#24feb
गीतकार समीर
🎂24 फ़रवरी 1958 , वाराणसी , ओदार गाँव।
पत्नी: अनीता पांडे
माता-पिता: अनजान, इंदिरा पांडे
बच्चे: सुचिता पांडे, सिद्धेश पांडे, संचिता पांडे
उनके पिता अंजान हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के प्रसिद्ध गीतकार थे
समीर हिन्दी फिल्मों के एक प्रसिद्ध गीतकार हैं।
इनके ज्यादातर गीत हिट हुए और इनके द्वारा लिखें गए गीत आज भी लोगोंं की जुबानोंं पर हैं। उनके पिता अनजान भी गीतकार रहे थे। उनके पास सबसे अधिक गीत लिखने का गिनीज़ विश्व कीर्तिमान है। उन्होंने लगभग 650 फिल्मों में 4000 से अधिक गाने लिखे हैं। उन्हें यश भारती पुरस्कार भी मिला है।
पहले वह पढ़ाई कर बैंक में नौकरी करते थे। उनके पिता नहीं चाहते कि वो फिल्मी उद्योग में आए क्योंकि उन्होंने खूब संघर्ष किया था। लेकिन समीर का ध्यान उसी तरफ था और 1980 में वो बम्बई पलायन कर गए। उन्हें सबसे पहले 1983 की फिल्म बेखबर में गीत लिखने का अवसर मिला था इसके बाद उन्होंने कई बड़ी फिल्मों में गीत लिखें जिसमें इंसाफ कौन करेगा (1984),
जवाब हम देंगे (1987),
दो कैदी (1989),
रखवाला (1989),
महासंग्राम (1990)
और बाप नम्बरी बेटा दस नम्बरी (1990) शामिल हैं।
लेकिन उनको प्रसिद्धि और पहचान 1990 की दो फ़िल्मों दिल और आशिकी से मिली उन्होंने इन फिल्मों के संगीतकार आनंद-मिलिंद और नदीम-श्रवण के साथ कई प्रशंसित और लोकप्रिय गीतों की रचना की विशेषकर नदीम-श्रवण के साथ उनका विशेष रिश्ता था। कुछेक फिल्मों को छोड़कर उन्होंने हर फिल्म में गीतकार के रूप में समीर को ही लिया और तीनों फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार उन्हें नदीम-श्रवण के संगीतबद्ध गीतों के लिये ही मिले। समीर मजरुह सुल्तानपुरी और आनन्द बक्शी से प्रभावित हैं और उन्हें अपने पिता सहित प्रेरणा स्त्रोत मानते हैं।
इनके ज्यादातर गीत हिट हुए और इनके द्वारा लिखें गए गीत आज भी लोगोंं की जुबानोंं पर हैं। उनके पिता अनजान भी गीतकार रहे थे। उनके पास सबसे अधिक गीत लिखने का गिनीज़ विश्व कीर्तिमान है। उन्होंने लगभग 650 फिल्मों में 4000 से अधिक गाने लिखे हैं।उन्हें यश भारती पुरस्कार भी मिला है।
✍️उन्हों ने बताया
एम. कॉम करने के बाद मेरे दादा शिवनाथ प्रसाद जी की इच्छा थी कि मैं बैंक में काम करूं। दादा जी सेंट्रल बैंक ऑफ इण्डिया में काम करते थे। घर से कोई दूसरा बैंक नौकरी में गया नहीं और, चूंकि मैं एमकॉम कर रहा था तो सबकी टकटकी मेरे ही ऊपर थी और मैंने सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया ज्वाइन कर लिया। लेकिन इसी बीच गीत लिखने का शौक बलवान हो गया, लोग मेरी कवि सम्मेलनों और मुशायरों में खूब तारीफ करते थे। बैक ज्वाइन करने के बाद मुझे लगा कि यह जगह मेरे लायक नहीं है। मैं गलत कर रहा हूं। दिल कुछ और बोल रहा है और मैं मजबूरी में कुछ और कर रहा हूं। दो दिन सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया में नौकरी करने के बाद नौकरी छोड़ दी
बैंक की नौकरी छोड़ने के बाद मां से 500 रुपये लेकर 5 अप्रैल 1980 को काशी एक्सप्रेस पकड़कर 6 अप्रैल को मुंबई की सरजमीं पर आ गया। पिता जी की मंशा थी कि मैं कुछ भी बनूं लेकिन गीतकार ना बनूं। वह कहते थे कि शौकिया तुम लिखते हो लिखते रहो, उसमे मुझे कोई ऐतराज नहीं है मगर कभी इस तरफ रुख मत करना। इसलिए उन्होंने मुझे साहित्य न पढ़ाकर कॉमर्स पढ़ाया। जब मुंबई में आया तो पिता जी से मिलने की हिम्मत नहीं हुई। गीतकार बनने का फैसला मेरा था, इसलिए मुझे अपनी अलग लड़ाई लड़नी थी।
मुंबई आने के बाद शुरुआती दिनों में बहुत संघर्ष किया। उन दिनों मलाड मालवानी चाल में रहता था। शुरुआती एक साल का जो संघर्ष था। आज भी याद करता हूं तो मेरी रूह कांप जाती है कि मैं कैसे रहा? न तो सही तरीके से खाना नसीब होता था और न ही रहने की सही व्यवस्था थी। शौच के लिए भी एक घंटे लाइन लगानी पड़ती थी। लेकिन इसके सिवा मेरे पास कोई विकल्प नहीं था। तकरीबन नौ साल की लड़ाई के बाद सफलता फिल्म 'दिल' से मिली और इसके बाद मेरी दुनिया बदल गई।
पिताजी ने एक बार मुझे लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल से मिलवाया। लक्ष्मीकांत जी बोले, 'अनजान जी मुझसे तो कह दिया। किसी और से मत कहिएगा। एक बात याद रखिए बाप की दुकान बाप की होती है और बेटे की दुकान बेटे की होती है। अगर इसके अंदर माद्दा है तो मुझे खुद मुखड़ा सुना कर प्रभावित करे। मैं चार साल तक लगातार चक्कर लगाता रहा। चार साल बाद फिल्म 'लव 86' में एक गाना लिखने का मौका दिया। मेरा मानना है कि जीवन की लड़ाइयां तो खुद ही लड़नी पड़ती है।
संगीतकार ऊषा खन्ना के घर पहुंचा। उनको सिर्फ चार गाने सुनाए और उन्होंने उसमें से दो गाने तुरंत फाइनल कर दिए। इस तरह से मुझे पहली फिल्म 'बेखबर' में 'गोरी परेशान है,काली परेशान है' लिखने का मौका मिला।
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