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नोट↔️↔️वो जब याद आए...
यपुर निवासी बॉलीवुड के महान संगीत निर्देशक दान सिंह ने यूं तो आनंद बख्शी सहित कई गीतकारों की रचनाओं को अपनी धुनों से सजाया लेकिन इनमें गुलजार का लिखा एक गीत खास है, पुकारो मुझे नाम लेकर पुकारो, मुझे तुमसे अपनी खबर मिल रही है। इससे एक वाकया भी जुड़ा है। इस गीत के लिए बनाई गई दान सिंह की धुन चोरी हो गई थी इसीलिए उन्हें दोबारा नई धुन की रचना करनी पड़ी।
‘भूल जाना’ फिल्म का यह गीत आज भी मुकेश के लोकप्रिय गीतों में शुमार है। यह फिल्म रिलीज नहीं हो पाई थी लेकिन इसके गाने बाजार में गए थे, जिनमें यह गाना उस दौर में बहुत मकबूल हुआ। बांसुरी और सितार के साथ राग यमन कल्याण पर आधारित सुंदर रूमानी धुन पर मुकेश की यह बेमिसाल गायकी है। गुलजार की इस खूबसूरत शायरी का मुखड़े के साथ एक अंतरा ही देखें, क्या कुछ नहीं है इसमेः-
पुकारो मुझे मेरा नाम लेकर पुकारो
मुझे तुमसे अपनी खबर मिल रही है
खयालों में तुमने भी देखी तो होंगी
कभी मेरे ख्वाबों की धुंधली लकीरें,
तुम्हारी हथेली से मिलती हैं जा कर
मेरे हाथ की ये अधूरी लकीरें
बड़ी सर चढ़ी हैं ये जुल्फें तुम्हारी
ये जुल्फें मेरे बाजुओं में उतारो
पुकारो मुझे नाम लेकर पुकारो।
दान सिंह ने एक बार मुझे बातचीत में बताया था कि फिल्म पूरब-पश्चिम के गीत कोई जब तुम्हारा ह्रदय तोड़ दे...की धुन उन्होंने रात्रिकालीन पार्टी में एक गीतकार को सुना दी थी, जिसने इंपाला कार की कीमत पर यह धुन संगीतकार को बेच दी। उन दिनों इम्पाला कार के जलवों की चर्चा होती थी। यह बात अलग है कि दान सिंह अपने जीवन में कभी कार नहीं खरीद पाए और गुमनामी की जिंदगी जीते हुए साइकिल के पैडलों से ही जयपुर की सड़कें नापते रहे। ये वही दान सिंह थे जिन्होंने माई लव फिल्म के वो तेरे प्यार का गम...और जिक्र होता है कयामत का... जैसे मशहूर गीतों को धुनों से सजाया। इस फिल्म में लक्ष्मीकांत, प्यारेलाल, पं. शिव कुमार और हरि प्रसाद चौरसिया ने उनके सहायक के रूप में काम किया था। पंकज राग अपनी बहुचर्चित पुस्तक ‘धुनों की यात्रा’ के 767 नंबर पृष्ठ पर लिखते हैं, ‘यह कितना दुखदायी है कि इतने प्रतिभाशाली कम्पोजर की और कोई फिल्म पर्दे पर ही नहीं पाई। प्रतिभा के साथ किस्मत का होना भी हमारे फिल्म जगत में बहुत जरूरी है और एक ऐसा संगीतकार जिसके पास किसी का वरदहस्त था, फिल्मी दुनिया के षड्यंत्रों और तिकड़मों के सामने टिक पाया। पूरी तरह हताश दानसिंह वापस जयपुर लौट गए।’ दानसिंह इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी धुनें आज भी लोगों के दिलों में बसी हैं।
मुकेश (दाएं) ने दान सिंह (ऊपर) से कहा था-ये बंबई है, पार्टियों में अपनी धुनें सुनाएंगे तो चोरी ही हो जाएंगी।
पुकारो मुझे...गीत की धुन चोरी होने का भी एक दिलचस्प किस्सा है। जब मुकेश यह गीत रिकॉर्ड कराने आए तो धुन सुनकर बोले -"इस धुन पर तो गीत रिकॉर्ड हो चुका है। तुम्हीं मेरे मंदिर, तुम्हीं मेरी पूजा...।' दान सिंह ने हैरान होकर पूछा, यह धुन वहां कैसे चली गई? इस पर मुकेश का जवाब था, दान सिंह जी यह बंबई है। आप तरल-गरल पार्टी में लोगों को धुन सुना देंगे तो यही होगा। दान सिंह ने बिना निराश हुए कहा, इससे क्या फर्क पड़ता है? एक घंटे में जाइए, मैं दूसरी धुन तैयार कर देता हूं। नई धुन पर यह गीत आज भी यू-ट्यूब पर सुना जा सकता है। दान सिंह की धुन चोरी होने का यह अकेला वाकया नहीं है। कितने लोगों को मालूम होगा कि इंदीवर के लिखे सदाबहार गीत, ‘चंदन सा बदन चंचल चितवन...’ की धुन दान सिंह की बनाई हुई है। दरअसल दान सिंह ने इंदीवर के लिखे इस गीत की धुन फिल्म भूल ना जाना के लिए बनाई थी लेकिन जब उन्हें पता चला कि यह फिल्म रिलीज नहीं हो रही है तो इंदीवर ने निर्माता जगन शर्मा से इजाजत लेकर यह गीत फिल्म सरस्वती चंद्र के लिए कल्याण जी आनंदजी को दे दिया। गीत के साथ ही यह धुन भी उनके पास पहुंच गई। इंदीवर ने जब भूल जाना के लिए यह गीत लिखा, तब चंदन सा बदन वाली पंक्ति मुखड़े में नहीं, अंतरे में थी। तब इसका मुखड़ा था- मतवाले नयन, जैसे नील गगन/पंछी की तरह खो जाऊं मैं। बाद में अंतरे को उठा कर मुखड़ा बना दिया गया लेकिन इसकी धुन दान सिंह वाली है।
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प्रसिद्ध संगीतकार दान सिंह की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रधांजलि
दान सिंह जयपुर राजस्थान के रहनेवाले थे, जिन्होंने संगीतकार खेमचंद प्रकाश से संगीत सीखा। वो एक अच्छा संगीतकार होने के साथ साथ एक अच्छा गायक भी थे। मुंबई आकर दो साल के संघर्ष के बाद 1969 में उनको पहला अवसर मिला किसी फ़िल्म में संगीत देने का और वह फ़िल्म थी 'तूफ़ान'। यह फ़िल्म नहीं चली। उसके अगले ही साल आई फ़िल्म 'माइ लव', जिसके गीतों नें धूम मचा दी। लेकिन अफ़सोस की बात कि 'माइ लव' के गीतों की अपार कामयाबी के बावजूद किसी नें उनकी तरफ़ न कोई तारीफ़ की और न ही कोई प्रोत्साहन मिला। वो पार्टियों में जाते और अपनी धुनें सुनाते। "वो तेरे प्यार का ग़म, एक बहाना था सनम" गीत में दान सिंह नें जिस तरह से राग भैरवी का इस्तेमाल किया, संगीतकार मदन मोहन को इतना प्रभावित किया कि उन्होंने दान सिंह को कहा था कि "भैरवी का इस्तेमाल तो हमने भी किया, पर आप इसमें ऐसा वेरिएशन कैसे ले आये?" दान सिंह को किसी नें मौका तो नहीं दिया पर उन पार्टियों में मौजूद कुछ नामी संगीतकार उनकी धुनों को चुराने लगे और अपने गीतों में उन्हें इस्तेमाल करते रहे। इससे वो इतने हताश हो गए कि अपनी डॉक्टर पत्नी उमा के साथ जयपुर लौट गए। जयपुर लौटने से पहले उन्होंने 'भूल न जाना', 'मतलबी' और 'बहादुर शाह ज़फ़र' जैसी फ़िल्मों में संगीत दिया, पर इनमें से कोई भी फ़िल्म नहीं चली।
संगीत निर्देशक दान सिंह ने यूं तो आनंद बख्शी सहित कई गीतकारों की रचनाओं को अपनी धुनों से सजाया लेकिन इनमें गुलजार का लिखा एक गीत खास है, पुकारो मुझे नाम लेकर पुकारो, मुझे तुमसे अपनी खबर मिल रही है। इससे एक वाकया भी जुड़ा है। इस गीत के लिए बनाई गई दान सिंह की धुन चोरी हो गई थी इसीलिए उन्हें दोबारा नई धुन की रचना करनी पड़ी।
भूल जाना’ फिल्म का यह गीत आज भी मुकेश के लोकप्रिय गीतों में शुमार है। यह फिल्म रिलीज नहीं हो पाई थी लेकिन इसके गाने बाजार में गए थे, जिनमें यह गाना उस दौर में बहुत मकबूल हुआ। बांसुरी और सितार के साथ राग यमन कल्याण पर आधारित सुंदर रूमानी धुन पर मुकेश की यह बेमिसाल गायकी है।
दान सिंह ने एक बार बातचीत में बताया था कि फिल्म पूरब-पश्चिम के गीत कोई जब तुम्हारा ह्रदय तोड़ दे...की धुन उन्होंने रात्रिकालीन पार्टी में एक गीतकार को सुना दी थी, जिसने इंपाला कार की कीमत पर यह धुन संगीतकार को बेच दी। उन दिनों इम्पाला कार के जलवों की चर्चा होती थी। यह बात अलग है कि दान सिंह अपने जीवन में कभी कार नहीं खरीद पाए और गुमनामी की जिंदगी जीते हुए साइकिल के पैडलों से ही जयपुर की सड़कें नापते रहे। ये वही दान सिंह थे जिन्होंने माई लव फिल्म के वो तेरे प्यार का गम...और जिक्र होता है कयामत का... जैसे मशहूर गीतों को धुनों से सजाया। इस फिल्म में लक्ष्मीकांत, प्यारेलाल, पं. शिव कुमार और हरि प्रसाद चौरसिया ने उनके सहायक के रूप में काम किया था। पंकज राग अपनी बहुचर्चित पुस्तक ‘धुनों की यात्रा’ के 767 नंबर पृष्ठ पर लिखते हैं, ‘यह कितना दुखदायी है कि इतने प्रतिभाशाली कम्पोजर की और कोई फिल्म पर्दे पर ही नहीं पाई। प्रतिभा के साथ किस्मत का होना भी हमारे फिल्म जगत में बहुत जरूरी है और एक ऐसा संगीतकार जिसके पास किसी का वरदहस्त था, फिल्मी दुनिया के षड्यंत्रों और तिकड़मों के सामने टिक पाया। पूरी तरह हताश दानसिंह वापस जयपुर लौट गए।’ दानसिंह इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी धुनें आज भी लोगों के दिलों में बसी हैं।
मुकेश ने दान सिंह से कहा था-ये बंबई है, पार्टियों में अपनी धुनें सुनाएंगे तो चोरी ही हो जाएंगी।
पुकारो मुझे...गीत की धुन चोरी होने का भी एक दिलचस्प किस्सा है। जब मुकेश यह गीत रिकॉर्ड कराने आए तो धुन सुनकर बोले -"इस धुन पर तो गीत रिकॉर्ड हो चुका है। तुम्हीं मेरे मंदिर, तुम्हीं मेरी पूजा...।' दान सिंह ने हैरान होकर पूछा, यह धुन वहां कैसे चली गई? इस पर मुकेश का जवाब था, दान सिंह जी यह बंबई है। आप तरल-गरल पार्टी में लोगों को धुन सुना देंगे तो यही होगा। दान सिंह ने बिना निराश हुए कहा, इससे क्या फर्क पड़ता है? एक घंटे में जाइए, मैं दूसरी धुन तैयार कर देता हूं। नई धुन पर यह गीत आज भी यू-ट्यूब पर सुना जा सकता है। दान सिंह की धुन चोरी होने का यह अकेला वाकया नहीं है। कितने लोगों को मालूम होगा कि इंदीवर के लिखे सदाबहार गीत, ‘चंदन सा बदन चंचल चितवन...’ की धुन दान सिंह की बनाई हुई है। दरअसल दान सिंह ने इंदीवर के लिखे इस गीत की धुन फिल्म भूल ना जाना के लिए बनाई थी लेकिन जब उन्हें पता चला कि यह फिल्म रिलीज नहीं हो रही है तो इंदीवर ने निर्माता जगन शर्मा से इजाजत लेकर यह गीत फिल्म सरस्वती चंद्र के लिए कल्याण जी आनंदजी को दे दिया। गीत के साथ ही यह धुन भी उनके पास पहुंच गई। इंदीवर ने जब भूल जाना के लिए यह गीत लिखा, तब चंदन सा बदन वाली पंक्ति मुखड़े में नहीं, अंतरे में थी। तब इसका मुखड़ा था- मतवाले नयन, जैसे नील गगन/पंछी की तरह खो जाऊं मैं। बाद में अंतरे को उठा कर मुखड़ा बना दिया गया लेकिन इसकी धुन दान सिंह वाली है।
बरसों बाद राजस्थान की पृष्ठभूमि पर फ़िल्म बनी 'बवंडर', जिसका संगीत तैयार किया दान सिंह नें, और उन्होंने यह साबित भी किया कि उनके संगीत में ठेठ और जादू आज भी बरक़रार है। विषय-वस्तु की वजह से फ़िल्म चर्चा में तो आई पर एक बार फिर दान सिंह का संगीत नहीं चल पाया। क़िस्मत के सिवा किसे दोष दें!!! किसी पत्रकार नें जब एक बार उनकी असफलता का कारण पूछा तो उनका जवाब था, "न पूछिये अपनी दास्तान।" दान सिंह के जीवन को देख कर यह स्पष्ट है कि प्रतिभा के साथ साथ क़िस्मत का होना भी अत्यावश्यक है, वर्ना इतने प्रतिभाशाली और सुरीले संगीतकार होने के बावजूद क्यों किसी नें उन्हें बड़ी फ़िल्मों में मौका नहीं दिया होगा! ख़ैर, आज इन सब बातों में उलझकर क्या फ़ायदा। आज दान सिंह हमारे बीच नहीं है, पर इस बात की संतुष्टि ज़रूर है कि अच्छे संगीत के रसिक कभी उनके कम पर स्तरीय योगदान को नहीं भूलेंगे।
18 जून 2011 में संगीतकार दान सिंह का निधन हो गया।
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