बुधवार, 23 अगस्त 2023

सहायक संगीतकार सपन चौधरी

🎂जन्म अज्ञात ।
⚰️निधन 23 अगस्त 1995
सपन चक्रवर्ती एक भारतीय गायक और संगीतकार थे। वह बंगाली और बॉलीवुड या हिंदी फिल्मों के लिए संगीत तैयार करते थे। सपन ने अपनी शिक्षा कलकत्ता विश्वविद्यालय से पूरी की। वह राहुल देव बर्मन के सहयोग से काम कर रहे थे। उन्होंने राहुल बर्मन की बंगाली फिल्मों के लिए कई गानों के बोल लिखे। सपन एक सामयिक पार्श्व गायक भी थे। गीतों की रचना करने के साथ-साथ, जिसके लिए वह संगीतकार थे, उन्होंने दुर्गा पूजा विशेष एल्बम के लिए गीत भी लिखे। उनकी रचना शैली ने उनके गुरु राहुल देव बर्मन को प्रभावित किया। उनका दुखद ⚰️निधन 23 अगस्त 1995 को कोलकाता में हुआ।
उन्होंने वर्ष 1973 में नया नशा, वर्ष 1974 में 36 घंटे और जब अंधेरा होता है जैसी हिंदी फिल्मों के लिए संगीत दिया। वह वर्ष 1975 में फिल्म ज़मीर में संगीतकार भी थे। बंगाली फिल्मों में उनका डेब्यू इसी फिल्म से हुआ था। वर्ष 1984 में फिल्म मोहोनार डाइक। वर्ष 1988 में, वह चार बंगाली फिल्मों के लिए संगीतकार थे, जिनके नाम शूरेर अकाशे, तुफान, चोटो बौ और मोनिमाला थे। वर्ष 1989 में उन्होंने फिल्म कारी दिये किल्लम में अपनी संगीत रचना का कौशल दिखाया। वर्ष 1990 में मोनमायुरी, मदंदा और महाजन ऐसी फिल्में हैं जिनके निर्माता वह थे। अगले वर्ष, उन्होंने अन्य बंगाली फिल्मों, बिधिलिपि और निलिमाय निल के लिए गाने तैयार किए। वर्ष 1992 में महाशोय, 1995 में अंतोरतामा, 1997 में सर्बजया और अंत में वर्ष 1998 में मेयर डिबयी जैसी फिल्मों में उन्होंने संगीतकार के रूप में काम किया।
किताब का गाना मेरे साथ चले ना साया उनके हिट गानों में से एक था। उन्होंने अपने गुरु राहुल देव बर्मन के साथ तीन गाने गाए, गोलमाल से गोलमाल है भाई, नरम नरम रात में।नर्म गर्म, और साथ में किशोर कुमार, सत्ते पे सत्ता से प्यार हमें किस मोड़ पर। उन्होंने भूपिंदर सिंह के साथ रतनदीप का गाना 'हो सजन आए हो' बनाया। पार्श्व गायक के रूप में सपन चक्रवर्ती द्वारा रचित हर गीत यादगार हैं।
जीवनी
सपन चक्रवर्ती को विभिन्न नामों से भी जाना जाता है: स्वपन चक्रवर्ती, सपन चक्रवर्ती, सपन चक्रवर्ती (बंगाली: স্বপন চক্রবর্তী) या बस सपन एक बंगाली भारतीय संगीतकार हैं जिन्होंने बॉलीवुड हिंदी और बंगाली फिल्मों के लिए संगीत तैयार किया है। वह राहुल देव बर्मन के संगीत सहायक और सामयिक पार्श्व गायक भी थे। उन्होंने बर्मन की बंगाली फिल्म और दुर्गा पूजा विशेष एल्बमों के गीतों के साथ-साथ उन फिल्मों के गीतों के लिए भी कई गीत लिखे, जिनमें वे संगीतकार थे। रचना शैली के संदर्भ में, उनके गुरु राहुल देव बर्मन का उदार प्रभाव उनकी रचनाओं में मौजूद है, जिसमें 1978 की फिल्म शालीमार का फंक क्लासिक बेबी लेट्स डांस टुगेदर (बर्मन द्वारा नहीं लिखा गया फिल्म का एकमात्र गीत) भी शामिल है
नया नशा (1973)
36 घंटे (1974)
जब अँधेरा होता है (1974)
ज़मीर (1975)
बंगाली 
मोहोनार डाइक (जिसे मोहोनार डाइके भी कहा जाता है ) (1984)
शुरेर आकाशे ( सुरेर आकाशे और शुरेर आकाशे भी लिखा जाता है ) (1988)
तूफ़ान ( तुफ़ान भी लिखा जाता है ) (1988)
छोटो बौ ( छोटो बौ , छोटोबौ और छोटोबौ भी लिखा जाता है (1988)
मोनिमाला (1989)
कारी दिए किनलम (1989)
मोनमायुरी (1990)
मदंदा (1990)
महाजन (जिसे मोहजोन भी कहा जाता है ) (1990)(1991)
बिधिलिपि (1991)
नीलिमय निल (जिसे नीलिमय नील भी कहा जाता है ) (1991)
महाशय (जिसे महाशय भी कहा जाता है ) (1992)
अंतोरातामा ( अंतरतामा और ओन्टोरोटोमो भी लिखा जाता है )(1995)
सर्बजया ( शोरबोजोया भी लिखा जाता है ) (1997)
मायेर डिब्यी ( मेयर डिब्यी भी लिखा जाता है ) (1998)
पार्श्वगायक के रूप में यादगार गीत 
बालिका बधु से आओ रे आओ खेलो
गोलमाल से राहुल देव बर्मन के साथ गोलमाल है भाई
हो सजन आये हो रत्नदीप से भूपिंदर सिंह के साथ
ख़ूबसूरत की रेखा के साथ कायदा कायदा आख़िर फ़ायदा
किताब से मेरे साथ चले ना साया
अंगूर से प्रीतम आन मिलो
शौकीन से हम तुम और ये नशा नशा
नरम गरम से राहुल देव बर्मन के साथ नरम नरम रात में
सत्ते पे सत्ता से राहुल देव बर्मन और किशोर कुमार के साथप्यार हमें किस मोड़ पे ले आया
आरडी बर्मन के सहायक संगीतकार,गायक  सपन चक्रवर्ती की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि

कहा जाता है कि घने बरगद के साए तले कोई दूसरा पौधा नहीं पनप पाता। संगीतकार सपन चक्रवर्ती के साथ यह कहावत काफी हद तक सही साबित हुई। वे आर.डी. बर्मन  के पांच सहायकों में से एक थे। जाहिर है, गुणी थे, विभिन्न वाद्यों (खासकर आर.डी. बर्मन के पसंदीदा इलेक्ट्रॉनिक वाद्यों) की गहरी समझ रखते थे, लेकिन स्वतंत्र संगीतकार की हैसियत से वे हिन्दी फिल्मों में लम्बी पारी नहीं खेल पाए। अमिताभ बच्चन और सायरा बानो की 'जमीर' (1975) में उनका संगीत ताजा बहार के खुशबूदार झोंकों की तरह था। इस फिल्म के किशोर कुमार  की आवाज वाले 'तुम भी चलो हम भी चलें, चलती रहे जिंदगी', 'जिंदगी हंसने-गाने के लिए है पल दो पल' और 'फूलों के डेरे हैं, साए घनेरे हैं' अपने जमाने में खूब चले। आज भी गुनगुनाए जाते हैं। साहिर लुधियानवी की शायरी को सपन चक्रवर्ती ने मूड के हिसाब से धुनों में बांधा, लेकिन फिल्म इंडस्ट्री के उन मंत्रों को मुट्ठी में नहीं बांध पाए, जो किसी फनकार की कामयाबी के सिलसिले को आगे बढ़ाते हैं।

नंदा की 'नया नशा' (1973) संगीतकार की हैसियत से सपन चक्रवर्ती की पहली फिल्म थी। इसमें 'आओ करें बातें' (लता मंगेशकर), एक लड़की ले गई दिल (किशोर कुमार) और 'कश पे कश लगाने दे' (आशा भौसले) जैसे गाने थे। हरि दत्त के निर्देशन में बनी यह फिल्म नहीं चली। इसलिए इसके संगीत को उभरने का मौका नहीं मिला। सपन चक्रवर्ती की दूसरी फिल्म 'छत्तीस घंटे' (1974) की भी यही कहानी रही। राज तिलक के निर्देशन में बनी यह फिल्म सुनील दत्त, राज कुमार, माला सिन्हा, परवीन बॉबी और डैनी जैसे सितारों के जमघट के बावजूद बॉक्स ऑफिस पर ढेर हो गई। यहां भी सपन चक्रवर्ती और साहिर की सलीकेदार जुगलबंदी थी। तीन गाने 'यहां बंधु आते को है जाना' (मुकेश), 'चुप हो आज कहो क्या है बात' (किशोर कुमार, आशा भौसले) और 'तीनों लोक पर राज तिहारा' (आशा, महेंद्र कपूर) अच्छे थे। उनकी एक और फिल्म 'जब अंधेरा होता है' (1974) कब आई, कब गई, किसी का ध्यान नहीं गया।

सपन चक्रवर्ती शौकिया गायक थे। आर.डी. बर्मन ने उनसे कई गाने गवाए। इनमें अमिताभ बच्चन की 'सत्ते पे सत्ता' का 'प्यार हमें किस मोड़ पे ले आया' आज भी लोकप्रिय है। सपन चक्रवर्ती के अलावा इसमें किशोर कुमार और आर.डी. बर्मन की आवाज है। बतौर गायक उनके दूसरे गानों में 'गोलमाल है भई सब गोलमाल है' (गोलमाल/ आर.डी. के साथ), मेरे साथ चले न साया (किताब), प्रीतम आन मिलो (अंगूर) और 'कायदा कायदा' (खूबसूरत/ रेखा के साथ) शामिल हैं। आर.डी. बर्मन के देहांत के सालभर बाद 23 अगस्त, 1995 को सपन चक्रवर्ती भी दुनिया को अलविदा कह गए।

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