जाए भोले नाथ
शिव जी का दसवां अध्याय श्री रामचंद्र
पूर्वे है
इस नहीं में ये जी कहाँ वर्तमान में ये कहां से उत्पन्न होता है और इसका क्या रुख है तो आप कहीं देहांत में यह कहा जाता है और जाकर कहा इससे सकता है और फिर रहे में किस प्रकार आता है
या नहीं आता तो आप श्री श्रीभगवान भी हे महाभाग बहुत अच्छी बात जी ने जो गुप्त से भी घूमते हैं
जिसे इंद्रा देवी देवता और ऋषि भी कठिनता से नहीं जान सकते हे रघुनन्दन मैं भी यह किसी दूसरे से कहना नहीं चाहता परंतु तुम्हारी भक्ति से प्रसन्न होकर मेहता में ही सत्य ज्ञान स्वरूप सानंद परमानंद
परमात्मा पर झूठे माया से मोहित जीवों को न दिखने वाला संसार का कारण नित्य विशुद्ध संपूर्ण का आत्मा सर्वान्तर्यामी निस्संग क्रिया रहे थे सब धर्मों से पर ही मन से भी पर ही मुझे कोई इंद्रिय ग्रहण नहीं कर सका
थी में संपूर्ण का ग्रहण करने वाला हूँ में सम्पूर्ण लोग को चाहता हूं
और मुझे कोई नहीं जानता में संपूर्ण विकारों से रहित वाले यौवन आदि परिणाम आदि विकार भी मुझे में ही जहाँ मन के सहित जाकर वाली निवृत हो जाती है
आनंद ग्रहण मुझको प्राप्त होकर ये प्राणी फिर कहीं से भी भाई को प्राप्त होता है
जो सम्पूर्ण प्राणियों को मुझमें देखता है और मुझे सम्पूर्ण प्राणियों में दिखता है लिंडा रहित जाता है जिसको सम्पूर्ण प्राणी आत्मा रूप दिखती ही पुष्कर व क्र एक रूप देखने वाले को शोक और मुंह भी होता
यह सम्पूर्ण भूतों में गुप्त रूप आत्मा प्रकाशित भी उठता हूँ
संपूर्ण में वर्तमान ही सूक्ष्मदर्शी श्रवण मनन निदिध्यासन साधना करने वाले पुरुष को अगर बुद्धि से दिखता है
दूसरे मनुष्यों को नहीं दिखता है
अनाज माया से युक्त निर्विकार अविनाशी एक में ही नाम रूप रहित ड्रम जगत का करता और शेयर हूं पर कहा अविद्या के साक्षी भुंतर ज्ञान पर स्वप्न में त्रिलोकी की कल्पना की जाती है
इसी प्रकार मुझे यह सब जगह उत्पन्न ही दिखता भी पाता और लय हो जाता है
अनेक प्रकार की अविद्या के आश्रय होकर जीव रूप से भी में ही निवास करता हूं पाँच करने देंगे और पाँच भी इन्द्रिय मन बुद्धि का चरित्र के चारों पंच रहा यह सब मिलकर लेकिन शरीर को उत्पन्न करती ली
फीलिंग्स शरीर भी अभी घर युक्त के चेतन ने कहा पृथ्वी पड़ता है
उसी को व्यवहार में जी क्षेत्र के और पुरुष ही वहीं जी अनादिकाल से पुण्य पाप से निर्मित हुए इस स्थावर जंगम आदि देशों में निवास कर शुभ अशुभ कर्म का फल है उसी को और लोग भी तथा वही
जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति इन अवस्थाओं का भाव है
झेली थी पर के अलग होने में मुखर्जी मलिन लिखा है
इसी प्रकार अन्तः करण के देशों से आत्मा विकारी काफी अन्तः करण और भी इन दोनों के परस्पर अभ्यास के कारण और एक भाव का अभिमान कर से परमात्मा भी दुखी सा प्रतीत होता है
वास्तव में सब दुख का धन अन्तः करण रही है
जी में नहीं परन्तु जिस पर कहा चंद्रमा का पृथ्वी जल में पढ़ने से में चलकर चलायमान होने से चलायमान वितरित का इसी प्रकार अन्तः करण के सुख दुख होने से वहीं झील में जिस प्रकार मारवाड़ देश मिली
दोपहर के समय सूर्य की किरण रेस में पढ़कर जल रूप से प्रति प्रति है
उसमें केवल अज्ञान से जाना जाता है
वो जल्द रूप नहीं वास्तव में संताप की करने जा रही हैं
इसी प्रकार आत्मा भी निर्देश है
परंतु है मूल बुद्धि वालों को अधिक किया और अपने दोष के कारण करता भोक्ता प्रतीत होता है
अन्य में फिर लिखे इस भूल नहीं में हृदय के विषय थी
रहता है
और न कि अगर वहां से लिखकर शिखा पर्यंत या हो रहा है
सावधान होकर वहीं एक ही वह में मनुष्य में ब्रह्मा इत्यादि अभिमान करता हुआ इस माह के भी इस चिट्ठे न ही से ऊपर से नीचे अवकाश के स्थान को व्याप्त करके स्थित रहता है
इतनी ही स्थान के बीच मिला है
जिसे का स्वरूप डंडे सहित कोमल कली की संभावना है
उसका मुख नीचे को है उसमें सोची और सुंदर एक छिद्र है
उसी को वह का थी
उसमें भी रहता है
केश के अग्रभाग का कौमों भागकर फिर उसका भी सोमा भास्कर की जो प्रमाण किया जाए वही सूक्ष्मता जीवों की जानी चाहिए
वस्तुतः जीव के स्वरूप का प्रमाण है कि ऐसा है और न ही जिस प्रकार कदम के फूल को भी आई चारों ओर की थी
इसी प्रकार से हृदय थानवी
नारी मिलकर ही वे एक और बल को देखती ही इस कारण उनकी फिर संध्या है
योगी ही नहीं उन गाड़ियों की संख्या बहत्तर से है
कही है
जिस प्रकार सूर्य से किरण निर्गत रहती है इसी प्रकार से वे नारी हृदय से निकली ही उनमें एक सौ एक मुख्य नारी ही नहीं सम्पूर्ण शरीर को वे शुरू कर दिया है
ऑफर थे कि इन्द्रियों में दस दस नाही
उन्हीं के द्वारा विषयों का अनुभव होता है
यह नारी सुख दुख जाग्रत स्वप्न आदि की साक्षात का कारण भी जिस प्रकार नदी जल को बढ़ाती है इसी प्रकार नारी सुख दुख रूप फल को भारतीय है
एक सौ एक नारियों में से एक नारी ऊपर अनंत नाम है और ब्रह्मरंध्र तक पहुंच गई है
जो को अर्थात सुषुम्ना नाम नारी है उसमें प्राप्त होकर यह जी मुक्त हो जाता है
जिस समय भी अन्तः करण कर आदि दोषी नहीं है
उस समय या कुलकर्णी श्री योगी का आत्मा इस नारे में प्राप्त होता है
परंतु समय सद्गुरु की कृपा और पूर्ण ज्ञान की आवश्यकता है कहा कि ज्ञान द्वारा मुक्ति फिरा जाती है
जिस प्रकार से राहुल अदृश्य रहकर भी चंद्र मंगल दिखता है
इसी प्रकार करवट रहने वाला आत्मा से ही में ही प्रतीत था है
या फिर भी वे सर्वत्र फूल और निश्चल रहे परन्तु वे जागृत अवस्था में घट आदि पदार्थों का चेतन में पृथ्वी में युक्त होने से अंतःकरण रखती से व्याप्त होकर चंचल का था
जिस प्रकार भी दूरी दसों दिशाओं को व्यापक करता है
इसी प्रकार निष्क्रिय कर पदार्थों में व्याप्त लिंग रहे के संबंध से उत्पन्न हुई अंतःकरण की वृत्ति नारियों द्वारा बाहर जाकर विषयों में रात को उन्हें प्रकाश करती है
अपने की उन कर्मों के अनुष्का जाग्रत अवस्था में सुख दुख का साक्षात का जी करता रहता है
कम फूल वृद्धि लिंग शरीर से है
जब तक मोक्ष न हो तब तक लिंग शरीर का नाश नहीं होता जिस समय ज्ञान द्वारा जीव और ब्रह्म का भी मिल जाएगा और अविद्या सहित इस शरीर का नाश जाएगा
उस समय केवल आत्मा का अनुभव मात्र अहं ब्रह्मास्मि इस रूप में स्थिर होने पर ही नहीं उठता है
जिस पर का घटकर उत्पन्न होते ही घटिया काश उसमें प्राप्त हो जाता है
और उसके नष्ट होने से वे अपने स्वरूप को मिली अवस्थान करता है
इसी प्रकार माया के नष्ट होने से आत्मा अपने स्वरूप को मिली अवस्था करता है जब जागृत अवस्था में भोग देने वाले कर्मों का क्षय होकर स्वप्न काल में वोट देने वाली कर जागृत करने के दिए गए आदि विषय के साक्षात
नेपाली ज्ञान को छुपाकर जब जागृत होते ही था
यह झील क्रीड़ा करो
इस प्रकार भी परमेश्वर की इच्छा से और अनुभव किया हुआ स्वप्न में के विषय का जागृत होने पर यह माया भी अभिनेत्रियों का भी जी माया की निद्रा के योग भी जाग्रत अवस्था में भी कपल से भिन्न करो अवस्था की ओर देखता है
घटबढ़ आदि विषय बहुत ही आहे
और सफल में की गोद देने वाले पदार्थ की तमाम सप्तशती अन्तः करण ने कल्पना भी जिस
का एक मनुष्य होने में अनेक मनुष्य ही का गौरव गुप्ता और संसार की सब रचना भिन्न भिन्न जानता है
यथार्थ में एक ही है
इसी प्रकार वास्तविक आत्मा है परन्तु अन्तः करण की कल्पना भी यह जगत अनेक भाव से दिखता है
इन सबको देखने वाला स्वयं झूठ आत्मा साक्षी रूप से
था में करण आदि सब पदार्थो की वासना भाव से की हुई असत्य होने दें वे रात आरोपी गए और परमात्मा उसी स्थान थानवी वासना मात्र से साक्षी है जिस प्रकार जागृत अवस्था में कर्ता कर्म किया
एक संपूर्ण कारणों से युक्त व्यवहार चलता है इसी प्रकार पूर्वांचल के एक कर्मों की प्रेरणा से गार्टनर रूप प्रपंच है
परंतु जागृत अवस्था में प्रपंच व्यवहार कमाना होता है और स्वप्नावस्था में कल फिर से यही रहे थे
संपूर्ण बुद्धि वृत्ति का साक्षी आत्मा स्वयं ही प्रकाश करता है
उसका का जो वासना मात्र साक्षी बना दे
स्वप्न कहते ही बाल्यावस्था में जागृत झुककर स्तनपान कंदुक क्रीड़ा अधिक ही उस कर रही उसी की वासना फिर वे प्रबल रहती है इस कारण वे ही लिखते ही और तरुण अवस्था में इन्द्रिय अपने व्यापार में
कुशल हो जाती है
यह ब्रांड अनेक व्यापार में व्यग्र हो जाता है
अध्ययन कृषि व्यापार आदि की वासना हृदय में अत्यंत उद्धरण जाती है इस कारण तद्रूप भी स्वप्न देखता है
और जो वृद्धावस्था में परलोक जाने के निमित्त दान धर्म विद्यार्थी धान ऐसे तब कम करते ही उनके हृदय में यह वासना दृढ़ हो जाती है तो प्रायः यह भी इसी प्रकार के देखा करते ही कि हमने ग्रहण किया इस प्रकार है
लोक की प्राप्ति हुई जिस प्रकार भी शेल पक्षी आकाश में भ्रमण करते करते जब थक जाता है तब विश्राम का और कोई उपाय नहीं देख कर निस पंखों को सिकोड़कर अपने घोंसले में विश्राम कर देता है इसी प्रकार जाग्रत और
स्वप्नावस्था में विचरने थी जब आत्मा शांत होता है तब संपूर्ण इंद्रियों के शिथिल होने से सब साधनाओं को ले कर देता है
अर्थात संपूर्ण इंद्रियों के व्यापार को समाप्त कर निवृत जाता है
नारियों के मार्ग से इंद्रिय की वासना को आकर्षण जागरण और सौंपा व्यवस्था के सब कार्य समाप्त कर आत्मा लिए जाता है जिसे कर रही यह माया से अच्छा से लेकर शैतान ने और व्याकरण स्वरूप को में लगा रहता है
उस समय संपूर्ण प्रपंच ले जाता है
परंतु यह अत्यंत नहीं इसमें केवल कार्य रोग का नाश का कारण रूप वासना बनी रहती है
जिस पुरुष की किसी भी स्त्री की अत्यंत इच्छा हो और वह उसे प्राप्त हो जाए उसके संभोग से जो सुख हो जाता है उसकी मां है परन्तु उससे कहीं अधिक सुख निद्रा अवस्था में जीव को आनंदमय कोष में प्राप्त होने का
जब जीव की गाय विषयों का ज्ञान नहीं होता वे अंततः था मोक्ष की अवस्था के समान जिसमें विषय वासना अत्यंत में वृद्धि होती है निवृत्त वासना वाला नहीं होता दूसरा कुछ भी न जाना केवल
ज्ञान का ही अनुभव किया परन्तु यह ज्ञान भी साक्षी आदि की दृष्टि से अनुभव किया जाता है
क्योंकि से सोया यदि साक्षी न हो तो सुख से सोने की मूर्ति किसी प्रकार भी हो सकती क्योंकि प्रगाढ़ निद्रा में सोते समय तो उसे सुख का अनुभव था न ही उसके पश्चात जागृत होकर साक्षी के द्वारा जानता जा है
स्वप्न सुषुप्ति अवस्था जैसी इस लोग की है जैसी भी ही सृष्टि के अंत में जब जागृत अवस्था आती है तो अपनी कारण झील के प्रारब्ध कर्म से फिर निर्दलीय इस प्रकार जाग उठती है
जिस प्रकार अग्निदेव चिंगारियां उठने लगती इसी का सूक्ष्म रूप में लीन हुई इन्द्रिय में मिली थी जिस पर का जल भरा हुआ घड़ा जल में डुबा तो और यदि उसे फिर से निकाल लो तो है उस जल से भरा ही आता है
इसी प्रकार से यह जीवात्मा इंद्री आदि सहित कारण में लय को प्राप्त हो उन इन्द्रियों सहित ली जागृत अवस्था को प्राप्त होता है जी ईश्वर ये दोनों वास्तव में एक ही रूप से परंतु अभी भी आगे प्रपंच से उन मिली
प्रतीत होता है
अविद्या न जाए तो ऐसा नहीं होता उसका
एक रूप में जाते ही जिस प्रकार थी
जल आदि पदार्थों से पृथ्वी से ही अनेक रूप दिखता है और झलकी चलायमान होने दी सूर्य आदि में ही चंचलता प्रतीत होती है इसी प्रकार को ट्रस्ट एक जीवात्मा ईश्वर एक ही है
और अनेक देशों में विविध रूप से प्रविष्ट होकर अनेक रूप को और गमनागमन भी रूप से नहीं दिखता है
वे आदि उपाधि से रहित सौ प्रकाश है परन्तु स्वरूप की स्मृति लोप को करने वाली माया ने विस्मृति को प्राप्त कर दिया कि इससे से का प्रपंच इसमें अज्ञान अज्ञात विविधता ने कहा कि यह माया तो
न होने वाली बात को भी करके दिखा देती है
माया के योग भी आत्मा में कितनी ही विरुद्ध कम थी
परन्तु माया की दूर होते ही जीव ईश्वर और ने भी कहा जाता है
भोले बाबा की जय हो
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