आज अधिकांश लोग वेदपाल वर्मा का नाम भी नहीं जानते होंगे, लेकिन एक ज़माना था जब उन्होंने फ़िल्म संगीत को कुछ दिलकश धुनें दी थीं। सिरसा (हरियाणा) के आर्यसमाजी परिवार में जन्मे वेदपाल वर्मा को बचपन में पिता अकसर भजन सुनाने मंदिर में ले जाते थे। संगीत के मूल तत्व उन्हें यहीं से प्राप्त हुए। बाद में संगीत की शिक्षा ली, कुछ दिनों तक मैकेनिक भी रहे, फिर ऑल इंडिया रेडियो में संगीतकार बने और मोतीराम जी तथा जीतूराम जी जैसे संगीतज्ञों से सीखते भी रहे। उनके काम से प्रभावित होकर एस.एस. ओबेराॅय और गीतकार मधुकर ने उन्हें बम्बई में काम का न्योता दिया। छठे दशक में अन्य कई संगीतकारों की तरह वे बम्बई गायक बनने चले गए। संघर्ष करते रहे, पर उन्हें सही अवसर नहीं मिला। तभी एक बार गीतकार रमेश शास्त्री ने निर्माता राधेश्याम झुनझुनवाला और निर्देशक सत्येन बोस की 'परिचय' (1954) में शैलेष के साथ संगीतकार के रूप में काम दिलवाया। इस फ़िल्म में वेदपाल ने 'मेरा घोड़ा बड़ा है निगोड़ा' (किशोर), 'देखा जो बालमा ने मेरी तरफ' (शमशाद) और 'मैं जनम जनम से हूं दुखिया' (आशा) की धुनें बनाई थीं पर गीत खास लोकप्रिय नहीं हुए। वैसे इससे पहले वेदपाल ने 'आई फिर से बहार' नाम की एक फ़िल्म में संगीत दिया था। ज्यादा गीत फ़िल्म के तमिल वर्ज़न से ही डब थे और फ़िल्म रिलीज़ न हो सकी थी। वैसे इस फ़िल्म में भी लता और साथियों के स्वर में 'शर्मीली शाम है' एक अच्छी मेलोडी थी, जिसमें कोरस का सुंदर प्रयोग किया गया था। 'परिचय' की असफलता के बाद फ़िल्म 'सारंग' भी रिलीज़ नहीं हुई। वेदपाल ने बांग्ला फ़िल्म 'साॅरी मैडम' (1962) में मुकेश से एक बांग्ला गीत 'साॅरी मैडम साॅरी सिस्टर' इसी दरमियान गवाया और पंजाबी फ़िल्म 'छोरियां दी टोली' में भी संगीत दिया।
वर्षों खोए रहने के उपरान्त नानाभाई भट्ट निर्देशित 'भूतनाथ' (1963) में उन्हें फिर मौका मिला। यह फ़िल्म कुछ चली भी थी, पर हम इसे याद करेंगे लता के दो अत्यंत मेलोडियस नगमों के लिए। वैसे तो उषा मंगेशकर का गाया 'मेरे महबूब सुन' भी हिट रहा था, पर लता के 'तुम न आए सनम शमा जलती रही' का पहाड़ी आधारित अनुकम्पन और 'भूले से कर लिया प्यार, हो गई नादानी' की झूमती धुन आज भी प्रभावित किए बिना नहीं रहती। 'संत तुकाराम' (1965) के गीत भी कुछ चले थे विशेषकर 'राम जिसे तारे तो कौन उसे मारे' (मन्ना डे, साथी), 'अब तो बना दे अवगुण मेरे' (रफ़ी), 'ओ भोले जोगी सुन मेरी पायलिया' (मन्ना डे, साथी)। 'संत तुकाराम' में वेदपाल ने बहुत कल्पनाशील पार्श्वसंगीत दिया था तथा जहां भी आवश्यकता देखी, वहां स्थानीय वाद्ययंत्रों का भी बखूबी इस्तेमाल किया। 'गुनहगार' (1967) में भी वेदपाल ने अच्छा ही संगीत दिया था, भले ही आधुनिक आॅर्केस्ट्रा वाला 'नई-नई हैं मंज़िलें नए नए हैं रास्ते' (महेन्द्र, उषा मंगेशकर) या 'शाम ढली, शमा जली, झूम उठी जिं़दगी' (आशा) जैसे गीत न चले।
फ़िल्मों में अच्छे अवसर न मिलने से वेदपाल गै़रफ़िल्मी गीतों की ओर भी मुड़े और एचएमवी के लिए भी उन्होंने कुछ गीत रेकाॅर्ड कराए जो रेडियो पर बजे भी। वेदपाल ने ढेर सारे जिंगल, वृत्तचित्रों और नाटकों में भी संगीत दिया। उनका 'निरमा' का विज्ञापन तो बेहद मशहूर हुआ। वेदपाल को गीत लिखने का भी शौक था और कल्याणजी-आनंदजी संगीतबद्ध 'सुनहरी नागिन' में उनका लिखा भी एक गीत था 'लेते लेते तेरा नाम मैं तो हो गई रे बदनाम'। 'माया सुंदरी' (1967) में संगीत देने के अलावा उन्होंने गीत लेखन में भी सहयोग किया था, हालांकि नाम सिर्फ सरस्वती कुमार 'दीपक' का ही रहा। हरमिंदर सिंह 'हमराज़' के हिंदी फ़िल्म गीतकोश, खण्ड 4 के अनुसार मूल तमिल से डब की गई इस फ़िल्म की डबिंग कलकत्ता में हुई थी और शायद इसी कारण 'किरणों की डोरी चांद का पलना', 'आज मिले हैं दो प्यार भरे दिल' जैसे सुंदर, नाजुक गीतों को आरती मुखर्जी, मानवेंद्र मुखर्जी जैसे बंगाली गायक-गायिकाओं से वेदपाल ने गवाया। इसी दौर में वेदपाल वर्मा ने कुछ तमिल और मलयालम फ़िल्मों में भी संगीत दिया।
वेदपाल मानते थे कि फ़िल्मों में संगीतकार को निर्बाध स्वतंत्रता नहीं रहती - उसे कहानी, चरित्र और निर्माता-निर्देशकों की मांग का बहुत ध्यान रखना पड़ता है। वेदपाल का दुर्भाग्य यह था कि उनको मिलने वाली अधिकांश फिल्में बाॅक्स आॅफिस पर इतनी असफल थीं कि उसके गीत सुने ही नहीं जा सके, जैसे 'भीमा मेरा हाथी' (1973) के स्वलिखित 'हजार दिल में हों तो ऐसे निकले वो अरमां' (मुकेश, हेमलता) और 'नन्ही, मुन्नी मेरी कलियन की अंखियन में मीठी नींद सजा ले' (मन्ना डे), 'हम जंगली हैं' (1973) का भी खुद का ही लिखा हुआ 'बातों बातों में मेरे दिल को चुराया तुम ने' (रफ़ी, उषा मंगेशकर), 'कोरा बदन' (1974) का 'झुरमुट बोले' (मनहर, कृष्णा बोस), 'वफ़ादार' (1976) का मुकेश का दुर्लभ गीत 'रोने को तो रात पड़ी है' एवं इसी फ़िल्म के 'ऐ मेरी जाने वफ़ा ऐ मेरी जाने हयात' (महेंद्र, कृष्णा बोस) और 'कभी दिल और कभी शमा जलकर रोए' (उषा मंगेशकर)। 1970 की भारतीय और ऐफ्रो कैरीबियन मजदूरों को लेकर बनाई गई फ़िल्म 'द राइट एंद द रांग' में वेदपाल वर्मा ने मुकेश से एक लाज़वाब गीत गवाया था - 'ओ मेरे हमराही क्यूं तेरा मन घबराए'। यह आज भी मुकेश के खूबसूरत गीतों में स्थान रखता है।
वेदपाल को पहली बार एक बड़े निर्माता के साथ काम करने का अवसर मिला 1980 में जब सावन कुमार ने अपनी पत्नी उषा खन्ना से सम्भवतः मनमुटाव के कारण 'ओ बेवफ़ा' का संगीत उन्हें सौंपा। 'ओ बेवफ़ा' में कहानी की सिचुएशन के हिसाब से धुन और वाद्य-संयोजन क़ाबिलेतारीफ़ था तथा धुनों में एक ताज़गी भी थी, जो शोरगुल के आ चुके दौर में और भी आकर्षक लगती है, विशेषकर हेमलता के गाए पीलू पर आधारित 'भरी बरसात में दिल जलाया' तथा 'अब वफ़ा का नाम न ले कोई' में। वहीं 'प्रीत न करियो मन ने कहा था' (हेमलता) और 'मेरा दिल किसने लिया' (हेमलता, सुरेश वाडकर) में लोक धुनों और खय्याम की शैली का प्रभाव साफ नज़र आता है। 'ज़ख्मी दिल' (1984) तथा 'गर्ल फ्राॅम इंडिया' जैसी फ़िल्मों से वेदपाल को कोई विशेष फ़ायदा नहीं हुआ, पर सावन कुमार ने पुनः उन्हें 'सौतन की बेटी' (1988) में लिया। गीतों को 'सौतन' की तुलना में तो कुछ भी लोकप्रियता नहीं मिली, पर यह निर्विवाद है कि इस फ़िल्म में वेदपाल ने लता से 'भूतनाथ' की तरह फिर दो बड़े मीठे मेलोडी प्रधान गीत गवाए थे - 'हम भूल गए रे हर बात' और 'कहां थे आप'। 'मेरा पति मेरी ज़िंदगी' (1993) और 'पिया का घर' (1997) में भी वेदपाल का संगीत था। पर कुल मिलाकर वेदपाल कामयाब संगीतकारों की श्रेणी में नहीं ही आ पाए। गोरेगांव के प्रसाद शाॅपिंग सेंटर के तीसरे माले के एक छोटे-से कमरे में वे रहते थे और अंततः 19 दिसम्बर, 1996 को अपनी गुमनाम-सी ज़िंदगी की तरह ही गुमनामी में उनका निधन हो गया।
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