गुरुवार, 19 दिसंबर 2024

शिव गीता अध्याय 4


शिव गीता अध्याय 4
अगस्त जी जब ऐसा कहकर आश्रम कुछ गए तब राम खिड़कियों पर गोदावरी के पवित्र आश्रम में रामचंद्र शिवलिंग का स्थापन कर अगर जी के निर्देशानुसार जुझारसिंह शादी करवाना भी विभूति लगाए
रुद्राक्ष के आवरण पहर शिवलिंग को गोदावरी के पवित्र जल से अभिषेक कर वन के उत्पन्न हुए फूलों और फलों से उनका पूजन कर भस्म लगाए भाषण पर ही शयन करती व्याघ्र चर्म के आसन पर बैठे रहते थे
अनन्य बुद्धि घर शिव सहस्त्रनाम जा लगी
एक महीने तक फलाहार एक महीने तक पत्तों का भोजन एक महीना जलपान और एक महीना पवन को आहत कर की शाम तक हटाकर है इन्द्रियों को जीतकर प्रसन्न मन में ईश्वर का ध्यान कि हृदय कमल पर विराजमान अट्ठानवे
पार्वती को धारण की चार भुजा ने ट्रेन बिजली के समान पीली जटाधारी करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाशमान कोटी चन्द्रमा के समान शीतल कम गहने गहने यज्ञोपवीत शवों का पहली मूवी ज्यादा चरम रही
भक्तों के आश्रयदाता व गायक मुद्रा धारण करने वाली व्याघ्र चर्म का ही स्तरीय ओढ़ी
देवता और असुरों से पूजित हो गई पंच मूर्ख चंद्रमा मस्तक पर धारण किए त्रिशूल और डमरू लिए नित्य अविनाशी शुद्ध अक्षय ने का एक रूप शिवजी का इस प्रकार मिलकर ध्यान करते चार महीने बीत गए
पहले कालिख समुद्र के समान में कर शव
जिस प्रकार से समुद्र मंथन के समय मंदराचल के खिलौने से धोनी भी की सिर्फ राष्ट्र की जलाने की कमी शिव जी के बाद की अग्नि के समान भयंकर महान शब्द सुनकर राम जाएगा चकित हो जब तक गोदावरी के तट की
दृष्टि करती तब तक महा भयंकर महारथी पूंजी जनकपुर
रामचंद्र के आगे उपस्थित हुई उसी तेजी से चकित हो रामचंद्र को दसों दिशाएं धांसू थी
श्रेष्ठ आत्मिक जागृति रीति राजकुमार मोनू को प्राप्त हो गई
पर विचार करके जाना कि यह व्यक्तियों माया माया थी
वे महाबीर उठकर और अपने बड़े को चढ़ाकर तरह दिखने मंत्रों से अभिमंत्रित कर शुभारंभ पर दृष्टि कर भी न ही आग्नेयास्त्र वरना सोमा पुत्र सूर्य सूर्यास्त पांवटा सुदर्शना
महान चक्र काल चक्र वे शुरुआत रुद्राक्ष पाशुपतास्त्र ब्रह्मास्त्र राष्ट्र बेंच राष्ट्र व मात्र और रामा इत्यादि अनेक मंत्रों का राम ही प्रयोग किया
उस पेज में रामचंद्र के अस्त्र और शस्त्र इस प्रकार लीन हो गए जैसे समुद्र भी था और ओनली मग्न हो जाते ही था एक मात्र मिली धनुष जलकर रामचंद्र के हाथ से घिरा फिर ककहरा से जो अंग
में पहनते ही गोरखा जो प्रतीक्षा के आघात से रक्षा करता है
जो शर्म के बने होते ही जलकर गिर पड़ी
ये भी कर लक्ष्मण भयभीत और मूर्छित हो पृथ्वी विधि और रामचन्द्रजी निस्तब्ध हो केवल दिल्ली पृथ्वी पर बैठ गई और आँखें मींचे भयभीत हो शंकर की शरण को प्राप्त हुई और ऊंचे स्वर से ही शीर्ष पर
नाम का जप कर भी न कि और शिवजी को पृथ्वी में दंड प्रेरणा बारह माह करने लगी फिर था
को शुद्ध आय मान करने वाला शब्द लिखा हुआ उद्घोषक पृथ्वी चलाए मां और पर कम हुए तरफा क्षण मात्र हुई थी
चंद्रमा के समान शीतल हुआ जब रामचंद्र नेत्र खोल कर देखते ही तब उन्होंने संपूर्ण भूषण धारक ही वृषभ का दर्शन किया जिसका अम्रत के मंत्री से उत्पन्न हुई मक्खन के फ्रेंड की भांति श्री थे
जिसकी शंघाई में स्वयं में भी भी का तुम्हारी शोभित होती नीलमणि के समान दिल
खंड साम्राज्य भूषित रत्नों की माला से शो भी जो कि शेर चावलों से ही ही घर घर शब्द वाली घंटे काउंसिल दसों दिशाओं को पूर्ण करती हुई वृषभ पर चढ़ी इस सर्वाधिक मरी के समान शोरगुल क्रांति महारथी
जी झुग्गी करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाशमान करुणा चन्द्रमा के समान शीतल व्यास चरण का वस्त्र धारण की न हो का यज्ञोपवीत पहली संपूर्ण अलंकारों से युक्त बिजली के समान पीढ़ी जटाधारी नीलकण्ठ
बिहार का चरम ओढ़ी मस्तक
पर चंद्रमा विरासत की अनेक प्रकार के शस्त्रों से युक्त दस भाव तीन नेत्र युवा को शो में श्री श्री सच्चिदानंद स्वरूप को तथा निकट बैठी हुई कोई चंद्रमुखी नील कमल के तमाम मरकत मणि के समान सुंदर
शरीर वाली मूर्तियों की आबरू गुणों से युक्त तारों से युक्त राष्ट्रीय की तमाम शोभित विंध्य पर्वत के समान ऊंचे इस दिन भर से युक्त सुंदरम अधिभार और सुंदर वस्त्र वाली और डिग्री आभूषणों से युक्त कस्तूरी आती
वे सुगंध लड़ाई विजय माला धारण की नील कमल के समान नेत्रों वाली पीढ़ी के श्री शोभित मुख में ताम्बूल खान ने इसी शो भी अधिनस्थ वाली शिव जी के आलिंगन भी उत्पन्न हुए रोमांच युक्त शरीर वाली सच्चे
आनंद भूतपूर्व फिर लौकी की माता का सुंदर पदार्थों के स्टार की मूर्तिमान पात्र पर भतीजी को रामचंद्र ने देखा इसी प्रकार अपने अपने वाहन पर चढ़े आए हाथ में ली

भुंतर आदि सामना करती अपनी अपनी स्त्रियों से युक्त इन राशि वालों के से भिड़ गए
और सबसे आगे गरुण पर चढ़ी शंख चक्र गदा और पद्म धारण की नींद में के समान शरीर धारी बिजली के समान कान्तिमान लक्ष्मी से युक्त एकाग्र चित्त से रुद्राक्ष अध्याय का पाठ करते हुए जनार्दन और पीछे
हंस पर चढ़े हुए चतुर्मुख ब्रह्मा जी चारों वो खुद से ही ऋक् यजु साम और अट्ठारह इन चारों वेद तथा रिजल्ट्स उक्त का जप करते हुए बड़ी दाढ़ी और जता की
सहित में ईश्वर की स्तुति करती इसलिए
था
शीश के मंत्रों से इस स्तुति करते हुए मुनि मन धन पर गंगा आदि नदियों से युक्त नील वर्ण कहकर श्री शेखर के मंत्रों से शिव जी की स्तुति करती कैलाश पर्वत के समान अनंत आदि महाना रत्न से विभूषित
केवल परीक्षा पास करने वाले और इस स्तुति करते हुए और स्वर्ण की छड़ी हाथ में ली नंदी के आगे स्थित हुई दक्षिण की ओर पर्वत के तमाम मूषक पर चढ़े गणेश जी की मयूर पर चढ़े कहा
के महाकाल और चंदेश्वर घर सेना नायक कर मूर्ति की इधर उधर दिया
ढाबा होने की संभावना मां दूर स्थित काला अग्निहोत्र फीचर है और कुटीर मूर्ति वाले प्रमुख ग्रांड तथा उनके अग्रभाग में नृत्य करने वाली अंग्रेजी ऐसे अनेक मूर्ति वाले करोड़ों मददगार
और अनेक प्रकार के वाहनों पर थे चारों ओर मात्र मंडल पर पंचाक्षरी विधियां जब तक पर फिर भी विद्याधर थी
और दिव्य रुद्र के गीत गाते हुए किन्नरों के समरूप और
त्रयम्बक यजामहे इस मंत्र को जपने वाले ब्राह्मण हूं
आकाश ली वीणा बजा कर गाते और नाचते हुए नारद और नारद की विधि से नृत्य करते हुए रंभा भी अप्सराओं के झुंड और गाने में तत्पर रहता थी गंधर्वों के श्रम हो तो शिव जी के कानों में कुंडल की तरह
दरअसल नामक नाटक गीत गाने में पर कंबल और स्तर लाभों से भिड़ गए तब देश को को देखकर जी धातु और हर्ष से गदगद कंठ शिव जी की स्तुति और दिल्ली सहित नाम की
उच्चारण करें

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...