गुरुवार, 28 दिसंबर 2023

हुस्न लाल और भगत राम बॉलीवुड की पहली दिग्गज संगीत निर्देशक जोड़ी


हुस्न लाल और भगत राम बॉलीवुड की पहली दिग्गज संगीत निर्देशक जोड़ी थीं । वे दो भाई हैं,
हुस्न लाल
🎂08 अप्रैल 1920
⚰️28 दिसंबर 1968

भगत राम
🎂1914
⚰️29 नवंबर 1973

हुस्न लाल एक प्रसिद्ध वायलिन वादक, गायक (भारतीय शास्त्रीय संगीत) और संगीतकार भी थे, लेकिन गायक के रूप में उनकी प्रतिभा आमतौर पर ज्ञात नहीं है। भगत राम एक कुशल हारमोनियम वादक माने जाते थे।

भगत राम ने 1930 के दशक में अकेले "भगत राम बातिश" नाम से कुछ फिल्मों के लिए संगीत तैयार किया। 1944 में, वह और हुस्न लाल पहली बार हुस्न लाल - भगत राम नाम से एक फिल्म के लिए संगीत तैयार करने के लिए एकजुट हुए। दोनों भाई 1940 और 1950 के दशक की शुरुआत में लोकप्रिय संगीतकार थे, लेकिन 1955 के बाद उनका करियर ख़राब हो गया।
उनके सबसे पुराने चचेरे भाई पंडित अमरनाथ या अमर नाथ भी 1940 के दशक में एचएमवी और फिल्म संगीत के संगीतकार थे । इन दो महान प्रतिपादकों ने संगीत निर्देशकों शंकर ( शंकर-जयकिशन के ), लक्ष्मीकांत शांताराम कुडालकर ( लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के ), खय्याम , गायक महेंद्र कपूर और गायक-संगीतकार एस. मोहिंदर को प्रशिक्षित किया । भाइयों का जन्म काहमा, पंजाब, ब्रिटिश भारत में हुआ था ।
मशहूर संगीतकार जोड़ी हुस्नलाल भगतराम के हुस्नलाल की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि



भारतीय फिल्म संगीत जगत में अपनी धुनों के जादू से श्रोताओं को मदहोश करने वाले संगीतकार तो कई हुए थे और उनका जादू भी श्रोताओं के सर चढ़कर बोला लेकिन उनमें कुछ ऐसे भी थे, जो बाद में गुमनामी के अंधेरे में खो गए और आज उन्हें कोई याद भी नहीं करता। फिल्म इंडस्ट्री की पहली संगीतकार जोड़ी हुस्नलाल-भगतराम भी ऐसी ही एक प्रतिभा थे। आवाज की दुनिया के बेताज बादशाह मोहम्मद रफी को प्रारंभिक सफलता और पहचान दिलाने में हुस्नलाल-भगतराम का अहम योगदान रहा था। चालीस के दशक के अंतिम वर्षों में जब मोहम्मद रफी फिल्म इंडस्ट्री में बतौर पाश्र्वगायक अपनी पहचान बनाने में लगे थे तो उन्हें काम ही नहीं मिलता था। तब हुस्नलाल-भगतराम की जोड़ी ने उन्हें एक गैर फिल्मी गीत गाने का अवसर दिया था। वर्ष 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद इस जोड़ी ने मोहम्मद रफी को राजेन्द्र कृष्ण रचित गीत ... सुनो सुनो ऐ दुनिया वालो बापू की अमर कहानी... गाने का अवसर दिया।

देशभक्ति के जज्बे से परिपूर्ण यह गीत श्रोताओं में काफी लोकप्रिय हुआ। इसके बाद अन्य संगीतकार भी मोहम्मद रफी की प्रतिभा को पहचानकर उनकी तरफ आकर्षित हुए और अपनी फिल्मों में उन्हें गाने का मौका देने लगे। मोहम्मद रफी हुस्नलाल-भगतराम के संगीत बनाने के अंदाज से काफी प्रभावित थे और उन्होंने कई मौकों पर इस बात का जिक्र भी किया है। मोहम्मद रफी सुबह चार बजे ही इस संगीतकार जोड़ी के घर तानपुरा लेकर चले जाते थे जहां वह संगीत का रियाज किया करते थे। हुस्नलाल भगतराम ने मोहम्मद रफी के अलावा कई अन्य संगीतकारों को पहचान दिलाने में अहम भूमिका निभाई थी। सुप्रसिद्ध संगीतकार जोड़ी शंकर जयकिशन ने हुस्नलाल-भगतराम से ही संगीत की शिक्षा हासिल की थी।

मशहूर संगीतकार लक्ष्मीकांत भी उन्हीं से वायलिन बजाना सीखा करते थे। छोटे भाई हुस्नलाल का जन्म 1920 में पंजाब में जालंधर जिले के कहमां गांव में हुआ था जबकि बड़े भाई भगतराम का जन्म भी इसी गांव में वर्ष 1914 में हुआ था। बचपन से ही दोनों का रुझान संगीत की ओर था। हुस्नलाल वायलिन और भगतराम हारमोनियम बजाने में रुचि रखते थे। हुस्नलाल और भगतराम ने संगीत की प्रारंभिक शिक्षा अपने बड़े भाई और संगीतकार पंडित अमरनाथ से हासिल की। इसके अलावा उन्होंने पंडित दिलीप चंद बेदी से से भी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ली थी। वर्ष 1930 ..1940 के दौरान संगीत निर्देशक शास्त्रीय संगीत की राग-रागिनी पर आधारित संगीत दिया करते थे लेकिन हुस्नलाल-भगतराम इसके पक्ष में नहीं थे।

उन्होंने शास्त्रीय संगीत में पंजाबी धुनों का मिश्रण करके अलग तरह का संगीत देने का प्रयास दिया और उनका यह प्रयास काफी सफल भी रहा। हुस्नलाल-भगतराम ने अपने सिने कैरियर की शुरूआत वर्ष 1944 में प्रदर्शित फिल्म चांद से की। इस फिल्म में उनके संगीतबद्ध गीत..दो दिलों की ये दुनिया..श्रोताओं में काफी लोकप्रिय हुए लेकिन फिल्म की असफलता के कारण संगीतकार के रूप में वे अपनी खास पहचान नही बना सके। वर्ष 1948 में प्रदर्शित फिल्म प्यार की जीत में अपने संगीतबद्ध गीत 'एक दिल के टुकड़े हजार हुए की सफलता के बाद हुस्नलाल-भगतराम फिल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने में कामयाब हो गए। मोहम्मद रफी की आवाज में कमर जलालाबादी रचित यह गीत आज भी रफी के दर्द भरे गीतों में विशिष्ट स्थान रखता है लेकिन दिलचस्प बात यह है कि हुस्नलाल-भगतराम ने यह गीत फिल्म प्यार की जीत के लिए नहीं बल्कि फिल्म सिंदूर के लिए संगीतबद्ध किया था।

सिंदूर के निर्माण के समय जब हुस्नलाल-भगतराम ने फिल्म निर्माता शशिधर मुखर्जी को यह गीत सुनाया तो उन्होंने इसे अनुपयोगी बताकर फिल्म में शामिल करने से मना कर दिया। बाद में निर्माता ओ.पी.दत्ता ने इस गीत को अपनी फिल्म 'प्यार की जीत में इस्तेमाल किया । वर्ष 1950 में प्रदर्शित फिल्म बड़ी बहन में अपने संगीतबद्ध गीत..चुप चुप खड़े हो जरूर कोई बात है..की सफलता के बाद हुस्नलाल-भगतराम फिल्म इंडस्ट्री में चोटी के संगीतकारों में शुमार हो गए। इस गीत से जुड़ा एक रोचक तथ्य है कि उस जमाने में गांवों में रामलीला के मंचन से पहले दर्शकों की मांग पर इसे अवश्य बजाया जाता था। लता मंगेशकर और प्रेमलता द्वारा गाए इस गीत की तासीर आज भी बरकरार है।

साठ के दशक मे पाश्चात्य गीत-संगीत की चमक से निर्माता-निर्देशक अपने आप को नहीं बचा सके और धीरे धीरे निर्देशकों ने हुस्नलाल-भगतराम की ओर से अपना मुख मोड़ लिया। इसके बाद हुस्नलाल दिल्ली चले गए और आकाशवाणी में काम करने लगे, जबकि भगतराम मुंबई में ही रहकर छोटे-मोटे स्टेज कार्यक्रम हिस्सा में लेने लगे। भगतराम 26 नवंबर 1973 को बड़ी ही खामोशी के साथ इस दुनिया को अलविदा कह गए । हुस्नलाल इससे पहले 28 दिसंबर 1968 को चल बसे थे।

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लोक प्रिय गीत

हुस्नलाल भगतराम की कुछ सर्वश्रेष्ठ रचनाओं की एक संक्षिप्त सूची निम्नलिखित है:

चले जाना नहीं ( बारी बहन )
चुप चुप खड़े हो ( बारी बहन )
वो मेरी तरफ यूं चले आ रहे - काफिला
लहरों से पूछ लो - काफ़िला
तेरे नैनों ने चोरी किया ( प्यार की जीत )
क्या यही तेरा प्यार था ( मिर्जा साहिबान )
हाथ सीने पे जो रख दो तो क़रार आ जाए ( मिर्जा साहिबान )
ओ परदेसी मुसाफिर, कैसे करता है इशारे ( बलम ) - लता मंगेशकर और सुरैया के बीच एक दुर्लभ युगल गीत
हमें दुनिया को दिल के जख्म ( आधी रात )
ओ माही ओ दुपट्टा मेरा देदे ( मीना बाजार )
अपना बना के छोड़ नहीं जाना ( मीना बाज़ार )
ऐ सनम, मैं तुझे पुकारूं सनमसनम ( सनम )
शाम ए बहार आई -शमा परवाना
अभी तो मैं जवां हूं ( अफसाना ) - लता मंगेशकर के सर्वश्रेष्ठ गीतों में से एक , यह वर्षों तक रेडियो सीलोन पर इसी नाम के एक लोकप्रिय कार्यक्रम का शीर्षक गीत था।
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उनके श्रेय वाली फ़िल्मों में शामिल हैं:

चांद, 1944, प्रभात फिल्म कंपनी , पुणे द्वारा
मिर्ज़ा साहिबान (1947 फ़िल्म) (इस फ़िल्म का एकमात्र संगीत पंडित अमरनाथ (बड़े चचेरे भाई) और दो भाई हुस्न लाल भगत राम तीनों ने तैयार किया था)
आज की रात (1948)
अमर कहानी , 1949
बड़ी बहन (1949)
बालम (1949)
प्यार की जीत (1948)
आधी रात (1950)
मीना बाज़ार (फ़िल्म) (1950)
अफसाना (1951)
सनम (1951)
काफिला (1952)
शमा परवाना (1954)
अदल-ए-जहाँगीर (1955 फ़िल्म)
शहीद भगत सिंह (1963 फ़िल्म)
मैं जट्टी पंजाब दी (1964) - पंजाबी फिल्म

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