकर अर्जुन भगवान के इस अद्भुत रूप की पहचान जानना चाहता है, जिसका उसके गुरु और मित्र श्री कृष्ण से कोई संबंध नहीं है। भगवान ने घोषणा की कि काल के रूप में वे तीनों लोकों के संहारक हैं। उन्होंने कौरव योद्धाओं का विनाश कर दिया है और पांडवों की जीत निश्चित है। इसलिए अर्जुन को अब और भयभीत नहीं होना चाहिए। उसे बस उठकर युद्ध करना चाहिए।

अभिभूत होकर अर्जुन भगवान की स्तुति करने लगता है, जो अपने अनंत रूपों में पूरे ब्रह्मांड में व्याप्त हैं और उनके भव्य रूप को अनेक बार नमस्कार करता है। वह श्री कृष्ण से किसी भी प्रकार के अपराध या अनादर के लिए क्षमा भी मांगता है, जो उसने अज्ञानता में उन्हें मात्र मनुष्य समझकर किया हो। इसके बाद अर्जुन भगवान से उनकी कृपा की याचना करता है और उनसे एक मनभावन रूप धारण करने का अनुरोध करता है।

इसके बाद श्री कृष्ण अपने चतुर्भुज रूप में प्रकट होते हैं, प्रत्येक भुजा में गदा, चक्र, शंख और कमल का फूल धारण करते हैं। इसके तुरंत बाद, वे अपने सौम्य और प्रेममय दो भुजाओं वाले आकर्षक श्री कृष्ण रूप में प्रकट होते हैं। फिर वे अर्जुन से कहते हैं कि उनसे पहले, किसी ने भी भगवान को इस आदिम ब्रह्मांडीय रूप में नहीं देखा है। यहाँ तक कि जो लोग वेदों का अध्ययन करते हैं, कठोर तपस्या, दान या अग्निहोत्र आदि करते हैं, उन्हें भी यह अवसर नहीं मिलता है। केवल अर्जुन के समान अनन्य भक्ति से ही कोई भगवान को देख सकता है, उन्हें जान सकता है और उनसे योग या मिलन प्राप्त कर सकता है।

भगवद गीता 11.1देखना "
अर्जुन ने कहा: आपने मुझ पर दया करके जो परम गोपनीय आध्यात्मिक ज्ञान प्रकट किया है, उसे सुनकर अब मेरा मोह दूर हो गया है।
गीता अध्याय 11
इसमें 55 श्लोक है
*❖════❃≛⃝❈⬤🪷*आध्यात्म ज्ञान के लिए दो ही सूत्र होते हैं*
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*❖════❃≛⃝❈⬤🪷*आध्यात्म ज्ञान के लिए दो ही सूत्र होते हैं*
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*(1) शास्त्र आज्ञा*
*(2) शास्त्र निषिद्ध आज्ञा*
*विज्ञान के ज्ञान लिए*
 *वैज्ञानिक विधि है जिस में ज्ञान ही महत्व पूर्ण है*

जिसका उपयोग विभिन्न प्रकार के पदार्थों के गुणों और विशेषताओं का अध्ययन करने के लिए किया जाता है। 

*यह विधि विशेष रूप से पदार्थों के रासायनिक और भौतिक गुणों का अध्ययन करने के लिए उपयुक्त है। पर इसी आधार में आध्यात्म भी आता है*

इस के विवेचन के मुख्य चरण निम्नलिखित हैं:
1. *नमूना तैयारी*:
2. *विश्लेषण*:
3. *डेटा विश्लेषण*:
4.*चौथा चरण* अलग अलग जगह प्रयोग करना 
1. *नमूना तैयारी*: पदार्थ का नमूना तैयार किया जाता है और उसे विश्लेषण के लिए तैयार किया जाता है।
2. *विश्लेषण*: नमूने का विश्लेषण विभिन्न प्रकार के उपकरणों और तकनीकों का उपयोग करके किया जाता है, जैसे कि एक्स-रे फ्लोरोसेंस, इन्फ्रारेड स्पेक्ट्रोस्कोपी, और न्यूक्लियर मैग्नेटिक रेजोनेंस।
3. *डेटा विश्लेषण*: विश्लेषण के परिणामों का विश्लेषण किया जाता है और पदार्थ के गुणों और विशेषताओं के बारे में निष्कर्ष निकाले जाते हैं।

4. *चौथे चरण में* विस्तृत विवेचन के लाभ जो निम्नलिखित हैं:

1. *विस्तृत जानकारी*: यह विधि पदार्थों के गुणों और विशेषताओं के बारे में विस्तृत जानकारी प्रदान करती है।
2. *उच्च सटीकता*: एलामिक विस्तृत विवेचन के परिणाम उच्च सटीकता के साथ प्राप्त किए जा सकते हैं।
3. *विभिन्न पदार्थों का अध्ययन*: यह विधि विभिन्न प्रकार के पदार्थों के अध्ययन के लिए उपयुक्त है, जैसे कि धातुएं, प्लास्टिक, और जैविक पदार्थ।

*वैज्ञानिक विस्तृत विवेचन के अनुप्रयोग निम्नलिखित हैं:*

1. *वैज्ञानिक अनुसंधान*: यह विधि वैज्ञानिक अनुसंधान में पदार्थों के गुणों और विशेषताओं का अध्ययन करने के लिए उपयुक्त है।
2. *उद्योग*: वैज्ञानिक विस्तृत विवेचन का उपयोग उद्योग में पदार्थों के गुणों और विशेषताओं का अध्ययन करने के लिए किया जाता है।
3. *चिकित्सा*: यह विधि चिकित्सा में जैविक पदार्थों के गुणों और विशेषताओं का अध्ययन करने के लिए उपयुक्त है।

*परीक्षा*

*इस में आध्यात्म की बात हो या किसी और की*

 *परीक्षा एक प्रकार की प्रोफेशनल परीक्षा है जो कि*

 *सभी के लिए आयोजित की जा सकती है। यह परीक्षा उन व्यक्तियों के लिए है जो कि आध्यात्म,रसायन, विज्ञान, भौतिक, विज्ञान, गणित, और इंजीनियरिंग, जैसे क्षेत्रों में अपना करियर बनाना चाहते हों।*

 *निम्नलिखित विषयों पर ही प्रश्न पूछे जाते हैं:*

*1. रसायन विज्ञान*
*2. भौतिक विज्ञान*
*3. गणित*
*4. इंजीनियरिंग*
*5. विज्ञान और प्रौद्योगिकी*
*6.आध्यात्म ज्ञान को विज्ञान से जोड़ कर* *(इस में प्रत्यक्ष ज्ञान और कुछ मुहावरे कुछ वेद पुराण के कहे वचन समलित होते है)*
*परीक्षा का प्रारूप आमतौर पर मौखिक, लिखित परीक्षा के रूप में हो सकता है,*
*जिसमें प्रश्नों का उत्तर देने के लिए उम्मीदवारों को एक निश्चित समय सीमा भी दी जा सकती है।*

*इस परीक्षा को पास करने से उम्मीदवारों को निम्नलिखित लाभ मिल सकते हैं:*

*1. किसी कंपनी में नौकरी के अवसर*
*2. अन्य कंपनियों में नौकरी के अवसर*
*3. विश्वविद्यालयों और अनुसंधान संस्थानों में अध्ययन और अनुसंधान के अवसर*
*4. प्रोफेशनल सर्टिफिकेशन और मान्यता*

यह परीक्षा उन व्यक्तियों के लिए उपयुक्त है जो कि विज्ञान और ज्ञान के प्रौद्योगिकी क्षेत्र में अपना करियर बनाना चाहते हो। और अपनी पसंद  कंपनी उद्योग में नौकरी करने के इच्छुक हैं।
या अपनी प्रगति को प्राप्त करने के इच्छुक है।

अगर कोई आध्यात्म द्वारा अपनी और समाज की प्रगति करना चाहे तो उसे निम्न अध्ययन की आवश्यकता होगी

आध्यात्म में मनुष्य अपनी और अपने समाज की प्रगति के लिए निम्नलिखित विषयों का अध्ययन कर सकता है:

*1. आत्म-ज्ञान:* आत्म-ज्ञान का अर्थ है अपने आप को समझना और अपनी आत्मा की प्रकृति को समझना।

*2. ध्यान और योग:* ध्यान और योग आध्यात्मिक प्रगति के लिए महत्वपूर्ण हैं। ये विषय मनुष्य को अपने मन और शरीर को नियंत्रित करने में मदद करते हैं।

*1. नैतिकता और सदाचार:*
 नैतिकता और सदाचार आध्यात्मिक प्रगति के लिए आवश्यक हैं। ये विषय मनुष्य को अपने जीवन में उचित निर्णय लेने में मदद करते हैं।

*2. आध्यात्मिक ग्रंथ:*
 आध्यात्मिक ग्रंथ, जैसे कि उपनिषद, भगवद गीता, और वेद, आध्यात्मिक प्रगति के लिए महत्वपूर्ण हैं। ये ग्रंथ मनुष्य को आध्यात्मिक ज्ञान और समझ प्रदान करते हैं।

1. *सामाजिक सेवा:*
2.  सामाजिक सेवा आध्यात्मिक प्रगति के लिए आवश्यक है। ये विषय मनुष्य को अपने समाज में योगदान करने और दूसरों की मदद करने में मदद करते हैं।

इन विषयों का अध्ययन करके, मनुष्य अपनी और अपने समाज की प्रगति के लिए आवश्यक ज्ञान और समझ प्राप्त कर सकता है।

फिर उसे किसी डिग्री ,या उपाधि की भी जरूरत नहीं होती। वो अपने ज्ञान ,कर्म ,भगति , द्वारा ही पूर्ण हो सकता है।

अब उसे और कुछ करने आवश्यकता ही नहीं होती है।

*ऐसे व्यक्ति को और क्या करने की आवश्यकता हो सकती है, यह निम्नलिखित हो सकते हैं:*

1. *आत्म-निरीक्षण और आत्म-मूल्यांकन*: वह अपने जीवन और अपने कर्मों का निरीक्षण और मूल्यांकन करता रहे, ताकि वह अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए निरंतर प्रयास कर सके।

2. *दूसरों की सेवा और सहायता*: वह दूसरों की सेवा और सहायता करने के लिए प्रयास करे, ताकि वह अपने समाज में योगदान कर सके और दूसरों की जिंदगी में सकारात्मक परिवर्तन ला सके।

3. *आध्यात्मिक ज्ञान का प्रसार*: वह आध्यात्मिक ज्ञान का प्रसार करने के लिए प्रयास करे, ताकि वह दूसरों को भी आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने में मदद कर सके।

4. *आत्म-शांति और आत्म-तृप्ति*: वह आत्म-शांति और आत्म-तृप्ति की दिशा में निरंतर प्रयास करे, ताकि वह अपने जीवन में सच्ची शांति और तृप्ति प्राप्त कर सके।

5.*बार बार अभ्यास* बार-बार अभ्यास करने से व्यक्ति को निम्नलिखित लाभ हो सकते हैं:

*1. _ज्ञान की गहराई_:*

 बार-बार अभ्यास करने से व्यक्ति को अपने ज्ञान की गहराई में जाने का अवसर मिलता है।
*2. _कौशल की वृद्धि_:*
 अभ्यास करने से व्यक्ति के कौशल में वृद्धि होती है और वह अपने कार्यों को अधिक कुशलता से कर सकता है।
*3. _आत्म-विश्वास की वृद्धि_:*

 बार-बार अभ्यास करने से व्यक्ति का आत्म-विश्वास बढ़ता है और वह अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए अधिक आत्मविश्वासी होता है।
*4. _आध्यात्मिक विकास_:*
 *अभ्यास करने से व्यक्ति का आध्यात्मिक विकास होता है और वह अपने जीवन में अधिक शांति और तृप्ति प्राप्त कर सकता है।*
*❖════❃≛⃝❈⬤🪷
*अब यह स्पष्ट होता है कि आध्यात्मिक ज्ञान और वैज्ञानिक ज्ञान दोनों ही महत्वपूर्ण हैं और एक दूसरे के पूरक हैं।*

*आध्यात्मिक ज्ञान हमें अपने आप को समझने, अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने, और अपने जीवन में शांति और तृप्ति प्राप्त करने में मदद करता है। जबकि वैज्ञानिक ज्ञान हमें प्राकृतिक जगत को समझने, के नए आयाम स्पष्ट करता है। कि आध्यात्मिक ज्ञान और वैज्ञानिक ज्ञान दोनों ही एक दूसरे के बिना अधूरे हैं। आध्यात्मिक ज्ञान के बिना, वैज्ञानिक ज्ञान हमें पूरी तरह से संतुष्ट नहीं कर सकता है, जबकि वैज्ञानिक ज्ञान के बिना, आध्यात्मिक ज्ञान हमें पूरी तरह से समझने में मदद नहीं कर सकता है।*

*इसलिए, यह महत्वपूर्ण है कि हम आध्यात्मिक ज्ञान और वैज्ञानिक ज्ञान दोनों को एक साथ मिलाकर अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए प्रयास करें।*

*इस आधार पर ही अपनी खोज का निर्णय खुद ही करें*

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अध्याय 11 भगवद गीता का एक महत्वपूर्ण अध्याय है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को अपनी विश्वरूप दर्शन की शक्ति का प्रदर्शन किया है।

इस अध्याय में, भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को अपने विश्वरूप का दर्शन कराते हैं, जिसमें वह अपने सभी रूपों और शक्तियों का प्रदर्शन करते हैं। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि वह अपने विश्वरूप में सभी जीवों और पदार्थों को देख सकते हैं, और वह अपनी शक्ति से सभी को नियंत्रित कर सकते हैं।

अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण के विश्वरूप को देखकर अत्यधिक आश्चर्यचकित और भयभीत हो जाता है। वह भगवान श्रीकृष्ण से कहता है कि वह उसके विश्वरूप को नहीं देख सकता है, और वह उसकी शक्ति के सामने नतमस्तक हो जाता है।

इस अध्याय का मुख्य संदेश यह है कि भगवान की शक्ति और महिमा को हमारी सीमित बुद्धि से नहीं समझा जा सकता है। हमें भगवान की शक्ति और महिमा के सामने नतमस्तक होना चाहिए, और हमें उसकी इच्छा के अनुसार जीना चाहिए।

इस अध्याय के माध्यम से, भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को और हमें यह समझाने की कोशिश करते हैं कि भगवान की शक्ति और महिमा को हमारी सीमित बुद्धि से नहीं समझा जा सकता है, और हमें उसकी इच्छा के अनुसार जीना चाहिए।

भगवद  गीता अध्याय: 11
श्लोक 1

श्लोक:
( विश्वरूप के दर्शन हेतु अर्जुन की प्रार्थना ) 
 अर्जुन उवाच
 मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसञ्ज्ञितम्‌।
 यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम॥

भावार्थ:
अर्जुन बोले- मुझ पर अनुग्रह करने के लिए आपने जो परम गोपनीय अध्यात्म विषयक वचन अर्थात उपदेश कहा, उससे मेरा यह अज्ञान नष्ट हो गया है
 11॥1॥पूर्व अध्याय में वर्णित भगवान की विभूतियों के बारे में पता चला कि वे अपने परम सन्तोष को क्या कहते हैं?

 अर्जुन इस्टास्टिक श्लोक में व्यक्त करता है?
👉आपका प्रश्न भगवद गीता के संदर्भ में है, जहां अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण से अपने संदेहों और मोह के बारे में पूछता है।

भगवद गीता में अर्जुन के प्रश्नों का उत्तर देते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने अपने ज्ञान और अनुभव को साझा किया है। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समझाया है कि कैसे वह अपने मोह और संदेहों से मुक्त हो सकता है और भगवान की शरण में जा सकता है।

भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समझाने के लिए कई उदाहरण और श्लोकों का उपयोग किया है। इनमें से एक प्रसिद्ध श्लोक है जिसे "इस्टास्टिक श्लोक" कहा जाता है:

"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि।"

(भगवद गीता, अध्याय 2, श्लोक 47)

इस श्लोक का अर्थ है कि हमें अपने कर्मों पर ध्यान देना चाहिए, न कि उनके परिणामों पर। हमें अपने कर्मों को भगवान की शरण में समर्पित करना चाहिए और उनके परिणामों को भगवान पर छोड़ देना चाहिए।

इस प्रकार, भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समझाया है कि कैसे वह अपने मोह और संदेहों से मुक्त हो सकता है और भगवान की शरण में जा सकता है।👈

अपने शिष्य पर केवल अनुग्रह करने और उसे मोह दशा से बाहर निकालने के लिए भगवान ने कितना अधिक परिश्रम किया। अर्जुन भी उनकी सराहना करते हैं। अनेकता में एकता का दर्शन करने का अर्थ दुनिया के दुख से सुरक्षित रहने के लिए रोग टीका टिप्पणी लगाई गई है। 

अर्जुन की इस स्वीकृति से कि मेरा मोह दूर हो गया है।व्यासजी एक उत्तम स्कूल पर प्रस्तुति वाले पूर्व अध्याय के प्रभाव को बड़ी सुंदरता से हमारे ध्यान में रखा गया है।
*मोह निवृत्ति?*
👉मोह निवृत्ति एक आध्यात्मिक अवधारणा है जिसका अर्थ है मोह या माया से मुक्ति प्राप्त करना। 
मोह या माया से तात्पर्य है हमारे मन और बुद्धि पर लगने वाले भौतिक और मानसिक आकर्षणों से, जो हमें अपने असली स्वरूप से दूर ले जाते हैं।

मोह निवृत्ति का अर्थ है इन आकर्षणों से मुक्त होना और अपने असली स्वरूप को समझना। यह एक आध्यात्मिक प्रक्रिया है जिसमें हम अपने मन और बुद्धि को शुद्ध करने के लिए प्रयास करते हैं और अपने असली स्वरूप को समझने के लिए प्रयास करते हैं।

मोह निवृत्ति के लिए कई आध्यात्मिक प्रथाएं और तकनीकें हैं, जिनमें से कुछ प्रमुख हैं:

1. ध्यान और आत्म-निरीक्षण
2. योग और प्राणायाम
3. आध्यात्मिक अध्ययन और स्वाध्याय
4. सेवा और परोपकार
5. आत्म-नियंत्रण और आत्म-विश्वास

इन प्रथाओं और तकनीकों के माध्यम से, हम सभी अपने मन और बुद्धि को शुद्ध करने के लिए प्रयास कर सकते हैं और अपने असली स्वरूप को समझने के लिए प्रयास कर सकते हैं।👈
 
सत्य के ज्ञान का एक पक्ष क्या है?

 न कि वह आपके अंदर ज्ञान की प्राप्ति है। अर्जुन अज्ञानता के कारण नाम रूपमयता इस सृष्टि में अपना अलग और स्वतंत्रता अनुभव अनुभव कर रही थी। वह अब इस भेद के मोह से मुक्त हो चुका था। उसे वह दृष्टि मिल गई जिसके द्वारा वह इस भेदात्मक दृश्य जगत में ही व्याप्त एक सत्ता को पाने में समर्थ हो जाता है। परन्तु फिर भी उसने अनेकता में एकता का प्रत्यक्ष दर्शन नहीं किया। वास्तविक सिद्धांत यह है कि उन्हें एकत्व का ज्ञान मंदिर था। राजपुत्र अर्जुन यह भलीभांति बताते हैं कि श्रीकृष्ण ने विभूतियोग का इतना विस्तृत वर्णन केवल उनकी ऊपरी कृपा के लिए ही किया था। यह बात हमें याद दिलाती है कि किस प्रकार के भगवान अपने भक्तों के हृदय में स्थित होकर उनके अज्ञानी अंधकार को नष्ट कर देते हैं। 
सत्य के ज्ञान का एक महत्वपूर्ण पक्ष है आत्म-ज्ञान या आत्म-साक्षरता। आत्म-ज्ञान का अर्थ है अपने आप को समझना, अपनी आत्मा की प्रकृति को समझना, और अपने जीवन के उद्देश्य को समझना।

आत्म-ज्ञान के माध्यम से, हम अपने विचारों, भावनाओं, और कार्यों को समझने के लिए प्रयास करते हैं। हम अपने जीवन में क्या सही है और क्या गलत है, इसके बारे में समझने के लिए प्रयास करते हैं।

आत्म-ज्ञान के कुछ महत्वपूर्ण पहलू हैं:

1. आत्म-निरीक्षण: अपने विचारों, भावनाओं, और कार्यों को समझने के लिए।
2. आत्म-मूल्यांकन: अपने जीवन में क्या सही है और क्या गलत है, इसके बारे में समझने के लिए।
3. आत्म-नियंत्रण: अपने विचारों, भावनाओं, और कार्यों को नियंत्रित करने के लिए।
4. आत्म-विश्वास: अपने आप पर विश्वास करने और अपने जीवन के उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए।

आत्म-ज्ञान के माध्यम से, हम अपने जीवन में अधिक संतुष्टि, शांति, और आनंद प्राप्त कर सकते हैं।
ये अध्यात्मविषयक वचन थे  अब अर्जुन ने क्या कहा है?
भगवद  गीता अध्याय: 11
श्लोक 2

श्लोक:
भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया।
 त्वतः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम्‌॥

भावार्थ:
क्योंकि हे कमलनेत्र! मैंने आपसे भूतों की उत्पत्ति और प्रलय विस्तारपूर्वक सुने हैं तथा आपकी अविनाशी महिमा भी सुनी है
 ॥2॥

गुरु और शिष्य के आपसी संवाद में यह स्वाभाविक है कि किसी कठिन विषय की समाप्ति पर शिष्य के मन में कुछ संदेह या प्रश्न उठते हैं। 

उस विश्वास की निवृत्ति के लिए वह गुरु के पास जा सकता है? 

लेकिन प्रश्न करने से पहले उसे यह सिद्ध करना होगा कि उसने विषय को स्पष्ट रूप से समझा भी है या नहीं। 
फिर उसे अपनी नवीनता का समाधान करने का अधिकार प्राप्त हो जाता है। 

इस पारम्परिक विधि का उद्घोष करते हुए अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण को यह बताने का प्रयास करते है ,कि वह पूर्व अध्याय के विषय को समझ गए हैं। उन्होंने भूतों की उत्पत्ति और प्रलय तथा भगवान की अंतर्निहित विभूतियों के श्रवण से यह समझा है।
फिर भी एक संदेह रह ही जाता है? 
जिसका ज्ञान तब होगा जब प्रत्यक्ष दर्शन से उसकी बुद्धि को तत्व का प्रमाणिक हो जाएगा। यह श्लोक विश्वरूप दर्शन की इच्छा को प्रगट करने की पूर्व तैयारी है। जब शिष्य अपनी योग्यता सिद्ध करने के लिए कोई युक्तिसंगत प्रश्न पूछता है या किसी विघ्न की निवृत्ति का उपाय जानना चाहता है। तो गुरु को उसकी सभी संभावित सहायता करनी चाहिए। हमने देखा कि योगेश्वर श्रीकृष्ण यहां अपने वयोवृद्ध को भी त्याग कर केवल कोटा अनुकंपाशात् अर्जुन को अपने विराट रूप में बुलाते हैं। केवल इसलिए कि उनके शिष्य ने उनसे देखने का आग्रह किया था। अर्जुन अपनी इच्छा से अगले श्लोक में बात करते हैं।
भगवद  गीता अध्याय: 11
श्लोक 3

श्लोक:
एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर।
 द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम॥

भावार्थ:
हे परमेश्वर! आप अपने को जैसा कहते हैं, यह ठीक ऐसा ही है, परन्तु हे पुरुषोत्तम! आपके ज्ञान, ऐश्वर्य, शक्ति, बल, वीर्य और तेज से युक्त ऐश्वर्य-रूप को मैं प्रत्यक्ष देखना चाहता हूँ
 ॥3॥
संस्कृत से वाक्प्रचारमे एवतत् (यह ठीक है ऐसा ही है) के द्वारा अर्जुन तत्त्वज्ञान के सैद्धान्तिक पक्ष को स्वीकार किया जाता है। संपूर्ण नाम और सिद्धांत में ईश्वर की व्यापकता की उपलब्धि बुज़ुर्ग दृष्टि से नोबेल थी। फिर भी बुद्धि को अभी भी प्रत्यक्षता की प्रतीक्षा थी। इसलिए अर्जुन कहता है कि? 

मैं आपके ईश्वरीय रूप को देखना चाहता हूँ। हमारे शास्त्रों में ईश्वर का वर्णन इस प्रकार किया गया है कि वह ज्ञान क्या है? ऐश्वर्य? शक्ति? बल? वीर्य और तेज में छः गुणधर्म 
👉आपके प्रश्न में उल्लिखित छः गुणधर्म भगवद गीता में वर्णित हैं और इन्हें "ऐश्वर्य" या "भगवान के गुण" कहा जाता है। ये छः गुणधर्म हैं:

1. *ऐश्वर्य* (ऐश्वर्य): यह भगवान की सर्वोच्चता और संपूर्णता का प्रतीक है। ऐश्वर्य से तात्पर्य है भगवान की वह शक्ति जो समस्त सृष्टि को नियंत्रित करती है।

2. *वीर्य* (वीर्य): यह भगवान की शक्ति और सामर्थ्य का प्रतीक है। वीर्य से तात्पर्य है भगवान की वह शक्ति जो समस्त सृष्टि को बनाए रखने और संचालित करने में सक्षम है।

3. *यशः* (यश): यह भगवान की महिमा और प्रसिद्धि का प्रतीक है। यशः से तात्पर्य है भगवान की वह महिमा जो समस्त सृष्टि में प्रसिद्ध है।

4. *श्रीः* (श्री): यह भगवान की सौंदर्य और समृद्धि का प्रतीक है। श्रीः से तात्पर्य है भगवान की वह सौंदर्य और समृद्धि जो समस्त सृष्टि में व्याप्त है।

5. *ज्ञान* (ज्ञान): यह भगवान की ज्ञान और बुद्धि का प्रतीक है। ज्ञान से तात्पर्य है भगवान की वह ज्ञान और बुद्धि जो समस्त सृष्टि को बनाए रखने और संचालित करने में सक्षम है।

6. *वैराग्य* (वैराग्य): यह भगवान की वैराग्य और निर्लेपता का प्रतीक है। वैराग्य से तात्पर्य है भगवान की वह वैराग्य और निर्लेपता जो समस्त सृष्टि से ऊपर है।

इन छः गुणधर्मों का संयोजन भगवान की सर्वोच्चता और संपूर्णता का प्रतीक है। ये गुणधर्म भगवान की वह शक्ति और सामर्थ्य को दर्शाते हैं जो समस्त सृष्टि को बनाए रखने और संचालित करने में सक्षम है।👈
से ही भगवान के दर्शन भी होते हैं। 

इस अवसर पर भगवान ने अर्जुन को दर्शन देने का निश्चय किया कि वे न केवल समस्त व्यष्टि शास्त्रों में वर्ण हैं, वे समष्टिरूपी पात्र हैं।
जिसमें सभी का नाम और सिद्धांत का अनुभव शामिल है। भगवान सर्वव्यापक के साथ ही सर्वातीत भी हैं। यद्यपि कट्टर बुद्धिवाद के अत्य्युत्साह में ज्ञान अर्जुन ने विश्वरूप के दर्शन अपनी मांग भगवान के साथ रखे उसे बंद कर दिया गया यह भाना हुआ कि उसकी यह धृष्टता है और उसने सद्व्यवहार के निषेध का उल्लंघन किया है। अगले श्लोक में वह अधिक नम्रता से कहा गया है।

भगवद  गीता अध्याय: 11
श्लोक 4

श्लोक:
मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो।
 योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम्‌॥

भावार्थ:
हे प्रभो! (उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय तथा अन्तर्यामी रूप से शासन करने वाला होने से भगवान का नाम 'प्रभु' है) यदि मेरे द्वारा आपका वह रूप देखा जाना शक्य है- ऐसा आप मानते हैं, तो हे योगेश्वर! उस अविनाशी स्वरूप का मुझे दर्शन कराइए
 11॥4॥

पूर्व श्लोक में वाणी की दी गई इच्छा को यहां पूर्ण नम्रता एवं सम्मान के साथ जोड़ा गया है। अपने सामान्य सामान्य जीवन में भी हम सम्मानपूर्वक प्रार्थना या नम्र भोजन करते समय इस प्रकार की भाषा का प्रयोग करते हैं
 जैसे अगर मुझे कुछ कहना की धीरे से कहा जाए? मुझ पर बड़ी कृपा होगी? 
सम्मिलित करें प्रस्तुतिकरण का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। पाण्डव राजपुत्र अर्जुन? मांनो इस तीर्थयात्रियों के संस्थापक पूर्व अपने सैनिकों को त्यागकर नम्र भाव से आमंत्रित करता है कि यदि आप मेरे लिए उपयुक्त हैं? तो अपने अव्यय रूप का मेरे को दर्शन कराइये। यहाँ बतायी गयी नम्रता एवं सम्मान किसी निम्न स्तर की इच्छा को पूर्ण करने के लिए हँसी-मज़ाक का प्रदर्शन नहीं है। भगवान को बनाए गए विशेषणों से ही यह बात स्पष्ट हो जाती है। प्रथम पंक्ति में अर्जुन भगवान को प्रभो अभिषेक और फिर योगेश्वर के नाम से मशहूर है। 
तो अब यह बात कही जा सकती है कि अर्जुन को अब यह विश्वास हो गया था कि श्रीकृष्ण केवल कोई मनुष्य नहीं हैं? 
जो आपके शिष्यों को प्रतिभाशाली संतोष या आध्यात्मिक प्रवचन देने में ही सक्षम हैं। उसने समझा कि श्रीकृष्ण तो स्वयं प्रभु अर्थात् परमात्मा और योगेश्वर हैं। इसलिए यदि वे यह कहते हैं कि उनके शिष्य अर्जुन विराट के दर्शन कैसे करे तो क्या उसकी इच्छा पूर्ण करने में सर्वथा समर्थ है तो वह कभी भी गुरु के द्वारा अनुसुना नहीं किया जारहा है।

भगवद  गीता अध्याय: 11
श्लोक 5

श्लोक:
(भगवान द्वारा अपने विश्व रूप का वर्णन ) 
 श्रीभगवानुवाच 
 पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः।
 नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च॥

भावार्थ:
श्री भगवान बोले- हे पार्थ! अब तू मेरे सैकड़ों-हजारों नाना प्रकार के और नाना वर्ण तथा नाना आकृतिवाले अलौकिक रूपों को देख
 ॥5॥
अर्जुन से इस प्रकार प्रेरित होकर श्रीभगवान् बोले --,
 हे पार्थ तू मेरे सैकड़ों हजारो अर्थात् अनेकों सिद्धांतों को देख जो कि नाना प्रकार के भेदवाले और दिव्य अर्थात देवलोक में होने वाले हैं -- अलौकिक हैं और नाना प्रकार के भेदवाले और दिव्य अर्थात् देवलोक में होनेवाले हैं पीत आदि नाना प्रकार के वर्ण और अनेक आकार वाले अवायव हैं अब ऐसे सिद्धांतो को भी देखो।

यदि समग्र आभूषण का मूल तत्व स्वर्ण है? 
तो विश्व का प्रत्येक आभूषण समष्टि स्वर्ण में उपलब्ध होना चाहिए। आभूषण में स्वर्ण को देखना कितना सरल होता है, क्योंकि वह इन्द्रियों के द्वारा जाने जाना वाला दर्शन होता है अर्थात वह इन्द्रियगोचर है। लेकिन नाना प्रकार और वर्णों के संपूर्ण आभूषणों को समष्टि स्वर्ण में देखना अधिक कठिन है? 
क्योंकि वह बुद्धि द्वारा जाना जा सकने वाला दर्शन(अनुभव होता है) अर्थात बुद्धिगामी दर्शन है। इस बात का  ध्यान में रखते हुए भगवान के कथन को पढ़ने पर उनका अभिप्राय स्वतः ही स्पष्ट हो जाता है। मेरे शतश और सहस्रश नाना प्रकार के आकार और वर्णों के अलौकिक सिद्धांतों को देखें। 
भगवान श्रीकृष्ण को अपना विराट स्वरूप धारण करने की आवश्यकता नहीं थी क्योंकि अर्जुन को केवल इतना ही करना था कि वह अपने समरूप स्थित रूप को देखे। लेकिन दुर्भाग्य से दिव्य दर्शन के लिए दर्शन के उपकरण उसके पास नहीं थे और इस लिएअर्जुन उन सब को नहीं देख सके? जो भगवान श्रीकृष्ण के पहले से ही पूजनीय थे। दूर स्थित किसी भी नक्षत्र या अन्य वस्तु को देखने के लिए दूरबिन नामक यंत्र का उपयोग किया जाता है। परन्तु उस यंत्र की अक्षर रेखा पर वस्तु से वस्तु दिखाई नहीं देती। तब उसे देखने के लिए दूरदर्शिता यंत्र को शामिल करना क्या है?

 जिससे कि वह वस्तु सूक्ष्मदर्शी पर्यवेक्षक के दृष्टि में आ जाए। इसी प्रकार श्रीकृष्ण ने स्वयं को विराट रूप में परिवर्तित नहीं किया लेकिन अर्जुन को केवल आन्त्रिक समायोजन करने में सहायता प्रदान की है जिससे कि वह भगवान श्रीकृष्ण में प्रवचन विश्वरूप का अनुसरण कर सके। इसी लिये भगवान कहते हैं कि देखो। वे इस श्लोक में दर्शनीय वस्तुओं को समझाते हैं। अगले श्लोक में दिव्य रूप कौन से हैं।
भगवद  गीता अध्याय: 11
श्लोक 6

श्लोक:
पश्यादित्यान्वसून्रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा।
 बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत॥

भावार्थ:
हे भरतवंशी अर्जुन! तू मुझमें आदित्यों को अर्थात अदिति के द्वादश पुत्रों को देख,
अदिति के द्वादश पुत्रों को आदित्य कहा जाता है, और उनके नाम हैं:

1. वरुण
2. मित्र
3. अर्यमन
4. भग
5. धाता
6. विद्युत
7. शशांक (चंद्रमा)
8. सविता
9. पूषा
10. शक्र (इंद्र)
11. विवस्वान (सूर्य)
12. त्वष्टा

 आठ वसुओं को देख
आठ वसुओं के नाम हैं:

1. पृथ्वी
2. जल (वरुण)
3. अग्नि
4. वायु
5. आकाश
6. सूर्य (विवस्वान)
7. चंद्रमा (शशांक)
8. धर (धाता)

एकादश रुद्रों को देख

एकादश रुद्रों के नाम हैं:

1. कपाली
2. पिंगल
3. भीम
4. विरूपाक्ष
5. विलोहित
6. शास्ता
7. अजपाद
8. अहिर्बुध्न्य
9. शंभु
10. चंद्र
11. भव

दोनों अश्विनीकुमारों को देख
अश्विनीकुमारों के नाम हैं:

1. नासत्य
2. दास्र

  उनचास मरुद्गणों को देख
उनचास मरुद्गणों के नाम हैं:

1. अवस्था
2. ध्रुव
3. स्कन्द
4. विशाख
5. नैघ्रुण्ट
6. क्रोध
7. तिग्म
8. बल
9. परजान्य
10. क्षेम
11. धृति
12. सृत
13. वायु
14. वानिर
15. मातरिश्वा
16. रम्भ
17. ताम्र
18. मारुत
19. क्षय
20. विवित
21. वानिर
22. अर्जुन
23. हर
24. बहु
25. युज
26. सात्य
27. सत्य
28. वृष्टि
29. रोहित
30. तिग्म
31. प्रसन्न
32. विभावसु
33. उदग्र
34. क्षेम
35. देवप्राण
36. अनिल
37. अनल
38. सोम
39. मृदु
40. पिंगल
41. दाह
42. चित्र
43. स्वन
44. ध्वनि
45. वेगवान
46. वलाहक
47. प्रवण
48. निर्वाण
49. वायुवेग
 तथा और भी बहुत से पहले न देखे हुए आश्चर्यमय रूपों को भी देख।
 11॥6॥
भगवद  गीता अध्याय: 11
श्लोक

श्लोक:
इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम्‌।
 मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टमिच्छसि॥

भावार्थ:
हे अर्जुन! अब इस मेरे शरीर में एक जगह स्थित चराचर सहित सम्पूर्ण जगत को देख तथा और भी जो कुछ देखना चाहता हो सो देख
 ॥7॥ (गुडाकेश- निद्रा को जीतने वाला होने से अर्जुन का एक नाम 'गुडाकेश' हुआ था)
केवल इतना ही नहीं --, हे गुडाकेश अब तू मेरे इस शरीर में एक ही स्थान पर स्थित चराचर सहित सारे जगत को भी देख ले। तथा और भी कौन सा जय पराजय आदि दृश्य है जिसके लिए तुम हम सब जीतोगे या वे हमको इस प्रकार जीतेंगे वह सब या अन्य जो कुछ देखना चाहता है तो वो भी देख लो।

प्रथम तो भगवान उत्साही साधक के गंतव्य मन को इसके लिए अध्ययन करना चाहिए जिसमें शामिल होने की उत्सुकता रूपी अक्षय धन का विकास हो। उनकी कोशिश है कि यह उत्सुकता तीव्र उत्कंठा या जिज्ञासा में तब्दील हो जाए। इसके लिए वे विश्वरूप में दर्शनशास्त्रीय विद्वानों का उल्लेख करते हैं। इस युक्ति से साधक का मन पूर्ण उत्कटता से एक ही स्थान पर केन्द्रित हो जाता है। यही इस श्लोक का प्रस्ताव है। ध्यान दें इस श्लोक पर विचार करने से ज्ञात होगा कि यहां व्यासजी ने भक्तिशास्त्र में वर्णित भक्ति का आदर किया है। इहिकास्थम् का अर्थ यहां एक स्थान पर है। इन शब्दों के द्वारा श्रीकृष्ण संपूर्ण चराचर (जड़ चेतन) जगत को अपने शरीर में बांधते हैं। श्रीकृष्ण स्वयं इह शब्द को स्पष्ट करते हुए बोलते हैं
मेरे शरीर में। संपूर्ण चराचर सहित भौतिक जगत को श्रीकृष्ण की देहाकृति में स्थित किया गया था। जैसा कि हमने इस अध्याय के प्रस्तावना में देखा है कि अर्जुन के मन को देश की कल्पना को सर्वथा मुक्त नहीं किया गया था।एकमात्र भगवान श्रीकृष्ण के परिच्छिन्न देह के तुल्य समष्टि आकाश की कल्पना को उनके मन में शेष रखा गया था। इस मन के द्वारा जब अर्जुन दिखाई देता है तो भगवान के शरीर में ही संपूर्ण विश्व के बारे में उनके व्यापक विस्तार को दर्शाया गया है जो लघु रूप में प्रकट होता है। बुरा फिर भी अर्जुन का उत्साह बढ़ाने के लिए क्या कहते हैं? और भी जो कुछ तुम देखना चाहते हो उसे भी देखो। मानव के विशिष्ट स्वभाव के अनुसार अर्जुन का मन अपनी आकांक्षी जिज्ञासाओं से चिंतित था अति स्वाभाविक है कि उसकी उत्सुकता भविष्य की घटनाओं को देखने की थी।(अगर युद्ध में बीडीओ की हत्या करू तो ऐसा होगा वैसा होगा उनकी फैक्ट्री में उनकी प्रयासरत समस्या के समाधान को देखने के लिए और भी बहुत कुछ था और विभिन्नता में व्याप्त एकत्व साक्षात्कार के लिए कम.विभूतियोग के अध्याय में एक परमात्मा को सबमें दिखाया गया था और यहाँ सब को एक भगवान में दिखाया जाने वाला है।।

भगवद  गीता अध्याय: 11
श्लोक 8

श्लोक:
न तु मां शक्यसे द्रष्टमनेनैव स्वचक्षुषा।
 दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम्‌॥

भावार्थ:
परन्तु मुझको तू इन अपने प्राकृत नेत्रों द्वारा देखने में निःसंदेह समर्थ नहीं है, इसी से मैं तुझे दिव्य अर्थात अलौकिक चक्षु देता हूँ, इससे तू मेरी ईश्वरीय योग शक्ति को देख
 ॥8॥

 हे गुडाकेश ! आज (अभी) इस मेरे शरीर में एक स्थान पर स्थित चराचर सहित संपूर्ण जगत को देखें और भी जो कुछ आप देखना चाहते हैं, उसे भी देखें।।

जैसे किसी जगह श्रीमद्भगवद्गीता -- ऐसा लिखा है। अन्य वर्णमाला का ज्ञान नहीं है, जबकि अन्य में केवल काली-काली रूढ़ियाँ दिखती हैं। लेकिन जो लेख है और गीता का गहरा मन है, 'श्रीमद्भगवद्गीता' देखें - ऐसा लिखा हुआ दिखता है गीता अध्यायोंकी, श्लोकोंकी, भावों की सभी बातें दीखने लगती हैं। ऐसे ही अर्जुन को जब भगवान ने दिव्यचक्षु दिया, तब अलौकिक विश्वरूप और उनकी दिव्यता भी दीखने लगी, जो कि साधारण बुद्धि का विषय नहीं था। यह सब सारभूत भगवतप्रदत्त दिव्यचक्षुकि ही थी। अब यहां एक श्लोक मिलता है कि जब अर्जुनने चतुर्थ श्लोक में कहा था कि यदि मैं आपके विश्वरूप को देख सकता हूं तो आप अपने विश्वरूप को देख सकते हैं?, तब उसके उत्तर में भगवान्को ने यह अष्टवाँ श्लोक कहा है कि तू अपने इन चर्मचक्षुओं से मेरे विश्वरूप को नहीं देख सकता, इसलिए मैं तेरे को दिव्यचक्षु देता है। भगवान ने वहां ऐसा नहीं कहा, प्रत्युत् दिव्यचक्षु देने से पहले ही 'झील के बारबार देखने की आज्ञा दी। जब अर्जुन ने नहीं देखा, तब मुझे न देखने का कारण बताया गया और फिर दिव्यचक्षु ने अपनी जान दे दी। मूलतः इतनी झंझट भगवान की ही क्यों,

सहायक भगवान की कृपा का क्रमिक रूप से विस्तार होता है, यह भगवान की कृपा के लिए सुझाया गया है क्योंकि भगवान का स्वभाव ही ऐसा है। भगवान भगवान कृपालु हैं। उन कृपासागर की कृपा का कभी अंत नहीं आता। भक्तों पर कृपा करने के उनके विचित्र विचित्र जो निराले निराले हैं। जैसे, पहले तो भगवान्ने अर्जुनको उपदेश दिया। उपदेश के द्वारा अर्जुन के अंदर के भावों का कर्मचारियों ने अपने विभूतियों का ज्ञान पुस्तकालय में मिला। उन विभूतियों की खोज से अर्जुन में एक विलक्षणता आ गई, जिससे उन्हों ने भगवान से कहा कि आपके अमृतमय वचन से मेरी तृप्ति नहीं हो रही है। वीडियो का वर्णन करके अंत में भगवान ने कहा कि ऐसे (तरह तरह की विभूतियों वाले) अनंत ब्रह्माण्ड मेरे एक अंशभूत में पड़े हुए हैं। जिसके एक अंश में अनंत ब्रह्माण्ड हैं, उस विराटरूप को देखने के लिए अर्जुन को वीडियो रूपी इच्छा हुई और इसके लिए उन्होंने प्रार्थना की। इस पर भगवान ने अपना विराट रूप दिखाया और देखने के लिए बारबार विजुअल दी। परन्तु अर्जुन को विराट्रूप दीखा नहीं। तब भगवानने दिव्यचक्षु प्रदान कीये। सारांश यह है कि भगवान ने ही विराटरूप दर्शन की जिज्ञासा प्रकट की है। जिज्ञासा प्रकट होकर विराट् रूप ज्वालामुखी की इच्छा प्रकट होती है। इच्छा प्रकट करने पर विराट रूप दिखाया गया। अर्जुन को नहीं देखा तो दिव्यचक्षु  की उत्पादकता की। यह निष्कर्ष है कि भगवान के शरणागत का सब काम करने की जिम्मेवारी भगवान अपने ऊपर ले जाते हैं।

 संबंध- दिव्यचक्षु प्राप्त करके अर्जुन ने भगवान का कैसा रूप देखा, यह बात संजय धृतराष्ट्रसे आगेके श्लोक में कही गई है।
 
भगवद  गीता अध्याय: 11
श्लोक 9

श्लोक:
(संजय द्वारा धृतराष्ट्र के प्रति विश्वरूप का वर्णन ) 
 संजय उवाच 
 एवमुक्त्वा ततो राजन्महायोगेश्वरो हरिः।
 दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम्‌॥

भावार्थ:
संजय बोले- हे राजन्‌! महायोगेश्वर और सब पापों के नाश करने वाले भगवान ने इस प्रकार कहकर उसके पश्चात अर्जुन को परम ऐश्वर्ययुक्त दिव्यस्वरूप दिखलाया
 ॥9॥
 आइए इसे और भी विस्तार से समझने की कोशिश करे भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिव्यचक्षु देने का उल्लेख है। यह दिव्यचक्षु अर्जुन को भगवान के विश्वरूप को देखने की क्षमता प्रदान करता है।

भगवान श्रीकृष्ण को "महायोगेश्वर" कहा गया है। यह शब्द भगवान की योगशक्ति और उनके विश्वरूप की महानता को दर्शाता  भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन की प्रार्थना से बहुत अधिक अपना विश्वरूप दिखाया। यह दर्शाता है कि भगवान अपने भक्तों की प्रार्थना को सुनते हैं और उनकी इच्छाओं को पूरा करते हैं।

इस में भगवान के विश्वरूप को "परमं रूपमैश्वरम्" कहा गया है। यह शब्द भगवान के विश्वरूप की महानता और अलौकिकता को दर्शाता है।

अंत में, व्याख्या में अर्जुन की प्रतिक्रिया का उल्लेख है, जो भगवान के विश्वरूप को देखकर भयभीत हो जाता है। यह दर्शाता है कि भगवान का विश्वरूप बहुत ही विलक्षण और अलौकिक है, जो मानव मन को प्रभावित कर सकता है।

भगवद  गीता अध्याय: 11
श्लोक 10-11

श्लोक:
अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम्‌।
 अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम्‌॥
 दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम्‌।
 सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम्‌॥

भावार्थ:
अनेक मुख और नेत्रों से युक्त, अनेक अद्भुत दर्शनों वाले, बहुत से दिव्य भूषणों से युक्त और बहुत से दिव्य शस्त्रों को धारण किए हुए और दिव्य गंध का सारे शरीर में लेप किए हुए, सब प्रकार के आश्चर्यों से युक्त, सीमा रहित और सब ओर मुख किए हुए विराट्स्वरूप परमदेव परमेश्वर को अर्जुन ने देखा।
 ॥10-11॥
अर्जुन विराटरूप से प्रकट हुए भगवान के मुख और उत्सव देख रहे हैं, वे सबके-सब दिव्य हैं। विराट रूप में जीव दिख रहे हैं, उनके मुख, नेत्र, हाथ, पैर आदि सब-के-सब अङ्ग विराटरूप भगवान हैं। क्योंकि भगवान स्वयं ही विराट रुप से प्रकट हुए हैं।भगवान्के विराटरूपेण रूप देखते हैं, तीन तिहाईयां दिखती हैं, दूसरे रंग देखते हैं, जबकि उनके विचित्र रूपसे मजबूत दिखती हैं, वह सब अद्भुत दिख रहा है।विराटरूपमें दिखनेवाले अनेक दार्शनिकों के हाथों में, आदिवासियों में, पिरामिडों में, नाकोंमें, और ग्लोमेन में मूर्तियां हैं, आभूषण वे सबके-के-सब दिव्य हैं। क्योंकि भगवान स्वयं ही गहनों के रूप में प्रकट हुए हैं।

इस विराटरूप में भगवान ने अपने हाथों में चक्र, गदा, धनुरा, बाण, परिघ आदि अनेक प्रकार के जो आयुध (अस्त्र-शास्त्र) उठाये हुए हैं, वे सबके-के-सब दिव्य हैं।विराटरूप भगवानने गले में पुष्पकी, सोनेकी, चांडिकी, मोतियोंकी, रत्नोंकी, गुंजन, आदिकी अनेक प्रकार की मालाएं धारण कर रखी हैं। वे सभी दिव्य हैं। वे अपने शरीर पर लाल, पीले, हरे, सफेद, कपिश आदि अनेक रंगों के वस्त्र पहनते हैं, जो सभी दिव्य हैं।विराटरूप भगवानने ललाट पर कस्तूरी, चंदन, कुंकुम आदि गंधके तिलक आदि हैं और शरीर पर गंध लेप लगे हुए हैं, वे सबके-सब दिव्य हैं।
इस प्रकार देखते ही चकित कर देने वाले, अनंत रूप वाले तथा चारों ओर मुख-ही-मुख वाले अपने परम ऐश्वर्यमय रूपको भगवान् अर्जुन को दिखाते  हैं। मानो अर्जुन स्नान कर रहा है, तो उस समय गंगाजी, पुल, घाट पर देवा स्त्री-पुरुष आदि देखने लगे हैं और मैं गंगाजी में स्नान कर रहा हूँ--ऐसा भी लगता है। असल में यहां न हरिद्वार है और न गंगाजी हैं; लेकिन उसका मन ही उन सब सैद्धांतिक में बना हुआ है। ऐसे ही एक भगवान ही अनेक सिद्धांत में उन वस्त्रों में बने आभूषण गहनों के रूप में, अनेक प्रकार के वस्त्रों के रूप में, अनेक प्रकार के वस्त्रों के रूप में, अनेक प्रकार के वस्त्रों के रूप में प्रकट हुए हैं। इसलिए भगवान के विराटरूप में सब कुछ दिव्य है। सोने और ग्वाल बाल ही नहीं, प्रत्युत उनके गाय बैल, सींग, बांसुरी, वस्त्र, आभूषण आदि भी भगवान स्वयं ही बन हुए हैं।

अब संजय विश्वरूपके प्रकाश का वर्णन करते हैं।,

भगवद  गीता अध्याय: 11
श्लोक 12

श्लोक:
दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता।
 यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः॥

भावार्थ:
आकाश में हजार सूर्यों के एक साथ उदय होने से उत्पन्न जो प्रकाश हो, वह भी उस विश्व रूप परमात्मा के प्रकाश के सदृश कदाचित्‌ ही हो
 ॥12॥

जैसे आकाश में हजारों तारे एक साथ उदित होनेपर भी हो सकते हैं, वैसे ही आकाश में हजारों तारे एक साथ उदित होनेपर भी हो सकते हैं और हजारों चन्द्रमाओं का मिला हुआ प्रकाश एक सूर्यके प्रकाशके सदृश भी नहीं हो सकता, ऐसे ही आकाश में हजारों तारे एक साथ उदित होनेपर भी हो सकते हैं उन सबका मिलाजुला प्रकाश विराट् भगवानके प्रकाशके सदृश नहीं हो सकता। ऐसा हुआ कि हजारों सूर्यों का प्रकाश भी विराट भगवान के प्रकाश का उपमेय नहीं हो सका। इस प्रकार जब हजारों सूर्योंके प्रकाशको उपमेय बनाने में भी दिव्यदर्शनवाले सञ्जायको आर्द्र होता है, तब वह प्रकाश विराट्रूप भगवानके प्रकाशका उपमान कैसे हो सकता है! क्योंकि सूर्य का प्रकाश भौतिक है, जब कि विराट भगवान का प्रकाश दिव्य है। भौतिक प्रकाश इतना बड़ा क्यों नहीं है,,दिव्य प्रकाश के सामने वह दिखता है। भौतिक प्रकाश और दिव्य प्रकाश की जाति अलग-अलग होने से उनकी तुलना नहीं की जा सकती। हाँ, अङ्गुली निर्देशन की तरह भौतिक प्रकाशसे दिव्य प्रकाशका पर हस्ताक्षर किया जा सकता है। यहां संजय भी हजारों सूर्योंके भौतिक प्रकाशकी कल्पना करके विराट्रूप भगवानके प्रकाश-(तेज-) का लक्ष्य बनाते हैं। 

  संबंध-- पीछे के श्लोकों में विश्वरूप भगवान के दिव्यरूप, अव्यय और तेजका वर्णन करके अब संजय अर्जुन द्वारा विश्वरूप का दर्शन करने की बात कही गई है।

भगवद  गीता अध्याय: 11
श्लोक 13

श्लोक:
तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा।
 अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा॥

भावार्थ:
पाण्डुपुत्र अर्जुन ने उस समय अनेक प्रकार से विभक्त अर्थात पृथक-पृथक सम्पूर्ण जगत को देवों के देव श्रीकृष्ण भगवान के उस शरीर में एक जगह स्थित देखा
 11॥13॥
उस समय पाण्डुपुत्र अर्जुन ने देव, पितृ और मनुष्यादि भेदसे अनेक प्रकार विभक्त हुए समस्त जगत्को उस विश्वरूप देवा धिदेव हरिके शरीरमें ही एकत्र स्थित देखा।
अर्जुन ने भगवान के उस ईश्वरीय रूप में देखा कि किस प्रकार सम्पूर्ण जगत् अपनी विविधता के साथ लाकर एक स्थान पर स्थित कर दिया गया था। हम देख चुके हैं कि विराट् पुरुष की संकल्पना ऐसे मन के द्वारा देखा गया दृश्य है जो देश और काल के माध्यम में कार्य नहीं कर रहा है अर्थात् देश और काल की कल्पना लोप हो चुकी है।अनेक को एक में देखने का जो दृश्य है वह उतना इन्द्रियगोचर नहीं है जितना कि बुद्धिग्राह्य है। यह नहीं कि सम्पूर्ण विश्व संकुचित हो कर भगवान् श्रीकृष्ण के देह परिमाण का हो गया है। यदि अर्जुन को जगत् के एकत्व का अपेक्षित बोध हुआ और यदि वह उस ज्ञान की दृष्टि से विश्व को देख सके तो यही पर्याप्त है।आधुनिक विज्ञान से भी इसके समान दृष्टांत उद्धृत किया जा सकता है। रसायनशास्त्र में द्रव्यों का वर्गीकरण करके उनका अध्ययन किया जाता है। जगत् की रसायन वस्तुओं का अध्ययन करने से ज्ञात होता है कि जगत् में लगभग एक सौ तीन तत्व है। और अधिक सूक्ष्म अध्ययन से वैज्ञानिक लोग अभी सिफ परमाणु तक पहँचे अब उसका भी विभाजन करके पाया गया कि परमाणु भी इलेक्ट्रॉन प्रोटॉन और न्यूट्रॉन से बना है। परमाणु के इस स्वरूप से सुपरिचित वैज्ञानिक जब बहुविध जगत् की ओर देखता है तब उसे यह जानना भी सरल होता है कि ये सभी पदार्थ परमाणुओं से बने हैं। इसी प्रकार यहाँ जब अर्जुन को श्रीकृष्ण की अहैतुकी कृपा प्रसाद से यह विशेष ज्ञान प्राप्त हुआ? तब वह भगवान् के शरीर में ही सम्पूर्ण विश्व को देखने में समर्थ हो गया।इस दृश्य को देखकर अर्जुन के शरीर और मन पर होने वाली प्रतिक्रियाओं को संजय ने ध्यानपूर्वक देखा और उनका विवरण सुनाते हुए वह कहता है।।

 
श्लोक: 14
*श्लोक:* 
सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव ।  
 न हि ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवा: ॥ १४ ॥  
 

*अनुवाद:* हे कृष्ण! आपने मुझसे जो कुछ कहा है, उसे मैं पूर्णतया सत्य मानता हूँ। हे प्रभु! न तो देवतागण, न असुरगण ही आपके स्वरूप को समझ सकते हैं।

*तात्पर्य:* 
यहाँ पर अर्जुन इसकी पुष्टि करता है कि श्रद्धाहीन तथा आसुरी प्रकृति वाले लोग कृष्ण को नहीं समझ सकते। जब देवतागण तक उन्हें नहीं समझ पाते तो आधुनिक जगत् के तथाकथित विद्वानों का क्या कहना? 
भगवत्कृपा से अर्जुन समझ गया कि परम सत्य कृष्ण हैं और वे सम्पूर्ण हैं। अत: हमें अर्जुन के पथ का अनुसरण करना चाहिए। 
👉(अर्जुन बन कर ही गीता का अध्ययन करना सही हो गा।)👈
इस भगवद्गीता का प्रमाण भी प्राप्त है। जैसा कि भगवद्गीता के चतुर्थ अध्याय में भी कहा गया है, भगवद्गीता के समझने की गुरु-परम्परा का ह्रास हो चुका था आज भी ह्रास हो रहा है। तत्व ज्ञानी पहले तो प्राप्त ही नहीं होता योगियों के योगी गुरुओं के भी गुरु कृष्ण को गुरु ना बता खुद गुरु तो में ही हू गुरु गद्दी पर कब्जा कर लोगों को गुमराह करना ही नहीं तो और क्या है , अत: कृष्ण ने अर्जुन से उसकी पुन:स्थापना की और महाभारत में सभी गुरुओं को इकठ्ठा कर के अर्जुन के हाथों मरवा कर धर्म की स्थापना की इसमें में मोहरा तो अर्जुन ही बना, क्यों कि भगवान अर्जुन को अपना परम प्रिय सखा तथा भक्त मानते थे। अत: जैसा कि गीतोपनिषद् की भूमिका में भी कहा है, भगवद्गीता का ज्ञान परम्परा-विधि से प्राप्त करना चाहिए। परम्परा-विधि के लुप्त होने पर उसके सूत्रपात के लिए अर्जुन को चुना गया था ऐसा नजर आता है। हमें चाहिए कि अर्जुन का हम अनुसरण करें, जिसने कृष्ण की सारी बातें जान लीं। तभी हम भगवद्गीता के सार को समझ सकेंगे और तभी कृष्ण को भगवान् रूप में जान सकेंगे। क्यों कि भगवान ही कहते हैं जो जैसे मुझको भजता है वैसे ही मैं भी उसको भजता हूं। इस लिए लोग कहते है तुम एक पैसा दोगे तो वो दस लाख देगा । इसको ऐसे समझें किसान एक किलो बीज बिजता और क्विंटलों में काटता है।
भगवद  गीता अध्याय: 13
श्लोक 14

श्लोक:
सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्‌।
 असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च॥

भावार्थ:
वह सम्पूर्ण इन्द्रियों के विषयों को जानने वाला है, परन्तु वास्तव में सब इन्द्रियों से रहित है तथा आसक्ति रहित होने पर भी सबका धारण-पोषण करने वाला और निर्गुण होने पर भी गुणों को भोगने वाला है
 13॥14॥

 *तात्पर्य:*

 उनके हाथ, पाँव, आखें, सिर तथा मुँह तथा उनके कान सर्वत्र हैं। इस प्रकार परमात्मा सभी वस्तुओं में व्याप्त होकर अवस्थित है।

 जिस प्रकार सूर्य अपनी अनन्त रश्मियों को विकीर्ण करके स्थित है, उसी प्रकार परमात्मा या भगवान् भी पूरी सृष्टि को धारण कर तठस्त हैं। और वे अपने सर्वव्यापी रूप में स्थित रहते हैं, और उनमें आदि शिक्षक ब्रह्मा से लेकर छोटी सी चींटी तक के सारे जीव स्थित हैं। उनके अनन्त शिर, हाथ, पाँव तथा नेत्र हैं, और अनन्त जीव हैं। ये सभी परमात्मा में ही स्थित हैं। अतएव परमात्मा सर्वव्यापक है। लेकिन आत्मा यह नहीं कह सकता कि उसके हाथ, पाँव तथा नेत्र चारों दिशाओं में हैं भी या नहीं। यह सम्भव नहीं है। यदि वह अज्ञानता के कारण ऐसा सोचता है कि उसे इसका ज्ञान नहीं है कि उसके हाथ तथा पैर चतुर्दिक प्रसरित हैं, किन्तु समुचित ज्ञान होने पर वह ऐसी स्थिति में आ जायेगा तो उसका ऐसा सोचना उल्टा है। इसका अर्थ यही होता है कि प्रकृति द्वारा बद्ध होने के कारण आत्मा परम नहीं है। परमात्मा आत्मा से भिन्न है।आत्मा पुराने कपड़े (शरीर छोड़ नए ग्रहण करती है और परमात्मा अपना हाथ असीम दूरी तक फैला सकता है,) किन्तु आत्मा ऐसा नहीं कर सकती। भगवद्गीता में भगवान् कहते हैं कि यदि कोई उन्हें पत्र, पुष्प या जल अर्पित करता है, तो वे उसे स्वीकार करते हैं। यदि भगवान् दूर होते तो फिर इन वस्तुओं को वे कैसे स्वीकार कर पाते? 
यही भगवान् की सर्वशक्तिमत्ता है। यद्यपि वे पृथ्वी से बहुत दूर अपने धाम में स्थित हैं, तो भी वे किसी के द्वारा अर्पित कोई भी वस्तु अपना हाथ फैला कर ग्रहण कर सकते हैं। आत्मा को पितृ रूप में श्राद्घ के समय पृथ्वी  पर भेजा जाता है यही उनकी शक्तिमत्ता है जो आत्मा परमात्मा का अंतर है भगवान शुद्ध सोना तो आत्मा सोने से बना जेवर मान सकते है। ब्रह्मसंहिता में (५.३७) कहा गया है—गोलोक एव निवसत्यखिलात्मभूत:—यद्यपि वे अपने दिव्य लोक में लीला-रत रहते हैं, फिर भी वे सर्वव्यापी हैं। आत्मा ऐसा घोषित नहीं कर सकती कि वह सर्वव्याप्त है। अतएव इस श्लोक में आत्मा (जीव) नहीं, अपितु परमात्मा या भगवान् का वर्णन हुआ है।
ब्रह्मसंहिता में (५.३७) पर भगवान कृष्ण के विश्वरूप का वर्णन किया गया है। इस श्लोक में कहा गया है कि भगवान कृष्ण का विश्वरूप बहुत ही विलक्षण और अलौकिक है, जो समस्त सृष्टि को अपने में समाहित किए हुए है।
भगवद  गीता अध्याय: 13
श्लोक 15

श्लोक:
बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च।
 सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञयं दूरस्थं चान्तिके च तत्‌॥

भावार्थ:
वह चराचर सब भूतों के बाहर-भीतर परिपूर्ण है और चर-अचर भी वही है। और वह सूक्ष्म होने से अविज्ञेय (जैसे सूर्य की किरणों में स्थित हुआ जल सूक्ष्म होने से साधारण मनुष्यों के जानने में नहीं आता है, वैसे ही सर्वव्यापी परमात्मा भी सूक्ष्म होने से साधारण मनुष्यों के जानने में नहीं आता है) है तथा अति समीप में (वह परमात्मा सर्वत्र परिपूर्ण और सबका आत्मा होने से अत्यन्त समीप है) और दूर में (श्रद्धारहित, अज्ञानी पुरुषों के लिए न जानने के कारण बहुत दूर है) या भी वही स्थित वही है
 13॥15॥
*तात्पर्य:* 
यद्यपि परमेश्वर समस्त जीवों की समस्त इन्द्रियों के स्रोत हैं, फिर भी जीवों की तरह उनके भौतिक इन्द्रियाँ नहीं होतीं। वास्तव में जीवों में आध्यात्मिक इन्द्रियाँ होती हैं, लेकिन बद्ध जीवन में वे भौतिक तत्त्वों से आच्छादित रहती हैं, अतएव इन्द्रिय कार्यों का प्राकट्य पदार्थ द्वारा होता है। परमेश्वर की इन्द्रियाँ इस तरह आच्छादित नहीं रहतीं। उनकी इन्द्रियाँ दिव्य होती हैं, अतएव निर्गुण कहलाती हैं। गुण का अर्थ है भौतिक गुण, लेकिन उनकी इन्द्रियाँ भौतिक आवरण से रहित होती हैं। यह समझ लेना चाहिए कि उनकी इन्द्रियाँ हमारी इन्द्रियों जैसी नहीं होतीं। यद्यपि वे हमारे समस्त ऐन्द्रिय कार्यों के स्रोत हैं, लेकिन उनकी इन्द्रियाँ दिव्य होती हैं, जो कल्मषरहित होती हैं। इसकी बड़ी ही सुन्दर व्याख्या श्वेताश्वतर उपनिषद् में (३.१९) अपाणिपादो जवनो ग्रहीता श्लोक 

श्वेताश्वतर उपनिषद् में (३.१९) पर कहा गया है:

अपाणिपादो जवनो ग्रहीता
पश्यन् शृण्वन् स्पृशन् जिघ्रन् अश्नन्
गच्छन् स्वपन् श्वसन् प्रलपन् विसृजन्
गृह्णन् उन्मिषन् निमिषन् अप्युक्तोऽसि

इसका अर्थ है:

"वह (परमात्मा) हाथ-पैर से रहित है, लेकिन वह तेजी से चलता है। वह नेत्रों से रहित है, लेकिन वह सब कुछ देखता है। वह कानों से रहित है, लेकिन वह सब कुछ सुनता है। वह नाक से रहित है, लेकिन वह सब कुछ सूंघता है। वह मुख से रहित है, लेकिन वह सब कुछ खाता है। वह पैरों से रहित है, लेकिन वह चलता है। वह सोता है, लेकिन वह जागता है। वह श्वास लेता है, लेकिन वह श्वास छोड़ता है। वह बोलता है, लेकिन वह मौन रहता है। वह सब कुछ ग्रहण करता है, लेकिन वह कुछ भी नहीं ग्रहण करता है। वह सब कुछ खोलता है, लेकिन वह कुछ भी नहीं खोलता है। वह सब कुछ बंद करता है, लेकिन वह कुछ भी नहीं बंद करता है।"

इस श्लोक में परमात्मा की विलक्षणता और उसकी सर्वशक्तिमानता का वर्णन किया गया है। यह कहा गया है कि परमात्मा हाथ-पैर, नेत्र, कान, नाक, मुख आदि से रहित है, लेकिन वह सब कुछ देखता, सुनता, सूंघता, खाता, चलता आदि है। यह परमात्मा की सर्वशक्तिमानता और उसकी विलक्षणता को दर्शाता है।
 इस श्लोक के भाव को हम प्रत्यक्ष ज्ञान के रूप में पवित्र ग्रंथ होना मान सकते हैं। ग्रंथ का अर्थ होता है ज्ञान देने वाला गुरु "पवित्र पुस्तक" या "धार्मिक ग्रंथ", और श्वेताश्वतर उपनिषद् भी एक प्राचीन और पवित्र हिंदू ग्रंथ है।जिस में यह बात सिद्ध  हुई है। भगवान् के हाथ भौतिक कल्मषों से ग्रस्त नहीं होते, अतएव उन्हें जो कुछ अर्पित किया जाता है, उसे वे अपने हाथों से ग्रहण करते हैं। बद्धजीव तथा परमात्मा में यही अन्तर है। उनके भौतिक नेत्र नहीं होते, फिर भी उनके नेत्र होते हैं, अन्यथा वे कैसे देख सकते? वे सब कुछ देखते हैं—भूत,वर्तमान तथा भविष्य। वे जीवों के हृदय में वास करते हैं, और वे जानते हैं कि भूतकाल में हमने क्या किया, अब क्या कर रहे हैं और भविष्य में क्या होने वाला है। इसकी पुष्टि भगवद्गीता में हुई है। वे सब कुछ जानते हैं, किन्तु उन्हें कोई नहीं जानता। कहा जाता है कि परमेश्वर के हमारे जैसे पाँव नहीं हैं, लेकिन वे आकाश में विचरण कर सकते हैं, क्योंकि उनके आध्यात्मिक पाँव होते हैं। दूसरे शब्दों में, भगवान् निराकार नहीं हैं, उनके अपने नेत्र, पाँव, हाथ, सभी कुछ होते हैं, और चूँकि हम सभी परमेश्वर के अंश हैं, अतएव हमारे पास भी ये सारी वस्तुएँ होती हैं। लेकिन उनके हाथ, पाँव, नेत्र तथा अन्य इन्द्रियाँ प्रकृति द्वारा कल्मषग्रस्त नहीं होतीं।  

 भगवद्गीता से भी पुष्टि होती है कि जब भगवान् प्रकट होते हैं, तो वे अपनी अन्तरंगा शक्ति से यथारूप में प्रकट होते हैं। वे भौतिक शक्ति द्वारा कल्मषग्रस्त नहीं होते, क्योंकि वे भौतिक शक्ति के भी स्वामी हैं। वैदिक साहित्य से भी हमें पता चलता है कि उनका सारा शरीर आध्यात्मिक है। उनका अपना नित्यस्वरूप होता है, जो सच्चिदानन्द विग्रह है। वे समस्त ऐश्वर्य से पूर्ण हैं। वे सारी सम्पत्ति के स्वामी हैं और सारी शक्ति के स्वामी हैं। वे सर्वाधिक बुद्धिमान तथा ज्ञान से पूर्ण हैं। ये भगवान् के कुछ लक्षण हैं। वे समस्त जीवों के पालक हैं और सारी गतिविधि के साक्षी हैं। जहाँ तक वैदिक साहित्य से समझा जा सकता है, परमेश्वर सदैव दिव्य हैं। यद्यपि हमें उनके हाथ, पाँव, सिर, मुख नहीं दीखते, लेकिन वे होते हैं और जब हम दिव्य पद तक ऊपर उठ जाते हैं, तो हमें भगवान् के स्वरूप के दर्शन होते हैं। कल्मषग्रस्त इन्द्रियों के कारण हम उनके स्वरूप को देख नहीं पाते। अतएव निर्विशेषवादी भगवान् को नहीं समझ सकते, क्योंकि वे भौतिक दृष्टि से प्रभावित होते हैं।

भगवद  गीता अध्याय: 13
श्लोक 16

श्लोक:
अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्‌।
 भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च॥

भावार्थ:
वह परमात्मा विभागरहित एक रूप से आकाश के सदृश परिपूर्ण होने पर भी चराचर सम्पूर्ण भूतों में विभक्त-सा स्थित प्रतीत होता है (जैसे महाकाश विभागरहित स्थित हुआ भी घड़ों में पृथक-पृथक के सदृश प्रतीत होता है, वैसे ही परमात्मा सब भूतों में एक रूप से स्थित हुआ भी पृथक-पृथक की भाँति प्रतीत होता है) तथा वह जानने योग्य परमात्मा विष्णुरूप से भूतों को धारण-पोषण करने वाला और रुद्ररूप से संहार करने वाला तथा ब्रह्मारूप से सबको उत्पन्न करने वाला है
 13॥16॥

*तात्पर्य:* 

वैदिक साहित्य से हम जानते हैं कि परम-पुरुष नारायण प्रत्येक जीव के बाहर तथा भीतर निवास करने वाले हैं। वे भौतिक तथा आध्यात्मिक दोनों ही जगतों में विद्यमान रहते हैं। यद्यपि वे बहुत दूर हैं, फिर भी वे हमारे निकट रहते हैं। ये वैदिक साहित्य के वचन हैं। 

आसीनो दूरं व्रजति शयानो याति सर्वत: (कठोपनिषद् १.२.२१)। 

(कठोपनिषद् के इस श्लोक का भावार्थ है:

"आत्मा बैठी हुई भी दूर तक जा सकती है, और शयन करते हुए भी सर्वत्र व्याप्त हो सकती है।"

इसका अर्थ है कि आत्मा की कोई सीमा नहीं है, वह सर्वत्र व्याप्त है और किसी भी स्थान पर जा सकती है। यह आत्मा की व्यापकता और उसकी शक्ति को दर्शाता है। जब कि भगवान सर्वत्र हैं। इसको हम सूर्य की भांति समझ सकते है)
चूँकि वे निरन्तर दिव्य आनन्द भोगते रहते हैं, अतएव हम यह नहीं समझ पाते कि वे सारे ऐश्वर्य का भोग किस तरह करते हैं। हम इन भौतिक इन्द्रियों से न तो उन्हें देख पाते हैं, न समझ पाते हैं। अतएव वैदिक भाषा में कहा गया है कि उन्हें समझने में हमारा भौतिक मन तथा इन्द्रियाँ असमर्थ हैं। किन्तु जिसने, भक्ति में कृष्ण भावनामृत का अभ्यास करते हुए, अपने मन तथा इन्द्रियों को शुद्ध कर लिया है, वह उन्हें निरन्तर देख सकता है। ब्रह्मसंहिता में इसकी पुष्टि हुई है कि परमेश्वर के लिए जिस भक्त में प्रेम उपज चुका है, वह निरन्तर उनका दर्शन कर सकता है। और भगवद्गीता में (११.५४) इसकी पुष्टि हुई है कि उन्हें केवल भक्ति द्वारा देखा तथा समझा जा सकता है। भक्त्या त्वनन्यया शक्य:।

इस सर्वोत्कृष्ट भव्य दृश्य को देखकर अर्जुन के मन में विस्मय की भावना और शरीर पर हो रहे रोमांच स्पष्ट दिखाई दे रहे थे। यद्यपि संजय घटनास्थल से दूर है फिर भी अपनी दिव्य दृष्टि से न केवल समस्त योद्धाओं के शरीर ही वरन् उनकी मनस्थिति को भी जानने में सक्षम प्रतीत होता है। अर्जुन की विस्मय की भावना उसे उतनी ही स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रही है जितने कि उसके रोमांच। शिर से प्रणाम करते हुये दोनों हाथ जोड़कर अर्जुन कुछ कहने के लिए अपना मुख खोलता है। अब तक अर्जुन कुछ नहीं बोला था जो उसके कण्ठावरोध का स्पष्ट सूचक है। प्रथम बार जब उसने उस दृश्य को देखा जो मधुरतापूर्वक साहस तोड़ने वाला प्रतीत होता था तब भावावेश के कारण अर्जुन का कण्ठ अवरुद्ध हो गया था।

11॥13॥

भगवद  गीता अध्याय: 11
श्लोक 14

श्लोक:
ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः।
 प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत॥

भावार्थ:
उसके अनंतर आश्चर्य से चकित और पुलकित शरीर अर्जुन प्रकाशमय विश्वरूप परमात्मा को श्रद्धा-भक्ति सहित सिर से प्रणाम करके हाथ जोड़कर बोले
 11॥14॥

 *तात्पर्य:* 

एक बार दिव्य दर्शन हुआ नहीं कि कृष्ण तथा अर्जुन के पारस्परिक सम्बन्ध तुरन्त बदल गये। अभी तक कृष्ण तथा अर्जुन में मैत्री सम्बन्ध था, किन्तु दर्शन होते ही अर्जुन अत्यन्त आदरपूर्वक प्रणाम कर रहा है और हाथ जोडक़र कृष्ण से प्रार्थना कर रहा है। वह उनके विश्वरूप की प्रशंसा कर रहा है। इस प्रकार अर्जुन का सम्बन्ध मित्रता का न रहकर आश्चर्य का परिचायक बन जाता है। बड़े-बड़े भक्त कृष्ण को समस्त सम्बन्धों का आगार मानते हैं। शास्त्रों में १२ प्रकार के सम्बन्धों का उल्लेख है और ये सब कृष्ण में निहित हैं।

शास्त्रों में वर्णित 12 प्रकार के सम्बन्ध जो कृष्ण में निहित हैं, वे यह हैं:

१. श्वासुर (पति का भाई)
२. पितृव्य (पिता का भाई)
३. मातुल (माता का भाई)
४. श्याल (पत्नी का भाई)
५. मित्र (मित्र)
६. पुत्र (पुत्र)
७. पिता (पिता)
८. गुरु (गुरु)
९. सखा (सखा या मित्र)
१०. स्वामी (स्वामी या मालिक)
११. प्रियतम (प्रियतम या प्रेमी)
१२. सर्वस्व (सर्वस्व या सब कुछ)

इन सभी सम्बन्धों को कृष्ण में निहित माना जाता है, क्योंकि वह सभी जीवों के लिए एक प्रेमी और एक सखा के रूप में निहित हैं।
यह कहा तो यह भी  जाता है कि वे दो जीवों के बीच, देवताओं के बीच या भगवान् तथा भक्त के बीच के पारस्परिक आदान-प्रदान होने वाले सम्बन्धों के सागर हैं।  

 यहाँ पर अर्जुन आश्चर्य-सम्बन्ध से प्रेरित है और उसी में वह अत्यन्त गम्भीर तथा शान्त होते हुए भी अत्यन्त आह्लादित हो उठा। उसके रोम खड़े हो गये और वह हाथ जोडक़र भगवान् की प्रार्थना करने लगा। निस्सन्देह वह भयभीत नहीं था। वह भगवान् के आश्चर्यों से अभिभूत था। इस समय तो उसके समक्ष आश्चर्य था और उसकी प्रेमपूर्ण मित्रता आश्चर्य से अभिभूत थी। अत: उसकी प्रतिक्रिया इस प्रकार हुई।
अर्जुनने भगवान्के रूपके विषय में जैसी कल्पना भी नहीं की थी, वैसा रूप देख कर उनको बड़ा आश्चर्य हुआ। भगवान ने  मेरेपर कृपा करके विलक्षण आध्यात्मिक बातें अपनी ओर से बतायीं और अब कृपा करके मेरे को अपना विलक्षण रूप दिखा रहे हैं-- इस बातको लेकर अर्जुन प्रसन्नताके कारण रोमाञ्चित हो उठ ते है।

भगवान्की विलक्षण कृपाको देखकर अर्जुनका ऐसा भाव उमड़ा कि मैं इसके बदलेमें क्या कृतज्ञता प्रकट करूँ? मेरे पास कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जो मैं इनके अर्पण करूँ। मैं तो केवल सिरसे प्रणाम ही कर सकता हूँ अर्थात् अपने-आपको अर्पित ही कर सकता हूँ। अतः अर्जुन हाथ जोड़कर और सिर झुकाकर प्रणाम करते हुए विश्वरूप भगवान्की स्तुति करने लगे।
अर्जुन विराट् रूप भगवान की जिस विलक्षणताको देखकर चकित हुए, उसका वर्णन आगेके तीन श्लोकोंमें करते हुए भगवान्की स्तुति करते हैं।
भगवद  गीता अध्याय: 11
श्लोक 15

श्लोक:
(अर्जुन द्वारा भगवान के विश्वरूप का देखा जाना और उनकी स्तुति करना ) 
 अर्जुन उवाच
 पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्‍घान्‌।
 ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थमृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान्‌॥

भावार्थ:
अर्जुन बोले- हे देव! मैं आपके शरीर में सम्पूर्ण देवों को तथा अनेक भूतों के समुदायों को, कमल के आसन पर विराजित ब्रह्मा को, महादेव को और सम्पूर्ण ऋषियों को तथा दिव्य सर्पों को देखता हूँ।
 11॥15॥

।।11.15।। जब अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण को देव (प्रकाशस्वरूप) शब्द से अवतारित करते हैं। तब उन्होंने संजय की दी हुई उपमा की ही पुष्टि की है। जिसमें कहा गया था कि सहस्त्र सूर्यों के प्रकाश के समान विराट् पुरुष का तेज है। विश्वरूप में दृष्टांत चमत्कार को अमाध्यते सोलो अर्जुन कहते हैं। मैं आपके शरीर में सभी देवताओं और अनेक भूत-विशेषताओं के समूह को देख रहा हूँ। इन सभी में उल्लेखित संजय को भी पहले कर दिया गया है। दोनों के द्वारा पढ़े गए विवरणों से ज्ञात होता है कि वह विराट रूप में न केवल लौकिक वस्तुएँ हैं। वर्णों में अलौकिक दिव्य देवताओं को भी शामिल किया जा सकता है। जैसे अर्जुन ब्रह्मा को कैसे बनाते हैं विष्णु महेश के भी दर्शन होते हैं। और इन सबके साथ कई ऋषिगण भी हैं। अर्जुन कई दिव्य सर्पों को भी देखते हैं। काव्य की यह एक शैली है कि प्रिय श्रेष्ठ महान कविजन सर्वोत्कृष्ट का वर्णन समय अचानक किसी विदरूप और उपहासस्पद के स्तर के काव्य का वर्णन करना शामिल है। इसका वास्तविक विवरण यह होता है कि स्ट्रेंथ को कुछ चौंका देने वाली वस्तु की ओर उनका ध्यान आकर्षित किया जाता है। इस विश्वरूप में ब्रह्माजी से लेकर सर्पों तक का प्रतिनिधित्व मिलता है। वेदांत का सिद्धांत कौन सा पिंड है वही ब्रह्माण्ड में  है या व्यष्टि ही समष्टि है। विश्व के महान तत्त्वचिंतकों ने इसका वर्णन और अनुभव भी किया है। परन्तु पूर्व में किसी ने भी इस सैद्धांतिक सिद्धांत का स्पष्ट वस्तुनिष्ठ प्रदर्शन नहीं किया था। इस कला के अग्रणी व्यासजी थे और अब तक इस कठिन कार्य में उनका अनुकरण करने का साहस किसी को नहीं हुआ।अर्जुन अब इस तरह का वर्णन इस विवरण से किया गया है कि असाधारण साहसी पुरुष को भी अपना साहसिक खोटे अनुभव का ज्ञान होगा।

 *तात्पर्य:* 
अर्जुन ब्रह्माण्ड की प्रत्येक वस्तु देखता है, अत: वह ब्रह्माण्ड के प्रथम प्राणी ब्रह्मा को तथा उस दिव्य सर्प को, जिस पर गर्भोदकशायी विष्णु ब्रह्माण्ड के अधोतल में शयन करते हैं, देखता है। इस शेष-शय्या के नाग को वासुकि भी कहते है। अन्य सर्पों को भी वासुकि कहा जाता है। अर्जुन गर्भोदकशायी विष्णु से लेकर कमललोक स्थित ब्रह्माण्ड के शीर्षस्थ भाग को जहाँ ब्रह्माण्ड के प्रथम जीव ब्रह्मा निवास करते हैं, देख सकता है। इसका अर्थ यह है कि अर्जुन आदि से अन्त तक की सारी वस्तुएँ अपने रथ में एक ही स्थान पर बैठे-बैठे देख सकता था। यह सब भगवान् कृष्ण की कृपा से ही सम्भव हो सका।
11॥15॥
11।।16।।
*श्लोक:* 
अनेकबाहूदरवक्‍त्रनेत्रं  
 पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम् ।  
 नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं  
 पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप  11॥ 16।।
 

अनुवाद: हे विश्वेश्वर, हे विश्वरूप! मैं आपके शरीर में अनेकानेक हाथ, पेट, मुँह तथा आँखें देख रहा हूँ, जो सर्वत्र फैले हैं और जिनका अन्त नहीं है। आपमें न अन्त दीखता है, न मध्य और न आदि।

*तात्पर्य:* 

कृष्ण भगवान् हैं और असीम हैं, अत: उनके माध्यम से सब कुछ देखा जा सकता था।
विश्वरूप के अनंत वैभव को देखने के लिए मानव की परिच्छिन्न बुद्धि उपयुक्त साधन नहीं है। इस रूप के पैमाने की विशालता और उसके गुरु अभिप्राय से ही मनुष्य की बुद्धि कहाँ है लड़कियाँ रह जाती हैं। भगवान ही एकमेव सत्य तत्त्व हैं जो सभी धर्मों के कर्मेन्द्रियों के पीछे चैतन्य रूप से विराजमान हैं। अर्जुन के शब्दों में यह बताया गया है कि क्या मैं तुम्हें अनेक बहुओं से परिचित कराता हूँ उदर मुख और दर्शनों से युक्त सर्वत्र अनंत रूप में दर्शन होता है। यह सत्य का अनारक्षितचित्र नहीं समझ में ली गई उपाधि है। सावधानी की सलाह उन शीघ्रता में काम आने वाले चित्रकारों के लिए आवश्यक है जो इस विषयवस्तु से स्फूर्ति और प्रेरणा का वर्णन करते हैं, वे इस विराट रूप को अपने रंग और तुलसी के द्वारा चित्रित करना चाहते हैं और उनके प्रयास में अत्याधिक अभाव के रूप में सामन जिसका 11।।16।।

📚📚📚

भगवद  गीता अध्याय: 11
श्लोक 17

श्लोक:
किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम्‌।
 पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ताद्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम्‌॥

भावार्थ:
आपको मैं मुकुटयुक्त, गदायुक्त और चक्रयुक्त तथा सब ओर से प्रकाशमान तेज के पुंज, प्रज्वलित अग्नि और सूर्य के सदृश ज्योतियुक्त, कठिनता से देखे जाने योग्य और सब ओर से अप्रमेयस्वरूप देखता हूँ
 11॥17॥
इस श्लोक की व्याख्या
 में अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण के विराट रूप का वर्णन कर रहे हैं, जो उन्होंने अपने दिव्य दृष्टि से देखा था। 
अर्जुन कहते हैं:
किरीटिनं: अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण को मुकुट धारण किए हुए देखते हैं, जो उनके दिव्य स्वरूप का प्रतीक है। यह मुकुट उनकी दिव्यता और राजसी स्वरूप को दर्शाता है।
गदिनं: भगवान श्रीकृष्ण के हाथ में गदा है, जो उनकी शक्ति और सामर्थ्य का प्रतीक है। गदा उनके युद्ध कौशल और रक्षात्मक क्षमता का द्योतक है।
चक्रिणं: भगवान श्रीकृष्ण के पास सुदर्शन चक्र है, जो उनके अपरिमित बल और दुष्टों का संहार करने की शक्ति का प्रतीक है।
तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम्: भगवान श्रीकृष्ण के विराट रूप से तेज की किरणें निकल रही हैं, जो चारों दिशाओं में फैल रही हैं। वे इस तेज से भरपूर हैं, और उनका प्रकाश हर ओर फैला हुआ है।पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्तात्: अर्जुन कहते हैं कि वे भगवान के इस रूप को देख रहे हैं, जो अत्यंत तेजस्वी होने के कारण देखना कठिन है। यह तेज ऐसा है कि उसे स्थिर दृष्टि से देख पाना संभव नहीं है।
दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम्: भगवान श्रीकृष्ण के इस विराट रूप की तुलना अर्जुन जलती हुई अग्नि और सूर्य की चमक से कर रहे हैं। उनका रूप अग्नि और सूर्य की भाँति अत्यधिक प्रकाशमान और तेजस्वी है, जिसे मापा नहीं जा सकता।

सारांश:
सारांश में: अर्जुन अपने सामने भगवान श्रीकृष्ण के उस विराट रूप को देख रहे हैं, जो अनंत तेज, शक्ति, और दिव्यता से युक्त है। वह रूप इतना प्रचंड और प्रकाशमान है कि उसकी तुलना अग्नि और सूर्य से की जा सकती है, और उसकी भव्यता को नापा या मापा नहीं जा सकता। यह रूप दैवीय और अलौकिक है, जिसे देख पाना सामान्य मानव के लिए संभव नहीं है।

विश्वरूप का और अधिक वर्णन करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह अचिन्त्य अराघ्य दिव्य रूप में है। उन्होंने वहां मुकुटधारी शंख,चक्र,गदाधारी, भगवान विष्णु के दर्शन किये। पुराणों में मिले विवरण के अनुसार शंख, चक्र ,आदि भगवान विष्णु के पदक या अंकित हैं। ये विशेष पदक जगत् पर उनके शासक एवं प्रभुत्व को दर्शन देने वाले हैं। कौन सा व्यक्तिवादी राष्ट्रवादी का शासक है और स्वामी कौन है
। वास्तव में क्या है? 
प्रभु या ईश्वर कहलाने योग्य होता है। कौन सा व्यक्ति अपने मन का और आकर्षक आकर्षण का दास बनता है? 

वह विशाल है अगर वह राजमुकुट के साथ भी वीडियो शेयर करता है तो उसका राजत्व भी बहुत ही छोटा होता है और साथ ही साथ कि थिंग्स पर मजबूत ताज धारण कर राजा की भूमिका निभाना एक अभिनेता के रूप में होता है। सौतेले पुरुष को इंद्रिय संयम और मांससंयम के बिना वास्तविक अधिकार या दीक्षा प्राप्त नहीं हो सकती। निम्न स्तरों की उचक प्रवृत्तियों पर विजय प्राप्त कर अपने मन रूपी राज्य पर स्वयं का राजतिलक देख कर कोई भी व्यक्ति सुखी और शक्तिशाली जीवन नहीं जी सकता। संयमी पुरुष ही विष्णु हैं और राजमुकुट के अधिकारी कौन हैं। चतुर्भुज विष्णु अपने हाथों में शंख, चक्र, गदा, और पद्म (कमल) धारण किये रहते हैं। यह एक सांकेतिक रूप है। भारत में कमल पुष्प शांति और शुभ और सुख का प्रतीक है। शंखनाद मनुष्य अपनी कर्तव्यनिष्ठा के लिए खोज करता है। यदि किसी पीढ़ी के अपने हृदय की यह उच्च जिज्ञासा नहीं सुनी जाती है तब सर्वत्र अशान्ति, युद्ध, महामारी, अक्ल, तूफान ,और साम्प्रदायिक विद्वेष और सामाजिक दुर्व्यवस्था फेलती है। उस पीढ़ी पर गदा का प्रभाव पड़ता है जो उसे सुव्यवस्थित और अनुशासित करने के लिए होता है। यदि कोई ऐसी पीढ़ी हो जो इतना भी ना सिखाता है। 
 तो फिर उसके लिए आता है चक्र कालचक्र जो सुधार के साथ उस पीढ़ी को नष्ट कर देता है। 
अर्जुन द्वारा दिए गए वर्णन से ज्ञात होता है कि एक ही परम सत्य ब्रह्मादि से पिपीलिका तक का अधिष्ठान है। वह सत्य सदा सर्वत्र एक ही है केवल उसकी अभिव्यक्ति ही विविध प्रकार की है। उसके दिव्यता की अभिव्यक्ति में तारातम्य का कारण विभिन्न स्थूल और सूक्ष्म डिग्रीयाँ हैं जहाँ माध्यम से वह सत्य व्यक्त होता है। यह विश्वरूप सब ओर से प्रकाशमान तेज का पुंज है प्रदत्त अग्नि और सूर्य के समान ज्योतिर्मय और देखना अति कठिन है। इस श्लोक में दिए गए विवरण में यह पंक्ति सर्वोच्च अभिव्यंजक है जो हमें शुद्ध चैतन्यस्वरूप पुरुष का स्पष्ट बोध कराती है। यह भौतिक प्रकाश स्मारक नहीं है। तथापि लौकिक भाषा से यह शब्द लिया गया है तथापि उसका उद्देश्य साभिप्राय है। चैतन्य ही वह प्रकाश है, जिसमें हम अपने मन की भावनाओं और बुद्धि के विचारों को स्पष्ट देखते हैं। यही चैतन्य चक्षु और श्रोत्र के नाम से जाना जाने वाला वर्ण और शब्द प्रकाशित होता है। इसलिए स्वाभाविक है कि अनंत चैतन्यस्वरूप भगवान श्रीकृष्ण के विश्वरूप का वर्णन इसी तरह से करना चाहते हैं अर्जुन कि विश्वरूप तेजपुंज कौन इंद्रिय, मन , बुद्धि को अंध बना दिया जा रहा है। यानी इस उपाधि को ग्रहण में नहीं कर पा रहा है। अप्रमेय (अज्ञेय) हालांकि अब तक अर्जुन ने अपनी ओर से सर्वसंभव प्रयास करके विराट स्वरूप का और उनके दर्शन से उत्पन्न मन की भावना का वर्णन किया है लेकिन इन सभी श्लोकों में आक्षेप की एक क्षीण धारा प्रवाहित हो रही है। अर्जुन का यह अनुभव है कि वह विषयवस्तु की पूर्णता को भाषा की अभिव्यक्ति में प्रतिबंधित नहीं कर पाया है। केवल उस भाषा वस्तु का वर्णन कर सकते हैं कौन सी इन्द्रियों का अवलोकन किया गया या मन के द्वारा अनुभूत हो या बुद्धि से समझी गया हो। यहां दिखाई देता है अर्जुन के समागम का ऐसा दृश्य क्या वह अनुभव कर रहा है? देख रहे हैं और स्वयं बुद्धि से समझ पा रहे हैं? और फिर भी कैसा विचित्र अनुभव होता है कि जब वह उसे अपनी भाषा की बोतल में बंद करने का प्रयास करता है। तो वह मानो वैररूप में उड़ता है अर्जुन इन्द्रियगोचर वस्तु के अनुभव की तथा भावना की भाषा का वर्णन करने का प्रयास किया गया है, उस वर्णन से यह स्वयं ही सन्तुष्ट नहीं होता है।आश्चर्यचकित मानव उस वैभव का गान अपनी बुद्धि की भाषा में करने का प्रयास कर रहा है। परन्तु यहाँ भी केवल निराश्रित उद्देश्य यही कह सकते हैं कि। हे प्रभो आप सर्वदा अज्ञेय हैं। हालाँकि कवि ने विराट स्वरूप का चित्रण दृश्यरूप में किया है, तथापि वे हमें समझाना चाहते हैं कि सत्स्वरूप आत्मा क्या है? वास्तव में, दृष्टा है,और वह बुद्धि का भी ज्ञानी विषय नहीं बन सकता। आत्मा दृष्टा और प्रमाता है और न कि दृश्य और प्रमेय वस्तु। आपके इस ईश्वरीय योग के दर्शन से मैं अनुमान भर ही लगाता हूँ।11॥17॥

भगवद  गीता अध्याय: 11
श्लोक 18

श्लोक:
त्वमक्षरं परमं वेदितव्यंत्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्‌।
 त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे॥

भावार्थ:
आप ही जानने योग्य परम अक्षर अर्थात परब्रह्म परमात्मा हैं। आप ही इस जगत के परम आश्रय हैं, आप ही अनादि धर्म के रक्षक हैं और आप ही अविनाशी सनातन पुरुष हैं। ऐसा मेरा मत है
 11॥18॥
व्याख्या:

इस श्लोक में अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण के विराट रूप को देखकर अपने भाव प्रकट कर रहे हैं। वे कहते हैं:

त्वम् अक्षरम् परमम् वेदितव्यम्: "आप अविनाशी और परम सत्य हैं जिसे जानना चाहिए।" यहाँ 'अक्षर' का अर्थ है जो कभी नष्ट नहीं होता, जो शाश्वत है। परमात्मा के इस स्वरूप को जानना ही जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य है।
त्वम् अस्य विश्वस्य परम् निधानम्: 
"आप इस सम्पूर्ण विश्व के परम आश्रय हैं।" 
अर्थात्, सम्पूर्ण सृष्टि का मूल आधार और अन्तिम शरण आप ही हैं। सभी जीव-जंतु, पिंड, और पदार्थ आप पर ही निर्भर हैं।

त्वम् अव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता: "आप अविनाशी और शाश्वत धर्म के रक्षक हैं।" यहाँ 'अव्यय' का अर्थ है वह जो कभी नष्ट नहीं होता, जो अपरिवर्तनीय है। 'शाश्वतधर्मगोप्ता' से तात्पर्य है कि आप सनातन धर्म के पालन और संरक्षण में सदैव तत्पर हैं।

सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे: "आप सनातन पुरुष हैं, ऐसा मेरा मानना है।" अर्थात्, आप आदि और अनंत हैं, आप ही वह सनातन पुरुष हैं जिनका न कोई आरंभ है न अंत।
इस प्रकार अर्जुन श्रीकृष्ण के विराट स्वरूप को देखकर समझते हैं कि वे ही सम्पूर्ण जगत के परम और शाश्वत सत्य हैं, और उनका स्वरूप अविनाशी और अनंत है। यह श्लोक भक्ति और समर्पण की भावना से भरा हुआ है, जो श्रीकृष्ण के परम और अखंड स्वरूप की महिमा को प्रकट करता है।

सभी बुद्धिमान पुरुष अपने प्रत्येक अनुभव से किसी निष्कर्ष तक चयन का प्रयास करते हैं। जो उनका ज्ञान है। अर्जुन को भी ऐसा ही एक अनुभव हो रहा है  जो अपनी संपूर्णता में बुद्धि से भी वर्णन योग्य नहीं है और शब्दों से भी जटिल सा लगता था। 
परन्तु उसने क्या कुछ देखा उसके लिए वह कुछ निष्कर्ष निकालने का प्रयास करता है। इस अनुभव को समझने पर वह इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि इस विराट स्वरूप के पीछे कौन सी शक्ति या चैतन्य है वही अविनाशी परम सत्य है।
समुद्र में उत्पत्ति स्थिति और लय को प्राप्त होने वाली सभी तरंगों का प्रभाव या स्रोत समुद्र होता है। वही उन तरंगों का निदान है। निधान का अर्थ है निःसंदेह, जिसका अर्थ है उसका आश्रय। इसी प्रकार अर्जुन भी इस अद्भुत पूर्ण निष्कर्ष पर पहुँचता है कि विराट् पुरुष ही संपूर्ण विश्व का निधान अर्थात अधिष्ठान है। विश्व शब्द से केवल यह दृष्टांत भौतिक जगत ही नहीं है। वेदांत के अनुसार जो वस्तु दृष्टान्त अनुभूत या ज्ञात है वह विश्व शब्द की परिभाषा में आती है इस परिभाषा के अनुसार विषय और उनके ग्राहक करण इंद्रिय, मन ,आदि सब विश्व ही है और उसका निधान है। यह परिवर्तनशील जगत् हर देश और काल की धुनों पर नृत्य करता है। क्या घटनाओं का अनुभव कर उनका संपूर्ण ज्ञान प्राप्त करने के लिए एक नित्य अपरिवर्तनशील ज्ञान का होना आवश्यक है। उन्होंने बताया कि किसी भी प्रकार से स्वयं उन कहानियों में ग्लास नहीं होता है। ऐसा क्या है अविकारी चेतन तत्व ही सत्य आत्मा ही है। जो इतने विशाल विश्वरूप को धारण कर सकता है। इन विचारों को ध्यान में रखते हुए अर्जुन ने यह घोषणा की है कि वह चेतन तत्व है। जिसने स्वयं को इस आश्चर्यजनक रूप में परिवर्तित कर लिया है वही एकमेव अविनाशी अपरिवर्तनशील सत्य है जो इस विकारी जगत् में सर्वत्र व्याप्ति है।हिन्दुओ के धर्म के अनुसार धर्म का रक्षक स्वयं भगवान ही है और न कि एक रामत्य राजा या पुरोहित वर्ग। क्या हिंदू लोग नहीं हैं ऐसे अनोखे देवदूत के शिष्य? 
इसका तात्पर्य क्षणिक ऐतिहासिक अस्तित्व से था और जीवन का कार्य पीढ़ी की कठिन सेवा करना था। सनातन के लिए सत्य पुरुष ही लक्ष्य है। गुरु है और मार्ग भी है। 

धर्म की रक्षा के लिए हमें विषैली गैस या परमाणु बम जैसी किसी भी लौकिक शक्ति की आवश्यकता नहीं है। क्या आप ही सनातन पुरुष हैं ऐसा मेरा मत है वेदांत के एक रूपक के स्थूल शरीर को एक राजनगरी के समान माना जाता है और इसके अनुसार नौ द्वार हैं। प्रत्येक का नियंत्रण और संरक्षण एकाधिकार अधिष्ठाता देवता द्वारा किया जाता है। इस नवद्वार पुरी में निवास करने वाला चैतन्य तत्व पुरुष है। न कि बाह्य जगत् के विषयों में। यह पुरुष ही विश्व का अधिष्ठान है। कौन सा विश्वरूप कायम रह सकता है इसमें अर्जुन की विस्मय से भरी पूरी दृष्टि को देखा जा सकता है।
11॥18॥
भगवद  गीता अध्याय: 11
श्लोक 19

श्लोक:
अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यमनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम्‌।
 पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रंस्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम्‌॥

भावार्थ:
आपको आदि, अंत और मध्य से रहित, अनन्त सामर्थ्य से युक्त, अनन्त भुजावाले, चन्द्र-सूर्य रूप नेत्रों वाले, प्रज्वलित अग्निरूप मुखवाले और अपने तेज से इस जगत को संतृप्त करते हुए देखता हूँ
 11॥19॥
इस श्लोक में अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण के विराट रूप के दर्शन करते हुए अपने अनुभव का वर्णन कर रहे हैं।अनादि-मध्यान्त: अर्जुन भगवान को बिना आदि, मध्य और अंत के देख रहे हैं, जिसका अर्थ है कि वे शाश्वत और अजर-अमर हैं। इसका तात्पर्य यह है कि भगवान का अस्तित्व समय की सीमा से परे है। वे न तो किसी समय में उत्पन्न हुए हैं, न किसी समय में समाप्त होंगे।अनन्तवीर्य: भगवान की शक्ति और सामर्थ्य असीमित है। उनका वीर्य या बल किसी सीमा में बंधा नहीं है। वे अनंत शक्तिशाली हैं और किसी भी बाधा को पार कर सकते हैं।अनन्तबाहुं: भगवान के अनेक रूप और अनेक हाथ हैं, जो अनंत हैं। यह उनके सर्वव्यापकता का संकेत है, जिससे वे हर जगह उपस्थित हैं और हर कार्य को नियंत्रित करते हैं।शशि-सूर्य-नेत्रम्: अर्जुन ने भगवान की आँखों को चंद्रमा और सूर्य के समान बताया है। यह उनके ज्ञान और दृष्टि की व्यापकता को दर्शाता है, जो दिन और रात, दोनों के रूप में जगत को प्रकाशित करता है।दीप्तहुताशवक्त्रं: भगवान का मुख अग्नि के समान प्रज्वलित है, जो उनके तेज और शक्ति का प्रतीक है। उनका मुख अग्नि के समान जलता हुआ प्रतीत हो रहा है, जिससे वे समस्त पाप और अज्ञान को भस्म कर सकते हैं।स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम्: भगवान अपने तेज से पूरे ब्रह्मांड को तप्त कर रहे हैं। उनके तेज से सारा संसार प्रकाशित और प्रभावित हो रहा है, जो यह बताता है कि उनकी शक्ति और प्रभाव कितना व्यापक और शक्तिशाली है।इस प्रकार, अर्जुन इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण के अनंत और सर्वशक्तिमान स्वरूप का वर्णन कर रहे हैं, जो समस्त सृष्टि को अपने तेज और शक्ति से प्रभावित कर रहे हैं। यह श्लोक यह भी दर्शाता है कि भगवान का स्वरूप कितनी भव्यता और अनंतता से भरा हुआ है।

अर्जुन की सूक्ष्म दृष्टि ने जैसा देखा और बुद्धि ने वैसा समझा? उसे जगत् की वस्तुत भाषा का वर्णन करने का प्रयास किया गया है। मैं आपको आदि अंत और मध्य सेअनुपयोगी अनन्त सार्मथ्य से युक्त अनंत बहुओं वाला दृश्य हूँ। व्यास के महाकाव्य काव्य द्वारा चित्रित यह शब्दचित्र ऐसा आभास निर्मित करता है कि मानों इस कविता का विषयवस्तु लुभावनी कोई दृश्य वस्तु नहीं है। अनेक चित्रकार उसे कागज़ पर रंगीन के द्वारा चित्रित करना चाहते हैं। वेदांत के बुद्धिजीवियों का अज्ञान स्पष्ट दिखाई देता है। आदि मध्य और अनंत अनुपयोगी ऐसी अनंत वस्तु को कभी भी सीमित फलक वाले चित्रों पर प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता है। क्या? अनंतबाहु के इस शब्द को देखकर दंग रह गए, उन्होंने प्रेरित होकर वास्तुशिल्प को चित्रित करने का प्रयास किया है। वस्तुत? कवि के इन्द्रियातीत अनुभव की दृष्टि से जगत् की दृश्यावली से सर्वथा भिन्न और अनुपम जो विराट दृश्य दिखाई देता है? उसे वास्तव में एकमात्र माप अध्ययनकर्ता सूक्ष्मदर्शी वैज्ञानिक ही समझते हैं।यहाँ अनंतबाहु का अर्थ केवल इतना है कि परमात्मा ही वह चेतन तत्व है। जो सभी बाहुओं को कार्य करने और सफलता प्राप्त करने की आवश्यकता है वह सामर्थ्‍य प्रदान करता है। जो प्रकाश तत्त्व भव्य ग्रंथ प्रकाशित करता है वह हमारे उत्सवों को भी शोभा देता है उन्हें वस्तु के दर्शन करने की योग्यता प्रदान करता है। यहाँ पर समष्टि की दृष्टि से वर्णन किया गया है? क्योंकि जगत् में हम सूर्य या चन्द्रमा के प्रकाश में स्थित वस्तुओं को देखते हैं? इन्हें यहां वेदांत की शास्त्रीय भाषा में विराटपुरुष का उत्सव कहा गया है। हुताशवक्त्रम् (दिप्त अग्निरूपी मुखवाला) हुताश का अर्थ अग्नि है। वाणी की अधिष्ठाता देवता अग्नि हैं। क्या? सभी सागरों में इस प्रकार के वाक्प्रचार प्रसिद्ध हैं कि उन पर गरमागरम विवाद हुआ है? उनका वह वाक्य जिसमें चिंगारी का काम भी शामिल है। मुख ही भक्ति का तथा वाणी का स्थान होने से यहां अग्नि को विराटपुरुष का मुख कहा गया है। आपके तेज से विश्व को तपते हुए आत्मा चैतन्य स्वरूप ही हो सकता है? क्योंकि जीवात्मा के संपूर्ण गुणधर्म को सर्वदा चैतन्य ही प्रकाशित करता है। यह चैतन्य न केवल वस्तु को प्रकाशित करता है? संपूर्ण विश्व के जीवन के लिए वर्ण सूर्य की उष्णता भी आवश्यक है। इस कथन से यह सिद्ध होता है कि बाह्य जगत का निरीक्षण और अध्ययन करने के उद्देश्य से ही हिंदू ऋषियों ने अपनी दृष्टि को अन्तर्मुखी बनाया था। ऐसा अनोखा घटित होता है कि क्या आप जानते हैं कि पृथ्वी पर एक विशेष तापमान के कारण जीवन लुप्त हो जाएगा। क्या यह प्रकाश उसका स्वरुप है? और न ही कोई अन्य स्रोत प्राप्त हुआ है। स्वेन्टेजसा शब्द से यह बात स्पष्ट हो गयी है। वही से जीवन संभाला है।अर्जुन आगे कहते हैं11॥19॥
भगवद  गीता अध्याय: 11
श्लोक 20

श्लोक:
द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः।
 दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदंलोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन्‌॥

भावार्थ:
हे महात्मन्‌! यह स्वर्ग और पृथ्वी के बीच का सम्पूर्ण आकाश तथा सब दिशाएँ एक आपसे ही परिपूर्ण हैं तथा आपके इस अलौकिक और भयंकर रूप को देखकर तीनों लोक अतिव्यथा को प्राप्त हो रहे हैं
 11॥20॥
इस श्लोक में अर्जुन भगवान कृष्ण के विराट रूप का अनुभव कर रहे हैं, जिसमें उन्हें यह महसूस हो रहा है कि भगवान का रूप केवल युद्धभूमि तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे ब्रह्मांड में विस्तारित है। आकाश, पृथ्वी और चारों दिशाएँ भगवान के विराट रूप से भर गई हैं। यह दृश्य इतना अद्भुत और विशाल है कि इसे देखकर तीनों लोक (भूतल, पाताल, और स्वर्ग) के सभी जीव भयभीत हो गए हैं। यह विराट रूप भगवान की सर्वव्यापकता और अपार शक्ति को दर्शाता है, जो हर जगह विद्यमान है और जिसके समक्ष कुछ भी छिपा नहीं रह सकता। अर्जुन के मन में इस रूप को देखकर गहन आश्चर्य और भय का मिश्रण उत्पन्न होता है, जो भगवान की महिमा और उनकी सर्वशक्तिमानता का प्रतीक है।
भगवद  गीता अध्याय: 11
श्लोक 21

श्लोक:
अमी हि त्वां सुरसङ्‍घा विशन्ति केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति।
 स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्‍घा: स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः॥

भावार्थ:
वे ही देवताओं के समूह आप में प्रवेश करते हैं और कुछ भय भीत होकर हाथ जोड़े आपके नाम और गुणों का उच्चारण करते हैं तथा महर्षि और सिद्धों के समुदाय 'कल्याण हो' ऐसा कह कर उत्तम-उत्तम स्तोत्रों द्वारा आपकी स्तुति करते हैं
 11॥21॥

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण के विराट रूप के दर्शन के समय अर्जुन द्वारा देखी जा रही स्थिति का वर्णन कितने सुन्दर तरीके से किया गया है। अर्जुन तो सब देख ही रहे हैं कि अनेक देवता और ऋषि भगवान के विराट रूप में प्रवेश कर रहे हैं। कुछ देवता भयभीत होकर हाथ जोड़कर प्रार्थना कर रहे हैं और भगवान की स्तुति कर रहे हैं।
महर्षि और सिद्धगण भगवान के सामने "स्वस्ति" (शुभकामना) कहते हुए उन्हें पुष्कल स्तुतियों से स्तुति कर रहे हैं। यह दृश्य अत्यंत भव्य और विस्मयकारी भगति का उदाहरण है, जिसमें सभी उच्चतम देवता, ऋषि और सिद्धगण भगवान की महिमा का गुणगान कर रहे हैं।
इस प्रकार, इस श्लोक में यह दर्शाया गया है कि भगवान का विराट रूप इतना विशाल और प्रभावशाली है कि बड़े-बड़े देवता, महर्षि और सिद्धगण भी उसकी स्तुति और उपासना करते हुए भगवान की कृपा पाने की कामना कर रहे हैं। यह भगवान के अनंत रूप और उनकी महिमा को दर्शाता है, जिसे देखकर सभी को भक्ति और आदर का अनुभव होता है।11॥21॥
अब तक अर्जुन ने विश्व रूप का जो वर्णन किया वह स्थिर था, साथ में अद्भुत और उग्र भी था। यहां अर्जुन विश्वरूप में दिखाई दे रही गति और क्रिया का वर्णन है। ये सुरसंघ विराट पुरुष में प्रवेश करके तिरोभूत हो रहे हैं। और अन्य लोग प्रतीक्षा करते हैं तो क्या आप इस प्रक्रिया को देख रहे हैं? तो अवश्य ही वे भय से आतंकित हो जायेंगे। किसी निश्चित निश्चितता से अशंकित पुरुष को जब सुरक्षा का कोई उपाय नहीं दिखता तब के शैतान की आज्ञा में वह सदा प्रार्थना की ओर प्रतिवृत्त होता है। इस मनोवैज्ञानिक सत्य को बड़ा ही सुंदरता से यहां शब्दों में व्यक्त किया गया है कि कई एक महत्वपूर्ण हाथ में हाथ डाले आपकी स्तुति करते हैं। और ये सब कुछ नहीं है। महर्षियों और सिद्ध पुरुषों का समूह अपने ज्ञान की विविधता से प्राप्त दैवी और आन्त्रिक शांति का कारण इस विराट के दर्शन से अविचलित घाट के इस विविध रूपमय विराट् पुरुष के उत्तम (बहुल) स्तोत्रों की स्तुतिगान करते हैं। वे सदा स्वस्तिवचन अर्थात सबके कल्याण की कामना करें। अपने पूर्ण ज्ञान के कारण वे जानते हैं कि ईश्वर इस प्रकार का अत्यंत प्रचंड उग्र रूप तभी धारण करता है जब वह विश्व का संपूर्ण पुनर्निर्माण करना चाहता है। सिद्ध पुरुष यह भी जानते हैं कि इस योजना में निर्माण कार्यों में किसी प्रकार का नुकसान नहीं होता है। इसलिए क्या वे इस विनाश की प्रक्रिया का स्वागत करते हैं? इस संपूर्ण विनाश की पुष्टि ही आएगी। मध्यम और अधम। अधम जीव ऐसे ही नष्ट हो जाते हैं। वे मृत्यु की प्रक्रिया के प्रथम शिकार होते हैं और दुर्भाग्य से उन्हें इस क्रिया का भान तक नहीं होता है कि वे उनका किसी भी प्रकार से विरोध कर सकते हैं। मध्यम प्रकार के लोग विचार-विमर्श इस क्षय और नाश की प्रक्रिया को देखते हैं और उसके प्रति परामर्श भी होते हैं। वे अपने भाग्य के विषय में हैशटैग आशंकित हो जाते हैं। क्या आप नहीं जानते कि विनाश से किसी वस्तु का कोई नुकसान नहीं होता? और सभी शैतानों के अलौकिक अंत से भयभीत हो जाते हैं। जिसमें समष्टि के स्वरूप एवं व्यवहार का संपूर्ण ज्ञान होता है। उन्हें इस बात का भय कभी नहीं छूता कि दैनिक जीवन में घटने वाली घटनाएं उनके साथ भी घट सकती हैं। समुद्र के स्वरूप को प्रतिबिंबित करने वालों को तरंगों के नाश से चिंता होने का कारण नहीं रहता है। इसी प्रकार? जब सिद्ध पुरुष उस महान विनाश को देखते हैं? कौन सी मर्नासन्न संस्कृति का पुनर्निमाण पूर्व में हुआ था? तब वे सत्य की इस महान शक्ति को पहचान कर ईश्वर निर्मित भावी जगत के लिए शांति और कल्याण की कामना करते हैं। किस भी दृष्टि से हम इस काव्य का अध्ययन करते हैं? हम कहते हैं कि स्वयं व्यासजी कितने महान मनोवैज्ञानिक हैं और वे कितनी सुन्दरता से यहाँ मानवता व्यवहार के ज्ञान को एक साथ जोड़ते हैं? जिससे कि मनुष्य शीघ्र विकास करके अपने पूर्णत्व के लक्ष्य तक पहुंच सके। इस दर्शनीय दृश्य को देखकर स्वर्ग के देवताओं की क्या प्रतिक्रया हुई अर्जुन ने उसे दिखाते हुए कहा है कि

भगवद  गीता अध्याय: 11
श्लोक 22

श्लोक:
रुद्रादित्या वसवो ये च साध्याविश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च।
 गंधर्वयक्षासुरसिद्धसङ्‍घावीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे॥

भावार्थ:
जो ग्यारह रुद्र और बारह आदित्य तथा आठ वसु, साध्यगण, विश्वेदेव, अश्विनीकुमार तथा मरुद्गण और पितरों का समुदाय तथा गंधर्व, यक्ष, राक्षस और सिद्धों के समुदाय हैं- वे सब ही विस्मित हो कर सब आपको ही देखते हैं
 ॥22॥
अर्जुन ने आगे वर्णन करते हुए कहा है कि इस ईश्वरीय रूप को देखने वालों में प्राकृतिक शक्तियां या शक्तियां के वे सभी अधिष्ठात्री देवतागण भी सम्मिलित हैं? प्रोटोमिक वैदिककाल में पूजा और उपासना की जाती थी। वे सभी विस्मयचक्रित कथाएँ इस रूप में देख रहे थे। इस श्लोक में सभी देवताओं के विषय में हम पूर्व अध्याय में वर्णन कर चुके हैं। जिन नवीन वास्तुशिल्प का उल्लेख यहाँ किया गया है? वे साध्य हैं ? विश्वेदेवा? और उष्मपा .इन शब्दों के अर्थों से आज हम अनभिज्ञ होने के कारण? यह श्लोक संभाव्य हमें अर्थपूर्ण स्पष्ट नहीं होगा। क्या? अर्जुन वैदिक युग का पुरुष और वेदों का अध्येता होने का कारण इनमें से सबसे अधिक प्रचलित था? अत उसकी भाषा भी यही हो सकती थी। हमें केवल यह देखना है कि इस विराट पुरुष के दर्शन का अर्जुन और विभिन्न प्रकार के देवताओं पर क्या प्रभाव पड़ा? ऋषियों? आदि की प्रतिक्रिया क्या हुई। इस आकार के विशाल विश्वरूप को प्रत्येक ने अपने-अपने मन के अनुसार देखा और समझा।
भगवान श्रीकृष्ण के विराट रूप का वर्णन करते हुए, अर्जुन कहते हैं कि हे भगवान, आपके इस विराट रूप को देखकर सभी देवता, ऋषि, और महात्मा विस्मित हो रहे हैं। इसमें रुद्र, आदित्य, वसु, साध्य, अश्विनीकुमार, मरुद्गण, पितर आदि देवता शामिल हैं। इसके अलावा, गंधर्व, यक्ष, असुर और सिद्धों के समूह भी आपके इस रूप को देखकर विस्मय से भर गए हैं।
अर्जुन के इस कथन का अर्थ है कि भगवान के विराट रूप में सभी प्रकार की शक्तियाँ और देवता सम्मिलित हैं। इस रूप को देखकर सभी दिव्य प्राणी विस्मित हैं और उसकी महानता का अनुभव कर रहे हैं। यह श्लोक हमें यह बताता है कि भगवान की शक्ति असीम है, और उनके विराट स्वरूप में सभी प्रकार के जीव और देवता समाहित हैं। उनका यह दिव्य रूप इतना विस्मयकारी है कि कोई भी जीव इसे देखकर अचंभित हुए बिना नहीं रह सकता।
इस प्रकार, अर्जुन ने भगवान के विराट रूप को देखकर उसकी महानता और सर्वव्यापीता को स्वीकार किया और यह स्पष्ट किया कि कोई भी प्राणी भगवान के इस रूप को समझने और देखने में पूरी तरह सक्षम नहीं है। उनका विराट रूप असीमित और अपार है, जिसमें समस्त सृष्टि समाहित है।
भगवद  गीता अध्याय: 11
श्लोक 23

श्लोक:
रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रंमहाबाहो बहुबाहूरूपादम्‌।
 बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालंदृष्टवा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम्‌॥

भावार्थ:
हे महाबाहो! आपके बहुत मुख और नेत्रों वाले, बहुत हाथ, जंघा और पैरों वाले, बहुत उदरों वाले और बहुत-सी दाढ़ों के कारण अत्यन्त विकराल महान रूप को देखकर सब लोग व्याकुल हो रहे हैं तथा मैं भी व्याकुल हो रहा हूँ
 ॥23॥

इस श्लोक में अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण के विराट रूप का वर्णन कर रहे हैं। जब श्रीकृष्ण ने अर्जुन को अपना विराट रूप दिखाया, तब अर्जुन ने उसमें अनेक मुखों, नेत्रों, भुजाओं और अंगों को देखा। श्रीकृष्ण के इस विराट रूप का हर अंग अनगिनत था, और उनके मुख से बड़े-बड़े दाँत दिखाई दे रहे थे, जो अत्यंत भयानक लग रहे थे।
अर्जुन यहाँ यह कहते हैं कि इस भयानक रूप को देखकर केवल वह ही नहीं, बल्कि समस्त संसार के लोग भय से कांप रहे हैं। उनका कहना है कि इस रूप के दर्शन मात्र से हर कोई विचलित हो रहा है। यह श्लोक इस बात को भी दर्शाता है कि भगवान का विराट रूप असीम है, जिसे देख पाना किसी भी साधारण मनुष्य के लिए सरल नहीं है। भगवान की अनंतता और उनके भीतर सबकुछ समाहित है, यह बात अर्जुन को यहाँ प्रत्यक्ष रूप से अनुभव हो रही है।
इस तरह, इस श्लोक के माध्यम से अर्जुन अपने भय और विस्मय को प्रकट कर रहे हैं, साथ ही भगवान की महिमा और उनके विराट रूप की महत्ता को स्वीकार भी कर रहे हैं।ओर आगे कहते हैं ।क्योंकि हे विष्णो! आकाश को स्पर्श करने वाले, दैदीप्यमान, अनेक वर्णों से युक्त तथा फैलाए हुए मुख और प्रकाशमान विशाल नेत्रों से युक्त आपको देखकर भयभीत अन्तःकरण वाला मैं धीरज और शान्ति नहीं पाता हूँ

भगवद  गीता अध्याय: 11
श्लोक 24

श्लोक:
नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णंव्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम्‌।
 दृष्टवा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो॥

भावार्थ:
क्योंकि हे विष्णो! आकाश को स्पर्श करने वाले, दैदीप्यमान, अनेक वर्णों से युक्त तथा फैलाए हुए मुख और प्रकाशमान विशाल नेत्रों से युक्त आपको देखकर भयभीत अन्तःकरण वाला मैं धीरज और शान्ति नहीं पाता हूँ
 ॥24॥
इस श्लोक में अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण के विराट रूप को देखकर अत्यधिक विस्मय और भय का अनुभव कर रहे हैं। यहाँ अर्जुन अपने मन की स्थिति को व्यक्त करते हैं:
नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं: अर्जुन कह रहे हैं कि भगवान का यह रूप आकाश तक फैला हुआ है, और इसकी अद्भुत दिव्यता अनेक रंगों में प्रदीप्त हो रही है। यह विराट रूप अत्यंत चमकदार है, जिससे उसकी भव्यता और अलौकिकता का पता चलता है।
व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम्: भगवान के इस रूप में अनगिनत मुख और विशाल, तेजस्वी नेत्र हैं। ये नेत्र इतने विशाल और चमकदार हैं कि उन्हें देखकर अर्जुन भयभीत हो गए हैं। ये नेत्र भगवान की सर्वदर्शिता और सर्वव्यापिता को दर्शाते हैं।
दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा: अर्जुन कहते हैं कि इस विराट रूप को देखकर उनकी आत्मा अंदर से कांप रही है। उनका अंतर्मन विचलित और भय से भर गया है। यह अनुभव अर्जुन के मानसिक संतुलन को डगमगा देता है।
धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो: अर्जुन श्रीकृष्ण को विष्णु नाम से संबोधित करते हुए कहते हैं कि उन्हें धैर्य नहीं मिल रहा है और न ही मन को कोई शांति। भगवान के इस विराट रूप को देखकर अर्जुन अपने आप को असहाय और कमजोर महसूस कर रहे हैं, उन्हें कोई सहारा नहीं मिल रहा जिससे वे शांति पा सकें।इस प्रकार, अर्जुन भगवान के इस विराट रूप को देखकर भयभीत हैं और उनका मन विचलित हो गया है। इस श्लोक में अर्जुन के मन की स्थिति का वर्णन है, जहाँ वे भगवान की महिमा को समझने में असमर्थ और भयभीत हैं। यह श्लोक भगवान की अपरंपार शक्ति और उसके सामने मनुष्य की नश्वरता को दर्शाता है।

भगवद  गीता अध्याय: 11
श्लोक 25

श्लोक:
दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानिदृष्टैव कालानलसन्निभानि।
 दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास॥

भावार्थ:
दाढ़ों के कारण विकराल और प्रलयकाल की अग्नि के समान प्रज्वलित आपके मुखों को देखकर मैं दिशाओं को नहीं जानता हूँ और सुख भी नहीं पाता हूँ। इसलिए हे देवेश! हे जगन्निवास! आप प्रसन्न हों
 11॥25॥
इस श्लोक में अर्जुन भगवान कृष्ण के विराट रूप को देखकर उत्पन्न भय और बेचैनी को व्यक्त कर रहे हैं। भगवान के विशाल और भयानक रूप को देखकर अर्जुन के मन में एक प्रकार का आतंक छा जाता है। वह इस रूप को देखकर दिशाओं का ज्ञान खो बैठते हैं, यानी वे सोचने और समझने की शक्ति खो देते हैं। इस विराट रूप के मुखों में अर्जुन को काल के समान विनाशकारी अग्नि दिखाई देती है, जो जीवों का संहार करने के लिए तत्पर है।
इस स्थिति में अर्जुन भगवान से निवेदन करते हैं कि वे कृपा करके अपने इस रूप को सामान्य करें, ताकि उन्हें शांति मिल सके। यह श्लोक अर्जुन के भीतर के भय और भगवान की अपार शक्ति के प्रति उनकी श्रद्धा को दर्शाता है। अर्जुन समझते हैं कि भगवान ही सृष्टि के निर्माण, पालन और संहार के अधिकारी हैं और उनके विराट रूप में यह सभी शक्तियाँ समाहित हैं।इस श्लोक से हमें यह भी शिक्षा मिलती है कि संसार में किसी भी शक्ति का अंत भगवान के हाथों में है और वही सृष्टि के कर्ता-धर्ता हैं। उनका आश्रय प्राप्त करने से ही व्यक्ति को सच्ची शांति और मुक्ति मिल सकती है।
जैसा कि किस श्लोक में वर्णित हैअर्जुन ऐसे भयंकर रूप में देखकर अपना धैर्य और सुख खो रहा है। सर्वभक्षी का एक रूपकर देने वाले वाले काल का यह चित्र है। जब दृष्टि के सम्मुख ऐसा विशाल दृश्य उपस्थित होता है और वह भी इतना अचूक रूप से तो विशालता का उसका आयाम ही विवेकशक्ति का मनो गला घोंट देता है और क्षणभर के लिए वह व्यक्तिगत संवेदनाशून्य हो जाता है। भ्रांतिजन्य दुर्व्यवस्था की दशा को यहाँ इन शब्दों में व्यक्त किया गया है कि
मैं दिशाओं को नहीं जान पा रहा हूं। बात पर ख़त्म नहीं होती। मैं न धैर्य रख पा रहा हूं और न शांति,को भी।आत्यंतिक विस्मय की इस स्थिति में चमत्कारी मानव का अनुभव होता है कि उसकी शारीरिक शक्ति क्या है मानसिक क्षमताएं और बुद्धि की सूक्ष्मदर्शिता अपने अलग-अलग रूप में और सामूहिक रूप में भी महत्वपूर्ण शून्य साधन हैं। छोटा सा व्यवहार अपने मिथ्या अभिमान के गुण और मिथ्या शक्ति के कवच को त्यागकर पूर्ण विवस्त्र हुआ स्वयं को नम्र भाव से समग्र की शक्ति के साथ समर्पित कर देता है। परम दिव्य समष्टि शक्ति के सम्मुख जिस व्यक्ति ने पूर्णरूप से अपने बौद्ध अभिमानों का अर्थशून्यता समझ लिया है उसके लिए केवल एक ही आश्रय रह जाता है और वह प्रार्थना करता है। 
इस श्लोक के अंत में अर्जुन प्रार्थना करता है
 हे देवेश हे जगनिवस आपको बहुत अच्छा लग रहा है। व्यासजी द्वारा की गई इस प्रार्थना में यह कहा गया है कि मनुष्य और दंभ से पूर्ण हृदय वाले व्यक्ति द्वारा कभी भी वास्तविक प्रार्थना नहीं की जा सकती है। जब व्यक्ति इस विशाल समष्टि विश्व में अपना आकर्षण प्रदर्शित करता है केवल एक बार वह हृदय से आत्म प्रार्थना करता है। अर्जुन इस युद्ध में विजय अपनी के प्रति शशांक था। 21वें श्लोक सेस्टेस्ट की तरह इस एपिसोड का मुख्य उद्देश्य अर्जुन को भावी घटनाओं का कुछ बोध कराना है। उसे युद्ध के परिणामों के प्रतिमूल्यांकन करते हुए? अब भगवान सीधे ही सैनिकों के योद्धाओं को काल के मुख में प्रवेश कराते हुए दिखाते हैं
11॥25॥

भगवद  गीता अध्याय: 11
श्लोक 26-27

श्लोक:
अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहैवावनिपालसंघैः।
 भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः॥
 वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि।
 केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु सन्दृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्‍गै॥

भावार्थ:
वे सभी धृतराष्ट्र के पुत्र राजाओं के समुदाय सहित आप में प्रवेश कर रहे हैं और भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य तथा वह कर्ण और हमारे पक्ष के भी प्रधान योद्धाओं के सहित सबके सब आपके दाढ़ों के कारण विकराल भयानक मुखों में बड़े वेग से दौड़ते हुए प्रवेश कर रहे हैं और कई एक चूर्ण हुए सिरों सहित आपके दाँतों के बीच में लगे हुए दिख रहे हैं
 जिन शूरवीरोंसे मुझसे पहले परजायकी अश्क थी? वह भी अब चला गया क्योंकि--, ये दुर्योधन आदि धृतराष्ट्रके सर्व पुत्र अवनिपालोंके शास्त्राहित--अवनि अर्थात् पृथ्वीका जो पालन करें उनका नाम अवनिपाल है। उनके शाकाहारी शाकाहारी बड़े वेगसे आपके मुखों में प्रवेश कर रहे हैं। यही नहीं? भीष्म? द्रोण और यह सूतपुत्र--कर्ण और हमारी ओरके भी धृष्टद्युम्नादि प्रमुख योद्धाओंके सहित (सबसेसब)।

॥26-27॥

11।।26।।
इस श्लोक में अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण के विराट रूप को देखकर कह रहे हैं कि हे भगवान! मैं देख रहा हूँ कि धृतराष्ट्र के सभी पुत्र (कौरव), विभिन्न राजाओं के साथ मिलकर, भीष्म, द्रोणाचार्य, कर्ण और हमारे तरफ के अन्य प्रमुख योद्धा सभी आपके अंदर प्रवेश कर रहे हैं।
शीघ्रतासे--बड़ी जल्दीके साथ आपके मुखों में प्रवेश कर रहे हैं। किस प्रकार के मुखों में दाढ़ोंवाले विकराल भयंकर मुखों में। तथा उन मुखों में प्रविष्ट हुए पुरुषों में से भी कितने ही विचूर्णित मस्तकोंसहित दांतों के बीच में भक्षण किए गए मांस की भाँति चित्रोक्त हुए दिख रहे हैं।
11।।27।।
इस श्लोक में अर्जुन आगे कहते हैं कि वे देख रहे हैं कि ये सभी योद्धा आपके भयानक और विकराल दाँतों से युक्त मुखों में तेजी से प्रवेश कर रहे हैं। कुछ योद्धा आपके दाँतों के बीच फँसे हुए दिखाई दे रहे हैं और उनके सिर कुचले हुए हैं, जो आपके दाँतों के बीच में चिपके हुए हैं।

व्याख्या: इन श्लोकों में अर्जुन ने भगवान के विराट रूप के दर्शन करके जो दृश्य देखा, उसका वर्णन किया है। अर्जुन देख रहे हैं कि महाभारत युद्ध के सभी योद्धा, चाहे वे कौरव पक्ष के हों या पांडव पक्ष के, सभी भगवान के विराट रूप में समाहित हो रहे हैं। यह दृश्य यह संकेत देता है कि युद्ध में सभी का अंत निश्चित है और कोई भी इससे बच नहीं सकता। भगवान का विकराल रूप यह दर्शा रहा है कि सभी योद्धा उनके नियंत्रण में हैं, और युद्ध की परिणति भगवान की इच्छा के अनुसार ही होगी। इस तरह से अर्जुन को यह समझ में आता है कि वे इस युद्ध में केवल एक माध्यम हैं और वास्तविक नियंत्रण भगवान के ही हाथों में है।
भगवद  गीता अध्याय: 11
श्लोक 28

श्लोक:
यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति।
 तथा तवामी नरलोकवीराविशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति॥

भावार्थ:
जैसे नदियों के बहुत-से जल के प्रवाह स्वाभाविक ही समुद्र के ही सम्मुख दौड़ते हैं अर्थात समुद्र में प्रवेश करते हैं, वैसे ही वे नरलोक के वीर भी आपके प्रज्वलित मुखों में प्रवेश कर रहे हैं
 भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को अपने विराट रूप का दर्शन करा रहे हैं, जिसमें अर्जुन को ब्रह्मांड की समस्त शक्तियाँ और घटनाएँ एक साथ दिखाई दे रही हैं। श्रीकृष्ण के इस रूप में अनंत मुख, अनंत भुजाएँ, अनंत नेत्र और अनंत रूप हैं। यहाँ पर, वे इस बात को समझा रहे हैं कि जैसे सारी नदियाँ सागर में मिल जाती हैं, वैसे ही सब योद्धा, चाहे वे कितने भी शक्तिशाली क्यों न हों, उनके विराट रूप में विलीन हो रहे हैं। यह श्लोक इस सत्य को दर्शाता है कि समस्त जीवों का अंतिम गंतव्य भगवान ही हैं, और सब कुछ अंततः उन्हीं में समाहित हो जाता है। इस प्रकार, वे यह भी दिखा रहे हैं कि संसार में जितने भी शक्तिशाली योद्धा और शासक हैं, वे सभी उनके विराट रूप का एक अंश मात्र हैं, और अंत में सभी का नाश और समापन उनके द्वारा ही होगा।

यह श्लोक हमें यह भी सिखाता है कि हर जीव का जन्म और मरण भगवान की इच्छा से ही होता है, और हमारे जीवन का उद्देश्य उसी दिव्य चेतना में समर्पित होना है।
अर्थात:
*समुद्र से मिलन के लिए आतुर* उन के ओर वेग से बहती नदी की उपमा इस श्लोक में दी गई है। जिस स्रोत से नदी का उद्गम होता है वहीं से उनका अपना विशेष व्यक्तित्व प्राप्त होता है। किसी भी एक बिंदु पर वहती नदी न रुकती है और न आगे बढ़ने से कतराती है। अल्पमति का पुरुष यह कह सकता है कि नदी की हर खाड़ी में ही किसी स्थान पर विशेष की ओर वृद्धि हो रही है। वास्तविक पुरुष कहानियाँ हैं कि सभी नदियाँ समुद्र की ओर ही बहती हैं और वे जब तक समुद्र से मिल नहीं जाते तब तक मार्ग के मध्य में कहीं रुक नहीं सकते हैं और नहीं रुकेंगे। समुद्र के साथ-साथ एक रूप हो जाने से विभिन्न नदियों के सभी भेद समाप्त हो जाते हैं। नदी के जल का प्रत्येक बूँद समुद्र से ही आता है। प्रथम मेघ के रूप में वह पर्वत शिखरों से ऊपर द्वीप तक और वहां वर्षा के रूप में दिखाई दिए, हुइ नदी तट के क्षेत्रों को जल प्रदान करके जीवन और पोषण के स्तर को ध्यान में रखते हुए वे शिखरों से वेगयुक्त प्रवाह के साथ अपने उस प्रभाव स्थान में मिल जाते हैं जहां से उन्होंने ये करुणा की उड़ान भरी थी। इसी प्रकार अपने समाज की सेवा और संस्कृति का पोषण करने और विश्व के सौन्दर्य की वृद्धि में अपना योगदान देने के लिए समष्टि से ही सभी व्यष्टि जीव प्रकट होते हैं लेकिन इनमें से कोई भी व्यक्ति अपनी इस मध्य तीर्थ यात्रा पर नहीं रुक सकता है। सभी को अपने मूल स्रोत की ओर शीघ्रता से आवेदन करना होगा। समुद्र को प्राप्त होने से नदी की कोई क्षति नहीं होती है। तथापि मार्ग में उसे कुछ विशेष गुण जरूर प्राप्त होते हैं किस कारण से उसे एक विशेष नाम और आकार प्राप्त होता है तथापि उसका यह स्वरूप सांकेतिक है। यह समुद्र के जल द्वारा शुष्क भूमि को बहुलता से समृद्ध करने के लिए प्रभु के रूप में लिया गया है।
11॥28॥
भगवद  गीता अध्याय: 11
श्लोक 29

श्लोक:
यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतंगाविशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः।
 तथैव नाशाय विशन्ति लोकास्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः॥

भावार्थ:
जैसे पतंग मोहवश नष्ट होने के लिए प्रज्वलित अग्नि में अतिवेग से दौड़ते हुए प्रवेश करते हैं, वैसे ही ये सब लोग भी अपने नाश के लिए आपके मुखों में अतिवेग से दौड़ते हुए प्रवेश कर रहे हैं।
 इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को अपने विराट रूप का दर्शन करा रहे हैं। अर्जुन ने भगवान के इस रूप में अनगिनत मुख और अनेकानेक रूप देखे, जिनसे अनंत तेज निकल रहा था। इस दृश्य को देखकर अर्जुन भयभीत हो गया।
श्रीकृष्ण के मुख में संसार के सभी प्राणी नष्ट हो रहे हैं, जैसे कोई पतंगे अग्नि में जलकर नष्ट हो जाते हैं। यहाँ 'पतंगे' का तात्पर्य उन जीवों से है, जो अपने अज्ञान और भ्रम के कारण माया में फंसे हुए हैं और उन्हें ज्ञात नहीं कि वे किस ओर जा रहे हैं। अग्नि में प्रवेश करने वाले पतंगों की तरह ये प्राणी भी श्रीकृष्ण के विराट रूप में समा रहे हैं, जो संहार और पुनरुत्थान के प्रतीक हैं।इस श्लोक के माध्यम से यह समझाया जा रहा है कि समय और मृत्यु के सामने सभी जीव-जन्तु असहाय हैं और वे अनजाने में अपने अंत की ओर बढ़ रहे हैं। श्रीकृष्ण के मुख में इन जीवों का नाश केवल भौतिक शरीर का नाश है, जिससे वे इस संसार के बंधनों से मुक्त हो जाते हैं। यह श्लोक जीवन के अस्थिर और क्षणभंगुर होने की ओर संकेत करता है, और यह भी बताता है कि भगवान के पास जाकर ही मोक्ष और शांति प्राप्त हो सकती है।
अव्यक्त से व्यक्त हुई सृष्टि के बीच की एकता को समुद्र से उत्पन्न नदियों की उपमा की अत्यंत सुंदर शैली पूर्व श्लोक में प्रकाशित हुई है। समुद्र से उत्पन्न सभी नदियाँ पुन: समुंदर में ही समा जाती हैं। कोई भी उपमा आपके लिए पूर्ण नहीं हो सकता। नदियों के दृष्टांत में एक अपूर्णता यह राह दिखाई देती है कि नदी को स्वयं की पहचान नहीं मिलती क्योंकि समुद्र मिलन में उसका चित्रण नहीं होता। कोई संदेह नहीं कर सकता कि आपके स्वतन्त्र विवेक के कारण अचेतन जल के समान व्यवहार नहीं होगा। यहां यह दर्शन के लिए कि जीवधारी प्राणी भी अपने स्वभाव से मृत्यु के मुख की ओर बरबस खान्दे चले जाते हैं यह दृष्टान्त दिया गया है कि जैसे पतंगें अत्यंत वेग से स्वनाश के लिए अग्नि के मुख में प्रवेश करते हैं। व्यासजी की संपूर्ण प्रकृति ही धर्मशास्त्र की खुली किताब है। वे अनेक घटनाएँ एवं उदाहरणों के साम्यवादी साम्यवादी साँचे को समझाते हैं कि अव्यक्त का लोकतंत्र में निर्माण ही सृष्टि की प्रक्रिया है और वाणी का अपने अव्यक्त स्वरूप में मिल जाना ही नाश या मृत्यु है। जब हम इस भयंकर या राक्षसी घटना वाली मृत्यु को वास्तविकता से समझने का प्रयास करते हैं तब वह प्रोफ़ेसर को त्यागकर अपने आकर्षण और तनावपूर्ण मुख को प्रदर्शित करता है,करती है। उसके उपचार का एकमात्र उपाय यही था कि उसकी दृष्टि उपभोक्ता पत्रिका तक न पहुँचे वह कहाँ से एक ही दृष्टि कोण में मौत की इस अलौकिक प्राकृतिक घटना को देखें और समझें। श्रीकृष्ण ने किया अपना यही इलाज। किसी भी घटना का रहस्योद्घाटन से पूर्ण अध्ययन करने पर उसके भयानक प्रशंसकों के विषदंत दूर हो जाते हैं जब मनुष्य की विवेकशीलता बुद्धि अज्ञान से असंयम हो जाता है? केवल तभी उसके आस-पास वाली घटनाएं होती थीं, जिसमें उसके ग्लास घोंटकर होने की घटनाएं होती थीं। जैसे नदियां समुद्र में और पतंगे अग्नि के मुख में तेजी से प्रवेश करती हैं वैसे ही सभी अव्यक्त रूप में विलेन हो जाते हैं। मृत्यु की घटना को इस प्रकार समझा जा सकता है कि मनुष्य भयमुक्त होकर अपने जीवन का सामना कैसे कर सकता है? क्योंकि उसके लिए सम्पूर्ण जीवन का अर्थ पत्रिका की एक खण्ड धारा है। इसलिए? काल की क्रीड़ा के रूप में मृत्यु एक डंक अपवित्र घटना बन जाती है। अगले श्लोक में इस मृत्यु को सम्पूर्ण घोर सौन्दर्य के साथ गौरवान्वित किया गया है
इस प्रकार, इस श्लोक में जीवन की नश्वरता और भगवान के विराट रूप की महिमा का वर्णन किया गया है।
11॥29॥
भगवद  गीता अध्याय: 11
श्लोक 30

श्लोक:
लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ताल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः।
 तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रंभासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो॥

भावार्थ:
आप उन सम्पूर्ण लोकों को प्रज्वलित मुखों द्वारा ग्रास करते हुए सब ओर से बार-बार चाट रहे हैं। हे विष्णो! आपका उग्र प्रकाश सम्पूर्ण जगत को तेज द्वारा परिपूर्ण करके तपा रहा है
महाऊर्मि के कुछ श्लोकों की रचना के बाद व्यासजी पुन: अपने पूर्व के विषय को निर्धारित करते हैं। जगत् के समस्त जीव वर्ग काल के मुख में प्रवेश करके नष्ट किये जा रहे हैं। इस काल तत्त्व की शुद्धि कभी न शांत होने वाली है। सभी लोगों का ग्रसन करते हुए आप अपना असवाद ले रहे हैं।वास्तु: यह श्लोक रचना स्थिति और संहार के पीछे के तीन सिद्धांत स्पष्ट करता हैं। 
G - Generator (सृष्टिकर्ता)
O - Operator (संचालक)
D - Destroyer (विनाशक)

यह भगवान के तीन मुख्य गुणों का प्रतीक है जो सृष्टि के रचना, पालन और संहार के लिए जिम्मेदार हैं।

हालाँकि हम इन तीनों की अलग-अलग रूप से कल्पना करते हैं वास्तव में ये तीनों एक ही प्रक्रिया के तीन मानक हैं। हमने पहले भी विस्तार से देखा है कि सर्वत्र मंदिर अस्तित्व का मूल रहस्य विध्वंस विध्वंस है। चलचित्र गृह में विभिन्न अभिलेखों की एक रील को प्रकाश वृत्त के रूप में दर्शाया गया है। उनके सामने आने वाले दूरदर्शी चित्रों से हम मृत कह सकते हैं और सम्मुख एसोसिएटेड को जन्म हुआ मान सकते हैं। लगातार हो रही जन्ममृत्यु की इस धारा के कारण सामने आ रहे एक खंडखंड चट्टान का आभास होता है। देश और काल से अवच्छिन्न ग्रह मेरे पास क्या है घटनाएँ और परिस्थितियाँ हमारे अनुभव में ज्ञान जगाती हैं और उनके इस उपदेश के सातत्य को हम अस्तित्व या जीवन कहते हैं। विष्णु और महेश की भाषा में पुराणों में कहा गया है। इस ज्ञान की दृष्टि से जब अर्जुन उस प्रकाशस्वरूप दीप्यमान समष्टि के रूप में दिखते हैं तब उसने कहा कि विराट के उग्र प्रकाश से प्रिय अंधवत हो जाता है। क्या आप उग्र रूप हैं इसलिए ऐसा भी समझें।
इस श्लोक में अर्जुन श्रीकृष्ण के विराट रूप का वर्णन कर रहे हैं। वे कहते हैं, "हे विष्णु! आप अपने अग्निज्वलित मुखों से समस्त लोकों को चारों ओर से ग्रस रहे हैं। आपके प्रचण्ड तेज से यह समस्त जगत व्याप्त हो रहा है और आपकी उग्र किरणें इसे दग्ध कर रही हैं।"यहां अर्जुन भगवान के उस रूप को देख रहे हैं जिसमें वे सृष्टि के सभी प्राणियों को समाहित कर रहे हैं। भगवान के मुख अग्नि के समान हैं, जो चारों ओर से समस्त लोकों को निगल रहे हैं। भगवान की इस दिव्य ज्योति से संपूर्ण संसार ओतप्रोत हो रहा है। उनकी यह उग्र किरणें अत्यंत प्रबल हैं, जो सब कुछ अपने तेज से जला रही हैं।इस श्लोक के माध्यम से यह बताया जा रहा है कि परमात्मा का विराट रूप असीमित और अनन्त है। उनकी शक्ति और तेज अपरिमित है, जो संपूर्ण सृष्टि को अपने में समाहित कर लेता है। यहाँ भगवान विष्णु की सर्वव्यापकता और सर्वशक्तिमानता को प्रकट किया गया है। उनका रूप इतनी तेजस्विता से भरा हुआ है कि कोई भी उसे सहन नहीं कर सकता, और यह सब कुछ नष्ट करने वाला प्रतीत होता है।
इस प्रकार, यह श्लोक हमें भगवान की महिमा, शक्ति और उनकी सर्वसमर्थता का बोध कराता है।
11॥30॥
भगवद  गीता अध्याय: 11
श्लोक 31

श्लोक:
आख्याहि मे को भवानुग्ररूपोनमोऽस्तु ते देववर प्रसीद।
 विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यंन हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम्‌॥

भावार्थ:
मुझे बतलाइए कि आप उग्ररूप वाले कौन हैं? हे देवों में श्रेष्ठ! आपको नमस्कार हो। आप प्रसन्न होइए। आदि पुरुष आपको मैं विशेष रूप से जानना चाहता हूँ क्योंकि मैं आपकी प्रवृत्ति को नहीं जानता
 अब अर्जुन पर यह अवसर भगवान श्रीकृष्ण की शक्ति की पवित्रता एवं दिव्यता को समझने का है। क्या यह अनुप्रमाणित हुआ सम्मान के साथ नतमस्तक का उपयोग करता है जिसमें अब तक उन्हें सिर्फ वृन्दावन के गोपाल के रूप में ही पहचाना गया था। हालाँकि वह बुद्धिमान था और उसकी सम्मिलन में यह दृश्य बहुत अधिक विशाल था। उसे पूर्ण रूप से देखना और उसका विश्लेषण करके उस पर विश्वास करना बेहद कठिन था। अब केवल यही कर सकते हैं कि आप अपने को भगवान के चरणों में समर्पित करके अकेले उनसे  विनती करें कि आप मुझे बताएं कि आप कौन हैं?, आपकी जिज्ञासा को और अधिक ठोस आकार के धारक अर्जुन ने सूचित किया है कि वह अपने प्रश्न का उत्तर शीघ्र ही चाहता है मैं आपको जानना चाहता हूँ। यह सुविदित तथ्य है कि अध्यात्मशास्त्र के ग्रंथों में सत्य के ज्ञान के लिए प्रखर जिज्ञासा को अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है क्योंकि वास्तव में साधकों की प्रेरणा होती है। लेकिन यहाँ अर्जुन का मन अपनी तात्कालिक समस्या या चुनौती का कारण व्याकुल था तो ऐसा नहीं कहा जा सकता कि वह वास्तव में यह दृश्य वास्तविक दिव्य सत्य को जानना चाहता है। इसमें यह जिज्ञासा है कि अपनी भावनाओं से अतिरंजित है और उसके साथ ही युद्ध के परिणामों को भी शामिल किया गया है। यह बात उसके इन शब्दों में स्पष्ट होती है कि मैं आपके प्रॉजेक्ट को नहीं जान पा रहा हूं। उसकी जिज्ञासा का अभिप्राय यह है कि इस उग्र रूप को धारण करते हुए अर्जुन ने कौरवों के विनाश में भगवान का क्या उद्देश्य रखा है जब वह किसी घटना के घाट से पीड़ित होने की इच्छा रखते हैं और उनके समरूप ऐसे लक्षण भी दिखाई देते हैं जो युद्ध में अपनी निश्चित विजय की भविष्यवाणी कर रहे हैं तो वह दस्तावेजों से इसकी पुष्टि चाहता है। यहाँ अर्जुन वही घटना देख भी रहा है वह जो भी देखता है वह स्वयं भगवान के मुख से ही उसकी पुष्टि चाहता है। तो उसका यह प्रश्न है। सत्य की ही एक अभिव्यक्ति है विनाश भगवान् ने एक ही रूप में अपने परिचय ढाँचे की घोषणा की है।
इस श्लोक में अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण से उनके विराट रूप के बारे में ही तो पूछ रहे हैं। अर्जुन ने श्रीकृष्ण का विराट रूप देखा, जिसमें वह अनेक मुखों, अनेक आँखों और विभिन्न रूपों में दिखाई दे रहे थे। यह रूप अत्यंत भयानक था, जिससे अर्जुन भयभीत हो गए थे।सिंपल पर अर्जुन खुद ही नहीं समझ पा रहे थे कि यह रूप किस उद्देश्य से धारण किया गया है और इसका क्या अर्थ है? इसलिए, वे विनम्रतापूर्वक भगवान श्रीकृष्ण से पूछते हैं कि वे कौन हैं और यह विराट रूप क्यों धारण किया है। अर्जुन भगवान से कृपा की याचना करते हैं और यह जानना चाहते हैं कि भगवान का यह अद्भुत रूप किस बात का सूचक है।इस श्लोक से यह पता चलता है कि जब किसी व्यक्ति को किसी महान शक्ति या सत्य का साक्षात्कार होता है, तो वह स्वाभाविक रूप से उसे समझने की जिज्ञासा और उस शक्ति से कृपा पाने की इच्छा करता है। अर्जुन की इस विनम्रता और जिज्ञासा से यह शिक्षा मिलती है कि ज्ञान की प्राप्ति के लिए विनम्रता और जिज्ञासा का होना आवश्यक है।
11॥31॥
भगवद  गीता अध्याय: 11
श्लोक 32

श्लोक:
(भगवान द्वारा अपने प्रभाव का वर्णन और अर्जुन को युद्ध के लिए उत्साहित करना) 
 श्रीभगवानुवाच
 कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धोलोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः।
 ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः॥

भावार्थ:
श्री भगवान बोले- मैं लोकों का नाश करने वाला बढ़ा हुआ महाकाल हूँ। इस समय इन लोकों को नष्ट करने के लिए प्रवृत्त हुआ हूँ। इसलिए जो प्रतिपक्षियों की सेना में स्थित योद्धा लोग हैं, वे सब तेरे बिना भी नहीं रहेंगे अर्थात तेरे युद्ध न करने पर भी इन सबका नाश हो जाएगा
 किसी भी वस्तु की एक अवस्था का नाश किये बिना उसका नवनिर्माण नहीं हो सकता। धार्मिक नाश की प्रक्रिया से ही जगत का निर्माण होता है। प्रोटोटाइप काल के शवागार्ट से ही आज की उत्पत्ति हुई है। इस उद्वेग विनाश के पीछे जो शक्ति दृश्य रूप में कार्य कर रही है वह वही साम्यवादी शक्ति है जो धर्म के जीवन के ऊपर शासन कर रही है। भगवान श्रीकृष्ण यहां स्वयं का परिचय लोक संहारक महाकाल के रूप में बनाते हैं। इस रूप में किसको धारण करने का प्रस्ताव उनकी पीढ़ी को नष्ट करना है जो अपने जीवन लक्ष्य के साथ विपरीत धारणाओं और घटिया जीवन मूल्यों को बनाए रखने के कारण जीर्णशीर्ण हो गया है। भगवान का लोकसंहारकारी भाव लोक उनका कल्याणकारी भाव विरोधी नहीं है। कभी-कभी विनाश करना भी मरना ही होता है। एक टूटे हुए पुल को या जीर्ण बांध को या प्राचीन इमारत को तोड़ना उक्त बातों के प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। उन्हें गिरियाना मर्ज़ी का ही एक कार्य है जो कोई भी विचारशील शासन समाज के लिए कर सकता है। यही सिद्धांत यहां लागू होता है।
जैसा आज की मोदी सरकार में भी होता नजर आता है और विपक्ष तेजी से पतन की ओर जाता दिखता है।
 इस उग्र रूप को धारण करने में भगवान का उद्देश्य उन सभी नकारात्मक शक्तियों का नाश करना है जो राष्ट्र के सांस्कृतिक जीवन को नष्ट करने पर तुली हुई हैं। भगवान के इस कथन से अर्जुन की विजय की आशा का विश्वास बदल जाता है। लेकिन भगवान ने यह बात भी स्पष्ट कर दी है कि पुनर्निर्माण के इस कार्य को करने के लिए कोई एक व्यक्ति या समुदाय का सहयोगी नहीं है। इस कार्य को करने में एक अकेला काल ही समर्थ है। उसी समाज में इस पुनर्जीवन को लाएगा। सार्वत्रिक ज्योतिष के इस अतिविशाल कार्य में व्यष्टि जीवमात्र भाग्य के प्राणी हैं। उनका होना या न होना भी काल की योजना पर निश्चित रूप से होना ही कायरान्वित रहेगा। राष्ट्र के लिए इस पुनर्जीवन के लिए मानव की मांग जगत की आवश्यकता है। भगवान स्पष्ट कहते हैं कि बिना इन भौतिकवादी योद्धाओं में से कोई भी इस निश्चित विनाश में जीवित नहीं रह पायेगा।महाभारत की कथा के सन्दर्भ में भगवान के कथन से यह स्पष्ट होता है कि कौरव सेना तो काल के पहले ही मर गई थी और पुनःप्राप्ति की सेना के सहयोग से अर्जुन निश्चित सफलता केवल साथ ही दे रही है। इसलिए सर्वव्यापी मनुष्य के प्रतिनिधि अर्जुन को यह उपदेश दिया जाता है कि वह निर्भय होकर अपने जीवन में कर्तव्य का पालन करे।उसके बाद के आने वाले की चिंता ना करे।जिसने आज का उज्वल निर्माण कर लिया उसका कल खुद उज्वल हो जाएगा।
भगवान श्रीकृष्ण यहाँ पर अपने विराट रूप में ब्रह्मांडीय रूप से प्रकट हो रहे हैं। वे कह रहे हैं कि मैं काल हूँ, अर्थात् समय का अवतार हूँ, और मैं संसार की समाप्ति का कारण हूँ। वर्तमान में, मैं पूरी सृष्टि को समाप्त करने के लिए सक्रिय हूँ।इस श्लोक में भगवान यह भी बताते हैं कि "काल" के रूप में वे सभी जीवों की अंतिम गति के दाता हैं। वे कहते हैं कि इस समय जो युद्ध चल रहा है, उसमें सभी योद्धा मेरे द्वारा विनाश के लिए आहूत किए गए हैं।सभी योद्धा जो इस युद्ध में शामिल हैं, उनके लिए निश्चित है कि वे मेरे द्वारा समाप्त होंगे। वे कह रहे हैं कि तुम्हारी, अर्थात् अर्जुन की, मृत्यु को लेकर कोई चिंता करने की आवश्यकता नहीं है।भगवान श्रीकृष्ण यह स्पष्ट कर रहे हैं कि संसार के अंत को कोई रोक नहीं सकता। वे स्वयं ही इस क्रम को नियंत्रित कर रहे हैं और इस प्रकार सभी योद्धाओं की मृत्यु निश्चित है, चाहे वे मेरे साथ युद्ध करें या मेरे बिना करें।इस श्लोक का संदेश है कि भगवान सब कुछ नियंत्रित कर रहे हैं और समय का तत्व सभी घटनाओं का अंतिम कारण है।
11॥32॥

भगवद  गीता अध्याय: 11
श्लोक 33

श्लोक:
तस्मात्त्वमुक्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून्भुङ्‍क्ष्व राज्यं समृद्धम्‌।
 मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्‌॥

भावार्थ:
अतएव तू उठ! यश प्राप्त कर और शत्रुओं को जीतकर धन-धान्य से सम्पन्न राज्य को भोग। ये सब शूरवीर पहले ही से मेरे ही द्वारा मारे हुए हैं। हे सव्यसाचिन! (बाएँ हाथ से भी बाण चलाने का अभ्यास होने से अर्जुन का नाम 'सव्यसाची' हुआ था) तू तो केवल निमित्तमात्र बन जा।

अर्जुनका नाम 'सव्यसाची' था इस नाम से भगवान अर्जुनसे कहते हैं कि तुम दोनों हाथ से बाण चलाओ अर्थात युद्ध में पूरी शक्ति लगाओ, तुम्हे तो निमित्तमात्र  बनने की ऊर्जा अपने बल, बुद्धि, क्षमता आदि को कम नहीं होने देगी  प्रत्युत तरल पदार्थ पूरा-का-पूरा चला जाता है। परन्तु मैंने मार दिया, मैंने विजय प्राप्त की - यह अभिमान नहीं करना है; क्योंकि ये सब मेरे द्वारा पहलेसे ही मारे गए हैं। इस लिए सुरक्षा केवल निमित्तमानवता है, कोई काम नया नहीं करना है तुमको।

निमित्तमात्रा अभिनीत कार्य करने में अपने ओर से किसी भी अंश में कमी नहीं रहनी पितृत्व, प्रत्युत् पूरी-की-पूरी शक्ति जुड़ेंगे मित्र कार्य करना। कार्यकी सिद्धिमें आपके अभिमानका किञ्चिन्मात्रा का भी अंश नहीं है। जैसे, भगवान श्रीकृष्णने गोवर्धन पर्वत उठाया तो उन्होंने ग्वालबालों से कहा कि तुमलोग भी पर्वतके नीचे-अपनी-अपनी लाठियां लगाओ। सभी ग्वालबालों ने अपनी-अपनी लठियाँ लगायीं और वे ऐसा इशारा करते हैं कि हम सभी ग्वालबालों ने ही माउंट के ऊपर उठा रखा है। असल में पर्वत का नाम भगवान के बायें हाथ की छोटी उंगली था! ग्वालबालों में जब इस तरका अभिमान हुआ, तब भगवान ने अपना आकार थोड़ा-सी नीचे कर लिया। उगल नीचे ही करते करते पहाड़ के नीचे आने लगा तो ग्वालबालोंने पुकारकर भगवान से कहा -- 'अरे दादा ! मेरे! मेरे!! मेरे!!!' भगवान ने कहा कि जोर से शक्ति लगाओ। वे हर किसी के साथ अपनी पूरी शक्ति लगाकर भी पर्वत को ऊंचा नहीं कर सकते। तब भगवान ने पुनः आरंभ किया अपने आकार से पर्वत को ऊंचा कर दिया। ऐसे ही साधकों को परमात्मता प्राप्त होती है, उनके बल, बुद्धि, योग्यता आदिको तो पूर्ण-का-पूरा होते हैं, जिनमें कभी-कभी किंचिन्मात्र की भी कमी नहीं होती, गुण, पर परमात्मका अनुभव होने में बल, उद्योग, योग्यता, तत्परता, निपुणता, परिश्रम आदिको कारण अभिमान नहीं करना, शामिल तो केवल भगवान की कृपा को ही कारण देवभूमि। भगवानने भी गीता में कहा गया है कि सनातन अवनदी मादी प्राप्त मेरी कृपासे होगी ।
इसका भाव यह है कि जो व्यक्ति मेरी शरण में आता है और मेरी कृपा को प्राप्त करता है, वह सनातन अवनदी (शाश्वत और अपरिवर्तनीय) मादी (आत्मा) को प्राप्त कर लेता है।

यहाँ पर भगवान श्रीकृष्ण यह बता रहे हैं कि जो व्यक्ति उनकी शरण में आता है और उनकी कृपा को प्राप्त करता है, वह आत्मा की शाश्वत और अपरिवर्तनीय प्रकृति को समझ लेता है और उसे प्राप्त कर लेता है।
यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण और गहरा विचार है, जो आत्मा की प्रकृति और भगवान की कृपा के बारे में भी बताता है।इससे यह सिद्ध हुआ कि केवल निमित्तमात्रा बनने से साधक को परमात्मा की प्राप्ति होती है।

जब साधक अपना बल चालित उपकरण करता है। तब अपने बल के कारण बार-बार असफलता का अनुभव होता है और तत्त्वकी प्राप्ति में देरी होती है। यदि साधक अपना बलका किञ्चिन्मात्र भी अभिमान न करे तो वास्तविक सिद्धि हो जाती है। क्योंकि परमात्मा तो नित्य प्राप्त होते हैं, केवल अपने पुरुषार्थ के अभिमान के कारण ही उनका अनुभव नहीं हो रहा होता। इस पुरुषार्थके अभिमानको दूर करने में ही भलाई है।यदि मनुष्य अभिमान और फलेच्छा का त्याग करके प्राप्त परिस्थितिके अनुकूल-कर्म करने में निमित्तमात्र बन जाता है, तो उसका स्वभाव स्वतः सिद्ध होता है। क्योंकि जो हो रहा है, वह अपनी शक्ति से रोक नहीं सकता और जो नहीं है, वह नहीं करेगा, कोई अपनी शक्ति से रोक नहीं सकता। मूलतः सिद्धि-असिद्धिमें सम रहते हुए कर्तव्यकर्मोंका पालन किया जाय तो मुक्ति स्वतःसिद्ध है। बंधन, नरकोंकी प्राप्ति, चौरासी लाख योनियों की प्राप्ति--ये सभी कृतिसाध्य हैं और मुक्ति, कल्याण, भगवत्प्राप्ति, भगवत्प्रेम आदि सभी स्वतःसिद्ध हैं।अतएव तू उठ! यश प्राप्त कर और शत्रुओं को जीतकर धन-धान्य से सम्पन्न राज्य को भोग। ये सब शूरवीर पहले ही से मेरे ही द्वारा मारे हुए हैं। हे सव्यसाचिन! (बाएँ हाथ से भी बाण चलाने का अभ्यास होने से अर्जुन का नाम 'सव्यसाची' हुआ था) तू तो केवल निमित्तमात्र बन जा।
भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को संबोधित करते हुए यह बताते हैं कि सभी शत्रु पहले ही नष्ट हो चुके हैं। भगवान स्वयं ने उन शत्रुओं को नष्ट किया है, और अर्जुन को केवल उनकी मृत्यु का निमित्त (साधन) माना गया है। इसलिए, अर्जुन को अपनी क्षमताओं पर विश्वास रखते हुए युद्ध में उठ खड़ा होना चाहिए और विजय प्राप्त करनी चाहिए। इस श्लोक में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को यह समझाया कि विजय सुनिश्चित है, और उसे युद्ध के प्रति अपने कर्तव्य को निभाना चाहिए।
11॥33॥
भगवद  गीता अध्याय: 11
श्लोक 34

श्लोक:
द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च कर्णं तथान्यानपि योधवीरान्‌।
 मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठायुध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान्‌॥

भावार्थ:
द्रोणाचार्य और भीष्म पितामह तथा जयद्रथ और कर्ण तथा और भी बहुत से मेरे द्वारा मारे हुए शूरवीर योद्धाओं को तू मार। भय मत कर। निःसंदेह तू युद्ध में वैरियों को जीतेगा। इसलिए युद्ध कर
 गुरु द्रोणाचार्य, पितामह भीष्म, जयद्रथ और कर्ण तथा अन्य प्रतिद्वंद्वी नामी शूरवीर हैं, जिनपर विजय करना बड़ा कठिन काम है पर यह सब
 सुपरमार्केट योद्धाओं का अंत हो गया है अर्थात् वे सभी कालरूप मेरे द्वारा मारे जा चुके हैं। इसलिए हे अर्जुन ! मेरे द्वारा मारे गए शूरवीरोंको तुम मार दो। परंतु यह अभिमान मत करना कि तुम ने मारा है।
अर्जुन पितामह भीष्म और गुरु द्रोणाचार्य को मारने में उन्हीं के पाप देवता थे, यही अर्जुनके मन में व्यथा थी।अब मूल रूप से भगवान ही कह रहे हैं कि वह व्यथा भी तुम्हें मत घुसो  यानी भीष्म और द्रोण आदि को मारने से हिंसा आदि दोषों का विचार करने की राक्षस किंचिन्मात्र की भी तेरे को आवश्यकता नहीं है। अपने तुम क्षात्रधर्म(क्षत्रिय धर्म) का पालन करो अर्थात् युद्ध करो इसका त्याग मत करो। तुम इनपर विजय करो, पर विजय का अभिमान मत करो; क्योंकि ये सबके-सब मेरे द्वारा पहले से ही मारे गए हैं।इस युद्ध को तुम जीतो गे।मैंने कहा था कि हम जीतेंगे या वे हमें जीतेंगे

 यह हमें पता नहीं। इस प्रकार अर्जुन मन में सन्देह था। यहां चतुर्थवे अध्यायके आरोहण में भगवान ने विश्वरूप दर्शन की आज्ञा दी, तो इसमें भगवान ने कहा कि तुम और भी जो कुछ देखना चाहो, वह देख लो अर्थात् किसकी जय होगी और किसकी पराजय होगी--यह भी तुम देखो लो। फिर भगवान और विराट् रूप के भी, द्रोण और कर्णके नाकी बात भी बताई इस श्लोक में उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि युद्ध में निःसंदेह विजय होगी।

साधक को अक्सर अपने साधन में बाधा रूप से नशे की लत की बात का है, जो व्यक्ति आकर्षित करता है, उसे डर लगता है कि मेरा उद्योग कुछ भी काम नहीं कर रहा है; मूलतः यह आकर्षण कैसे मिटे तो ! भगवान ये सब-के-सब विघ्न विनाशन हैं। और मेरे द्वारा नष्ट किये गए हैं  इस लिए साधक कोई भी हो इस पर इस विशेष को महत्व न दे।
(आज जब हिंदुओं पर अत्याचार बड़े तो जो हिंदू डरपोक बने हुए थे अचानक एक जुट हो कर उस अत्याचार से भीड़ गए और भय पीछे हट गया)

यदि मानव को मारने का अधिकार होता है तो विधि-निषेध अर्थात शुभ कर्म, अशुभ कर्म मत करो--जैसे सिद्धांत, गुरुजन और संतो का कहना ही वैकल्पिक हो जाएगा। वह विधि निषेध किस पर लागू होगा, मूलतः मनुष्य किसी को मारता है या दुःख देता है तो पाप ही देता है क्योंकि यह उसका राग-द्वेष अन्धकार चेष्टा है। लेकिन क्षत्रिय के लिए शास्त्रविहित युद्ध प्राप्त हो जाय, तो सेवा और व्यवहार त्याग करके कर्तव्य-पालन करने से पाप नहीं लगता, क्योंकि यह क्षत्रियका स्वधर्म है।
'मेरे द्वारा मारे गए को तू मार'-- इस कथन से यह श्लोक आता है कि कालरूप भगवान के द्वारा सबके-के-सब मारे गए हैं तो दुनिया में कोई किसी को कैसे मारता है तो वह भगवान के द्वारा मारे गए को ही मारता है।  यदि मानव को मारने का अधिकार होता है तो विधि-निषेध अर्थात शुभ कर्म, अशुभ कर्म मत करो--जैसे सिद्धांत, गुरुजन और संतो का कहना ही वैकल्पिक हो जाएगा। वह विधिनिषेध किस्पर लागू होगा, मूलतः मनुष्य किसी को मारता है या दुःख देता है तो पाप ही देता है क्योंकि यह उसका राग-द्वेष अन्धकार की ही चेष्टा है। लेकिन क्षत्रियके ले शास्त्रविहित युद्ध प्राप्त हो जाय, तो सेवा और व्यवहार त्याग करके अपने कर्तव्य का पालन करने से पाप नहीं लगता, क्योंकि यह क्षत्रियका स्वधर्म है।

हिंदू धर्म में वर्णाश्रम धर्म के अनुसार, चार वर्णों के स्वाभाविक कर्म निम्नलिखित हैं:

ब्राह्मण:

- अध्ययन और अध्यापन
- यज्ञ और अनुष्ठान करना
- धर्म और न्याय की रक्षा करना

क्षत्रिय:

- राज्य और प्रशासन करना
- युद्ध और रक्षा करना
- न्याय और धर्म की रक्षा करना

वैश्य:

- व्यापार और वाणिज्य करना
- कृषि और पशुपालन करना
- समाज की आर्थिक व्यवस्था को बनाए रखना

शूद्र:

- अन्य वर्णों की सेवा करना
- समाज की सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था को बनाए रखना
- अपने कर्तव्यों का पालन करना और समाज के लिए उपयोगी बनना

यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि ये कर्म वर्णाश्रम धर्म के अनुसार हैं तो इस से बड़ा मोक्ष का कोई दूसरा मार्ग भी नहीं है।
श्रीकृष्ण अर्जुन को युद्ध के प्रति उनके आत्म-संस्कार को प्रोत्साहित कर रहे हैं। वे अर्जुन को बताते हैं कि उसने युद्ध में कई महत्वपूर्ण योद्धाओं को पराजित कर दिया है, और इसलिए उसे और अधिक चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने पहले ही महत्वपूर्ण विजय प्राप्त कर ली है, और उसे अपने प्रयासों को जारी रखना चाहिए क्योंकि उसकी विजय निश्चित है। इस प्रकार, यह श्लोक अर्जुन को मानसिक और भावनात्मक स्थिरता बनाए रखने और अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते रहने की प्रेरणा देता है।
11॥34॥

भगवद  गीता अध्याय: 11
श्लोक 35

श्लोक:
(भयभीत हुए अर्जुन द्वारा भगवान की स्तुति और चतुर्भुज रूप का दर्शन कराने के लिए प्रार्थना) 
 संजय उवाच
 एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृतांजलिर्वेपमानः किरीटी।
 नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णंसगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य॥

भावार्थ:
संजय बोले- केशव भगवान के इस वचन को सुनकर मुकुटधारी अर्जुन हाथ जोड़कर काँपते हुए नमस्कार करके, फिर भी अत्यन्त भयभीत हो कर के भगवान श्रीकृष्ण के प्रति गद्‍गद्‍ वाणी से बोले
 11॥35॥ 

नाटक कार के रूप में व्यासजी अपनी सहज स्वाभाविक कला कुशलता के दृश्य को युद्धभूमि से शांत और मौन राज प्रासाद में ले जाते हैं। जहां संजय और धृतराष्ट्र को तथा भूमि का युद्धांत सुनाया जा रहा था। इसी अध्याय में तीन बार पाठकों को कुरुक्षेत्र के भयोत्पादक वातावरण से दूर ले जाने वाला  व्यासजी न केवल इन दृश्यों की प्रभावशाली गति को दिखाते हैं वर्णों के मन को विश्राम की आवश्यकता भी होती है जो कठोर सौन्दर्य के सूक्ष्म विषय में तनाव अनुभव करने लगता है। यह कदापि नहीं भूलना चाहिए कि गीता में हमारा विशेष उपदेश है जिसमें पाण्डवों के न्यायपक्ष से पूर्ण सहानुभूति है। स्वाभाविक है कि भीष्म द्रोणादि के नाश का व्रतान्त कैसे सुना जाता होगा वैसे ही वह उस अंध वृद्ध व्यक्ति को घोर विध्वंस के प्रति संवैधानिक अनुमति चाहिए। जैसा कि हमने पहले भी देखा था कि केवल धृतराष्ट्र ही इस समय भी युद्ध रोक सकता था। और संजय को यह देखने की बेहद उत्सुकता है कि किस तरह यह रुका हुआ है। इस प्रकार इस श्लोक में सुसंगत भाषा से ही संजय का मंतव्य स्पष्ट हो जाता है। संभावित रूप से यह एक साहसपूर्ण भविष्यवाणी है जिसमें संजय ने धृतराष्ट्र के इस विनाशकारी युद्ध की निर्थकता को दर्शाया है। और एक अन्ध पुरुष कदापि नहीं देख पायेगा और अगर उसकी बुद्धि पर भी मोह का अधिकार हो तो देखने का प्रश्न ही सही नहीं है। अत्याधिक पुत्रशक्ति के कारण यदि राजा धृतराष्ट्र को सद्बुद्धि नहीं मिल पाती तो संजय एक मनोवैज्ञानिक उपचार का प्रयोग करके देखना चाहते हैं। अगर इस बात का विस्तृत वर्णन किया गया है कि किसी भी दृश्य को देखने वाले सभी लोग किस प्रकार के डर से कांप रहे हैं। तो निश्चित रूप से ही धृतराष्ट्र 
 के मन में भी आतंक फैला हुआ ही होगा। यदि कृष्ण के अतीत मित्र अर्जुन भी भय से कांपता हुए गदगद वाणी में भगवान से मिले हैं तो इस वर्णन से संजय यह स्पष्ट करते हैं कि किसी भी विवेकी पुरुष शेष युद्ध की भयावहता को और परास्त करने वाले पक्ष के लोगों को प्राप्त होने वाले भयंकर परिणामों को भी पहचान तो सकता ही है। लेकिन संजय के इन शब्दों का धृतराष्ट्र के मन पर भी कोई असर तो नहीं पड़ा। जो आपके पुत्रों के प्रति मूढ़ प्रेम के अतिरिक्त अन्य सभी प्रति पूर्ण अंध हो गया था। अर्जुन ने विश्वरूप भगवान को अपना आदर्श बनाकर रखा है।
और इस श्लोक में, अर्जुन की भक्ति और श्रद्धा को दर्शाया गया है। विराट रूप के दर्शन के बाद, अर्जुन ने भगवान कृष्ण के प्रति पूरी तरह से नतमस्तक हो गए। उनकी शारीरिक स्थिति—हाथ जोड़ना, कांपना, और सिर झुका लेना—उनकी गहरी श्रद्धा और भय को व्यक्त करता है।
अर्जुन का यह व्यवहार भगवान के विराट रूप की दिव्यता और असामान्यता का परिचायक है। विराट रूप का दर्शन एक अत्यंत चौंकाने वाला और डरावना अनुभव था, जिससे अर्जुन के भीतर गहरा श्रद्धा और भय उत्पन्न हुआ। यह श्लोक यह भी दर्शाता है कि भगवान की विराटता और उनके अद्वितीय स्वरूप के दर्शन से व्यक्ति के भीतर अद्वितीय भावनाएँ उत्पन्न हो सकती हैं।
11॥35॥
अब आगेके श्लोक से अर्जुन भगवानकी स्तुति करना आरंभ करते हैं।
भगवद  गीता अध्याय: 11
श्लोक 36

श्लोक:
अर्जुन उवाच
 स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च।
 रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्‍घा:॥

भावार्थ:
अर्जुन बोले- हे अन्तर्यामिन्! यह योग्य ही है कि आपके नाम, गुण और प्रभाव के कीर्तन से जगत अति हर्षित हो रहा है और अनुराग को भी प्राप्त हो रहा है तथा भयभीत राक्षस लोग दिशाओं में भाग रहे हैं और सब सिद्धगणों के समुदाय नमस्कार कर रहे हैं
  कविता के इस भावव्यंजय आकर्षण के द्वारा एक बार पुन: हमें उत्पन हुए औ वैभव से भव्य सुखद राजप्रसाद से कोलाहल और आश्चर्यमय विराटरूप की ओर ले जाया जाता है।
अब देखिये क्या अर्जुन के दोनों हाथ जुड़े हुए हैं?
 भयकंपित और विस्मय से अवरुद्ध कण्ठ से भगवान की स्तुति कर रहे है। यह चित्र अर्जुन की मनस्थिति का स्पष्ट परिचय देता है। चौदह श्लोकों की स्तुतिगान का यह खंड हिंदू धर्म में उपलब्ध सर्वोत्तम प्रार्थनाओं का प्रतिनिधित्व करता है। वस्तुत आम लोगों का यह संकल्प क्या है सुन्दरता लय और अर्थ की गहनता की दृष्टि से अधिक श्रेष्ठ किसी सार्वभौम प्रार्थना की कल्पना नहीं की जा सकती। हम देख रहे हैं कि अर्जुन की तत्त्वदर्शन की क्षमता शनैशनै इस विराट रूप के पीछे दिव्य अनंत सत्य को पहचान रही है। जब कोई व्यक्तिगत दर्पण में अपना प्रतिबिम्ब दिखता है तो क्या होता है? तब सामान्यतः उसे दर्पण की सतह का भान भी नहीं होता है लेकिन यदि वह ध्यान सतह पर केन्द्रित करे तो उसके लिए वह प्रतिबिम्ब प्राय: लुप्त सा हो जाता है। यहाँ भी अर्जुन जब तक उस विश्वरूप के हर रूप को ही देखने में लगा रहा तब तक इस विशाल रूप के सारतत्त्व अनंत स्वरूप को वह पहचान नहीं सका। अब इस खण्ड से यह स्पष्ट होता है कि अर्जुन ने विराट रूप को वास्तविक सत्य और अर्थ की पहचान करायी थी।

अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण के विराट रूप की दिव्यता और प्रभाव का वर्णन कर रहे हैं। अर्जुन ने देखा कि भगवान का विराट रूप इतना अद्भुत और भव्य है कि पूरा जगत इससे प्रभावित हो रहा है। सभी जीव-जंतु और दिशाएँ इस रूप को देखकर भयभीत हो रहे हैं, जबकि सिद्धों की मंडलियाँ इस विराट रूप की पूजा और नमस्कार कर रही हैं। यह श्लोक इस बात की पुष्टि करता है कि भगवान का विराट रूप सार्वभौम और अद्वितीय है, जो सभी की आँखों में आकाशीय भय और श्रद्धा पैदा करता है।
11॥36॥
भगवद  गीता अध्याय: 11
श्लोक 37

श्लोक:
कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन्‌ गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे।
 अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत्‌॥

भावार्थ:
हे महात्मन्‌! ब्रह्मा के भी आदिकर्ता और सबसे बड़े आपके लिए वे कैसे नमस्कार न करें क्योंकि हे अनन्त! हे देवेश! हे जगन्निवास! जो सत्‌, असत्‌ और उनसे परे अक्षर अर्थात सच्चिदानन्दघन ब्रह्म है, वह आप ही हैं
सिद्ध संघ आपको नमस्कार नहीं करते क्यों कि आप तो सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी के भी आदिकर्ता हैं। वह कौन सा सम्पूर्ण कार्य है जो जगत को दर्शाता है आदि सभी का नाम और सिद्धांत क्या है? जैसे घाटों का कारण मिट्टी और आभूषणों का कारण सुनहरा है। अनंतस्वरूप परमात्मा न केवल यही विश्व है परन्तु सभी देवताओं का ईश्वर भी है क्योंकि उसी सर्वशक्तिमान् परमात्मा से संपूर्ण जगत को तथा प्राकृतिक शक्तियों को सामर्थ प्राप्त होती है। इस चराचर जगत् को दो सत् और असत् में विभाजित किया जा सकता है। यहाँ सत् शब्द से अर्थ उन वस्तुओं से है जिनको इंद्रिय मन और बुद्धि के द्वारा जाना जा सकता है अर्थात जो स्थूल और सूक्ष्म रूप में व्यक्ति हैं। स्थूल विषय मूल और विचार व्यक्ति (सत्) कहलाते हैं। इस बातचीत का क्या कारण है? उसे असत् अर्थात् अव्यक्त कहते हैं। किसी व्यक्ति के जीवन पद्धति को नियन्त्रित करने वाला यह अव्यक्त कारण उस व्यक्ति के संस्कार या रिवाज ही हैं। यहां भगवान की दी गई आज्ञा के अनुसार वह सत् और असत् की परिभाषा दोनों ही है। और वह इन दोनों से भी आगे है। क्या आप भी इन दोनों में से एक हैं? लेकिन उन्हें प्रकाशित करने वाला प्रकाश उन दोनों से ही होता है। अंगूठी और कंठी ये दोनों निस्देह सोने के ही बने हैं? पर यहां असली सोने की परिभाषा नहीं दी जा सकती कि वह अंगूठी या कंठी है क्या ये दोनों आभूषण तो हैं ही? लेकिन इन दोनों से परे भी है. इस दृष्टि से संपूर्ण नामरूपों का सारतत्व होने से परमात्मा अक्षर और अव्यक्त दोनों एक ही हैं और अपने-अपने स्वरूप की दृष्टि से इन दोनों से परे अक्षर स्वरूप है। वहअक्षरतत्त्व चैतन्य स्वरूप है जो स्थूल और सूक्ष्म दोनों का ही प्रकाशक है। इसी अक्षर ने ही क्या विराट रूप धारण किया है अन्य स्तुति अर्जुन कर रहा है।प्रस्तुत खंड विश्व के सभी धर्मों में उपलब्ध सार्वभौमिक प्रार्थनाओं का प्रतिनिधित्व होता है। किसी भी धर्म या जाति के लोगों पर प्रति कोई आक्षेप नहीं हो सकता क्योंकि सनातन सत्य के विषय में कौन सा प्रतिपादित सिद्धांत है उसका ही सारा यह खंड है। यह भक्त के दिल को प्रिय अप्रेम की सीमा तक ऊँचा उठा सकता है। भक्त उसे साक्षात अनुभव करा सकते हैं। अर्जुन भगवान की स्तुति करते हुए कहा गया है।इस श्लोक में, अर्जुन भगवान कृष्ण से प्रश्न करते हैं कि अगर आप इस प्रकार के परम ब्रह्म और अनन्त देवता हैं, तो फिर मैं आपको कैसे नमन न करूं? आप ही ब्रह्मा, विष्णु, शिव, और सभी देवताओं के आदिकर्ता हैं, आप सृष्टि के संपूर्ण अस्तित्व के स्वामी हैं, इसलिए आपके प्रति आदर और भक्ति का प्रदर्शन न करना न केवल अनुचित है बल्कि अज्ञानता भी है। यह श्लोक भगवान के विराट रूप की अनुपम महानता को उजागर करता है और उनके प्रति अनन्य सम्मान की आवश्यकता को स्पष्ट करता है।
आप तो ब्रह्मा और अन्य देवताओं से भी बड़े और महान हैं, क्योंकि आप ही सृष्टि के आदिकर्ता हैं। आप अनन्त और सर्वव्यापी देवेश (ईश्वर) हैं, जो सम्पूर्ण जगत के निवास स्थल हैं। आप अक्षर (अविनाशी) और सत्त्व और असत्त्व से परे हैं। आपके दर्शन से और आपके प्रति सम्मान न दिखाना तो पूर्णतः असंगत है। आपसे न नमस्कार करने का कारण ही नहीं है।
11॥37॥
भगवद  गीता अध्याय: 11
श्लोक 38

श्लोक:
त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणस्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्‌।
 वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप।।

भावार्थ:
आप आदिदेव और सनातन पुरुष हैं, आप इन जगत के परम आश्रय और जानने वाले तथा जानने योग्य और परम धाम हैं। हे अनन्तरूप! आपसे यह सब जगत व्याप्त अर्थात परिपूर्ण हैं
 आदिदेव आत्मा ही आदिकर्ता है। चैतन्यस्वरूप आत्मा से ही सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी की उत्पत्ति हुई है। समष्टि मन और बुद्धि से अविच्छिन्न (मर्यादित सीमित) आत्मा ही ब्रह्माजी रूप है। विश्व के परम आश्रय संपूर्ण विश्व में तो भगवान निवास करते हैं इसलिए उसे यहां विश्व का परम आश्रय कहा गया है। जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है विश्व शब्द से केवल स्तूप जगत् ही नहीं जानना चाहिए वर्ण पूर्व श्लोक में बताया गया है कि सत् और असत् (व्यक्त और अव्यक्त) के रूप में ही विश्व के दो लोग शामिल हैं। विश्व शब्द को इस प्रकार समझने पर वेदांत के विद्यार्थियों को इस जीवन का संपूर्ण अर्थ समझ में नहीं आएगा। हमें शरीर मन और बुद्धि की जड़े उपाधियों के द्वारा जगत् का अनुभव होता है। ये स्वत्व जड़ होने के कारण उनका अपना चैतन्य नहीं है। आत्म चैतन्य के सम्बन्ध से ही वे चेतनवत् व्यवहार करने में समर्थ होते हैं।वस्तुतः क्या इन जड़ोतियों और उपाधियों की उत्पत्ति आत्मा से नहीं हो सकती? 
क्योंकि आध्यात्मिक अविवेकी है। हम यह भी नहीं कह सकते कि जड़ जगत की उत्पत्ति किसी अन्य स्वतन्त्र कारण से हुई है। क्योंकि आत्मा ही सर्वसम्बन्ध है एकमेव अद्वितीय सत्य है। इसलिए वेदांत में कहा गया है कि यह विश्व परम सत्य ब्रह्म पर अध्यारोपित है जैसे भ्रान्तिकाल में प्रेत स्तम्भ में अध्याय होता है। इस प्रकार की भ्रांति में वह स्तम्भ ही प्रेत और उसकी गति का और उत्पन्न हुई प्रतिक्रियाओं का वर्णन कहलायेगा। वस्तुत: स्तम्भ के अतिरिक्त भूत का कोई अनुभव या सत्यता नहीं है। इसी प्रकार यहां अर्जुन का निर्देश अत्यंत सुंदर से विश्व के दर्शन को प्रकट करता है। क्या आप जानते हैं और ज्ञान चैतन्य है क्या वह तत्व है? जो हमारे डॉक्टर को सत्यत्व प्रदान करता है। चैतन्य से प्रकाशित हुए बिना इस जड़ जगत् का ज्ञान सम्भव नहीं है?
 इसलिए यहां चैतन्यस्वरूप भगवान श्रीकृष्ण को कहा गया है। 
आत्मा साक्षात्कार के उपदिष्ट सभी साधनाओं की प्रक्रिया यह है कि इन्द्रियादि द्वारा धारण किया जाने वाला मन का ध्यान विषयों से निवृत्त कर उसे आत्मस्वरूप में स्थिर किया जाता है। जब यह मन वृत्तिशून्य हो जाता है तब शुद्ध चैतन्य स्वरूप आत्मा का साक्षात् अनुभवगम्य बोध होता है। इसलिए आत्मा को यहां वेद्य अर्थात अदृश्य तत्त्व कहा गया है। संपूर्ण विश्व आपके द्वारा व्याप्त है, जैसे सभी मिष्ठानों में मधुरता व्याप्त है या तरंगों में जल व्याप्त है वैसे ही विश्व में भी देवत्व का वास है। अभी तक कहा गया था कि अधिष्ठान के अतिरिक्त आध्यात्म वस्तु का कोई प्रमाण नहीं मिला। आत्मा ही उसकी अधिष्ठान है जिस पर यह नानाविश्व रचना की विशिष्टता हो रही है। इसलिए यहां कहा गया है कि आपके द्वारा यह विश्व व्याप्ति है। यह केवल उपनिषद प्रतिपादित है कि सत्य की ही पुनरुक्ति है कि अनंत ब्रह्म असमानता करता है लेकिन उसे कोई रोग नहीं हो सकता।
चेतन और जड़ के प्रत्यक्ष उदाहरण निम्नलिखित हैं:

चेतन के उदाहरण:

1. मानव: मानव एक चेतन प्राणी है, जिसमें आत्मा, बुद्धि, मन और इंद्रियाँ होती हैं।
2. जानवर: जानवर भी चेतन प्राणी होते हैं, जिनमें आत्मा और इंद्रियाँ होती हैं।
3. पौधे: पौधे भी चेतन प्राणी होते हैं, जिनमें आत्मा और इंद्रियाँ होती हैं, लेकिन उनकी चेतना मानव और जानवरों की तुलना में कम होती है।

जड़ के उदाहरण:

1. पत्थर: पत्थर एक जड़ पदार्थ है, जिसमें आत्मा और इंद्रियाँ नहीं होती हैं।
2. धातु: धातु भी एक जड़ पदार्थ है, जिसमें आत्मा और इंद्रियाँ नहीं होती हैं।
3. जल: जल एक जड़ पदार्थ है, जिसमें आत्मा और इंद्रियाँ नहीं होती हैं।

यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि चेतन और जड़ की परिभाषा विभिन्न दर्शनों और विज्ञानों में अलग-अलग हो सकती है।

अगर अन्न को लें और(भोजन) के बारे में चेतन और जड़ की चर्चा करना एक दार्शनिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है।

अन्न को जड़ माना जा सकता है, क्योंकि यह एक भौतिक पदार्थ है जिसमें आत्मा और इंद्रियाँ नहीं होती हैं। अन्न को हम खाते हैं, पचाते हैं और ऊर्जा के रूप में उपयोग करते हैं, लेकिन इसमें कोई चेतना या आत्मा नहीं होती है।

हालांकि, अन्न को चेतन भी माना जा सकता है, क्योंकि यह जीवन को बनाए रखने और ऊर्जा प्रदान करने में मदद करता है। अन्न को खाने से हमारे शरीर को ऊर्जा मिलती है और हमारी चेतना को बनाए रखने में मदद मिलती है।

इस प्रकार, अन्न को दोनों ही दृष्टिकोण से देखा जा सकता है - जड़ और चेतन। यह हमारे जीवन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और हमारी चेतना को बनाए रखने में मदद करता है।
अन्न,जल जीवन हैं क्यों कि अन्न ,जल के बिना जीवन नहीं ।
बिल्कुल! अन्न, जल और जीवन तीनों एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। अन्न और जल जीवन के लिए आवश्यक हैं, और जीवन के बिना अन्न और जल का कोई अर्थ नहीं है।

अन्न हमारे शरीर को ऊर्जा प्रदान करता है, जल हमारे शरीर को हाइड्रेटेड रखता है, और जीवन हमें इन दोनों चीजों का आनंद लेने का अवसर प्रदान करता है।

यहाँ एक सुंदर श्लोक है जो इस बात को दर्शाता है:

"अन्नं जलं जीवनम्"
"अन्नं देहं जलं प्राणम्"
"जीवनं सर्वम्"

अर्थात्: अन्न, जल और जीवन तीनों एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। अन्न हमारे शरीर को बनाता है, जल हमारे प्राणों को बनाता है, और जीवन हमें इन दोनों चीजों का आनंद लेने का अवसर प्रदान करता है।
पर  हिंदू धर्म में यह मान्यता है कि पितृ (पूर्वज) अन्न और जल को सीधे नहीं लेते हैं, बल्कि वह उनकी सुगंध से ही तृप्त हो जाते हैं।

इसलिए, जब हम पितृ तर्पण करते हैं, तो हम अन्न और जल को नहीं देते हैं, बल्कि उनकी सुगंध को ही पितृों को अर्पित करते हैं। यह मान्यता है कि पितृों की आत्मा सुगंध के माध्यम से तृप्त होती है और उन्हें शांति और संतुष्टि मिलती है।

यह एक सुंदर और अर्थपूर्ण अनुष्ठान है, जो हमें अपने पूर्वजों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता का प्रदर्शन करने का अवसर प्रदान करता है।
चलिए श्लोक के मूल भाव पर आते हैं।
त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणः: आप (भगवान कृष्ण) आदि देवता हैं, पुरातन पुरुष हैं। यहाँ "आदि देव" का तात्पर्य है कि आप स्वयं सृष्टि के आरंभ में ही विद्यमान हैं और आप ही सृष्टि के कर्ता हैं।
त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्: आप इस सम्पूर्ण ब्रह्मांड के परम आश्रय और आधार हैं। यानी, आप ही इस सृष्टि का मूल स्रोत हैं, जिसमें सृष्टि के समस्त प्राणियों और वस्तुओं का अस्तित्व निहित है।
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम: आप जानते हैं और सभी वस्तुओं को जानते हैं, आप ही विद्यमान हैं और आप ही परम धाम हैं। "वेत्तासि" का तात्पर्य है कि आप सर्वज्ञ हैं और "वेदीयं" का तात्पर्य है कि आप ही विदित हैं, यानि आपकी पहचान और पहचान की कोई सीमा नहीं है।
त्वया ततं विश्वमनन्तरूप: इस ब्रह्मांड का सम्पूर्ण विस्तार आपके अनंत रूप में समाहित है। आपका विराट रूप अनंत और अविनाशी है, जो सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त है।

यह एक सुंदर और गहरा श्लोक है जो भगवान कृष्ण की महिमा का वर्णन करता है। यहाँ इसकी सरल व्याख्या है:

भगवान कृष्ण आदि देवता हैं, जो सृष्टि के आरंभ में ही विद्यमान थे। वे सृष्टि के कर्ता हैं और सम्पूर्ण ब्रह्मांड के परम आश्रय और आधार हैं।

भगवान कृष्ण सर्वज्ञ हैं और सभी वस्तुओं को जानते हैं। वे विद्यमान हैं और परम धाम हैं। उनका विराट रूप अनंत और अविनाशी है, जो सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त है।

इस श्लोक में भगवान कृष्ण की महिमा का वर्णन किया गया है और यह बताया गया है कि वे सृष्टि के कर्ता और सम्पूर्ण ब्रह्मांड के परम आश्रय और आधार हैं।
इस श्लोक में भगवान कृष्ण ने अर्जुन को उनके विराट रूप की महानता और सार्वभौमिकता का अनुभव कराने की बात की है। यहाँ यह समझाया गया है कि भगवान कृष्ण ब्रह्मांड के आदिदेव, सृष्टि के कारण और इस सृष्टि के परम आश्रय हैं। उनका विराट रूप असीम और सर्वव्यापी है, जो सभी वस्तुओं और प्राणियों में व्याप्त है।
11॥38॥

भगवद  गीता अध्याय: 11
श्लोक 39

श्लोक:
वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्‍क: प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च।
 नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते॥

भावार्थ:
आप वायु, यमराज, अग्नि, वरुण, चन्द्रमा, प्रजा के स्वामी ब्रह्मा और ब्रह्मा के भी पिता हैं। आपके लिए हजारों बार नमस्कार! नमस्कार हो!! आपके लिए फिर भी बार-बार नमस्कार! नमस्कार!!
 इस श्लोक का मुख्य उद्देश्य भगवान श्रीकृष्ण के विराट रूप की असीमता और सर्वव्यापकता को दर्शाना है। अर्जुन भगवान के हर रूप में उनकी दिव्यता और शक्ति को पहचानते हुए उन्हें बार-बार प्रणाम कर रहे हैं।
11॥39॥
भगवद  गीता अध्याय: 11
श्लोक 40

श्लोक:
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व। 
 अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वंसर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः॥

भावार्थ:
हे अनन्त सामर्थ्यवाले! आपके लिए आगे से और पीछे से भी नमस्कार! हे सर्वात्मन्‌! आपके लिए सब ओर से ही नमस्कार हो, क्योंकि अनन्त पराक्रमशाली आप समस्त संसार को व्याप्त किए हुए हैं, इससे आप ही सर्वरूप हैं(भाव स्पष्ट है)
यह श्लोक भगवद्गीता के विराट रूप के दर्शन का वर्णन करता है। इसमें अर्जुन भगवान को सभी दिशाओं में, प्रत्येक स्थान पर और प्रत्येक वस्तु में उपस्थित मानते हुए उन्हें नमन कर रहे हैं।
 
इस प्रकार, इस श्लोक में भगवान की अनन्तता, सर्वव्यापकता और उनकी शक्ति का सम्मान प्रकट किया गया है। अर्जुन भगवान के विराट रूप को देखकर उनकी अपार शक्ति और उपस्थिति के प्रति श्रद्धा और सम्मान प्रकट कर रहे हैं।
11॥40॥
भगवद  गीता अध्याय: 11
श्लोक 41-42

श्लोक:
सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति।
 अजानता महिमानं तवेदंमया प्रमादात्प्रणयेन वापि॥
 यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु।
 एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षंतत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम्‌॥

भावार्थ:
आपके इस प्रभाव को न जानते हुए, आप मेरे सखा हैं ऐसा मानकर प्रेम से अथवा प्रमाद से भी मैंने 'हे कृष्ण!', 'हे यादव !' 'हे सखे!' इस प्रकार जो कुछ बिना सोचे-समझे हठात्‌ कहा है और हे अच्युत! आप जो मेरे द्वारा विनोद के लिए विहार, शय्या, आसन और भोजनादि में अकेले अथवा उन सखाओं के सामने भी अपमानित किए गए हैं- वह सब अपराध अप्रमेयस्वरूप अर्थात अचिन्त्य प्रभाव वाले आपसे मैं क्षमा करवाता हूँ
 
इस श्लोक में अर्जुन अपने पूर्ववर्ती वाक्यों पर खेद प्रकट करते हैं। वे श्री कृष्ण से कहते हैं कि उन्होंने अनजाने में, और बिना जानबूझकर, कृष्ण की महानता का अवमूल्यन किया। अर्जुन ने श्री कृष्ण को ‘हे कृष्ण’, ‘हे यादव’ और ‘हे सखा’ जैसे सामान्य संबोधन से पुकारा, जैसे वे एक साधारण मित्र हों, जबकि उनकी वास्तविक महिमा अनंत है। अर्जुन स्वीकार करते हैं कि यह सब उन्होंने प्रमाद (अज्ञानता) और प्रेम (प्रणय) के कारण किया, और इस प्रकार के संबोधन के लिए खेद प्रकट करते हैं। यहाँ पर अर्जुन के शब्दों में उनकी आत्म-आलोचना और श्री कृष्ण के प्रति गहरे सम्मान का संकेत मिलता है।
॥41-42॥
भगवद  गीता अध्याय: 11
श्लोक 43

श्लोक:
पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान्‌।
 न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्योलोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव॥
भावार्थ:
आप इस चराचर जगत के पिता और सबसे बड़े गुरु एवं अति पूजनीय हैं। हे अनुपम प्रभाववाले! तीनों लोकों में आपके समान भी दूसरा कोई नहीं हैं, फिर अधिक तो कैसे हो सकता है।
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि वे इस सृष्टि के सभी जीवों और अदृश्य प्राणियों के लिए पिता के समान हैं। भगवान की तुलना किसी भी अन्य व्यक्ति से नहीं की जा सकती क्योंकि वे स्वयं ही सृष्टि के सबसे पूजनीय गुरु हैं और उनसे बढ़कर कोई नहीं है। भगवान श्रीकृष्ण की महिमा इतनी व्यापक और अनुपम है कि सृष्टि के तीनों लोकों में उनका कोई समकक्ष या समान नहीं है।यह श्लोक इस बात पर प्रकाश डालता है कि भगवान श्रीकृष्ण का विराट रूप सभी जीवों के लिए सर्वोच्च है और उनकी उपस्थिति और प्रभाव अवर्णनीय और अनूठा है। उन्हें सच्चे अर्थ में पूजा और सम्मान देने का अधिकार केवल उनकी अनंत महिमा के कारण ही संभव है।इस प्रकार, इस श्लोक का संदेश यह है कि भगवान श्रीकृष्ण का स्वरूप अपरंपार और असाधारण है, और उनके बराबर का कोई अन्य नहीं है, जो इस सृष्टि के चर और अचर दोनों ही रूपों को समेटे हुए है।
 
आप ही इस चराचर संसार के पिता हैं, आप ही पूजनीय हैं और आप ही *गुरुओंके महान गुरु हैं।* हे अनंत अनंत भगवान! इस त्रिलोकी में आपके समान भी दूसरा कोई नहीं है, फिर और अधिक तो कैसे हो सकता है!
11॥43॥
भगवद  गीता अध्याय: 11
श्लोक 44

श्लोक:
तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायंप्रसादये त्वामहमीशमीड्यम्‌।
 पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम्‌॥

भावार्थ:
अतएव हे प्रभो! मैं शरीर को भलीभाँति चरणों में निवेदित कर, प्रणाम करके, स्तुति करने योग्य आप ईश्वर को प्रसन्न होने के लिए प्रार्थना करता हूँ। हे देव! पिता जैसे पुत्र के, सखा जैसे सखा के और पति जैसे प्रियतमा पत्नी के अपराध सहन करते हैं- वैसे ही आप भी मेरे अपराध को सहन करने योग्य हैं।
 अर्जुन स्वयं को सर्वशक्तिमान् भगवान के साक्षात साक्ष्य में वकौशल और तर्क करने की सूक्ष्म क्षमता का समावेश मिलता है। यूक्रेनियन में पूजनीय व्यक्ति का चरणस्पर्श अंकित किया जाता है? जो कि शारीरिक कर्म है उसका जो वास्तविक अभिप्राय है उसे हृदय के तांत्रिक भाव के रूप में प्राप्त करना होता है। आध्यात्मिक विचारधारा द्वारा किए गए कृत्यों को प्राप्त करना ही वास्तविक प्रणाम या साष्टांग प्रणाम है। अनात्म जड़वत डिग्रीयों के साथ तादात्म्य से उत्पन्न भावना और तत्केन्द्रित मिथ्या कल्पनाओं के कारण आपका ही हृदयस्थ आत्मा का हमें साक्षात अनुभव नहीं होता है। किस मात्रा में ये मिथ्या धारणाएँ नष्ट हो जाती हैं? वह मात्रा में निश्चित ही? हम आत्मा की शांति का अनुभव कर सकते हैं जो हमारा शुद्ध स्वरूप ही है। असल में देखा जाये? तो विनम्रता के इस लक्षण में हम अपने कलाकार पाश्विक सपनों की उस गठरी को ही निहत्थे कर रहे हैं? जो हमारी मूढ़ता और उचकता के कारण दुर्गंधित होता है वह स्वभाविक है कि? जब कोई भक्त? भक्ति और भक्ति की भावना से भगवान के चरण की खोज होती है? तो कलाकारों के लिए क्षमा याचना करता है। यहां अर्जुन भगवान से क्षमा याचना करते हैं कि क्या वे अपने अपराधियों को ऐसे ही सहन करते हैं? जैसे पिता पुत्र के? मित्र अपने मित्र के? प्रिय अपनी प्रिया के अपराध को सहन करता है। इन तीन उदाहरणों में वे सब घृणित अपराध शामिल हो जाते हैं? जो मनुष्य प्रभु भगवान के प्रति अज्ञानी है, वह अर्जुन भगवान को सामान्य रूप में धारण कर सकता है और यह सर्वातीत है? सार्वभौमिक उग्र रूप का त्याग करने की प्रार्थना करता है।
यह एक बहुत ही गहरा और आध्यात्मिक विचार है। 
मैं इसे सरल बनाने की कोशिश करूंगा:

अर्जुन भगवान कृष्ण से कहते हैं कि वे अपने अपराधों को क्षमा करें और अपने वास्तविक रूप में प्रकट हों। अर्जुन भगवान को अपने सामान्य रूप में देखना चाहते हैं, न कि उनके उग्र रूप में।

अर्जुन की यह प्रार्थना हमें सिखाती है कि हमें अपने अपराधों को स्वीकार करना चाहिए और अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानना चाहिए। हमें अपने अज्ञान और अपराधों के लिए क्षमा मांगनी चाहिए और अपने वास्तविक स्वरूप को प्रकट करने की प्रार्थना करनी चाहिए।

यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण आध्यात्मिक विचार है, जो हमें अपने जीवन में आत्म-ज्ञान और आत्म-शुद्धि की ओर ले जाता है।
वास्तव में! क्षमा करना और क्षमा पाना दोनों ही बहुत महत्वपूर्ण हैं। जब हम क्षमा करते हैं, तो हम अपने मन को हल्का करते हैं और अपने जीवन में सकारात्मकता को बढ़ाते हैं।

क्षमा करने से हमें कई फायदे होते हैं:

1. मन की शांति: क्षमा करने से हमारे मन को शांति मिलती है और हम अपने जीवन में अधिक संतुष्ट महसूस करते हैं।
2. संबंधों में सुधार: क्षमा करने से हमारे संबंधों में सुधार होता है और हम अपने प्रियजनों के साथ अधिक मजबूत और स्वस्थ संबंध बना सकते हैं।
3. आत्म-विकास: क्षमा करने से हम अपने आत्म-विकास में मदद करते हैं और हम अपने जीवन में अधिक सकारात्मक और आध्यात्मिक बन सकते हैं।

इसलिए, क्षमा करना और क्षमा पाना दोनों ही बहुत महत्वपूर्ण हैं। हमें अपने जीवन में क्षमा करने की आदत डालनी चाहिए और अपने मन को हल्का करने के लिए क्षमा पाने की प्रार्थना करनी चाहिए।

11॥44॥
भगवद  गीता अध्याय: 11
श्लोक 45

श्लोक:
अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे।
 तदेव मे दर्शय देवरूपंप्रसीद देवेश जगन्निवास॥

भावार्थ:
मैं पहले न देखे हुए आपके इस आश्चर्यमय रूप को देखकर हर्षित हो रहा हूँ और मेरा मन भय से अति व्याकुल भी हो रहा है, इसलिए आप उस अपने चतुर्भुज विष्णु रूप को ही मुझे दिखलाइए। हे देवेश! हे जगन्निवास! प्रसन्न होइए
 अर्जुन के विराट रूप के दर्शन से प्रभावित हो कर, वह अत्यंत हर्षित और विस्मित है। यह अद्भुत दृश्य उसके लिए पूरी तरह नया और अनदेखा है, जो उसे अत्यधिक आनंदित करता है। लेकिन विराट रूप की भव्यता और विराटता से उत्पन्न भय और असहजता के कारण उसका मन व्याकुल हो गया है।अर्जुन इस स्थिति में भगवान से प्रार्थना करता है कि वह अपने विराट रूप को त्याग कर अपने सामान्य और मानवीय रूप में प्रकट हों। उसकी यह प्रार्थना इस बात का संकेत है कि वह भगवान की वास्तविकता और सौम्यता को अपने लिए अधिक स्वीकार्य मानता है, जिससे कि वह शांतिपूर्वक युद्ध की स्थिति को समझ सके।अर्जुन की यह भावनाएँ हमें यह भी सिखाती हैं कि दिव्य और अलौकिक रूप के दर्शन से व्यक्ति को शांति और संतुलन बनाए रखना कठिन हो सकता है, और वास्तविकता के प्रति उसकी अपेक्षाएँ सरल और साधारण हो सकती हैं।
11॥45॥
भगवद  गीता अध्याय: 11
श्लोक 46

श्लोक:
किरीटिनं गदिनं चक्रहस्तमिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव।
 तेनैव रूपेण चतुर्भुजेनसहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते॥

भावार्थ:
मैं वैसे ही आपको मुकुट धारण किए हुए तथा गदा और चक्र हाथ में लिए हुए देखना चाहता हूँ। इसलिए हे विश्वस्वरूप! हे सहस्रबाहो! आप उसी चतुर्भुज रूप से प्रकट होइए
 अर्जुन भगवान के विराट रूप के दर्शन के लिए अत्यंत उत्सुक हैं क्योंकि वे जानते हैं कि इस रूप में भगवान की विश्वव्यापी शक्ति और दिव्यता का अद्भुत प्रदर्शन होता है। वे इस विराट रूप में भगवान को देखना चाहते हैं ताकि वे पूरी ब्रह्मांड की इस दिव्य छवि का अनुभव कर सकें और समझ सकें कि भगवान की शक्ति और उपस्थिति किस प्रकार से हर एक स्थान और हर एक प्राणी में समायी हुई है।इस श्लोक से यह संदेश भी मिलता है कि भगवान की अद्वितीय और असीमित शक्ति को समझना और देखना एक गहन और दिव्य अनुभव है, जो केवल भगवान की कृपा से संभव होता है।
अर्जुन भगवान कृष्ण से प्रार्थना कर रहे हैं कि वह उन्हें अपनी विराट रूप में दर्शन दें। अर्जुन भगवान से कहते हैं कि वह एक ऐसा रूप दिखाएँ जिसमें वह किरीटिन (मुकुटधारी), गदिन (गदा धारक) और चक्रहस्त (चक्रधारी) हैं। वे चाहते हैं कि भगवान इस रूप में उन्हें दर्शन दें, जिसमें वे चार भुजाओं वाले और हजारों हाथों वाले हैं।
यहाँ अर्जुन अपनी इच्छा को स्पष्ट शब्दों में चित्रित करता है कि? मैं आपको पूर्ववत देखना चाहता हूं। क्या वह भगवान के विराट रूप को देखने वालों में से एक है? जो उन्होंने संपूर्ण विश्व के साथ अपनी एकत्व को दर्शन देने के लिए धारण किया था। वेदांत द्वारा प्रतिपादित निर्गुण? निराकार तत्त्व या समष्टि के सिद्धांत का जब प्रत्यक्ष अनुभव होता है? तो विरले लोगों में ही वह प्रतिष्ठित धारणा शक्ति होती है कि वे उस सत्य को अपनी पूर्णता में समझकर अपना ध्यान केंद्रित कर सकते हैं। अगर कभी बुद्धि उसे सहारा भी दे तो? तो प्रिय भक्त का हृदय उसके साथ अधिक काल तक तादात्म्य नहीं रखता है। मन के स्तर पर सत्य को केवल रूपकों के द्वारा ही समझाकर उसका आनंददायक अनुभव किया जा सकता है? सीधे तौर पर उसका पूरा वैभव के द्वारा कभी नहीं। इस श्लोक में अर्जुन भगवान वासुदेव के सौम्य रूप के बारे में बताया गया है? जो भागवत के भगवान विष्णु का परमप्रसिद्ध रूप है। सभी पुराणों में ईश्वर का वर्णन रूपक की भाषा में चतुर्भुज के रूप में किया गया है। शरीर के शास्त्र विद्यार्थियों के लिए यह कोई प्रकृति की आसाधारण निर्मिति ही विशिष्ट हो सकती है। हम भूल गए हैं कि वास्तव में यह सत्य केवल एक सांतिक रूपक है। भगवान की ये चार भुजाएँ अन्तकरण चतुष्टय अर्थात् मन? बुद्धि? चित्त और व्यवहार के प्रतीक हैं। पुराणों में चतुर्भुजधारी भगवान का नील वर्ण कहा गया है और वे पीताम्बरधारी हैं अर्थात वे पीत वस्त्र धारण किये हुए हैं। नीलवर्ण से अभिप्राय उनकी अनंतता से है क्या वस्तु सदा नीलवर्ण से अभिप्राय है? जैसे ग्रीष्म ऋतु का निर्भ्र आकाश या गहरा सागर। पृथ्वी का वर्णन है पीत। इस प्रकार भगवान विष्णु के रूप का अर्थ यह है कि अनंत परमात्मा परिच्छिन्नता को धारण कर अंतकरण चतुष्टय के द्वारा जीवन का खेल खेला जाता है। यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि सभी धर्मों में ईश्वर का वर्णन एक ही प्रकार से किया गया है। वह भगवान सर्वज्ञ एवं सर्वशक्तिमान् है। ईश्वर के बाहुबल से ही मनुष्य को सफलता प्राप्त होती है? इसलिए सर्वशक्तिमान भगवान का निर्देश चतुर्भुजधारी के रूप में किया जा सकता है। भगवान विष्णु शंखचक्रगदापद्मधारी हैं। शंखनाद के द्वारा भगवान सभी को अपने गुप्त दर्शन की प्रार्थना करते हैं। यदि मनुष्य अपने हृदय की श्रेष्ठ भावनारूपी शंखनाद को अनुसुना कर देता है? तो दुख के रूप में उस पर गदा का आघात होता है। आख़िर क्या है अगर इंसान अपने में सुधार नहीं ला सका? तो अंतिम परिणाम चक्र के द्वारा शिरच्छेद है अर्थात् परमपुरुषार्थ की अप्राप्ति रूप नाश। इसके विपरीत? यदि किसी मानव दिव्य जीवन की खोज में उसकी पूर्ण प्रेरणा मिलती है? तो उसे पद्म अर्थात कमल की प्राप्ति होती है। हिंदू धर्म में कमल पुष्प आध्यात्मिक पूर्णता एवं शांति का प्रतीक है। भारतीय संस्कृति में यह सुखसमृद्धि का भी प्रतीक है। पाश्चात्य देश में शांति का प्रतीक शुभ्र कपोत को माना जाता है।संक्रांति में? अर्जुन चाहते हैं कि भगवान उनके सौम्य रूप और शांति में समर्पण करें। वेदांत केस्टिक और नवदीक्षित छात्रों के लिए सतत सूक्ष्मदर्शी सिद्धांत दर्शन की गति बनाए रखना कठिन होता है। बुद्धि की ऐसी थकान भारी राज्य में? उत्साही साधकों के लिए ऐसे विश्वसनीय विश्रामस्थल की आवश्यकता है? जहां विश्राम करके वे पुन: नवचैतन्य से युक्त हो सकते हैं। यह शांति का साया है भगवान का सगुण? साकार और सौम्यरूप। अर्जुन को वास्तविक दर्शक क्या कहते हैं? भगवान अपने विराट रूप का उपसंहार करके मधुर वचनों में उनका चित्रण करते   रहे हैं
11॥46॥
भगवद  गीता अध्याय: 11
श्लोक 47

श्लोक:
(भगवान द्वारा अपने विश्वरूप के दर्शन की महिमा का कथन तथा चतुर्भुज और सौम्य रूप का दिखाया जाना) 
 श्रीभगवानुवाच 
 मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदंरूपं परं दर्शितमात्मयोगात्‌।
 तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यंयन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम्‌॥

भावार्थ:
श्री भगवान बोले- हे अर्जुन! अनुग्रहपूर्वक मैंने अपनी योगशक्ति के प्रभाव से यह मेरे परम तेजोमय, सबका आदि और सीमारहित विराट् रूप तुझको दिखाया है, जिसे तेरे अतिरिक्त दूसरे किसी ने पहले नहीं देखा था
 
*तात्पर्य:* 
अर्जुन भगवान् के विश्वरूप को देखना चाहता था, अत: भगवान् कृष्ण ने अपने भक्त अर्जुन पर अनुकम्पा करते हुए उसे अपने तेजोमय तथा ऐश्वर्यमय विश्वरूप का दर्शन कराया। यह रूप सूर्य की भाँति चमक रहा था और इसके मुख निरन्तर परिवर्तित हो रहे थे। कृष्ण ने यह रूप अर्जुन की इच्छा को शान्त करने के लिए ही दिखलाया। यह रूप कृष्ण की उस अन्तरंगाशक्ति द्वारा प्रकट हुआ जो मानव कल्पना से परे है। अर्जुन से पूर्व भगवान् के इस विश्वरूप का किसी ने दर्शन नहीं किया था, किन्तु जब अर्जुन को यह रूप दिखाया गया तो स्वर्गलोक तथा अन्य लोकों के भक्त भी इसे देख सके। उन्होंने इस रूप को पहले नहीं देखा था, केवल अर्जुन के कारण वे इसे देख पा रहे थे। दूसरे शब्दों में, कृष्ण की कृपा से भगवान् के सारे शिष्य भक्त उस विश्वरूप का दर्शन कर सके, जिसे अर्जुन देख रहा था। किसी ने टीका की है कि जब कृष्ण सन्धि का प्रस्ताव लेकर दुर्योधन के पास गये थे, तो उसे भी इसी रूप का दर्शन कराया गया था। दुर्भाग्यवश दुर्योधन ने शान्ति प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया, किन्तु कृष्ण ने उस समय अपने कुछ रूप दिखाए थे। किन्तु वे रूप अर्जुन को दिखाये गये इस रूप से सर्वथा भिन्न थे। यह स्पष्ट कहा गया है कि इस रूप को पहले किसी ने भी नहीं देखा था।इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि वे उन्हें अपना दिव्य और विराट रूप दिखा रहे हैं। यह रूप अत्यंत तेजस्वी और अनंत है, जो सम्पूर्ण ब्रह्मांड को समेटे हुए है। यह स्वरूप पूर्ण रूप से अद्भुत और अनदेखा है, जिसे पहले किसी ने भी नहीं देखा। भगवान के इस विराट रूप में उनका दिव्य तेज, अनंतता और विश्व व्यापी स्वरूप प्रकट होता है, जो केवल उनके दिव्य योग की शक्ति से संभव है। अर्जुन को इस दिव्य रूप के दर्शन से यह समझ में आता है कि भगवान का स्वरूप न केवल अद्भुत है, बल्कि उसकी विशालता और शक्ति भी अतुलनीय है।
स्वयं भगवान यहाँ स्वीकार करते हैं कि उनके विश्वरूप का दर्शन करना किसी भी भक्त का विशेषाधिकार नहीं है। चतुर्थ कृपा के सागर भगवान श्रीकृष्ण के विशेष अनुग्रह के रूप में अर्जुन इस विरले लाभ का आनंद अनुभव कर सकते हैं। क्या यह भी विशेष रूप से कहा जाता है यह मेरा तेजोमय अनंत विश्वरूप पूर्व किसी ने नहीं देखा है। इसका अर्थ यह नहीं है कि गीता के रचियता महर्षि व्यास क्या हैं यहाँ कोई नये दर्शन की स्थापना और व्याख्या कर रहे हैं ये सत्यता वे भगवान से प्रमाणित करना चाहते हैं। इस कथन का अभिप्राय केवल इतना ही है कि सार्वभौम एकता का यह परिचय या अनुभव किसी व्यक्ति को  नहीं हुआ जैसे कि अर्जुन को युद्ध भूमि में हुआ था। इससे पहले अर्जुन का मन थका हुआ शरीर और मानसिक रूप से पूर्णताया यह थी अर्जुन की विषादपूर्ण हालत। विविध नामरूपमयी सृष्टि की अनेकता में एकता को देखना समझ सकने के लिए बुद्धि की एकाग्रता की जो उपयुक्त स्थिति आवश्यक है वे अर्जुन मीलों दूर थे। लेकिन भगवान श्रीकृष्ण ने अलौकिक योगशक्ति के प्रभाव से उन्हें दिव्यचक्षु प्रदान करना आवश्यक है जान संयोग के एक शांत क्षण में ही उसे विश्वरूप का दर्शन कराया। भगवान अपनी अभिप्राय को अगले श्लोक में स्पष्ट करते हैं
11॥47॥
भगवद  गीता अध्याय: 11
श्लोक 48

श्लोक:
न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानैर्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः।
 एवं रूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर॥

भावार्थ:
हे अर्जुन! मनुष्य लोक में इस प्रकार विश्व रूप वाला मैं न वेद और यज्ञों के अध्ययन से, न दान से, न क्रियाओं से और न उग्र तपों से ही तेरे अतिरिक्त दूसरे द्वारा देखा जा सकता हूँ।

*तात्पर्य:*
 इस प्रसंग में दिव्य दृष्टि को भलीभाँति समझ लेना चाहिए। तो यह दिव्य दृष्टि किसके पास हो सकती है? 
दिव्य का अर्थ है दैवी। जब तक कोई देवता के रूप में दिव्यता प्राप्त नहीं कर लेता, तब तक उसे दिव्य दृष्टि प्राप्त नहीं हो सकती। और यह देवता कौन है?
 वैदिक शास्त्रों का कथन है कि जो भगवान् विष्णु के भक्त हैं, वे देवता हैं,
 (विष्णुभक्ता: स्मृता देवा:)।
 जो नास्तिक हैं, अर्थात् जो विष्णु में विश्वास नहीं करते या जो कृष्ण के निर्विशेष अंश को परमेश्वर नहीं मानते हैं, उन्हें यह दिव्य दृष्टि प्राप्त नहीं हो सकती। ऐसा सम्भव नहीं है कि कृष्ण का विरोध करके कोई दिव्य दृष्टि भी प्राप्त कर सके। दिव्य बने बिना दिव्य दृष्टि प्राप्त नहीं की जा सकती। दूसरे शब्दों में, जिन्हें दिव्य दृष्टि प्राप्त है, वे भी अर्जुन की ही तरह विश्वरूप देख सकते हैं।  

 भगवद्गीता में विश्वरूप का विवरण है। यद्यपि अर्जुन के पूर्व यह विवरण अज्ञात ही था, किन्तु इस घटना के बाद अब विश्वरूप का कुछ अनुमान लगाया जा सकता है। जो लोग सचमुच ही दिव्य हैं, वे भगवान् के विश्वरूप को देख सकते हैं। किन्तु कृष्ण का शुद्धभक्त बने बिना कोई दिव्य नहीं बन सकता है। किन्तु जो भक्त सचमुच दिव्य प्रकृति के हैं, और जिन्हें दिव्य दृष्टि प्राप्त है, वे भगवान् के विश्वरूप का दर्शन करने के लिए उत्सुक भी नहीं रहते। जैसा कि पिछले श्लोक में कहा गया है, अर्जुन ने कृष्ण के चतुर्भुजी विष्णु रूप को देखना चाहा, क्योंकि विश्वरूप को देखकर वह सचमुच भयभीत हो उठा था।  

 इस श्लोक में कुछ महत्त्वपूर्ण शब्द हैं, यथा वेदयज्ञाध्ययनै: जो वेदों तथा यज्ञानुष्ठानों से सम्बन्धित विषयों के अध्ययन का निर्देश करता है। वेदों का अर्थ है, समस्त प्रकार का वैदिक साहित्य यथा चारों वेद (ऋग्, यजु, साम तथा अथर्व) एवं अठारहों पुराण, सारे उपनिषद् तथा वेदान्त सूत्र। मनुष्य इन सबका अध्ययन चाहे घर में करे या अन्यत्र। इसी प्रकार यज्ञ विधि के अध्ययन करने के अनेक सूत्र हैं—कल्पसूत्र तथा मीमांसा-सूत्र। दानै: सुपात्र को दान देने के अर्थ में आया है; जैसे वे लोग जो भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति में लगे रहते हैं, यथा ब्राह्मण तथा वैष्णव। इसी प्रकार क्रियाभि: शब्द अग्निहोत्र के लिए है और विभिन्न वर्णों के कर्मों का सूचक है। शारीरिक कष्टों को स्वेच्छा से अंगीकर करना तपस्या है। इस तरह मनुष्य भले ही इन सारे कार्यों—तपस्या, दान, वेदाध्ययन आदि को बेशक करे, किन्तु जब तक वह अर्जुन की भाँति भक्त नहीं होता, तब तक वह विश्वरूप का दर्शन ही नहीं कर सकता। निर्विशेषवादी भी कल्पना करते रहते हैं कि वे भगवान् के विश्वरूप का दर्शन कर रहे हैं, किन्तु भगवद्गीता से हम जानते हैं कि निर्विशेषवादी भक्त नहीं हैं। फलत: वे भगवान् के विश्वरूप को नहीं देख पाते।  

 ऐसे अनेक पुरुष हैं जो अवतारों की सृष्टि करते हैं। वे झूठे ही सामान्य व्यक्ति को अवतार मानते हैं, किन्तु यह मूर्खता है। हमें तो भगवद्गीता का अनुसरण करना चाहिए, अन्यथा पूर्ण आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्ति की कोई सम्भावना नहीं है। यद्यपि भगवद्गीता को भगवत्तत्व का प्राथमिक अध्ययन माना जाता है, तो भी यह इतना पूर्ण है कि कौन क्या है, इसका अन्तर बताया जा सकता है। छद्म अवतार के समर्थक यह कह सकते हैं कि उन्होंने भी ईश्वर के दिव्य अवतार विश्वरूप को देखा है, किन्तु यह स्वीकार्य नहीं, क्योंकि यहाँ पर यह स्पष्ट उल्लेख हुआ है कि कृष्ण का भक्त बने बिना ईश्वर के विश्वरूप को नहीं देखा जा सकता। अत: पहले कृष्ण का शुद्धभक्त बनना होता है, तभी कोई दावा कर सकता है कि वह विश्वरूप का दर्शन करा सकता है, जिसे उसने देखा है। कृष्ण का भक्त कभी भी छद्म अवतारों को या इनके अनुयायियों को मान्यता नहीं देता।
भगवान के छद्म रूप का अर्थ है भगवान के वे रूप जो प्रत्यक्ष नहीं होते हैं, लेकिन जिनके माध्यम से भगवान की उपस्थिति का अनुभव किया जा सकता है।

हिंदू धर्म में भगवान के कई छद्म रूपों का वर्णन किया गया है, जिनमें से कुछ प्रमुख हैं:

1. प्रकृति: भगवान की शक्ति और सौंदर्य का प्रतीक प्रकृति है। पेड़-पौधे, नदी-समुद्र, पहाड़-घाटी सभी भगवान के छद्म रूप हैं।
2. जीव-जन्तु: भगवान की शक्ति और करुणा का प्रतीक जीव-जन्तु हैं। पशु-पक्षी, मानव सभी भगवान के छद्म रूप हैं।
3. मंदिर और तीर्थ स्थल: भगवान की उपस्थिति का अनुभव करने के लिए मंदिर और तीर्थ स्थल बनाए जाते हैं। ये स्थल भगवान के छद्म रूप हैं।
4. गुरु और शास्त्र: भगवान की ज्ञान और शक्ति का प्रतीक गुरु और शास्त्र हैं। गुरु भगवान के छद्म रूप हैं जो हमें ज्ञान और मार्गदर्शन प्रदान करते हैं।
5. आत्मा: भगवान की शक्ति और चेतना का प्रतीक आत्मा है। आत्मा भगवान के छद्म रूप है जो हमारे भीतर वास करता है।

इन सभी छद्म रूपों के माध्यम से भगवान की उपस्थिति का अनुभव किया जा सकता है।
इन सब को धोखा भी नहीं कहा जा सकता।क्यों कि भगवान के छद्म रूप वास्तव में भगवान की शक्ति और उपस्थिति का प्रतीक हैं। यह हमें भगवान के साथ जुड़ने और उनकी उपस्थिति का अनुभव करने का अवसर प्रदान करता है।(कण कण में भगवान की धारणा बनाते है जो)

भगवान के छद्म रूप हमें भगवान की वास्तविक प्रकृति को समझने में मदद करते हैं। यह हमें भगवान की शक्ति, करुणा और ज्ञान का अनुभव करने का अवसर प्रदान करता है।

यह धोखा नहीं है, बल्कि यह भगवान की उपस्थिति का एक तरीका है जो हमें उनके साथ जुड़ने और उनकी शक्ति का अनुभव करने का अवसर प्रदान करता है। अब बुद्धि के द्वारा इनको परखा भी जा सकता है।भगवान किसी से कुछ लेते नहीं अपितु अब को देते है पालन हार हैं।
किंतु यह छद्म रूप भगवान के बराबर भी नहीं है। भगवान तो सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ और सर्वव्यापी हैं। वे सृष्टि के रचयिता, पालनकर्ता और विनाशक हैं।

भगवान की महिमा और शक्ति का वर्णन करना मुश्किल है। वे अनंत, अपरिमित और अगम्य हैं। उनकी शक्ति और ज्ञान की कोई सीमा नहीं है।

भगवान के बराबर कोई नहीं है, न तो कोई देवता, न तो कोई प्राणी, न तो कोई वस्तु। भगवान सर्वोच्च हैं और उनकी महिमा का वर्णन करना मुश्किल है।मुक्ति केवल भगवान ही देते है ऐसा समझ सकते है।
11।48॥

भगवद  गीता अध्याय: 11
श्लोक 49

श्लोक:
मा ते व्यथा मा च विमूढभावोदृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्‍ममेदम्‌।
 व्यतेपभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वंतदेव मे रूपमिदं प्रपश्य॥

भावार्थ:
मेरे इस प्रकार के इस विकराल रूप को देखकर तुझको व्याकुलता नहीं होनी चाहिए और मूढ़भाव भी नहीं होना चाहिए। तू भयरहित और प्रीतियुक्त मनवाला होकर उसी मेरे इस शंख-चक्र-गदा-पद्मयुक्त चतुर्भुज रूप को फिर देख
  विचलित एवं मोहित हो गये हो। अब इसे समाप्त करता हूँ। हे मेरे भक्त! तुम समस्त चिन्ताओं से पुन: मुक्त हो जाओ। तुम शान्त चित्त से अब अपना इच्छित रूप देख सकते हो।

*तात्पर्य:*

 भगवद्गीता के प्रारम्भ में अर्जुन अपने पूज्य पितामह भीष्म तथा गुरु द्रोण के वध के विषय में चिन्तित था। किन्तु कृष्ण ने कहा कि उसे अपने पितामह का वध करने से डरना नहीं चाहिए। जब कौरवों की सभा में धृतराष्ट्र के पुत्र द्रौपदी को विवस्त्र करना चाह रहे थे, तो भीष्म तथा द्रोण मौन थे, अत: कर्तव्यविमुख होने के कारण इनका वध होना चाहिए। कृष्ण ने अर्जुन को अपने विश्वरूप का दर्शन यह दिखाने के लिए कराया कि ये लोग अपने कुकृत्यों के कारण पहले ही मारे जा चुके हैं। यह दृश्य अर्जुन को इसलिए दिखलाया गया, क्योंकि भक्त शान्त होते हैं और ऐसे जघन्य कर्म नहीं कर सकते। विश्वरूप प्रकट करने का अभिप्राय स्पष्ट हो चुका था। अब अर्जुन कृष्ण के चतुर्भुज रूप को देखना चाह रहा था। अत: उन्होंने यह रूप दिखाया। भक्त कभी भी विश्वरूप देखने में रुचि नहीं लेता क्योंकि इससे प्रेमानुभूति का आदान-प्रदान नहीं हो सकता। भक्त या तो अपना पूजाभाव अर्पित करना चाहता है या दो भुजा वाले कृष्ण का दर्शन करना चाहता है जिससे वह भगवान् के साथ प्रेमाभक्ति का आदान-प्रदान कर सके।
भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को सम्बोधित किया है और कहा है कि इस विराट रूप को देखकर तुम्हें जो भय और भ्रम हुआ है, वह पूरी तरह से व्यर्थ है। इस दिव्य रूप की भयावहता से घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह रूप केवल अस्थायी है। तुम्हारे मन में जो डर और अज्ञानता उत्पन्न हुई है, उसे त्याग दो। वास्तव में, इस विराट रूप का दर्शन परमात्मा की एक विशेष माया है और इसका मूल स्वरूप प्रेम और सौम्यता है।
तुम्हें इस विराट रूप को देखकर पुनः शांति और प्रेम की भावना से अपने सामान्य रूप को देखना चाहिए। यह रूप सिर्फ एक अस्थायी दर्शन है और तुम्हारी चिरकालिक आत्मा के लिए असली रूप वही है जो तुम्हें प्रेम और शांति का अनुभव कराता है। इसीलिए, इस डर और भ्रम को छोड़कर, तुम फिर से मेरे वास्तविक रूप की अनुभूति करो, जो तुम्हारे मन में स्थायी प्रेम और शांति को लाएगा।
11॥49॥
भगवद  गीता अध्याय: 11
श्लोक 50

श्लोक:
संजय उवाच
 इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः।
 आश्वासयामास च भीतमेनंभूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा॥

भावार्थ:
संजय बोले- वासुदेव भगवान ने अर्जुन के प्रति इस प्रकार कहकर फिर वैसे ही अपने चतुर्भुज रूप को दिखाया और फिर महात्मा श्रीकृष्ण ने सौम्यमूर्ति होकर इस भयभीत अर्जुन को धीरज दिया।जिनको अर्जुन अपना मानता था उन गुरु योद्धाओं संबंधियों द्वारा मुफ्त का धीरज भी नहीं दिया जा सका।
वह तो भगवान श्रीकृष्ण ही हैं जिन्होंने अर्जुन को सम्बोधित किया है और कहा है कि इस विराट रूप को देखकर तुम्हें जो भय और भ्रम हुआ है, वह पूरी तरह से व्यर्थ है। इस दिव्य रूप की भयावहता से घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह रूप केवल अस्थायी है। तुम्हारे मन में जो डर और अज्ञानता उत्पन्न हुई है, उसे त्याग दो। वास्तव में, इस विराट रूप का दर्शन परमात्मा की एक विशेष माया है और इसका मूल स्वरूप प्रेम और सौम्यता है।
तुम्हें इस विराट रूप को देखकर पुनः शांति और प्रेम की भावना से अपने सामान्य रूप को देखना चाहिए। यह रूप सिर्फ एक अस्थायी दर्शन है और तुम्हारी चिरकालिक आत्मा के लिए असली रूप वही है जो तुम्हें प्रेम और शांति का अनुभव कराता है। इसीलिए, इस डर और भ्रम को छोड़कर, तुम फिर से मेरे वास्तविक रूप की अनुभूति करो, जो तुम्हारे मन में स्थायी प्रेम और शांति लाएगा।
 11॥50॥
भगवद  गीता अध्याय: 11
श्लोक 51

श्लोक:
(बिना अनन्य भक्ति के चतुर्भुज रूप के दर्शन की दुर्लभता का और फलसहित अनन्य भक्ति का कथन) ) 
 अर्जुन उवाच
 दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन।
 इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः॥

भावार्थ:
अर्जुन बोले- हे जनार्दन! आपके इस अतिशांत मनुष्य रूप को देखकर अब मैं स्थिरचित्त हो गया हूँ और अपनी स्वाभाविक स्थिति को प्राप्त हो गया हूँ
 11॥51॥
भगवद  गीता अध्याय: 11
श्लोक 52

श्लोक:
श्रीभगवानुवाच
 सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम।
 देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्‍क्षिणः॥

भावार्थ:
श्री भगवान बोले- मेरा जो चतुर्भज रूप तुमने देखा है, वह सुदुर्दर्श है अर्थात्‌ इसके दर्शन बड़े ही दुर्लभ हैं। देवता भी सदा इस रूप के दर्शन की आकांक्षा करते रहते हैं
 
*तात्पर्य:* 

इस अध्याय के 48वें श्लोक में भगवान् कृष्ण ने अपना विश्वरूप दिखाना बन्द किया और अर्जुन को बताया कि अनेक तप, यज्ञ आदि करने पर भी इस रूप को देख पाना असम्भव है। अब सुदुर्दर्शम् शब्द का प्रयोग किया जा रहा है जो सूचित करता है कि कृष्ण का द्विभुज रूप और अधिक गुह्य है। कोई तपस्या, वेदाध्ययन तथा दार्शनिक चिंतन आदि विभिन्न क्रियाओं के साथ थोड़ा सा भक्ति-तत्त्व मिलाकर कृष्ण के विश्वरूप का दर्शन संभवत: कर सकता है, लेकिन ‘भक्ति-तत्त्व’ के बिना यह संभव नहीं है, इसका वर्णन पहले ही किया जा चुका है। फिर भी विश्वरूप से आगे कृष्ण का द्विभुज रूप है, जिसे ब्रह्मा तथा शिव जैसे बड़े-बड़े देवताओं द्वारा भी देख पाना और भी कठिन है। वे उनका दर्शन करना चाहते हैं और श्रीमद्भागवत में प्रमाण है कि जब भगवान् अपनी माता देवकी के गर्भ में थे, तो स्वर्ग के सारे देवता कृष्ण के चमत्कार को देखने के लिए आये और उन्होंने उत्तम स्तुतियाँ कीं, यद्यपि उस समय वे दृष्टिगोचर नहीं थे। वे उनके दर्शन की प्रतीक्षा करते रहे। मूर्ख व्यक्ति उन्हें सामान्य जन समझकर भले ही उनका उपहास कर ले और उनका सम्मान न करके उनके भीतर स्थित किसी निराकार ‘कुछ’ का सम्मान करे, किन्तु यह सब मूर्खतापूर्ण व्यवहार है। कृष्ण के द्विभुज रूप का दर्शन तो ब्रह्मा तथा शिव जैसे देवता तक करना चाहते हैं।  

 भगवद्गीता (9.11) में इसकी पुष्टि हुई है—अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्—जो लोग उनका उपहास करते हैं, वे उन्हें दृश्य नहीं होते। जैसा कि ब्रह्मसंहिता में तथा स्वयं कृष्ण द्वारा भगवद्गीता में पुष्टि हुई है, कृष्ण का शरीर सच्चिदानन्द स्वरूप है। उनका शरीर कभी भी भौतिक शरीर जैसा नहीं होता। किन्तु जो लोग भगवद्गीता या इसी प्रकार के वैदिक शास्त्रों को पढक़र कृष्ण का अध्ययन करते हैं, उनके लिए कृष्ण समस्या बने रहते हैं। जो भौतिक विधि का प्रयोग करता है उसके लिए कृष्ण एक महान ऐतिहासिक पुरुष तथा अत्यन्त विद्वान चिन्तक हैं, यद्यपि वे सामान्य व्यक्ति हैं और इतने शक्तिमान होते हुए भी उन्हें भौतिक शरीर धारण करना पड़ा। अन्ततोगत्वा वे परम सत्य को निर्विशेष मानते हैं, अत: वे सोचते हैं कि भगवान् ने अपने निराकार रूप से ही साकार रूप धारण किया। परमेश्वर के विषय में ऐसा अनुमान नितान्त भौतिकतावादी है। दूसरा अनुमान भी काल्पनिक है। जो लोग ज्ञान की खोज में हैं, वे भी कृष्ण का चिन्तन करते हैं और उन्हें उनके विश्वरूप से कम महत्त्वपूर्ण मानते हैं। इस प्रकार कुछ लोग सोचते हैं कि अर्जुन के समक्ष कृष्ण का जो रूप प्रकट हुआ था, वह उनके साकार रूप से अधिक महत्त्वपूर्ण है। उनके अनुसार कृष्ण का साकार रूप काल्पनिक है। उनका विश्वास है कि परम सत्य व्यक्ति नहीं है। किन्तु भगवद्गीता के चतुर्थ अध्याय में दिव्य विधि का वर्णन है और वह कृष्ण के विषय में प्रामाणिक व्यक्तियों से श्रवण करने की है। यही वास्तविक वैदिक विधि है और जो लोग सचमुच वैदिक परम्परा में हैं, वे किसी अधिकारी से ही कृष्ण के विषय में श्रवण करते हैं और बारम्बार श्रवण करने से कृष्ण उनके प्रिय हो जाते हैं। जैसा कि हम कई बार बता चुके हैं कि कृष्ण अपनी योगमाया शक्ति से आच्छादित हैं। उन्हें हर कोई नहीं देख सकता। वही उन्हें देख पाता है, जिसके समक्ष वे प्रकट होते हैं। इसकी पुष्टि वेदों में हुई है, किन्तु जो शरणागत हो चुका है, वह परम सत्य को सचमुच समझ सकता है। निरन्तर कृष्णभावनामृत से तथा कृष्ण की भक्ति से आध्यात्मिक आँखें खुल जाती हैं और वह कृष्ण को प्रकट रूप में देख सकता है। ऐसा प्राकट्य देवताओं तक के लिए दुर्लभ है, अत: वे भी उन्हें नहीं समझ पाते और उनके द्विभुज रूप के दर्शन की ताक में रहते हैं। निष्कर्ष यह निकला कि यद्यपि कृष्ण के विश्वरूप का दर्शन कर पाना अत्यन्त दुर्लभ है और हर कोई ऐसा नहीं कर सकता, किन्तु उनके श्यामसुन्दर रूप को समझ पाना तो और भी कठिन है।

भगवान श्री कृष्ण इस श्लोक में अर्जुन से कहते हैं कि आपने जो विराट रूप देखा है, वह अत्यंत दुर्लभ है। यह रूप देवताओं के लिए भी सदा दर्शन की इच्छा रखने वाला होता है, लेकिन वे भी इसे प्रतिदिन नहीं देख सकते। इस विराट रूप का दर्शन करने के लिए विशेष योग्यता और परम धार्मिकता की आवश्यकता होती है। इसलिए, इस दिव्य रूप को देखना आपके लिए एक बहुत ही विशेष अनुभव है, जो साधारण मनुष्यों के लिए संभव नहीं होता।
11।।52।।
भगवद  गीता अध्याय: 11
श्लोक 53

श्लोक:
नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया।
 शक्य एवं विधो द्रष्टुं दृष्ट्वानसि मां यथा॥

भावार्थ:
जिस प्रकार तुमने मुझको देखा है- इस प्रकार चतुर्भुज रूप वाला मैं न वेदों से, न तप से, न दान से और न यज्ञ से ही देखा जा सकता हूँ।
 
*तात्पर्य:* 

कृष्ण पहले अपनी माता देवकी तथा पिता वसुदेव के समक्ष चतुर्भुज रूप में प्रकट हुए थे और तब उन्होंने अपना द्विभुज रूप धारण किया था। जो लोग नास्तिक हैं, या भक्तिविहीन हैं, उनके लिए इस रहस्य को समझ पाना अत्यन्त कठिन है। जिन विद्वानों ने केवल व्याकरण विधि से या कोरी शैक्षिक योग्यताओं के आधार पर वैदिक साहित्य का अध्ययन किया है, वे कृष्ण को नहीं समझ सकते। न ही वे लोग कृष्ण को समझ सकेंगे, जो औपचारिक पूजा करने के लिए मन्दिर जाते हैं। वे भले ही वहाँ जाते रहें, वे कृष्ण के असली रूप को नहीं समझ सकेंगे। कृष्ण को तो केवल भक्तिमार्ग से समझा जा सकता है, जैसा कि कृष्ण ने स्वयं अगले श्लोक में बताया है।
भगवद  गीता अध्याय: 11
श्लोक 54

श्लोक:
भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन।
 ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप॥

भावार्थ:
परन्तु हे परंतप अर्जुन! अनन्य भक्ति (अनन्यभक्ति का भाव अगले श्लोक में विस्तारपूर्वक कहा है।) के द्वारा इस प्रकार चतुर्भुज रूपवाला मैं प्रत्यक्ष देखने के लिए, तत्व से जानने के लिए तथा प्रवेश करने के लिए अर्थात एकीभाव से प्राप्त होने के लिए भी शक्य हूँ
 अनन्य भक्ति से तात्पर्य है भगवान के प्रति एकनिष्ठ और निस्वार्थ भक्ति। इसमें भक्त का मन और हृदय पूरी तरह से भगवान के प्रति समर्पित होता है, और वह किसी अन्य व्यक्ति या वस्तु के प्रति आकर्षित नहीं होता है।

अनन्य भक्ति के भाव में निम्नलिखित बातें शामिल हैं:

1. एकनिष्ठता: भक्त का मन और हृदय पूरी तरह से भगवान के प्रति समर्पित होता है।
2. निस्वार्थता: भक्त भगवान के प्रति अपनी भक्ति के लिए किसी प्रकार का लाभ या पुरस्कार की अपेक्षा नहीं करता है।
3. प्रेम और समर्पण: भक्त भगवान के प्रति गहरा प्रेम और समर्पण महसूस करता है।
4. विश्वास और श्रद्धा: भक्त भगवान के प्रति पूर्ण विश्वास और श्रद्धा रखता है।

अनन्य भक्ति के भाव से भक्त को भगवान के साथ गहरा संबंध बनाने में मदद मिलती है, और वह अपने जीवन में शांति, सुख और आनंद का अनुभव करता है।
11॥54॥
भगवद  गीता अध्याय: 11
श्लोक 55

श्लोक:
मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्‍गवर्जितः।
 निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव॥

भावार्थ:
हे अर्जुन! जो पुरुष केवल मेरे ही लिए सम्पूर्ण कर्तव्य कर्मों को करने वाला है, मेरे परायण है, मेरा भक्त है, आसक्तिरहित है और सम्पूर्ण भूतप्राणियों में वैरभाव से रहित है (सर्वत्र भगवद्बुद्धि हो जाने से उस पुरुष का अति अपराध करने वाले में भी वैरभाव नहीं होता है, फिर औरों में तो कहना ही क्या है), वह अनन्यभक्तियुक्त पुरुष मुझको ही प्राप्त होता है।
अब संपूर्ण गीताशास्त्र का सारभूत अर्थ कल्याण संक्षेप में कर्तव्यरूपसे बताया जाता है --, जो मुझे भगवान के लिए कर्म करने वाला है और मेरा ही परायण है -- सेवक स्वामी के लिए कर्म करता है लेकिन शेष प्राप्तयोग्य अपनी परमगति उसे प्रमाणित नहीं करता और यह तो मेरे लिए ही कर्म करने वाला है, और मुझे ही अपनी परमगति समझ वाला होता है? इस प्रकार परमगति मैं ही हूं ऐसा जो मत्परायण है। तथापि मेरा एक ही भक्त है अर्थात जो सबसे प्रकार की सभी इंद्रियों से परिपूर्ण उत्साह रखता है वह मेरा ही भजन है? ऐसा मेरा भक्त है। तथा जो धन? पूत? मित्र? स्त्री और बंधुवर्गमें सङ्ग--प्रीति--प्रेमसेअनुपयोगी है। तथा सभी भूतों में वैरभाव से अनुपयोगी है अर्थात अपना अत्यंत अनिष्ट करने की चेष्टा करने वालों में भी जो शत्रुभाव से अनुपयोगी है। ऐसा जो मेरा भक्त है? हे पाण्डव वह मुझे पाता है अर्थात् मैं ही उसकी परमगति हूँ? उसकी दूसरी कोई गति कभी नहीं होती। यह मैंने तेरे दर्शन के लिए इष्ट उपदेश दिया है।
11 ॥55॥ 
 
🌹ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायांयोगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे विश्वरूपदर्शनयोगो नामैकादशोऽध्यायः🌹
 ॥11॥


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