विराट स्वरूप शिव गीता
शीर्ष गीता का आत्मा तिहाई श्रीरामचंद्र बोली हे भगवन जो कुछ मैंने प्रश्न किया गया तो उसी प्रकार फिर है महेश है
आपने इस विषय का कोई उत्तर नहीं दिया है महेश है आपका नहीं पर छिन्न परमाणु अर्थात यकता करने के योग्य हैं
सब संसार की उत्पत्ति पालन न करते तो इसी प्रकार अपने अपने अधिकार के पालन करने वाले इंद्र वरुण आदि सब देवता तुम्हारी से में कहती रहती हैं और वे सब देवता और चौदह भुवन कि मैं ही हूं
ऐसा जो तुम कहते कहते कहते हो अर्थात जब तक उपाधि है तब तक जी ईश्वर आदि का अभी
संभावित नहीं होता हो
झड़प पंच महाभूतों में चेतना का ताजा टर्म में संभावित नहीं भेद नहीं आपसे सुनना परंतु संदेह नहीं जाता है
एक शिष्ट का निश्चय ही उस अंधे की दूर करने को आप ही समर्थ श्रीभगवान बोली सूक्ष्म के बीच में जिस स्त्री का महान गुटका सदा रहता है
और उसी ही भी
निकल भी था है
यदि ऐसा न हो तो बताओ यह रच कहां से आता है
इसी प्रकार मेरे सूक्ष्म शरीर सब भूतों का पालन और नाश होता है
जिस प्रकार से जल के बीच में स्वयं ही का खंड डालने से वे उस में विलीन हो जाता है और दिखता नहीं फिर जल को अगली में गर्म करने से व पूर्वक प्राप्त हो जाता है
अर्थात जैसी पवित्र दिन सूरज प्रकाश उत्पन्न होता और संध्या में विलीन जाता है
इसी प्रकार मुक्ति जगह से उत्पन्न होकर जुड़ी नहीं जाता है
और मुझे में ही स्थित रहता है
सुहृद रहा तुम्हें ऐसा हो श्री रामचंद्र बोली हे भगवन आपने दृष्टांत से प्रतिपादन किया परन्तु जिस प्रकार दिशाओं के भ्रम वाले को उतर आते दिशाओं का भ्रम हो जाता है इसी प्रकार मुझे ग्राम हो गया है
वह निवृत नहीं गुप्ता मैं क्या करूं
श्री भगवान बोली हे लाभ जिस प्रकार यह चराचर जगत मुझे वर्तमान में सो मैं तुमको दिखाता हूँ परन्तु तुम उसे देखने में समर्थ नहीं इसी कारण उसके देखने को मैं तुम्हें दिव्य नेत्र लेता उन्नीस
भी भय त्याग कर तुमने रहा दिव्य स्वरूप देखो न रहें या देवता इस मेरे टेस्टबुक को मेरे बिना अनुग्रह के चर्म चक्षुओं से ही नहीं देख सकती तो जी कहते हैं ऐसा कहकर शिवजी ने रामचंद्र को दिव्य नेत्र
ही और पास साल की समान भरा विस्तृत मुख रामचंद्र दिखाया करोड़ों बिजली के समान प्रकाशमान अतिशय दायक भयंकर उस रूप को देखते ही रामचंद्र जंघाओं के बल से कुछ भी नहीं बैठ गई
घृणा और दंडवत करके शिव जी को बार बार प्रकटन करने लगी फिर महाबली रामचंद्र उठकर जब देखते हैं तब तक तिरुपुर घाटी शिव जी के मुख में करोड़ों ब्रह्मांड प्रलय काल की अग्नि में व्याप्त होकर चटका पक्षी थी
पंखों के समान की सुनहरी मंदराचल विंध्याचल पर्वत साथ समुद्र चंद्र सूर्य आदि संपर्क रहे पाँच महाभूत और शिव जी के साथ आए हुई सब देवता भगवान भरे बड़े पर चौदह चौवन इस प्रकार रामचंद्र नहीं
प्रत्येक ब्रह्मांड को भी कर उन्हें पूर्व काल में हुआ देवता और असुरों का संग्राम देखा विश्व के दस था और उनके कर्तव्य कर्म सुबाथू रावण वध आदि युद्ध में देवताओं की पराजय शिव जी का त्रिपुरासुर को मार
वरना इसी प्रकार उत्पन्न हुई संपूर्ण जीवों का लाइनें कर रामचंद्र भयभीत हो बार बार प्रणाम कर भी न कि यद्यपि रामचंद्र को तत्त्वज्ञान भी हो गया था तथापि वे गए
तब उपनिषदों का कहा और अर्थ रूप भारी श्री शिव जी की स्तुति करने की श्री रामचंद्र बोली हे विशेष
शरणागत दुख नाशक एक शेखर प्रसन्न भी और संसार के भाई दी मुझे अनाथ की रक्षा की थी
शंकर यह भूमि और इस पर उत्पन्न होने वाले वृक्ष आदि सब से ही उत्पन्न भी यह सब भेजते आप ही में इस चित्र थी
अंत में इस तरह आप ही में इससे हो जाती हैं ब्रह्मा इंद्र एकादश रूद्र मरोडकर गंधर्व यक्ष असुर से गंगा आदि नदियां सागर ये सब शूल धारण करने वाली आपके मुंह में
दिखती है
चंद्रमोहन तुम्हारी माया से कल्पित हुआ यह दृश्य तुम्हारे ही स्वरूप में कृति था है
इस भ्रांति युक्त होकर पुरुष इस प्रकार से दी ही जिस प्रकार भी शक्ति में रक्षक का और रस्सी में स्तर का भ्रम उत्पन्न होता है
वे भ्रांति ऐसी नहीं है
यह जैसी भ्रांति होती है वे पदार्थ अन्यत्र फिर होता है
और नहीं भी होता जैसे शक्ति रजत की भ्रांति हुई परन्तु रूप पदार्थ दूसरे स्थान में वृद्धि के वैसी करते हैं तुम्हारे रूप से बचकर अन्यत्र नहीं दिखता इसी से लोग इस को शिफ्टिंग का रजत व दुगना हो
मांगते ही आप अपने पीसी सब जगह व्याप्त और प्रकाशित करते ही ढेर थी
आपके प्रकाश के बिना तो सम्पूर्ण जगत क्षण मात्र में अदृश्य जाए जिस प्रकार भी राज्यों में के भ्रांति सहायक होती है यद्यपि वहाँ वास्तव में कर खुद उत्पन्न नहीं होता और भ्रम के नाश होने पर स्तर का
नाश नहीं होता यह था कि है कि जो उत्पन्न नहीं हुआ उसका नाश नहीं होता परन्तु यह भय देने वाला होता है
इसी प्रकार तुम्हारी माया से जिसका अस्तित्व प्राप्त हुआ से ऐसे ही जगत मिथ्या भ्रांति के कार्य को सत्य उत्पन्न करता है
जिन्हें तुम्हारा शरीर जगत का आधारभूत दिखता नहीं यदि विचार दृष्टि से देखा जाए तो यह ज्ञान दृष्टि की कल्पना भी कारण कि तुम सच्चिदानंद स्वरूप को और सर्वत्र को कहना है तो कर्मकांड पड़ता
तक सर्व शक्ति व्यर्थ नहीं और ऐसा नहीं के इस सपूत उदाहरण अध्ययन आदि कर्मों का फल चूककर्ता को देखती हूँ ये कर्मकांड पर विश्वास रखने का फरमान के पर
महापुण्य के उदय से जो ब्रह्म का साक्षात्कार होता है
और ये सब प्रपंच तुम से अभिन्न दिखने लगता तब तुम क्यों कर्मों का फल थे
था नहीं देती तब कर्मकांड प्रतिपादक कथा प्रसिद्ध हो जाती है
ज्ञान ही अविचारी पुरुष ही पूजा यज्ञ आदि भाई करम से ही संतुष्ट होते हैं
ऐसा कहते ही परन्तु यह ठीक नहीं कहा कि जो अमूर्तन परमाणु रहे हैं
और अनंत है उसको रोक की इच्छा नहीं थी इसी प्रकार किंचित बेलपत्र पत्र यह चुल्लू भर जल से रीति से ही आपको देता है
विपरीत स्वीकार करके आप उसी राज्य पद्धिति तो ये भी माया से ही करती थी
ऐसा मेरा है
तुम ही एक पुराना पुरुष संपूर्ण दिशा विदिशा और विश्व में व्याप्त हो इस जगत की नाश होने में भी तुम्हारी हानि हो सकती जिस प्रकार घटकर नाश होने से घट में व्याप्त आकाश की हानि नहीं हो सकती
इसी प्रकार जगत के से तुम्हारी कुछ आनी ही जिस प्रकार आकाश में एक ही सूर्य का वेब जन भरे हुई छोटे पात्रों में अनेक भक्त को प्राप्त होता है
था अनेक रूप देखते ही इसी प्रकार भी आप एक होकर भी सबके अन्तः करण में अनेक रूप से विराजती है
संसार की उत्पत्ति पालन और नाश होने में भी तुम्हारा कुछ कर्तव्य नहीं है कि अनाज थे देहधारियों के कर्मानुसार शॉर्ट फिल्म को तुम सब कार्य करते
श्रमिक के बाद भी और पृथ्वी के समान अंतर ही थी
इस छूट और सूची दोनों जल्द हूँ में आत्मतत्त्व के सिवाय दूसरा चैतन्य आयुष नहीं है
सुख दुख जो दोनों देश को होती ही उनके कहने वाले शिल्पी केवल आपको में आरोप करती है
विवेक नहीं हे भगवान सच्चिदानंद स्वरूप और समुद्र में हम लोग नील कंठ काल सरूरपुर भक्त जनों के संपूर्ण पाठक दूर करने वाली और सबके साक्षी आपके घर के सूची कहते हैं इस प्रकार
विशेषकर को प्रणाम कर हाथ जोड वीडियो रामचंद्र पर में शिवजी से ली
श्री रामचंद्र भले ही विश्वासमत यह अपना भविष्य रोग का उपचार हारकर ही ही शंकर आपके अलग है से आप में खतरे स्थित सब जगत को देख कर मुझे प्रतीति नही श्री भगवान होली हे महाभोज राम
देखो मुझसे दूसरा कोई नहीं थे
जी कहते हैं ऐसा कहकर शिवजी ने अपने देश से देवता आदि को गुप्त किया तथा विश्वरूप छुपा लिया आंखो फिर जो
रामचंद्र प्रसन्न होकर देखते ही इतनी ही समय में पर्वत के रंग पर जाकर चरम पर स्थित पंचमुखी नीलकण्ठ से
शिव जी को देखा जो व्याघ्र चर्म का रोडे
शरीर ही ड्यूटी लगाई गई
सबके कंगन टहनी नाथ का यज्ञोपवीत धारण ज्यादा
हम का ही वस्त्र रही बिजली के शर्मा पीवी चर्चा धारण की अकेले मस्तक पर चंद्रमा धारण की श्रेष्ठ भक्तों की दुहाई देने वाली चार भुजा शत्रु नाशक पशुधन धारण की मेरा हाथ में ली सब जगत के पति शिव जी को थी
उनकी आज्ञा में मन लगाएं प्रणाम करके रामचंद्र स्थित हुई तब शिवजी राम चंद्र भी झूठी तुम्हारे पूछने की इच्छा है
तुम सब पूछो है
मेरे सिवाय दूसरा कोई तुम्हारा गुरु ही
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