महान फ़िल्म निर्देशक, पटकथा लेखक, निर्माता एवं पत्रकार ख्वाजा अहमद अब्बास की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि
*🎂जन्म 07जून*
*⚰️01जून*
ख़्वाजा अहमद अब्बास मुल्क़ के उन गिने चुने लेखकों में शामिल हैं जिन्होंने अपने लेखन से पूरी दुनिया को मुहब्बत, अमन और इंसानियत का पैग़ाम दिया। अब्बास ने न सिर्फ फ़िल्मों, बल्कि पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्र में भी नए मुक़ाम कायम किए। तरक्क़ीपसंद तहरीक से जुड़े हुए कलमकारों और कलाकारों की फ़ेहरिस्त में ख़्वाज़ा अहमद अब्बास का नाम बहुत अदब से लिया जाता है। आज उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें खिराज़-ऐ-अक़ीदत ~ 🌷
ख्वाज़ा अहमद अब्बास का जन्म 7 जून, 1914 को हरियाणा के पानीपत में हुआ था। उनके दादा ख़्वाजा ग़ुलाम अब्बास 1857 स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख सेनानियों में से एक थे और वह पानीपत के पहले क्रांतिकारी थे, जिन्हें तत्कालीन अंग्रेज़ हुक़ूमत ने तोप के मुँह से बाँधकर शहीद किया था। इस बात का भी शायद ही बहुत कम लोगों को इल्म हो कि ख़्वाज़ा अहमद अब्बास, मशहूर और मारूफ़ शायर मौलाना अल्ताफ हुसैन हाली के परनवासे थे। यानी वतन के लिए कुछ करने का जज्बा और जोश उनके ख़ून में ही था। अदब से मुहब्बत की तालीम उन्हें विरासत में मिली थी।
ख़्वाज़ा अहमद अब्बास की शुरूआती तालीम हाली मुस्लिम हाई स्कूल में और आला तालीम अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में हुई। उनके अंदर एक रचनात्मक बैचेनी नौजवानी से ही थी।
अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद अब्बास जिस सबसे पहले अख़बार से जुड़े, वह ‘बॉम्बे क्रॉनिकल’ था। इस अखबार में बतौर संवाददाता और फ़िल्म समीक्षक उन्होंने साल 1947 तक काम किया। अपने दौर के मशहूर साप्ताहिक ‘ब्लिट्ज’ से उनका नाता लंबे समय तक रहा। इस अखबार में प्रकाशित उनके कॉलम ‘लास्ट पेज’ ने उन्हें देश भर में काफी शोहरत प्रदान की।
तेज़ी से काम करना, लफ्फाजी और औपचारिकता से परहेज, नियमितता और साफ़गोई ख़्वाजा अहमद अब्बास के स्वभाव का हिस्सा थे। विनम्रता उनकी शख्सियत को संवारती थी।
कथाकार राजिंदर सिंह बेदी ने अब्बास की शख्सियत के बारे में लिखा है ~
"एक चीज जिसने अब्बास साहब के सिलसिले में मुझे हमेशा विर्त-ए-हैरत (अचंभे का भंवर) में डाला है, वह है उनके काम की हैरतअंगेज ताकतो-कूव्वत। कहानी लिख रहे हैं और उपन्यास भी। कौमी या बैनुल-अकवामी (अंतरराष्ट्रीय) सतह पर फिल्म भी बना रहे हैं और सहाफत को भी संभाले हुए हैं। आगे लिखते हैं, फिर पैंतीस लाख कमेटियों का मेंबर होना सामाजिक जिम्मेदारियों का सबूत है और यह बात मेंबरशिप तक ही महदूद नहीं। हर जगह पहुंचेंगे भी, तकरीर भी करेंगे। पूरे हिंदुस्तान में मुझे इस किस्म के तीन आदमी दिखाई देते हैं-एक पंडित जवाहर लाल नेहरू, दूसरे बंबई के डॉक्टर बालिगा और तीसरे ख्वाजा अहमद अब्बास। जिनकी यह कूव्वत और योग्यता एक आदमी की नही।"
अपनी स्थापना के कुछ ही दिन बाद, इप्टा का सांस्कृतिक आंदोलन जिस तरह से पूरे मुल्क़ में फैला, उसमें ख़्वाजा अहमद अब्बास का अहम हाथ है। अब्बास ने इप्टा के लिए खूब नाटक भी लिखे, कई नाटकों का निर्देशन भी किया। ‘यह अमृता है’, ‘बारह बजकर पांच मिनिट’, ‘जुबैदा’ और ‘चौदह गोलियां’ उनके मक़बूल नाटक हैं।
इप्टा द्वारा साल 1946 में बनाई गई पहली फिल्म ‘धरती के लाल’ ख्वाजा अहमद अब्बास ने ही निर्देशित की थी। कहने को यह फिल्म इप्टा की थी, लेकिन इस फ़िल्म में मुख्य भूमिका अब्बास ने ही निभाई थी। बंगाल के अकाल पर बनी यह फिल्म कई अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में समीक्षकों द्वारा सराही गई। इस फिल्म में जो प्रमाणिकता दिखलाई देती है, वह अब्बास की कड़ी मेहनत का ही नतीजा है। बंगाल के अकाल की वास्तविक जानकारी इक्कट्ठा करने के लिए उन्होंने उस वक़्त बाकायदा अकालग्रस्त इलाक़ों का दौरा भी किया। इस फ़िल्म की कहानी और संवाद ख्वाजा अहमद अब्बास ने ही लिखे थे।
‘धरती के लाल’ ऐसी फ़िल्म थी जिसमें देश की मेहनतकश अवाम को पहली बार केन्द्रीय हैसियत में पेश किया गया है। पूरे सोवियत यूनियन में यह फिल्म दिखाई गई और कई देशों ने अपनी फ़िल्म लाइब्रेरियों में इसे स्थान दिया है। इंग्लैंड की प्रसिद्ध ग्रंथमाला पेंग्विन ने अपने एक अंक में उसे फिल्म-इतिहास में एक महत्वपूर्ण फिल्म कहा। सच बात तो यह है ‘धरती के लाल’ फिल्म से प्रेरणा लेकर ही विमल राय ने अपनी फिल्म ‘दो बीघा जमीन’ और सत्यजीत रॉय ने ‘पाथेर पांचाली’ में यथार्थवाद का रास्ता अपनाया।
इसके बाद साल 1951 में उन्होंने ‘नया संसार’ नाम से अपनी खुद की फ़िल्म कंपनी खोल ली। ‘नया संसार’ के बैनर पर उन्होंने कई उद्देश्यपूर्ण और सार्थक फ़िल्में बनाईं। मसलन ‘राही’ (1953), मशहूर अंग्रेजी लेखक मुल्क राज आनंद की एक कहानी पर आधारित थी, जिसमें चाय के बागानों में काम करने वाले श्रमिकों की दुर्दशा को दर्शाया गया था। मशहूर निर्देशक वी. शांताराम की चर्चित फिल्म ‘डॉ. कोटनिस की अमर कहानी’ अब्बास के अंग्रेजी उपन्यास ‘एंड वन डिड नॉट कम बैक’ पर आधारित है।
‘अनहोनी’ (1952) सामाजिक विषय पर एक विचारोत्तेजक फिल्म थी। फिल्म ‘शहर और सपना’ (1963) में फुटपाथ पर जीवन गुजारने वाले लोगों की समस्याओं का वर्णन है, तो ‘दो बूँद पानी’ (1971) में राजस्थान के रेगिस्थान में पानी की विकराल समस्या को दर्शाया गया है।
गोवा की आजादी पर आधारित ‘सात हिंदुस्तानी’ भी उनकी एक उल्लेखनीय फिल्म है। मशहूर निर्माता-निर्देशक राज कपूर के लिए ख्वाजा अहमद अब्बास ने जितनी भी फिल्में लिखी, उन सभी में हमें एक मजबूत सामाजिक मुद्दा मिलता है। चाहे वो ‘आवारा’ हो, ‘जागते रहो’ या फिर ‘श्री 420’। पैंतीस वर्षों के अपने फ़िल्मी करियर में अब्बास ने तेरह फिल्मों का निर्माण किया। लगभग चालीस फिल्मों की कहानी और पटकथाएँ लिखीं, जिनमें ज़्यादातर राज कपूर की फ़िल्में हैं। अब्बास को भले ही फ़िल्मकार के रुप में अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली हो लेकिन बुनियादी तौर पर वे एक अफ़सानानिगार थे। अब्बास एक बेहतरीन अदीब थे। उन्होंने साहित्य की लगभग सभी विधाओं कहानी, उपन्यास, नाटक, रिपोर्ताज में जमकर लिखा। अब्बास की कहानियों की तादाद कोई एक सैंकड़े से ऊपर है। उन्होंने अंग्रेजी, उर्दू और हिंदी तीनों भाषाओं में जमकर लिखा।
अब्बास की कहानियां अपने दौर के उर्दू के चर्चित रचनाकारों कृष्ण चंदर, इस्मत चुगताई, राजेन्द्र सिंह बेदी और सआदत हसन मंटो के साथ छपतीं थीं। हालांकि उनकी कहानियों में कहानीपन से ज्यादा पत्रकारिता हावी होती थी, लेकिन फिर भी पाठक उन्हें बड़े शौक से पढ़ा करते थे। अब्बास का अफ़साना ‘जिंदगी’ पढ़ने के बाद पाठक बखूबी उनकी सोच के दायरे और नज़रिए तक पहुंच सकते हैं। ख्वाजा अहमद अब्बास के कई कहानी संग्रह प्रकाशित हुए। जिनमें ‘एक लड़की’, ‘जाफरान के फूल’, ‘पांव में फूल’, ‘मैं कौन हूं’, ‘गेंहू और गुलाब’, ‘अंधेरा-उजाला’, ‘कहते हैं जिसको इश्क’, ‘नई धरती नए इंसान’, ‘अजंता की ओर’, ‘बीसवीं सदी के लैला मजनू’, ‘आधा इंसान’, ‘सलमा और समुद्र’, और ‘नई साड़ी’ प्रमुख कहानी संग्रह हैं। ‘इंकलाब’, ‘चार दिन चार राहें’, ‘सात हिंदुस्तानी’, ‘बंबई रात की बांहों में’ और ‘दिया जले सारी रात’ उनके प्रमुख उपन्यास हैं। ख्वाजा अहमद अब्बास के समस्त लेखन को यदि देखें, तो यह लेखन स्वछन्द, स्पष्ट और भयमुक्त दिखलाई देता है।
उनकी कहानियों का दायरा पांच दशक तक फैला हुआ है। अब्बास की पहली कहानी ‘अबाबील’ साल 1935 में छपी और उसके बाद यह सिलसिला बीसवीं सदी के आठवें दशक तक चला। जब अब्बास ने अपनी पहली कहानी लिखी, तो उस वक्त उनकी उम्र महज उन्नीस साल थी। उन्नीस साल कोई अधिक उम्र नहीं होती लेकिन जो कोई भी इस कहानी को एक बार पढ़ लेगा, वह अब्बास के जेहन और उनके कहन का दीवाना हुए बिना नहीं रहेगा। इस एक अकेली कहानी से अब्बास रातों-रात देश-दुनिया में मशहूर हो गए।
कई जबानों में इस कहानी के अनुवाद हुए। अंग्रेजी, रूसी, जर्मन, स्वीडिश, अरबी, चीनी वगैरह-वगैरह। जर्मन ज़ुबान में दुनिया की बेहतरीन कहानियों का जब एक संकलन निकला, तो उसमें ‘अबाबील’ को शामिल किया गया।
कहानी में अब्बास ने किसान की जिंदगी का जिस तरह से खाका खींचा है, वह बिना गांव और किसानों की जिंदगी को जिये बिना मुमकिन नहीं। ताज्जुब की बात यह है कि अब्बास को गांव और किसान की जिंदगी का कोई जाती तजुर्बा नहीं था। कहानी लिखते समय किसानों के बारे में उनका इल्म न के बराबर था। एक इंटरव्यू में जब कृष्ण चंदर ने इसके मुतआल्लिक उनसे पूछा, तो अब्बास का बेबाक जवाब था ~
'कोई ज़रूरी नहीं कि हर कहानी अनुभव पर आधारित हो। जिस प्रकार क़ातिल के विषय में लिखने से पहले क़त्ल करना ज़रूरी नहीं। या एक वेश्या के जीवन का वर्णन करने के लिए यह ज़रूरी नहीं है कि लेखक स्वयं भी किसी वेश्या के साथ सो चुका हो।'
शहर और महानगरों का कड़वा यथार्थ अब्बास की कई कहानियों में सामने आया है। ‘अलिफ लैला' और ‘सुहागरात’ ऐसी ही संघर्षों और उसके बीच चल रही जिंदगी की कहानियां हैं। इन्हीं कहानियां का विस्तार उनकी फिल्म ‘शहर और सपना’ है। जो उस वक्त कई अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में सराही गई थी।
अब्बास एक सच्चे वतनपरस्त और सेक्युलर इंसान थे। उनके सबसे करीबी दोस्तों में शामिल थे, इन्दर राज आनन्द, मुनीष नारायण सक्सेना, वी.पी. साठे, आर. के. करंजिया, राज कपूर, कृष्ण चंदर, अली सरदार जाफ़री आदि। अपनी वसीयत में उन्होंने लिखा था ~
‘मेरा जनाजा यारों के कंधों पर जुहू बीच स्थित गांधी के स्मारक तक ले जाएं, लेजिम बैंड के साथ। अगर कोई खिराज-ए-अकीदत पेश करना चाहे और तकरीर करे तो उनमें सरदार जाफ़री जैसा धर्मनिरपेक्ष मुसलमान हो, पारसी करंजिया हों या कोई रौशनख्याल पादरी हो वगैरह, यानी हर मजहब के प्रतिनिधि हों।’
ख़्वाजा अहमद अब्बास ने अपनी आखिरी सांस माया नगरी मुंबई में ली। 1 जून 1987 को वे इस दुनिया से जिस्मानी तौर पर दूर चले गए। उन्होंने अपनी वसीयत में लिखा, ‘जब मैं मर जाऊंगा तब भी मैं आपके बीच में रहूंगा। अगर मुझसे मुलाक़ात करनी है तो मेरी किताबें पढ़ें और मुझे मेरे ‘आखिरी पन्नों’, ‘लास्ट पेज’ में ढूंढे, मेरी फिल्मों में खोजें। मैं और मेरी आत्मा इनमें है। इनके माध्यम से मैं आपके बीच, आपके पास रहूँगा, आप मुझे इनमें पायेंगे।’
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