भगवद गीता अध्याय: 18
यह गीता का अंतिम अध्याय है, जिसमें पूर्वार्द्ध में योगेश्वर श्रीकृष्ण द्वारा प्रस्तुत अनेक प्रकार के संस्करणों का समाधान है तथा गीता का उपसंहार है कि गीता से लाभ क्या है? सत्रहवें अध्याय में आहार, तप, यज्ञ, दान और श्रद्धा के विभाग से संबंधित स्वरूप बताया गया है, वही सन्दर्भ में त्याग के प्रकार शेष हैं। मनुष्य जो कुछ करता है, कारण सहित कौन है? कौन कराता है? भगवान निर्माण हैं या प्रकृति? यह प्रश्न सबसे पहले आरंभ से है, जिस पर इस अध्याय में प्रकाश पुनः स्थापित किया गया है। इसी प्रकार वर्ण-व्यवस्था की चर्चा हो रही है। सृष्टि में उसके स्वरूप का विश्लेषण इस अध्याय में प्रस्तुत है। अंत में गीता से मिलने वाली विभूतियों पर प्रकाश डाला गया है।
गत अध्याय में कई प्रसंगों के खंडित अर्जुन ने स्वयं को एक प्रश्न बताया कि त्याग और संत को भी विभागसहित बताएं-
पौराणिक कथा: वास्तव में भगवद्गीता सत्रह अध्यायों में ही समाप्त हो चुका है। अठारहवाँ अध्याय तो पूर्वविवेकित विषयों का संक्षिप्त विवरण है। प्रत्येक अध्याय में भगवान बल निर्धारक का कहना है कि भगवान की सेवा ही जीवन का चरम लक्ष्य है। इसी विषय को इस आठवें अध्याय में ज्ञान के परम गुह्य मार्ग के रूप में संक्षेप में बताया गया है। पहले छह अध्यायों में भक्तियोग पर बल दिया गया- योगिनामपि सर्वेषाम्... - "समस्त योगियों में से जो योगी अपने अंतर में सदैव मेरा चिंतन करता है, वह सर्वश्रेष्ठ है।" अगले छह अध्यायों में शुद्ध भक्ति, प्राकृतिक प्रकृति और श्रम का विवेचन है। अंत के छह अध्यायों में ज्ञान, वैराग्य अपरा और परा प्रकृति के कार्य और भक्ति का वर्णन है। निष्कर्ष के रूप में यह कहा गया है कि सभी कार्यों को भगवान से कहा जाना चाहिए, जो ॐ तत् सत् शब्द से प्रकट होते हैं और यह शब्द परम पुरुष विष्णु के सूचक हैं। भगवद्गीता के तीसरे खंड से यही प्रकट होता है कि भक्ति ही एकमात्र जीवन का चरम लक्ष्य है। पूर्वाचार्य एवं ब्रह्मसूत्र या वेदांत-सूत्र का उद्धरण इसकी स्थापना बताई गई है। कुछ निर्विशेष वेदांत सूत्र के ज्ञान पर अपना एकाधिकारिक ज्ञान है, लेकिन वास्तव में वेदांत सूत्र भक्ति को समझने के लिए है, क्योंकि ब्रह्मसूत्र के रचयिता (प्रणेता) साक्षात् देवता हैं और वे ही इसके ज्ञाता हैं। इसका वर्णन पन्द्रहवें अध्याय में हुआ है। प्रत्येक शास्त्र, प्रत्येक वेद की लक्ष्य भक्ति है। भगवद्गीता में यही व्याख्या है।
जिस प्रकार द्वितीय अध्याय में संपूर्ण विषयवस्तु के प्रस्तावना (सार) का वर्णन है, उसी प्रकार चतुर्थ अध्याय में संपूर्ण उपदेश का सारांश दिया गया है। इसमें त्याग (वैराग्य) और त्रिगुणातीत दिव्य पथ की प्राप्ति को ही जीवन का लक्ष्य बताया गया है। अर्जुन भगवद्गीता के दो विषय हैं, त्याग और संत। अतएव वह इन शब्दों के अर्थ की जिज्ञासा कर रहा है।
इस श्लोक में भगवान को मूर्तिमान करने के लिए उपयुक्त हृषिकेश तथा केशिनिशुदन- ये दो शब्द महत्वपूर्ण हैं। हृषिकेश कृष्ण हैं, संपूर्ण इंद्रियों के स्वामी, जो हमें मानसिक शांति प्राप्त करने में सहायक भूमिका निभाते हैं। अर्जुन की प्रार्थना है कि वे सभी बातें इस तरह से करें, जिससे वह समभाव में स्थिर रहें। फिर भी उनके मन में कुछ संशय हैं और ये संशय असुरों के समान होते हैं। अतएव वह कृष्ण को केशी-निशुदन द्वारा चित्रित किया गया है। केशी अत्यंत दुर्जेय असुर था, जिसका वध कृष्ण ने किया था। अब अर्जुन चाहते हैं कि वे अपने संशय रूपी असुर का वध करें।
केशी-निशुदन की यह कहानी संक्षेप में इस तरह है
केशी एक राक्षस था जो भगवान श्रीकृष्ण का दुश्मन था। वह बहुत ही शक्तिशाली और दुर्जेय था। एक दिन, केशी ने भगवान श्रीकृष्ण को मारने का निश्चय किया और उनके पास आया।
भगवान श्रीकृष्ण ने केशी को देखकर कहा, "केशी, तुम मुझे मारने के लिए आये हो, लेकिन मैं तुम्हें बताता हूँ कि तुम्हारी मृत्यु पहले से ही निश्चित है।"
केशी ने भगवान श्रीकृष्ण की बात को अनसुना कर दिया और उन पर हमला करने की कोशिश की। लेकिन भगवान श्रीकृष्ण ने केशी को अपनी शक्ति से मार दिया।
इस कहानी का अर्थ यह है कि जो व्यक्ति अपने अहंकार और अभिमान के कारण भगवान के विरुद्ध कार्य करता है, वह अपनी मृत्यु को आमंत्रित करता है। लेकिन जो व्यक्ति भगवान की शरण में आता है और उनकी भक्ति करता है, वह अपने जीवन को सफल और सार्थक बना सकता है।
अब आगे:
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 1
श्लोक:
(त्याग का विषय)
अर्जुन उवाच
सन्न्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम्।
त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन॥
भावार्थ:
अर्जुन बोले- हे महाबाहो! हे अन्तर्यामिन्! हे वासुदेव! मैं संन्यास और त्याग के तत्व को पृथक्-पृथक् जानना चाहता हूँ
॥1॥
भगवान श्रीउवाच
काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः।
सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यगं विचक्षणाः
18॥2॥
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण दो प्रकार के त्याग की चर्चा कर रहे हैं। पहले प्रकार के त्याग को लेकर पण्डितजन (ज्ञानी लोग) यह मानते हैं कि जब कोई व्यक्ति काम्य कर्मों
(जैसे कि यज्ञ, दान, तप आदि) को त्याग देता है जो किसी विशेष फल की प्राप्ति के लिए किए जाते हैं, तो यही संन्यास होता है।
इन कर्मों को करने का उद्देश्य किसी विशेष लाभ प्राप्त करना होता है, जैसे संतान प्राप्ति, धन की प्राप्ति, या किसी संकट से मुक्ति। इसलिए इन कर्मों के त्याग को संन्यास के रूप में देखा जाता है।
दूसरे प्रकार के त्याग की दृष्टि से, जो अनुभवी और विवेकशील लोग होते हैं, वे सभी कर्मों के फल का त्याग करने को संन्यास मानते हैं। इसका अर्थ है कि व्यक्ति को केवल कर्म करने में ही ध्यान देना चाहिए, और उनके परिणामों की चिंता नहीं करनी चाहिए। यहां पर ‘सर्वकर्मफलत्याग’ का मतलब है कि सभी प्रकार के कर्मों के फल की आशा और इच्छा को छोड़ देना।
यह दृष्टिकोण भगवान के प्रति भक्ति, देवताओं की पूजा, माता-पिता और गुरुजनों की सेवा, यज्ञ, दान, तप, और वर्णाश्रम के अनुसार जीवन यापन के सभी कर्तव्यों में परिलक्षित होता है।
इस प्रकार, इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण हमें बताते हैं कि त्याग केवल काम्य कर्मों के छोड़ने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सभी कर्मों के फल की आस और उनके प्रति मोह को भी त्यागने का नाम है।
यह समझने के लिए कि सच्चा संन्यास क्या है, केवल कर्मों का त्याग ही नहीं बल्कि कर्मों के परिणामों की इच्छा को भी छोड़ना आवश्यक है।
अर्थात भौतिक इच्छा पर आधारित कर्मों के परित्याग को विद्वान लोग संत कहते हैं और सभी कर्मों के फल-त्याग को बुद्धिमान लोग कहते हैं।
कर्मफल की खोज से निकले कर्म का त्याग करना चाहिए । यही भगवद्गीता का उपदेश है। लेकिन जिन कर्मों से उच्च आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त होता है, उनका परित्याग नहीं किया जाना चाहिए।
अगले श्लोक से यह स्पष्ट हो जाएगा। वैदिक साहित्य में किसी विशेष उद्देश्य से यज्ञ पूरा करने को अनेको पुस्तकों में उल्लेख किया गया मिल जाता है। कुछ यज्ञ ऐसे होते हैं, लेकिन जो अच्छी संतान प्राप्त करने के लिए या स्वर्ग की प्राप्ति के लिए जाते हैं, जो यज्ञ के लिए वशीभूत होने पर भी उन्हें त्यागना चाहिए।
किंतु आध्यात्मिक ज्ञान में प्रगति या हृदय की शुद्धि के लिए जाने वाले यज्ञों का अभ्यास करना बारम्बार करते रहना चाहिए।
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 3
श्लोक:
त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः।
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे॥
भावार्थ:
कई एक विद्वान ऐसा कहते हैं कि कर्ममात्र दोषयुक्त हैं, इसलिए त्यागने के योग्य हैं और दूसरे विद्वान यह कहते हैं कि यज्ञ, दान और तपरूप कर्म त्यागने योग्य नहीं हैं।
वैदिक साहित्य में ऐसे अनेक कर्म हैं, जहां विषय में प्रमुखता है । उदाहरणार्थ, कहा जाता है कि यज्ञ में पशुओं को मारा जा सकता है, फिर भी कुछ का मतलब है कि पशुओं को पूर्णतया मारा जा सकता है। हालाँकि वैदिक साहित्य में पशु वध की संस्तुति हुई है, लेकिन पशुओं को मारा जाना नहीं माना जाता है। यह पशु बलि को नवीन जीवन प्रदान करने के लिए उपलब्ध है। कभी-कभी यज्ञ में मारे गये पशु को नवीन पशु-जीवन प्राप्त होता है, तो कभी उसे पशु तत्क्षण मनुष्य योनि प्राप्त होती है। लेकिन इस संबंध में मनीषियों को मान्यता है। कुछ का कहना है कि पशुहत्या नहीं करनी चाहिए और कुछ का कहना है कि बलि के लिए विशेष यज्ञ करना शुभ है। अब यज्ञ-कर्म विषयक विभिन्न सोला का साध्य भगवान स्वयं कर रहे हैं।
18॥3॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 4
श्लोक:
निश्चयं श्रृणु में तत्र त्यागे भरतसत्तम।
त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः॥
भावार्थ:
हे पुरुषश्रेष्ठ अर्जुन ! संन्यास और त्याग, इन दोनों में से पहले त्याग के विषय में तू मेरा निश्चय सुन। क्योंकि त्याग सात्विक, राजस और तामस भेद से तीन प्रकार का कहा गया है
त्याग ,सात्विक,राजस ,तामस तीन तरह का होता है
हालाँकि त्याग के विषय में विभिन्न प्रकार के मत हैं, लेकिन परम पुरुष श्रीकृष्ण अपना निर्णय दे रहे हैं,
जिसे अब अंतिम माना जाना चाहिए । निसानदेह, सारे वेद भगवान द्वारा प्रदत्त विभिन्न विधान (नियम) हैं।
पर यहां पर तो भगवान साक्षात उपस्थित होते हैं, अतएव उनके वचनों को अंतिम मान लेना चाहिए।
भगवान कहते हैं कि भौतिक प्रकृति के तीन गुणों में से जिस गुण का त्याग किया जाता है, उसी के अनुसार त्याग का प्रकार किया जाना चाहिए।
18॥4॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 5
श्लोक:
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्।
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्॥
भावार्थ:
यज्ञ, दान और तपरूप कर्म त्याग करने के योग्य नहीं है, बल्कि वह तो अवश्य कर्तव्य है, क्योंकि यज्ञ, दान और तप -ये तीनों ही कर्म बुद्धिमान पुरुषों को (वह मनुष्य बुद्धिमान है, जो फल और आसक्ति को त्याग कर केवल भगवदर्थ कर्म करता है।) पवित्र करने वाले हैं
यज्ञ, दान तथा तपस्या कर्मों का कभी भी परित्याग नहीं करना चाहिए, उन्हें अनिवार्य रूप से ग्रहण करना चाहिए। निसंदेह यज्ञ, दान तथा तपस्वी महात्माओं को भी शुद्ध बताया जाता है।
योगी को चाहिए कि मानव समाज के विकास के लिए कर्म करें । मनुष्य को आध्यात्मिक जीवन तक ऊपर उठाने के लिए अनेक संस्कार (पवित्र कर्म) दिए गए हैं। उदाहरणार्थ, विवाहोत्सव एक यज्ञ माना जाता है। यह विवाह यज्ञ है।
एक संत ने, जिसने अपने परिवार से संबंध त्याग कर संन्यास ले लिया है, विवाहोत्सव को प्रोत्साहन दे?
भगवान कहते हैं कि मानव कल्याण के लिए जो भी यज्ञ हो, उसका कभी भी त्याग न करें। विवाह यज्ञ मानव मन को संयमित करने के लिए है, जिससे आध्यात्मिक प्रगति के लिए वह शांत हो जाता है। संन्यासी को भी चाहिए कि इस विवाह यज्ञ की संस्तुति अधिकतर के लिए पढ़ें। साधुओं को चाहिए कि फनी का संग न करें, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि जो व्यक्ति अभी जीवन के निम्नतम स्तर में है, अर्थात जो युवा है, वह विवाह - यज्ञ में पत्नी को स्वीकार न करे। सभी यज्ञ भगवान की प्राप्ति के लिए हैं। अतएव निम्नतम स्तर पर यज्ञों का परित्याग नहीं करना चाहिए। इसी प्रकार दान हृदय की शुद्धि (संस्कार) के लिए है। यदि सुपात्र को दिया जाता है, तो इससे आध्यात्मिक जीवन में प्रगति होती है, जैसा कि पहले वर्णित है।
अर्थात। इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण यह स्पष्ट करते हैं कि यज्ञ, दान, और तप इन तीन महत्वपूर्ण कर्मों को छोड़ना या त्याग करना उचित नहीं है। यज्ञ, दान और तप न केवल धार्मिक कृत्य हैं, बल्कि ये सभी कर्म व्यक्ति के आंतरिक और बाह्य शुद्धता के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। बुद्धिमान व्यक्ति वही है, जो इन कर्मों को फल की इच्छा और आसक्ति से मुक्त होकर करता है, और इन कर्मों द्वारा आत्मा की पवित्रता और उन्नति को प्राप्त करता है।
यहाँ पर भगवान श्रीकृष्ण ने यह भी स्पष्ट किया है कि यज्ञ, दान और तप केवल धार्मिक क्रियाएँ नहीं हैं, बल्कि ये मनुष्यों के मानसिक और आध्यात्मिक विकास के लिए भी महत्वपूर्ण हैं। इन कर्मों के माध्यम से व्यक्ति अपने जीवन में शांति, संतोष, और सच्चे ज्ञान को प्राप्त कर सकता है। इसलिए, इन कर्मों का पालन करना और इन्हें अपनी दैनिक जीवन का हिस्सा बनाना अनिवार्य है।
यज्ञ, दान, और तप, ये तीन प्रकार के कर्म त्यागने योग्य नहीं हैं अर्थात इनका त्याग करना नहीं बनता है।
उदाहरण के लिए क्यों करना है यह यज्ञ? दान और तब ये त्रिबुद्धि पुरुषों को अर्थात् फल,कामनारहित, पुरुषोंको पवित्र करने वाले हैं।
18॥5॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 6
श्लोक:
एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च।
कर्तव्यानीति में पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम्॥
भावार्थ:
इसलिए हे पार्थ! इन यज्ञ, दान और तपरूप कर्मों को तथा और भी सम्पूर्ण कर्तव्यकर्मों को आसक्ति और फलों का त्याग करके अवश्य करना चाहिए, यह मेरा निश्चय किया हुआ उत्तम मत है
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को उपदेश देते हुए कहा है कि सभी प्रकार के यज्ञ, दान और तप जैसे कर्मों को, तथा अन्य सभी कर्तव्य कर्मों को, हमें आसक्ति और उनके फलों की कामना के बिना करना चाहिए। श्रीकृष्ण ने स्पष्ट रूप से यह संकेत दिया है कि कर्मों को निष्काम भाव से, यानी किसी भी व्यक्तिगत लाभ की इच्छा के बिना करना ही सर्वोत्तम है।
संग का त्याग: कर्मों को करते समय व्यक्ति को कर्मफल की आसक्ति और जुड़ाव का त्याग करना चाहिए। यदि व्यक्ति कर्म करते समय फल की इच्छा रखता है, तो वह कर्म निष्काम नहीं होता।
कर्तव्य का निर्वहन: भगवान श्रीकृष्ण के अनुसार, यह निश्चय किया हुआ उत्तम मत है कि व्यक्ति अपने पारिवारिक ,समाजिक ,देश के प्रति कर्तव्यों को पूर्ण ईमानदारी से निभाते समय पूर्ण आत्मसमर्पण भाव और निष्कामता(किसी प्रकार के फल की इच्छा नकारते हुए साथ ही व्यक्ति अपने पारिवारिक ,समाजिक ,देश के प्रति कर्तव्यों को पूर्ण ईमानदारी से निभाते हुए कर्म करे।
इस प्रकार, यह श्लोक कर्मयोग की सिद्धि के लिए एक महत्वपूर्ण उपदेश प्रदान करता है, जो हमें सिखाता है कि कर्म करने के लिए केवल कर्म करने का महत्व होना चाहिए, न कि उसके फल का।
क्यों कि वैसे तो सभी यज्ञ शुद्ध करने वाले ही होते हैं, लेकिन मनुष्य को कार्य से कोई भी फल की इच्छा नहीं करनी चाहिए। दूसरे शब्दों में, जीवन में सभी यज्ञ भौतिक विकास के लिए ही तो हैं, उनका परित्याग करना चाहिए। लेकिन जिन यज्ञों से मनुष्य का अनुभव शुद्ध हो और जो आध्यात्मिक स्तर तक उठाने वाले हों, उन्हें कभी बंद नहीं करना चाहिए। जिस किसी वस्तु से कृष्णभावनामृत तक पहुंच जा सके, प्रोत्साहन देना चाहिए। श्रीमद्भागवत में भी कहा गया है कि जिस कार्य से भगवद्भक्ति का लाभ हो, उसे स्वीकार करना चाहिए। यही धर्म का सर्वोच्च पुजारी है। भगवद्भक्ति को ऐसे किसी भी कर्म, यज्ञ या दान को स्वीकार करना चाहिए, जो भगवद्भक्ति करने में सहायक हो। जैसे सब का भला ही मांगने को यज्ञ करे।सब के भले के साथ उसका भी तो भला ही होना है। परिवार का भला होगा तो उसका भी होगा? आज तो भाई , भाई की प्रगति को बर्दाश्त नहीं करता। देश का भला होगा तो उसका भला भी निश्चित है।
11॥6॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 7
श्लोक:
नियतस्य तु सन्न्यासः कर्मणो नोपपद्यते।
मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः॥
भावार्थ:
(निषिद्ध और काम्य कर्मों का तो स्वरूप से त्याग करना उचित ही है)
परन्तु नियत कर्म का
(इसी अध्याय के श्लोक 48 की टिप्पणी में इसका अर्थ देखने को चलते है अध्याय 18 श्लोक 48 जो इस प्रकार है:
"स्वभावजेन कौन्तेय निकुन्ज चोयः साहसात्।
नावृत्तिं ज्ञानवान्नैव अनुतिष्ठति कर्म यः।।"
इस श्लोक का अर्थ यह है:
"हे कुंतीपुत्र! स्वभाव से ही प्राप्त हुए कर्म को त्यागने से कोई लाभ नहीं होता है, क्योंकि स्वभाव से ही प्राप्त हुए कर्म को करने से ही ज्ञान प्राप्त होता है। जो व्यक्ति ज्ञान के अनुसार कर्म करता है, वह कभी भी कर्म को त्यागने की बात नहीं सोचता है।"
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि स्वभाव से ही प्राप्त हुए कर्म को करने से ही ज्ञान प्राप्त होता है, और जो व्यक्ति ज्ञान के अनुसार कर्म करता है, वह कभी भी कर्म को त्यागने की बात नहीं सोचता है।
(विपक्ष को कभी भी त्यागना नहीं चाहिए। यदि कोई मोहवश अपने नियोजित कर्मियों का परित्याग कर देता है, तो ऐसे त्याग को तामसी कहा जाता है।)
प्रकृति: जो कार्य भौतिक तुष्टि के लिए किया जाता है, उसे इसी तरह त्याग दिया जाता है, लेकिन जिन कार्यों से आध्यात्मिक विकास हो, वैसे भगवान के लिए भोजन बनाना, भगवान को भगवान का भोग लगाना, फिर प्रसाद ग्रहण करना, उनकी संस्तुति की जाती है। कहा जाता है कि संत को अपने लिए भोजन नहीं बनाना चाहिए। लेकिन आपके लिए खाना पकाना बेकार ही है, भगवान के लिए खाना पकाना बेकार नहीं है। इसी प्रकार अपने शिष्यों के कृष्णभावनामृत में प्रगति करने में सहायक बनने के लिए संत जन पहले भगवान को भोग लगा फिर खुद खाते हैं।
इसी प्रकार विवाह यज्ञ का विधान किया जा सकता है। यदि कोई ऐसे कार्य का परित्याग करता है, तो यह आवश्यक है कि वह तमोगुण के अधीन हो जाता है
स्वरूप से त्याग करना उचित नहीं है। इसलिए मोह के कारण उसका त्याग कर देना तामस त्याग कहा गया है।
इस प्रकार, यह श्लोक कर्मयोग की सिद्धि के लिए एक महत्वपूर्ण उपदेश प्रदान करता है, इस श्लोक का उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि हमें नियत कर्मों का त्याग नहीं करना चाहिए। ये कर्म हमें अपने कर्तव्यों को निभाने और जीवन में संतुलन बनाए रखने में सहायक होते हैं। मोह या भ्रम की स्थिति से प्रेरित होकर यदि हम इन कर्मों का त्याग करते हैं, तो यह एक तामसिक और दोषपूर्ण त्याग होगा, जो हमारे आत्मा के विकास में रुकावट डालता है।
18॥7॥
नोट 18।।7।।नित्य कर्म वे कर्म हैं जो एक हिंदू व्यक्ति को अपने दैनिक जीवन में करने होते हैं। ये कर्म व्यक्ति को अपने धर्म और कर्तव्य का पालन करने में मदद करते हैं।
नित्य कर्मों में शामिल हैं:
👉प्रातः उठ कर शौच, स्नान , ब्रश आदि करना
👉संध्या वंदन: सूर्योदय और सूर्यास्त के समय पूजा करना और संध्या मंत्रों का जाप करना।
👉 पूजा और अर्चना: अपने घर में देवताओं की पूजा करना और उन्हें अर्चना करना।
👉जप और ध्यान: अपने इष्ट देवता के मंत्रों का जाप करना और ध्यान करना।
👉हवन और यज्ञ: अग्नि की पूजा करना और हवन और यज्ञ करना।
👉 दान और पुण्य: गरीबों और जरूरतमंदों को दान देना और पुण्य करना।
👉स्वाध्याय: वेदों और अन्य धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन करना।
👉 आत्म-शुद्धि: अपने मन और आत्मा को शुद्ध बनाने के लिए प्रयास करना।
इन नित्य कर्मों को करने से व्यक्ति को अपने धर्म और कर्तव्य का पालन करने में मदद मिलती है, और वह अपने जीवन में अधिक शांति और संतुष्टि प्राप्त कर सकता है।
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 8
श्लोक:
दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत्।
स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत्॥
भावार्थ:
जो कुछ कर्म है वह सब दुःखरूप ही है- ऐसा समझकर यदि कोई शारीरिक क्लेश के भय से कर्तव्य-कर्मों का त्याग कर दे, तो वह ऐसा राजस त्याग करके त्याग के फल को किसी प्रकार भी नहीं पाता
जो व्यक्ति कर्मों को समेकित समझ कर या शारीरिक क्लेश के भय से त्याग देता है, उसके लिए कहा जाता है कि यह त्याग रजोगुण में किया जाता है। ऐसा करने से कभी त्याग का उच्चफल प्राप्त नहीं होता।
त्राहिमाम: जो व्यक्ति कृष्णभावनमृत को प्राप्त हुआ है, उसे इस भय से अर्थोपार्जन बंद नहीं करना चाहिए कि वह सकाम कर्म कर रहा है। यदि कोई कार्य करके कामये धन को कृष्णभावनामृत में स्थापित किया गया है, या यदि कोई प्रातःकाल प्रारंभिक दिव्य कृष्णभावनामृत को नष्ट कर देता है, तो उसे यह बताना चाहिए कि वह डर कर या यह निर्देश कि ऐसे कार्य निष्पादित हैं, उन्हें त्यागें नहीं। ऐसा होता है राज त्याग। राजसी कर्म का फल सदैव दुःख होता है। यदि कोई व्यक्ति इस भाव से कर्म त्यागता है, तो उसे त्याग का फल कभी नहीं मिलता।
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने बताया है कि अगर कोई व्यक्ति सिर्फ इसलिए कर्मों को त्याग देता है क्योंकि उसे शारीरिक कष्ट या असुविधा का भय है, तो वह व्यक्ति असली त्याग की सिद्धि नहीं प्राप्त कर पाता। यहाँ 'राजस त्याग' से तात्पर्य है कि ऐसा त्याग स्वार्थी और अस्थायी होता है, जो केवल बाहरी कष्टों से बचने के लिए किया जाता है।
प्रातः उठो और मंदिर जाने से मत शरमाओ।
इस श्लोक का तात्पर्य यह है कि कर्मों का त्याग केवल शारीरिक कष्ट या बाहरी कारणों की वजह से नहीं करना चाहिए। सच्चा त्याग वह है जब व्यक्ति कर्मों को उनके धर्म और कर्तव्य के अनुसार, बिना किसी स्वार्थ या व्यक्तिगत लाभ की इच्छा से करता है।
उपसंहार यह है कि केवल बाहरी कारणों से कर्मों को छोड़ना और कर्म की वास्तविकता को न समझना, राजस त्याग कहलाता है, जो सच्चे त्याग के फल को प्राप्त करने में विफल रहता है।
18॥8॥
कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेअर्जुन।
सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः॥
हे अर्जुन! जो शास्त्रविहित कर्म करना कर्तव्य है- इसी भाव से आसक्ति और फल का त्याग करके किया जाता है- वही सात्त्विक त्याग माना गया है।
नई बात हो गई
नियति कर्म इसी मनोभाव से किया जाना चाहिए। मनुष्य को फल के प्रति अनासक्त विशिष्ट कर्म करना चाहिए, उसके कर्म के गुण से विलग होना चाहिए। जो व्यक्ति कृष्ण भावनामृत में सीढ़ियों के अवशेषों में कार्य करता है, वह न तो अवशेषों के कार्यों से अपने को जोड़ता है, न ही अवशेषों के अवशेषों से। वह तो मात्र कृष्ण के लिए काम करता है। और जब वह इसे फल स्वरूप कृष्ण को अर्पण कर देता है, तो वह दिव्य स्तर पर काम करता है।
नोट: ध्यान रहे कर्मों को करते हुए सावधान भी रहें
किसी के नित्य कर्म में प्रति दिन के हिसाब से शहर के सभी मंदिरों में माथा टेक कर ही कुछ ग्रहण करने का नियम बना लिया।जवानी में तो चलता रहा पर बुढ़ापा आते ही छूटना शुरू हो गया।
इस का भाव यह है कि अपने सर पर उतना ही बोझ डालो जितना उठा सको,जरूरत से ज्यादा बोझ गर्दन ही तुड़वाए गा।
इसी प्रकार दान को भी अपनी हैसियत देख कर ही करना चाहिए।
भाव:चादर देख कर ही पैर पसारें।
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि कर्म का त्याग कैसे किया जाए, इसे समझने के लिए हमें कर्म के स्वभाव को समझना होगा। जो कर्म शास्त्र द्वारा निर्धारित है और जिसे कर्तव्य भाव से किया जाता है, उसे बिना किसी अपने निजी लाभ की इच्छा के या स्वार्थ के करना चाहिए।
"सात्त्विक त्याग"
का मतलब है कि कर्म को केवल अपनी जिम्मेदारी के रूप में स्वीकार करना और उसका फल भगवान को समर्पित कर देना। इसमें व्यक्ति को न तो कर्म के प्रति आसक्ति होनी चाहिए और न ही उसके फल की लालसा।
इस प्रकार, जो कर्म निःस्वार्थ भाव से और शास्त्रों के अनुसार किया जाता है, वह सात्त्विक त्याग कहलाता है। यह त्याग व्यक्ति को आत्मा की शांति और वास्तविक सुख की ओर ले जाता है।
18।।9।।
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 10
श्लोक:
न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते।
त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः॥
भावार्थ:
जो मनुष्य अकुशल कर्म से तो द्वेष नहीं करता और कुशल कर्म में आसक्त नहीं होता- वह शुद्ध सत्त्वगुण से युक्त पुरुष संशयरहित, बुद्धिमान और सच्चा त्यागी है
सतोगुण में स्थित बुद्धिमान् त्यागी, जो न तो अशुभ कर्म से घृणा करता है, (झटकई तो जानवर काटे गा , मुसलमान का धर्म कहता है कि काफिर की हत्या करदो वो तो अपने धर्म के अनुसार सही कर रहा है आप को अपने धर्म के अनुसार करना है)फिर घृणा को क्या औचित्य रह जाता है?
न शुभकर्म से घटित होता है, वह कर्म के विषय में कोई संशय नहीं रखता।इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने सच्चे त्यागी की पहचान को स्पष्ट किया है। यहाँ पर 'त्यागी' उस व्यक्ति को कहा गया है, जो सत्त्वगुण से परिपूर्ण और संशयरहित होता है।
"न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म": जो व्यक्ति अकुशल कर्म, यानी उन कर्मों से जो उसके लिए लाभकारी नहीं हैं, उनसे द्वेष नहीं करता। ऐसे व्यक्ति का मन अशांत नहीं होता और वह अनावश्यक क्रोध या नफरत नहीं दिखाता।
"कुशले नानुषज्जते": वही व्यक्ति कुशल कर्म, यानी उन कर्मों में भी आसक्त नहीं होता जो उसके लिए लाभकारी होते हैं। वह कर्मों के फल या परिणाम से प्रभावित नहीं होता और न ही उन कर्मों में संलग्न रहता है।
"त्यागी सत्त्वसमाविष्टो": सच्चा त्यागी वह है, जो सत्त्वगुण से युक्त होता है। इसका अर्थ है कि उसका मन पूर्णतः शुद्ध और शांत होता है, और वह केवल अपने कर्तव्यों का पालन करता है बिना किसी स्वार्थ या इच्छा के।
"मेधावी छिन्नसंशयः": इस श्लोक के अनुसार, ऐसे त्यागी व्यक्ति की बुद्धि तीक्ष्ण होती है और उसकी शंकाएँ या संशय पूरी तरह से समाप्त हो जाते हैं। वह ज्ञान और समझ से परिपूर्ण होता है।
इस प्रकार, श्रीकृष्ण ने स्पष्ट किया है कि सच्चा त्यागी वह है जो न तो अकुशल कर्म से द्वेष करता है और न ही कुशल कर्म में आसक्त होता है। वह सत्त्वगुण से युक्त, बुद्धिमान और संशयरहित होता है।
18॥10॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 11
श्लोक:
न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः।
यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते॥
भावार्थ:
क्योंकि शरीरधारी किसी भी मनुष्य द्वारा सम्पूर्णता से सब कर्मों का त्याग किया जाना शक्य नहीं है, इसलिए जो कर्मफल त्यागी है, वही त्यागी है- यह कहा जाता है
भगवद्गीता में कहा गया है कि मनुष्य कभी भी कर्म का त्याग नहीं कर सकता। अतएव जो कृष्ण के लिए कर्म करता है और कर्मफलों को भोगता नहीं तथा जो कृष्ण को सब कुछ बनाता है, वही वास्तविक कलाकार ही है। अंतर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ में अनेक सदस्य हैं, जो अपने-अपने निवास, भंडार या अन्य स्थानों पर कठिन परिश्रम करते हैं और जो कुछ कमाते हैं, उसे जरूरत भर का रख कर दूसरे को दान दे देते हैं। ऐसे महात्मा वास्तव में संत होते हैं और वे संत में स्थित होते हैं। यहां स्पष्ट रूप से बताया गया है कि कर्मफलों का परित्याग किस प्रकार और किस प्रकार किया जाता है।
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने स्पष्ट किया है कि किसी भी व्यक्ति द्वारा सम्पूर्ण रूप से कर्मों का त्याग करना असंभव है। इस पृथ्वी पर जीवित रहने के लिए कुछ कर्म करने की आवश्यकता होती है। जैसे शरीर को चलाने के लिए हमें खाना-पीना और अन्य आवश्यक कार्य रिश्ते नाते भी निभाने पड़ते हैं, इसी प्रकार जीवन के अन्य पहलुओं को निभाने के लिए कर्म तो आवश्यक है।
लेकिन, जो व्यक्ति कर्मफल का त्याग करता है, अर्थात् कर्म करते समय उसके फल की कामना नहीं करता, वही सच्चा त्यागी कहलाता है। कर्मफल का त्याग करने वाला व्यक्ति अपने कर्मों को निष्काम भाव से करता है और परिणाम की चिंता नहीं करता। यही सच्चे त्याग की परिभाषा है।
इस प्रकार, श्लोक का सार यह है कि कर्मों का त्याग शारीरिक और मानसिक रूप से संभव नहीं है, लेकिन जो कर्मफल के प्रति उदासीन रहता है, वही वास्तव में त्यागी है। इस दृष्टिकोण से, कर्म और कर्मफल की सही सोच ,समझ और दृष्टिकोण,का होना बहुत महत्वपूर्ण है।
18॥11॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 12
श्लोक:
अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम्।
भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु सन्न्यासिनां क्वचित्॥
भावार्थ:
कर्मफल का त्याग न करने वाले मनुष्यों के कर्मों का तो अच्छा, बुरा और मिला हुआ ।
ऐसे तीन प्रकार का फल मरने के पश्चात अवश्य होता है, किन्तु कर्मफल का त्याग कर देने वाले मनुष्यों के कर्मों का फल किसी काल में भी नहीं होता
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण कर्मफल के संबंध में एक महत्वपूर्ण उपदेश देते हैं। वे बताते हैं कि जो व्यक्ति कर्मफल का त्याग नहीं करता, उनके कर्मों के फल तीन प्रकार के होते हैं - अच्छा, बुरा और मिश्रित। इसका अर्थ है कि हर कर्म का एक परिणाम होता है, जो या तो सुखद, दुखद या दोनों का मिश्रण हो सकता है।
वहीं, जो व्यक्ति कर्मफल का त्याग तो करता है, और उसके कर्मों के फल से वह किसी प्रकार से प्रभावित नहीं होता। यहाँ कर्मफल का त्याग से तात्पर्य है कि ऐसे व्यक्ति ने अपने कर्मों का फल भगवान या ईश्वर पर छोड़ दिया है ,और स्वार्थ और व्यक्तिगत लाभ की अपेक्षा भी नहीं करता।
इस प्रकार, इस श्लोक के माध्यम से श्रीकृष्ण यह स्पष्ट करते हैं कि कर्मफल के प्रति जो असक्ति और अपेक्षा(उम्मीद को) छोड़ देता है, उसे कर्मों का फल प्राप्त नहीं होता और वह आत्मिक शांति और मोक्ष की ओर अग्रसर होता जाता है।
इस विचारधारा के अनुसार, जो व्यक्ति अपने कर्मों को ईश्वर की इच्छा पर छोड़ देता है और उसके परिणाम की चिंता नहीं करता, (जैसे रखे रहना होता है)
वह आत्मा की वास्तविक स्वतंत्रता और शांति को प्राप्त करता है।
18॥12॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 13
श्लोक:
(कर्मों के होने में सांख्यसिद्धांत का कथन)
पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे।
साङ्ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम्॥
भावार्थ:
हे महाबाहो! सम्पूर्ण कर्मों की सिद्धि के ये पाँच हेतु कर्मों का अंत करने के लिए उपाय बतलाने वाले सांख्य-शास्त्र में कहे गए हैं, उनको तू मुझसे भलीभाँति जान
यहाँ पर प्रश्न पूछा जा सकता है कि प्रत्येक कर्म का कुछ न कुछ फल जब होता ही है, तो फिर यह कैसे संभव है कि कृष्णभावमय व्यक्ति को कर्म के फलों का सुख - दुःख भोगना नहीं पड़ता है?
भगवान वेदांत दर्शन का उदाहरण यह है कि यह किस प्रकार संभव है। वे कहते हैं कि सभी कर्मों के पाँच कारण होते हैं। अतएव किसी भी व्यवसाय में सफलता के लिए इन पांचों लक्ष्यों पर विचार करना होगा। सांख्य का अर्थ है ज्ञान का आधारस्तंभ और वेदांत प्रणेता आचार्यों द्वारा संकलित ज्ञान का चरम आधारस्तंभ, यहां तक कि शंकर भी वेदांतसूत्र को इसी रूप में स्वीकार करते हैं। अतएव ऐसे शास्त्र की राय ग्रहण करनी चाहिए।
परम नियन्त्रण परमात्मा में निहित है। जैसा कि भगवद्गीता में कहा गया है-
सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविस्ताः - वे प्रत्येक व्यक्ति को अपने पूर्वकर्मों का स्मरण करा कर किसी न किसी कार्य में प्रवृत्त करते हैं। और जो कृष्णभावनाभावित कर्म अन्तर्यामी भगवान के निर्देश मिलते हैं, उनका फल न तो इस जीवन में मिलता है, न ही मृत्यु के दर्शन होते हैं।
यह श्लोक कर्मफल की सिद्धि और कर्म की प्रक्रिया के वैज्ञानिक दृष्टिकोण को दर्शाता है, जो सांख्यशास्त्र में वर्णित है। यह कर्म के पूर्ण होने के लिए आवश्यक तत्वों की स्पष्टता को सुनिश्चित करता है।
18॥13॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 14
श्लोक:
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्।
विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्॥
भावार्थ:
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण कर्मों की सिद्धि के विभिन्न तत्वों को स्पष्ट कर रहे हैं। यहाँ पांच प्रमुख तत्वों का उल्लेख है, जो किसी भी कर्म के सम्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं:
इस विषय में अर्थात कर्मों की सिद्धि में अधिष्ठान
(जिसके आश्रय कर्म किए जाएँ, उसका नाम अधिष्ठान है)
और कर्ता तथा भिन्न-भिन्न प्रकार के करण
(जिन-जिन इंद्रियादिकों और साधनों द्वारा कर्म किए जाते हैं, उनका नाम करण है)
एवं नाना प्रकार की अलग-अलग चेष्टाएँ और वैसे ही पाँचवाँ हेतु दैव
(पूर्वकृत शुभाशुभ कर्मों के संस्कारों का नाम दैव है) है
अब उन पाँच कारणों के बारे में भी बताया है जो किसी भी कर्म को पूरा करने के लिए आवश्यक हैं। ये पाँच कारण इस प्रकार हैं:
1. अधिष्ठान (आधार): यह कर्म के लिए आवश्यक आधार या मूल कारण है।
2. कर्ता (कर्ता): यह वह व्यक्ति है जो कर्म को करता है।
3. करण (साधन): यह वह साधन या उपकरण है जिसका उपयोग कर्म को करने के लिए किया जाता है।
4. चेष्टा (प्रयास): यह वह प्रयास या ऊर्जा है जो कर्म को करने के लिए आवश्यक है।
5. दैव (भाग्य): यह वह भाग्य या नियति है जो कर्म के परिणाम को निर्धारित करती है।
इन पाँच कारणों का ज्ञान होना हर कर्म की सफलता के लिए अति अनिवार्य है।
अधिष्ठानम् शब्द शरीर के लिए आया है। शरीर के अंदर आत्मा कर्म करती है, जिससे कर्मफल होता है। अतएव यह निर्माता व्यापारी है। आत्मा ही ज्ञात तथा कर्ता है, इसका उल्लेख श्रुति में है। एष हि दृष्टा सृष्टा (प्रश्न उपनिषद् 4.9)।
(एष हि दृष्टा सृष्टा का अर्थ है:
"यही वह आत्मा है जो सृष्टि को देखता है और सृष्टि को बनाता है।"
यह उपनिषदिक वाक्य बताता है कि आत्मा ही वह है जो सृष्टि को देखता है, समझता है और सृष्टि को बनाता है। यह आत्मा ही वह है जो सृष्टि के पीछे की शक्ति है।)
वेदांतसूत्र में भी ज्योऽतेव (2.3.18)
(वेदांत में ज्योऽतेव (2.3.18) का सरल भाव है:
"जैसे आकाश में सूर्य का प्रकाश फैलता है, वैसे ही आत्मा की ज्योति सारे शरीर में फैलती है।"
यह वाक्य बताता है कि आत्मा की ज्योति या चेतना सारे शरीर में व्याप्त होती है, जैसे कि सूर्य का प्रकाश आकाश में फैलता है। यह वाक्य आत्मा की सर्वव्यापकता और चेतना को दर्शाता है।)
तथा कर्ता शास्त्रार्थवत्त्वत् (2.3.33)
(शास्त्रार्थवत्त्वत् (2.3.33) की व्याख्या है:
"शास्त्रों के अर्थ को समझने के लिए तर्क और विचार करना चाहिए।"
यह वाक्य बताता है कि शास्त्रों के अर्थ को समझने के लिए केवल शब्दों को पढ़ना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके अर्थ को समझने के लिए तर्क और विचार करना भी आवश्यक है।
यह वाक्य वेदांत के अध्ययन में तर्क और विचार के महत्व को दर्शाता है, और बताता है कि शास्त्रों के अर्थ को समझने के लिए हमें अपने तर्क और विचार का उपयोग करना चाहिए।)
इन श्लोकों से इसकी पुष्टि होती है। कर्म के उपकरण इन्द्रियाँ और आत्मा इन्द्रियाँ विभिन्न कर्म करती हैं। प्रत्येक कर्म के लिए पृथक्करण चेष्टा होती है। लेकिन सभी कार्यकलाप भगवान की इच्छा पर असंवैधानिक हैं, जो प्रत्येक हृदय में मित्र रूप में आसीन हैं। ईश्वर परम कारण है। अतएव जो इन रेनडोल में अन्तर्यामी देवताओं के निर्देशों के अनुसार कृष्णभावना का कार्य करता है, वह किसी कर्म बन्धा नहीं है। जो पूर्ण कृष्ण भावनामय हैं, वे अन्ततः अपने कर्मों के लिए अमूल्य नहीं होते हैं। सब कुछ परम इच्छा, भगवान, ईश्वर पर असंतुलित है
इस प्रकार, इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने कर्मों की सिद्धि के लिए आवश्यक पांच तत्वों को स्पष्ट किया है, जिनका ध्यान रखकर कर्मों को सही रूप से पूरा किया जा सकता है।
18॥14॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 15
श्लोक:
शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः।
न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः॥
भावार्थ:
मनुष्य मन, वाणी और शरीर से शास्त्रानुकूल अथवा विपरीत जो कुछ भी कर्म करता है- उसके ये पाँचों कारण हैं,
मनुष्य अपने शरीर, मन या वाणी से जो भी या अनुचित कर्म करता है, वह पाँचों में नष्ट हो जाता है।
संस्कृत: इस श्लोक में न्याय (उचित) और विपरीत (अनुचित) शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। सही कार्यों में शास्त्रीय सिद्धांतों की पुष्टि होती है और अनुचित कार्यों में शास्त्रीय सिद्धांतों की पुष्टि होती है। जिस बिजनेस ने भी बिजनेस किया है, उसके लिए इन पांच कर्मचारियों की पूरी जरूरत है।
न्यायपूर्ण और विपरीत कर्मों से अर्धवार्षिक धर्म के अनुकूल और विपरीत कर्म होते हैं।
सभी प्रकार के कर्मों की सिद्धि के लिए सभी प्रकार के कर्मों की सिद्धि के लिए केवल गाड़ी के बोनट के नीचे पांच गुणों की आवश्यकता होती है। पेट्रोल का नहीं. पेट्रोल के बिना इंजन का काम नहीं कर सकता और न ही केवल पेट्रोल के द्वारा यात्रा सफल और सुखद हो सकती है। इंजन और पेट्रोल के संबंध में वाहनों में गति दिखाई देती है और तब स्वामी की इच्छा के अनुसार चालक उसे गंतव्य तक पहुंचा सकता है। इस उदाहरण को समझें ।
भगवान श्रीकृष्ण के कथन का अभिप्राय स्पष्ट हो जाएगा। अकर्म चैतन्य स्वरूप आत्मा आदि उपाधियों से तादात्म्य करके जीव के रूप में अनेक प्रकार की आकांक्षाओं से प्रेरित होकर अनुचित कर्म किया जाता है। समस्त कर्मों में पूर्वोक्त पाँच पदों की आवश्यकता है। पूर्व के दो श्लोकों का निष्कर्ष यह है कि मनुष्य का कर्तृत्वाभिमान मिथ्या (भ्रम मात्र) है। ऐसा भगवान कहते हैं
18॥15॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 16
श्लोक:
तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः।
पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः॥
भावार्थ:
परन्तु ऐसा होने पर भी जो मनुष्य अशुद्ध बुद्धि (सत्संग और शास्त्र के अभ्यास से तथा भगवदर्थ कर्म और उपासना के करने से मनुष्य की बुद्धि शुद्ध होती है, इसलिए जो उपर्युक्त साधनों से रहित है, उसकी बुद्धि अशुद्ध है, ऐसा समझना चाहिए।) होने के कारण उस विषय में यानी कर्मों के होने में केवल शुद्ध स्वरूप आत्मा को कर्ता समझता है, वह मलीन बुद्धि वाला अज्ञानी यथार्थ नहीं समझता है
तात्पर्य:
मूर्ख व्यक्ति यह नहीं समझता कि परमात्मा उसके अन्तर में मित्र रूप में बैठा है और उसके कर्मों का संचालन कर रहा है। यद्यपि स्थान, कर्ता, चेष्टा तथा इन्द्रियाँ भौतिक कारण हैं, लेकिन अन्तिम (मुख्य) कारण तो स्वयं भगवान् हैं। अतएव मनुष्य को चाहिए कि केवल चार भौतिक कारणों को ही न देखे, अपितु परम सक्षम कारण को भी देखे। जो परमेश्वर को नहीं देखता, वह अपने आपको ही कर्ता मानता है।
18॥16॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 17
श्लोक:
यस्य नाहङ्कृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते।
हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते॥
भावार्थ:
जिस पुरुष के अन्तःकरण में 'मैं कर्ता हूँ' ऐसा भाव नहीं है तथा जिसकी बुद्धि सांसारिक पदार्थों में और कर्मों में लिपायमान नहीं होती, वह पुरुष इन सब लोकों को मारकर भी वास्तव में न तो मरता है और न पाप से बँधता है। (जैसे अग्नि, वायु और जल द्वारा प्रारब्धवश किसी प्राणी की हिंसा होती देखने में आए तो भी वह वास्तव में हिंसा नहीं है, वैसे ही जिस पुरुष का देह में अभिमान नहीं है और स्वार्थरहित केवल संसार के हित के लिए ही जिसकी सम्पूर्ण क्रियाएँ होती हैं, उस पुरुष के शरीर और इन्द्रियों द्वारा यदि किसी प्राणी की हिंसा होती हुई लोकदृष्टि में देखी जाए, तो भी वह वास्तव में हिंसा नहीं है क्योंकि आसक्ति, स्वार्थ और अहंकार के न होने से किसी प्राणी की हिंसा हो ही नहीं सकती तथा बिना कर्तृत्वाभिमान के किया हुआ कर्म वास्तव में अकर्म ही है, इसलिए वह पुरुष 'पाप से नहीं बँधता'।)
तात्पर्य:
इस श्लोक में भगवान् अर्जुन को बताते हैं कि युद्ध न करने की इच्छा अहंकार से उत्पन्न होती है। अर्जुन स्वयं को कर्ता मान बैठा था, लेकिन उसने अपने भीतर तथा बाहर परम (परमात्मा) के निर्देश पर विचार नहीं किया था। यदि कोई यह न जाने कि कोई परम निर्देश भी है, तो वह कर्म क्यों करे?
लेकिन जो व्यक्ति कर्म के उपकरणों को, कर्ता रूप में अपने को तथा परम निर्देशक के रूप में परमेश्वर को मानता है, वह प्रत्येक कार्य को पूर्ण करने में सक्षम है।
ऐसा व्यक्ति कभी मोहग्रस्त नहीं होता। जीव में व्यक्तिगत कार्यकलाप तथा उसके उत्तरदायित्व का उदय मिथ्या अहंकार से तथा ईश्वरविहीनता या कृष्णभावनामृत के अभाव से होता है। जो व्यक्ति कृष्णभावनामृत में परमात्मा या भगवान् के आदेशानुसार कर्म करता है, वह वध करता हुआ भी वध नहीं करता। न ही वह कभी ऐसे वध के फल भोगता है। जब कोई सैनिक अपने श्रेष्ठ अधिकारी सेनापति की आज्ञा से वध करता है, तो उसको दण्डित नहीं किया जाता। लेकिन यदि वही सैनिक स्वेच्छा से वध कर दे, तो निश्चित रूप से न्यायालय द्वारा उसका निर्णय होता है।
यहां कुछ मुख्य बिंदु हैं जो समझ ने में मदद करते है:
1. आत्मा की अविक्रियता: आत्मा विकारों से मुक्त है और किसी भी प्रकार के कर्म को नहीं करता है।
2. अधिष्ठान और कर्म: अधिष्ठान (आत्मा) कर्मों को नहीं करता है, बल्कि यह शरीर और इंद्रियों के माध्यम से कार्य करता है।
3. अविद्या और कर्म: अविद्या (अज्ञान) के कारण व्यक्ति कर्मों को करता है, लेकिन आत्मा को इसका कोई संबंध नहीं है।
4. विद्वानों की स्थिति: विद्वानों को आत्मा की अविक्रियता का ज्ञान होता है, इसलिए वे कर्मों के बंधन से मुक्त होते हैं।
5. गीता का सार: गीता का सार यह है कि आत्मा अविक्रिय है, और विद्वानों को इसका ज्ञान होना चाहिए।
महाभारत : इस श्लोक में भगवान अर्जुन को दर्शाया गया है कि युद्ध न करने की इच्छा से उत्पन्न स्थिति क्या होती है। अर्जुन स्वयं को कर्ता मान नहीं सकते थे, लेकिन उन्होंने अंदर और बाहर परम (परमात्मा) के निर्देशों पर विचार नहीं किया था।
यदि कोई यह नहीं जानता कि कोई परम निर्देश भी है, तो वह कर्म क्यों करे?
लेकिन जो किसी कर्म के उपकरण को, कर्ता के रूप में अपने और परम निर्देशित भगवान के रूप में चिह्नित करता है, वह प्रत्येक कार्य को पूरा करने में सक्षम होता है। ऐसा व्यक्ति कभी मोहग्रस्त भी नहीं होता। जीव में व्यक्तिगत कार्य कलाप तथा उसके उत्तरदायित्व
(पारिवारिक,समाजिक,देश) के प्रति का उदय ही मिथ्या व्यवहार से हो तथा ईश्वर विमुक्ति या कृष्णभावनामृत का अभाव भी हो ।
तो जो व्यक्ति कृष्णभावनामृत में भगवान या भगवान के आदेश का पालन करता है जो शास्त्र कहते, वह वध करना नहीं होता नहीं यो बाद करता है। न ही वह कभी ऐसे वध के फल भोगता है।
जब कोई सैनिक अपने वरिष्ठ अधिकारी सेनापति की आज्ञा से किसी आतताई का वध करता है, तो दंडित नहीं किया जाता है।
लेकिन यदि सैनिक उस अधिकार से ना कर करने की बात करे , तो निश्चित रूप से उसका निर्णय न्यायालय द्वारा होता है और उसी को दंडित करते है।
महाभारत में ऐसे पाँच प्रकार के लोगों का उल्लेख है कि उन के वध से कोई पाप नहीं लगता है:
1. अर्थदूषक (आर्थिक रूप से दोषी): जो व्यक्ति आर्थिक रूप से दोषी है, जैसे कि चोरी करने वाला या धोखाधड़ी करने वाला।
2. देशद्रोही (देशद्रोही): जो व्यक्ति अपने देश के प्रति विश्वासघात करता है।
3. मातृद्रोही (मातृद्रोही): जो व्यक्ति अपनी माता के प्रति विश्वासघात करता है।
4. गुरुद्रोही (गुरुद्रोही): जो व्यक्ति अपने गुरु के प्रति विश्वासघात करता है।
5. आततायी (आततायी): जो व्यक्ति अन्य लोगों को नुकसान पहुंचाने के लिए आततायी होता है।
इन पाँच प्रकार के लोगों के वध से कोई पाप नहीं लगता है, क्योंकि वे समाज के लिए खतरनाक होते हैं और उनके वध से समाज की रक्षा होती है।
18॥17॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 18
श्लोक:
ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना।
करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसङ्ग्रहः॥
भावार्थ:
ज्ञाता (जानने वाले का नाम 'ज्ञाता' है।),
ज्ञान (जिसके द्वारा जाना जाए, उसका नाम 'ज्ञान' है। )
और ज्ञेय (जानने में आने वाली वस्तु का नाम 'ज्ञेय' है।)
ये तीनों प्रकार की कर्म-प्रेरणा हैं और कर्ता
(कर्म करने वाले का नाम 'कर्ता' है।),
करण (जिन साधनों से कर्म किया जाए, उनका नाम 'करण' है।)
तथा क्रिया (करने का नाम 'क्रिया' है।)
ये तीनों प्रकार का कर्म-संग्रह है।
इस श्लोक में भगवद्गीता के अंतिम अध्याय का उपसंहार करते हुए कर्म और ज्ञान के विभिन्न प्रकारों की व्याख्या की गई है। यहाँ पर हमें तीन प्रमुख उपरोक्त बातें बताई गई हैं:
ज्ञान, ज्ञेय तथा ज्ञाता- ये त्रिकर्म को प्रेरणा देने वाले कारण हैं। इंद्रियाँ (करण), कर्म तथा कर्ता- ये तीन कर्मों का समूह है।
दैनिक कार्य के लिए तीन प्रकार की प्रेरणाएँ हैं- ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता। कर्म का उपकरण (करण), स्वयं कर्म तथा कर्ता- ये त्रि कर्म के संयोजन कहलाते हैं। किसी भी मनुष्य द्वारा प्राप्त किसी भी कर्म में ये ही तत्व रहते हैं। कर्म करने से पहले कुछ न कुछ प्रेरणा होती है। किसी भी कर्म से पहले प्राप्त होने वाला फल कर्म के सूक्ष्म रूप में वास्तविक निर्माण होता है। इसके बाद वह क्रिया का रूप धारण कर लेती है। पहले मनुष्य को दर्शन करना, अनुभव करना और इच्छा करना जैसे दर्शन शास्त्र का सामना करना पड़ता है, जिसे प्रेरणा कहा जाता है और यह प्रेरणा को लक्ष्य निर्धारण से प्राप्त किया जाता है, या गुरु के उपदेश से, एक तरह से होता है। जब प्रेरणा होती है और जब कर्ता होता है, तो इंद्रियों की सहायता से, जिसमें मन शामिल होता है और जो सभी इंद्रियों का केंद्र होता है, वास्तविक कर्म होता है। किसी भी कर्म के सभी समूहों को कर्म का कर्म-संग्रह कहा जाता है।
18॥18॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 19
श्लोक:
(तीनों गुणों के अनुसार ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि, धृति और सुख के पृथक-पृथक भेद)
ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः।
प्रोच्यते गुणसङ्ख्याने यथावच्छ्णु तान्यपि॥
भावार्थ:
गुणों की संख्या करने वाले शास्त्र में ज्ञान और कर्म तथा कर्ता गुणों के भेद से तीन-तीन प्रकार के ही कहे गए हैं, उनको भी तु मुझसे भलीभाँति सुन
कर्म,
कर्ता,
बुद्धि,
धृति
सुख भी सत्व,राजस, तामस
हिंदू धर्म के अनुसार, प्रकृति के तीन गुण होते हैं: सत्त्व, रजस और तमस। इन तीनों गुणों के अनुसार ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि, धृति और सुख के पृथक-पृथक भेद होते हैं। यहाँ विस्तार से बताया गया है:
*ज्ञान*
- सत्त्वगुणी ज्ञान: यह ज्ञान शुद्ध, स्पष्ट और वास्तविक होता है। यह ज्ञान आत्मा की प्रकृति को समझने में मदद करता है।
- रजसगुणी ज्ञान: यह ज्ञान अशुद्ध, अस्पष्ट और विकृत होता है। यह ज्ञान व्यक्ति को अपने स्वार्थ के लिए प्रेरित करता है।
- तमसगुणी ज्ञान: यह ज्ञान अत्यधिक अशुद्ध, अस्पष्ट और विकृत होता है। यह ज्ञान व्यक्ति को अज्ञान और भ्रम में डालता है।
*कर्म*
- सत्त्वगुणी कर्म: यह कर्म शुद्ध, निष्काम और आत्मा की प्रकृति के अनुसार होता है। यह कर्म व्यक्ति को आत्मा की प्रकृति को समझने में मदद करता है।
- रजसगुणी कर्म: यह कर्म अशुद्ध, स्वार्थी और व्यक्ति के लिए हानिकारक होता है। यह कर्म व्यक्ति को अपने स्वार्थ के लिए प्रेरित करता है।
- तमसगुणी कर्म: यह कर्म अत्यधिक अशुद्ध, हानिकारक और व्यक्ति के लिए विनाशकारी होता है। यह कर्म व्यक्ति को अज्ञान और भ्रम में डालता है।
*कर्ता*
- सत्त्वगुणी कर्ता: यह कर्ता शुद्ध, निष्काम और आत्मा की प्रकृति के अनुसार होता है। यह कर्ता व्यक्ति को आत्मा की प्रकृति को समझने में मदद करता है।
- रजसगुणी कर्ता: यह कर्ता अशुद्ध, स्वार्थी और व्यक्ति के लिए हानिकारक होता है। यह कर्ता व्यक्ति को अपने स्वार्थ के लिए प्रेरित करता है।
- तमसगुणी कर्ता: यह कर्ता अत्यधिक अशुद्ध, हानिकारक और व्यक्ति के लिए विनाशकारी होता है। यह कर्ता व्यक्ति को अज्ञान और भ्रम में डालता है।
*बुद्धि*
- सत्त्वगुणी बुद्धि: यह बुद्धि शुद्ध, स्पष्ट और वास्तविक होती है। यह बुद्धि व्यक्ति को आत्मा की प्रकृति को समझने में मदद करती है।
- रजसगुणी बुद्धि: यह बुद्धि अशुद्ध, अस्पष्ट और विकृत होती है। यह बुद्धि व्यक्ति को अपने स्वार्थ के लिए प्रेरित करती है।
- तमसगुणी बुद्धि: यह बुद्धि अत्यधिक अशुद्ध, अस्पष्ट और विकृत होती है। यह बुद्धि व्यक्ति को अज्ञान और भ्रम में डालती है।
*धृति*
- सत्त्वगुणी धृति: यह धृति शुद्ध, स्थिर और आत्मा की प्रकृति के अनुसार होती है। यह धृति व्यक्ति को आत्मा की प्रकृति को समझने में मदद करती है।
- रजसगुणी धृति: यह धृति अशुद्ध, अस्थिर और व्यक्ति के लिए हानिकारक होती है। यह धृत
धृति का अर्थ है "धारण करना" या "अपनाना"। यह शब्द संस्कृत में पाया जाता है और इसका अर्थ है किसी विचार, आदत या गुण को अपनाना और उसे धारण करना।
इस प्रकार, धृति का अर्थ है किसी चीज़ को अपनाना, उसे धारण करना और उसे अपने जीवन में उतारना।
सुख के प्रकार:
सुख के तीन प्रकार होते हैं जो सत्त्व, रजस और तमस गुणों से संबंधित होते हैं:
सत्त्वगुणी सुख:
यह सुख शुद्ध, स्थिर और आत्मा की प्रकृति के अनुसार होता है। यह सुख व्यक्ति को आत्म-शांति और आनंद प्रदान करता है। उदाहरण के लिए, ध्यान, योग और आत्म-चिंतन से प्राप्त सुख सत्त्वगुणी होता है।
रजसगुणी सुख:
यह सुख अशुद्ध, अस्थिर और व्यक्ति के लिए हानिकारक होता है। यह सुख व्यक्ति को क्षणिक आनंद प्रदान करता है, लेकिन अंत में दुख और पीड़ा का कारण बनता है। उदाहरण के लिए, व्यसन, लालच और क्रोध से प्राप्त सुख रजसगुणी होता है।
तमसगुणी सुख:
यह सुख अत्यधिक अशुद्ध, अस्थिर और व्यक्ति के लिए विनाशकारी होता है। यह सुख व्यक्ति को क्षणिक आनंद प्रदान करता है, लेकिन अंत में आत्म-विनाश और नैतिक पतन का कारण बनता है। उदाहरण के लिए, हिंसा, चोरी और अन्य अपराधिक गतिविधियों से प्राप्त सुख तमसगुणी होता है।
चौदहवें अध्याय में प्रकृति के तीन गुणों का विस्तार से वर्णन किया गया है। उस अध्याय में कहा गया है कि सतोगुण प्रकाशक होता है, रजोगुण भौतिकवादी होता है और तमोगुण अलस्य और प्रमाद का उपदेशक होता है। प्रकृति के सारे गुण बंधनकारी हैं, वे मुक्ति के साधन नहीं हैं। यहाँ तक कि सतोगुण में भी मनुष्य बद्ध रहता है। सत्रहवें अध्याय में विभिन्न प्रकार की पूजाओं का वर्णन किया गया है। इस श्लोक में भगवान कहते हैं कि वे विभिन्न प्रकार के गुणों के अनुसार ज्ञान, कर्ता और कर्म के विषय में बताते हैं।
18॥19॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 20
श्लोक:
सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते।
अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम्॥
भावार्थ:
जिस ज्ञान से मनुष्य पृथक-पृथक सब भूतों में एक अविनाशी परमात्मभाव को विभागरहित समभाव से स्थित देखता है, उस ज्ञान को तू सात्त्विक जान
प्रकृति: जो व्यक्ति हर जीव में हो, कण वह देवता हो, मनुष्य हो, पशु-पक्षी हो या जलजन्तु या पौधा हो, एक ही आत्मा को देखता है, उसे सात्विक ज्ञान प्राप्त होता है। सभी मंडलों में एक ही आत्मा है, हालाँकि पूर्व कर्मों के अनुसार उनका शरीर अलग-अलग होता है। जैसा कि उस अध्याय के अध्याय में वर्णन है, प्रत्येक शरीर जीवनी में शक्ति की अभिव्यक्ति भगवान की पराप्रकृति के कारण होती है। वह एक पराप्रकृति, वह जीवनी शक्ति है जिसके हर शरीर में सात्विक दर्शन होते हैं। यह जीवनी शक्ति अज्ञात है, भला है शरीर का विनाश। जो असंतत भेद है, वह शरीर का कारण है। बौद्धजीवन में अनेक प्रकार के भौतिक रूप हैं, अतेव जीवनी शक्ति विभक्त मूल रूप से विद्यमान हैं। ऐसा निराकार ज्ञान आत्म-साक्षात्कार का एक सिद्धांत है।
इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण यह सिखाना चाहते हैं कि जो ज्ञान एकता की दृष्टि से परिपूर्ण होता है, वही सात्त्विक ज्ञान है। इस ज्ञान के द्वारा, व्यक्ति भूतों के बीच विभाजन नहीं देखता, बल्कि वह सब में एक ही दिव्य तत्व, एक ही परमात्मा का अनुभव करता है।
यह ज्ञान तात्त्विक दृष्टि को प्रकट करता है, जिसमें भूतों के भिन्न-भिन्न रूपों में भी एक ही चैतन्य का अनुभव किया जाता है। यहाँ "अविभक्तं विभक्तेषु" का तात्पर्य है कि जो ज्ञान सारे विभाजन और भेदभाव को पार करके सभी जीवों में एकता का अनुभव करता है, वही ज्ञान सात्त्विक है।
इस प्रकार, सात्त्विक ज्ञान वह है जो हमें एकात्मता की समझ प्रदान करता है और सम्पूर्ण सृष्टि में एक ही दिव्य तत्व की उपस्थिति का एहसास कराता है।
19॥20॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 21
श्लोक:
पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान्।
वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम्॥
भावार्थ:
किन्तु जो ज्ञान अर्थात जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य सम्पूर्ण भूतों में भिन्न-भिन्न प्रकार के नाना भावों को अलग-अलग जानता है, उस ज्ञान को तू राजस जान
जो आत्मा को परमात्मा नहीं मानते वही लोग ,भूत, प्रेत,चुडैल,पिशाच,आती के नाम आत्मा को देते है ।तू राजस जान।
जब कि हैं तो यह भी परमात्मा के ही अंश इनको जब हम परमात्मा का अंश नहीं मानते तो यह हमें भूत, प्रेत,चुडैल,पिशाच बन कर दिखाते है।
अर्थात यह धारणा होती है कि भौतिक शरीर ही जीव है और शरीर के नष्ट होने पर स्वयं भी नष्ट हो जाता है, राजसी ज्ञान है। इस ज्ञान के अनुसार एक शरीर दूसरा शरीर अलग-अलग होता है, क्योंकि उनका स्वतंत्र विकास अलग-अलग प्रकार से होता है, अन्यथा स्वतंत्र को प्रकट करने वाला अलगाव आत्मा नहीं रहता। शरीर स्वयं आत्मा है और शरीर से पृथक कोई आत्मा नहीं है। यह ज्ञान के अनुसार अवचेतन है। या यह कि आत्मा पृथक्करण नहीं होती; एक सर्वाभाविक आत्मा है, जो ज्ञान से पूर्ण है और यह शारीरिक क्षणिक अज्ञानता का प्रकाश है। या यह कि इस शरीर में कोई विशेष जीवात्मा या परम आत्मा नहीं है। ये सभी धारणाएँ रजोगुण से उत्पन्न होती हैं।
18॥21॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 22
श्लोक:
यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम्।
अतत्त्वार्थवदल्पंच तत्तामसमुदाहृतम्॥
भावार्थ:
परन्तु जो ज्ञान एक कार्यरूप शरीर में ही सम्पूर्ण के सदृश आसक्त है तथा जो बिना युक्तिवाला, तात्त्विक अर्थ से रहित और तुच्छ है- वह तामस कहा गया है
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने तामस गुण से संबंधित एक विशेष प्रकार की आसक्ति का वर्णन किया है।
"यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम्" - इसका तात्पर्य है कि जो व्यक्ति किसी एक कार्य में पूरी तरह से आसक्त रहता है, बिना किसी कारण या तर्क के, केवल उसके परिणामों की चिंता करता है। इस प्रकार की आसक्ति में तात्त्विक दृष्टिकोण की कमी होती है।
"अतत्त्वार्थवदल्पंच" - यहाँ यह कहा गया है कि वह ज्ञान या कार्य जो सत्यमूलक नहीं है, यानि जो तात्त्विक रूप से महत्वहीन और सतही है, उसे तामस कहा जाता है।
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने यह स्पष्ट किया है कि जब किसी व्यक्ति की आसक्ति कार्य की तात्त्विकता को समझे बिना केवल उसका परिणाम देखने तक सीमित होती है, तो वह तामस गुण का संकेत है। ऐसे ज्ञान या कार्य में गहराई की कमी होती है और यह अव्यावहारिक या अज्ञानी होता है।
सामान्य मनुष्य का 'ज्ञान' सदैव तामसी होता है, क्योंकि प्रत्येक बद्धजीव में तमोगुण ही उत्पन्न होता है। जो वैज्ञानिक प्रमाणों से या शास्त्रीय अवशेषों के माध्यम से ज्ञान संकलित नहीं करता, उसका ज्ञान शरीर तक ही सीमित रहता है। उसे शास्त्रों के आदेश से कार्य करने की चिंता नहीं होती। उसके लिए धन ही ईश्वर है और ज्ञान का अर्थ शारीरिक आवश्यकताओं की तुष्टि है। ऐसे ज्ञान का परम सत्य से कोई सम्बन्ध नहीं होता। यह बहुत कुछ है समुद्र के किनारे का ज्ञान, सोना, रक्षा करना और धर्म करना। ऐसे ज्ञान को यहां तमोगुण से उत्पन्न किया गया है। दूसरे शब्दों में, यह शरीर से परे आत्मा संबंधित ज्ञान सात्विक ज्ञान है। जिस ज्ञान से लौकिक तर्क और चिंतन (मनोधर्म) द्वारा नाना प्रकार के सिद्धांत और वाद जन्म लें, वह राजसी है और शरीर को सुखमय बनाए रखने वाले ज्ञान को तामसी कहा जाता है।
इस प्रकार, श्लोक 22 में तामस गुण के अंतर्गत आने वाले कार्य और ज्ञान की सीमाओं और दोषों का उल्लेख किया गया है।
18॥22॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 23
श्लोक:
नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम।
अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते॥
भावार्थ:
जो कर्म शास्त्रविधि से नियत किया हुआ और कर्तापन के अभिमान से रहित हो तथा फल न चाहने वाले पुरुष द्वारा बिना राग-द्वेष के किया गया हो- वह सात्त्विक कहा जाता है
जिस काम को करने की आज्ञा हो,करने वाला बिना किसी प्रकार का अभिमान किए करे और उसके लिए कोई फायदा नुकसान भी ना देखता हो। बिना किसी राग द्वेष के कि उसका मेरे पर अहसान है अब उस अहसान को चुकाने का समय है।बिना ऐसा भी सोचे करता है वह सात्विक होता है।
भाव:
त्रिविध कर्मों में सात्विक कर्म सर्वोत्तम कहा है
जिस को करने से कर्ता के मन में शांति और उसके कर्मक्षेत्र में शांति उत्पन्न होती है। प्राय: मनुष्य फल में आस्कत अपना व्यक्तिगत राग और द्वेष से प्रेरित कार्य करता है।
परंतु यहां कहा गया है कि नियत अर्थात् कर्तव्य कर्म को अनासक्त भाव से तथा राग द्वेष से साधन प्राप्त करने पर ही वह सात्विक कर्म है।
सात्विक पुरुष कर्म इसी प्रकार होता है?
क्योंकि कर्म कर्तव्य है और उसी ईश्वर की पूजा है।
ऐसी भावना और प्रेरणा से युक्त होने पर मनुष्य अपना ही सामान्य कार्यकुशल एवं श्रेष्ठता से कहीं अधिक ऊँचा उठ जाता है। अर्पण की भावना से जुड़े कर्मों में राग और द्वेष का प्रश्न ही नहीं होना चाहिए। समस्त साधु संतों का सेवाकार्य यह तथ्य प्रमाण है। अनेक अवसरों पर हम भी इसी भावना से कर्म करते हैं।
ऐसा एक विशिष्ट उदाहरण उस अवसर का है जब हमारे पैर में कोई चोट लग जाती है। उस समय हम झटका कर पैर को देखने लग जाते हैं और शरीर के सारे अंग उसकी सेवा में निकल जाते हैं। इस सेवा कार्य में हम यह नहीं कह सकते कि हमें अपने पैर से अन्य कार्यों का अधिक प्यार है।
क्यों कि मनुष्य तो अपने संपूर्ण शरीर में ही निवास करता है और उसके शरीर के सभी अंग एक जैसे होते हैं।इसी प्रकार जो सात्विक पुरुष एकमेव अनोखा सच्चित्सन्स्वरूप सर्वसम्बन्ध परमात्मा को आत्मस्वरूप में कैसे पहचाना जाता है?
तो उस पुरुष के लिए कोई भी व्यक्ति चाहे वह राजकुमार हो या दरिद्र, शास्त्रज्ञ या अज्ञानी, सभी समान हैं।
ऐसा पुरुष आनंद और कृतार्थता की भावना से जगत की सेवा करता है। इस प्रकार, सात्विक कर्मों की पूर्णता उनके करने में ही होती है। फलप्राप्ति का विचार भी उत्पन्न नहीं होता है।
ऐसा पुरुष अनुप्राणित आनंद और कृतार्थता की भावना से जगत् की सेवा करता है।इस प्रकार सात्विक कर्मों की पूर्णता उनके करने में ही होती है। फल प्राप्ति का विचार भी उत्पन्न नहीं होता है।
18॥23॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 24
श्लोक:
यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुनः।
क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम्॥
भावार्थ:
परन्तु जो कर्म बहुत परिश्रम से युक्त होता है तथा भोगों को चाहने वाले पुरुष द्वारा या अहंकारयुक्त पुरुष द्वारा किया जाता है, वह कर्म राजस कहा गया है
यहाँ आपके द्वारा दी गई जानकारी का सुधार किया गया है:
जो कर्म फल की इच्छा से किए जाते हैं, या जो कर्म बहुत परिश्रम से युक्त होते हैं, वे राजस कहे जाते हैं। राजसिक कर्म मैं करता हूँ की भावना से प्रेरित, व्यवहार से युक्त और परिश्रम से अधिक होते हैं। इसका कर्ता अत्याधिक तनाव और दबाव में रहता है।
राजनीतिक नेता, सामाजिक पद्धति, बड़ी पूंजीपति उद्योगपति, चिंतित पालक, कट्टर धर्म प्रचारक, धर्म परिवर्तन वाले मिशनरियों और अंधधुंध धन के अनुयायियों के सभी कर्म राजस श्रेणी में ही आते हैं। कभी-कभी तो वे तमोगुण के स्तर तक भी गिर जाते हैं।
वेदशास्त्र का ज्ञाता पुरुष निरहंकारी कहा जाता है, जो आत्मतत्त्व को समझता है और उसके अनुसार जीवन जीता है।
18॥24॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 25
श्लोक:
अनुबन्धं क्षयं हिंसामनवेक्ष्य च पौरुषम्।
मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते॥
भावार्थ:
जो कर्म परिणाम, हानि, हिंसा और सामर्थ्य को न विचारकर केवल अज्ञान से आरंभ किया जाता है, वह तामस कहा जाता है।
तामस मनुष्य कर्म करता है, लेकिन वह फल की कामना नहीं करता है। वह तो बस अपने मन में आये विचार के अनुसार कार्य करता है, बिना किसी विचार-विमर्श के।
वह कार्य करने से पहले इसके परिणामों के बारे में नहीं सोचता है। वह नहीं सोचता है कि इस कार्य से उसका और दूसरों का क्या नुकसान हो सकता है, क्या हानि हो सकती है, क्या हिंसा हो सकती है, और क्या उसकी योग्यता और क्षमता इस कार्य को करने के लिए पर्याप्त है।
तामस मनुष्य का कर्म करने का तरीका यह है कि वह बस अपने मन में आये विचार के अनुसार कार्य करता है, बिना किसी विचार-विमर्श के। यही कारण है कि तामस कर्म को सबसे निम्न स्तर का कर्म माना जाता है।
अर्थात मनुष्य को अपने कर्मों का लेखा-जोखा राज्य या भगवान के दूतों को, जिसमें यमदूत कहा जाता है, शामिल होता है। उत्तरदायित्वहीन कर्म विनाशक है, क्योंकि इसी प्रकार संस्कार विनाशक होता है। यह वार्हल्या हिंसा पर आधारित है और अन्य शिष्टता के लिए दुःखद होता है। उत्तरदायित्व से हीन ऐसा कर्म अपने निजी अनुभव के आधार पर किया जाता है। ये मोह है. ऐसा संपूर्ण मोहग्रस्त कर्म तमोगुण का प्रकोप होता है।
18॥25॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 26
श्लोक:
मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः।
सिद्धयसिद्धयोर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते॥
भावार्थ:
जो कर्ता संगरहित, अहंकार के वचन न बोलने वाला, धैर्य और उत्साह से युक्त तथा कार्य के सिद्ध होने और न होने में हर्ष -शोकादि विकारों से रहित है- वह सात्त्विक कहा जाता है
जो व्यक्ति भौतिक गुणों के बिना अहिंसा, संकल्प और उत्साह उत्साह तो समूह से भी उत्पन होता है को त्यागकर अपना कर्म करता है और सफलता या असफलता में अविचलित रहता है, वह सात्विक कलाकार होता है।
✍️त्राहिमाम: कृष्णभावनामय हमेशा व्यक्तिगत प्रकृति के गुणों से अतीत होता है। उसे अपने द्वारा दिए गए कर्मों के परिणामों की कोई निंदा की चिंता नहीं रहती, क्योंकि वह मिथ्या व्यवहार और घमंड से परे होता है। फिर भी कार्य के पूर्ण होने तक वह निरंतर उत्साह से परिपूर्ण रहता है। उसे होने वाले कष्टों की कोई चिंता भी नहीं होती, वह सदैव उत्साहपूर्ण ही रहता है। वह सफलता या असफलता की परवाह नहीं करता, वह सुख-दुःख में ही समभाव रखता है। ऐसा कर्ता सात्विक है।
18॥26॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 27
श्लोक:
रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः।
हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः॥
भावार्थ:
जो कर्ता आसक्ति से युक्त कर्मों के फल को चाहने वाला और लोभी है तथा दूसरों को कष्ट देने के स्वभाववाला, अशुद्धाचारी और हर्ष-शोक से लिप्त है वह राजस कहा गया है
जो कर्ता कर्म तथा कर्म फल के प्रति आसक्त वृक्षों का भोग करना चाहता है तथा जो लोभी, सदैव तृष्णालु, अपवित्र तथा सुख-दुःख से अलग होने वाला है, वह राजसी कहा जाता है।
मादक द्रव्य : मनुष्य सदैव किसी भी कार्य के प्रति या फल के प्रति अत्यधिक अनुरक्त रहता है, क्योंकि वह दार्शनिक, घर-बार, पत्नी तथा पुत्र के प्रति अत्यधिक अनुरक्त होता है। ऐसा व्यक्ति जीवन में ऊपर की ओर ही सोचे तो कोई आश्चर्य नहीं होता। वह इस दुनिया को यथासंभव आरामदेह बनाकर ही रहती है। सामान्यतः वह अत्यधिक लोभी होता है और सोचता है कि उसे प्राप्त किया गया है। प्रत्येक वस्तु स्थायी है और कभी नष्ट नहीं होगी। ऐसा व्यक्ति अन्य लोगों से इच्छा रखता है और इंद्रिय तृप्ति के लिए कोई भी अनुचित कार्य कर सकता है। अतएव ऐसा व्यक्ति अपवित्र होता है और वह इसकी चिंता नहीं करता है कि उसकी आय शुद्ध या कर्ता है। यदि उसका कार्य सफल हो जाता है तो वह अत्यधिक परिश्रम भी करता है और अत्यधिक दुःखी भी हो जाता है। रजोगुणी कर्ता ऐसा ही होता है।
यह श्लोक कर्मों के कर्ता के स्वभाव का वर्णन करता है जो राजस गुण से युक्त होता है।
रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिःरागी: जो हे वो व्यक्ति कर्मों में आसक्ति रखता है, वह इस बात को लेकर सजग रहता है कि उसे कर्मों के फल की प्राप्ति हो।
कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो: जो कर्मों के फल को पाने के लिए लालायित और लोभी होता है।
हिंसात्मकोऽशुचिः: जो दूसरों को कष्ट देने की प्रवृत्ति वाला, अशुद्ध आचरण वाला है।
हर्षशोकान्वितः: जो व्यक्ति खुशी और दुख से प्रभावित होता है, जो कर्मों के फल के मिलने पर खुशी और न मिलने पर दुःख महसूस करता है।
राजसः परिकीर्तितः: ऐसे व्यक्ति को राजस गुणी कहा जाता है।
संक्षेप में, इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण यह बताते हैं कि जो व्यक्ति कर्मों में आसक्ति, फल की लालसा, लोभ, हिंसा, अशुद्ध आचरण और सुख-दुख के प्रति अत्यधिक संवेदनशीलता रखता है, वह व्यक्ति राजस गुण से युक्त है। इस गुण के प्रभाव में व्यक्ति अपने कर्मों के फल की प्राप्ति के लिए हर समय चिंतित रहता है और उसके मन की स्थिति खुशी और दुःख के उतार-चढ़ाव से भरी रहती है।
18॥27॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 28
श्लोक:
आयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठोनैष्कृतिकोऽलसः।
विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते॥
भावार्थ:
जो कर्ता अयुक्त, शिक्षा से रहित घमंडी, धूर्त और दूसरों की जीविका का नाश करने वाला तथा शोक करने वाला, आलसी और दीर्घसूत्री
(दीर्घसूत्री उसको कहा जाता है कि जो थोड़े काल में होने लायक साधारण कार्य को भी फिर कर लेंगे, ऐसी आशा से बहुत काल तक नहीं पूरा करता। )
है वह तामस कहा जाता है
आज का काम कल पर छोड़ने वाला।
तात्पर्य यह है कि जो व्यक्ति कर्तव्य करने में सक्षम तो होता नहीं है और उसके अंदर
निम्नलिखित विशेषताएँ होती हैं, उसे तामसिक कहा जाता है। इस श्लोक में विशेष रूप से चार गुणों को तामसिकता की पहचान के रूप में प्रस्तुत किया गया है: नीचे देखे ऐसे व्यक्ति में निम्नलिखित विशेषताएं होती हैं:
1. आलस्य: वह व्यक्ति आलसी होता है और काम करने में दिलचस्पी नहीं रखता है।
2. अनियमितता: वह व्यक्ति अनियमित होता है और अपने कामों को समय पर पूरा नहीं करता है।
3. असंगठितता: वह व्यक्ति अपने कामों को संगठित नहीं करता है और अक्सर अपने लक्ष्यों को प्राप्त नहीं कर पाता है।
4. अनिर्णयता: वह व्यक्ति अनिर्णयी होता है और अपने निर्णयों को लेने में समय भी लेता है।
5. अस्वीकार्यता: वह व्यक्ति अपनी जिम्मेदारियों को स्वीकार नहीं करता है और अक्सर अपने कामों को दूसरों पर थोपता है।
इन विशेषताओं के कारण, पप्पू लोग आज का काम कल पर छोड़ने वाला व्यक्ति होते है जो अपने लक्ष्यों को प्राप्त नहीं कर पाते है और अक्सर अपने जीवन में असफलता का सामना ही करते है।
जो व्यक्ति शास्त्रों के विरुद्ध कार्य करता है, जो भौतिकवादी और कपटी है, जो दूसरों का अपमान करने में माहिर है, और जो आलसी और दीर्घसूत्री है, वह तमोगुणी व्यक्ति है।
तमोगुणी व्यक्ति की विशेषताएं यह होतिं हैं:
- शास्त्रों के विरुद्ध कार्य करना
- भौतिकवादी और कपटी होना
- दूसरों का अपमान करना
- आलसी और दीर्घसूत्री होना
यह व्यक्ति तमोगुण के प्रभाव में रहता है और उसके कार्य और व्यवहार भी तमोगुणी ही होते हैं।
पुरातात्विक अभिलेखों से हमें पता चलता है कि हमें कौन सा काम करना चाहिए और कौन सा नहीं करना चाहिए। जो लोग शास्त्र के अपवित्रीकरण द्वारा अकरणीय कार्य करते हैं, लोहविज्ञान भौतिकवादी होते हैं। वे प्रकृति के गुणों के अनुसार कार्य करते हैं, शास्त्रों के अनुसार ऐसे कर्ता भद्रा नहीं होते हैं और सामान्यता के अनुसार सदैव कपटी (धूर्त) और अन्य का अपमान करने वाले होते हैं। वे अत्यधिक उग्र होते हैं, काम करते हैं भी उसे ठीक से नहीं करते हैं और बाद में करने के लिए उसे एक तरफ रख देते हैं, अतएव वे खिन्न रहते हैं। जो काम एक घंटे में हो सकता है, उसे वे वर्षों तक खींचते हैं - वे दीर्घसूत्री होते हैं। ऐसे कर्ता तमोगुणी होते हैं।
18॥28॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 29
श्लोक:
बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं श्रृणु।
प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनंजय॥
भावार्थ:
हे धनंजय ! अब तू बुद्धि का और धृति का भी गुणों के अनुसार तीन प्रकार का भेद मेरे द्वारा सम्पूर्णता से विभागपूर्वक कहा जाने वाला सुन
18॥29॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 30
श्लोक:
प्रवत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये।
बन्धं मोक्षं च या वेति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी॥
भावार्थ:
हे पार्थ ! जो बुद्धि प्रवृत्तिमार्ग (गृहस्थ में रहते हुए फल और आसक्ति को त्यागकर भगवदर्पण बुद्धि से केवल लोकशिक्षा के लिए राजा जनक की भाँति बरतने का नाम 'प्रवृत्तिमार्ग' है।)
प्रवृतिमार्ग: प्रवृत्तिमार्ग एक ऐसा मार्ग है जिसमें व्यक्ति गृहस्थ में रहते हुए भी फल और आसक्ति को त्यागकर भगवदर्पण बुद्धि से केवल लोकशिक्षा के लिए कार्य करता है।
राजा जनक ने इस प्रवृत्तिमार्ग का पालन किया था। उन्होंने राज्य का पालन किया, लेकिन उन्होंने कभी भी राज्य के फल की इच्छा नहीं की। उन्होंने अपने कार्यों को भगवान के लिए समर्पित किया और लोकशिक्षा के लिए कार्य किया।
इस प्रकार, प्रवृत्तिमार्ग एक ऐसा मार्ग है जिसमें व्यक्ति गृहस्थ में रहते हुए भी भगवान की सेवा कर सकता है और लोकशिक्षा के लिए कार्य कर सकता है।
और निवृत्ति मार्ग को
(देहाभिमान को त्यागकर केवल सच्चिदानंदघन परमात्मा में एकीभाव स्थित हुए श्री शुकदेवजी और सनकादिकों की भाँति संसार से उपराम होकर विचरने का नाम 'निवृत्तिमार्ग' है।)
अर्थात ऐसे समझें
निवृत्तिमार्ग एक ऐसा मार्ग है जिसमें व्यक्ति देहाभिमान को त्यागकर केवल सच्चिदानंदघन परमात्मा में एकीभाव स्थित होता है और संसार से उपराम होकर विचरता है।
श्री शुकदेवजी और सनकादिकों ने इस निवृत्तिमार्ग का पालन किया था। उन्होंने अपने जीवन को पूरी तरह से परमात्मा की सेवा में समर्पित किया और संसार के मोह और आसक्ति से मुक्त होकर विचरने लगे।
निवृत्तिमार्ग की विशेषताएं हैं:
- देहाभिमान का त्याग
- परमात्मा में एकीभाव स्थिति
- संसार से उपराम होना
- परमात्मा की सेवा में जीवन समर्पित करना
यह मार्ग उन लोगों के लिए है जो संसार के मोह और आसक्ति से मुक्त होना चाहते हैं और परमात्मा की सेवा में अपना जीवन समर्पित करना चाहते हैं।
कर्तव्य और अकर्तव्य को, भय और अभय को तथा बंधन और मोक्ष को यथार्थ जानती है- वह बुद्धि सात्त्विकी है
वह बुद्धि सतोगुणी है, जिससे मनुष्य यह जानता है कि मोक्ष देना या ना देना भगवान का ही काम है किसी दूसरे का नहीं अब वो जानता है कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं, मुक्ति की बातें करने वाले गुरु से या ऐसे लोगों से किस को डरना चाहिए और किसे नहीं डरना चाहिए, जो खुद दुनियां छोड़ने वाला है और क्या वह मुक्ति देने वाला है भी या नहीं?
शास्त्रों के निर्देशानुसार कर्म करना या उन कर्मों को करना, जिनमें शामिल होना चाहिए, क्रेडेंशियल (क्रेडेंशियल का मतलब है विश्वास, आस्था, विश्वसनीयता वगैरह के लिए आधार प्रदान करना)कहा जाता है। जिन कार्यों का इस तरह का कोई निर्देश नहीं होता है उन्हें नहीं जानना चाहिए। जो व्यक्तिशास्त्रीय अभिलेखों को निर्दिष्ट नहीं करता है, वह कर्मों और उनकी प्रतिक्रिया से बंधा हुआ है। जो बुद्धि अच्छे-बुरे का भेद बताती है, वह सात्विकी है।
18॥30॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 31
श्लोक:
यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च।
अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी॥
भावार्थ:
हे पार्थ! मनुष्य जिस बुद्धि के द्वारा धर्म और अधर्म को तथा कर्तव्य और अकर्तव्य को भी यथार्थ नहीं जानता, वह बुद्धि राजसी है
॥31॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 32
श्लोक:
अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता।
सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी॥
भावार्थ:
हे अर्जुन! जो तमोगुण से घिरी हुई बुद्धि अधर्म को भी 'यह धर्म है' ऐसा ही मान लेती है तथा इसी प्रकार अन्य संपूर्ण पदार्थों को भी विपरीत मान लेती है, वह बुद्धि तामसी है
सात्विक बुद्धि का पदार्थ ज्ञान वास्तव में होता तो राजसी बुद्धि का सन्देहात्मक मध्य तामसी बुद्धि तो वस्तु को उसके मूलस्वरूप से सर्वथा विपरीत रूप में पहचानती है। धर्म को अधर्म और अधर्म को धर्म मानना यह बुद्धि का कार्य है। वस्तुत: तामसी बुद्धि कोई बुद्धि ही नहीं कह सकती। वह तो विपरीत ज्ञानों की एक गठरी ही है। विरोधाभासों के निष्कर्षों का कारण यह है कि इसकी क्षमता अद्भुत है अज्ञानता का अंधकार और अहंकार का अंधोन्माद होता है।
योग परमात्मा को जानने का साधन है। जो व्यक्ति मन, प्राण और इन्द्रियों को परमात्मा में एकाग्र करके दृढ़ता रखता है वे स्थित रहते हैं, वही कृष्ण भावना में तत्परता होती है। ऐसी धृति सात्विक होती है। अव्यभिचारिन्य शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सूचित करता है कि कृष्णभावनामृत में तत्पर मनुष्य को कभी कोई अन्य कार्य द्वारा प्रतिबंधित नहीं किया जाता है।
18॥32॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 33
श्लोक:
धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः।
योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी॥
भावार्थ:
हे पार्थ! जिस अव्यभिचारिणी धारण शक्ति
(भगवद्विषय के सिवाय अन्य सांसारिक विषयों को धारण करना ही व्यभिचार जैसा दोष है, उस दोष से जो रहित है वह 'अव्यभिचारिणी धारणा' है।)
जिस से मनुष्य ध्यान योग के द्वारा मन, प्राण और इंद्रियों की क्रियाओं
( मन, प्राण और इंद्रियों को भगवत्प्राप्ति के लिए भजन, ध्यान और निष्काम कर्मों में लगाने का नाम 'उनकी क्रियाओं को धारण करना' है।)
इस प्रकार धारण करता है, वह धृति सात्त्विकी है
अर्थात:अव्यभिचारिणी धारण शक्ति (भगवद्विषय के सिवाय अन्य सांसारिक विषयों को धारण करना ही व्यभिचार दोष है, उस दोष से जो रहित है वह 'अव्यभिचारिणी धारणा' है।) से मनुष्य ध्यान योग के द्वारा मन, प्राण और इंद्रियों की क्रियाओं ( मन, प्राण और इंद्रियों को भगवत्प्राप्ति के लिए भजन, ध्यान और निष्काम कर्मों में लगाने का नाम 'उनकी क्रियाओं को धारण करना' है।) को धारण करता है, वह धृति सात्त्विकी है
"जिस धृति (स्थिरता) के द्वारा मन, प्राण और इन्द्रियों की क्रियाओं को धारण किया जाता है", इसका अर्थ है कि सत्त्वगुणी व्यक्ति अपनी मानसिक, शारीरिक और इंद्रियगत गतिविधियों को संयमित और नियंत्रित तरीके से संचालित करता है। वह अपने कर्मों को किसी विशेष उद्देश्य के लिए प्रयोग करता है, जैसे भगवद्भक्ति, ध्यान, या निष्काम सेवा।आदि
योगेनाव्यभिचारिण्या - "योग के द्वारा जो अव्यभिचारिणी (असंगत) होती है", इसका तात्पर्य है कि इस धृति का स्वरूप ऐसा होता है जो भक्ति और ध्यान में निरंतर स्थिर रहता है। यह किसी अन्य विषय की ओर विचलित नहीं होती और स्थिरता बनाए रखती है।
धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी - "वह धृति पार्थ (अर्जुन) सात्त्विकी है", इसका मतलब है कि यह स्थिरता सत्त्वगुण से युक्त है। इसे सत्त्वगुणी धृति कहा जाता है, जो शांति, संतुलन, और समर्पण के गुणों से परिपूर्ण होती है।
इस प्रकार, श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने सत्त्वगुणी धृति की विशिष्टता और उसकी महत्ता को स्पष्ट किया है, जो योग, ध्यान और आत्मसाक्षात्कार की दिशा में सहायक होती है।
धृति का अर्थ है मन, प्राण और इंद्रियों की क्रियाओं को धारण करने की शक्ति। यह शक्ति व्यक्ति को अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद करती है।
अव्यभिचारिणी धृति वह है जिसमें व्यक्ति अपने मन, प्राण और इंद्रियों की क्रियाओं को धारण करता है और उन्हें अपने लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए उपयोग करता है।
यह धृति सात्विकी है, जिसका अर्थ है कि यह धृति सात्विक गुणों से युक्त है। सात्विक गुणों में शामिल हैं:
- मन की शुद्धि
- प्राणों की शुद्धि
- इंद्रियों की शुद्धि
- लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए प्रयास करना
इस प्रकार, अव्यभिचारिणी धृति वह है जिसमें व्यक्ति अपने मन, प्राण और इंद्रियों की क्रियाओं को धारण करता है और उन्हें अपने लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए उपयोग करता है। यह धृति सात्विकी है और सात्विक गुणों से युक्त है।
18॥33॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 34
श्लोक:
यया तु धर्मकामार्थान्धत्या धारयतेऽर्जुन।
प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी॥
भावार्थ:
परंतु हे पृथापुत्र अर्जुन! फल की इच्छावाला मनुष्य जिस धारण शक्ति के द्वारा अत्यंत आसक्ति से धर्म, अर्थ और कामों को धारण करता है, वह धारण शक्ति राजसी है
✍️मनुष्य के जीवन के चार पुरुषार्थ हैं अर्थात् प्रयास द्वारा प्राप्त करने योग्य लक्ष्यधर्म पुण्य? अर्थ? काम और मोक्ष। किस सत्य के साथ मनुष्य धर्म अर्थ और काम को धारण करना क्या है? वह राजसी धृति कहलाती है। यहां मोक्ष का अनुलेख ध्यान देने योग्य है। राजसी पुरुष को संसार बंधनों से सदैव के लिए मुक्ति की इच्छा नहीं होती। राजसी पुरुष का धर्माचरण भी स्वर्गादि लोकों के द्वारा पुण्यप्राप्ति के लिए होता है। अर्थ से धन प्रवाह सत्ता अधिकार आदि से ही रहता है तथा काम का अर्थ विषयोपभोग है। रजोगुणी पुरुष की यह दृढ़ धारणा होती है कि इन्द्रियों के विषय में ही सुख का साधन है।
प्राकृतिक: जो धार्मिक धार्मिक या आर्थिक कार्यों में कर्मफलों का सदैव आकांक्षी होता है, उसकी एकमात्र इच्छा इंद्रियतृप्ति होती है और जिसका मन, जीवन और इंद्रियां इस प्रकार से जुड़ी रहती हैं, वह रजोगुणी होती है।
18॥34॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 35
श्लोक:
यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च।
न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी॥
भावार्थ:
हे पार्थ! दुष्ट बुद्धिवाला मनुष्य जिस धारण शक्ति के द्वारा निद्रा, भय, चिंता और दु:ख को तथा उन्मत्तता को भी नहीं छोड़ता अर्थात धारण किए रहता है- वह धारण शक्ति तामसी है
18॥35॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 36-37
श्लोक:
सुखं त्विदानीं त्रिविधं श्रृणु मे भरतर्षभ।
अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति॥
यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्।
तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम्॥
भावार्थ:
हे भरतश्रेष्ठ! अब तीन प्रकार के सुख को भी तू मुझसे सुन। जिस सुख में साधक मनुष्य भजन, ध्यान और सेवादि के अभ्यास से रमण करता है और जिससे दुःखों के अंत को प्राप्त हो जाता है, जो ऐसा सुख है, वह आरंभकाल में यद्यपि विष के तुल्य प्रतीत
(जैसे खेल में आसक्ति वाले बालक को विद्या का अभ्यास मूढ़ता के कारण प्रथम विष के समान ही लगता है।जब पद लिख कर विद्वान होता है तब उसे पता चलता है।
वैसे ही विषयों में आसक्ति वाले पुरुष को भगवद्भजन, ध्यान, सेवा आदि साधनाओं का अभ्यास मर्म न जानने के कारण प्रथम 'विष के तुल्य ही प्रतीत होता' है)
होता है, परन्तु परिणाम में अमृत के तुल्य है, इसलिए वह परमात्मविषयक बुद्धि के प्रसाद से उत्पन्न होने वाला सुख सात्त्विक कहा गया है
इससे यह अर्थ नहीं निकलता कि सतोगुणी मनुष्य स्वप्न नहीं देखता। यहां पर स्वप्न का अर्थ अति निद्रा है। स्वप्न सदा आता है, कागज वह सात्विक हो, राजस हो या तामसी, स्वप्न तो प्राकृतिक घटना है। लेकिन जो अपने को अधिक सोने से नहीं बचाए, जो भौतिक वस्तुओं को भोगने के गौरव से नहीं बचाए, जो सदैव संसार पर प्रभुत्व जमाने का स्वप्न देखते हैं और जहां प्राण, मन तथा इंद्रियां इस प्रकार निवास करती हैं, वे तामसी धृति वाले कहे जाते हैं।
विद्धाजीव भौतिक सुख भोगने की बारम्बर चेष्टा करता है। इस प्रकार वह चार्वितचर्वण करता है। लेकिन कभी-कभी ऐसे ब्लॉग के रेस्त्रां से वह किसी महापुरुष की संगति से भवबंधन से मुक्त हो जाता है। दूसरे शब्दों में, बद्धजीव सदा ही किसी न किसी इंद्रियतृप्ति में लगा रहता है, लेकिन जब सादृश्य से यह समझ में आता है कि यह तो एक ही वस्तु की खोज है और वास्तविक कृष्णभावनामृत का उदय होता है, तो कभी-कभी वह ऐसी कथित कलाकृति सुख से मुक्त हो जाता है।
18॥36-37॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 38
श्लोक:
विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम्।
परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम्॥
भावार्थ:
जो सुख विषय और इंद्रियों के संयोग से होता है, वह पहले- भोगकाल में अमृत के तुल्य प्रतीत होने पर भी परिणाम में विष के तुल्य
(बल, वीर्य, बुद्धि, धन, उत्साह और परलोक का नाश होने से विषय और इंद्रियों के संयोग से होने वाले सुख को 'परिणाम में विष के तुल्य' कहा है)
होती है इसलिए वह सुख राजस कहा गया है
जो सुख विषयों और इंद्रियों के संयोग से प्राप्त होता है, वह प्रारंभ में अमृत के समान अनुभव होता है, लेकिन अंत में विष के समान होता है।
इसका अर्थ यह है कि जब हम इंद्रियों और भौतिक वस्तुओं के साथ मिलकर सुख का अनुभव करते हैं, तो यह सुख शुरुआत में बहुत सुखद और आनंददायक लगता है। यह सुख हमें ऐसा लगता है जैसे यह अमृत है, यानी बहुत ही मीठा और जीवनदायिनी। लेकिन इसके परिणामस्वरूप, जैसे-जैसे समय बीतता है, यह सुख अंततः विष के समान बन जाता है। इसका मतलब यह है कि इस प्रकार का सुख दीर्घकालिक संतोष और शांति नहीं लाता। इसके परिणामस्वरूप बल, वीर्य, बुद्धि, धन, उत्साह, और यहाँ तक कि परलोक का भी नाश होता है। यह सुख केवल क्षणिक होता है और अंततः पीड़ा और असंतोष का कारण बनता है।
इसलिए, इस श्लोक में इसे 'राजस' सुख कहा गया है, जो कि राजसी गुण (रजस) से संबंधित होता है। राजस सुख हमें तत्काल आनंद दे सकता है लेकिन लंबे समय में इसके दुष्परिणाम होते हैं।
18॥38॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 39
श्लोक:
यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः।
निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम्॥
भावार्थ:
जो सुख भोगकाल में तथा परिणाम में भी आत्मा को मोहित करने वाला है, वह निद्रा, आलस्य और प्रमाद से उत्पन्न सुख तामस कहा गया है
जो व्यक्ति अलस्य तथा निद्रा में ही सुखी रहता है, वह कहता है कि वही तमोगुणी है। जिस व्यक्ति को कोई अनुमान नहीं है कि उसने किस प्रकार का काम किया है और किस प्रकार का नहीं है, वह भी तमोगुणी है। तमोगुणी व्यक्ति के लिए सारी वस्तुएँ ब्रह्मा (मोह) हैं। उसे न तो तमोगुणी में सुख मिलता है, न अंत में रजोगुणी व्यक्ति के लिए अंतिम व्यक्ति में कुछ क्षणिक सुख और अंत में दुख हो सकता है, लेकिन जो तमोगुणी है, उसमें और अंत में दुख ही दुख होता है।इस प्रकार, श्लोक यह समझाता है कि तामसिक सुख बाहरी रूप से सुखद लग सकता है, लेकिन यह आत्मा के वास्तविक कल्याण के लिए हानिकारक है। यह व्यक्ति को आलस्य और प्रमाद में ढकेलता है और स्थायी संतोष की बजाय अस्थायी संतोष प्रदान करता है।
18॥39॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 40
श्लोक:
न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः।
सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिःस्यात्त्रिभिर्गुणैः॥
भावार्थ:
पृथ्वी में या आकाश में अथवा देवताओं में तथा इनके सिवा और कहीं भी ऐसा कोई भी सत्त्व नहीं है, जो प्रकृति से उत्पन्न इन तीनों गुणों से रहित हो
बहुत बड़ी बात बताते है श्री कृष्ण ,पृथ्वी, आकाश, देवताओं, या किसी अन्य स्थान पर ऐसा कोई भी सत्त्व नहीं है जो प्रकृति के तीन गुणों
(सत्व, रजस, और तमस)
से परे हो।
इस श्लोक के माध्यम से यह बताया गया है कि संपूर्ण ब्रह्मांड में किसी भी वस्तु, व्यक्ति या तत्त्व में इन तीन गुणों से मुक्त नहीं हो सकता। ये तीनों गुण—सत्व (ज्ञान और पवित्रता), रजस (क्रिया और इच्छा), और तमस (अज्ञान और आलस्य)—प्रकृति के मूलभूत तत्व हैं और हर सत्त्व में इनका कुछ न कुछ प्रभाव होता ही है।
इसका तात्पर्य यह है कि ब्रह्मा (सृष्टि के निर्माता), विष्णु (पालक), और शिव (संहारक)—इन सबके गुण भी इन तीन गुणों से मुक्त नहीं हैं। हर जीव, हर पदार्थ, और हर स्थिति इन गुणों के प्रभाव से प्रभावित होती है, और इस प्रकार ये गुण ब्रह्मांड की सच्चाई का हिस्सा हैं।
इस श्लोक के माध्यम से यह भी समझने को मिलता है कि जब तक कोई व्यक्ति इन गुणों की पहचान और नियंत्रण नहीं कर लेता, तब तक उसे पूर्ण रूप से मुक्त और आत्मज्ञान प्राप्त करना संभव नहीं होता।
इस प्रकार, यह श्लोक प्रकृति के गुणों की अनिवार्यता और उनके बिना किसी सत्त्व के अस्तित्व की असंभावना को स्पष्ट करता है।(पर एक छोटा सा भी शुभ कर्म जन्म मृत्यु से रक्षा का कारक भी बन जाता है)
जब कि कर्म दो प्रकार के होते हैं: जन्मारम्भक कर्म और भोगदायक कर्म। जन्मारम्भक कर्म से जीव का जन्म होता है, जबकि भोगदायक कर्म से जीव को सुख-दुख का अनुभव होता है।
जैसे किसी का जन्म उच्च कुल में होता है ।तो उसको आदर सत्कार मिलता है। वैसे ही निम्न कुल में जन्म लेने वाले को तिरस्कार से अपमानित होना होता है।
यह मान अपमान भी परिस्थिति आने पर टिकते तो है नहीं।पर जन्म तटस्थ रहता है। और सत, रज तम,के द्वारा परस्थिति के अनुसार मान अपमान आता जाता ही हो जाता है।
पुण्य और पाप के आधार पर जीव को स्वर्ग, नरक या मनुष्य योनि में जन्म मिलता है। पुण्य और पाप का तारतम्य रहता है, जिसके आधार पर जीव को ऊंची या नीची योनि में जन्म मिलता है।
सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण के आधार पर जीव को तीन प्रकार के लोकों में जन्म मिलता है: ऊर्ध्वलोक, मध्यलोक और अधोलोक। इन लोकों में भी गुणों के तारतम्य के आधार पर जीव को ऊंची या नीची योनि में ही जन्म मिलता है।
मनुष्य योनि में भी चार वर्ण होते हैं: ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। इन वर्णों में भी गुणों के तारतम्य के आधार पर जीव को ऊंची या नीची योनि में जन्म मिलता है।
इस प्रकार, कर्मों के आधार पर जीव को विभिन्न योनियों में जन्म मिलता है, और गुणों के तारतम्य परिस्थिति के आधार पर जीव को ऊंची या नीची योनि में जन्म मिलता है।(जैसे नक्षत्र गृह आदि समय एक होता है उसी घड़ी 2बालकों का अलग अलग जगह जन्म होता है एक का राज दरबार में दूसरे का कुम्हार के घर में राज के घर जन्म बालक राजकुमार , और कुम्हार के घर जन्म बच्चा कुम्हार ही होता है।परिस्थिति कुम्हार को या राजा को उनके कर्मानुसार क्या बना दे।यह तो मेरे राम जी ही जानते है और कोई नहीं।
18॥40॥
गीता अध्याय 18 श्लोक 41
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 41
श्लोक:
(फल सहित वर्ण धर्म का विषय)
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप।
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः॥
भावार्थ:
हे परंतप! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों के तथा शूद्रों के कर्म स्वभाव से उत्पन्न गुणों द्वारा विभक्त किए गए हैं
यहाँ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों के कर्म, स्वभाव और गुणों का विस्तार से वर्णन किया गया है:
ब्राह्मण
ब्राह्मणों के कर्म और स्वभाव:
- वेदों का अध्ययन और अध्यापन
- यज्ञों का आयोजन और प्रदर्शन
- दान और पुण्य के कार्य
- सत्य और न्याय का पालन
इन उदाहरणों का स्रोत विभिन्न हिंदू शास्त्रों में है, जिनमें से कुछ प्रमुख हैं:
१. _मनुस्मृति_: यह एक प्राचीन हिंदू धर्मशास्त्र है, जिसमें ब्राह्मणों के कर्तव्यों और आचरण के बारे में विस्तार से बताया गया है। मनुस्मृति में कहा गया है कि ब्राह्मणों को वेदों का अध्ययन और अध्यापन करना चाहिए, यज्ञ और हवन करने चाहिए, और दान और पुण्य करने चाहिए।
२. _यजुर्वेद_: यह एक प्राचीन हिंदू वेद है, जिसमें यज्ञ और हवन के बारे में विस्तार से बताया गया है। यजुर्वेद में कहा गया है कि ब्राह्मणों को यज्ञ और हवन करने चाहिए, जिससे उन्हें धार्मिक और आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति हो सके।
३. _महाभारत_: यह एक प्राचीन हिंदू महाकाव्य है, जिसमें ब्राह्मणों के कर्तव्यों और आचरण के बारे में विस्तार से बताया गया है। महाभारत में कहा गया है कि ब्राह्मणों को सत्य और न्याय का पालन करना चाहिए, और दान और पुण्य करने चाहिए।
४. _वेदांत सूत्र_: यह एक प्राचीन हिंदू धर्मशास्त्र है, जिसमें ब्राह्मणों के कर्तव्यों और आचरण और आजीविका के बारे में विस्तार से बताया गया है। वेदांत सूत्र में कहा गया है कि ब्राह्मणों को अन्नदान और अतिथि सेवा करनी चाहिए, जिससे उन्हें पुण्य की प्राप्ति हो सके।
इन शास्त्रों में वर्णित नियमों और सुझावों का पालन करके, ब्राह्मण अपनी जीविका चला सकते हैं और समाज को धार्मिक, आध्यात्मिक और नैतिक ज्ञान से अवगत करा सकते हैं।
ब्राह्मणों के गुण:
- सत्त्वगुण की प्रधानता
- ज्ञान और विज्ञान की प्राप्ति
- धैर्य और संयम की क्षमता
- दया और करुणा की भावना
क्षत्रिय
क्षत्रियों के कर्म और स्वभाव:
- राज्य और प्रशासन का कार्य
- सैन्य और युद्ध का कार्य
- न्याय और दंड का पालन
- रक्षा और सुरक्षा का कार्य
क्षत्रियों के गुण:
- रजोगुण की प्रधानता
- साहस और पराक्रम की क्षमता
- नेतृत्व और प्रशासन की क्षमता
- न्याय और दंड की क्षमता
क्षत्रियों की जीविका चलाने के लिए शास्त्रों में कई नियम और सुझाव दिए गए हैं। यहाँ कुछ प्रमुख बातें हैं:
१. _राज्य और प्रशासन_: शास्त्रों में कहा गया है कि क्षत्रियों को राज्य और प्रशासन का कार्य करना चाहिए। वे राजा या प्रशासक के रूप में कार्य कर सकते हैं और समाज को न्याय और सुरक्षा प्रदान कर सकते हैं।
२. _सैन्य और युद्ध_: शास्त्रों में कहा गया है कि क्षत्रियों को सैन्य और युद्ध का कार्य करना चाहिए। वे सैनिक या सेनापति के रूप में कार्य कर सकते हैं और समाज की रक्षा कर सकते हैं।
३. _न्याय और दंड_: शास्त्रों में कहा गया है कि क्षत्रियों को न्याय और दंड का कार्य करना चाहिए। वे न्यायाधीश या दंडाधिकारी के रूप में कार्य कर सकते हैं और समाज में न्याय और अनुशासन बनाए रखने में मदद कर सकते हैं।
४. _रक्षा और सुरक्षा_: शास्त्रों में कहा गया है कि क्षत्रियों को रक्षा और सुरक्षा का कार्य करना चाहिए। वे रक्षक या सुरक्षा अधिकारी के रूप में कार्य कर सकते हैं और समाज की रक्षा और सुरक्षा में मदद कर सकते हैं।
इन नियमों और सुझावों का पालन करके, क्षत्रिय अपनी जीविका चला सकते हैं और समाज को न्याय, सुरक्षा और रक्षा प्रदान कर सकते हैं।
इन शास्त्रों में से कुछ प्रमुख हैं:
- मनुस्मृति
- यजुर्वेद
- महाभारत
- वेदांत सूत्र
- भागवत पुराण
इन शास्त्रों में वर्णित नियमों और सुझावों का पालन करके, क्षत्रिय अपनी जीविका चला सकते हैं और समाज को न्याय, सुरक्षा और रक्षा प्रदान कर सकते हैं।
वैश्य
वैश्यों के कर्म और स्वभाव:
- व्यापार और वाणिज्य का कार्य
- कृषि और पशुपालन का कार्य
- उद्योग और उत्पादन का कार्य
- वित्त और अर्थव्यवस्था का कार्य
वैश्यों के गुण:
- रजोगुण और तमोगुण की मिश्रित प्रधानता
- व्यावसायिक और आर्थिक क्षमता
- उत्पादन और वितरण की क्षमता
- व्यापार और वाणिज्य की क्षमता
वैश्य की जीविका चलाने के लिए शास्त्रों में कई नियम और सुझाव दिए गए हैं। यहाँ कुछ प्रमुख बातें हैं:
१. _व्यापार और वाणिज्य_: शास्त्रों में कहा गया है कि वैश्यों को व्यापार और वाणिज्य का कार्य करना चाहिए। वे व्यापारी या वाणिज्यिक के रूप में कार्य कर सकते हैं और समाज को आवश्यक वस्तुओं और सेवाओं की आपूर्ति कर सकते हैं।
२. _कृषि और पशुपालन_: शास्त्रों में कहा गया है कि वैश्यों को कृषि और पशुपालन का कार्य करना चाहिए। वे किसान या पशुपालक के रूप में कार्य कर सकते हैं और समाज को आवश्यक खाद्य पदार्थों और पशु उत्पादों की आपूर्ति कर सकते हैं।
३. _उद्योग और उत्पादन_: शास्त्रों में कहा गया है कि वैश्यों को उद्योग और उत्पादन का कार्य करना चाहिए। वे उद्योगपति या उत्पादक के रूप में कार्य कर सकते हैं और समाज को आवश्यक वस्तुओं और सेवाओं की आपूर्ति कर सकते हैं।
४. _वित्त और अर्थव्यवस्था_: शास्त्रों में कहा गया है कि वैश्यों को वित्त और अर्थव्यवस्था का कार्य करना चाहिए। वे वित्तीय सलाहकार या अर्थव्यवस्था विशेषज्ञ के रूप में कार्य कर सकते हैं और समाज को वित्तीय और आर्थिक मामलों में सलाह और मार्गदर्शन प्रदान कर सकते हैं।
इन नियमों और सुझावों का पालन करके, वैश्य अपनी जीविका चला सकते हैं और समाज को आवश्यक वस्तुओं और सेवाओं की आपूर्ति कर सकते हैं।
इन शास्त्रों में से कुछ प्रमुख हैं:
- मनुस्मृति
- यजुर्वेद
- महाभारत
- वेदांत सूत्र
- भागवत पुराण
इन शास्त्रों में वर्णित नियमों और सुझावों का पालन करके, वैश्य अपनी जीविका चला सकते हैं और समाज को आवश्यक वस्तुओं और सेवाओं की आपूर्ति कर सकते हैं।
शूद्र
शूद्रों के कर्म और स्वभाव:
- सेवा और सहायक का कार्य
- श्रम और मजदूरी का कार्य
- सहायता और समर्थन का कार्य
- सेवा और समर्पण का कार्य
शूद्रों के गुण:
- तमोगुण की प्रधानता
- सेवा और सहायक की क्षमता
- श्रम और मजदूरी की क्षमता
- सहायता और समर्थन की क्षमता।
शूद्र की जीविका चलाने के लिए शास्त्रों में कई नियम और सुझाव दिए गए हैं। यहाँ कुछ प्रमुख बातें हैं:
१. _सेवा और सहायक का कार्य_: शास्त्रों में कहा गया है कि शूद्रों को सेवा और सहायक का कार्य करना चाहिए। वे अन्य वर्णों के लोगों की सेवा में लग सकते हैं और उनकी सहायता कर सकते हैं।
२. _श्रम और मजदूरी_: शास्त्रों में कहा गया है कि शूद्रों को श्रम और मजदूरी का कार्य करना चाहिए। वे विभिन्न प्रकार के श्रमिक कार्यों में लग सकते हैं और अपनी जीविका चला सकते हैं।
३. _सहायता और समर्थन_: शास्त्रों में कहा गया है कि शूद्रों को सहायता और समर्थन का कार्य करना चाहिए। वे अन्य लोगों की सहायता कर सकते हैं और उनका समर्थन कर सकते हैं।
४. _अन्य वर्णों की सेवा_: शास्त्रों में कहा गया है कि शूद्रों को अन्य वर्णों की सेवा करनी चाहिए। वे ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों की सेवा में लग सकते हैं और उनकी सहायता कर सकते हैं।
इन नियमों और सुझावों का पालन करके, शूद्र अपनी जीविका चला सकते हैं और समाज में अपना योगदान कर सकते हैं।
इन शास्त्रों में से कुछ प्रमुख हैं:
- मनुस्मृति
- यजुर्वेद
- महाभारत
- वेदांत सूत्र
- भागवत पुराण
इन शास्त्रों में वर्णित नियमों और सुझावों का पालन करके, शूद्र अपनी जीविका चला सकते हैं और समाज में अपना योगदान कर सकते हैं।
ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों और शूद्रों में प्रकृति के गुणों के अनुसार उनके स्वभाव का निर्माण करके भेद किया जाता है।
1गुण और स्वभाव: इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण यह स्पष्ट कर रहे हैं कि विभिन्न जातियों और वर्गों का कर्म उनके स्वभाव और गुणों से निर्धारित होता है। ब्राह्मणों की प्रवृत्ति विद्या, तपस्या और शिक्षण में होती है; क्षत्रियों की प्रवृत्ति सुरक्षा, शासन और युद्ध में होती है; वैश्य व्यापार और कृषि में होते हैं; और शूद्र सेवा और श्रम में संलग्न होते हैं।
2कर्मों का विभाजन: यहाँ 'कर्माणि प्रविभक्तानि' का तात्पर्य है कि विभिन्न कर्म अलग-अलग गुणों और स्वभाव के आधार पर विभाजित किए गए हैं। यह विभाजन कर्म और स्वभाव के मेल पर आधारित है, न कि जन्म या जाति के आधार पर।
3जाति व्यवस्था का सन्देश: भगवान श्रीकृष्ण ने इस श्लोक में जाति व्यवस्था के प्राकृतिक और गुण आधारित विभाजन की बात की है। यह विभाजन समाज को सही ढंग से कार्य करने और प्रत्येक व्यक्ति के स्वाभाविक गुणों के अनुसार अपना कार्य करने में मदद करता है।
इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण ने समाज के विभिन्न वर्गों के कर्म और स्वभाव को मान्यता दी है और यह स्पष्ट किया है कि प्रत्येक वर्ग के कर्म उनके स्वभाव और गुणों से निर्धारित होते हैं। बताया गया है।
अब सामाजिक रूप में देखें इस देह में
ब्राह्मण मुख बताया गया है
क्षत्रिय को बाजू और सीना तो
वैश्य को पेट बताया जाता है।
शूद्र को पैर बताया गया है।
अब इनके सामाजिक कर्म के ढांचे का अवलोकन करते है।
जिस से समाजिक शिक्षा मिलती है और समाज एक उन्नत समाज बनता है।
ब्राह्मण (मुख)
है जिस का काम वचन बोलना। भोजन चबाना और वैश्य के हवाले करना होता है।
अब वैश्य को जो भोजन प्राप्त होता है।उस से शारीरिक निर्वाह योग्य ऊर्जा को ब्राह्मण ,शूद्र,क्षत्रिय को वापिस दे कर ऊर्जा वान बना कर कचरा त्यागने को शूद्र को सौंपना होता है।
अब अगर शूद्र को चोट लगे तो उसे बचाने या सहलाने को आगे क्षत्रिय हाथ आते है। ब्राह्मण फुक मारता और रोता है।
अब देखो ब्राह्मण को चोट लगे तो बचाने क्षत्रिय हाथ आता है और रोते ब्राह्मण के आंसू भी पोंछता है।
अगर क्षत्रिय को चोट लगे तब भी दुख ब्राह्मण को ही होता है।
शूद्र सेवा के रूप में सब को मंदिर ले जाता है पर पूजा ब्राह्मण,क्षत्रिय मिल कर ही करते है।
जिन चरणों को छुआ जाता है वह शूद्र ही होते है।
18 ॥41॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 42
श्लोक:
शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्॥
भावार्थ:
अंतःकरण का निग्रह करना, इंद्रियों का दमन करना, धर्मपालन के लिए कष्ट सहना, बाहर-भीतर से शुद्ध
✍️श्रेष्ठता के अभिमान का अभाव, दम्भाचरण का अभाव, किसी भी प्राणी को किसी प्रकार भी न सताना, क्षमाभाव, मन-वाणी आदि की सरलता, श्रद्धा-भक्ति सहित गुरु की सेवा, बाहर-भीतर की शुद्धि (सत्यतापूर्वक शुद्ध व्यवहार से द्रव्य की और उसके अन्न से आहार की तथा यथायोग्य बर्ताव से आचरणों की और जल-मृत्तिकादि से शरीर की शुद्धि को बाहर की शुद्धि कहते हैं तथा राग, द्वेष और कपट आदि विकारों का नाश होकर अन्तःकरण का स्वच्छ हो जाना भीतर की शुद्धि कही जाती है।) अन्तःकरण की स्थिरता और मन-इन्द्रियों सहित शरीर का निग्रह
अब जिन इच्छा आदिको वैशेशिकमतावलंबी
वैशेषिक दर्शन के अनुसार, पदार्थ नौ प्रकार के होते हैं:
1. पृथ्वी
2. जल
3. अग्नि
4. वायु
5. आकाश
6. समय
7. दिशा
8. आत्मा
9. मन
वैशेषिक दर्शन के अनुसार, इन पदार्थों के गुण और कर्म होते हैं, और ये गुण और कर्म एक दूसरे के साथ संबंधित होते हैं।)
वैशेषिकमतावलंबी व्यक्ति वैशेषिक दर्शन के सिद्धांतों को मानता है और उनका अनुसरण करता है।
आत्माके धर्म मानते हैं वे भी क्षेत्रके ही धर्म हैं आत्माके नहीं यह बात भगवान कहते हैं --, इच्छा -- जिस प्रकारके सुखदायक विषयका पहले उपभोग किया गया था फिर वैसा ही पदार्थ के होने पर प्राप्त होने वाला सुखका कारण समझकर मनुष्य उसे लेना चाहता है वह चाहत है नाम की चाहत वह अन्तःकरण का धर्म है और ज्ञेय होने के कारण क्षेत्र है। तथा द्वितीय--जिस प्रकार के पदार्थको दुःखका कारण समझकर पहले अनुभव हुआ हो फिर एक ही जाति के पदार्थ के प्राप्त होने पर कौन सा मनुष्य द्वेष करता है उस भावका नाम क्या है वह भी ज्ञेय होनेके कारण क्षेत्र ही है। वही प्रकार सुख कौन सा उपयुक्तआशारूप और सात्विक है ज्ञेय होने के कारण क्षेत्र ही है तथा विपरीतरूप दुःख भी ज्ञेय होने के कारण क्षेत्र ही है। देह और इंद्रियोंका समूह संघ के सदस्य हैं। प्रकाशित हुई जो अन्तःकरणकी वृत्ति है जो अग्निसे कलश लोहपिंडकी भाँति आत्मचैतन्यके आभासरूपसे व्याप्त है वह स्वयं भी ज्ञेय होनेके कारण क्षेत्र ही है। व्याकुल हुए शरीर और इन्द्रियादि किस आधार पर मिलते हैं वह धृति भी ज्ञेय होने से ही क्षेत्र है। अंतःकरण के लिए समस्त धर्मों का संकेत करने के लिए यहां इच्छादि धर्मों का ग्रहण किया गया है। कौन सा कुछ कहा गया है? उनके उपसंहार हैं--महत्तत्त्वदि अलवरसे सम्मिलित क्षेत्रका इसका स्वरूप संक्षेपसे कहा गया है। अर्थात् जिन समस्त क्षेत्रभेदोंका समूह में यह शरीर क्षेत्र ऐसा कहा गया है? महाभूतोंसे लेकर धृतिपर्यन्त भेदोंसे अलग-अलग उस क्षेत्र की व्याख्या कर दी गई। जो आगे कहे जानेवाले विशेष क्षेत्र से सम्बंधित है जिस क्षेत्रज्ञ को प्रभावयुक्त जन लेने से (मनुष्य) अमृतरूप हो जाता है भगवान स्वयं वाम आश्रम ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि, अन्य वचनों से विशेषों सहित।इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने ज्ञान प्राप्ति के लिए आवश्यक गुणों और आचरणों का वर्णन किया है। यह श्लोक अध्याय 13 के "प्रकृति, पुरुष तथा चेतना" के संदर्भ में है, जिसमें यह बताया गया है कि व्यक्ति को किन-किन गुणों का पालन करना चाहिए ताकि वह सच्चे ज्ञान को प्राप्त कर सके।
यहाँ पर 'अमानित्वम' का अर्थ है श्रेष्ठता का अभाव, यानी कि अपने आपको सबसे बड़ा या सबसे श्रेष्ठ मानने का भाव न होना। 'अदम्भित्वम्' का अर्थ है दिखावा न करना। व्यक्ति को अपने गुणों और योग्यताओं का प्रदर्शन करके दूसरों पर प्रभाव डालने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।इस से घमंड पैदा होता है।अर्थात जैसे हो वैसे ही दूसरों को भी दिखाई दो।
अहिंसा: यह गुण सभी प्रकार की हिंसा से दूर रहने की शिक्षा देता है। न केवल शारीरिक हिंसा से बल्कि मानसिक और वाणी द्वारा भी किसी को कष्ट न पहुँचाने का भाव होना चाहिए।
क्षान्ति: यहाँ क्षमाभाव का महत्व बताया गया है, जिसका अर्थ है दूसरों की गलतियों को माफ कर देना। क्षमाशीलता से व्यक्ति के मन में शांति और स्थिरता आती है।बार बार भी गलती माफ नहीं होती फिर भी प्रयासरत रहे कि किसी का बुरा अपने द्वारा ना हो जाए।आरजवम्: इसका मतलब है सरलता और सच्चाई। जीवन में व्यक्ति को सच्चा और सीधा होना चाहिए, बिना किसी छल-कपट के।दंभी स्वरूप को ग्रहण ना करें।
आचार्योपासनम्: गुरु की सेवा और उनके प्रति श्रद्धा का भाव रखना 'आचार्योपासनम्' कहलाता है। गुरु के ज्ञान और शिक्षाओं का सम्मान और उनका पालन करना आवश्यक है।(गुरु मानो ग्रंथ )
शौचम्: यहाँ शुद्धि के दो पहलुओं का वर्णन है - बाहरी और आंतरिक शुद्धि। बाहरी शुद्धि का अर्थ है शरीर, वस्त्र, और पर्यावरण की सफाई रखना। आंतरिक शुद्धि का अर्थ है मन और हृदय को राग, द्वेष, और छल कपट जैसे विकारों से मुक्त रखना।
स्थैर्यम्: मन और शरीर की स्थिरता। जीवन में आने वाली परेशानियों में धैर्य संतोष रखना और अपने लक्ष्य की ओर स्थिर रहना 'स्थैर्यम्' कहलाता है।
आत्मविनिग्रहः: अपने मन, इंद्रियों और शरीर पर नियंत्रण रखना। इच्छाओं और वासनाओं को संयमित करके आत्मनियंत्रण करना।(इच्छा कभी पूरी नहीं होती जरूरत जरूर पूरी होती है ,ध्यान में सदा रखना।)
इस श्लोक में भगवान कृष्ण बताते हैं कि यह सभी गुण आत्मज्ञान प्राप्त करने के लिए आवश्यक हैं। इन गुणों का पालन करके व्यक्ति अपने जीवन में सच्चा ज्ञान प्राप्त कर सकता है और परमात्मा के साक्षात्कार के मार्ग पर अग्रसर हो सकता है।)
दूसरों के अपराधों को क्षमा करना, मन, इंद्रिय और शरीर को सरल रखना, वेद, शास्त्र, ईश्वर और परलोक आदि में श्रद्धा रखना, वेद-शास्त्रों का अध्ययन-अध्यापन करना और परमात्मा के तत्त्व का अनुभव करना- ये सब-के-सब ही ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म हैं
18॥42॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 43
श्लोक:
शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्।
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्॥
भावार्थ:
शूरवीरता, तेज, धैर्य, चतुरता और युद्ध में से न भागना, दान देना और स्वामिभाव- ये सब-के-सब ही क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म हैं
18॥43॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 44
श्लोक:
कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्।
परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्॥
भावार्थ:
खेती, गोपालन और क्रय-विक्रय रूप सत्य व्यवहार
(वस्तुओं के खरीदने और बेचने में तौल, नाप और गिनती आदि से कम देना अथवा अधिक लेना एवं वस्तु को बदलकर या एक वस्तु में दूसरी या खराब वस्तु मिलाकर ना देना अथवा अच्छी कमाई ले लेना तथा नफा, आढ़त और दलाली ठहराकर उससे अधिक दाम लेना या कम देना तथा झूठ, कपट, चोरी और जबरदस्ती से अथवा अन्य किसी प्रकार से दूसरों के हक को ग्रहण कर लेना इत्यादि दोषों से जो रहित हो जो सत्यतापूर्वक ईमानदारी से पवित्र वस्तुओं का व्यापार करता है उसका नाम 'सत्य व्यवहार' है।)
जैसे एक कपड़ा व्यापारी नियम बनाता है कि उसे 1₹मीटर से अधिक मुनाफा नहीं लेना है।इसी में से दुकान, मकान,कर्मचारी, और दुकान पर भिक्षा मांगने आए लोगों को भी उन का मेहनताना आदि देना है।यदि वह प्रति दिन
1₹ प्रॉफिट से 100मीटर के 10 थान कपड़ा बेचे तो उस से उसे 10000₹ प्रति दिन की कमाई हो जाती है,।
ये वैश्य के स्वाभाविक कर्म हैं तथा सब वर्णों की सेवा करना शूद्र का भी स्वाभाविक कर्म है
18॥44॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 45
श्लोक:
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः।
स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥
भावार्थ:
अपने-अपने स्वाभाविक कर्मों में तत्परता से लगा हुआ मनुष्य भगवत्प्राप्ति रूप परमसिद्धि को प्राप्त हो जाता है। अपने स्वाभाविक कर्म में लगा हुआ मनुष्य जिस प्रकार से कर्म करके परमसिद्धि को प्राप्त होता है, उस विधि को तू सुन
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18॥45॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 46
श्लोक:
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः॥
भावार्थ:
जिस परमेश्वर से संपूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति हुई है और जिससे यह समस्त जगत् व्याप्त है
(जैसे बर्फ जल से व्याप्त है, वैसे ही संपूर्ण संसार सच्चिदानंदघन परमात्मा से व्याप्त है),
उस परमेश्वर की अपने स्वाभाविक कर्मों द्वारा पूजा करके
(जैसे पतिव्रता स्त्री पति को सर्वस्व समझकर पति का चिंतन करती हुई पति के आज्ञानुसार पति के ही लिए मन, वाणी, शरीर से कर्म करती है, वैसे ही परमेश्वर को ही सर्वस्व समझकर परमेश्वर का चिंतन करते हुए परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार मन, वाणी और शरीर से परमेश्वर के ही लिए स्वाभाविक कर्तव्य कर्म का आचरण करना 'कर्म द्वारा परमेश्वर को पूजना' है) मनुष्य परमसिद्धि को प्राप्त हो जाता है
18॥46॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 47
श्लोक:
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्॥
भावार्थ:
अच्छी प्रकार आचरण किए हुए दूसरे के धर्म से गुणरहित भी अपना धर्म श्रेष्ठ है, क्योंकि स्वभाव से नियत किए हुए स्वधर्मरूप कर्म को करता हुआ मनुष्य पाप को नहीं प्राप्त होता
भगवद्गीता में मनुष्य के वृत्तिपरक कार्य (स्वधर्म) का निर्देश है।
जैसा कि पूर्व श्लोकों में वर्णन है, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के गुण उनके विशेष प्राकृतिक गुण (स्वभाव) द्वारा बताए गए हैं। किसी को भी दूसरे के कार्य का अनुकरण नहीं करना चाहिए। जो व्यक्ति स्वभाव से शूद्र के द्वारा जाने वाले कर्म के प्रति आकृष्ट हो, उसे आप अपने पंथ ही ब्राह्मण न कहें, भले ही वह ब्राह्मण कुल में क्यों उत्पन्न न हुआ हो। इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति को अपने स्वभाव के अनुसार कार्य करना चाहिए; कोई भी कर्म निकृष्ट नहीं है, यदि वह भगवान की सेवा के लिए किया जाता है। ब्राह्मण का संस्कार-परक कार्य निश्चित रूप से सात्विक है, लेकिन यदि किसी मनुष्य का स्वभाव सात्विक नहीं है, तो उसे ब्राह्मण के संस्कार-परक कार्य (धर्म) का अनुकरण नहीं करना चाहिए। क्षत्रिय या पुरोहितों के लिए अनेक गहित बातें हैं - क्षत्रियों को शत्रुओं का वध करने के लिए हिंसक आचरण करना पड़ता है और कभी-कभी क्षत्रियों में झूठ भी बोलना पड़ता है। ऐसी हिंसा और कपाट राजनीतिक मामले सामने आते हैं, लेकिन क्षत्रियों से यह आशा नहीं की जाती कि वह अपनी प्रवृत्तिपरक कर्तव्य त्याग कर ब्राह्मण के कार्य करने लगें। पूजा तो ब्राह्मण ही करता है। और करे गा।क्षत्रिय उस में आहुति के लिए उपस्थित हो सकता है।
मनुष्य को भगवान की कृपा करने के लिए कार्य करना चाहिए। उदाहरणार्थ, अर्जुन क्षत्रिय था। वह दूसरे पक्ष से युद्ध करने से बच रहा था। लेकिन अगर ऐसा युद्ध भगवान कृष्ण के लिए करना पड़े, तो पतन से घबड़ाने की जरूरत नहीं है। कभी-कभी व्यावसायिक क्षेत्र में भी व्यापारियों को लाभ के लिए झूठ बोलना पड़ता है। अगर वह ऐसा नहीं करेगा तो उसे कोई फायदा नहीं होगा। कभी-कभी व्यापार के लिए वह कहता है, "अरे मेरे ग्राहक भाई! मैं तुमसे कोई लाभ नहीं ले रहा हूं।" लेकिन हमें यह कहना चाहिए कि बिना लाभ के व्यापार जीवित नहीं रह सकता। यदि कोई व्यापारी यह कहता है कि उसे कोई लाभ नहीं मिल रहा है तो उसे एक सरल ऋण वसूली करनी चाहिए।जैसे महिलाओं का काम ही मोल भाव करना होता है।व्यापारी कपड़ा दिखाता है। और मोलभाव में एक निश्चित कीमत बता कर कैंची हाथ में पकड़ कर कहता है बोलो बहन काटूं पर काटता नहीं काटने का दिखावा करता रहता है। अंत में ना तेरा ना मेरा इतने लगेंगे सहमति बना कर काट देता है।इस प्रकार उसे कोई दोष नहीं लगता क्यों कि सहमति बन जाती है।
इस लिए व्यापारियों को यह नहीं कहना चाहिए कि उन्हें ऐसे कार्य में लगा दिया गया है, जिसमें झूठ बोलने की आवश्यकता है, अतएव इस व्यवसाय (वैश्य कर्म) को त्यागकर ब्राह्मण की प्रथा ग्रहण करनी चाहिए। इसके सिद्धांतों द्वारा आज्ञा नहीं दी गई।
यदि कोई क्षत्रिय हो, वैश्य हो या शूद्र, यदि वह इस कार्य से भगवान की सेवा करता है, तो कोई मित्र नहीं है। कभी-कभी विभिन्न यज्ञों का सम्पादन करते समय ब्राह्मणों को भी साधु की हत्या करनी पड़ती है, क्योंकि इन अनुष्ठानों में पशुओं की बलि का मतलब होता है। इसी प्रकार यदि क्षत्रिय अपने कार्य में शत्रु का वध करता है, तो उस पर पाप नहीं चढ़ता। तृतीय अध्याय में इन बातों की स्पष्ट एवं विस्तृत व्याख्या हो गयी है। प्रत्येक मनुष्य को यज्ञ या भगवान विष्णु के लिए कार्य करना चाहिए। निजी इन्द्रिय चिकित्सा के लिए कोई भी कार्य बंधन का कारण नहीं है।
इसी लिए यहां कहा गया है कि
(अच्छी प्रकार आचरण किए हुए दूसरे के धर्म से गुणरहित भी अपना धर्म श्रेष्ठ है, )
(क्योंकि स्वभाव से नियत किए हुए स्वधर्मरूप कर्म को करता हुआ मनुष्य पाप को नहीं प्राप्त होता)
स्वधर्म की श्रेष्ठता: श्लोक का पहला भाग बताता है कि व्यक्ति का अपना धर्म, भले ही उसमें कोई विशेष गुण या योग्यता न हो, परंतु वह दूसरों के धर्म से श्रेष्ठ है। इसका मतलब यह है कि व्यक्ति को अपनी स्वाभाविक प्रकृति और गुणों के अनुसार ही कर्म करना चाहिए।
स्वभावनियत कर्म: 'स्वभावनियतं कर्म' का तात्पर्य है कि व्यक्ति को अपने स्वभाव और स्वाभाविक गुणों के अनुसार ही कार्य करना चाहिए। यह कर्म स्वधर्म के अंतर्गत आता है और इसे पूरी ईमानदारी और निष्ठा के साथ करना चाहिए।
किल्बिष की अनुपस्थिति: जब व्यक्ति अपने स्वधर्म के अनुसार कर्म करता है, तो उसे 'किल्बिष' (पाप या दोष) का सामना नहीं करना पड़ता। यहाँ पर 'किल्बिष' का मतलब है पाप या दोष, जो किसी अन्य के धर्म का पालन करने के परिणामस्वरूप हो सकता है।
इस का निष्कर्ष यह निकला कि मनुष्य को अपने द्वारा विशेष गुण के कार्य में संलग्न होकर भगवान की सेवा के लिए ही कार्य करना चाहिए।
18॥47॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 48
श्लोक:
सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्।
सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः॥
भावार्थ:
अतएव हे कुन्तीपुत्र! दोषयुक्त होने पर भी सहज कर्म
(प्रकृति के अनुसार शास्त्र विधि से नियत किए हुए वर्णाश्रम के धर्म और सामान्य धर्मरूप स्वाभाविक कर्म हैं उनको ही यहाँ स्वधर्म, सहज कर्म, स्वकर्म, नियत कर्म, स्वभावज कर्म, स्वभावनियत कर्म इत्यादि नामों से कहा है)
को नहीं त्यागना चाहिए, क्योंकि धूएँ से अग्नि की भाँति सभी कर्म किसी-न-किसी दोष से युक्त हैं।
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को यह शिक्षा दे रहे हैं कि हमें अपने स्वभाव के अनुसार निर्धारित कर्मों को, भले ही उनमें कोई दोष हो, नहीं छोड़ना चाहिए। यहाँ 'सहज कर्म' से तात्पर्य उस कर्म से है जो हमारी प्रकृति और शास्त्रों के अनुसार हमें तो करना ही चाहिए।
भगवान कृष्ण यह स्पष्ट कर रहे हैं कि कर्मों में दोष का होना स्वाभाविक है, जैसे आग धुएँ से ढकी होती है। इसी तरह, हमारे सभी कर्मों में कुछ न कुछ दोष होते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि हमें कर्मों को छोड़ देना चाहिए। यदि हम कर्म करने से डरते हैं या दोषों के कारण कर्मों को छोड़ देते हैं, तो हम अपने कर्तव्यों को पूरा नहीं कर पाएंगे।
मेने तो प्रत्यक्ष रूप में देखा है।कुछ आश्रमों साम्रदायों,निरंकारी,राधास्वामी,रामपाल,जैसे लोगों के यहां जो ब्राह्मण घुस गए है वह अपनी जगह पर बैठ जाते है। और ऐसे ही क्षत्रिय लोग लाइनों में लोगो को लगाना शुरू हो जाते है। और शूद्र बिना कोई ड्यूटी लगे भी साफ सफाई सेवा की ड्यूटी खुद ही संभाल लेते है।
इस के माध्यम से भगवान कृष्ण यह सिखा रहे हैं कि दोषपूर्ण होते हुए भी कर्मों को अपने स्वभाव के अनुसार करना आवश्यक है, क्योंकि यही कर्म हमें पूर्णता की ओर ले जाते हैं और जीवन की वास्तविकता को समझने में मदद करते हैं।
जब कि यह सभी कार्य जिनको वो कर रहे होते है उस आश्रम के लिए करते है भगवान के लिए नहीं।
जीवन में सारा कर्म ही भौतिक भंडार से भंडारित रहता है। यहां तक कि ब्राह्मणों तक को ऐसे यज्ञ करने पड़ते हैं, जिनमें पशुहत्या अनिवार्य है। इसी प्रकार के क्षत्रिय क्षत्रिय कतिपय ही पवित्र क्यों न हो, उसे शत्रुओं से युद्ध करना पड़ता है। वह इससे बच नहीं सकता। इसी प्रकार एक व्यवसाय को त्यागना वह बहुत ही पवित्र क्यों न हो, अपने व्यापार में बने रहने के लिए कभी-कभी लाभ को छिपाना दिखता है, या कभी-कभी काला बाजार चलाना होता है। ये बातें जरूरी हैं, असली बचा नहीं जा सकता। इसी प्रकार यदि शूद्र ने स्वामी की सेवा करनी पड़े, तो उसे स्वामी की आज्ञा का पालन करना होता है, फिर भी ऐसा नहीं करना ।
इन सब दोषों के होने से भी मनुष्य को अपने निर्धारित कर्तव्य पालन ही करना चाहिए, क्योंकि वे स्वभावगत होते हैं।
यहां पर एक बेहद खूबसूरत उदाहरण दिया गया है। यद्यपि अग्नि शुद्ध है, फिर भी इसमें धुआँ रहता है। लेकिन तीन पर भी अग्नि उपकरण नहीं होता। अग्नि धुआँ पर भी अग्नि समस्त तत्त्वों में शुद्धतम मानी जाती है। यदि कोई क्षत्रिय प्रथा त्याग कर ब्राह्मण की प्रथा ग्रहण करना स्वीकार करता है, तो इसकी कोई निश्चितता नहीं है कि ब्राह्मण प्रथा में कोई अरुचिकर कार्य नहीं होगा। अतएव कोई भी निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि दुनिया में प्रकृति के कलम से कोई भी पूर्णत: मुक्त नहीं है। इस प्रसंग में अग्नि और धुएँ का उदाहरण अत्यंत उपयुक्त है। यदि जाड़े के दिनों में कोई भी अग्नि से कोयला नहीं निकलता है, तो कभी-कभी धुएँ से जलने और शरीर के अन्य भाग दुःखते हैं, लेकिन इन दिनों आग से भी अग्नि का ताप समाप्त हो जाता है। इसी प्रकार किसी को अपनी सहज वृत्ति इसलिए नहीं छोड़नी चाहिए कि कुछ बाधक तत्व आ गया है। ईश्वर की सेवा करने का संकल्प ले। यही सिद्धि है। जब भी कोई भी प्रथापरक कार्य भगवान को मनाने के लिए किया जाता है, तो उस कार्य के सभी दोष शुद्ध हो जाते हैं। जब भक्ति से संबंधित कर्मफल शुद्ध हो जाते हैं, तो मनुष्य अपने अंतःकरण का दर्शन कर सकता है और यही आत्म-साक्षात्कारकर्ता है।
18॥48॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 49
श्लोक:
(ज्ञाननिष्ठा का विषय )
असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः।
नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां सन्न्यासेनाधिगच्छति॥
भावार्थ:
सर्वत्र आसक्तिरहित बुद्धिवाला, स्पृहारहित और जीते हुए अंतःकरण वाला पुरुष सांख्ययोग के द्वारा उस परम नैष्कर्म्यसिद्धि को प्राप्त होता है
संत का अर्थ है कि सदा अपने भगवान का हिस्सा बनाने वाला मनुष्य यह सोचे कि उसे अपने कार्य के फल को भोगने का कोई अधिकार नहीं है। सृष्टि में वह भगवान का अंश है, अतावेव उसके कार्य का फल भगवान द्वारा भोगा जाना चाहिए, यही वास्तव में कृष्णभावनामृत है। जो व्यक्ति कृष्णभावनामृत में स्थित कर्म करता है, वह वास्तव में संत है। ऐसी मनोवृत्ति होने से मनुष्य सन्तुष्ट रहता है क्योंकि वास्तव में वह भगवान के लिये कार्य कर रहा होता है। इस प्रकार वह किसी भी भौतिक वस्तु का आनंद नहीं ले पाता है, वह भगवान की सेवा से प्राप्त दिव्य सुख से किसी भी वस्तु का आनंद नहीं ले पाता है। संत को पूर्व कार्यकलापों के बंधन से मुक्त माना जाता है, लेकिन जो व्यक्ति कृष्णभावनामृत में होता है, वह बिना संत ग्रहण किए ही यह सिद्धि प्राप्त कर लेता है। यह मनोवैज्ञानिक योगारूढ़ या योग की सिद्धावस्था कहलाती है। जैसा कि तीसरे अध्याय में पुष्टि हुई है - यस्त्वमात्रत्रेव स्यात् - जो व्यक्ति अपने में रहता है, उसे अपने कर्म से किसी प्रकार के बंधन का भय नहीं रहता।
यहाँ "असक्तबुद्धिः" का मतलब है कि जिनकी बुद्धि संसारिक बंधनों और इच्छाओं से मुक्त है। "सर्वत्र" का अर्थ है सभी परिस्थितियों में। "जितात्मा" का मतलब है जो अपनी आत्मा पर विजय प्राप्त कर चुका है। "विगतस्पृहः" का अर्थ है जो इच्छाओं और चाहतों से मुक्त है।
इस श्लोक में कहा गया है कि जब व्यक्ति की बुद्धि हर स्थिति में आसक्ति से मुक्त होती है, उसकी आत्मा पर पूरी विजय होती है और वह इच्छाओं से परे हो जाता है, तब वह व्यक्ति "नैष्कर्म्यसिद्धि" को प्राप्त करता है। "नैष्कर्म्यसिद्धि" का अर्थ है कर्मों से परे होने की स्थिति, जिसमें व्यक्ति बिना किसी कर्म के योग या समर्पण के माध्यम से परम स्थिति को प्राप्त कर लेता है।
इस प्रकार, संन्यास और सांख्ययोग के द्वारा परम सिद्धि की प्राप्ति के लिए, व्यक्ति को आसक्ति, इच्छाओं और सांसारिक बंधनों से मुक्त होना ही पड़ता है।
18॥49॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 50
श्लोक:
सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे।
समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा॥
भावार्थ:
जो कि ज्ञान योग की परानिष्ठा है, उस नैष्कर्म्य सिद्धि को जिस प्रकार से प्राप्त होकर मनुष्य ब्रह्म को प्राप्त होता है, उस प्रकार को हे कुन्तीपुत्र! तू संक्षेप में ही मुझसे समझ।
तात्पर्य:भगवान् अर्जुन को बताते हैं कि किस तरह कोई व्यक्ति केवल अपने वृत्तिपरक कार्य में लग कर परम सिद्धावस्था को प्राप्त कर सकता है, यदि यह कार्य भगवान् के लिए किया गया हो। यदि मनुष्य अपने कर्म के फल को परमेश्वर की तुष्टि के लिए ही त्याग देता है, तो उसे ब्रह्म की चरम अवस्था प्राप्त हो जाती है। यह आत्म-साक्षात्कार की विधि है। ज्ञान की वास्तविक सिद्धि शुद्ध कृष्णभावनामृत प्राप्त करने में है।भगवान् अर्जुन के शिष्य किसी प्रकार के व्यक्ति होते हैं जो केवल अपने वृत्तिपरक कार्य में लगकर परमसिद्धांत को प्राप्त कर सकते हैं, यदि यह कार्य भगवान के लिए किया गया हो। यदि मनुष्य अपने कर्म के फल को भगवान की तुष्टि के रूप में त्याग देता है, तो उसे ब्रह्म की चरम सीमा प्राप्त होती है। यह आत्म-साक्षात्कार की विधि है। ज्ञान की वास्तविक सिद्धि शुद्ध कृष्णवनामृत प्राप्त करने के लिए इसका वर्णन निम्नलिखित श्लोकों में किया गया है।
18॥50॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 51-53
श्लोक:
बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च।
शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च॥
विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानस।
ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः॥
अहङकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्।
विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते॥
भावार्थ:
विशुद्ध बुद्धि से युक्त तथा हलका, सात्त्विक और नियमित भोजन करने वाला, शब्दादि विषयों का त्याग करके एकांत और शुद्ध देश का सेवन करने वाला, सात्त्विक धारण शक्ति के (इसी अध्याय के श्लोक 33 में जिसका विस्तार है) द्वारा अंतःकरण और इंद्रियों का संयम करके मन, वाणी और शरीर को वश में कर लेने वाला, राग-द्वेष को सर्वथा नष्ट करके भलीभाँति दृढ़ वैराग्य का आश्रय लेने वाला तथा अहंकार, बल, घमंड, काम, क्रोध और परिग्रह का त्याग करके निरंतर ध्यान योग के परायण रहने वाला, ममतारहित और शांतियुक्त पुरुष सच्चिदानन्दघन ब्रह्म में अभिन्नभाव से स्थित होने का पात्र होता है
बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्याऽऽत्मानं नियम्य च।
शब्दादीन् विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च।।18.51।।
भावार्थ यह है:
"जो व्यक्ति अपनी बुद्धि को शुद्ध करके और धृति के साथ अपने आप को नियंत्रित करता है, जो शब्द, रूप, रस, गंध और स्पर्श जैसे विषयों को त्याग देता है और राग और द्वेष को भी त्याग देता है, वह व्यक्ति परमात्मा की प्राप्ति के लिए तैयार हो जाता है।"
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने बताया है कि कैसे एक व्यक्ति अपने आप को शुद्ध और नियंत्रित कर सकता है और परमात्मा की प्राप्ति के लिए तैयार हो सकता है।
इस श्लोक का भावार्थ यह है:
"जो व्यक्ति अपनी बुद्धि को शुद्ध करके और धृति के साथ अपने आप को नियंत्रित करता है, जो शब्द, रूप, रस, गंध और स्पर्श जैसे विषयों को त्याग देता है और राग और द्वेष को भी त्याग देता है, वह व्यक्ति परमात्मा की प्राप्ति के लिए तैयार हो जाता है।"
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने बताया है कि कैसे एक व्यक्ति अपने आप को शुद्ध और नियंत्रित कर सकता है और परमात्मा की प्राप्ति के लिए तैयार हो सकता है।
विविक्तसेवी लघुवशि यत्वाक्कयमानसः।
ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रित:।।18.52।।
"जो व्यक्ति एकांत में रहना पसंद करता है, जो अपने मन को नियंत्रित करने में सक्षम है, जो ध्यानयोग में निरंतर लगा रहता है, और जो वैराग्य को अपना आश्रय बनाता है, वह व्यक्ति परमात्मा की प्राप्ति के लिए तैयार हो जाता है।"
इस श्लोक में बताया गया है कि कैसे एक व्यक्ति अपने आप को परमात्मा की प्राप्ति के लिए तैयार कर सकता है। इस श्लोक के मुख्य बिंदु हैं:
- एकांत में रहना
- मन को नियंत्रित करना
- ध्यानयोग में निरंतर लगे रहना
- वैराग्य को अपना आश्रय बनाना
इन बिंदुओं का पालन करके, एक व्यक्ति अपने आप को परमात्मा की प्राप्ति के लिए तैयार कर सकता है।
"जो व्यक्ति अहंकार, बल, दर्प, काम, क्रोध और परिग्रह को त्याग देता है, वह व्यक्ति निर्मम, शांत और ब्रह्मभूयाय (ब्रह्म की अवस्था में पहुंचने के लिए) तैयार हो जाता है।"
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने बताया है कि कैसे एक व्यक्ति अपने आप को ब्रह्म की अवस्था में पहुंचने के लिए तैयार कर सकता है।
इस श्लोक के मुख्य बिंदु हैं:
अहंकार (अहंकार का त्याग)
बल (बल का दुरुपयोग न करना)
दर्प (गर्व और अभिमान का त्याग)
काम (कामवासना का नियंत्रण)
क्रोध (क्रोध का नियंत्रण)
परिग्रह (परिग्रह का त्याग, अर्थात् व्यक्तिगत संपत्ति का त्याग)
इन बिंदुओं का पालन करके, एक व्यक्ति अपने आप को ब्रह्म की अवस्था में पहुंचने के लिए तैयार कर सकता है।
॥51-53॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 54
श्लोक:
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति।
समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्॥
भावार्थ:
फिर वह सच्चिदानन्दघन ब्रह्म में एकीभाव से स्थित, प्रसन्न मनवाला योगी न तो किसी के लिए शोक करता है और न किसी की आकांक्षा ही करता है। ऐसा समस्त प्राणियों में समभाव वाला (गीता अध्याय 6 श्लोक 29 में देखना चाहिए)
योगी मेरी पराभक्ति को ( जो तत्त्व ज्ञान की पराकाष्ठा है तथा जिसको प्राप्त होकर और कुछ जानना बाकी नहीं रहता वही यहाँ पराभक्ति, ज्ञान की परानिष्ठा, परम नैष्कर्म्यसिद्धि और परमसिद्धि इत्यादि नामों से कही गई है) प्राप्त हो जाता है
पराभक्ति एक उच्च स्तर की भक्ति है, जिसमें भक्त अपने आप को पूरी तरह से भगवान के चरणों में समर्पित कर देता है। पराभक्ति की प्रकाष्ठा निम्नलिखित हैं:
१. _निष्काम भक्ति_: पराभक्ति में भक्त अपने आप को पूरी तरह से भगवान के चरणों में समर्पित कर देता है, बिना किसी व्यक्तिगत लाभ या इच्छा के।
२. _निरंतर ध्यान_: पराभक्ति में भक्त भगवान के ध्यान में निरंतर रहता है, और अपने दैनिक जीवन में भी भगवान की याद में रहता है।
३. _विश्वास और श्रद्धा_: पराभक्ति में भक्त भगवान में पूरी तरह से विश्वास और श्रद्धा रखता है, और भगवान की कृपा और आशीर्वाद में पूरी तरह से निर्भर रहता है।
४. _आत्म-समर्पण_: पराभक्ति में भक्त अपने आप को पूरी तरह से भगवान के चरणों में समर्पित कर देता है, और अपने आप को भगवान की इच्छा के अनुसार चलाने के लिए तैयार रहता है।
५. _प्रेम और भक्ति_: पराभक्ति में भक्त भगवान से प्रेम और भक्ति के साथ जुड़ता है, और भगवान की प्रेम और कृपा को अपने जीवन में अनुभव करता है।
परम नैष्कर्म्यसिद्धि और परमसिद्धि दोनों ही आध्यात्मिक सिद्धियाँ हैं, लेकिन इनमें कुछ भेद भी हैं:
परम नैष्कर्म्यसिद्धि:
यह सिद्धि तब प्राप्त होती है जब व्यक्ति अपने कर्मों को भगवान के चरणों में समर्पित कर देता है और अपने आप को भगवान की इच्छा के अनुसार चलाने के लिए तैयार रहता है।
इस सिद्धि में व्यक्ति को अपने कर्मों के परिणामों की चिंता नहीं रहती है, क्योंकि वह जानता है कि भगवान ही उसके कर्मों के परिणामों को नियंत्रित करते हैं।
परमसिद्धि:
यह सिद्धि तब प्राप्त होती है जब व्यक्ति अपने आप को पूरी तरह से भगवान के चरणों में समर्पित कर देता है और अपने आप को भगवान की इच्छा के अनुसार चलाने के लिए तैयार रहता है।
इस सिद्धि में व्यक्ति को अपने आप को भगवान के साथ एकता का अनुभव होता है और वह भगवान की कृपा और आशीर्वाद को अपने जीवन में अनुभव करता है।
सरल हिंदी में भाव:
परम नैष्कर्म्यसिद्धि का भाव यह है कि व्यक्ति अपने कर्मों को भगवान के चरणों में समर्पित कर देता है और अपने आप को भगवान की इच्छा के अनुसार चलाने के लिए तैयार रहता है।
परमसिद्धि का भाव यह है कि व्यक्ति अपने आप को पूरी तरह से भगवान के चरणों में समर्पित कर देता है और अपने आप को भगवान की इच्छा के अनुसार चलाने के लिए तैयार रहता है, जिससे वह भगवान के साथ एकता का अनुभव करता है।
प्रश्न इन दोनों में कोई खास अंतर तो नहीं नजर आ रहा पहले इच्छा उसके बाद ही सभी तरह का समर्पण करते है जैसे शादी की इच्छा फिर शादी और समर्पण?
उत्तर वैसे यह सवाल बहुत ही प्रासंगिक है! सही कहा है कि इच्छा के बाद ही समर्पण होता है, लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण अंतर यह है कि:
परम नैष्कर्म्यसिद्धि और परमसिद्धि दोनों में समर्पण होता है, लेकिन दोनों के समर्पण के पीछे की प्रेरणा और उद्देश्य अलग-अलग होते हैं।
परम नैष्कर्म्यसिद्धि में समर्पण की प्रेरणा यह होती है कि व्यक्ति अपने कर्मों के परिणामों से मुक्त होना चाहता है ,और भगवान की इच्छा के अनुसार चलना भी चाहता है। यह समर्पण एक प्रकार की सेवा या कर्तव्य की भावना से प्रेरित होता है।
दूसरी ओर, परमसिद्धि में समर्पण की प्रेरणा यह होती है कि व्यक्ति भगवान के साथ एकता का अनुभव करना चाहता है और अपने आप को पूरी तरह से भगवान के चरणों में समर्पित करना चाहता है। यह समर्पण एक प्रकार की प्रेम और भक्ति की भावना से प्रेरित होता है।
इस प्रकार, दोनों समर्पणों में एक महत्वपूर्ण अंतर है: एक में सेवा और कर्तव्य की भावना होती है, जबकि दूसरे में प्रेम और भक्ति की भावना होती है।
शास्त्रों में भगति के मुख्य रूप से नौ प्रकार बताए गए हैं:
१. _श्रवण भक्ति_: भगवान की कथाओं और गुणों को सुनने से जो भक्ति उत्पन्न होती है, उसे श्रवण भक्ति कहते हैं।
२. _कीर्तन भक्ति_: भगवान के नाम और गुणों को गाने और सुनने से जो भक्ति उत्पन्न होती है, उसे कीर्तन भक्ति कहते हैं।
३. _स्मरण भक्ति_: भगवान के नाम और गुणों को याद रखने और स्मरण करने से जो भक्ति उत्पन्न होती है, उसे स्मरण भक्ति कहते हैं।
४. _पाद सेवा भक्ति_: भगवान के चरणों की सेवा करने से जो भक्ति उत्पन्न होती है, उसे पाद सेवा भक्ति कहते हैं।
५. _अर्चन भक्ति_: भगवान की पूजा और अर्चना करने से जो भक्ति उत्पन्न होती है, उसे अर्चन भक्ति कहते हैं।
६. _वंदन भक्ति_: भगवान को नमस्कार और वंदन करने से जो भक्ति उत्पन्न होती है, उसे वंदन भक्ति कहते हैं।
७. _दास्य भक्ति_: भगवान को अपना स्वामी मानने और उनकी सेवा करने से जो भक्ति उत्पन्न होती है, उसे दास्य भक्ति कहते हैं।
८. _सख्य भक्ति_: भगवान को अपना मित्र मानने और उनके साथ सख्य भाव रखने से जो भक्ति उत्पन्न होती है, उसे सख्य भक्ति कहते हैं।
९. _माधुर्य भक्ति_: भगवान को अपना प्रियतम मानने और उनके साथ माधुर्य भाव रखने से जो भक्ति उत्पन्न होती है, उसे माधुर्य भक्ति कहते हैं।
इन नौ प्रकार की भगति के माध्यम से भक्त भगवान के साथ जुड़ सकता है और उनकी कृपा और आशीर्वाद को प्राप्त कर सकता है।
विवाह संस्कार में विवाह के महत्व को जान कर भी इसे अनुभव किया जा सकता है।
विवाह के समय लड़का लड़की दोनों अलग अलग कुल से होते है।उनका प्रेम भी अपने अपने परिवार से एक समान ही होता है।लड़की से हमें शिक्षा प्राप्त होती है कि जिस तरह उस का अपने परिवार के साथ पहले था धीरे धीरे उस में बदलाव आता जाता है।उस का सारा लगाव प्रेम ससुराल से जुड़ जाता है। उसकी सारी भगति अब चाहे दादी बन जाए अपनी ससुराल ही प्यारी लगने लगती है।उसी में मस्त हो जाती है।यही उसकी सब से बड़ी तपस्या,भगति होती है।जिस का विचार कर के ही हमारे पूर्वजों ऋषि मुनियों ने तत्व निकाला और विवाह संस्कार में दुल्हन को बताया कि पति ही परमेश्वर है।उसे कोई जप तप अपने लिए करने की कोई जरूर नहीं है ,वो पति के शुभ कर्मों में आधे की हकदार है।पति के बुरे कर्मों का उसे कोई फल नहीं मिले गा। इस प्रकाष्ठा की भगति को जान लेने के बाद
उसको प्राप्त होकर और कुछ जानना बाकी ही नहीं रहता।
प्यारे और उसके अलग-अलग तरह के आभूषणों से साधक का मन अपने आप शांत हो जाता है।
अर्थात; इस पाठ में भगवान श्रीकृष्ण ने बताया है कि कैसे एक साधक अपने मन को शांत और स्थिर कर सकता है और परमात्मा की परा भक्ति को प्राप्त कर सकता है।
भगवान श्रीकृष्ण ने बताया है कि साधक को अपने मन को शांत और स्थिर करने के लिए अपने विक्षेपों और संभ्रमों को नियंत्रित करना होगा। इसके लिए साधक को अपने कर्तृत्व और भोक्तृत्व के अभिमान को त्यागना होगा और अपने आप को परमात्मा के चरणों में समर्पित करना होगा।
भगवान श्रीकृष्ण ने बताया है कि जब साधक अपने मन को शांत और स्थिर कर लेता है, तो वह परमात्मा की परा भक्ति को प्राप्त कर लेता है। इस अवस्था में साधक अपने आप को परमात्मा के साथ एकता का अनुभव करता है और अपने जीवन में शांति, सुख और संतुष्टि का अनुभव करता है।
इस पाठ का मुख्य संदेश यह है कि साधक को अपने मन को शांत और स्थिर करने के लिए अपने विक्षेपों और संभ्रमों को नियंत्रित करना होगा और अपने आप को परमात्मा के चरणों में समर्पित करना होगा।
18॥54॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 55
श्लोक:
भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः।
ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्॥
भावार्थ:
उस पराभक्ति के द्वारा वह मुझ परमात्मा को, मैं जो हूँ और जितना हूँ, ठीक वैसा-का-वैसा तत्त्व से जान लेता है तथा उस भक्ति से मुझको तत्त्व से जानकर तत्काल ही मुझमें प्रविष्ट हो जाता है
जब परमात्मतत्त्वमें आकर्षणहोता हर अनुराग हो जाता है। तब साधक स्वयं उस परमात्मा के सर्वथा समर्पित हो जाता है, वह तत्त्वसे आदर्श हो जाता है। फिर उनका अलग कोई (स्वतंत्र) सिद्धांत ही नहीं रहता अर्थात उनका असंभाव अतिसूक्ष्म अंश भी नहीं रहता। इसलिए प्रेम समान प्रेम भक्ति प्राप्त होती है। उस भक्ति से परमात्मतत्त्वका वास्तविक बोध हो जाता है,ब्रह्मभूतअवस्था हो जाने पर संसारके संपर्क का तो सर्वथा त्याग ही हो जाता है पर उसमें मैं ब्रह्म हूँ, मैं शांत हूँ, मैं निर्विकार हूँ, ऐसा सूक्ष्मअहंभाव रह जाता है।
शायद अगले जन्म में इस सूक्ष्मअहंभाव से मुक्त हो इस भवसागर से मुक्त होने को (क्यों कि भगवान ही बता चुके हैं इस योगी का योग जहां से छूट जाता है वह विद्वान श्रीमानों के घर जन्म ले कर इस छूटे योग को जहां से छुटा है आगे करने को आकर्षित किया जाता है।)
यह असंभाव जब तक ही रहता है जब तक परिच्छिन्नता और पराधीनता बनी रहती है।
( परिच्छिन्नता का अर्थ सरल हिंदी में है "सीमितता" या "परिसीमितता"।
इस शब्द का अर्थ है कि कोई वस्तु, व्यक्ति या अवधारणा की सीमाएं या परिसीमाएं होती हैं, जो उसे अनंत या असीमित नहीं बनाती हैं।
उदाहरण के लिए, एक पेड़ की परिच्छिन्नता होती है, क्योंकि उसकी सीमाएं होती हैं - वह एक निश्चित आकार, रंग और स्थान में होता है। इसी तरह, एक मानव की परिच्छिन्नता होती है, क्योंकि उसकी सीमाएं होती हैं - वह एक निश्चित आयु, स्वास्थ्य और क्षमता में होता है।)
क्योंकि यह अहंभाव प्रकृतिका कार्य है और प्रकृति पर इसलिए स्वतंत्रता बनी हुई है। ईश्वरकी ओर आकृष्ट होनेसे परमभक्तिसे ही यह अहंभाव मिटता भी है।
क्यों कि वे ही परमात्मा अनेक सिद्धांतों में अनेक अध्यायों में अनेक शक्तियाँ लेकर कई कार्य करने के लिए बारबार प्रकट होते हैं और वे ही परमात्मा अनेक संप्रदायों में अपनी-अपनी भावना के अनुसार अनेक इष्टदेवों के रूप में कहे जाते हैं। वास्तव में परमात्मा एक ही हैं। इस प्रकार मैं जो हूं--यह तत्त्वसे जान लेता है। ऐसा मुझे तत्त्वसे जानने वाला मेरे में प्रविष्ट हो जाता है अर्थात् मेरे साथ भिन्नका जो भाव था वह अब सर्वथा के लिए मिट जाता है। तत्त्वसे दर्शनपर शामिल जो आनंदपना था वह सर्वथा मिट जाता है और वह उस तत्त्व में प्रविष्ट हो जाता है। यही पूर्णता है और इसी में मनुष्यजन्मकी स्थिरता है।
जीवका परमात्मामें प्रेम
( उस की रति, प्रीति या आकर्षण)
स्वतः है। परन्तु जब यह जीव प्रकृतिके साथ सम्बन्ध जोड़ता है तब वह परमात्मा से विमुख हो जाता है और उसका संसार में आकर्षण हो जाता है। यह आकर्षण ही इच्छा होती है श्रद्धा,विश्वास, इच्छा, आशा, तृष्णा ,आदि रसायन क्या है?
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श्रद्धा, विश्वास, इच्छा, आशा, तृष्णा आदि सभी मन की विभिन्न अवस्थाएं हैं जो हमारे जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। आइए इनमें से प्रत्येक को विस्तार से समझें:
श्रद्धा
श्रद्धा का अर्थ है "विश्वास" या "आस्था"। यह एक ऐसी अवस्था है जहां हम किसी व्यक्ति, वस्तु, या विचार में पूरी तरह से विश्वास करते हैं। श्रद्धा हमें अपने लक्ष्यों की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित करती है और हमें अपने जीवन में स्थिरता प्रदान करती है।
विश्वास
विश्वास श्रद्धा के समान ही है, लेकिन यह थोड़ा अधिक मजबूत है। विश्वास का अर्थ है कि हम किसी व्यक्ति, वस्तु, या विचार में पूरी तरह से यकीन करते हैं और उस पर भरोसा करते हैं। विश्वास हमें अपने जीवन में सुरक्षा और स्थिरता प्रदान करता है।
इच्छा
इच्छा का अर्थ है "कामना" या "वांछा"। यह एक ऐसी अवस्था है जहां हम किसी विशेष वस्तु, परिस्थिति, या अनुभव को प्राप्त करने की कामना करते हैं। इच्छा हमें अपने लक्ष्यों की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित करती है, लेकिन यह हमें कभी-कभी असंतुष्ट और तनावग्रस्त भी बना सकती है।
आशा
आशा का अर्थ है "उम्मीद" या "आकांक्षा"। यह एक ऐसी अवस्था है जहां हम किसी विशेष परिणाम या परिस्थिति की उम्मीद करते हैं। आशा हमें अपने जीवन में सकारात्मकता और उत्साह प्रदान करती है, लेकिन यह हमें कभी-कभी निराशा और असंतुष्टता की ओर भी ले जा सकती है।
तृष्णा
तृष्णा का अर्थ है "लालच" या "लोभ"। यह एक ऐसी अवस्था है जहां हम किसी विशेष वस्तु या परिस्थिति को प्राप्त करने के लिए अत्यधिक लालची या लोभी हो जाते हैं। तृष्णा हमें अपने जीवन में असंतुष्टता और तनाव प्रदान कर सकती है, और यह हमें कभी-कभी अनैतिक या अन्यायपूर्ण कार्यों की ओर भी ले जा सकती है।
इन सभी अवस्थाओं को समझने से हम अपने जीवन में अधिक संतुष्टता, शांति और सुख प्राप्त कर सकते हैं।
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यह तो मात्र क्षणभंगुर और परिवर्तनशील है तथा यह जीवात्मा स्वयं है नित्य और अपरिवर्तनशील है। लेकिन ऐसा घटित हुआ भी प्रकृतिके साथ तादात्म्य होने से यह परिवर्तनशील हो जाता है। इससे मिलता जुलता तो कुछ भी नहीं पर कुछ होगा -- यह ब्रह्माण्ड इच्छा के कारण यह जन्म मरण के चक्कर में पड़ा हुआ महान दुःख पाता रहता है। इससे छूटनेके लिए भगवानने योग बताया गया है। वह योग जदतासे संबंध विच्छेद करके परमात्माके साथ नित्य योगा का अनुभव कराता है।
गीता में मुख्य रूप से तीन योग कहे हैं--
कर्मयोग,ज्ञानयोग, भक्तियोग। इन त्रिपर विचार किया गया तो भगवान्का प्रेम त्रिया ही योगों में है। कर्मयोग में कर्तव्यनिष्ठा का अर्थ है अर्थात वह रति कर्तव्यनिष्ठा है।कर्मयोगी में यह रति अन्तमें आत्मारतिमें परिणत हो जाती है और जिस कर्मयोग में भक्तिके संस्कार हैं ज्ञानयोगमें वही प्रेमको आत्मरति कहा जाता है अर्थात वह रति स्वरूप में होती है।और भक्तियोग में वही प्रेमको भगवद्रति कहते हैं अर्थात् वह रति भगवान में होती है।इस प्रकार इन त्रियोगों में रति होने पर भी गीता में भगवद्रति की विशेष रूप से महिमा गई है।
तपस्वी? ज्ञानी और सारि--इन त्रिसे भी योगी (समतावाला) श्रेष्ठ है । यह है कि जड़तासे संबंधित हुआ हुआ बड़ा भारी तप करने पर?
बहुत से सिद्धांतका (अनेक प्रकार) ज्ञानसम्पादन करनेपर और यज्ञ, दान, तीर्थ आदि के बड़े बड़े अनुष्ठान करने पर क्या कुछ प्राप्त होता है वह सब अनित्य ही होता है। योगिको नित्यतत्त्वकी प्राप्ति होती है। मूलतः तपस्वी ज्ञानी और अनामी--इन त्रिसे योगी श्रेष्ठ है। इस प्रकार के कर्मयोगी, ज्ञानयोगी ,हठयोगी, लययोगी आदि सब योगियों में भी भगवान भक्तियोगी को सर्वश्रेष्ठ बताते हैं। यही भक्तियोगी भगवान्के समग्ररूपको जान लेता है। सांख्ययोगी भी परमभक्तिके द्वारा उस समग्ररूपको जान लेता है।
इस प्रकरणके दीक्षा में अंतःकरणकी शुद्धिरूप सिद्धिको प्राप्त होता है साधक जिस प्रकार ब्रह्मको प्राप्त होता है--इस प्रकरणकी प्रतिज्ञा की और बताया गया है कि ध्यानयोगके परायणसे वह वैराग्यको प्राप्त होता है। वैराग्यसे व्यवहार आदिका का त्याग करके ममता का त्याग शांत होता है। तब वह ब्रह्मप्राप्तिका पात्र होता है। पात्र में ही उसकी ब्रह्मभूतअवस्था होती है। ब्रह्मभूतअवस्थापर संसार के संवाद से जो हो रहा है रागद्वेष, हर्षशोक, आदि द्वन्द्व जो नित्य होते थे, वे सर्वथा मिट जाते हैं तो वह सम्पूर्ण कर्मों की इस मार्किट में सम हो जाते हैं। समपर,पराभक्ति प्राप्त हो जाती है। वह पराभक्ति ही वास्तविक प्रियता है। वह प्रियतासे परमात्माके समग्ररूपका बोध हो जाता है। बोध होते ही उस तत्त्व में प्रवेश हो जाता है।
अनन्यभक्ति से तो मनुष्य भगवान्को तत्त्वसे जान सकते हैं उनकी प्रविष्टी हो सकती है और उनके दर्शन भी हो सकते हैं परन्तु सांख्ययोगी भगवान्को तत्त्वसे जानने से उनकी प्रविष्टी होती है भगवान भोलेनाथ के दर्शन में बाउंड नहीं होता है। कारण कि उसकी साधना पहले से ही विवेक प्रधान बनी हुई है इसलिए दर्शन की इच्छा नहीं होती। दर्शन न होने पर भी कोई कमी नहीं रहती, मूलतः कमी मानी नहीं जाती।
यहाँ उस तत्व में प्रविष्ट हो जाना ही अनिर्वचनीय प्रेमकी प्राप्ति है। इसी प्रेम को नारदभक्तिसूत्र में प्रतिक्षण वर्धमान कहा गया है । इस प्रेम में सर्वथा पूर्णता हो जाती है अर्थात उसका लेना जानिए और पाना कुछ भी बाकी नहीं रहेगा। इसलिए ना करने का राग रहता है न खोजे की जिज्ञासा रहती है न जीनकी आशा रहती है न प्रेमीका भय रहता है और न मृतक का लालच ही रहता है।
जब तक भगवान में पराभक्ति अर्थात् परम प्रेम नहीं होती तब तक ब्रह्मभूतअवस्था में भी मैं ब्रह्म हूँ यह सूक्ष्म अवलोकन रहता है। जब तक लेशमात्र भी अच्छा रहता है तबतक परिच्छिन्नताका अत्यंत अभाव नहीं होता। परन्तु मैं ब्रह्म हूं यह सूक्ष्म अहंभाव तब तक जन्म मरण का कारण नहीं बनता जब तक बनता है प्राकृतिक गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु क्योंकि गुणसङ्ग होने से ही बंधन होता है
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं:
गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु
अर्थ: गुणों के साथ जुड़ने से (जीव) को जन्म और मृत्यु के चक्र में पड़ना पड़ता है।
यहाँ गुणसङ्ग का अर्थ है गुणों के साथ जुड़ना या गुणों के प्रभाव में आना। गुणों के साथ जुड़ने से जीव को जन्म और मृत्यु के चक्र में पड़ना पड़ता है, क्योंकि गुणों के प्रभाव से जीव को कर्मों के अनुसार फल मिलते हैं और वह जन्म और मृत्यु के चक्र में पड़ जाता है।
गुणसङ्ग भाव का अर्थ है गुणों के साथ जुड़ने की प्रवृत्ति या आदत। यह भाव जीव को गुणों के प्रभाव में आने के लिए प्रेरित करता है और उसे जन्म और मृत्यु के चक्र में पड़ने के लिए मजबूर करता है।)
उदाहरणार्थ--गठिया नींद से जगने पर सामान्य मनुष्य मात्र को सब से पहले यही अनुभव होता है कि मैं हूं। ऐसा अनुभव होता है जब नाम, रूप, देश, काल ,जाति आदि के साथ स्वयंका संपर्क जुड़ता है, तब मैं सोचता हूं कि यह अशुभ कर्मों का कारण ही बनता है जिससे जन्म मरण का चक्कर चल जाता है। परन्तु कौन सा ऊँचे प्रवेश द्वारे का साधक होता है जिसका अर्थ है धार्मिक ब्रह्मभूतअवस्था क्या है उनका सात्विक ज्ञान में सभी जगह अपने-अपने स्वरूप का बोध तो रहता है। लेकिन जब तक साधक का सत्त्वगुणके साथ संबंध रहता है तब तक नींद से जगने पर मैं ब्रह्म हूं या सब कुछ एक परमात्मा ही है--
ऐसी वृत्ति होती है और घटना घटती है कि नींद में यह वृत्ति छूट गई थी?
मानो उसकी भूल हो गई थी और अब पीछे वह तत्त्वकी जागृति फिर हो गई है स्मृति आ गयी है। गुणात्मक हो जाने पर अर्थात् गुणधर्म से सर्वथा संबंधविच्छेदित होने पर विस्मृति और स्मृति -- ऐसी दो स्थितियाँ तो नहीं होती अर्थात् नींद में भूल हो गई और अब स्मृति आ गई -- ऐसा अनुभव नहीं होता
प्रत्युत नींद तो केवल अंतःकरण में आई थी अपने में नहीं? अपना स्वरूप तो ज्योंकात्यों ही तो रहा--ऐसा अनुभव होता है। प्रकृति यह है कि निद्राका आना और उसका जगना -- ये दोनों प्रकृति में ही तो हैं?
ऐसा रहता है उनका स्पष्ट अनुभव। ✍️इसी तेरहवें अध्याय के बाईसवें श्लोक में कहा गया है कि प्रकाश अर्थात् नींद से जगना और मोह अर्थात नींद का आना--इन दोनों में गुणातीत पुरुष के किञ्चिन्मात्रा भी रागद्वेष नहीं होता।
संबंध देखे;
पहले श्लोक में अर्जुनने संत और त्यागके तत्त्वके विषय में पूछा गया है तो उनके उत्तरमें भगवानने चतुर्थ से बारहवें श्लोक कर्मयोग का और एकतालिसवें श्लोक कर्मयोगका और संक्षेपमें भक्तियोग का और त्रावेंसे चालीसवें श्लोकतक विचार प्रधान सांख्ययोगका और उन्चासवेंसे पचपनवें श्लोक ध्यानप्रधान सांख्ययोगका और संक्षेपमें पराभक्त प्राप्तिका का वर्णन किया गया है। अब भगवान शरणागतिकी प्रधानतावाले भक्तियोग का वर्णन करते हैं।
देवी भागवत पुराण में शिव गीता और राम गीता में भक्ति के प्रकारों के बारे में बताया गया है। इन ग्रंथों में भक्ति के निम्नलिखित प्रकार बताए गए हैं:
शिव गीता में भक्ति के 9 प्रकार बताए गए हैं:
1. श्रवण भक्ति
2. कीर्तन भक्ति
3. स्मरण भक्ति
4. पाद सेवा भक्ति
5. अर्चन भक्ति
6. वंदन भक्ति
7. दास्य भक्ति
8. सख्य भक्ति
9. आत्मसमर्पण भक्ति
राम गीता में भक्ति के 10 प्रकार बताए गए हैं:
1. श्रवण भक्ति
2. कीर्तन भक्ति
3. स्मरण भक्ति
4. पाद सेवा भक्ति
5. अर्चन भक्ति
6. वंदन भक्ति
7. दास्य भक्ति
8. सख्य भक्ति
9. वात्सल्य भक्ति
10. आत्मसमर्पण भक्ति
देवी भागवत पुराण में भक्ति के 12 प्रकार बताए गए हैं:
1. श्रवण भक्ति
2. कीर्तन भक्ति
3. स्मरण भक्ति
4. पाद सेवा भक्ति
5. अर्चन भक्ति
6. वंदन भक्ति
7. दास्य भक्ति
8. सख्य भक्ति
9. वात्सल्य भक्ति
10. आत्मसमर्पण भक्ति
11. तंत्र भक्ति
12. मंत्र भक्ति
इन भक्ति के प्रकारों का भाव विस्तार से बताने के लिए, मैं प्रत्येक प्रकार को अलग-अलग समझाऊंगा:
श्रवण भक्ति
श्रवण भक्ति का अर्थ है भगवान की कथाओं और गुणों को सुनने से जो भक्ति उत्पन्न होती है। यह भक्ति का पहला चरण है, जहां हम भगवान के बारे में जानने के लिए उनकी कथाओं और गुणों को सुनते हैं।
कीर्तन भक्ति
कीर्तन भक्ति का अर्थ है भगवान के नाम और गुणों को गाने और सुनने से जो भक्ति उत्पन्न होती है। यह भक्ति का दूसरा चरण है, जहां हम भगवान के नाम और गुणों को गाते और सुनते हैं।
स्मरण भक्ति
स्मरण भक्ति का अर्थ है भगवान के नाम और गुणों को याद रखने और स्मरण करने से जो भक्ति उत्पन्न होती है। यह भक्ति का तीसरा चरण है, जहां हम भगवान के नाम और गुणों को याद रखते और स्मरण करते हैं।
पाद सेवा भक्ति
पाद सेवा भक्ति का अर्थ है भगवान के चरणों की सेवा करने से जो भक्ति उत्पन्न होती है। यह भक्ति का चौथा चरण है, जहां हम भगवान के चरणों की सेवा करते हैं।
अर्चन भक्ति
अर्चन भक्ति का अर्थ है भगवान की पूजा और अर्चना करने से जो भक्ति उत्पन्न होती है। यह भक्ति का पांचवां चरण है, जहां हम भगवान की पूजा और अर्चना करते हैं।
वंदन भक्ति
वंदन भक्ति का अर्थ है भगवान को नमस्कार और वंदन करने से जो भक्ति उत्पन्न होती है। यह भक्ति का छठा चरण है, जहां हम भगवान को नमस्कार और वंदन करते हैं।
दास्य भक्ति
दास्य भक्ति का अर्थ है भगवान को अपना स्वामी मानने और उनकी सेवा करने से जो भक्ति उत्पन्न होती है। यह भक्ति का सातवां चरण है, जहां हम भगवान को अपना स्वामी मानते हैं और उनकी सेवा करते हैं।
सख्य भक्ति
सख्य भक्ति का अर्थ है भगवान को अपना मित्र मानने और उनके साथ सख्य भाव रखने से जो भक्ति उत्पन्न होती है। यह भक्ति का आठवां चरण है, जहां हम भगवान को अपना मित्र मानते हैं और उनके साथ सख्य भाव रखते हैं।
वात्सल्य भक्ति
वात्सल्य भक्ति का अर्थ है भगवान को अपना पुत्र या पुत्री मानने और उनके प्रति वात्सल्य भाव रखने से जो भक्ति उत्पन्न होती है। यह भक्ति का नौवां चरण है, जहां हम भगवान को अपना पुत्र या पुत्री मानते हैं और उनके प्रति वात्सल्य भाव रखते हैं।
आत्मसमर्पण भक्ति
आत्मसमर्पण भक्ति का अर्थ है भगवान के चरणों में अपने आप को पूरी तरह से समर्पित करने से जो भक्ति उत्पन्न होती है। आत्मसमर्पण भक्ति
आत्मसमर्पण भक्ति का अर्थ है भगवान के चरणों में अपने आप को पूरी तरह से समर्पित करने से जो भक्ति उत्पन्न होती है। यह भक्ति का दसवां चरण है, जहां हम भगवान के चरणों में अपने आप को पूरी तरह से समर्पित करते हैं और उनकी इच्छा के अनुसार जीवन जीते हैं।
तंत्र भक्ति
तंत्र भक्ति का अर्थ है भगवान की पूजा और आराधना करने के लिए तंत्र के सिद्धांतों और प्रक्रियाओं का पालन करने से जो भक्ति उत्पन्न होती है। यह भक्ति का ग्यारहवां चरण है, जहां हम तंत्र के सिद्धांतों और प्रक्रियाओं का पालन करके भगवान की पूजा और आराधना करते हैं।
मंत्र भक्ति
मंत्र भक्ति का अर्थ है भगवान के नाम और मंत्रों का जाप करने से जो भक्ति उत्पन्न होती है। यह भक्ति का बारहवां चरण है, जहां हम भगवान के नाम और मंत्रों का जाप करके उनकी भक्ति करते हैं।
इन सभी भक्ति के प्रकारों का उद्देश्य भगवान के साथ जुड़ना और उनकी कृपा प्राप्त करना है। प्रत्येक भक्ति के प्रकार का अपना विशेष महत्व है और वे सभी मिलकर भगवान की भक्ति को पूर्ण बनाते हैं।
18॥55॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 56
श्लोक:
( भक्ति सहित कर्मयोग का विषय )
सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः।
मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्॥
भावार्थ:
मेरे परायण हुआ कर्मयोगी तो संपूर्ण कर्मों को सदा करता हुआ भी मेरी कृपा से सनातन अविनाशी परमपद को प्राप्त हो जाता है
मद्-व्यापाश्रयः शब्द का अर्थ है भगवान के संरक्षण में भौतिक कल्मष से संबंधित होने के लिए शुद्ध भक्त भगवान या उनके प्रति निधि स्वरूप गुरु के प्रत्यक्ष में कर्म होता है। उसके लिए समय की कोई सीमा नहीं है। वह सदा, चौबीस घंटे, शत-प्रतिशत भगवान के उपदेश में संलग्न रहता है। ऐसे भक्त पर जो कृष्णभावनामृत में चूहे रहते हैं, भगवान भगवान के प्रिय होते हैं। वह सारा सामान के अलावा अंततोगत्वा दिव्यधाम या कृष्णलोक को प्राप्त करता है। वहां उनका प्रवेश सुरक्षित रहता है, इसमें कोई संशय नहीं है। उस परम धाम में कोई परिवर्तन नहीं होता, वहां प्रत्येक वस्तु शाश्वत, अविनाशी और ज्ञानमय है।
भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक में कर्मयोग और भक्ति का महत्व बताते हैं। वे कहते हैं कि जो व्यक्ति हर समय अपने सभी कर्मों को मेरे प्रति समर्पित कर करता है, वह मेरी कृपा से सनातन और अविनाशी परमपद को प्राप्त कर लेता है।
यह श्लोक कर्मयोग के सिद्धांत को स्पष्ट करता है कि कर्म करने की प्रक्रिया में भी भगवान की भक्ति और समर्पण होना चाहिए। जब व्यक्ति अपने सभी कर्मों को ईश्वर को समर्पित कर करता है, तो वह भगवान की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त करता है। इस तरह की भक्ति और समर्पण के माध्यम से, व्यक्ति को शाश्वत और अविनाशी परमपद की प्राप्ति होती है।इसका मतलब है कि कर्म करते समय यदि ईश्वर की भक्ति और समर्पण हो, तो कर्मफल की चिंता किए बिना भी व्यक्ति अनंत और स्थायी मोक्ष को प्राप्त कर सकता है। भगवान की कृपा से प्राप्त यह परमपद कभी नष्ट नहीं होता और यह शाश्वत होता है।
अब भक्त भगवान या उनके प्रति निधि स्वरूप गुरु जिनका शास्त्रों में वर्णन है उनके नाम निम्नलिखित हैं क्या इन में आप के गुरु शामिल है?:
भगवान के प्रति भक्त
1. *प्रह्लाद*:
भगवान विष्णु के प्रति भक्त, जिनकी कहानी श्रीमद्भागवत में वर्णित है।
2. *ध्रुव*:
भगवान विष्णु के प्रति भक्त, जिनकी कहानी श्रीमद्भागवत में वर्णित है।
3. *मीराबाई*:
भगवान कृष्ण के प्रति भक्त, जिनकी कविताएं और गीत भक्ति साहित्य में प्रसिद्ध हैं।
4. *तुकाराम*:
भगवान विट्ठल के प्रति भक्त, जिनकी कविताएं और गीत भक्ति साहित्य में प्रसिद्ध हैं।
5. *सूरदास*:
भगवान कृष्ण के प्रति भक्त, जिनकी कविताएं और गीत भक्ति साहित्य में प्रसिद्ध हैं।
गुरु के प्रति भक्त
1. *अर्जुन*:
भगवान कृष्ण के प्रति शिष्य और भक्त, जिनकी कहानी महाभारत में वर्णित है।
2. *उद्धव*:
भगवान कृष्ण के प्रति शिष्य और भक्त, जिनकी कहानी श्रीमद्भागवत में वर्णित है।
3. *नारद*:
भगवान विष्णु के प्रति शिष्य और भक्त, जिनकी कहानी श्रीमद्भागवत में वर्णित है।
4. *शुकदेव*:
भगवान विष्णु के प्रति शिष्य और भक्त, जिनकी कहानी श्रीमद्भागवत में वर्णित है।
5. *व्यास*:
भगवान विष्णु के प्रति शिष्य और भक्त, जिनकी कहानी महाभारत में वर्णित है।
18॥56॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 57
श्लोक:
चेतसा सर्वकर्माणि मयि सन्न्यस्य मत्परः।
बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव॥
भावार्थ:
सब कर्मों को मन से मुझमें अर्पण कर के तथा समबुद्धि रूप योग को अवलंबन करके मेरे परायण और निरंतर मुझमें चित्तवाला हो
जब मनुष्य कृष्णभावनमृत में कर्म करता है, तो वह संसार के स्वामी के रूप में कर्म नहीं करता। उसे चाहिए कि वह सेवक की भाँति भगवान के निर्देशानुसार कर्म करे। सेवक को स्वतन्त्रता नहीं रहती। वह केवल अपने स्वामी के आदेश पर कार्य करता है, उस पर लाभ-हानि का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। वह भगवान के आदेश के अनुसार अपनी कर्तव्यनिष्ठा का पालन करता है। अब यह तर्क दिया जा सकता है कि अर्जुन कृष्ण के व्यक्तिगत निर्देशकों के साथ काम कर रहे थे, लेकिन जब कृष्ण नहीं होंगे तो कोई किस तरह का काम करेगा यदि इस पुस्तक में दिए गए कृष्ण के निर्देश और कृष्ण के प्रतिनिधि के दिशानिर्देश में कोई कार्य करता है, तो उसका फल वही होगा। इस श्लोक में मत्परः शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह सूचित करता है कि मनुष्य जीवन में कृष्ण को आकर्षित करने के लिए कृष्णभावनाभावित कार्य करने के अतिरिक्त अन्य लक्ष्य नहीं होता है। जब वह इस प्रकार कार्य कर रहा हो तो उसे केवल कृष्ण का ही चिंतन करना चाहिए- "कृष्ण ने मुझे यह विशेष कार्य पूरा करने के लिए नियुक्त किया है।" और इस तरह का कार्य करते हुए उसे स्वाभाविक रूप से कृष्ण का चिंतन मिलता है। यही पूर्ण कृष्णभावनामृत है। बुरा यह ध्यान दे रहा है कि मनमाना कर्म करके उसके फल भगवान को खो दिया गया। इस प्रकार का कार्य कृष्णभावनामृत की भक्ति में नहीं आता है। मनुष्य को चाहिए कि कृष्ण के ऑर्डर पर व्यवसाय करें। ये बेहद ज़रूरी बात है. कृष्ण का यह आदेश गुरु-परंपरा द्वारा प्रामाणिक गुरु से प्राप्त होता है। अतएव गुरु के आदेश से जीवन का मूल दायित्व निर्धारित होना चाहिए। यदि किसी को प्रामाणिक गुरु प्राप्त हो जाता है और वह किसी को कार्य निर्देशित करता है, तो कृष्णभावनामय जीवन की सिद्धि सुनिश्चित है।
भगवान का यह नियम है कि जो मेरी शरण लेता है, मैं उसी प्रकार उसे शरण देता हूँ । जो भक्त अपनी वस्तु मुझे अर्पण करता है, मैं उसे अपनी वस्तु देता हूं। भक्त तो सीमित ही वस्तु देता है, पर मैं अनंत गुणा करके देता हूं। परन्तु जो अपना- तुम्हें ही मुझे देता है, मैं तुम्हें ही उसे देता हूं। वास्तव में मैंने अपने- तुम्हें संसारमात्रको दे रखा है , और सब कुछ करनेकी स्वतन्त्रता दे रखा है। यदि मनुष्य अपनी दी हुई स्वतन्त्रता को मेरा अर्पण कर देता है, तो मैं भी अपनी स्वतन्त्रता को उसका अर्पण कर देता हूँ। इसलिए यहां भगवान स्वतन्त्रताको अपने अर्पण करने के लिए अर्जुनसे कहते हैं।
इस का प्रत्यक्ष ज्ञान है कि किसान एक बीज बोता है भगवान उस एक को कई गुना बड़ा कर देते है।
अब इस पदके में संपूर्ण शारीरिक क्रियाएं भी ली जाती हैं अर्थात शरीरके लिए तू जो भोजन करता है, जल पीता है, कुपथ्य त्याग और पथ्य सेवन करता है, ओष-सेवन करता है, कपड़ा पहनना है, सर्दी-गर्मीसे शरीर की रक्षा करना है, स्वास्थ्य के लिए समय-सोता और जागता है, घूमना-फिरना है, शौच-स्नान करना है, आदि सभी कामो को मेरा अर्पण करना है फिर कर दें ना।
इसी प्रकार यज्ञ-संबन्धी सभी क्रियाएं होती हैं अर्थात् शाकल्य-सामग्री एकत्र करना, अग्नि समर्पण करना, मन्त्र समर्पण करना, आहुति देना आदि सभी शास्त्रीय क्रियाएं मेरे अर्पण कर दे।अब तू जो कुछ देता है अर्थात् दस्तावेज़ी सेवाएँ करता है, अध्ययन की सहायता करता है, अध्ययन की आवश्यकता-विशेषता करता है, आदि जो कुछ शास्त्रीय क्रिया करता है, वह सब मेरे अर्पण कर दे।
तू जो कुछ तप करता है विषय-वस्तु से अपनी इन्द्रियोंका संयम करता है, अपनी कर्तव्या पालना करता है अनुपयुक्त-प्रतिकूल वैज्ञानिकों को सिद्धांतों का पालन करना और तीर्थ, व्रत, भजन-ध्यान, जप-कीर्तन, श्रवण-मनन, समाधि आदि जो कुछ भी पारमार्थिक क्रिया करता है, वह सब मेरे अर्पण कर दे।
उच्च तीर्थ पद शास्त्रीय और पारमार्थिक कार्यका दूसरा विभाग है।
इसका सरल भाव है कि
हे भगवान! मैं अपने सभी कार्यों को आपको अर्पण करता हूं। जब मैं ऐसा करता हूं, तो मेरा 'मैं' और 'मेरा'पन समाप्त हो जाता है, और मुझे पूर्णता की प्राप्ति होती है। यह पूर्णता ऐसी है कि जिसमें कोई दुःख नहीं होता है, और जिसमें स्थित होने पर कोई भी दुःख मुझे प्रभावित नहीं कर सकता है।"
इस श्लोक में भगवान को अर्पण करने के महत्व को बताया गया है, और यह भी बताया गया है कि जब हम अपने कार्यों को भगवान को अर्पण करते हैं, तो हमें पूर्णता की प्राप्ति होती है।
चलो सांसारिक बंधन से मुक्ति का सरल उपाय है। प्रभु बच्चे को सद्बुद्धि दो की इस कठिन उपाय को करने पर आने वाली सभी अड़चनों को भी आप में अर्पण कर निश्चिंत हो कर बाकी जीवन जिए।
सभी प्रकार के कर्म करते हुए हम ईश्वरप्रणय की भावना से रह सकते हैं। संपूर्ण गीता में इस पर बल दिया गया है कि केवल शारीरिक कर्म की आवश्यकता ईश्वर दर्पण की भावना है और यह एक ऐसा तथ्य है। जिसका अभ्यासे को विस्मरण हो जाता है।शरीर, मन, बुद्धि के स्तर पर होने वाले विषय ग्रहण और उनकी प्रति हमारी प्रतिक्रिया के रूप में भी व्यवसाय हैं?
उन सबको भक्ति से वंचित करें मुझे अर्पण करे। यह किसी भी प्रकार से मनुष्य के लिए पालन-पोषण करना बहुत कठिन है। एक ही आत्मा ,ईश्वर, गुरु ,और भक्त में और सर्वत्र राम रहते हुए हम अपने व्यावहारिक जीवन में सामान्य नाम और सिद्धांत के साथ व्यवहार करते हैं। हम जानते हैं कि इन लोगों के लिए आत्मसत्ता की आवश्यकता होती है। यदि हम अपने समग्र व्यवहार में इस आत्मतत्व का स्मरण रखते हैं तो वह जगत् के अधिष्ठान का ही स्मरण होगा। यदि किसी वस्त्र की दुकान में विभिन्न रूप रंग हो।किसे सदा इस बात का स्मरण रखना चाहिए कि वह समुद्र तट के सूती वस्त्रों का व्यापार कर रहे हैं। किसी भी तरह से व्यापार को समझना मुश्किल नहीं होगा। में देखा गया तो इस का स्मरण रखें कि उसके लिए अधिक सुरक्षित और प्रकार के फायदे हैं अन्यथा वह किसी कप की कीमत ऊनी प्रतिबंध के खाते से बहुत अधिक बता देता है या अपने माल को टाट के बोरे जैसे कि बहुमत में बेच देता है। यदि किसी स्वर्णकार को यह स्मरण-गृह की सलाह दी जाए कि वह सोने पर काम कर रहा है तो वह सलाह देता है कि उसके लाभ के लिए ही हैं। जैसे गहनों में सोने और कपडे में सूत हैं वैसे ही विश्व के सभी नाम और सिद्धांतों में आत्मा ही मूल तत्व हैं। जो भक्त अपने जीवन के सर्वांगीण व्यवहार में इस दिव्य तत्त्व का स्मरण रखता है वही पुरुष जीवन को आदर और सम्मान दे सकता है जो योग्य जीवन हैं। यह नियम है कि जीवन को जो तुम दोगे, तुम्हें जीवन से वही पाओ गे। तुम हँसोगे तो जीवन हँसोगे और तुम खिलोगे तो जीवन भी खिलेगा उसके पास आत्मज्ञान से उत्पन्न आदर और सम्मान के साथ तो जीवन रक्षा में भी आदर और सम्मान प्राप्त होगा।समर्पण की भावना से सभी कर्मों को करने पर न केवल भगवान के प्रति हमारा प्रेम बढ़ता है। बल्कि आदर्श जीवन और दिव्य लक्ष्य के कारण हमारा भी जीवन पवित्र बन जाता है। गीता में अद्वितीय भाव और सतत आत्मानुसंधान पर विशेष बल दिया गया है। इस श्लोक में हम देख सकते हैं कि एक ऐसे उपाय का वर्णन किया गया है जिसके उपदेश से ही साधक को ईश्वर का अखंड स्मरण बना रहता है। इसके लिए जहां कहीं भी निर्जन सोसायटी वन या गुप्त गुफाओं में इसे रखने की आवश्यकता नहीं है तो हम अपने दैनिक कार्य क्षेत्र में ही कर सकते हैं। इस प्रकार का संकेत भावना का जीवन जीने से लाभ जो अब कार्यरत हैं।
॥57॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 58
श्लोक:
मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।
अथ चेत्वमहाङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥
भावार्थ:
उपर्युक्त प्रकार से मुझमें चित्तवाला होकर तू मेरी कृपा से समस्त संकटों को अनायास ही पार कर जाएगा और यदि अहंकार के कारण मेरे वचनों को न सुनेगा तो नष्ट हो जाएगा अर्थात परमार्थ से भ्रष्ट हो जाएगा
॥58॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 59
श्लोक:
यदहङ्कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे।
मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति॥
भावार्थ:
जो तू अहंकार का आश्रय लेकर यह मान रहा है कि 'मैं युद्ध नहीं करूँगा' तो तेरा यह निश्चय मिथ्या है, क्योंकि तेरा स्वभाव तुझे जबर्दस्ती युद्ध में लगा देगा
18॥59॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 60
श्लोक:
स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा।
कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत्॥
भावार्थ:
हे कुन्तीपुत्र! जिस कर्म को तू मोह के कारण करना नहीं चाहता, उसको भी अपने पूर्वकृत स्वाभाविक कर्म से बँधा हुआ परवश होकर करेगा
18॥60॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 61
श्लोक:
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽजुर्न तिष्ठति।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारुढानि मायया॥
भावार्थ:
हे अर्जुन! शरीर रूप यंत्र में आरूढ़ हुए संपूर्ण प्राणियों को अन्तर्यामी परमेश्वर अपनी माया से उनके कर्मों के अनुसार भ्रमण कराता हुआ सब प्राणियों के हृदय में स्थित है
अर्जुन परम ज्ञाता न थे और लड़ते या न लड़ते का उनका निर्णय उनके क्षुद्र विवेक तक सीमित था। भगवान कृष्ण ने उपदेश दिया कि जीवात्मा (व्यक्ति) ही सर्वेसर्वा नहीं है। भगवान या स्वयं कृष्ण अन्तर्यामी परमात्मा रूप में हृदय में स्थित जीव को निर्देश देते हैं। शरीर परिवर्तन तो होता ही है जीव अपने पिछले कर्मों को भूल जाता है, लेकिन परमात्मा जो भूत, वर्तमान और भविष्य का ज्ञाता है, उसका सारा कार्य का साक्षी रहता है। अतावेव खिलौने के सभी कार्यों का संचालन एक समान परमात्मा द्वारा होता है। जीव वस्तुतः होता है, रूप ही पाता है और वह भौतिक शरीर उसके द्वारा निर्मित होता है, जो परमात्मा के निर्देशों में भौतिक शक्ति उत्पन्न होती है। ज्योंही जीव किसी विशेष प्रकार के शरीर में स्थापित कर दिया जाता है, वह शारीरिक अवस्था के लिए उचित कार्य निर्धारित कर देता है। मजबूत तेज मोटरकार में सवार व्यक्ति कम तेज कार में बैठा व्यक्ति से अधिक तेज होता है, भले ही जीव विशेष चालक एक ही क्यों न हो। इसी प्रकार के जीव के लिए भौतिक प्रकृति के आदेश से एक विशेष शरीर का निर्माण होता है, जिससे वह अपनी पूर्व मान्यता के कर्म कर सके। जीव स्वतन्त्रता नहीं होती। मनुष्य को यह नहीं चाहिए कि वह ईश्वर से स्वतन्त्र है। व्यक्ति तो सदैव भगवान के दर्शन में रहता है। अतएव उसका कर्तव्य है कि वह शरणागत हो
18॥61॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 62
श्लोक:
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्॥
भावार्थ:
हे भारत! तू सब प्रकार से उस परमेश्वर की ही शरण में
(लज्जा, भय, मान, बड़ाई और आसक्ति को त्यागकर एवं शरीर और संसार में अहंता, ममता से रहित होकर एक परमात्मा को ही परम आश्रय, परम गति और सर्वस्व समझना तथा अनन्य भाव से अतिशय श्रद्धा, भक्ति और प्रेमपूर्वक निरंतर भगवान के नाम, गुण, प्रभाव और स्वरूप का चिंतन करते रहना एवं भगवान का भजन, स्मरण करते हुए ही उनके आज्ञा अनुसार कर्तव्य कर्मों का निःस्वार्थ भाव से केवल परमेश्वर के लिए आचरण करना यह 'सब प्रकार से परमात्मा के ही शरण' होना है)
जा। उस परमात्मा की कृपा से ही तू परम शांति को तथा सनातन परमधाम को प्राप्त होगा
18॥62॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 63
श्लोक:
इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया।
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु॥
भावार्थ:
इस प्रकार यह गोपनीय से भी अति गोपनीय ज्ञान मैंने तुमसे कह दिया। अब तू इस रहस्ययुक्त ज्ञान को पूर्णतया भलीभाँति विचार कर, जैसे चाहता है वैसे ही कर
भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक में अर्जुन को उपदेश देने के बाद अंतिम निष्कर्ष पर पहुँचते हैं। यहाँ पर श्री कृष्ण ने जो ज्ञान दिया है, वह साधारण नहीं बल्कि गुप्त और गहराई से भरा हुआ है। यह ज्ञान, जो विश्व की सच्चाई और मानव जीवन के उद्देश्य को उजागर करता है, साधारण ज्ञान से भी परे है।
भगवान कृष्ण ने अर्जुन को यह ज्ञान देने के बाद कहा है कि अब यह अर्जुन पर निर्भर करता है कि वह इस ज्ञान को अपने विवेक से समझे और जैसा उचित समझे, वैसा कार्य करें। यह एक प्रकार का स्वतंत्रता का संदेश है जिसमें भगवान कृष्ण अर्जुन को पूर्ण स्वतंत्रता देते हैं कि वह इस ज्ञान को अपनी इच्छाओं और समझ के अनुसार लागू करें।
इस श्लोक का संदेश यह है कि ज्ञान प्राप्त करने के बाद उसकी वास्तविकता को आत्मसात करना और उसे अपने जीवन में लागू करना महत्वपूर्ण है। ज्ञान को सुनने के बाद, उसकी सही समझ और कार्यान्वयन का कार्य स्वयं व्यक्ति का होता है।
18॥63॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 64
श्लोक:
सर्वगुह्यतमं भूतः श्रृणु मे परमं वचः।
इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्॥
भावार्थ:
संपूर्ण गोपनीयों से अति गोपनीय मेरे परम रहस्ययुक्त वचन को तू फिर भी सुन। तू मेरा अतिशय प्रिय है, इससे यह परम हितकारक वचन मैं तुझसे कहूँगा
श्रीकृष्ण इस श्लोक में अर्जुन को एक महत्वपूर्ण संदेश देने का संकेत देते हैं। वे कहते हैं कि वे जो वचन देने जा रहे हैं, वह सभी रहस्यों से भी अधिक गुप्त और महत्वपूर्ण है। यह संदेश अर्जुन के लिए विशेष रूप से हितकारी होगा क्योंकि श्रीकृष्ण उन्हें अत्यधिक प्रिय मानते हैं।
श्रीकृष्ण का यह वचन विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें जीवन के सबसे गहरे रहस्यों और सिद्धांतों का उद्घाटन किया जाएगा। अर्जुन को यह ज्ञान प्राप्त करने के लिए पूरी तरह तैयार और योग्य माना गया है, इसलिए श्रीकृष्ण उन्हें यह ज्ञान देने का निर्णय लेते हैं।
इस श्लोक के माध्यम से, श्रीकृष्ण यह दर्शाते हैं कि किसी भी व्यक्ति की विशेषता और महत्व को पहचानकर उसे विशेष ज्ञान या निर्देश दिया जाता है। अर्जुन की भक्ति और समर्पण ने उन्हें इस दिव्य ज्ञान के लिए पात्र बना दिया है।
18॥64॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 65
श्लोक:
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥
भावार्थ:
हे अर्जुन! तू मुझमें मनवाला हो, मेरा भक्त बन, मेरा पूजन करने वाला हो और मुझको प्रणाम कर। ऐसा करने से तू मुझे ही प्राप्त होगा, यह मैं तुझसे सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ क्योंकि तू मेरा अत्यंत प्रिय है
ज्ञान का गुह्यतम अंश है कि मनुष्य कृष्ण का शुद्ध भक्त बने, अकेले का चिंतन करे और अकेले के लिए कर्म करे। व्यावसायिक ध्यान ठीक नहीं। जीवन को इस प्रकार ढीला करना चाहिए कि कृष्ण का चिंतन करने का सदा अवसर प्राप्त हो। मनुष्य इस प्रकार कर्म करता है कि उसके सभी नित्य कर्म कृष्ण के लिए हैं। वह अपने जीवन को इस प्रकार प्रमाणित करता है कि भगवान श्रीकृष्ण का ही चिंतन करते हैं और भगवान की यह प्रतिज्ञा है कि जो इस प्रकार कृष्णभावमय होगा, वह निश्चित रूप से कृष्णधाम को मिलेगा, जहां वह साक्षात् कृष्ण के सान्निध्य में रहेगा। यह गुह्यतम ज्ञान अर्जुन को इसी तरह समझाया गया है, क्योंकि वह कृष्ण का प्रिय मित्र (सखा) है। जो भी अर्जुन के पथ का अनुसरण करता है, वह कृष्ण के प्रिय साखा अर्जुन के समान ही सिद्धि प्राप्त कर सकता है।
ये शब्द इस बात पर बल देते हुए दिए गए हैं कि इंसान को अपना मन उस कृष्ण पर एकाग्र करना चाहिए, जो दोनों हाथों से वंशी धारण करने वाले, सुंदर मुखवाले और अपने बालों में मोर पंख धारण किए हुए सांवले बालक के रूप में हैं। कृष्ण का वर्णन ब्रह्मसंहिता तथा अन्य ग्रंथों में मिलता है। मनुष्य को परम ईश्वर के आदि रूप कृष्ण पर अपने मन को एकाग्र करना चाहिए। उसे अपने मन को भगवान के अन्य सिद्धांतों की ओर नहीं मोड़ना चाहिए। भगवान के नाना रूप हैं, यथा विष्णु, नारायण, राम वराह आदि। बुरा भक्त को चाहिए कि अपने मन को एक रूप में केन्द्रित करे, जो अर्जुन के साथ था। कृष्ण के रूप में मन की यह एकाग्रता ज्ञान का गुह्यतम अंश है, जिसकी अभिव्यक्ति अर्जुन के लिए हुई थी, क्योंकि वह कृष्ण की अत्यंत प्रिय सखा है।
भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक में अर्जुन से साक्षात आदेश दे रहे हैं कि वह उन पर पूरा ध्यान केंद्रित करें, उनकी भक्ति में रत रहें, उनकी पूजा करें, और उन्हें प्रणाम करें। यहाँ पर भगवान कृष्ण यह आश्वासन दे रहे हैं कि ऐसा करने से अर्जुन निश्चित रूप से भगवान कृष्ण को प्राप्त होगा।
इस श्लोक में भगवान कृष्ण ने अपनी दिव्य सत्ता और भक्ति के महत्व को स्पष्ट किया है। वे अर्जुन से कहते हैं कि यदि वह उनके प्रति पूर्ण श्रद्धा और समर्पण के साथ रहेंगे, तो उनकी पूर्णता को प्राप्त करना निश्चित है।
भगवान कृष्ण अर्जुन से यह प्रतिज्ञा करते हैं कि वह उनके प्रिय हैं और इसलिए उनके आदेश को मानने से उन्हें आत्मसाक्षात्कार और मोक्ष की प्राप्ति होगी। यहाँ भगवान कृष्ण का सन्देश यह है कि भक्ति और समर्पण की मार्गदर्शिका से मनुष्य जीवन की सर्वोत्तम प्राप्तियों को प्राप्त कर सकता है।
18॥65॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 66
श्लोक:
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥
भावार्थ:
संपूर्ण धर्मों को अर्थात संपूर्ण कर्तव्य कर्मों को मुझमें त्यागकर तू केवल एक मुझ सर्वशक्तिमान, सर्वाधार परमेश्वर की ही शरण
(इसी अध्याय के श्लोक 62 में भी बताया है
हे भारत! तू सब प्रकार से उस परमेश्वर की ही शरण में (लज्जा, भय, मान, बड़ाई और आसक्ति को त्यागकर एवं शरीर और संसार में अहंता, ममता से रहित होकर एक परमात्मा को ही परम आश्रय, परम गति और सर्वस्व समझना तथा अनन्य भाव से अतिशय श्रद्धा, भक्ति और प्रेमपूर्वक निरंतर भगवान के नाम, गुण, प्रभाव और स्वरूप का चिंतन करते रहना एवं भगवान का भजन, स्मरण करते हुए ही उनके आज्ञा अनुसार कर्तव्य कर्मों का निःस्वार्थ भाव से केवल परमेश्वर के लिए आचरण करना यह 'सब प्रकार से परमात्मा के ही शरण' होना है) जा। उस परमात्मा की कृपा से ही तू परम शांति को तथा उस सनातन परमधाम को प्राप्त होगा)
में आ जा। मैं तुझे संपूर्ण पापों से मुक्त कर दूँगा, तू शोक मत कर
क्योंकि जो लोग भक्त नहीं हैं, वे न तो कृष्ण को समझेंगे, न ही भगवद्गीता को जो लोग कृष्ण को तथा भगवद्गीता को यथारूप में स्वीकार नहीं करते , उन्हें मनमाने ढंग से भगवदगीता की व्याख्या करने का प्रयास करने का अपराध मोल नहीं लेना चाहिए। भगवद्गीता की नवीनता से की जाय, जो कृष्ण को भगवान के रूप में स्वीकार करने के लिए तैयार हूं। यह अखंड अनुयायियों का विषय है, ईश्वरीय चिंतन का नहीं, लेकिन जो भी भगवद्गीता को यथारूप में प्रस्तुत करने का सात्विक मन से प्रयास करता है, वह भक्ति के कार्यकलापों में प्रगति करता है और शुद्ध भक्तिमय जीवन प्राप्त करता है। ऐसी शुद्धभक्ति के उद्घाटित उनके भगवद्धाम जन ध्रुव हैं।
18॥66॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 67
श्लोक:
( श्रीगीताजी का माहात्म्य )
इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन।
न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति॥
भावार्थ:
तुझे यह गीत रूप रहस्यमय उपदेश किसी भी काल में न तो तपरहित मनुष्य से कहना चाहिए, न भक्ति-
(वेद, शास्त्र और परमेश्वर तथा महात्मा और गुरुजनों में श्रद्धा, प्रेम और पूज्य भाव का नाम 'भक्ति' है।)-
रहित से और न बिना सुनने की इच्छा वाले से ही कहना चाहिए तथा जो मुझमें दोषदृष्टि रखता है, उससे तो कभी भी नहीं कहना चाहिए
तप और भक्ति का अभाव: गीता का ज्ञान केवल उन लोगों के लिए है जो तप
(आध्यात्मिक अनुशासन और साधना) और भक्ति (ईश्वर के प्रति श्रद्धा और प्रेम) में विश्वास रखते हैं। यदि किसी व्यक्ति में ये गुण नहीं हैं, तो उन्हें इस ज्ञान का महत्व समझ में भी नहीं आएगा।
(उनको भगवान का कहा नहीं सुनाई देने वाला उनको तो वही सुनाई देगा जो उनका गुरु बताए गा)
ऐसे लोग जो अपनी ही हांकते दूसरे किसी की सुनने की इच्छा का महत्व:नहीं है, और जो लोग गीता को समझने या सुनने की इच्छा नहीं रखते हैं, उन्हें यह ज्ञान देना व्यर्थ हो सकता है।
❤️यह भी एक पाठ शाला ही तो है ❤️
*❖════❃≛⃝❈⬤🪷
टिप्पणी:
आध्यात्मिक पाठ शाला एक ऐसी शिक्षा प्रणाली है जो आध्यात्मिक ज्ञान और मूल्यों को प्रदान करने पर केंद्रित है। यह प्रणाली गोद शाला से शुरू होती है और विभिन्न चरणों में विकसित होती है।
आध्यात्मिक पाठ शाला के विभिन्न चरण निम्नलिखित हैं:
1. *गोद शाला*: यह आध्यात्मिक पाठ शाला का पहला चरण है, जहां बच्चों को आध्यात्मिक मूल्यों और ज्ञान की आधारशिला रखी जाती है।
मां की गोद से इस का आरंभ होता है। मां ही परिवार के सदस्यों से परिचित करवाती है।
2. *बाल विहार*: यह चरण गोद शाला के बाद आता है, जहां बच्चों को आध्यात्मिक ज्ञान और मूल्यों के बारे में विस्तार से बताया जाता है।
जब बचा बड़ा हो कर प्रकृति से जुड़ता है तो उसको भांति भांति की जिज्ञासाएं घेर लेती है।
3. *ज्ञान मंदिर*: यह चरण बाल विहार के बाद आता है, जहां बच्चों को आध्यात्मिक ज्ञान और मूल्यों के बारे में गहराई से बताया जाता है।
यही उसकी शिक्षा की सही नींव रखी जाती है। प्रार्थना से शुरू हो सामाजिक भाई चारा और पहिचान का उसे ज्ञान होता है।
4. *आध्यात्मिक विद्यालय*: यह चरण ज्ञान मंदिर के बाद आता है, जहां बच्चों को आध्यात्मिक ज्ञान और मूल्यों के बारे में विस्तार से बताया जाता है और उन्हें आध्यात्मिक जीवन जीने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है।
यहां उसे प्रैक्टिकली होने पर अपने अनुभव से पता लगता है कि सच,झूठ क्या है।
5. *आध्यात्मिक महाविद्यालय*: यह चरण आध्यात्मिक विद्यालय के बाद आता है, जहां बच्चों को आध्यात्मिक ज्ञान और मूल्यों के बारे में गहराई से बताया जाता है और उन्हें आध्यात्मिक जीवन जीने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है।
अब उसे धार्मिक ,समाजिक शोध करना आता है।
आध्यात्मिक पाठ शाला का उद्देश्य बच्चों को आध्यात्मिक ज्ञान और मूल्यों के बारे में शिक्षित करना है, ताकि वे आध्यात्मिक जीवन जीने के लिए प्रशिक्षित हो सकें और अपने जीवन में आध्यात्मिक मूल्यों को लागू कर सकें।
जिसका मूल तो क,ख, ग से ही शुरू होता है ।
⬤≛⃝❈❃════❖*
इस ज्ञान का आदान-प्रदान केवल उन लोगों से किया जाना चाहिए जो इसे ग्रहण करने की तत्परता और इच्छा रखते हैं।
दोषदृष्टि रखने वालों से परहेज: जो लोग भगवान श्रीकृष्ण या उनके ज्ञान में दोष निकालते हैं या उन्हें आलोचना की दृष्टि से देखते हैं, उनके साथ गीता के ज्ञान की चर्चा नहीं करनी चाहिए।
ऐसे लोग इस ज्ञान की गहराई को समझने में असमर्थ होंगे और यह केवल विवाद और संघर्ष को जन्म देगा।
इस प्रकार, इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण ने इस दिव्य ज्ञान के आदान-प्रदान के लिए एक चयनित और योग्य समूह की आवश्यकता को स्पष्ट किया है, ताकि यह ज्ञान सही मायने में उपयोगी और प्रभावशाली हो सके।
जिन लोगों ने तपस्यामय धार्मिक अनुष्ठान नहीं किए, कृष्णभावनामृत में भक्ति का कभी प्रयास नहीं किया, मांग की कि शुद्धभक्तों की सेवा नहीं की जाती है और विशेषतया जो लोग कृष्ण को केवल ऐतिहासिक पुरुष मानते हैं, या जो कृष्ण की महानता से दोवे होते हैं, उन्हें यह परम गुह्यज्ञान नहीं बताना चाहिए। लेकिन कभी-कभी ऐसा देखा जाता है कि कृष्ण से द्वेष रखने वाले आसुरी पुरुष भी कृष्ण की पूजा विभिन्न प्रकार से करते हैं और व्यवसाय के लिए भगवद्गीता का प्रवचन करने का अभ्यास अपना लेते हैं। लेकिन जो शास्त्रीय कृष्ण को देखने की इच्छा रखता है उसे भगवद्गीता के ऐसे भाष्यों से बचना चाहिए। असल में कामी लोग भगवद्गीता के प्रस्तावों को समझ नहीं पाते। यदि कोई कामी न भी हो और वैदिक शास्त्रों द्वारा आदिम सिद्धांतों का दृढ़ता से पालन किया जाता हो, लेकिन यदि वह भक्त नहीं है, तो वह कृष्ण को नहीं समझ सकता। और यदि वह अपने को कृष्णभक्त बताता है, लेकिन कृष्ण भावना भावित कार्यकलापों में नहीं रहता, तब भी वह कृष्ण को नहीं समझ पाता। बहुत से लोग हैं, जो भगवान से इसलिए द्वेष रखते हैं, क्योंकि उन्होंने भगवदगीता में कहा है कि वे परम हैं और कोई ऐसे नहीं तो उनके समान है। ऐसे बहुत से लोग हैं, जो कृष्ण से दवेष रखते हैं। ऐसे लोगों को भगवद्गीता नहीं सुनानी चाहिए, क्योंकि वे उन्हें समझ ही नहीं पाते हैं। उनमें श्रद्धा,भगति,सेवा का ही विकास करना चाहिए
ऐसे लोग भगवद्गीता और कृष्ण को नहीं समझ पाएंगे। शुद्ध भक्तों से कृष्ण को समझे बिना किसी को भी भगवद्गीता की टीका करने का साहस भी नहीं करना चाहिए।
18॥67॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 68
श्लोक:
य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति।
भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः॥
भावार्थ:
जो पुरुष मुझमें परम प्रेम करके इस परम रहस्ययुक्त गीताशास्त्र को मेरे भक्तों में कहेगा, वह मुझको ही प्राप्त होगा- इसमें कोई संदेह नहीं है
सामान्यतः यह उपदेश तो यही दिया जाता है कि केवल भक्तों के बीच में भगवद्गीता की झलक मिलती है,
क्योंकि जो लोग भक्त नहीं हैं, वे न तो कृष्ण को समझेंगे, न ही भगवद्गीता को जो लोग कृष्ण को तथा भगवद्गीता को यथारूप में स्वीकार नहीं करते , उन्हें मनमाने ढंग से भगवदगीता की व्याख्या करने का प्रयास करने का अपराध मोल नहीं लेना चाहिए।
(ऐसे लोग भगवद रूप में रमे ज्ञान वालो के ज्ञान के खंडे के प्रहार से बच नहीं सकते)
भगवद्गीता की नवीनता से की जाय, जो कृष्ण को भगवान के रूप में स्वीकार करने के लिए तैयार हूं। यह अखंड अनुयायियों का विषय है, ईश्वरीय चिंतन का नहीं, लेकिन जो भी भगवद्गीता को यथारूप में प्रस्तुत करने का सात्विक मन से प्रयास करता है, वह भक्ति के कार्यकलापों में प्रगति करता है और शुद्ध भक्तिमय जीवन प्राप्त करता है। ऐसी शुद्धभक्ति के उद्घाटित उनके भगवद्धाम जन ध्रुव
(किनारा हैं जो एक किनारे से दूसरे किनारे तक पहुंचना जानते हैं)
जैसे दरिया में बाढ़ आई है इस किनारे से दूसरे किनारे कैसे जाया जाए?
कस्ती के द्वारा, या पानी का बहाव कम होने पर या किसी पुल के सहारे।
18॥68॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 69
श्लोक:
न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः।
भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि॥
भावार्थ:
उससे बढ़कर मेरा प्रिय कार्य करने वाला मनुष्यों में कोई भी नहीं है तथा पृथ्वीभर में उससे बढ़कर मेरा प्रिय दूसरा कोई भविष्य में होगा भी नहीं
❤️यह भी है आचार्य की स्तुति। यहां पर मूर्तियाँ हैं कि किस प्रकार के ऐसे महान आचार्य भगवतस्वरूप को प्राप्त होते हैं। गीताचार्य भगवान श्रीकृष्ण विशेष बल कह रहे हैं उसके तुल्य इस जगत में मेरा अतिशय प्रिय कार्य करने वाला और कोई नहीं है। केवल इतना ही नहीं
देर भविष्य में भी मेरी प्रिय इस पृथ्वी पर कोई ऐसा नहीं होगा।सम्पूर्ण गीता में।
अनेक स्थानों पर इस मनोवैज्ञानिक सत्य को प्रमाणित किया गया है कि ध्येयवस्तु से विभिन्न समस्त वृत्तान्तों का परित्याग करके यदि कोई साधक अपने मन को प्राप्त करवाने योग्य वस्तु में एकाग्र या सम्मिलित कर लेता है तो वह स्वयं ध्याय स्वरूप प्रकट होकर अनंत आत्मा का अनुभव कर सकता है। जो साधक गीता का अध्ययन और चिंतन मनन में ही अपने समय का सदुपयोग करता है और उसी का प्रचार भी करता है तो उनके मन में वह ज्ञान के प्रति प्रबल आदर और सम्मान जागृत होता है। फलत वह अपने सारतत्व से तादात्म्य करके परम शांति का अनुभव करता है जो परमात्मा का स्वरूप ही है। इसलिए भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं ऐसे पुरुष से मेरा कोई प्रिय नहीं है क्यों कि वह ईश्वर के स्वरूप के ज्ञान का प्रचार करता है। इससे अधिक मेरा अतिशय प्रिय कार्य कोई नहीं है।
इस सन्दर्भ में इस बात पर ध्यान दिया जा रहा है कि गीताज्ञान के प्रचार के लिए हमें स्वयं से पूर्ण परामर्श प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं है। हम कौन सा ज्ञान ग्रहण कर सकते हैं? उनके मूल प्रेम का प्रचार ऐसे लोगों को करना चाहिए जो इस विषय से सर्वथा अनभिज्ञ हैं। ओर प्रचार के साथ ही हमें इस ज्ञान के अनुसार ही जीवन यापन करना चाह रहे है ऐसा पुरुष मुझे अतिशय प्रिय है। यह भगवान श्रीकृष्ण का उपदेशक है। न केवल उपदेशक वर्ण इस ज्ञान का निष्ठावान जिज्ञासु मित्र भी अभिनन्दन का पात्र है ही है।ऐसा भगवान कहते हैं।
18॥69॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 70
श्लोक:
अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः।
ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः॥
भावार्थ:
जो पुरुष इस धर्ममय हम दोनों के संवाद रूप गीताशास्त्र को पढ़ेगा, उसके द्वारा भी मैं ज्ञानयज्ञ
(गीता अध्याय 4 श्लोक 33 भगवद गीता अध्याय: 4
श्लोक 33
श्लोक:
( ज्ञान की महिमा ) श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप।
सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते॥
भावार्थ:
हे परंतप अर्जुन! द्रव्यमय यज्ञ की अपेक्षा ज्ञान यज्ञ अत्यन्त श्रेष्ठ है तथा यावन्मात्र सम्पूर्ण कर्म ज्ञान में समाप्त हो जाते हैं
॥33॥
न कर्मणामनुष्ठानैर्न दानैस्तपसपि वा।। कैवल्यं लभते मर्त्यः साक्षात् ज्ञानेन केवलम् ॥2॥
न कर्मों के अनुष्ठान से न दान से न तप से मनुष्य मुक्ति को प्राप्त होता है प्राप्त होता है तो केवल ज्ञान से।
एसे पूजित हो ऊँगा- ऐसा मेरा मत है
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टिप्पणी;
राम गीता, शिव गीता, कृष्ण गीता, यम गीता, और भगवती गीता में निम्नलिखित श्लोक और भावार्थ हैं:
राम गीता:
न कर्मणा न दानेन न तपसा किमपि यत्।
ज्ञानेन तु केवलेन मोक्षः प्राप्यते न हि॥
भावार्थ: न तो कर्मों के अनुष्ठान से, न तो दान से, न तो तप से मनुष्य मुक्ति को प्राप्त होता है। मुक्ति केवल ज्ञान से ही प्राप्त होती है।
शिव गीता:
न कर्मणा न दानेन न तपसा किमपि यत्।
ज्ञानेन तु केवलेन मोक्षः प्राप्यते न हि॥
भावार्थ: न तो कर्मों के अनुष्ठान से, न तो दान से, न तो तप से मनुष्य मुक्ति को प्राप्त होता है। मुक्ति केवल ज्ञान से ही प्राप्त होती है।
कृष्ण गीता:
न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनेके अमृतत्वमानशुः।
ज्ञानेन तु केवलेन मोक्षः प्राप्यते न हि॥
भावार्थ: न तो कर्मों के अनुष्ठान से, न तो संतान से, न तो धन से, न तो त्याग से किसी एक के द्वारा अमरत्व प्राप्त होता है। मुक्ति केवल ज्ञान से ही प्राप्त होती है।
यम गीता:
न कर्मणा न दानेन न तपसा किमपि यत्।
ज्ञानेन तु केवलेन मोक्षः प्राप्यते न हि॥
भावार्थ: न तो कर्मों के अनुष्ठान से, न तो दान से, न तो तप से मनुष्य मुक्ति को प्राप्त होता है। मुक्ति केवल ज्ञान से ही प्राप्त होती है।
भगवती गीता:
न कर्मणा न दानेन न तपसा किमपि यत्।
ज्ञानेन तु केवलेन मोक्षः प्राप्यते न हि॥
भावार्थ: न तो कर्मों के अनुष्ठान से, न तो दान से, न तो तप से मनुष्य मुक्ति को प्राप्त होता है। मुक्ति केवल ज्ञान से ही प्राप्त होती है।
इन सभी गीताओं में यही भावार्थ है कि मुक्ति केवल ज्ञान से ही प्राप्त होती है, न कि कर्मों, दान, तप आदि से।
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18॥70॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 71
श्लोक:
श्रद्धावाननसूयश्च श्रृणुयादपि यो नरः।
सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम्॥
भावार्थ:
जो मनुष्य श्रद्धायुक्त और दोषदृष्टि से रहित होकर इस गीताशास्त्र का श्रवण भी करेगा, वह भी पापों से मुक्त होकर उत्तम कर्म करने वालों के श्रेष्ठ लोकों को प्राप्त होगा
18॥71॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 72
श्लोक:
कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा।
कच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय॥
भावार्थ:
हे पार्थ! क्या इस (गीताशास्त्र) को तूने एकाग्रचित्त से श्रवण किया?
और हे धनञ्जय! क्या तेरा अज्ञानजनित मोह नष्ट हो गया?
अब यहां भगवान अर्जुन के गुरु का काम कर रहे थे। अतएव यह उनका धर्म भी था कि अर्जुन से वह पूरी तरह से भगवद्गीता को सही ढंग से समझ सकते हैं या नहीं। यदि समझ में नहीं आता है, तो भगवान उसे फिर से किसी अंश विशेष या पूर्ण भगवद्गीता का उपदेश देने को तैयार हैं। जो भी व्यक्ति कृष्ण जैसे प्रामाणिक गुरु या उनके प्रतिनिधि भगवद्गीता को सुनते हैं, या ज्ञान प्राप्त करना चाहते है उनकी अज्ञानता दूर हो जाती है। कि नहीं?पूछने का तो हक बनता है।अगर शिष्य को समझ नहीं आता तो उसे जानने का अधिकार शिष्य का भी होता है। और गुरु हर संभव प्रयास कर उस के अनुकूल उसे समझाता है सभी जरूरी काम छोड़ कर।
भगवद्गीता कोई सामान्य ग्रंथ नहीं है, जिसे किसी कवि या उपन्यासकार ने लिखा हो, इसे साक्षात भगवान ने कहा है। जो लकी व्यक्ति इन उपदेशों में कृष्ण से या उनके किसी प्रामाणिक आध्यात्मिक प्रतिनिधि से सुनता है, वह मानता है कि मुक्त पुरुष अज्ञानता के अंधेरे को पार कर लेता है।
18॥72॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 73
श्लोक:
अर्जुन उवाच
नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वप्रसादान्मयाच्युत।
स्थितोऽस्मि गतसंदेहः करिष्ये वचनं तव॥
भावार्थ:
अर्जुन बोले- हे अच्युत! आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया और मैंने स्मृति प्राप्त कर ली है, अब मैं संशयरहित होकर स्थिर हूँ, अतः आपकी आज्ञा का पालन करूँगा संजय उवाच
जिसका जीव प्रतिनिधि अर्जुन कर रहा है, उसका स्वरूप यह है कि वह भगवान का आदेश व्यवसाय करता है। वह आत्मानुशासन (संयम) के लिए बनाया गया है। श्रीचैतन्य महाप्रभु का कथन है कि जीव का स्वरूप भगवान के नित्य दास रूप में है। इस नियम को भूल जाने के कारण जीव प्रकृति द्वारा रचा जाता है। लेकिन भगवान की सेवा करने से वह ईश्वर का मुक्त दास बनता है। जीव का स्वरूप सेवक के रूप में है। उसे माया या भगवान में से किसी एक की सेवा करनी होती है। यदि वह भगवान की सेवा करता है, तो वह अपनी सामान्य स्थिति में रहता है। लेकिन यदि वह बाह्य शक्ति माया की सेवा करना बंद कर देता है, तो वह निश्चित रूप से बंधन में पड़ जाता है। इस भौतिक जगत् में जीव मोह की सेवा की जा रही है। वह काम और वैराग्य से बंधा हुआ है, फिर भी वह अपने को जगत् का स्वामी प्रमाणित करता है। यही मोह है. मुक्त होने पर पुरुष का मोह दूर हो जाता है और वह भगवान की इच्छानुसार कर्म करने के लिए भगवान की शरण में चला जाता है। जीव को फाँसने की माया का अन्तिम पाश यह धारणा है कि वह ईश्वर है। जीव का विचार है कि अब वह जीव नहीं रहा, अब तो वह ईश्वर है। वह इतना मूर्ख होता है कि वह यह नहीं सोचता कि यदि वह ईश्वर होता तो इतना संशयग्रस्त क्यों रहता। वह इस पर विचार नहीं करता। इसलिए यही माया का अंतिम पाश होता है। अनाधिकृत माया से मुक्त होने वाले भगवान श्रीकृष्ण को सील कर दिया गया है और उनके ऑर्डर ऑफर व्यवसाय करने के लिए सहमति दे दी गई है।
इस श्लोक में मोह शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। मोह ज्ञान का विरोधी होता है। वास्तविक ज्ञान तो यह है कि प्रत्येक जीव भगवान का शाश्वत सेवक है। लेकिन जीव अपने को इस स्थिति में न समझकर सोचता है कि वह सेवक नहीं है, जीव इस जगत का स्वामी है, क्योंकि वह प्रकृति पर प्रभुत्व जतना चाहता है। यह मोह भगवत्कृपा से या शुद्ध भक्त की कृपा से प्राप्त किया जा सकता है। इस मोह से दूर मनुष्य कृष्णभावनामृत में कर्म करने के लिए राजी हो जाता है।
कृष्ण के आदेश ग्राहक कृष्ण करना भावनामृत है। बद्धजीव माया द्वारा मोहित होने के कारण यह नहीं जान पाता कि भगवान स्वामी हैं, जो ज्ञानमय हैं और सर्वसम्पत्तिवान हैं। वे अपने भक्तों को जो कुछ भी चाह सकते हैं। वे सभी के मित्र हैं और मित्र विशेष कृपालु रहते हैं। वे प्रकृति और संपूर्ण विश्व के कप्तान हैं। वे अक्षय काल के नियन्त्रक हैं और समस्त ऐश्वर्य एवं शक्तियां पूर्ण हैं। भगवान भक्त का समर्पण भी कर सकते हैं। जो उन्हें नहीं जानता वह मोह के वश में है, वह भक्त नहीं बल्कि माया का सेवक बन जाता है। लेकिन अर्जुन भगवान से भगवद्गीता सुनकर सभी मोह से मुक्त हो गए। उसने यह समझा कि कृष्ण केवल उसके मित्र हैं, बल्कि भगवान हैं और वह कृष्ण को वास्तव में समझा गया है। अतएव भगवद्गीता का पाठ करने का अर्थ है कृष्ण की वास्तविकता के साथ। जब किसी व्यक्ति को पूर्ण ज्ञान होता है, तो वह स्वभावत: कृष्ण को त्याग देता है। जब अर्जुन को यह समझ में आया कि यह तो कृष्ण की योजना है, तो जनसंख्या की सामान्य वृद्धि को कम करने के लिए, तो उन्होंने कृष्ण की इच्छानुसार युद्ध करना स्वीकार कर लिया। उसने भगवान के आदेश को पुनः प्राप्त करने के लिए अपना धनु-बाण ग्रहण कर लिया।
अर्थात
अर्जुन बोला--हे अच्युत मेरा अज्ञानजानि मोह जो कि संपूर्ण संसाररूप अनर्थका कारण था और समुद्रकी भाँति धूल था अब नष्ट हो गया है. और यह आपकी कृपासे आत्मविषयक ऐसी स्मृति भी प्राप्त कर ली है जिससे प्राप्त होने वाली सभी औषधियाँ--संशय विच्छिन्न हो जाती हैं। इस मोहनाविषयक प्रश्नोत्तरी से यह बात निश्चित रूपसे प्रदर्शित हो गई है कि जो यह अज्ञानजनित मोह का नाश और आत्मविषयक स्मृतिका लाभ है बस इतना ही समग्र शास्त्रके अर्थ ज्ञान का फल है। इसी प्रकार (छान्दोग्य) श्रुति में भी मैं आत्मा को न जानने वाला शोक करता हूँ। तथापि हृदय की औषधि विच्छिन्न हो जाती है वहाँ एकताका अनुभव करने वाले को केसा मोह तथा केसा शोक एक जैसे मंत्रवर्णन भी हैं। अब मैं संशायित हुआ आपकी आज्ञा के सामने खड़ा हूं। मेरा आपका कहना है। अभिप्राय यह है कि मैं आपकी कृपासे कृतार्थ हो गया हूं (अब) मेरी कोई कर्तव्यनिष्ठा शेष नहीं है।
18॥73॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 74
श्लोक:
संजय उवाच
इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः।
संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम्॥
भावार्थ:
संजय बोले- इस प्रकार मैंने श्री वासुदेव के और महात्मा अर्जुन के इस अद्भुत रहस्ययुक्त, रोमांचकारक संवाद को सुना
गीतोपदेश का पात्र पूर्व में क्या था?
अर्जुन ने कहा था मैं युद्ध नहीं करूंगा। और उपदेश की समाप्ति पर वह पूर्व श्लोक में यह घोषणा की मैं अब आपके वचन का पालन करूंगा। इस प्रकार रोग का उपचार पूर्ण हुआ और उसके साथ ही गीताशास्त्र की परिसमाप्ति होती है। इस सन्दर्भ में
ईसामसीह के कथन का स्मरण होता है। प्राणदंड की शूली को धोते हुए वे जा रहे थे लोगों की व्यंगोक्तियों से क्षणभर के लिए वे अर्जुन की स्थिति में पहुंच गए। क्या अचानक मोह मुक्त होकर उन्होंने घोषणा की कि हे प्रभु आपकी इच्छा पूरी हो। अर्जुन के और ईसामसीह के वाक्यों में कितना समय है। इष्ट देवता वासुदेव और अर्जुन का संवाद श्रवण अध्यात्म की सांकेतिक भाषा के अनुसार वासुदेव का अर्थ क्या है? सर्वसंबंध चैतन्यस्वरूप आत्मा तथा पार्थ का क्या अर्थ है यह सब जड़वत उपाधियों से तादात्म्य जीव। जब यह जीव इस मिथ्या तादात्म्य का परित्याग कर देता है। तब वह अपने शुद्ध आत्मसत्ता का साक्षात्कार लेता है। आत्मानात्म के विवेक की ही गीताशास्त्र की प्रतिपाद्य कला विषय है।अद्भुत श्रीकृष्णार्जुन के संवाद रूप में श्रवण कैसे हो गया तत्त्वज्ञान को
संजय अद्भुत और विस्मयकारी विशेषण देता है। सूक्ष्म बुद्धि के ग्राह्य होने के कारण कोई भी दर्शन नहीं होता है। लेकिन गीता के तत्त्वज्ञान की अद्भुतता भी कुछ अपूर्व ही है। जो पूर्ण अर्जुनत्या विखंडन और विखंडित हो चुका था किस किस अर्जुन को यह ज्ञान प्राप्त हुआ पूर्ण और शक्तिशाली बन गया। यह एक उदाहरण है गीता की भगवन् शक्ति का प्रत्यक्ष प्रमाण। इसी कारण से गीता को एक विशिष्ट और अलौकिक आभा प्राप्त हुई है। गीता में यह स्पष्ट किया गया है कि मानव जाति किसी का ना तो स्वामी है नहीं किसी का दास ही है।
निर्मित के स्वामित्व वाली यह क्षमता पहले से ही है। जब यह सत्य उद्घाटित होता है। तब संजय के लिए यह स्वाभाविक है कि वह आनंदविभोर अभिनय को अद्भुत कह कर दिखाते हैं।महात्मा अर्जुन संजय इस श्लोक में अर्जुन को गौरवान्वित करते हैं।
पार्थ के सारथी भगवान श्रीकृष्ण भाव यह है कि यदि कोई छोटा बच्चा कठिन काम करने वाला व्यक्ति है तो कोई काम छोटा बड़ा नहीं होता।
वह तो केवल स्तुति और अभिनन्दन का पात्र होता है। यह कार्य कोई नवयुवक कैसे कर के दिखायेगा तो इसमें कोई विशेष आश्चर्य की बात नहीं होती। इसी प्रकार सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान भगवान श्रीकृष्ण के लिए गीता का उपदेश बच्चों के लिए क्या है जबकि मोह और ब्रह्माण्ड में बेसहारा हुए अर्जुन की उस स्थिति से बाहर निकल कर आना?
असल में एक उपलब्धि ही है. उनका यह साहस और वीरता प्रशंसनीय है। संजय की सहानुभूति हमेशा पाण्डवों के साथ ही थी। और वह धृतराष्ट्र का नमक खा रहा था। इसलिए अपने स्वामी के साथ निष्ठावान रहना उसका कर्तव्य था। उस समय की राजनीति के अनुसार केवल धृतराष्ट्र ही इस युद्ध को रोक सकता था और इस लिए संजय सूक्ष्म से सूक्ष्मदर्शी संकेत करता है कि अर्जुन पुन: अपनी वीरतापूर्ण स्थिति में आ गया है? इसका परिणाम क्या होगा? धृतराष्ट्र के एक सौ पुत्रों का विनाश?
वृद्धावस्था में पुत्र वियोग की पीड़ा और असम्मान का कलंकित जीवन। लेकिन ऐसा ही एक मामला सामने आया है कि धृतराष्ट्र की अंधता केवल उत्सवों की ही नहीं है?
वर्ण मन और बुद्धि की भी क्या था। क्योंकि महर्षि वेदव्यास के प्रति अपनी कृतज्ञता का चित्रण करते हुए संजय के अनुनय विज्ञ के नैतिक भवन और अंध राजा के बधिर मंदिर पर कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ा है।
❤️ गुरु अविनाशी ही हो या कोई भी❤️
व्यास संजय के गुरु थे (अविनाशी थे) और संजय ने स्वीकार किया है कि व्यास की प्रार्थना से ही वे भगवान को समझ पाते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि गुरु के माध्यम से ही कृष्ण को जानना चाहिए प्रत्यक्ष रूप से नहीं।
यहां गुरु निर्मल माध्यम है, अविनाशी अर्जुन अनुभव तो प्रत्यक्ष भी होता है। गुरु परंपरा का यही रहस्य है। जब गुरु प्रामाणिक हो तो भगवद्गीता का प्रत्यक्ष दर्शन हो सकता है,अन्यथा नहीं जैसा कि अर्जुन ने किया था। संसार भर में अनेक योगी हैं, लेकिन कृष्ण योगेश्वर हैं। उन्होंने भगवद्गीता में स्पष्ट उपदेश दिया है, "मेरी शरण में आओ। जो ऐसा करता है वह सर्वोच्च योगी है।" छठे अध्याय के अंतिम श्लोक में इसकी पुष्टि हुई है-
(श्लोक:
तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः।
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन॥
भावार्थ:
योगी तपस्वियों से श्रेष्ठ है, शास्त्रज्ञानियों से भी श्रेष्ठ माना गया है और सकाम कर्म करने वालों से भी योगी श्रेष्ठ है। इससे हे अर्जुन! तू योगी हो
6॥46॥
आत्मिक विकास के अनेक साधकों में ध्यान की महत्ता के लिए भगवान के दर्शन होते हैं, यहां विभिन्न प्रकार के साधकों के निर्देश देकर वे योगी को सर्वश्रेष्ठ शिष्य होते हैं। मंदबुद्धि के वे लोग जो केवल शारीरिक तप के बारे में विचार करते हैं उन तपस्वियों से निश्चित ही योगी श्रेष्ठ हैं। ज्ञानियों से भी योगी को श्रेष्ठ माना जाता है। यहां ज्ञानी से समुद्र शास्त्र पंडित्य रखने वाले पुरुष से हैं। सकाम या निष्काम कर्म करने वालों से भी योगी श्रेष्ठ है। निष्काम भाव से कर्म और उपासना करने वाले अनेक साधकों की यह धारणा है कि इनका ही परम लक्ष्य है। भगवान कहते हैं कि जो योगी अपने शरीर, मन और बुद्धि के साथ मिथ्या तादात्म्य को दूर करके आत्मानुसंधान करता है वह तपस्वी है। ज्ञानी और साम्यवादी से श्रेष्ठ है क्योंकि वह सत्य के अत्यंत निकट है। इसलिए हे अर्जुन तुम योगी बनो। योगी के भी कई प्रकार होते हैं जिनमें हर एक का ध्येय अलग-अलग हो सकता है। अत: उन सब में श्रेष्ठ योगी किसे भगवान कहते हैं?
सकामभाववाले) तपस्वियों से भी योगी श्रेष्ठ है, ज्ञानियों से भी योगी श्रेष्ठ है और संतों से भी योगी श्रेष्ठ है -- ऐसा मेरा मत है। मूलतः हे अर्जुन ! तू योगी हो जा।)
योगिनाम सर्वेषाम्।
नारद कृष्ण के शिष्य और व्यास के गुरु हैं। अतेव व्यास अर्जुन के ही समान प्रामाणिक हैं, क्योंकि वे गुरु-परंपरा में आते हैं और संजय व्यासदेव के शिष्य हैं। अतेव व्यास की कृपा से संजय की इन्द्रियाँ विमल हो सकीं और वे कृष्ण का साक्षात् दर्शन कर सके और उनकी बातचीत सुन सके। जो व्यक्ति कृष्ण का प्रत्यक्ष श्रवण करता है, वह इस गुह्यज्ञान को समझ सकता है। यदि वह गुरु परंपरा में नहीं होता तो वह कृष्ण की बातचीत कोई ओर नहीं सुन सकता। अतएव उनका ज्ञान सदैव अधूरा रहता है, विशेष जहां तक भगवद्गीता का प्रश्न है।
भगवद्गीता में योग की संपूर्ण पद्धतियों का वर्णन है - कर्मयोग, ज्ञानयोग तथा भक्तियोग। श्रीकृष्ण इन सभी योगों के स्वामी हैं।
लेकिन यह समझ लेनी चाहिए कि जिस तरह अर्जुन कृष्ण को सीधे तौर पर समझा सके, उसके लिए सौभाग्य था, उसी प्रकार व्यासदेव की कृपा से संजय भी कृष्ण को साक्षात् श्रवण में समर्थ हो सके। कृष्ण से प्रत्यक्ष श्रवण एवं व्यास जैसे गुरु के माध्यम से प्रत्यक्ष श्रवण में कोई अंतर नहीं है। गुरु भी व्यासदेव का प्रतिनिधि होता है। अतावे वैदिक पद्धति के अनुसार अपने गुरु के जन्मदिवस पर शिष्यगण व्यास पूजा नामक उत्सव मनाते हैं।
पहले किसी भी तत्व ज्ञानी की सेवा करो फिर उस से ज्ञान प्राप्त करों।
ज्ञान बहुत विशाल है ज्ञान सागर है।पेड़ ,नदी,नाली,बड़े ,बूढ़े, बच्चे,वस्तु ,प्रकृति से भी प्राप्त हो जाता है वह गुरु नहीं गवाह होते है।
18॥74॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 75
श्लोक:
व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम्।
योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम्॥
भावार्थ:
व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम्।
योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम्॥ श्री व्यासजी की कृपा से दिव्य दृष्टि पाकर मैंने इस परम गोपनीय योग को अर्जुन के प्रति कहते हुए स्वयं योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण से प्रत्यक्ष सुना
व्यासजीकी कृपासे मैंने स्वयं इस परम विश्वास योग (गीता-ग्रंथ) को कहा है साक्षात योगेश्वर भगवान श्रीकृष्णसे सुना है।
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 76
श्लोक:
राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम्।
केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः॥
भावार्थ:
हे राजन! भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के इस रहस्ययुक्त, कल्याणकारक और अद्भुत संवाद को पुनः-पुनः स्मरण करके मैं बार-बार हर्षित हो रहा हूँ
18 ॥76॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 77
श्लोक:
तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः।
विस्मयो मे महान् राजन्हृष्यामि च पुनः पुनः॥
भावार्थ:
हे राजन्! श्रीहरि (जिसका स्मरण करने से पापों का नाश होता है उसका नाम 'हरि' है) के उस अत्यंत विलक्षण रूप को भी पुनः-पुनः स्मरण करके मेरे चित्त में महान आश्चर्य होता है और मैं बार-बार हर्षित हो रहा हूँ
हे राजन हरिके उस अति अद्भुत विश्वरूप को भी बारम्बर ने याद करके? मुझे बड़ा आश्चर्य हो रहा है और मैं बारम्बार हर्षित हो रहा हूँ।
18॥77॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 78
श्लोक:
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥
भावार्थ:
हे राजन! जहाँ योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण हैं और जहाँ गाण्डीव-धनुषधारी अर्जुन है, वहीं पर श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है- ऐसा मेरा मत है
॥78॥
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे मोक्षसन्न्यासयोगो नामाष्टादशोऽध्यायः
॥18॥
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