गीता शास्त्र के अध्याय 15 को "पुरुषोत्तम योग" भी कहा जाता है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जीवन के मूलभूत सिद्धांतों के बारे में बताया है, जो इस प्रकार हैं:
*मुख्य बिंदु:*
1. *विश्व वृक्ष*: भगवान ने जीवन को एक विशाल वृक्ष के रूप में वर्णित किया, जिसकी जड़ें ऊपर और शाखाएँ नीचे हैं।
2. *माया का प्रभाव*: भगवान ने बताया कि माया के कारण जीव आत्मा को भूल जाते हैं और संसार में फंस जाते हैं।
3. *आत्म-ज्ञान*: भगवान ने अर्जुन को आत्म-ज्ञान के महत्व के बारे में बताया, जिससे जीव आत्मा को अपने असली स्वरूप का ज्ञान होता है।
4. *पुरुषोत्तम*: भगवान ने खुद को पुरुषोत्तम कहा, जो सबसे ऊंचा और सर्वशक्तिमान है।
5. *भक्ति और शरणागति*: भगवान ने अर्जुन को अपनी शरण में आने और भक्ति करने के महत्व के बारे में बताया।
*श्लोक 20 का विशेष महत्व:*
श्लोक 20 में भगवान कहते हैं:
"मैं ही ज्ञान का एकमात्र स्रोत हूँ, और मेरी शरण में आने से ही जीव आत्मा को मोक्ष मिलता है।"
इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जीवन के मूलभूत सिद्धांतों और आत्म-ज्ञान के महत्व के बारे में बताया है, जो जीवन के लिए मार्गदर्शक हैं।
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भगवद गीता अध्याय: 15
श्लोक 1
श्लोक:
(संसार वृक्ष का कथन और भगवत्प्राप्ति का उपाय)
श्रीभगवानुवाच
ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्॥
भावार्थ:
श्री भगवान बोले- आदिपुरुष परमेश्वर रूप मूल वाले (आदिपुरुष नारायण वासुदेव भगवान ही नित्य और अनन्त तथा सबके आधार होने के कारण और सबसे ऊपर नित्यधाम में सगुणरूप से वास करने के कारण ऊर्ध्व नाम से कहे गए हैं और वे मायापति, सर्वशक्तिमान परमेश्वर ही इस संसाररूप वृक्ष के कारण हैं, इसलिए इस संसार वृक्ष को 'ऊर्ध्वमूलवाला' कहते हैं) और ब्रह्मारूप मुख्य शाखा वाले (उस आदिपुरुष परमेश्वर से उत्पत्ति वाला होने के कारण तथा नित्यधाम से नीचे ब्रह्मलोक में वास करने के कारण, हिरण्यगर्भरूप ब्रह्मा को परमेश्वर की अपेक्षा 'अधः' कहा है और वही इस संसार का विस्तार करने वाला होने से इसकी मुख्य शाखा है, इसलिए इस संसार वृक्ष को 'अधःशाखा वाला' कहते हैं) जिस संसार रूप पीपल वृक्ष को अविनाशी (इस वृक्ष का मूल कारण परमात्मा अविनाशी है तथा अनादिकाल से इसकी परम्परा चली आती है, इसलिए इस संसार वृक्ष को 'अविनाशी' कहते हैं) कहते हैं, तथा वेद जिसके पत्ते (इस वृक्ष की शाखा रूप ब्रह्मा से प्रकट होने वाले और यज्ञादि कर्मों द्वारा इस संसार वृक्ष की रक्षा और वृद्धि करने वाले एवं शोभा को बढ़ाने वाले होने से वेद 'पत्ते' कहे गए हैं) कहे गए हैं, उस संसार रूप वृक्ष को जो पुरुष मूलसहित सत्त्व से जानता है, वह वेद के तात्पर्य को जानने वाला है। (भगवान् की योगमाया से उत्पन्न हुआ संसार क्षणभंगुर, नाशवान और दुःखरूप है, इसके चिन्तन को त्याग कर केवल परमेश्वर ही नित्य-निरन्तर, अनन्य प्रेम से चिन्तन करना 'वेद के तात्पर्य को जानना' है)
श्रीभगवान इस श्लोक में संसार को एक विशाल पीपल के वृक्ष के रूप में प्रस्तुत करते हैं। इस संसार वृक्ष की जड़ों को "ऊर्ध्वमूल" यानी ऊँचाई में स्थिर मानते हैं, जो भगवान के रूप में प्रकट होते हैं। यह संकेत करता है कि आदिपुरुष परमेश्वर ही इस संसार के मूल(जड़) हैं और नित्य हैं, जबकि संसार की शाखाएँ और पत्ते इस वृक्ष के विस्तार और विकास को दर्शाते हैं।
ऊर्ध्वमूल: यह शब्द आदिपुरुष परमेश्वर की ओर इशारा करता है, जो संसार के मूल कारण हैं। वे शाश्वत और नित्य हैं। सदा रहने वाले है।जिसका कभी भी नाश नहीं होता।
अविनाशी: संसार का मूल तत्व अविनाशी है, जिसका अर्थ है कि परमात्मा स्वयं अविनाशी हैं और संसार भी उनकी परंपरा से उत्पन्न हुआ है।
पत्ते: वेदों को इस संसार वृक्ष के पत्तों के रूप में दर्शाया गया है, जो यज्ञ और कर्मों के माध्यम से जो सदा संसार की रक्षा और वृद्धि में सहायक होते रहते हैं।
ज्ञान का अर्थ: जो व्यक्ति इस संसार वृक्ष को इस दृष्टिकोण से समझता है और केवल परमेश्वर की ध्यान में रहता है, वह वास्तव में वेद के तात्पर्य को जानने वाला होता है। इसका अर्थ है कि इस संसार के क्षणभंगुर (जो कभी भी नष्ट हो सकता है आज के गुरु कभी भी नष्ट हो सकते है वो दुखद परिस्थिति में सहायक भी नहीं हो सकते) ओर जो इन दुःखद तत्वों से पार हो कर परमेश्वर की नित्य और शाश्वत स्थिति को जानना सिखा सके वास्तविक ज्ञान वही है।
इस श्लोक के माध्यम से श्रीभगवान ने संसार की वास्तविकता और भगवत्प्राप्ति के मार्ग को स्पष्ट किया है, और यह भी बताया है कि जीवन में वास्तविक ज्ञान प्राप्त करने के लिए परमात्मा की ओर ध्यान केंद्रित करना आवश्यक होता है।(जब कि कलयुग में यह गुरु लोग अपनी ओर ही ध्यान आकर्षित करते है)
नोट : प्राप्त इसी भूमिका को लेकर हम आगे बढ़ें गे बिना गीता के मूल भाव से कोई छेड़ छाड़ किए।
15॥1॥
भगवद गीता अध्याय: 15
श्लोक 2
श्लोक:
अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः।
अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके॥
भावार्थ:
उस संसार वृक्ष की तीनों गुणोंरूप जल के द्वारा बढ़ी हुई एवं विषय-भोग रूप कोंपलोंवाली
( शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध -ये पाँचों स्थूलदेह और इन्द्रियों की अपेक्षा सूक्ष्म होने के कारण उन शाखाओं की 'कोंपलों' के रूप में कहे गए हैं।) देव, मनुष्य और तिर्यक् आदि योनिरूप शाखाएँ
(मुख्य शाखा रूप ब्रह्मा से सम्पूर्ण लोकों सहित देव, मनुष्य और तिर्यक् आदि योनियों की उत्पत्ति और विस्तार हुआ है,इसलिए उनका यहाँ 'शाखाओं' के रूप में वर्णन किया है)
नीचे और ऊपर सर्वत्र फैली हुई हैं तथा मनुष्य लोक में ( अहंता, ममता और वासनारूप मूलों को केवल मनुष्य योनि में कर्मों के अनुसार बाँधने वाली कहने का कारण यह है कि अन्य सब योनियों में तो केवल पूर्वकृत कर्मों के फल को भोगने का ही अधिकार है और मनुष्य योनि में नवीन कर्मों के करने का भी अधिकार है)
कर्मों के अनुसार बाँधने वाली अहंता-ममता और वासना रूप जड़ें भी नीचे और ऊपर सभी लोकों में व्याप्त हो रही हैं।
अहंता-ममता का अर्थ है "मैं" और "मेरा" की भावना। अध्याय 15 के श्लोक में भगवान कृष्ण कहते हैं:
"अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्।
विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते।।"
इस श्लोक का भाव यह है कि जो व्यक्ति अहंता-ममता को त्याग देता है, वह शांत और निर्मम हो जाता है, और वह ब्रह्म की अवस्था में पहुँच जाता है।
अहंता-ममता को त्यागने का अर्थ है कि हमें अपने आप को और अपनी सभी वस्तुओं को भगवान के हाथ में सौंप देना चाहिए,तो विचार योग तथ्य यह है कि गुरु को भी भगवान के हाथों में सौंप कर हमें अपने आप को भगवान के साथ जोड़ लेना चाहिए। यहां फिर सोचना बनता है कि भगवान के साथ हमने खुद को जोड़ना है तो हमें भगवान की ही आज्ञा को मानना भी तो होगा?जिस से स्पष्ट होता है कि भगवान से जुड़ने को किसी गुरु की आज्ञा की आवश्यकता ही नहीं? क्यों कि दो लोगों की आज्ञा का पालन करना उन दो नौकाओं की भांति ही साबित होगा जिन पर एक समय में हम दोनों नौकाओं पर सवार हो जाएं।जिस का परिणाम डूबना ही है? और कहते भी हैं कि दो नौकाओं का सवार डूबता ही है? दो मालिकों का सेवक भी किसी एक मालिक को धोखा कब दे दे कह नहीं सकते?
श्लोक का मूल भाव भी यही है।
उस संसार वृक्ष की तीनों गुणोंरूप जल के द्वारा बढ़ी हुई एवं विषय-भोग रूप कोंपलोंवाली ( शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध -ये पाँचों स्थूलदेह और इन्द्रियों की अपेक्षा सूक्ष्म होने के कारण उन शाखाओं की 'कोंपलों' के रूप में कहे गए हैं।) देव, मनुष्य और तिर्यक् आदि योनिरूप शाखाएँ (मुख्य शाखा रूप ब्रह्मा से सम्पूर्ण लोकों सहित देव, मनुष्य और तिर्यक् आदि योनियों की उत्पत्ति और विस्तार हुआ है, इसलिए उनका यहाँ 'शाखाओं' के रूप में वर्णन किया है) नीचे और ऊपर सर्वत्र फैली हुई हैं तथा मनुष्य लोक में ( अहंता, ममता और वासनारूप मूलों को केवल मनुष्य योनि में कर्मों के अनुसार बाँधने वाली कहने का कारण यह है कि अन्य सब योनियों में तो केवल पूर्वकृत कर्मों के फल को भोगने का ही अधिकार है और मनुष्य योनि में नवीन कर्मों के करने का भी अधिकार है) कर्मों के अनुसार बाँधने वाली अहंता-ममता और वासना रूप जड़ें भी नीचे और ऊपर सभी लोकों में व्याप्त हो रही हैं।
इस श्लोक में संसार को एक विशाल वृक्ष के रूप में चित्रित किया गया है, जिसकी शाखाएँ तीन गुणों
(सत्त्व, रजस, और तमस)
से उत्पन्न होती हैं और ये विषय-भोग के कोंपलों के रूप में व्यक्त होती हैं। इन शाखाओं में शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध जैसे विषय हैं, जो इन्द्रियों के अनुभव की वस्तुएं हैं।
वृक्ष की शाखाएँ देवता (गुरु, मनुष्य(गुरु) और तिर्यक् (पशु) योनियों का प्रतीक हैं, जो इस ब्रह्माण्ड में विभिन्न जीवन रूपों और अवस्थाओं को दर्शाते हैं। यह वृक्ष ऊपर से नीचे तक फैलता है और मनुष्य योनि में कर्मों के अनुसार मनुष्य को जकड़े हुए है।
मुख्य रूप से, इस वृक्ष की जड़ें अहंता, ममता, और वासना रूप में बताई गई हैं। ये जड़ें मनुष्य योनि में कर्मों के अनुसार बंधन की स्थिति को जन्म देती हैं।
(दो मालिकों का नौकर या दो नौकाओं का सवार)
अन्य योनियों में, जीवन केवल पूर्वकृत कर्मों के फल भोगने तक सीमित होता है, लेकिन मनुष्य योनि में नए कर्म करने का भी नियम ओर अधिकार होता है, जिससे ज्ञान द्वारा ही वे इस वृक्ष के बंधनों से मुक्त हो सकते हैं।
इस प्रकार, यह श्लोक संसार की स्थिति और मनुष्य के कर्मों के बंधनों को स्पष्ट करने का प्रयास करता है और हमें यह समझने में मदद करता है कि कैसे हम इन बंधनों से छुटकारा पा सकते हैं।
इस वृक्ष की शाखाएँ ऊपर तथा नीचे फैली हुई हैं और प्रकृति के तीन गुणों द्वारा पोषित हैं। इसकी टहनियाँ इन्द्रिय विषय हैं। इस वृक्ष की जड़ें नीचे की ओर भी जाती हैं, जो मानव समाज के सकाम कर्मों से बँधी हुई हैं।
तात्पर्य : अश्वत्थ वृक्ष की यहाँ और भी व्याख्या की गई है। इसकी शाखाएँ चतुर्दिक फैली हुई हैं। निचले भाग में जीवों की विभिन्न योनियाँ हैं, यथा मनुष्य, पशु, घोड़े, गाय, कुत्ते, बिल्लियाँ आदि। ये सभी वृक्ष की शाखाओं के निचले भाग में स्थित हैं। लेकिन ऊपरी भाग में जीवों की उच्चयोनियाँ हैं- यथा देव, गन्धर्व तथा अन्य बहुत सी उच्चतर योनियाँ। जिस प्रकार सामान्य वृक्ष का पोषण जल से होता है, उसी प्रकार यह वृक्ष प्रकृति के तीन गुणों द्वारा पोषित होता है। कभी-कभी हम देखते हैं कि जल के आभाव से कोई-कोई भूखण्ड वीरान हो जाता है, तो कोई खण्ड लहलहाता है, इसी प्रकार जहाँ प्रकृति के किन्ही विशेष गुणों का आनुपातिक आधिक्य होता है, वहाँ उसी के अनुरूप जीवों की योनियाँ प्रकट होती हैं।
वृक्ष की टहनियाँ इन्द्रियविषय हैं। विभिन्न गुणों के विकास से हम विभिन्न प्रकार की इन्द्रियों का विकास करते हैं और इन इन्द्रियों के द्वारा हम विभिन्न इन्द्रियविषयों का भोग करते हैं। शाखाओं के सिरे इन्द्रियाँ हैं- यथा कान, नाक, आँख आदि, जो विभिन्न इन्द्रियविषयों के भोग में आसक्त हैं। टहनियाँ शब्द, रूप, स्पर्श आदि इन्द्रिय विषय हैं। सहायक जड़ें राग तथा द्वेष हैं, जो विभिन्न प्रकार के कष्ट तथा इन्द्रियभोग के विभिन्न रूप हैं। धर्म-अधर्म की प्रवृत्तियाँ इन्हीं गौण जड़ों से उत्पन्न हुई मानी जाती हैं, जो चारों दिशाओं में फैली हैं। वास्तविक जड़ तो ब्रह्मलोक में है, किन्तु अन्य जड़ें मर्त्यलोक में हैं। जब मनुष्य उच्चलोकों में पुण्यकर्मों का फल भोग चुकता है, तो वह इस धरा पर उतरता है और उन्नति के लिए सकाम कर्मों का नवीनीकरण करता है। यह मनुष्य लोक तो कर्म क्षेत्र माना जाता है। और मनुष्य को भोग योनि।
15॥2॥
भगवद गीता अध्याय: 15
श्लोक 3
श्लोक:
न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा।
अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल मसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा॥
भावार्थ:
इस संसार वृक्ष का स्वरूप जैसा कहा है वैसा यहाँ विचार काल में नहीं पाया जाता
(इस संसार का जैसा स्वरूप शास्त्रों में वर्णन किया गया है और जैसा देखा-सुना जाता है, वैसा तत्त्व ज्ञान होने के पश्चात नहीं पाया जाता, जिस प्रकार आँख खुलने के पश्चात स्वप्न का संसार नहीं पाया जाता)
क्योंकि न तो इसका आदि है (इसका आदि नहीं है, यह कहने का प्रयोजन यह है कि इसकी परम्परा कब से चली आ रही है, इसका कोई पता नहीं है)
और न अन्त है
(इसका अन्त नहीं है, यह कहने का प्रयोजन यह है कि इसकी परम्परा कब तक चलती रहेगी, इसका कोई पता नहीं है)
तथा न इसकी अच्छी प्रकार से स्थिति ही है।
(इसकी अच्छी प्रकार स्थिति भी नहीं है, यह कहने का प्रयोजन यह है कि वास्तव में यह है क्यों कि क्षणभंगुर और नाशवान है)
इसलिए इस अहंता, ममता और वासनारूप अति दृढ़ मूलों वाले संसार रूप पीपल के वृक्ष को दृढ़ वैराग्य रूप से भाव है।
(ब्रह्मलोक तक के भोग क्षणिक और नाशवान हैं, ऐसा समझकर, इस संसार के समस्त विषयभोगों में सत्ता, सुख, प्रीति और रमणीयता का न भासना ही 'दृढ़ वैराग्यरूप शस्त्र' है)
शस्त्र द्वारा काटकर
(स्थावर, जंगम रूप यावन्मात्र संसार के चिन्तन का तथा अनादिकाल से अज्ञान द्वारा दृढ़ हुई अहंता, ममता और वासना रूप मूलों का त्याग करना ही संसार वृक्ष का अवान्तर 'मूलों के सहित काटना' है।)
इस वृक्ष के वास्तविक स्वरूप का अनुभव इस जगत् में नहीं किया जा सकता। कोई भी नहीं समझ सकता कि इसका आदि कहाँ है, अन्त कहाँ है या इसका आधार कहाँ है? लेकिन मनुष्य को चाहिए कि इस दृढ़ मूल वाले वृक्ष को विरक्ति विराग रूप के शस्त्र से काट गिराए। तत्पश्चात् उसे ऐसे स्थान की खोज करनी चाहिए जहाँ जाकर लौटना न पड़े और जहाँ उस भगवान् की ही शरण ग्रहण कर ली जाये, जिससे अनादि काल से प्रत्येक वस्तु का सूत्रपात तथा विस्तार होता आया है।तात्पर्य : अब तक यह स्पष्ट कह दिया गया है कि इस अश्वत्थ वृक्ष के वास्तविक स्वरूप को इस भौतिक जगत् में नहीं समझा जा सकता। चूँकि इसकी जड़ें ऊपर की ओर हैं, अतः वास्तविक वृक्ष का विस्तार विरुद्ध दिशा में होता है। जब वृक्ष के भौतिक विस्तार में कोई फँस जाता है, तो उसे न तो यह पता चल पाता है कि यह कितनी दूरी तक फैला है और न वह इस वृक्ष के शुभारम्भ को ही देख पाता है। फिर भी मनुष्य को उस के कारण की खोज तो करनी ही होती है। " मैं अमुक पिता का पुत्र हूँ, जो अमुक का पुत्र है, आदि " - इस प्रकार खोजने पर अमुक पिता के पिता करने से मनुष्य को अंत में ब्रह्मा प्राप्त होते हैं, जिन्हें गर्भोदकशायी विष्णु ने उत्पन्न किया। इस प्रकार अन्ततः भगवान् तक पहुँचा जाता है, जहाँ सारी गवेषणा का अन्त हो जाता है। मनुष्य को इस वृक्ष के उद्गम, परमेश्वर की खोज ऐसे व्यक्तियों की संगति द्वारा करनी होती है, जिन्हें उस परमेश्वर का पूर्ण ज्ञान प्राप्त हो। ईश्वर का पूर्ण ज्ञान तो पवित्र ग्रंथों से ही संभव हो सकता है जो इस वृक्ष के पत्ते अंग बताए गए है?
इसी प्रकार ज्ञान से मनुष्य धीरे-धीरे वास्तविकता के इस प्रतिबिम्ब से विलग हो जाता है और सम्बन्ध-विच्छेद होने पर वह वास्तव में मूलवृक्ष में ही स्थित हो जाता है।
इस प्रसंग में असङ्ग शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि विषयभोग की आसक्ति तथा भौतिक प्रकृति पर प्रभुता अत्यन्त प्रबल होती है। अतएव प्रामाणिक शास्त्रों पर आधारित आत्म-ज्ञान की विवेचना द्वारा विरक्ति सीखनी चाहिए और ज्ञानी पुरुषों से श्रवण भी करना चाहिए। भक्तों की संगति में रहकर ऐसी विवेचना से भगवान् की प्राप्ति थोड़ी सुगम होजाती है। तब सर्वप्रथम जो करणीय है, वह है भगवान् की शरण ग्रहण करना। यहाँ पर उस स्थान (पद) का वर्णन किया गया है, जहाँ जाकर मनुष्य इस धोखे से प्रतिबिम्बित इस वृक्ष में कभी वापस नहीं लौटता।
भगवान् कृष्ण वह आदि मूल हैं, जहाँ से प्रत्येक वस्तु निकली है। उस भगवान् का अनुग्रह प्राप्त करने के लिए केवल उनकी शरण ग्रहण करनी चाहिए, जो श्रवण, कीर्तन आदि द्वारा भक्ति करने के फलस्वरूप प्राप्त होती है। वे ही भौतिक जगत् के विस्तार के कारण हैं। इसकी व्याख्या पहले ही स्वयं भगवान् ने की है।
अहं सर्वस्य प्रभवः- मैं प्रत्येक वस्तु का उद्गम हूँ। अतएव इस भौतिक जीवन रूपी प्रबल अश्वत्थ के वृक्ष के बन्धन से छूटने के लिए कृष्ण की शरण ग्रहण की जानी चाहिए। कृष्ण (भगवान) की ही शरण ग्रहण करते ही मनुष्य स्वतः इस भौतिक विस्तार से विलग हो जाता है।इस प्रकार, इस संसार वृक्ष को काटने का अर्थ है अपने भीतर के अहंकार, ममता, और वासना के जड़ों को समाप्त करना, जो कि इस संसार के अस्थिरता और नाशवान प्रकृति को समझकर किया जा सकता है।
15॥3॥
भगवद गीता अध्याय: 15
श्लोक 4
श्लोक:
ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी॥
भावार्थ:
उसके पश्चात उस परम-पदरूप परमेश्वर को भलीभाँति खोजना चाहिए, जिसमें गए हुए पुरुष फिर लौटकर संसार में नहीं आते और जिस परमेश्वर से इस पुरातन संसार वृक्ष की प्रवृत्ति विस्तार को प्राप्त हुई है, उसी आदिपुरुष नारायण के मैं शरण हूँ- इस प्रकार दृढ़ निश्चय करके उस परमेश्वर का मनन और निदिध्यासन करना चाहिए
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को एक महत्वपूर्ण शिक्षाएँ दे रहे हैं। वे बताते हैं कि यह संसार एक विशाल वृक्ष के समान है, जिसमें हम सभी जीवन के एक भाग के रूप में जुड़े हुए हैं। इस वृक्ष की उत्पत्ति और विस्तार की प्रक्रिया आदिपुरुष नारायण से हुई है, जो इस विश्व के परमेश्वर हैं।
भगवान श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि हमें इस परमेश्वर को ठीक से खोजने का प्रयास करना चाहिए, जो उस परम पद (अधिकतम स्थिति) का स्वरूप है, जिसमें पहुँचने के बाद जीवात्मा पुनः संसार में लौटती नहीं है। अर्थात, जो परमेश्वर हमे मोक्ष प्राप्त करने के बाद संसार के पुनरागमन से मुक्त करता है।
इस श्लोक के माध्यम से यह सिखाया जा रहा है कि एक व्यक्ति को न केवल भगवान के अस्तित्व को जानना चाहिए, बल्कि उसे ध्यान और भक्ति द्वारा उस परमेश्वर की सच्ची पहचान भी करनी चाहिए। यह ध्यान और ध्यानानंद एक दृढ़ निश्चय के साथ होना चाहिए, जिसमें भगवान नारायण के प्रति पूर्ण विश्वास और समर्पण शामिल हो।इस प्रकार, श्लोक हमें प्रेरित करता है कि हम अपने जीवन में आदिपुरुष नारायण की खोज करें, उनके चरणों में शरण लें और मोक्ष की प्राप्ति के लिए गंभीर प्रयास करें।
15॥4॥
भगवद गीता अध्याय: 15
श्लोक 5
श्लोक:
निर्मानमोहा जितसङ्गदोषाअध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसञ्ज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्॥
भावार्थ:
जिनका मान और मोह नष्ट हो गया है, जिन्होंने आसक्ति रूप दोष को जीत लिया है, जिनकी परमात्मा के स्वरूप में नित्य स्थिति है और जिनकी कामनाएँ पूर्ण रूप से नष्ट हो गई हैं- वे सुख-दुःख नामक द्वन्द्वों से विमुक्त ज्ञानीजन उस अविनाशी परम पद को प्राप्त होते हैं
जो झूठी प्रतिष्ठा, मोह तथा कुसंगति से मुक्त हैं, जो शाश्वत तत्त्व को समझते हैं, जिन्होंने भौतिक काम को नष्ट कर दिया है, जो सुख तथा दुःख के द्वन्द्व से मुक्त हैं और जो मोहरहित होकर परम पुरुष के शरणागत होना जानते हैं, वे उस शाश्वत राज्य को प्राप्त होते हैं।
तात्पर्य : यहाँ पर शरणागति का अत्यन्त सुन्दर वर्णन हुआ है। इसके लिए जिस प्रथम योग्यता की आवश्यकता है, वह है मिथ्या अहंकार से मोहित न होना। चूँकि बद्धजीव अपने को प्रकृति(माया) का स्वामी मानकर गर्वित रहता है, अतएव उसके लिए भगवान् की शरण में जाना कठिन होता है। उसे वास्तविक ज्ञान के अनुशीलन द्वारा यह जानना चाहिए कि वह प्रकृति का स्वामी नहीं है, उसका स्वामी तो परमेश्वर है। जब मनुष्य अहंकार से उत्पन्न मोह से मुक्त हो जाता है, तभी शरणागति की प्रक्रिया प्रारम्भ हो सकती है। जो व्यक्ति इस संसार में सदैव सम्मान की आशा रखता है, उसके लिए भगवान् के शरणागत होना कठिन है। अहंकार तो मोह के कारण होता है, क्योंकि यद्यपि मनुष्य यहाँ आता है, कुछ काल तक रहता है और फिर चला जाता है, तो भी मूर्खतावश यह समझ बैठता है कि वही इस संसार का स्वामी है। इस तरह वह सारी परिस्थिति को जटिल बना देता है और सदैव कष्ट उठाता रहता है। सारा संसार इसी भ्रान्तधारणा के अन्तर्गत आगे बढ़ता है। लोग सोचते हैं कि यह भूमि या पृथ्वी मानव समाज की है और उन्होंने भूमि का विभाजन इस मिथ्या धारणा से कर रखा है कि वे इसके स्वामी हैं। मनुष्य को इस भ्रम से मुक्त होना चाहिए कि मानव समाज ही इस जगत् का स्वामी है। जब मनुष्य इस प्रकार की भ्रान्तधारणा से मुक्त हो जाता है, तो वह पारिवारिक, सामाजिक तथा राष्ट्रीय स्नेह से उत्पन्न कुसंगतियों से मुक्त हो जाता है। ये त्रुटि पूर्ण संगतियाँ ही उसे इस संसार से बाँधने वाली हैं। इस अवस्था के बाद उसे आध्यात्मिक ज्ञान विकसित करना होता है। उसे ऐसे ज्ञान का अनुशीलन करना होता है कि वास्तव में उसका क्या है और क्या नहीं है। और जब उसे वस्तुओं का सही-सही ज्ञान हो जाता है तो वह सुख-दुःख, हर्ष- विषाद जैसे द्वन्द्वों से मुक्त हो जाता है। वह ज्ञान से परिपूर्ण हो जाता है और तब भगवान् का शरणागत बनना सम्भव हो पाता है।इस श्लोक का सार यह है कि एक व्यक्ति जो आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त कर चुका है और जिसने अपने भीतर के बंधनों और इच्छाओं को समाप्त कर लिया है, वह परम शांति और अविनाशी परम पद को प्राप्त कर लेता है। यह अवस्था दिव्य शांति और स्थिरता की होती है, जहाँ व्यक्ति समस्त द्वन्द्वों से मुक्त हो जाता है और सच्चे ज्ञान का अनुभव करता है।
15॥5॥
भगवद गीता अध्याय: 15
श्लोक 6
श्लोक:
न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥
भावार्थ:
जिस परम पद को प्राप्त होकर मनुष्य लौटकर संसार में नहीं आते उस स्वयं प्रकाश परम पद को न सूर्य प्रकाशित कर सकता है, न चन्द्रमा और न अग्नि ही, वही मेरा परम धाम
('परम धाम' परम धाम एक आध्यात्मिक अवधारणा है जो भगवान के निवास स्थान को संदर्भित करती है।भगवान तो कण कण में हैं ।परन्तु यह वह स्थान है जिसे शास्त्र कहते है जहां भगवान निवास करते हैं और जहां जीवात्मा को मोक्ष या मुक्ति प्राप्त होती है।वह परम धाम है।परम धाम को विभिन्न धर्मों में और अलग अलग आध्यात्मिक परंपराओं में अलग-अलग तरीकों से वर्णित किया गया है। कुछ लोग इसे एक भौतिक स्थान के रूप में देखते हैं, जबकि अन्य इसे एक आध्यात्मिक अवस्था के रूप में देखते हैं।
हिंदू धर्म में, परम धाम को अक्सर वैकुण्ठ या गोलोक के रूप में वर्णित किया जाता है, जो भगवान विष्णु या भगवान कृष्ण के निवास स्थान हैं।
इस्लाम धर्म में, परम धाम को जन्नत के रूप में वर्णित किया जाता है, जो एक स्वर्गीय स्थान है जहां मुसलमानों को मृत्यु के बाद प्रवेश मिलता है।
बौद्ध धर्म में, परम धाम को अक्सर निर्वाण के रूप में वर्णित किया जाता है, जो एक आध्यात्मिक अवस्था है जहां जीवात्मा को मोक्ष या मुक्ति प्राप्त होती है।
इस प्रकार, परम धाम एक आध्यात्मिक अवधारणा है जो भगवान के निवास स्थान को संदर्भित करती है, और इसका अर्थ विभिन्न धर्मों और आध्यात्मिक परंपराओं में अलग-अलग तरीकों से वर्णित किया गया है।
15॥6॥
भगवद गीता अध्याय: 15
श्लोक 7
श्लोक:
(जीवात्मा का विषय)
श्रीभगवानुवाच
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।
मनः षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति॥
भावार्थ:
इस देह में यह जीवात्मा मेरा ही सनातन अंश है कोई टुकड़ा नहीं
(जैसे विभागरहित स्थित हुआ भी महाकाश घटों में पृथक-पृथक की भाँति प्रतीत होता है, वैसे ही सब भूतों में एकीरूप से स्थित हुआ भी परमात्मा पृथक-पृथक की भाँति प्रतीत होता है, इसी से देह में स्थित जीवात्मा को भगवान ने अपना 'सनातन अंश' कहा है)
और वही इन प्रकृति में स्थित मन और पाँचों इन्द्रियों को आकर्षित भी तो करता है।श्रीभगवान ने कहा है कि इस शरीर में स्थित जीवात्मा मेरा ही सनातन अंश है। जैसे कि एक ही आकाश को विभिन्न घटों में विभाजित किया जाता है, लेकिन आकाश स्वयं एक ही होता है, वैसे ही जीवात्मा भी मेरा एक अंश है, जबकि शरीर और मन के माध्यम से यह विभिन्न रूपों में प्रकट होता है। जीवात्मा अपनी प्रकृति के अनुसार, मन और पाँचों इन्द्रियों को आकर्षित करता है और उनके माध्यम से कार्य करता है।
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण यह स्पष्ट कर रहे हैं कि जीवात्मा, जो कि हमारे शरीर में निवास करता है, वह भगवान का ही एक अविभाज्य हिस्सा है। जीवात्मा शाश्वत और अनन्त है, और इसे शरीर में स्थित मन और इन्द्रियों द्वारा संचालित किया जाता है। मन और इन्द्रियाँ जो भी कार्य करती हैं, जीवात्मा उन्हीं के माध्यम से हीअनुभव करता है।भगवान इस श्लोक के माध्यम से हमें यह समझाना चाहते हैं कि जीवात्मा और परमात्मा के बीच एक गहरा सम्बन्ध है। जीवात्मा, जो कि एक दिव्य अंश है, मन और इन्द्रियों के माध्यम से इस भौतिक संसार के साथ जुड़ा रहता है। यह संसार में आकर्षण और विघटन का कारण बनता है, जो कि इस शरीर के माध्यम से अनुभव किया जाता है।
इस प्रकार, श्लोक 7 हमें यह सिखाता है कि हमें अपने भीतर के दिव्य अंश को पहचानना चाहिए और अपने मन और इन्द्रियों को सही दिशा में संकर्षित करना चाहिए ताकि हम आत्मा की वास्तविकता को समझ सकें और आत्मा के साथ परमात्मा के सम्बन्ध को जान सकें।
अपने भीतर के दिव्य अंश को पहचानने के लिए, निम्नलिखित कुछ सुझाव दिए जा सकते हैं:
1. *आत्म-चिंतन*:
अपने आप के बारे में चिंतन करें। अपने विचारों, भावनाओं और क्रियाओं को समझने की कोशिश करें।
2. *ध्यान*:
ध्यान के माध्यम से अपने मन को शांत और एकाग्र करने की कोशिश करें। इससे आपको अपने भीतर के दिव्य अंश को पहचानने में मदद मिल सकती है।
3. *प्राकृतिक सौंदर्य का अनुभव*:
प्राकृतिक सौंदर्य का अनुभव करने से आपको अपने भीतर के दिव्य अंश को पहचानने में मदद मिल सकती है। प्राकृतिक सौंदर्य का अनुभव करने से आपको अपने आप को और ब्रह्मांड को एक दूसरे से जुड़ा हुआ महसूस हो सकता है।
4. *आध्यात्मिक पुस्तकों का अध्ययन*:
आध्यात्मिक पुस्तकों का अध्ययन करने से आपको अपने भीतर के दिव्य अंश को पहचानने में मदद मिल सकती है। आध्यात्मिक पुस्तकें आपको अपने आप को और ब्रह्मांड को एक दूसरे से जुड़ा हुआ समझने में मदद कर सकती हैं।
5. *गुरु रूपी आध्यात्मिक मार्गदर्शक ग्रंथों की शरण*:
आध्यात्मिक मार्गदर्शक की शरण में जाने से आपको अपने भीतर के दिव्य अंश को पहचानने में मदद मिल सकती है। गुरु या आध्यात्मिक मार्गदर्शक आपको अपने आप को और ब्रह्मांड को एक दूसरे से जुड़ा हुआ समझने में मदद जरूर कर सकते हैं।
15॥7॥
भगवद गीता अध्याय: 15
श्लोक 8
श्लोक:
शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः।
गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात्॥
भावार्थ:
वायु गन्ध के स्थान से गन्ध को जैसे ग्रहण करके ले जाता है, वैसे ही देहादिका स्वामी जीवात्मा भी जिस शरीर का त्याग करता है, उससे इन मन सहित इन्द्रियों को ग्रहण करके फिर जिस शरीर को प्राप्त होता है- उसमें जाता है
इस संसार में जीव अपनी देहात्मबुद्धि को एक शरीर से दूसरे में उसी तरह ले जाता है, जिस तरह वायु सुगन्धि को ले जाती है। इस प्रकार वह एक शरीर धारण करता है और फिर इसे त्याग कर दूसरा शरीर धारण करता है।
तात्पर्य : यहाँ पर जीव को ईश्वर अर्थात् अपने शरीर का नियामक कहा गया है। यदि वह चाहे तो अपने शरीर को त्याग कर उच्चतर योनि में जा सकता है और चाहे तो निम्न योनि में जा सकता है। इस विषय में उसे थोड़ी स्वतन्त्रता भी प्राप्त है। शरीर में जो परिवर्तन होता है, वह उस पर निर्भर करता है। मृत्यु के समय वह जैसी चेतना बनाये रखता है, वही उसे दूसरे शरीर तक ले जाती है। यदि वह कुत्ते या बिल्ली जैसी चेतना बनाता है, तो उसे कुत्ते या बिल्ली का शरीर प्राप्त होता है। यदि वह अपनी चेतना दैवी गुणों में स्थित करता है, तो उसे देवता का स्वरूप प्राप्त होता है। और यदि वह कृष्ण भावनामृत में होता है, तो वह आध्यात्मिक जगत में कृष्णलोक को जाता है, जहाँ उसका सान्निध्य कृष्ण से होता है। यह दावा मिथ्या है कि इस शरीर के नाश होने पर सब कुछ समाप्त हो जाता है। आत्मा एक शरीर से दूसरे शरीर में देहान्तरण करता है और वर्तमान शरीर तथा वर्तमान कार्यकलाप ही अगले शरीर 'का आधार बनते हैं। कर्म के अनुसार भिन्न शरीर प्राप्त होता है और समय आने पर यह शरीर त्यागना होता है। यहाँ यह कहा गया है कि सूक्ष्म शरीर, जो अगले शरीर का बीज वहन करता है, अगले जीवन में दूसरा शरीर निर्माण करता है। एक शरीर से दूसरे शरीर में देहान्तरण की प्रक्रिया तथा शरीर में रहते हुए संघर्ष करने को कर्षति अर्थात् जीवन संघर्ष कहते हैं।इस श्लोक में श्री कृष्ण ने जीवन और मृत्यु के चक्र को समझाया है। यह दर्शाया गया है कि जैसे वायु गंध को ले जाती है, वैसे ही आत्मा शरीर को छोड़ने के बाद नई देह को ग्रहण करती है। यह प्रक्रिया पुनर्जन्म की ओर इशारा करती है, जहाँ आत्मा पुरानी देह को छोड़कर नई देह में प्रवेश करती है। यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि जीवन की अस्थिरता और मृत्यु के बाद आत्मा का स्थानांतरण एक निरंतर प्रक्रिया है, और यह हमें जन्म और मृत्यु के रहस्यों को समझने में मदद करता है।
15॥8॥
भगवद गीता अध्याय: 15
श्लोक 9
श्लोक:
श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च।
अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते॥
भावार्थ:
यह जीवात्मा श्रोत्र, चक्षु और त्वचा को तथा रसना, घ्राण और मन को आश्रय करके -अर्थात इन सबके सहारे से ही विषयों का सेवन करता है।
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण जीवात्मा की प्रकृति और उसकी संवेदनाओं के माध्यम से विषयों के अनुभव के बारे में बताते हैं।
श्रोत्रं, चक्षुः, स्पर्शनं - ये तीन इंद्रियाँ हैं जिनके माध्यम से हम सुनते हैं, देखते हैं, और छूते हैं। ये हमारे अनुभवों के प्रारंभिक स्रोत होते हैं।
रसना, घ्राण - रसना का तात्पर्य है स्वाद की अनुभूति, और घ्राण से तात्पर्य है सुगंध की पहचान। ये इंद्रियाँ भोजन और सुगंध का अनुभव करने में सहायक होती हैं।
नोट:व्रत करने वाले के व्रत को भी यही इंद्रियाँ मान,बुद्धि,सुगंध द्वारा भोजन का अनुभव करवा कर व्रत करने वाले के व्रत को भंग कर देती है।
क्यों कि अधिष्ठाय मनश्चायं - जीवात्मा इन सभी इंद्रियों को सहारा लेकर अर्थात् इनकी सहायता से ही अपने मन और बुद्धि को इस शरीर के माध्यम से विभिन्न विषयों का अनुभव करवा ता है।
इस प्रकार, यह श्लोक हमें यह समझाता है कि हमारे इंद्रियाँ और मन किस प्रकार बाहरी संसार से प्राप्त अनुभवों का स्वाद चखते हैं। ये सभी इंद्रियाँ और मन मिलकर हमारे अनुभव को सम्पूर्णता प्रदान करते हैं और हम इनका उपयोग करके विभिन्न विषयों का सेवन करते हैं।
श्री कृष्ण के इस विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि जीवन में हमारे अनुभवों की समग्रता इंद्रियों और मन की क्रियाओं पर निर्भर करती है।
15॥9॥
भगवद गीता अध्याय: 15
श्लोक 10
श्लोक:
उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम्।
विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः॥
भावार्थ:
शरीर को छोड़कर जाते हुए को अथवा शरीर में स्थित हुए को अथवा विषयों को भोगते हुए को इस प्रकार तीनों गुणों से युक्त हुए को भी अज्ञानीजन नहीं जानते, केवल ज्ञानरूप नेत्रों वाले विवेकशील ज्ञानी ही तत्त्व से जानते हैं।
मूर्ख न तो समझ पाते हैं कि जीव किस प्रकार अपना शरीर त्याग सकता है, न ही वे यह समझ पाते हैं कि प्रकृति के गुणों के अधीन वह किस तरह के शरीर का भोग करता है। लेकिन जिसकी आँखें ज्ञान में प्रशिक्षित होती हैं, वह यह सब देख सकता है। विद्वान डॉक्टर ही बता देता है कि शरीर त्यागने वाला कितने दिनों का मेहमान है।समय तो भगवान के हाथ ही है
तात्पर्य : ज्ञान-चक्षुषः शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। बिना ज्ञान के कोई न तो यह समझ सकता है कि जीव इस शरीर को किस प्रकार त्यागता है, न ही यह कि वह अगले जीवन में कैसा शरीर धारण करने जा रहा है, अथवा यह कि वह विशेष प्रकार के शरीर में क्यों रह रहा है। इसके लिए पर्याप्त ज्ञान की आवश्यकता होती है, जिसे प्रामाणिक गुरु से भगवद्गीता तथा अन्य ऐसे ही ग्रंथों को सुन कर समझा जा सकता है। जो इन बातों को समझने के लिए प्रशिक्षित है, वह भाग्यशाली है। प्रत्येक जीव किन्हीं परिस्थितियों में शरीर त्यागता है, जीवित रहता है और प्रकृति के अधीन होकर भोग करता है। फलस्वरूप वह इन्द्रियभोग के भ्रम में नाना प्रकार के सुख-दुःख सहता रहता है। ऐसे व्यक्ति जो काम तथा इच्छा के कारण निरन्तर मूर्ख बनते रहते हैं, अपने शरीर-परिवर्तन तथा विशेष शरीर में अपने वास को समझने की सारी शक्ति खो बैठते हैं। वे इसे नहीं समझ सकते। किन्तु जिन्हें आध्यात्मिक ज्ञान हो चुका है,
वे देख पाते हैं कि आत्मा शरीर से भिन्न है और यह अपना शरीर बदल कर विभिन्न प्रकार से भोगता रहता है। ऐसे ज्ञान से युक्त व्यक्ति समझ सकता है कि इस संसार में बद्धजीव किस प्रकार कष्ट भोग रहे हैं। अतएव जो लोग कृष्णभावनामृत में अत्यधिक आगे बढ़े हुए हैं, वे इस ज्ञान को सामान्य लोगों तक पहुँचाने में प्रयत्नशील रहते हैं, क्योंकि उनका बद्ध जीवन अत्यन्त कष्टप्रद रहता है। उन्हें इसमें से निकल कर कृष्णभावनाभावित होकर आध्यात्मिक लोक में जाने के लिए अपने को मुक्त करना होता है।
इस लिए सच्चे ज्ञानी, जिन्होंने आत्मज्ञान प्राप्त कर लिया है, वे समझते हैं कि आत्मा न तो उत्पन्न होती है और न ही इसका विनाश होता है, यह शरीर के गुणों से परे है। वे आत्मा की अमरता और इसकी वास्तविक स्थिति को पहचानते हैं, जबकि सामान्य लोग केवल शरीर और उसकी गतिविधियों पर ही ध्यान केंद्रित करते हैं। अंत समय में भी उट पटांग ही बोलते रह जाते हैं।
इस प्रकार, इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण हमें यह सिखाते हैं कि सच्चे ज्ञान की प्राप्ति ही आत्मा के वास्तविक स्वरूप को पहचानने की कुंजी है और अज्ञान से मुक्ति की राह है।
नोट: जिसने सारी उम्र ही भगवान को नहीं भजा अंत तक गुरु जी गुरु जी ही करता रहा उसे गुरु भी अपने ही लोक तक ले जाता है जहां से उसे पुनः वापिस ही आना होता है। ब्रह्म लोक तक गया जीव वहां के सुख दुख भोग वापिस यही आता है। और भगवान को भोजने वाला शरीर त्याग भगवान को ही प्राप्त हो जाता है।
15॥10॥
अध्याय 15 के श्लोक नंबर 11
भगवद गीता अध्याय: 15
श्लोक 11
श्लोक:
यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम्।
यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः॥
भावार्थ:
यत्न करने वाले योगीजन भी अपने हृदय में स्थित इस आत्मा को तत्त्व से जानते हैं, किन्तु जिन्होंने अपने अन्तःकरण को शुद्ध नहीं किया है, ऐसे अज्ञानीजन तो यत्न करते रहने पर भी इस आत्मा को नहीं जानते।
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण योगियों और साधकों की मनोवृत्तियों की तुलना करते हैं। यहाँ पर, दो प्रकार के साधकों का उल्लेख किया गया है:
योगियों का दृष्टिकोण: इस श्लोक में कहा गया है कि जो लोग योग और साधना में लगे हुए हैं, वे आत्मा को तत्त्व से देखते हैं और उसे अपने हृदय में स्थित मानते हैं। वे आत्मा के शुद्ध स्वरूप को पहचानते हैं, क्योंकि उन्होंने अपनी साधना के माध्यम से अपने अंतरात्मा को साफ किया है और वास्तविकता को जानने की क्षमता प्राप्त की है। उनके लिए आत्मा का दर्शन सहज और स्पष्ट होता है।
अज्ञानी व्यक्तियों का दृष्टिकोण: इसके विपरीत, वे लोग जो साधना में प्रयासरत हैं, लेकिन जिन्होंने अपने अंतःकरण को शुद्ध नहीं किया है, वे आत्मा को नहीं देख पाते। उनका ज्ञान अधूरा और अशुद्ध होता है, इसलिए वे आत्मा के असली स्वरूप को नहीं पहचान पाते। ऐसे लोग केवल बाहरी प्रयास करते हैं, परन्तु उनकी आंतरिक स्थिति सही नहीं होती, इसलिए वे आत्मा के दर्शन में असमर्थ रहते हैं।
इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण ने यह स्पष्ट किया है कि केवल बाहरी क्रियाओं और प्रयासों से आत्मा की सच्चाई का अनुभव नहीं किया जा सकता। इसके लिए अंतरात्मा की गहरी सफाई और शुद्धता आवश्यक है। योग और साधना में सफलता का आधार आत्मा की वास्तविकता को जानने की आंतरिक क्षमता पर निर्भर करता है, न कि केवल बाहरी प्रयासों पर।
👉आत्म-साक्षात्कार को प्राप्त प्रयत्नशील योगीजन यह सब स्पष्ट रूप से देख सकते हैं। लेकिन जिनके मन विकसित नहीं हैं और जो आत्म-साक्षात्कार को प्राप्त नहीं हैं, वे प्रयत्न करके भी यह नहीं देख पाते कि क्या हो रहा है।👈
तात्पर्य : अनेक योगी आत्म-साक्षात्कार के पथ पर होते हैं, लेकिन जो आत्म- साक्षात्कार को प्राप्त नहीं है, वह यह नहीं देख पाता कि जीव के शरीर में कैसे-कैसे परिवर्तन हो रहे हैं।
इस प्रसंग में योगिनः शब्द महत्त्वपूर्ण है। आजकल ऐसे अनेक तथाकथित योगी हैं और योगियों के तथाकथित संगठन हैं, लेकिन आत्म-साक्षात्कार के मामले में खुद तो शून्य हैं। वे केवल कुछ आसनों में व्यस्त रहते हैं और यदि उनका शरीर सुगठित तथा स्वस्थ हो गया, तो वे सन्तुष्ट हो जाते हैं। उन्हें इसके अतिरिक्त कोई जानकारी नहीं रहती।
वे यतन्तोऽप्यकृतात्मान: कहलाते हैं। यद्यपि वे तथाकथित योगपद्धति का प्रयास करते हैं, लेकिन वे स्वरूपसिद्ध नहीं हो पाते। ऐसे व्यक्ति आत्मा के देहान्तरण को नहीं समझ सकते। केवल वे ही ये सभी बातें समझ पाते हैं, जो सचमुच योग पद्धति में रमते हैं और जिन्हें आत्मा, जगत् तथा परमेश्वर की अनुभूति हो चुकी है। दूसरे शब्दों में, जो भक्तियोगी हैं, वे ही समझ सकते हैं कि किस प्रकार से सब कुछ घटित होता है।
सांस लेना रोकना और छोड़ना कोई योग नहीं होता यह क्रिया तो सवता:भी होती ही रहती है।
योग तो आत्मा को परमात्मा में जोड़ने की कला है।जो इंद्रियों को अपनी वासनाओं को रोक कर आत्मा परमात्मा में जोड़ने है।
15॥11॥
भगवद गीता अध्याय: 15
श्लोक 12
श्लोक:
(प्रभाव सहित परमेश्वर के स्वरूप का विषय)
यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम्।
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम्॥
भावार्थ:
सूर्य में स्थित जो तेज सम्पूर्ण जगत को प्रकाशित करता है तथा जो तेज चन्द्रमा में है और जो अग्नि में है- उसको तू मेरा ही तेज जान।
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी दिव्य शक्ति और तेज के बारे में बताया है। इस श्लोक में तीन प्रकार के तेजों का उल्लेख किया गया है:
आदित्य में स्थित तेज़: यहाँ पर सूर्य के तेज़ की बात की जा रही है, जो सम्पूर्ण जगत को प्रकाशित करता है। सूर्य का तेज़ न केवल दिन को उजागर करता है, बल्कि सम्पूर्ण पृथ्वी के जीवन के लिए आवश्यक ऊर्जा भी प्रदान करता है।
चन्द्रमा में स्थित तेज़: चन्द्रमा का प्रकाश भी जीवन के विभिन्न पहलुओं को प्रभावित करता है। यह रात के समय में प्रकाश प्रदान करता है और कई प्राकृतिक प्रक्रियाओं जैसे ज्वारीय लहरों (ज्वार भाटा)को प्रभावित करता है।
अग्नि में स्थित तेज़: अग्नि, जिसे हम रोजमर्रा के जीवन में उपयोग करते हैं, भी एक प्रकार का तेज़ है। यह जलाने, तपाने और ऊर्जा प्रदान करने में सक्षम है।
इन तीनों प्रकार के तेज़ों का स्रोत भगवान श्रीकृष्ण की परम शक्ति है। वे बताते हैं कि जो तेज़ सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि में दिखाई देता है, वह वास्तव में उनकी ही शक्ति है। इस प्रकार, इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण अपने दिव्य तेज़ और परम सत्ता का परिचय देते हैं और यह संकेत देते हैं कि सम्पूर्ण सृष्टि में जो भी तेज़ और प्रकाश है, वह उनकी ही शक्ति का प्रतिरूप है।
भगवान कृष्ण ने अर्जुन को दिव्य तेज़ के बारे में बताया है।
दिव्य तेज़ का अर्थ है भगवान की दिव्य ऊर्जा या प्रकाश। यह भगवान की वह शक्ति है जो सारे ब्रह्मांड को रोशन करती है और जीवन को संचालित करती है।
भगवान कृष्ण ने दिव्य तेज़ के बारे में निम्नलिखित बातें बताई हैं:
1. _दिव्य तेज़ की उत्पत्ति_: भगवान कृष्ण ने बताया है कि दिव्य तेज़ की उत्पत्ति उनसे ही होती है। यह उनकी दिव्य ऊर्जा है जो सारे ब्रह्मांड को रोशन करती है।
2. _दिव्य तेज़ का स्वरूप_: भगवान कृष्ण ने बताया है कि दिव्य तेज़ का स्वरूप अत्यधिक प्रकाशमय होता है। यह प्रकाश इतना तेज़ होता है कि यह सारे ब्रह्मांड को रोशन कर देता है।
3. _दिव्य तेज़ का कार्य_: भगवान कृष्ण ने बताया है कि दिव्य तेज़ का कार्य सारे ब्रह्मांड को रोशन करना और जीवन को संचालित करना है। यह तेज़ सारे जीवों को ऊर्जा और जीवन प्रदान करता है।
4. _दिव्य तेज़ का महत्व_: भगवान कृष्ण ने बताया है कि दिव्य तेज़ का महत्व अत्यधिक है। यह तेज़ सारे ब्रह्मांड को रोशन करता है और जीवन को संचालित करता है। यह तेज़ सारे जीवों को ऊर्जा और जीवन प्रदान करता है।
संक्षेप में इस प्रकार, गीता के 15वें अध्याय में भगवान कृष्ण ने दिव्य तेज़ के बारे में विस्तार से यही बताया है। यह तेज़ भगवान की दिव्य ऊर्जा है जो सारे ब्रह्मांड को रोशन करती है और जीवन को संचालित करती है।
इस का तात्पर्य : अज्ञानी मनुष्य यह नहीं समझ पाता कि यह सब कुछ कैसे घटित होता है। लेकिन भगवान् ने यहाँ पर जो कुछ बतलाया है, उसे समझ कर ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। प्रत्येक व्यक्ति सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि तथा बिजली देखता है। उसे यह समझने का प्रयास करना चाहिए कि चाहे सूर्य का तेज हो, या चन्द्रमा, अग्नि अथवा बिजली का तेज, ये सब भगवान् से ही उद्भूत हैं। कृष्णभावनामृत का प्रारम्भ इस भौतिक जगत् में बद्धजीव को उन्नति करने के लिए काफी अवसर प्रदान करता है। जीव मूलतः परमेश्वर के अंश हैं और भगवान् यहाँ पर इंगित कर रहे हैं कि जीव किस प्रकार भगवद्धाम को प्राप्त कर सकते हैं।
इस श्लोक से हम यह समझ सकते हैं कि सूर्य सम्पूर्ण सौरमण्डल को प्रकाशित कर रहा है। ब्रह्माण्ड अनेक हैं और सौरमण्डल भी अनेक हैं। सूर्य, चन्द्रमा तथा लोक भी अनेक हैं, लेकिन प्रत्येक ब्रह्माण्ड में केवल एक सूर्य है। भगवद्गीता में (१०.२१) कहा गया है कि चन्द्रमा भी एक नक्षत्र है (नक्षत्राणामहं शशी)। सूर्य का प्रकाश परमेश्वर के आध्यात्मिक आकाश में आध्यात्मिक तेज के कारण है। सूर्योदय के साथ ही मनुष्य के कार्यकलाप प्रारम्भ हो जाते हैं। वे भोजन पकाने के लिए अग्नि जलाते हैं और फैक्टरियाँ चलाने के लिए भी अग्नि जलाते हैं। अग्नि की सहायता से अनेक कार्य किये जाते हैं। अतएव सूर्योदय, अग्नि तथा चन्द्रमा की चाँदनी जीवों को अत्यन्त सुहावने लगते हैं। उनकी सहायता के बिना कोई जीव नहीं रह सकता । अतएव यदि मनुष्य यह जान ले कि सूर्य, चन्द्रमा तथा अग्नि का प्रकाश तथा तेज भगवान् श्रीकृष्ण से उद्भूत हो रहा है, तो उसमें कृष्णभावनामृत का सूत्रपात हो जाता है। चन्द्रमा के प्रकाश से सारी वनस्पतियाँ पोषित होती हैं। चन्द्रमा का प्रकाश इतना आनन्दप्रद है कि लोग सरलता से समझ सकते हैं कि वे भगवान् कृष्ण की कृपा से ही जी रहे हैं। उनकी कृपा के बिना न तो सूर्य होगा, न चन्द्रमा, न अग्नि और सूर्य, चन्द्रमा तथा अग्नि के बिना हमारा जीवित रहना असम्भव है। बद्धजीव में कृष्णभावनामृत जगाने वाले ये ही कतिपय विचार हैं।
सबको प्रकाशित करनेवाली अग्नि, सूर्य आदि ज्योतियां भी किस परमपदको प्रकाशित नहीं कर सकतीं जिस परमपदको को प्राप्त हुए मुमुक्षुजन फिर दुनिया की ओर नहीं आते जैसे घट आदिके आकाश महाकाशके अंश हैं वैसे ही डिग्रीजनित भेदसे विभिन्न हुए जीव जिस परमपदके (कल्पितभावसे) के अंश हैं वह परमपदका सर्वतत्व और सर्व व्यवहार का आधारत्व बतलाने की इच्छा से भगवान के चार श्लोकों द्वारा संक्षिप्तसे विभूतियों का वर्णन किया गया है--जो तेजदीप्ति प्रकाश सूर्यमें स्थित हुआ अर्थात् सूर्यके सशक्त हुआ समस्त जगत को प्रकाशित करता है जो प्रकाश करने वाला तेज शशाक--चंद्रमा में स्थित है और जो अग्नि में भी वर्तमान है उस तेज को तू मुझे विष्णु की अपनी ही ज्योति रूप समझ। या जो तेज अर्थात चैतन्यमय ज्योति सूर्य कहाँ स्थित है? तथा चन्द्रमा एवं अग्नि कहाँ स्थित है?
उस तेजको तू मुझे विष्णुकी स्वकीय (चेतनमयी) ज्योति समझ। वह चेतनमयी ज्योति तो चराचर सभी लोको में समान भाव कहाँ स्थित है फिर यह कैसे बताएं कि कौन तेज सूर्य में स्थित है इत्यादि। --सत्त्व--स्वच्छताकी अधिकतासे उनमें अधिकता संभाव्य होने के कारण यह दोष नहीं है क्योंकि सूर्य आदिमें सत्त्वअत्यन्त प्रकाश अत्यधिकस्वच्छता है मूलतः उनमें ब्रह्मज्योति परम प्रत्यक्ष प्रतिभा विद्यमान है किस कारण से उस की बैटरी बदल गयी है। यह बात नहीं है कि कहीं कुछ बह्मज्योति अधिक है। जैसे दुनिया में देखा गया है कि समान भाव से सम्मुख सामने स्थित होने पर भी काष्ठ या आकृति आदि में मुख का प्रति बिम्ब नहीं दिखता पर दर्पण आदि पदार्थ जो सहजता से स्वच्छ और स्वच्छतर होता है वही तारतम्यसे स्वच्छ और स्वच्छंदतार दिखता है वैसे ही (इस विषय में भी समझो)।
15॥12॥
भगवद गीता अध्याय: 15
श्लोक 13
श्लोक:
गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा।
पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः॥
भावार्थ:
और मैं ही पृथ्वी में प्रवेश करके अपनी शक्ति से सब भूतों को धारण करता हूँ और रस स्वरूप अर्थात अमृत मय चन्द्रमा होकर सम्पूर्ण ओषधियों को अर्थात वनस्पतियों को पुष्ट करता हूँ
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने बताया है कि कैसे वे सृष्टि के प्रत्येक अंग में अपनी शक्ति का प्रवाह बनाए रखते हैं।
गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा:
यहाँ भगवान कहते हैं कि वे पृथ्वी (गाम) में प्रवेश करके सभी जीवों (भूतानि) को अपनी शक्ति (ओजस) से धारण करते हैं। इसका अर्थ है कि भगवान पृथ्वी में व्याप्त होते हैं और वहां के प्रत्येक जीव और वस्तु को अपने दिव्य शक्ति से संजीवनी प्रदान करते हैं।
पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे चंद्रमा (सोम) के रूप में बनकर सभी वनस्पतियों (ओषधि) को पोषित (पुष्ट) करते हैं। चंद्रमा का रस (रसायन) वनस्पतियों के लिए आवश्यक नमी और पोषण का स्रोत है, जिससे वे फल-फूलते हैं और जीवन में वृद्धि होती है।
इस प्रकार, श्लोक यह स्पष्ट करता है कि भगवान श्रीकृष्ण सृष्टि के प्रत्येक भाग में अपनी उपस्थिति और ऊर्जा बनाए रखते हैं, जिससे सृष्टि का सम्पूर्ण तंत्र सही तरीके से चलता है और जीवन में संतुलन बना रहता है।
15॥13॥
भगवद गीता अध्याय: 15
श्लोक 14
श्लोक:
अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः।
प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम्॥
भावार्थ:
मैं ही सब प्राणियों के शरीर में स्थित रहने वाला प्राण और अपान से संयुक्त वैश्वानर अग्नि रूप होकर चार
(भक्ष्य, भोज्य, लेह्य और चोष्य, ऐसे चार प्रकार के अन्न होते हैं, उनमें जो चबाकर खाया जाता है, वह 'भक्ष्य' है- जैसे रोटी आदि। जो निगला जाता है, वह 'भोज्य' है- जैसे दूध आदि तथा जो चाटा जाता है, वह 'लेह्य' है- जैसे चटनी आदि और जो चूसा जाता है, वह 'चोष्य' है- जैसे ईख आदि)
प्रकार के अन्न को पचाता हूँ
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अपने दिव्य स्वरूप का वर्णन कर रहे हैं। वे कहते हैं कि वे स्वयं वैश्वानर अग्नि के रूप में सभी प्राणियों के शरीर में स्थित होते हैं। वैश्वानर अग्नि शरीर के भीतर पाचन क्रिया का कार्य करती है। यह अग्नि प्राण और अपान वायु से मिलकर काम करती है, जो शरीर के भीतर अन्न के पाचन में मदद करती है।
वैश्वानर अग्नि एक प्रकार की आध्यात्मिक अग्नि है जो हमारे भीतर स्थित होती है। यह अग्नि हमारे शरीर के भीतर स्थित होती है और हमारे जीवन को संचालित करने में मदद करती है।
वैश्वानर अग्नि को अक्सर जठराग्नि के रूप में भी जाना जाता है, जो हमारे पेट में स्थित होती है और हमारे भोजन को पचाने में मदद करती है। लेकिन वैश्वानर अग्नि का अर्थ केवल जठराग्नि से ही नहीं है, बल्कि यह हमारे भीतर स्थित एक आध्यात्मिक शक्ति है जो हमारे जीवन को संचालित करने में मदद करती है।
वैश्वानर अग्नि के कुछ प्रमुख कार्य हैं:
1. _भोजन को पचाना_: वैश्वानर अग्नि हमारे भोजन को पचाने में मदद करती है।
2. _शरीर को ऊर्जा प्रदान करना_: वैश्वानर अग्नि हमारे शरीर को ऊर्जा प्रदान करती है।
3. _मन को शुद्ध करना_: वैश्वानर अग्नि हमारे मन को शुद्ध करने में मदद करती है।
4. _आध्यात्मिक विकास में मदद करना_: वैश्वानर अग्नि हमारे आध्यात्मिक विकास में मदद करती है।
वैश्वानर अग्नि को जागृत करने के लिए, हमें निम्नलिखित कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए:
1. _स्वस्थ भोजन_: हमें स्वस्थ भोजन खाना चाहिए जो हमारे शरीर को ऊर्जा प्रदान करे।
2. _नियमित व्यायाम_: हमें नियमित व्यायाम करना चाहिए जो हमारे शरीर को मजबूत बनाए।
3. _ध्यान खाना खाते हुए पहले भगवान को भोग लगवा कर ही ग्रहण करे। नमस्कार करके भोजन ग्रहण करे
4. _आध्यात्मिक अभ्यास_: हमें आध्यात्मिक अभ्यास करना चाहिए जो हमारे आध्यात्मिक शक्ति को बढ़ाने के लिए आप आओ प्रभु मेरे साथ भोजन ग्रहण करें।
अर्थात: आध्यात्मिक अभ्यास करने के लिए, हमें अपने दैनिक जीवन में कुछ आध्यात्मिक गतिविधियों को शामिल करना चाहिए। यहाँ कुछ और सुझाव दिए जा सकते हैं:
आध्यात्मिक अभ्यास के लिए सुझाव
1. *प्रार्थना और ध्यान*: अपने दिन की शुरुआत प्रार्थना और ध्यान से करें। इससे आपको अपने दिन की शुरुआत सकारात्मक और आध्यात्मिक तरीके से करने में मदद मिलेगी।
2. *आत्म-चिंतन*: अपने दिन के अंत में आत्म-चिंतन करें। इससे आपको अपने दिन की गतिविधियों का मूल्यांकन करने और अपने जीवन में सुधार करने में मदद मिलेगी।
3. *आध्यात्मिक पुस्तकें पढ़ना*: आध्यात्मिक पुस्तकें पढ़ने से आपको अपने आध्यात्मिक ज्ञान को बढ़ाने में मदद मिलेगी।
4. *आध्यात्मिक संगीत सुनना*: आध्यात्मिक संगीत सुनने से आपको अपने मन को शांत और आध्यात्मिक तरीके से जोड़ने में मदद मिलेगी।
5. *प्रभु के साथ संवाद करना*: प्रभु के साथ संवाद करने से आपको अपने आध्यात्मिक जीवन में गहराई और अर्थ प्राप्त करने में मदद मिलेगी। जैसा कि कहा, "प्रभु मेरे साथ भोजन ग्रहण करें।"
भक्ष्य - जो अन्न चबाकर खाया जाता है, जैसे रोटी।
भोज्य - जो निगला जाता है, जैसे दूध।
लेह्य - जो चाटा जाता है, जैसे चटनी।
चोष्य - जो चूसा जाता है, जैसे ईख।
इस प्रकार, भगवान श्रीकृष्ण यह स्पष्ट कर रहे हैं कि वे ही संपूर्ण पाचन क्रिया के आधार हैं और अन्न के चार प्रकारों को पचाने में मदद करते हैं। यह श्लोक यह भी दर्शाता है कि भगवान की उपस्थिति और क्रियाएँ हर जीव में व्याप्त हैं और उनके बिना कोई भी पाचन प्रक्रिया पूर्ण नहीं हो सकती।
15॥14॥
भगवद गीता अध्याय: 15
श्लोक 15
श्लोक:
सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टोमत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च।
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्योवेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्॥
भावार्थ:
मैं ही सब प्राणियों के हृदय में अन्तर्यामी रूप से स्थित हूँ तथा मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और अपोहन
(विचार द्वारा बुद्धि में रहने वाले संशय, विपर्यय आदि दोषों को हटाने का नाम 'अपोहन' )
होता है और सब वेदों द्वारा मैं ही जानने योग्य
(सर्व वेदों का तात्पर्य परमेश्वर को जानने का है, इसलिए सब वेदों द्वारा 'जानने के योग्य' एक परमेश्वर ही है)
हूँ तथा वेदान्त का कर्ता और वेदों को जानने वाला भी मैं ही हूँ
गुरु से भी उत्तम गुरु भगवान खुद ही हैं
"मैं सभी जीवों के हृदय में, अन्तर्यामी रूप में स्थित हूँ। मेरी ही उपस्थिति से सभी को स्मृति (याद रखने की शक्ति), ज्ञान (सच्चा ज्ञान) और अपोहन (बुद्धि में रहने वाले दोषों का नाश) प्राप्त होता है। अर्थात्, यह सब मेरे द्वारा ही संभव होता है। सभी वेदों द्वारा मैं ही जानने योग्य हूँ, क्योंकि वेदों का परम उद्देश्य मुझे जानना है। मैं वेदान्त (वेदों का अंतिम भाग) का निर्माता और वेदों को जानने वाला भी हूँ।"
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने यह स्पष्ट किया है कि वे सभी प्राणियों के हृदय में स्थित हैं और वे ही स्मृति, ज्ञान और अपोहन के स्रोत हैं। इसके अलावा, वेदों का ज्ञान भी भगवान श्रीकृष्ण पर ही आधारित है, और वेदांत का निर्माता भी वही हैं। यह श्लोक भगवान की सम्पूर्णता और उनकी सार्वभौमिकता को दर्शाता है, जो सभी विद्या और ज्ञान का स्रोत हैं।
15॥15॥
भगवद गीता अध्याय: 15
श्लोक 16
श्लोक:
(क्षर, अक्षर, पुरुषोत्तम का विषय)
द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते॥
भावार्थ:
इस संसार में नाशवान और अविनाशी भी ये दो प्रकार
(गीता अध्याय 7 श्लोक 4-5 में जो अपरा और परा प्रकृति के नाम से कहे गए हैं तथा अध्याय 13 श्लोक 1 में जो क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के नाम से कहे गए हैं, उन्हीं दोनों का यहाँ क्षर और अक्षर के नाम से वर्णन किया है)
के पुरुष हैं। इनमें सम्पूर्ण भूतप्राणियों के शरीर तो नाशवान और जीवात्मा अविनाशी कहा जाता है
क्षर पुरुष: यह संसार के भौतिक रूप से संबंधित है, जो नाशवान है। इसका मतलब है कि यह सब भौतिक तत्व, प्राणी, और उनके शरीर (शरीर के सभी हिस्से, जीवित और निर्जीव) अस्थायी और बदलने वाले होते हैं। जैसे कि यह दुनिया, हमारे शरीर, और सभी भौतिक वस्तुएं समय के साथ बदलती हैं या नष्ट हो जाती हैं।
अक्षर पुरुष: यह जीवात्मा (आत्मा) का स्वरूप है, जो अविनाशी और शाश्वत होता है। अक्षर पुरुष का मतलब है कि आत्मा, जो कि हमारे वास्तविक स्वभाव का प्रतिनिधित्व करती है, नाशवान नहीं होती। यह स्थायी और अमर है, और इसका अस्तित्व सदा रहता है।
इन दोनों पुरुषों के बीच का अंतर इस बात को दर्शाता है कि भौतिक संसार और आत्मा (आध्यात्मिक संसार) के गुण और स्वभाव बिल्कुल भिन्न होते हैं। भौतिक संसार क्षणिक और परिवर्तनशील है, जबकि आत्मा स्थायी और शाश्वत है।
इस प्रकार, यह श्लोक हमें समझाता है कि संसार में जो कुछ भी भौतिक है, वह अस्थायी है और जो कुछ भी आत्मा का हिस्सा है, वह शाश्वत है। इस तरह, हमें समझना चाहिए कि हम कौन हैं और इस भौतिक संसार की अस्थिरता से परे हमारी वास्तविक पहचान क्या है।
15॥16॥
भगवद गीता अध्याय: 15
श्लोक 17
श्लोक:
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः।
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः॥
भावार्थ:
इन दोनों से उत्तम पुरुष तो अन्य ही है, जो तीनों लोकों में प्रवेश करके सबका धारण-पोषण करता है एवं अविनाशी परमेश्वर और परमात्मा- इस प्रकार कहा गया है।
श्लोक का संदेश: श्रीकृष्ण यहाँ यह स्पष्ट कर रहे हैं कि "उत्तम पुरुष" केवल एक ही है, जो सभी ब्रह्मांडों में व्याप्त है और सभी जीवों का पालन करता है। यह वह परमेश्वर है जो सृष्टि के सभी प्रपंचों से परे है और इसका अस्तित्व कभी समाप्त नहीं होता।
15॥17॥
भगवद गीता अध्याय: 15
श्लोक 18
श्लोक:
यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः।
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः॥
भावार्थ:
क्योंकि मैं नाशवान जड़वर्ग- क्षेत्र से तो सर्वथा अतीत हूँ और अविनाशी जीवात्मा से भी उत्तम हूँ, इसलिए लोक में और वेद में भी पुरुषोत्तम नाम से प्रसिद्ध हूँ
यहां इस प्रकार, भगवान श्रीकृष्ण यह घोषणा कर रहे हैं कि वे संसार और वेदों में ‘पुरुषोत्तम’ अर्थात् सर्वोत्तम पुरुष के रूप में प्रसिद्ध हैं।
इस श्लोक के माध्यम से श्रीकृष्ण यह स्पष्ट करते हैं कि वे न केवल भौतिक संसार की सीमाओं से परे हैं बल्कि आत्मा और परमात्मा के भी पार हैं। वे सम्पूर्ण सृष्टि के सबसे सर्वोच्च तत्व हैं।
15॥18॥
भगवद गीता अध्याय: 15
श्लोक 19
श्लोक:
यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम्।
स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत॥
भावार्थ:
भारत! जो ज्ञानी पुरुष मुझको इस प्रकार तत्त्व से पुरुषोत्तम जानता है, वह सर्वज्ञ पुरुष सब प्रकार से निरन्तर मुझ वासुदेव परमेश्वर को ही भजता है
15॥19॥
भगवद गीता अध्याय: 15
श्लोक 20
श्लोक:
इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ।
एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत॥
भावार्थ:
हे निष्पाप अर्जुन! इस प्रकार यह अति रहस्ययुक्त गोपनीय शास्त्र मेरे द्वारा कहा गया, इसको तत्त्व से जानकर मनुष्य ज्ञानवान और कृतार्थ हो जाता है
15॥20॥
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन संवादे पुरुषोत्तमयोगो नाम पञ्चदशोऽध्यायः
॥15॥
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