गुरुवार, 19 दिसंबर 2024

राम गीता


प्राचीन ग्रंथों में कई राम गीता नहीं पाई जाती हैं।प्रत्येक में वक्ता भगवान श्री राम ही है परन्तु श्रोता तथा प्रतिपाद्य विषय भिन्न भिन्न है।अध्यात्म रामायण के उत्तर कांड के पंचम सर्ग के रूप में यह राम गीता प्राप्त होती है।

सीता वनवास प्रसंग के अनन्तर एक बार जब लक्ष्मण जी और भगवान श्री रामचंद्र जी है। वहां अज्ञान रूपी सागर को पार कराने वाले ज्ञानोपदेश देने की प्रार्थना किया तब श्री रघुनाथजी में उनको जो उपदेश दिया वहीं राम गीता कहलाती है।
इसमें युक्ति युक्त विवेचन द्वारा आत्म ज्ञान को ही विशुद्ध ज्ञान बताकर समस्त इन्द्रियों के विषयों से निवृत्त करके आत्मा अनुसंधान हेतु प्रेरित किया गया है।

✍️इस राम गीता को यहां प्रस्तुत किया जा रहा है।

किसी दिन भगवान श्री राम के चरण कमलों की सेवा साक्षात श्री लक्ष्मीजी करती हैं एकांत में बैठे हुए थे।
उस समय शुद्ध विचार वाले लक्ष्मण जी उनके पास जाकर उन्हें भक्तिपूर्वक प्रणाम कर अति विनीत भाव से कहने लगे।

महामंत्री आप शुद्ध ज्ञान स्वरूप समस्त देहधारियों के आत्मा सबके स्वामी और रूप से निराकार है।जो आपके चरण कमलों के लिए भ्रमर रूप है।उन परम भागवत के सहवास के दृष्टिकोण को ही आप ज्ञान दृष्टि से दिखलाई देते हैं।

हे प्रभो योगी जिनका निरंतर चिंतन करते हैं।संसार से छुड़ाने वाले वो आपके चरण कमलों की  शरण में हैं।आप मुझे ऐसा उपदेश दीजिए जिससे में सुगमता से ही अज्ञान रूपी संसार समुद्र के पार हो जाउ।

अब श्री लक्ष्मण जी से ये वचन सुनकर शरणागत वत्सल भोपाल शिरोमणि भगवान राम सुनने के लिए उत्सुक हुए लक्ष्मण को उनकी अज्ञान अंधकार का नाश करने के लिए प्रसन्न चित्त से ज्ञानोपदेश करने लगे।

      🙏भगवान श्री राम बोले🙏

सबसे पहले अपने अपने वर्ण और आश्रम के लिए शास्त्रों में बतलाई हुई क्रियाओं का यथावत पालन कर,शुद्ध हो जाने पर उन कर्मों को छोड़ दें और श्याम दमा आदि साधनों से संपन्न हो आत्मज्ञान की प्राप्ति के लिए योग्य तत्वज्ञानी गुरु की शरण में जाएं।कारण देहांत और की प्राप्ति के लिए ही स्वीकार किए गए हैं।क्यों कि उनमें ट्रेन( सवार होने वाले पुरुषों से संबंधित टेस्ट अनिष्ट दोनों ही प्रकार की क्रियाएं होती हैं उनसे धर्म और अधर्म दोनों की ही प्राप्ति होती है)और उनके कारण शरीर प्राप्त होता है जिस से फिर कम होते हैं।इसी प्रकार यह संसार चक्र की भांति चलता रहता है।संसार का मूल कारण आज ज्ञान नहीं है।और इन शास्त्रीय विधि वाक्यों में उस अज्ञान का नाश ही संसार से मुक्त होने का उपाय बतलाया गया है।उसे सीख क्यों कि अज्ञान का नाश करने में ज्ञान ही समर्थ है,ओर इसका काम भी कम नहीं है।क्योंकि उस अज्ञान से उत्पन्न होने वाला काम उसका विरोधी नहीं हो सकता?काम कर में रूपी इस द्वारा अज्ञान का नाश अथवा राज का श्रेय भी नहीं हो सकता।बल्कि उससे दूसरे सदोष कामों की उत्पत्ति होती है।उससे पुन्हा संसार की प्राप्ति होना अनिवार्य है।
इस लिए बुद्धिमान को ज्ञान विचार में ही तत्पर होना चाहिए।

कुछ वितर्क वादी ऐसा कहते हैं कि जिस प्रकार वेद के कथनानुसार ज्ञान पुरुष का साधक है,वैसे ही कारण वेद विहित है।और प्राणियों के लिए कर्मों की आवश्यक कर्तव्य का विधान भी है।इसलिए वे कर्म ज्ञान के सहकारी हो जाते हैं।साथ ही क्रोध न करने के कारण दोस्त भी बतलाया है।

इसलिए मुमुक्षु को उन्हें सर्वदा करते रहना चाहिए।और यदि कोई कहे कि ज्ञान स्वतंत्र है एवं निश्चय ही अपना फल देने वाला है।उसे मन से भी किसी और की सहायता की आवश्यकता नहीं है।तो उसका यह कहना ठीक नहीं।
क्योंकि जिस प्रकार वेदोक्त प्रीमियर बताया गया है।तेल भी गर्म होने पर  अन्य कारक आदि की अपेक्षा करता ही है।उसी प्रकार विधि से प्रकाशित कर्मों के द्वारा ही ज्ञान मुफ्त का साधक हो सकता है।आता:  कर्मों का त्याग उचित ही नहीं है।
श्री धाम  ऐसा जो कोई कुतर्की कहते हैं।जिसे उन्हों ने देखा ही नहीं होता।उनके कथन में प्रत्यक्ष विरोध होने के कारण वह ठीक नहीं है क्यों कि यह गर्म देहाभिमान से होता है और ज्ञान अहंकार के नाश होने पर ही सिद्ध होता है।वेदांत वाक्यों का विचार करते करते विशुद्ध विज्ञान के प्रकाश से उद्भासित होने पर ही चरम ज्ञान में वृद्धि होती है।उसी  विद्या को आत्मज्ञान कहते हैं।

इसके अतिरिक्त कारण मुझे संपूर्ण कारक आदि की सहायता से ही तो होता है।किन्तु विद्या समस्त कारक आदि का नाश कर देती है।इसलिए समस्त इन्द्रियों के विषयों से निवृत्त होकर निरंतर आत्मा अनुसंधान में लगा हुआ बुद्धिमान पुरुष,पूर्ण कर्मों का सर्वथा त्याग कर देंता है।क्योंकि विद्या का विरोधी होने के कारण गम का उसके साथ समोच्च नहीं हो सकता जब तक माया से मोहित रहने के कारण मनुष्य का शरीर आदि में आत्मभाव है।तभी तक उसे वैदिक कर्म अनुष्ठान करने उस के लिए कर्तव्य है।उस को  समूह  आदि वाक्यों से संपूर्ण अनाथ में वस्तुओं का निषेध करके अपने परमात्म स्वरूप को जान लेने पर फिर उसे समस्त कर्मों को छोड़ देना चाहिए।उसे कमाया परमात्मा और जीवात्मा के भेद को दूर करने वाला प्रकाश विज्ञान अन्तः कारण में स्पर्श के तहत भासित होने लगता है।उसी समय आत्मा के लिए संसार प्राप्ति के कारण माया अनायास ही काराकाट के सहित दिनों हो जाती है।
(काराकाट एक प्रकार की तांत्रिक पूजा है जो हिन्दू धर्म में प्रचलित है। इसका उद्देश्य भगवान की कृपा प्राप्त करना और अपने जीवन में सुख, समृद्धि और शांति प्राप्त करना है।

काराकाट पूजा में भगवान की पूजा की जाती है और उनसे अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना की जाती है। इस पूजा में विशेष मंत्रों और पूजा सामग्री का उपयोग किया जाता है।

काराकाट पूजा के कुछ महत्वपूर्ण पहलू हैं:

1. *भगवान की कृपा*: काराकाट पूजा का मुख्य उद्देश्य भगवान की कृपा प्राप्त करना है।
2. *इच्छाओं की पूर्ति*: इस पूजा में भगवान से अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना की जाती है।
3. *सुख, समृद्धि और शांति*: काराकाट पूजा का उद्देश्य अपने जीवन में सुख, समृद्धि और शांति प्राप्त करना है।
4. *विशेष मंत्र और पूजा सामग्री*: इस पूजा में विशेष मंत्रों और पूजा सामग्री का उपयोग किया जाता है।

काराकाट पूजा के लाभ:

1. *भगवान की कृपा*: काराकाट पूजा से भगवान की कृपा प्राप्त होती है।
2. *इच्छाओं की पूर्ति*: इस पूजा से अपनी इच्छाओं की पूर्ति होती है।
3. *सुख, समृद्धि और शांति*: काराकाट पूजा से अपने जीवन में सुख, समृद्धि और शांति प्राप्त होती है।

काराकाट पूजा के नियम:

1. *पूजा की तैयारी*: पूजा से पहले विशेष तैयारी करनी चाहिए।
2. *विशेष मंत्रों का उपयोग*: पूजा में विशेष मंत्रों का उपयोग करना चाहिए।
3. *पूजा सामग्री का उपयोग*: पूजा में विशेष पूजा सामग्री का उपयोग करना चाहिए।
4. *पूजा के बाद धन्यवाद*: पूजा के बाद भगवान को धन्यवाद देना चाहिए।)

श्रुति प्रमाण से उस के नष्ट कर दिए जाने पर फिर वो अपना कार्य करने में समर्थ भी किस प्रकार हो सकेगी?क्योंकि परमार्थ तत्व एकमात्र ज्ञान स्वरूप निर्माण के लिए अद्वितीय है।अतः बोध हो जाने पर फिर अविद्या उत्पन्न नहीं होगी।
क्यों कि ज्ञान दूध से निकले मक्खन की भांति होता है जो दुबारा दूध नहीं बन सकता।जब एक बार नष्ट हो जाने पर अविद्या का पुनः जन्म ही नहीं होता तो बोध वाहन को मैं इस कदम का करता हूं ऐसी बुद्धि कैसे हो सकती है।इसलिए ज्ञान स्वतंत्र है उसे जीव के मोक्ष के लिए किसी भी और साधना की अपेक्षा ही नहीं है।
मैं अकेला ही उसके लिए समर्थ हूं ,इसके सिवा तैत्तिरीय शाखा के प्रसिद्ध शूटिंग भी आग्रहपूर्वक स्पष्ट कहती है,समस्त कर्मों का त्याग करना ही अच्छा है।तथा ऐरावत इत्यादि के बाद अनुष्का ने ही शाखा की स्वीकृति भी कहती है कि मोक्ष का साधन ज्ञान किसी से कम नहीं।अब ज्ञान होता है कि ,और तुमने जो ज्ञान की समानता में यज्ञादि का दृष्टांत दिया वो भी ठीक नहीं
 है।क्योंकि उन दोनों के कर्म ही अलग अलग है।क्यों कि इसके अतिरिक्त यज्ञ तो बहुत से कारकों से सिद्ध होता है।और ज्ञान इसके विपरीत है।अर्थात वह इस ज्ञान के आदेश से कोई साधन नहीं है।कर्म के त्याग करने से  अवश्य ही प्रायश्चित्त के भोगी होंगे।ऐसी अनात्म बुद्धि अज्ञानियों को हुआ करती है।तत्व ज्ञानियों को नहीं।(कहते है हाथी के पांव में सभी का पांव समा जाता है)इसलिए विकार रहित चित्त वाले ज्ञान वान बोध वाले पुरुष को विहित कर्मों का भी विधि पूर्वक त्याग कर देना चाहिए।
फिर शुद्ध चित्त होकर श्रद्धापूर्वक गुरु की कृपा से तक तुम मसीह इस महावाक्य के द्वारा परमात्मा और जीवात्मा की एकता रूप जान कर सुमेरू के समान निश्चल एवं सुखी हो जाए।यह नियम नहीं है कि प्रत्येक वाक्य का अर्थ जानने में पहले उसके पदों के अर्थ का ज्ञान भी कोई कारण हो।इस तत्त्व मसी महावाक्य के तहत और पर्व क्रम से परमात्मा और जीवात्मा के वाचक हैं और इसी उन दोनों में एकता करता है।इन दोनों जीवात्मा और परमात्मा में जीवात्मा के तहत अन्तः करण  साक्षी हैऔर परमात्मा परोक्ष रूप से इन्द्री आती है।इस वाच्यार्थ रूप तुम विरोध को छोड़कर और लक्षणा वृत्ति से लक्षित उनकी शुद्ध चेतना को ग्रहण कर उसे ही अपना आत्मा में जाएंगे और इस प्रकार के भाव से स्थित हो रहे इन तत्वों एवं पदों में एक रूप होने के कारण जैसे लक्षण नहीं हो सकती और परस्पर विरोध होने के कारण आज बुरे लक्षण भी नहीं हो सकते।सो जो भगवान है वही हम है।इन दोनों पदों के अर्थ की भांति इन तट और पदों में भी भाग त्याग लक्षण ही निर्दोष से हो सकते है।पृथ्वी आदि पंजीकृत भूतों से उत्पन्न हुए सुख दुख आदि गर्म लोगों के आश्रय और पूर्व पार के कर्म फल से प्राप्त होने वाले इस माया माया आदि अंत बांध शरीर को आत्मा की स्थूल उपाधि मानते हैं।और मन बुद्धि दस इंद्रियां तथा पाँच उपरांत इन सत्रह अंगों से युक्त और अपंजीकृत भूतों से उत्पन्न हुए सूक्ष्म शरीर को जो उपभोक्ता के सुख दुख आदि अनुभव का साधन भर है,आठ माह का दूसरा देन मानते हैं,इनके अतिरिक्त अनादि और अनिवार्यत माया माया कारण शरीर ही जीव का तीसरा देना है।इस प्रकार उपाधि भेद से सर्वथा पृथक स्थित अपने आत्मस्वरूप को क्रमशः उपाधियों का बाद करते हुए अपने हृदय में निश्चय करें, कि मनी के समान ये आठ आत्मा भी अन्न आदि भिन्न भिन्न पोस्टों में उनके रंग से उन्हीं के आकार का आभास होने लगता है।किन्तु इसका भली प्रकार विचार करने से या द्वितीय होने के कारण अष्टम गुरु और अजन्मा निश्चित होता है।

त्रिपुरा में का बुद्धि जीवी श्रॉफ ने जाग्रत और सुषुप्ति भेद से तीन प्रकार की वृत्तियाँ दिखाई देती है,किंतु इन तीनों व्यक्तियों में से प्रत्येक का एक दूसरे में व्याभिचार होने के कारण ये तीनों ही एकमात्र कल्याण स्वरूप नित्य पर में मिथ्या है।बुद्धि की वृत्ति हुई है तो आदरणीय प्राण मन और चेतन आत्मा के संघात रूप से निरंतर परिवर्तित होती रहती है।यह दृष्टि तमोगुण से उत्पन्न होने वाली होने के कारण अज्ञान रूपा है और जब तक रहती है तब तक ही संसार में जन्म होता रहता है।ने टीम ने तीन आदेश के प्रमाण से निखिल संसार का बाद करके और हृदय में दर्द नाम का आस्वादन करके सम्पूर्ण जगत को उसके चार रूप पुस्तक ब्रह्म को ग्रहण करके त्याग में जैसे नारियल के जल को पीकर मनुष्य उसे फेंक देते हैं।क्यों कि आत्मा न कभी मरता है न जन्मता है।वो न कभी क्षीण होता है और न बढ़ता ही है,वह पुरातन संपूर्ण विशेषणों से रहित सुख स्वरूप स्वयं प्रकाश मय और अद्वितीय है।
इस प्रकार ही ज्ञान माया और सुख दुख स्वरूप है।उसमें यह दुखमय संसार की प्रतीति कैसे हो सकती है।यह तो अभ्यास के कारण अज्ञान से ही दिखाई दे रहा है।ज्ञान से तो यह एक क्षण में ही लीन हो जाता है,
क्योंकि ज्ञान और अज्ञान का परस्पर विरोध है।ढंग से जो अन्य में अन्य की प्रतीति होती है।उसी को विद्वानों ने अभ्यास कहा है, जिस प्रकार असर रूप रज्जू आदि में सर्प की प्रतीति होती है।उसी प्रकार ईश्वर में संस्कार की पुष्टि हो रही है।जो विकल्प और माया से रहित है।
जिस  के कारण अन्य रामायण अद्वितीय और चित्त स्वरूप परमात्मा भ्रम में पहले इस अहंकार रूप अभ्यास की ही कल्पना होती है।साक्षी आत्मा में इच्छा अनिच्छा राग द्वेश और सुख दुख भी रूप बुद्धि की वृत्तियाँ ही जन्म मरण रूपी संसार के कारण बनते है।क्योंकि सुषुप्ति में इन का अभाव हो जाने पर हमें जागने पर इस के रूप का भान होता है।अनादि अविद्या से उत्पन्न हुई बुद्धि में प्रतिबिम्बित चेतन का प्रकाश ही कहलाता है।बुद्धि के साक्षी रूप से आत्मा उससे पृथक है,वह परमात्मा तो बुद्धि से भी परे है।अग्नि से तपे हुए लोहे के समान लाभांश साक्षी आत्मा तथा बुद्धि के एकत्र रहने से परस्पर अन्य उन्नत अभ्यास होने के कारण क्रमशः उनकी चेतनता और जड़ता प्रतीत होती है,अर्थात जिस प्रकार आदमी से तपे हुए लोहे में अग्नि और लोहे का तादाद में हो जाने से लोहे का आकार अग्नि में और अग्नि की उष्णता लोहे में दिखाई देने लगती है उसी प्रकार बुद्धि और आत्मा का तादात में हो जाने से आत्मा की चेतनता बुद्धि आदि में और बुद्धि आदि की जड़ता आत्मा में प्रतीत होने लगती है।गुरु के समीप रहने से और वेद वाक्य उसे आत्मज्ञान का अनुभव होने पर अपने हृदयस्थ उपाधि रहित आत्मा का साक्षात्कार करके आत्मा रूप से प्रतीत होने वाले देहात संपूर्ण जड़ पदार्थों का त्याग कर देना चाहिए।मैं प्रकाश स्वरूप अजन्मा अद्वितीय निरंतर भाव आसमान अत्यंत निर्मल विशुद्ध विज्ञान ढांडा ने राम आए क्रिया रहे थे और एकमात्र आनंद स्वरूप होगा मैं सदा ही मौत ही तो हू और मुक्त हूं।इस प्रकार सदा आत्मा का खंड वृत्ति से चिंतन करने वाले पुरुष के कारण में उत्पन्न हुई विशुद्ध भावना तुरंत ही कारक आदि के सहित अविद्या का नाश कर देती है।ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार नियमानुसार सेवन की हुई औषधि रोगों को नष्ट कर डालती है।
आत्म चिंतन करने वाले पुरुष को चाहिए कि एकांत देश में इंद्रियों को उनके विषयों से हटाकर और अन्तः करण को अपने अधीन कर के बैठे तथा आत्मा में स्थित होकर और किसी साधन का आश्रय न लेकर शुद्ध चित्त हुआ ज्ञान दृष्टि द्वारा एक आत्मा की भावना करें ये विश्व परमात्मा स्वरूप है ऐसा समझकर इसे सबके कारण रूप आत्मा में लीन करेगी।इस प्रकार जो पूर्ण चिदानंद स्वरूप से क्षेत्र हो जाता है।उसे बाहर अथवा आन्तरिक किसी भी वस्तु का ज्ञान नहीं रहता।तमाम  प्राप्त होने के पूर्व ऐसा चिंतन करें कि सम्पूर्ण चराचर जगत केवल ओमकार मात्र है।यह संसार वाक्य है और ओमकार इसका वाचक है।ज्ञान होने पर इसका कुछ भी नहीं रहता ओमकार में लीन हो जाता है यह व्यवस्था समाधि लाभ से पहले की है।प्रस्तुत दृष्टि से ऐसा कोई भेद नहीं है।
नाना प्रकार से स्थित आकार रूप डिस्क पुरुष को पुकार में लीन करें और ओमकार के द्वितीय व गैजेट्स के रूपों को कार को उसके अंतिम वाहन मकान में निकाल लें
फिर कारण आत्मा अपराध ब्यूरो कार को भी चंद्रग्रहण रूप परमात्मा में लीन कर रहे हैं और ऐसी भावना करें कि वह नित्य मुक्त विज्ञान स्वरूप उपाधि निर्मल पर ब्रह्मांड मैं ही है इस प्रकार निरंतर परमात्म भावना करते करते जो आत्मा आनंद में मग्न हो गया है।तथा की से सम् पूर्ण दृष्टि प्रपंच विस्मृत हो गया है। नित्य आत्मानंद का अनुभव करने वाला जीवनमुक्ति योगी ने तरंग समुद्र के समान साक्षात मुक्त तो हो जाता है।इस प्रकार जो निरंतर समाज योग का अभ्यास करता है। जिसके संपूर्ण इंद्रिय गोचर विषय निवृत्त हो गए हैं।तथा जिसने काम क्रोध आदि संपूर्ण शत्रुओं को परास्त कर दिया है।क्षय हो इन्द्रियाँ मन और पांच ज्ञानेन्द्रियों को जीतने वाले महात्मा को मेरा निरंतर साक्षात्कार होता है।इस प्रकार निशात माही चिंतन करता हुआ मुन्नी सर्वदा समस्त बंधनों से मुक्त हो कर रहे तथा करता भोक्ता के अभिमान को छोड़कर प्रारब्ध फल भोगता रहे।जिससे वो अंत में साक्षात तुम मुझ में ही लीन हो जाता है।संसार को आदि आमतौर माध्यम में सब प्रकार भाई और श्लोक का ही कारण जानकर समस्त वेद विहित कर्मों को त्याग तथा सम्पूर्ण प्राणियों के अंतरात्मा रूप अपने आत्मा का भजन करें जिस प्रकार समुद्र में जल दूध में दूध महाकाश में घटा थी   और वायु में वायु मिलकर एक हो जाते हैं। उसी प्रकार इस संपूर्ण प्रपंच को अपने आत्मा के साथ अभिन्न रूप से चिंतन करने सेमुझ परमात्मा के साथ अभिन्न भाव से स्थित हो जाता है यह जगह है वो छुट्टी युक्ति और प्रमाण से बाधित होने के कारण चंद्र भेद और दिशाओं में होने वाले ब्रह्म के समान ही है जब तक सारा संसार मेरा यह रूप दिखलाई न दे तब तक निरंतर मेरी आराधना करता रहे जो श्रद्धालु और उत्कट भक्त होता है उसे अपने हृदय में आभास होने लगता है। ना जाने किस भेस में आ जाएं राम जो बुद्धिमान इस प्रकार मनन करेगा वह तत्काल समस्त पापों से मुक्त हो जाएगा।यह संसार जो दिखता है वह माया झूठ है।इसे अपने चित्त से निकाल कर मेरी भावना से शुद्ध चित्त और दुखी होकर आनंद पूल और क्लेश शून्य हो जाओ जो पुरुष अपने चित्त से मुझे गुणातीत निर्गुण का अथवा कभी कभी मेरे सगुण स्वरूप का भी सेवन करता है वो मेरा ही रूप है।वो अपने चरण राज्य के स्पर्श से सूर्य के समान संपूर्ण त्रिलोकी को पवित्र कर देता है।भी या द्वितीय ज्ञान समस्त शक्तियों का एकमात्र चार है।इसे वेदांत वैद्य भागवत बाद मैंने भी कहा है।
योग गुरु भक्ति कम्पन्न पुरुष का श्रद्धापूर्वक पाठ करेगा।उसकी यदि मेरे वचनों में प्रीति होगी तो वो मेरा ही रूप हो जाएगा।

प्राचीन ग्रंथों में कई राम गीता नहीं पाई जाती हैं
प्रत्येक में वक्ता भगवान श्री राम ही है परन्तु श्रोता तथा प्रतिपाद्य विषय भिन्न भिन्न है
अध्यात्म रामायण के उत्तर कांड के पंचम सर्ग के रूप में यह राम जीता प्राप्त होती है
सीता वनवास प्रसंग के अनन्तर एक बार जब लक्ष्मण जी ने भगवान श्री रामचंद्र जी है
अज्ञान रूपी सागर को पार कराने वाले ज्ञानोपदेश देने की प्रार्थना किया तब श्री रघुनाथजी में उनको जो उपदेश दिया वहीं राम बीता कहलाती है
इसमें युक्ति युक्त विवेचन द्वारा आत्म ज्ञान को ही विशुद्ध ज्ञान बताकर समस्त इन्द्रियों के विषयों से निवृत्त करके आत्मा अनुसंधान हेतु प्रेरित किया गया है
इस राम गीता को यहां प्रस्तुत किया जा रहा है
किसी दिन भगवान श्री राम के चरण कमलों की सेवा साक्षात श्री लक्ष्मीजी करती हैं एकांत में बैठे हुए थे
उस समय शुद्ध विचार वाले लक्ष्मण जी उनके पास जाकर उन्हें भक्तिपूर्वक प्रणाम कर अति विनीत भाव से कहने लगे
महामंत्री आप शुद्ध ज्ञान स्वरूप समस्त देहधारियों के आत्मा सबके स्वामी और रूप से निराकार है
जो आपके चरण कमलों के लिए भ्रमर रूप है
उन परम भागवत के सहवास के दृष्टिकोण को ही आप ज्ञान दृष्टि से दिखलाई देते हैं
हे प्रभो योगी जिनका निरंतर चिंतन करते हैं
संसार से छुड़ाने वाले उन आपके चरण कमलों की में शरण हैं
आप मुझे ऐसा उपदेश दीजिए जिससे में सुगमता से ही अज्ञान रूपी यापार समुद्र के पार हो जाओ
श्री लक्ष्मण जी से ये वचन सुनकर शरणागत वत्सल भोपाल शिरोमणि भगवान राम सुनने के लिए उत्सुक हुए लक्ष्मण को उनकी अज्ञान अंधकार का नाश करने के लिए प्रसन्न चित्त से ज्ञानोपदेश करने लगे
भगवान श्री राम बोले
सबसे पहले अपने अपने वर्ण और आश्रम के लिए शास्त्रों में बतलाई हुई क्रियाओं का यथावत पालन कर
शुद्ध हो जाने पर उन कर्मों को छोड़ दें और श्याम दामाद आदि साधनों से संपन्न हो आत्मज्ञान की प्राप्ति के लिए शर्त गुरु की शरण में जाएं
कारण देहांत और की प्राप्ति के लिए ही स्वीकार किए गए हैं
क्योंकि उनमें ट्रेन रखने वाले पुरुषों से टेस्ट अनिष्ट दोनों ही प्रकार की क्रियाएं होती हैं उनसे धर्म और धर्म दोनों की ही प्राप्ति होती है
और उनके कारण शरीर प्राप्त होता है जिससे फिर कम होते हैं
इसी प्रकार यह संसार चक्र की भांति चलता रहता है
संसार का मूल कारण आज ज्ञान नहीं है
और इन शास्त्रीय विधि वाक्यों में उस अज्ञान का नाश ही संसार से मुक्त होने का उपाय बतलाया गया है
अज्ञान का नाश करने में ज्ञान ही समर्थ है
का काम कम नहीं है
क्योंकि उस अज्ञान से उत्पन्न होनेवाला काम उसका विरोधी नहीं हो सकता
काम कर में द्वारा अज्ञान का नाश अथवा राज का श्रेय नहीं हो सकता
बल्कि उससे दूसरे सदोष कम की उत्पत्ति होती है
उससे पुन्हा संसार की प्राप्ति होना अनिवार्य है
इस लिए बुद्धिमान को ज्ञान विचार में ही तत्पर होना चाहिए
कुछ वितर्क वादी ऐसा कहते हैं कि जिस प्रकार वेद के कथनानुसार ज्ञान पुरुष का साधक है
वैसे ही कारण वेद विहित है
और प्राणियों के लिए कर्मों की आवश्यक कर्तव्य का विधान भी है
इसलिए वे कर्म ज्ञान के सहकारी हो जाते हैं
साथ ही ने गर्म न करने में दोस्त भी बतलाया है
इसलिए मुमुक्षु को उन्हें सर्वदा करते रहना चाहिए
और यदि कोई कहे कि ज्ञान स्वतंत्र है एवं निश्चय ही अपना फल देने वाला है
उसे मन से भी किसी और की सहायता की आवश्यकता नहीं है
तो उसका यह कहना ठीक नहीं
क्योंकि जिस प्रकार वेदोक्त प्रीमियर गया
जब तेल गर्म होने पर भी अन्य कारक आदि की अपेक्षा करता ही है
उसी प्रकार विधि से प्रकाशित कर्मों के द्वारा ही ज्ञान मुफ्ती का साधक हो सकता है
आता है कर्मों का त्याग उचित नहीं है
श्री धाम तीन ऐसा जो कोई कुतर्की कहते हैं
उनके कथन में प्रत्यक्ष विरोध होने के कारण वह ठीक नहीं है क्योंकि गर्म देहाभिमान से होता है और ज्ञान अहंकार के नाश होने पर सिद्ध होता है
वेदांत वाक्यों का विचार करते करते विशुद्ध विज्ञान के प्रकाश से उद्भासित जो चरम मार्च में वृद्धि होती है
उसी को विद्या आत्मज्ञान कहते हैं
इसके अतिरिक्त कारण मुझे संपूर्ण कारक आदि की सहायता से होता है
किन्तु विद्या समस्त कारक आदि का नाश कर देती है
इसलिए समस्त इन्द्रियों के विषयों से निवृत्त होकर निरंतर आत्मा अनुसंधान में लगा हुआ बुद्धिमान पुरुष
पूर्ण कर्मों का सर्वथा त्याग कर दें
क्योंकि विद्या का विरोधी होने के कारण गम का उसके साथ समोच्च नहीं हो सकता जब तक माया से मोहित रहने के कारण मनुष्य का शरीर आदि में आत्मभाव है
तभी तक उसे वैदिक कर्म अनुष्ठान कर्तव्य है
ने टीम ने तीन आदि वाक्यों से संपूर्ण अनाथ में वस्तुओं का निषेध करके अपने परमात्म स्वरूप को जान लेने पर फिर उसे समस्त कर्मों को छोड़ देना चाहिए
जेठ कमाया परमात्मा और जीवात्मा के भेद को दूर करने वाला प्रकाश विज्ञान अन्तः कारण में स्पर्श के तहत भासित होने लगता है
उसी समय आत्मा के लिए संसार प्राप्ति के कारण माया अनायास ही काराकाट के सहित दिनों हो जाती है
श्रुति प्रमाण से उसके नष्ट कर दिए जाने पर फिर वो अपना कार्य करने में समर्थ भी किस प्रकार हो सकेगी
क्योंकि परमार्थ तत्व एकमात्र ज्ञान स्वरूप निर्माण और अद्वितीय है
अतः बोध हो जाने पर फिर अविद्या उत्पन्न नहीं होगी
जब एक बार नष्ट हो जाने पर अविद्या का पुनः जन्म ही नहीं होता तो बोध वाहन को मैं इस कदम का करता हूं ऐसी बुद्धि कैसे हो सकती है
इसलिए ज्ञान स्वतंत्र है उसे जीव के मोक्ष के लिए किसी भी और कमाने की अपेक्षा नहीं है
मैं अकेला ही उसके लिए समर्थ है
इसके सिवा तैत्तिरीय शाखा के प्रसिद्ध शूटिंग भी आग्रहपूर्वक स्पष्ट कहती है
समस्त कर्मों का त्याग करना ही अच्छा है
तथा ऐरावत इत्यादि बाद अनुष्का ने ही शाखा की स्वीकृति भी कहती है कि मोक्ष का साधन ज्ञान नहीं है कम नहीं
और तुमने जो ज्ञान की समानता में यज्ञादि का दृष्टांत दिया तो ठीक नहीं है
क्योंकि उन दोनों के अलग अलग है
इसके अतिरिक्त यज्ञ तो बहुत से कारकों से सिद्ध होता है
और ज्ञान इसके विपरीत है
अर्थात वह का आदेश से साधन नहीं है
गर्म के त्याग करने से मैं अवश्य के प्रायश्चित्त भोगी होंगा
ऐसी अनात्म बुद्धि अज्ञानियों को हुआ करती है
तत्व ज्ञानियों को नहीं
इसलिए विकार रहित चित्त वाले बोध वाहन पुरुष को विहित कर्मों का भी विधि पूर्वक त्याग कर देना चाहिए
फिर शुद्ध चित्त होकर श्रद्धापूर्वक गुरु की कृपा से तक तुम मसीह इस महावाक्य के द्वारा परमात्मा और जीवात्मा की एकता जानकर सुमेरू के समान निश्चल एवं सुखी हो जाए
यह नियम नहीं है कि प्रत्येक वाक्य का अर्थ जानने में पहले उसके पदों के अर्थ का ज्ञान भी कारण है
इस तत्त्व मशीन महावाक्य के तहत और पर्व
क्रम से परमात्मा और जीवात्मा के वाचक हैं और अस्सी उन दोनों की एकता करता है
इन दोनों जीवात्मा और परमात्मा में जीवात्मा तहत अन्तः करण का साक्षी है
और परमात्मा परोक्ष इन्द्री आती है
इस वाच्यार्थ रूप तुम विरोध को छोड़कर और लक्षणा वृत्ति से लक्षित उनकी शुद्ध चेतना को ग्रहण कर उसे ही अपना आत्मा जाएंगे और इस प्रकार के भाव से स्थित हो रहे
इन तत्वों एवं पदों में एक रूप होने के कारण जैसे लक्षण नहीं हो सकती और परस्पर विरोध होने के कारण आज जहल लक्षण भी नहीं हो सकती
लिए सोया
हम ये वहीं है
इन दोनों पदों के अर्थ की भांति इन तट और पदों में भी भाग त्याग लक्षणा ही निर्दोष से हो सकती है
पृथ्वी आदि पंजीकृत भूतों से उत्पन्न हुए सुख दुख आदि गर्म लोगों के आश्रय और पूर्व पार जेपी कर्म फल से प्राप्त होने वाले इस माया माया आदि अंत बांध शरीर को वीके जैन आत्मा की स्थूल उपाधि मानते हैं
और मन बुद्धि दस इंद्रियां तथा पाँच उपरांत इन सत्रह अंगों से युक्त और अपंजीकृत भूतों से उत्पन्न हुए सूक्ष्म शरीर को जो उपभोक्ता के सुख दुख आदि अनुभव का साधन है
आठ माह का दूसरा देन मानते हैं
इनके अतिरिक्त अनादि और अनिवार्यत माया माया कारण शरीर ही जीव का तीसरा देना है
इस प्रकार उपाधि भेद से सर्वथा पृथक स्थित अपने आत्मस्वरूप को क्रमशः उपाधियों का बाद करते हुए अपने हृदय में निश्चय करें
मनी के समान ये आठ आत्मा भी अन्न आदि भिन्न भिन्न पोस्टों में उनके रंग से उन्हीं के आकार का आभास होने लगता है
किन्तु इसका भली प्रकार विचार करने से या द्वितीय होने के कारण अष्टम गुरु और अजन्मा निश्चित होता है
त्रिपुरा में का बुद्धिजीवी श्रॉफ ने
जाग्रत और सुषुप्ति भेद से तीन प्रकार की वृत्तियाँ दिखाई देती है
किंतु इन तीनों व्यक्तियों में से प्रत्येक का एक दूसरे में व्याभिचार होने के कारण ये तीनों ही एकमात्र कल्याण स्वरूप नित्य पर में मिथ्या है
बुद्धि की वृत्ति हुई है
आदरणीय प्राण मन और चेतन आत्मा के संघात रूप से निरंतर परिवर्तित होती रहती है
यह दृष्टि तमोगुण से उत्पन्न होने वाली होने के कारण अज्ञान रूपा है और जब तक रहती है तब तक ही संसार में जन्म होता रहता है
ने टीम ने तीन आदेश के प्रमाण से निखिल संसार का बाद करके
और हृदय में दर्द नाम का आस्वादन करके सम्पूर्ण जगत को उसके चार रूप पुस्तक ब्रह्म को ग्रहण करके त्याग में जैसे नारियल के जल को पीकर मनुष्य उसे फेंक देते हैं
आठ माह न कभी मरता है न जन्मता है
वो न कभी क्षीण होता है और न बढ़ता ही है
वह पुरातन संपूर्ण विशेषणों से रहित सुख स्वरूप स्वयं प्रकाश शर्मा
और अद्वितीय है
जो इस प्रकार ज्ञान माया और सुखस्वरूप है
उसमें यह दुखमय संसार की प्रतीति कैसे हो सकती है
यह तो अभ्यास के कारण अज्ञान से ही दिखाई दे रहा है
ज्ञान से तो यह एक क्षण में ही लीन हो जाता है
क्योंकि ज्ञान और अज्ञान का परस्पर विरोध है
ढंग से जो अन्य में अन्य की प्रतीति होती है
उसी को विद्वानों ने अभ्यास कहा है
जिस प्रकार असर तुरूप रज्जू आदि में कप की प्रतीति होती है
उसी प्रकार ईश्वर में संस्कार की पुष्टि हो रही है
जो विकल्प और माया से रहित है
ट्रंप के कारण अन्य रामायण अद्वितीय और चित्त स्वरूप परमात्मा भ्रम में पहले इस अहंकार रूप अभ्यास की ही कल्पना होती है
के साक्षी आत्मा में इच्छा अनिच्छा राग द्वेश और सुख दुख भी रूप बुद्धि की वृत्तियाँ ही जन्म मरण रूपी संसार के कारण है
क्योंकि सुषुप्ति में इन का अभाव हो जाने पर हमें आठ माह का रूप से भान होता है
अनादि अविद्या से उत्पन्न हुई बुद्धि में प्रतिबिम्बित चेतन का प्रकाश ही
कहलाता है
बुद्धि के साक्षी रूप से आत्मा उससे पृथक है
वह परमात्मा तो बुद्धि से परे है
अगली से तपे हुए लोहे के समान लाभांश साक्षी आत्मा तथा बुद्धि के एकत्र रहने से परस्पर अन्य उन्नत अभ्यास होने के कारण क्रमशः उनकी चेतनता और जड़ता प्रतीत होती है
अर्थात जिस प्रकार आदमी से तपे हुए लोग ट्रेन में अग्नि और लोहे का तादाद में हो जाने से लोहे का आकार अग्नि में और अग्नि की उष्णता लोहे में दिखाई देने लगती है
उसी प्रकार बुद्धि और आत्मा का तादात में हो जाने से आत्मा की चेतनता बुद्धि आदि में और बुद्धि आदि की जड़ता आत्मा में प्रतीत होने लगती है
इसलिए अभ्यास वर्ष बुद्धि से लेकर शरीर पर्यंत में वस्तुओं को ही आत्मा मानने लगते हैं
गुरु के समीप रहने से और वेद वाक्य उसे आत्मज्ञान का अनुभव होने पर अपने हृदयस्थ उपाधि रहित आत्मा का साक्षात्कार करके आत्मा रूप से प्रतीत होने वाले देहात संपूर्ण जड़ पदार्थों का त्याग कर देना चाहिए
मैं प्रकाश स्वरूप अजन्मा अद्वितीय निरंतर भाव आसमान अत्यंत निर्मल विशुद्ध विज्ञान ढांडा ने राम आए क्रिया रहे थे और एकमात्र आनंद स्वरूप होगा
मैं सदा ही मौत
अतीन्द्रिय ज्ञान स्वरूप विकृत रूट और अनंत पार हूं
वे दिवाली पंडित जैन श्री मेरा हृदय में चिंतन करते हैं
इस प्रकार सदा आत्मा का खंड वृत्ति से चिंतन करने वाले पुरुष के कारण में उत्पन्न हुई विशुद्ध भावना तुरंत ही कारक आदि के सहित अविद्या का नाश कर देती है
ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार नियमानुसार सेवन की हुई औषधि रोगों को नष्ट कर डालती है
आत्म चिंतन करने वाले पुरुष को चाहिए कि एकांत देश में इंद्रियों को उनके विषयों से हटाकर और अन्तः करण को अपने अधीन कर के बैठे तथा आत्मा में स्थित होकर और किसी साधन का आश्रय न लेकर शुद्ध चित्त हुआ
ज्ञान दृष्टि द्वारा एक आत्मा की भावना करें
ये विश्व परमात्मा स्वरूप है ऐसा समझकर इसे सबके कारण रूप आत्मा में लीन करेगी
इस प्रकार जो पूर्ण चिदानंद स्वरूप से क्षेत्र हो जाता है
उसे बाहर अथवा आन्तरिक किसी भी वस्तु का ज्ञान नहीं रहता
तमाम डी प्राप्त होने के पूर्व ऐसा चिंतन करें कि सम्पूर्ण चराचर जगत केवल ओमकार मात्र है
यह संसार वाक्य है और ओमकार इसका वाचक है
अज्ञान के कारण ही की प्रतीति होती है
ज्ञान होने पर इसका कुछ भी नहीं रहता
ओमकार में
तू और मां ये तीन वाहन है
इनमें से आकार विश्व जागृति के अभिमानी का वाचक है
पुकार तेज अर्थात सौंपने का अभिमानी कहलाता है
और मक्कार राज्य अर्थात सुषुप्ति के अभिमानी को कहते हैं
यह व्यवस्था समाधि लाभ से पहले की है
प्रस्तुत दृष्टि से ऐसा कोई भेद नहीं है
नाना प्रकार से स्थित आकार रूप डिस्क पुरुष को पुकार में लीन करें
और ओमकार के द्वितीय व गैजेट्स के रूपों को कार को उसके अंतिम वाहन मकान में निकालें
फिर कारण आत्मा अपराध ब्यूरो कार को भी चंद्रग्रहण रूप परमात्मा में लीन कर हैं
और ऐसी भावना करें कि वह नित्य मुक्त विज्ञान स्वरूप उपाधि निर्मल पर ब्रह्मांड मैं ही है
इस प्रकार निरंतर परमात्म भावना करते करते जो आत्मा आनंद में मग्न हो गया है
तथा की से सम् पूर्ण दृष्टि प्रपंच विस्मृत हो गया है
नित्य आत्मानंद का अनुभव करने वाला जीवनमुक्ति योगी ने तरंग समुद्र के समान साक्षात मुक्त तो हो जाता है
इस प्रकार जो निरंतर समाज योग का अभ्यास करता है
जिसके संपूर्ण इंद्रिय गोचर विषय निवृत्त हो गए हैं
तथा जिसने काम क्रोध आदि संपूर्ण शत्रुओं को परास्त कर दिया है
क्षय हो इन्द्रियाँ मन और पांच ज्ञानेन्द्रियों को जीतने वाले महात्मा को मेरा निरंतर साक्षात्कार होता है
इस प्रकार निशात माही चिंतन करता हुआ मुन्नी सर्वदा समस्त बंधनों से मुक्त हो कर रहे तथा करता भोक्ता के अभिमान को छोड़कर प्रारब्ध फल भोगता रहे
जिससे वो अंत में साक्षात तुम मुझ में ही लीन हो जाता है
संसार को आदि आमतौर माध्यम में सब प्रकार भाई और श्लोक का ही कारण जानकर समस्त वेद विहित कर्मों को त्याग दें
तथा सम्पूर्ण प्राणियों के अंतरात्मा रूप अपने आत्मा का भजन करें
जिस प्रकार समुद्र में जल दूध में दूध महाकाश में घटा था शादी और वायु में वायु मिलकर एक हो जाते हैं
उसी प्रकार इस संपूर्ण प्रपंच को अपने आत्मा के साथ अभिन्न रूप से चिंतन करने से
मुझ परमात्मा के साथ अभिन्न भाव से स्थित हो जाता है
यह जगह है वो छुट्टी युक्ति और प्रमाण से बाधित होने के कारण चंद्र भेद और दिशाओं में होने वाले ब्रह्म के समान ही है
ऐसी भावना करता हुआ लोक व्यवहार में स्थित उन्होंने इसे देखें
जब तक सारा संसार मेरा यह रूप दिखलाई न दे तब तक निरंतर मेरी आराधना करता रहेगा
जो श्रद्धालु और उत्कट भक्त होता है
उसे अपने हृदय में व दाम में राहुल साक्षात्कार होता है
प्रिय है
संपूर्ण छुट्टियों के स्टार रूप इस ग्रुप के रहस्य को मैंने निश्चय कर तुम तुमसे कहा है
जो बुद्धिमान इस मनन करेगा
वह तत्काल समस्त पापों से मुक्त हो जाएगा
भाषा वीडियो कुछ जगत दिखाई देता है वो सब माया है
इसे अपने चित्त से निकाल कर मेरी भावना से शुद्ध चित्त और दुखी होकर आनंद पूल और क्लेश शून्य हो जाओ
जो पुरुष अपने चित्त से मुझे गुणातीत निर्गुण का अथवा कभी कभी मेरे सगुण स्वरूप का भी सेवन करता है
वो मेरा ही रूप है
वो अपने चरण राज्य के स्पर्श से सूर्य के समान संपूर्ण त्रिलोकी को पवित्र कर देता है
भी या द्वितीय ज्ञान समस्त शक्तियों का एकमात्र चार है
इसे वेदांत वैद्य भागवत बाद मैंने भी कहा है
योग गुरु भक्ति कम्पन्न पुरुष का श्रद्धापूर्वक पाठ करेगा
उसकी यदि मेरे वचनों में प्रीति होगी
तो वो मेरा ही रूप हो जाएगा

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