अध्याय 12
श्री रामचंद्र बोले
हे देवा देव महेश्वर आपको नमस्कार आप उपासना के विधि और उसका उदेश का वर्णन करें
हम पर कृपा कर के हित करें किस समय किस प्रकार का उपवास उपासना किया जाए
हे भगवान हमारे ऊपर आपकी कृपा हो तो उपासना का अंग नियम कहो
शिवजी बोले हे राम मैं तुमसे उपासना के विधि और का देशकाल कहता हूँ तुम मन लगा कर सकूं
जितनी देवता हैं ये सब मेरे इस भी वास्तव में मुझ से फिल्म नहीं जो दूसरे देवताओं के भारत में ही और श्रद्धापूर्वक उनका पूजन करते है ही राज है
वे पुरुष मेरा ही भेद गुड्डी से यजन कर ले जाने की जिस कारण की इस सम्पूर्ण संसार में मेरे सिवाय और कुछ भी नहीं
वे सब क्रिया का भोक्ता और का फल देने वाला हूँ
जो पुरुष वेश शेव गणेश शादी जिस भाव से मेरी उपासना करते ही उसी भावना के अनुष्का उसी देवता के रूप से ही मैं उन्हें वांछित फल था विधि भी अवधि से किसी प्रकार से हो जो मेरी उपासना करते हैं
तो उनको भी प्रसन्न होकर फल देता हूं इसमें कोई संदेह नहीं यह भी वे दुराचारी है परन्तु वह अनन्य होकर मेरा भजन करता है
उस पुरुष को साधु बनना चाहिए और वे उन निभाने की भक्ति की महिमा दिखाई गई
परंतु यह निश्चय जानना चाहेगी कि अनन्य भक्ति वाला किसी प्रकार दुराचारी नहीं हो सकता कारन के अनन्य भक्ति का और हाल में मारना नहीं चाहता जो एकनिष्ठ बुद्धि हो कर जीवात्मा परमात्मा को एक ही रूप जानता है
अर्थात जीव रूप भी मेरे को जानता है
और अनन्य बुद्धि से ही मेरा भजन करता है उसका आप को इस स्पर्श नहीं करता बहुत क्या ब्रह्महत्या भी इस पर नहीं करती उपासना के विधि चार प्रकार के लिए संबंध आरोप को संवर्ग और
अध्यापकों को वस्तु काफी गुर्दे से मन की प्रगति से अनंत गुणों की भावना से ही चिंतन करना जैसे की मूर्ति में अनंत गुरु विशिष्ट शेर तरह विष्णु का ध्यान करना इसका नाम का पद से एक भी या
अंग में संपूर्ण उपाय वस्तु का आरोप कर की जो प्रार्थना करनी है उसे आरोप खेती ही झेली
कोई की उदगीर साहब रूप से उपासना की जाती है
और अभ्यास इनका करूं
बहुधा एक सा ही भीड़ इतना ही है कि बुद्धिपूर्वक किसी एक वस्तु में विवक्षित धर्म का होकर करके उसकी उपासना करना जैसे ही ट्रेन बाद अगली का आहों को था इस ट्रिक को अंग्रेजों को मानना यह है अगर यहां से
कर्मयोग होती उपासना करने का नाम भर है
सम्पूर्ण भूतों को उपासना के योग से वैश्विक ना झेली थी काल में कन्वर्ट नामक वायु अपनी शक्ति से तब रूपों को वश में करती है
गुरु से प्राप्त हुई जानती देवताओं में और अपने में भेद न मानना और अन्तः करण भी देवता के समीप प्राप्त हो ना हो अंतःकरण से ही सब पूजन कल्पित करना इसका ना अंतरंग उपासना है और इसके उपरांत
दूसरी विभिन्न से बहेड़ा को उपासना कहलाती है
कहा किसी की उपासना करनी और कहां तक करनी किसी भी देवता की उपासना करते हुए ध्यान उस देवता के स्वरूप का जो ज्ञान होता है करे
उस ज्ञान को वीजा की जान ली शिव का ध्यान करते हुए कहा हमने के ध्यान से मध्य में विच्छिन्न न होकर व्यवधान रहित ज्ञान परंपरा से निदिध्यासन करके ज्ञान योग के देवताओं अपनी बुद्धि लगाकर एक रूप का साक्षात नीता उपासना करता रहे संपदा जो चार उपासना व ही यह दुल्हन बुद्धि की उपासना तरह उपासना की परमहंस थी
और सगुण उपासना इस प्रकार की मूर्ति की उपासना करने के समय उसके प्रत्येक अवयवों में अक्षय दृष्टि लगाकर उपवास रखना को
उपासना के अणुओं का शिवा करो बात सुनो के योग के देशों का गठन करती ही फील्ड और क्षेत्र आदि में जाने से उपासना भी यह विचार कर रही है कौन भी जाने की श्रद्धा थी और जहां अपना
स्वच्छ और एकाग्रता युक्त हो वहां सबसे बैठकर उपासना कर रही कम मुझे विवाह भर
अथवा निरक्षर पर स्थित होकर एकांत देशी इससे हो समान कृपा और शरीर को सरल विधि पूर्वक भस्म धारण कर और संपूर्ण इंद्रियों को रोक कर तथा भक्ति पूर्वक अपने गुरु को प्रणाम कर रही ज्ञान शास्त्र ज्ञान की प्राप्ति के लिए
भक्ति से प्राणायाम रही जिसका अन्तः करण मूड और रेट शून्य उसके इन्द्रिय दुष्ट गुणों की खान में था जैसे दुष्ट घोड़ा साथी के वश में नहीं आता जैसे दुष्ट इन्द्रिय
उन्हें वश में नहीं कर सकती ज्ञान कम होने नहीं उनकी यात्रा करने से संपूर्ण इंद्री मन के शहीत वश में हो जाती है जिसमें का कृषि क्षेत्र आश्य साथी के वश में हो जाता है
और विवेक शून्य चंचल चित्र वहां आए और अंतर शौच से ही और अनुभव क्या रही थी जो उस स्थान को नहीं प्राप्त होती परंतु निरंतर संसार में ही भ्रमण करते ही और जो ज्ञान इस फिर क्षेत्र भाई अभियान
पवित्रता से युक्त ही वे उस स्थान को प्राप्त होते ही जहां होगी फिर आना नहीं होता है शिल्पी में लिखा है जिसका विज्ञान रुपये साथी मन रूपी लगा धारण यह है
एग्री घोड़ी जिससे शरीर रूपी में जो बैठा है वे संसार रूपी मार्ग से पहाड़ परम बाद मोक्ष इस स्थान पर पहुंचा था
हृदय कमल काम आदि दोष रहित शबनम आदि गुण सम्पन्न सच है
और अगर शोक रहे करके उसकी मेरा ध्यान करना जिससे जो अपशिष्ट स्वरूप को सीमा रहे थे जिससे श्रेष्ठ कोई दूसरा नहीं है जो नाश रहे तो कल्याण करो
आदि अंत शून्य प्रशांत और सबका कहना है
व्यापक सच्चिदानंद स्वरूप को रोग रहित उत्पत्ति शून्य आश्रय युक्त मुझे ब्राह्मणों को शुद्ध नदी के समान शहरी और धाम में पार्वती को धारण किए जागरूक शर्म ओली नीलकण्ठ त्रिलोचन जो
झूठ धारण की चंद्रमा सिर पर गहरी नाभि का यज्ञोपवीत पहली व्याघ्र चरम का ही स्तरीय उन्होंने में सर्वश्रेष्ठ भक्तों के आश्रयदाता बीच के और के ऊंचे दोनों हाथों में वृहद और पशु धारण की सब अंग में विभूति
लगाई तथा सम्पूर्ण आभूषणों से विभूषित इस प्रकार से ही आत्मा के अग्रणी ऑपरेटर को उत्तर अनेक करके उसका मक्खन करता हुआ नेहा ऊपर कहे अनुसार ज्ञान भी तो ये मेरा कक्षा का बता दें झा
यद्यपि करते हैं तब अग्नि के लिमिट है या शमी के दो लकड़ी लें ऊपर नीचे रख अग्नि की लिमिट को से ही थी
वेद और शास्त्रों के चलते मुझे को भी पा नहीं सकता परन्तु एकाग्र चित्त से सदैव मेरा ध्यान करता है
मैं उससे भी प्राप्त होता है और क्या नहीं करता जो पाप से मुक्त नहीं जिसके कृष्णा शांत नहीं श्रवण मनन निदिध्यासन थी जिसका मन समाधान ही है
जिसका मन चंचल गए ऐसा पुरुष केवल शास्त्र के अध्ययन से मुझे पूरा नहीं कर सकता जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति इन तीनों अवस्थाओं का प्रपंच जिसका रूप अधिष्ठान ब्रह्मस्वरूप के द्वारा प्रकाशित होता है वे भ्रम
मैं तो ऐसा यथार्थ जानने से यह
संपूर्ण बंधनों से मुक्त हो जाता है
तीनों अवस्थाओं भी जो भोज्य पदार्थ जो भोक्ता और भोग्य वस्तु है
ये तीनों ब्रह्म की ही सता से करते थे
इनका प्रकाशक गति करने वाला चौरासी में ही इस का निर्भर गठन कर असे मत अधिकारियों को सगुण रूप का उपदेश करते ही मध्याह्न काल की करोड़ों सूर्यों के समान तेज युक्त और करोड़ों चंद्रमा के समान
शीतल सूर्य चन्द्रमा अभी भी जिसके ने तरह ही उनकी मुक्कमल का स्मरण कर रही एक ही परमात्मा सम्पूर्ण भूतों में गुप्त थे
सर्वव्यापी और सब भूतों का अंतर आत्मा ही सबका अध्यक्ष और सब भूतों में निवास करने वाला सबका का अच्छी थी प्रेरणा करने वाला ले और ही स्वाभाविक सब भूतों का आत्मा वे एक ही ढील है
माया प्रपंच का बीज प्रकट करता है
वे पुरुष मैं ही मुझे जो धीर पुरुष शास्त्र और आचार के उद्देश्य से साक्षात्कार करते ही उन्हीं निरंतर शांति और केवल मुक्ति मिलती है
दूसरों की नहीं जिस प्रकार से एशिया हनी सब संसार में प्रविष्ट होकर उनका लोहा आदमी भी पीढ़ी चतुष्कोण आदि रूप से उसी वस्तु के आकार से ही हो जाती है
इसी फिर का सबका अंतरात्मा एक ही है और शरीर में प्राप्त होने से उसी के आकार का प्रतीक होता है यदि उपाधि के वशीभूत होने से भिन्न भिन्न प्रकार का प्रतीत होता है
तथा करोड़ लोगों के दुख से दुखी और सुख से सुखी नहीं होता जो विद्वान ज्ञान मुझको सर्वान्तर्यामी महान जब सौर प्रकाश माया से रहित आत्मस्वरूप जाता है
वहीं संसार बंधन से मुक्त होता है इसके सिवाय मुफ्ती के प्राप्त होने का दूसरा उपाय भी
साथ ही शिल्पी में कहा ही प्रथम सृष्टि के आरम्भ में में ब्रह्मा को उत्पन्न करके उनके लिमिट भेद को विश करना वहीं इस स्तुति सीखें योग के पुरुष में
निश्चय ही मुझे जानते ही लिए मृत्यु के मुख से छूट जाते ही ऐसा शिल्पी में उपस्थित रहे
इस प्रकार शांति आदि गुणों से युक्त हो जो मुझको तट से झांकता है
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