शनिवार, 24 फ़रवरी 2024

नक्श लायल पूरी

#24feb
#22jan 
महान गीतकार शायर नक़्श लायलपुरी

🎂24 फरवरी, 1928
⚰️22 जनवरी 2017

पंजाब के लायलपुर अब पाकिस्तान का हिस्सा में 24 फरवरी, 1928 को जन्मे लायलपुरी के वालिद मोहतरम जगन्नाथ ने उनका नाम जसवंत राय शर्मा रखा था। शायर बनने के बाद उन्होंने अपना नाम बदल लिया और बन गए नक्श लायलपुरी। साहित्य में उनकी दिलचस्पी उनके स्कूल के दिनों में ही दिख गई, जब उनकी स्कूल टीचर साल के अंत में उनकी कॉपी इसलिए खरीदती थीं, क्योंकि उनमें उनकी कविताएं लिखी होती थीं। साल 1947 में भारत और पाकिस्तान के विभाजन के बाद उनका परिवार शरणार्थियों के एक काफिले के साथ उस पार के पंजाब से भारत में लखनऊ आ गया। पान खाने और मुस्कराने की आदत उनको लखनऊ से ही मिली। उनकी शख़्सियत में वही नफ़ासत और तहज़ीब है जो लखनऊ वालों में होती है। लखनऊ की अदा और तवस्सुम उनकी इल्मी और फ़िल्मी शायरी में मौजूद है-

कई बार चाँद चमके तेरी नर्म आहटों के
कई बार जगमगाए दरो-बाम बेख़ुदी में

भारत और पाकिस्तान के विभाजन के दर्द को उन्होंने अपनी आंखों से देखा था और बंटवारे के दर्द को बहुत ही करीब से महसूस किया था और यह उनकी शायरी में बखूबी नजर आया-

हमने क्या पा लिया हिंदू या मुसलमां होकर
क्यूं न इंसा से मोहब्बत करें इंसा होकर

नक्श लायलपुरी के ग़ज़ल का चेहरा दर्द के शोले में लिपटे हुए शबनमी एहसास की लज़्ज़त से तरबतर है। शायरी के इस समंदर में एक तरफ़ फ़िक्र की ऊँची-ऊँची लहरें हैं तो दूसरी तरफ़ इंसानी जज़्बात की ऐसी गहराई है जिसमें डूब जाने को मन करता है। कहते हैं नाम भले भूल जाए, लफ्ज बचे रहते हैं, और अगर लफ्ज इतने पाकीजा हों तो तो वे सिर्फ बचे ही नहीं रहते, हर दिल का राग बन जाते हैं। नक़्श साहब की शायरी में पंजाब की मिट्टी की महक, लखनऊ की नफ़ासत और मुंबई के समंदर का धीमा-धीमा संगीत है-

मेरी पहचान है शेरो-सुख़न से
मैं अपनी क़द्रो क़ीमत जानता हूं

ज़िंदगी के तजुरबात ने उनके लफ़्ज़ों को निखारा संवारा और शायरी के धागे में इस सलीक़े से पिरो दिया कि उनके शेर ग़ज़ल की आबरू बन गए। फ़िल्मी नग़मों में भी जब उनके लफ़्ज़ गुनगुनाए गए तो उनमें भी अदब बोलता और रस घोलता दिखाई दिया–

ये मुलाक़ात इक बहाना है
प्यार का सिलसिला पुराना है
धड़कने धड़कनों में खो जायें
दिल को दिल के क़रीब लाना है
ख़्वाब तो कांच से भी नाज़ुक है
टूटने से इन्हें बचाना है
मन मेरा प्यार का शिवाला है
आप को देवता बनाना है
मैं हूँ अपने सनम के बाहों में
मेरे क़दमों तले ज़माना है

नक़्श लायलपुरी 1951 में रोज़गार की तलाश में मुंबई आए और यहीं के होकर रह गए। लाहौर में तरक़्क़ीपसंद तहरीक का जो जज़्बा पैदा हुआ था उसे मुंबई में एक माहौल मिला-

ये अंजुमन, ये क़हक़हे, ये महवशों की भीड़
फिर भी उदास, फिर भी अकेली है ज़िंदगी 

गीतकार के रूप में उन्हें पहला मौका 1952 में मिला था, लेकिन 1970 के दशक के प्रारंभ तक उन्हें खास सफलता नहीं मिल पाई। बाद में उन्होंने कई शीर्ष फिल्म निर्देशकों, संगीत निर्देशकों और गायकों के साथ काम किया और सुमधुर, रूमानी और भावनात्मक गीत लिखे, जो लाखों दिलों को छू गया। लायलपुरी के लिखे कुछ सर्वश्रेष्ठ गीतों में 'मैं तो हर मोड़ पर', 'ना जाने क्या हुआ, जो तूने छू लिया', 'उल्फत में जमाने की हर रस्म को ठुकरा' और 'दो दीवाने शहर में' शामिल हैं। नौशाद के साथ 'ताजमहल' और खय्याम के साथ 'यात्रा' जैसी फिल्मों के लिए गीत लिखे थे। नक्श लायलपुरी कहते हैं कि गीतकार के रूप में उन्हें बुलंदी बी.आर. इशारा की फिल्म 'चेतना' से मिली और उसमें उनकी नज्म 'मैं तो हर मोड़ पर तुमको दूंगा सदा' को अधिक सराहा गया। नक्श लायलपुरी के फिल्मी गानों की बहुत दिनों तक धूम रही। उन्होंने जयदेव, खैय्याम, मदन मोहन और रोशन के साथ खूब काम किया, लेकिन मदन मोहन से काफी प्रभावित थे। उनका कहना था कि मदन मोहन जी का जजमेंट काफी अच्छा था। सुरों के साथ गीत की भी उन्हें अच्छी परख थी। एक बार नक्श जी उन्हें एक गीत लिखकर दिया-
 
आपकी बातें करें या अपना अफसाना कहें,
होश में दोनों नहीं हैं, किसको दीवाना कहें।।

इस गीत को सुनकर वह खुशी से उछल पड़े और नक्श को गले लगाते हुए कहा कि यह तो लाजवाब मुखड़ा है। इसे हम चाहें तो कव्वाली बना लें, गीत बना लें या फिर गजल बना लें। गायकी की हर विधा में नक्श यह बेजोड़ हैं. उनके गीतों को सभी ने सराहा- 

माना तेरी नज़र में तेरा प्यार हम नहीं
कैसे कहें के तेरे तलबगार हम नहीं
सींचा था जिस को ख़ूने तमन्ना से रात दिन
गुलशन में उस बहार के हक़दार हम नहीं
हमने तो अपने नक़्शे क़दम भी मिटा दिए
लो अब तुम्हारी राह में दीवार हम नहीं

हिंदी फिल्मों में कितने ही कालजयी गीत लिखने वाले नक्श लायलपुरी साहब का 22 जनवरी 2017 को मुंबई में 89 वर्ष की उम्र में इंतकाल हो गया। ये फ़नकार अपनी उम्र के अंतिम दिनों में लगभग गुमनामी की ज़िंदगी जीता रहा-

बोझ होता जो ग़मों का तो उठा भी लेते
ज़िंदगी बोझ बनी हो तो उठाएं कैसे
कुछ प्रसिद्ध गीत
  • धानी चुनर मोरी हाए रे
  • मैं तो हर मोड़ पर तुझको दूंगा सदा
  • कई सदियों से कई जन्मों से
  • उल्फ़त में ज़माने की हर रस्म को ठुकराओ
  • तुम्हें देखती हूं तो लगता है ऐसे
  • ये मुलाक़ात इक बहाना है
  • क़दर तूने ना जानी
  • चांदनी रात में एक बार तुझे देखा है
  • चिट्ठिए
  • तुम्हें हो न हो मुझको तो
  • प्यार का दर्द है मीठा मीठा प्यारा प्यारा
  • सीने में भी तूफ़ां है
  • न जाने क्या हुआ,जो तूने छू दिया
  • तुझ संग प्रीत लगाई सजना
  • नन्हा मुन्ना राही हूं, देश का सिपाही हूं
  • जिंदगी की न टूटे लड़ी,प्यार कर ले घड़ी दो घड़ी
  • मेरे देश की धरती सोना उगले,उगले हीरे मोती

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