शनिवार, 21 दिसंबर 2024

शिव गीता अध्याय 12


अध्याय 12

 श्री रामचंद्र बोले
हे देवा देव महेश्वर आपको नमस्कार आप उपासना के विधि और उसका उदेश का वर्णन करें

हम पर कृपा कर के हित करें किस समय किस प्रकार का उपवास उपासना किया जाए
हे भगवान हमारे ऊपर आपकी कृपा हो तो उपासना का अंग नियम कहो 
शिवजी बोले हे राम मैं तुमसे उपासना के विधि और का देशकाल कहता हूँ तुम मन लगा कर सकूं
जितनी देवता हैं ये सब मेरे इस भी वास्तव में मुझ से फिल्म नहीं जो दूसरे देवताओं के भारत में ही और श्रद्धापूर्वक उनका पूजन करते है ही राज है
वे पुरुष मेरा ही भेद गुड्डी से यजन कर ले जाने की जिस कारण की इस सम्पूर्ण संसार में मेरे सिवाय और कुछ भी नहीं
वे सब क्रिया का भोक्ता और का फल देने वाला हूँ
जो पुरुष वेश शेव गणेश शादी जिस भाव से मेरी उपासना करते ही उसी भावना के अनुष्का उसी देवता के रूप से ही मैं उन्हें वांछित फल था विधि भी अवधि से किसी प्रकार से हो जो मेरी उपासना करते हैं
तो उनको भी प्रसन्न होकर फल देता हूं इसमें कोई संदेह नहीं यह भी वे दुराचारी है परन्तु वह अनन्य होकर मेरा भजन करता है
उस पुरुष को साधु बनना चाहिए और वे उन निभाने की भक्ति की महिमा दिखाई गई
परंतु यह निश्चय जानना चाहेगी कि अनन्य भक्ति वाला किसी प्रकार दुराचारी नहीं हो सकता कारन के अनन्य भक्ति का और हाल में मारना नहीं चाहता जो एकनिष्ठ बुद्धि हो कर जीवात्मा परमात्मा को एक ही रूप जानता है
अर्थात जीव रूप भी मेरे को जानता है
और अनन्य बुद्धि से ही मेरा भजन करता है उसका आप को इस स्पर्श नहीं करता बहुत क्या ब्रह्महत्या भी इस पर नहीं करती उपासना के विधि चार प्रकार के लिए संबंध आरोप को संवर्ग और
अध्यापकों को वस्तु काफी गुर्दे से मन की प्रगति से अनंत गुणों की भावना से ही चिंतन करना जैसे की मूर्ति में अनंत गुरु विशिष्ट शेर तरह विष्णु का ध्यान करना इसका नाम का पद से एक भी या
अंग में संपूर्ण उपाय वस्तु का आरोप कर की जो प्रार्थना करनी है उसे आरोप खेती ही झेली
कोई की उदगीर साहब रूप से उपासना की जाती है
और अभ्यास इनका करूं
बहुधा एक सा ही भीड़ इतना ही है कि बुद्धिपूर्वक किसी एक वस्तु में विवक्षित धर्म का होकर करके उसकी उपासना करना जैसे ही ट्रेन बाद अगली का आहों को था इस ट्रिक को अंग्रेजों को मानना यह है अगर यहां से
कर्मयोग होती उपासना करने का नाम भर  है
सम्पूर्ण भूतों को उपासना के योग से वैश्विक ना झेली थी काल में कन्वर्ट नामक वायु अपनी शक्ति से तब रूपों को वश में करती है
गुरु से प्राप्त हुई जानती देवताओं में और अपने में भेद न मानना और अन्तः करण भी देवता के समीप प्राप्त हो ना हो अंतःकरण से ही सब पूजन कल्पित करना इसका ना अंतरंग उपासना है और इसके उपरांत
दूसरी विभिन्न से बहेड़ा को उपासना कहलाती है
कहा किसी की उपासना करनी और कहां तक करनी किसी भी देवता की उपासना करते हुए ध्यान उस देवता के स्वरूप का जो ज्ञान होता है करे
उस ज्ञान को वीजा की जान ली शिव का ध्यान करते हुए कहा हमने के ध्यान से मध्य में विच्छिन्न न होकर व्यवधान रहित ज्ञान परंपरा से निदिध्यासन करके ज्ञान योग के देवताओं अपनी बुद्धि लगाकर एक रूप का साक्षात नीता उपासना करता रहे संपदा जो चार उपासना व ही यह दुल्हन बुद्धि की उपासना तरह उपासना की परमहंस थी
और सगुण उपासना इस प्रकार की मूर्ति की उपासना करने के समय उसके प्रत्येक अवयवों में अक्षय दृष्टि लगाकर उपवास रखना को
उपासना के अणुओं का शिवा करो बात सुनो के योग के देशों का गठन करती ही फील्ड और क्षेत्र आदि में जाने से उपासना भी यह विचार कर रही है कौन भी जाने की श्रद्धा थी और जहां अपना
स्वच्छ और एकाग्रता युक्त हो वहां सबसे बैठकर उपासना कर रही कम मुझे विवाह भर
अथवा निरक्षर पर स्थित होकर एकांत देशी इससे हो समान कृपा और शरीर को सरल विधि पूर्वक भस्म धारण कर और संपूर्ण इंद्रियों को रोक कर तथा भक्ति पूर्वक अपने गुरु को प्रणाम कर रही ज्ञान शास्त्र ज्ञान की प्राप्ति के लिए

 भक्ति से प्राणायाम रही जिसका अन्तः करण मूड और रेट शून्य उसके इन्द्रिय दुष्ट गुणों की खान में था जैसे दुष्ट घोड़ा साथी के वश में नहीं आता जैसे दुष्ट इन्द्रिय
उन्हें वश में नहीं कर सकती  ज्ञान कम होने नहीं उनकी यात्रा करने से संपूर्ण इंद्री मन के शहीत वश में हो जाती है जिसमें का कृषि क्षेत्र आश्य साथी के वश में हो जाता है
और विवेक शून्य चंचल चित्र वहां आए और अंतर शौच से ही और अनुभव क्या रही थी जो उस स्थान को नहीं प्राप्त होती परंतु निरंतर संसार में ही भ्रमण करते ही और जो ज्ञान इस फिर क्षेत्र भाई अभियान
पवित्रता से युक्त ही वे उस स्थान को प्राप्त होते ही जहां होगी फिर आना नहीं होता है शिल्पी में लिखा है जिसका विज्ञान रुपये साथी मन रूपी लगा धारण यह है
एग्री घोड़ी जिससे शरीर रूपी में जो बैठा है वे संसार रूपी मार्ग से पहाड़ परम बाद मोक्ष इस स्थान पर पहुंचा था 
हृदय कमल काम आदि दोष रहित शबनम आदि गुण सम्पन्न सच है
और अगर शोक रहे करके उसकी मेरा ध्यान करना जिससे जो अपशिष्ट स्वरूप को सीमा रहे थे जिससे श्रेष्ठ कोई दूसरा नहीं है जो नाश रहे तो कल्याण करो
आदि अंत शून्य प्रशांत और सबका कहना है
व्यापक सच्चिदानंद स्वरूप को रोग रहित उत्पत्ति शून्य आश्रय युक्त मुझे ब्राह्मणों को शुद्ध नदी के समान शहरी  और धाम में पार्वती को धारण किए जागरूक शर्म ओली नीलकण्ठ त्रिलोचन जो
झूठ धारण की चंद्रमा सिर पर गहरी नाभि का यज्ञोपवीत पहली व्याघ्र चरम का ही स्तरीय उन्होंने में सर्वश्रेष्ठ भक्तों के आश्रयदाता बीच के और के ऊंचे दोनों हाथों में वृहद और पशु धारण की सब अंग में विभूति
लगाई तथा सम्पूर्ण आभूषणों से विभूषित इस प्रकार से ही आत्मा के अग्रणी ऑपरेटर को उत्तर अनेक करके उसका मक्खन करता हुआ नेहा ऊपर कहे अनुसार ज्ञान भी तो ये मेरा कक्षा का बता दें झा
यद्यपि करते हैं तब अग्नि के लिमिट है या शमी के दो लकड़ी लें ऊपर नीचे रख अग्नि की लिमिट को से ही थी
वेद और शास्त्रों के चलते मुझे को भी पा नहीं सकता परन्तु एकाग्र चित्त से सदैव मेरा ध्यान करता है
मैं उससे भी प्राप्त होता है और क्या नहीं करता जो पाप से मुक्त नहीं जिसके कृष्णा शांत नहीं श्रवण मनन निदिध्यासन थी जिसका मन समाधान ही है
जिसका मन चंचल गए ऐसा पुरुष केवल शास्त्र के अध्ययन से मुझे पूरा नहीं कर सकता जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति इन तीनों अवस्थाओं का प्रपंच जिसका रूप अधिष्ठान ब्रह्मस्वरूप के द्वारा प्रकाशित होता है वे भ्रम
मैं तो ऐसा यथार्थ जानने से यह
संपूर्ण बंधनों से मुक्त हो जाता है
तीनों अवस्थाओं भी जो भोज्य पदार्थ जो भोक्ता और भोग्य वस्तु है
ये तीनों ब्रह्म की ही सता से करते थे
इनका प्रकाशक गति करने वाला चौरासी में ही इस का निर्भर गठन कर असे मत अधिकारियों को सगुण रूप का उपदेश करते ही मध्याह्न काल की करोड़ों सूर्यों के समान तेज युक्त और करोड़ों चंद्रमा के समान
शीतल सूर्य चन्द्रमा अभी भी जिसके ने तरह ही उनकी मुक्कमल का स्मरण कर रही एक ही परमात्मा सम्पूर्ण भूतों में गुप्त थे
सर्वव्यापी और सब भूतों का अंतर आत्मा ही सबका अध्यक्ष और सब भूतों में निवास करने वाला सबका का अच्छी थी प्रेरणा करने वाला ले और ही स्वाभाविक सब भूतों का आत्मा वे एक ही ढील है
माया प्रपंच का बीज प्रकट करता है
वे पुरुष मैं ही मुझे जो धीर पुरुष शास्त्र और आचार के उद्देश्य से साक्षात्कार करते ही उन्हीं निरंतर शांति और केवल मुक्ति मिलती है
दूसरों की नहीं जिस प्रकार से एशिया हनी सब संसार में प्रविष्ट होकर उनका लोहा आदमी भी पीढ़ी चतुष्कोण आदि रूप से उसी वस्तु के आकार से ही हो जाती है
इसी फिर का सबका अंतरात्मा एक ही है और शरीर में प्राप्त होने से उसी के आकार का प्रतीक होता है यदि उपाधि के वशीभूत होने से भिन्न भिन्न प्रकार का प्रतीत होता है
तथा करोड़ लोगों के दुख से दुखी और सुख से सुखी नहीं होता जो विद्वान ज्ञान मुझको सर्वान्तर्यामी महान जब सौर प्रकाश माया से रहित आत्मस्वरूप जाता है
वहीं संसार बंधन से मुक्त होता है इसके सिवाय मुफ्ती के प्राप्त होने का दूसरा उपाय भी
साथ ही शिल्पी में कहा ही प्रथम सृष्टि के आरम्भ में में ब्रह्मा को उत्पन्न करके उनके लिमिट भेद को विश करना वहीं इस स्तुति सीखें योग के पुरुष में
निश्चय ही मुझे जानते ही लिए मृत्यु के मुख से छूट जाते ही ऐसा शिल्पी में उपस्थित रहे
इस प्रकार शांति आदि गुणों से युक्त हो जो मुझको तट से झांकता है

शिव गीता अध्याय 11


आनंद प्रभु की आनंद मई स्तुति

शिव गीता की अध्याय 11 से श्रवण करें

ज्ञानमार्ग जीव कि वे अंतर्गत और पर लोग नकद देन के कारण है

यह वहां संक्षेप से कहकर विस्तार से वर्णन करते हुए श्री भगवान ने ही 

रमेश उस झील के लिए हंटर घटे और पर लॉक कर मैं तुमसे वादा करता हूं

धान होकर इस धूल वे भी जो कुछ भोजन किया जाता और पिया चाहता थी उसी के कारण रही और ढूंढ रहे भी संबंध उत्पन्न होता है 

उसी से जीवन धारण होता है
जिस समय भी आनंद या जरावस्था से का प्रबल होता है तब जसराना की मंद हो जाने से गुजर किया हुआ अच्छी तरह नहीं पचता है

जैसे भूजल बिना रस के न प्राप्त होने से शीघ्र ही धातु सूख जाते है और भोजन की तथा पान से ही शरीर में जठराग्नि के रहे रहते जो भक्षण किया जाता है

वे रूप होकर शरीर को पुष्ट करता है
उस समय प्राण वायु में संपूर्ण रस लेकर सब धातुओं में पहुंचाता है इसी कारण से यह समान  कहलाता है

जो वृद्धावस्था में उत्पन्न नहीं होता इस कारण शरीर के बंधन जो दृढ़ता से परस्पर संघर्ष करते थे शिथिल हो जाते है

 जिस प्रकार भी आमतौर पर रखकर अपने भार से आप ही शीघ्र पतित हो जाता है

इसी प्रकार शरीर को शिथिल होने से लिंग शरीर का इस टूल से जीव हो जाता है
संपूर्ण इंद्रियों की वासना आध्यात्मिक जीवन संबंधी बुद्धि और ज्ञानेन्द्रिय आदि आधिभौतिक प्राप्त होने वाली देरी का कारण हूँ 

सूक्ष्म रूप वाले कारण ये तीनों आकर्षित होकर करने का मन में एकता को प्राप्त होते ही था

मुख्य प्राणवायु शेष नौ आयोग से युक्त होकर श्वास रोग भी हो जाता है
और वे सब एक होकर जीवात्मा का रूप से ही विद्या कर और वासना से युक्त हो ये ही अपने कारण से ही नारी मार्ग का आश्रय करके नेत्र मार्ग अथवा ब्रह्मरंध्र के द्वारा के बाहर रहता है

जिस प्रकार से घड़े को इस देश से दूसरे स्थान में ले कर जाते ही परन्तु वे आकाश से पूर्ण ही जाता है

जहां घट जाएगा उसी स्थान पर घटा आकाश भी जाता है इसी प्रकार से जहां जहां लिंग शरीर गमन करता है
उसे उसी स्थान मिली जीव होता है
और कमान उसका दूसरे दिल को प्राप्त था ही 

जिस प्रकार नदी का मनुष्य कभी इस किनारे और का भी दूसरे किनारे जाता है
इसी प्रकार यह मोक्ष न होने तक अनेक योनियों में भ्रमण करता रहता है 

जो पापी हैं उनको यमदूत ले जाते ही यह यातना देने का जो नरक दुख भोगने के लिए  ले कर  जाते है ध्यान रहे यह यम दूत काम क्रोध लोभ मोह और अहंकार ही है जो साथ साथ रह कर अच्छे बुरे कर्मों का लेखा जोखा याद रखते है 

उनका आश्रय करके केवल न को ही को भोगता है और जिन्होंने सदा ही यज्ञ आदि पूत वापी को को तरह भी निर्माण करना उन का काम है

वे लोग को गमन करती ही यमदूत उन्हें लोक को प्राप्त करते ही कुछ माह का क्रम यह है कि लू फिर रात्री अभिमानी देवता के निकट से कृषि पक्ष अभिमानी देवता के लिखकर शेर दक्षिणायन
विमान देवता के निकट फिर वहां से ही पितृलोक में जाता है प्रतिलोक से आगे चंद्र लोगों को प्राप्त हो से थे पाकर महालक्ष्मी का भोग करता है
वहां यह चंद्रमा के ही समान होकर कर्म के फल कि अभी तक चंद लोग में वास करता है

जब पुण्य फल समाप्त हो जाता है तो जिस क्रम से इस लोक में का मन हुआ था उसी क्रम भी इस लोक में छेड़ रखा है

चंद लोग से चलते समय उस शरीर कुछ हो या आकाश रूप होकर आकाश से भाई और वायु से जल में आता है
झलक भी में हूँ 

में प्राप्त होकर शरीर वसा द्वारा पृथ्वी पर प्रतीत होता है फिर अनेक करण के वश का भक्षण योग्य अन्य में प्राप्त होता है और कितनी एक शरीर प्राप्ति के निमीत मनुष्य आदि की योनि में प्राप्त होते है और  कितने

 ज्ञान की तारतम्य में भी से इस था और आदि योनि को प्राप्त हो जाती ही झूठी अन्य में प्राप्त हुए ही उस अन्न को इस स्त्री पुरुष भक्षण करते ही उसे स्त्री और पुरुषों का राज और शुक्र होकर उन दोनों के संभोग से ही स्त्री
गर्भ धारण करती ही यही कर्म के अनुसार इस स्त्री पुरुष और नपुंसक होता है
इस प्रकार इस झील की इस लोक में घर और पर लोग गलत थी अब इस की मुक्ति का वर्णन करता हूं 

यह जो शम धर्म कर्म आदि साधन संपन्न सदा नहीं गाना श्रम के करती और फल की आकांक्षा न करके शुल्क और
पर कहते ही वे मनुष्य देवयानी मार्ग से लोग पर वन गमन करती या ध्यान रहे धर्म कर्म दोनों भगवान के पुत्र और शर्म नामक लड़की है जिनमें यह गुण हों वही भगवान के बच्चे हैं

जब कि में प्राप्त को पीछे धकेल और से शुकल पक्ष अभिमानी देवता के लिख कर जाता है
से उत्तरायण को प्राप्त होकर संवत्सर के लिख कर गमन करता है
फिल्म सूर्य लोक को प्राप्त होता है
लोग से भी उन पर दुष्ट लोग को प्राप्त होता है
से आगे कोई पुरुष ही विविध को प्राप्त हो ब्राह्मणों को जाता है और वहां से यहां नहीं आता ब्रह्मलोक में प्राप्त होकर उपाधि से के आश्रित हो यह जीव रहता

डेविड हेडली ब्रह्मलोक में अनेक प्रकार के मन पसंद भोगों को घूरता हुआ बहुत काल तक उसे स्थान में भास्कर ब्रह्मा के का मुक्त हो जाता है

उसके से आवृत्ति नहीं होती जिस प्रकार से स्वप्न में देशी दृष्टि जागृत होते ही लाई जाती है

इसी प्रकार से ब्रह्मज्ञान प्राप्त होने से यह सब सृष्टि ले जाती है

और जिन्होंने केवल पाते ही और उपासना तरह पूंजीकरण से रहित की तीसरी कट थी न रख सकती है
वे अनेक प्रकार की राह और घोर लड़कों को धोकर पीछे शेष कर्मों के अनुसार शूद्र जंतुओं के शरीर को प्राप्त होते है पर भी में भी मदद शहर दास आदि का जन्म लेता है
इस प्रकार झील की गति तो रंग की
और क्या तुमने की गई श्री रामचंद्र हो रही 

हे भगवान आपने उपासना और कर्म फल से अनेक प्रकार से ही चंद्र लो और ब्रह्मलोक लोक की प्राप्ति वर्णन की

हाथी गंधर्व आदी लोग और इन्द्रादि लोगों को में किस प्रकार से ही गौरव प्राप्त होते ही कोई भी का कोई इंद्र और कोई गंधर्व था ही  शंकर यह कर्म का फल है 

यह उपासना का फल ही तो कृपा करके वर्णन किया

इस में मुझे बड़ा भी शिवजी बोले उपासना और शुभ कारण इन दोनों के ही योग से फल प्राप्त होता है

मैं हम वादा करते ही जो मनुष्य युवा कई भर शू नियमों और बलवान हो गए थे
शब्द भी प्रयोग पृथ्वी को निष्कंटक भोग करता हूं

उसका ना मानुष आनंद ही आनंद प्रभु साधारण मनुष्यों को वे प्राप्त होने वाले आनंद से सौ गुना अधिक है
जो मनुष्य तप आदि से संयुक्त हो गए
गंधर्व होता है मनुष्य के आनंद भी सौ गुना आनंद गंधर्वों को प्राप्त हुई
इसी प्रकार से ऊपर लोग देवलोक आदि में उत्तरोत्तर चौगुना आना बढ़ता जाता है
फिर भी देवि देवता से इंद्र से बृहस्पति बृहस्पति से भ्रम ते ब्रह्मदेव से ब्रह्मानंद उत्तरोत्तर सौ गुना अधिक से जान के आनंद से अधिक आनंद तो देवलोक में मिलना कहा है जाने किसी को किसी की
तो की अपेक्षा कहीं 

कहीं से भय ही है
जो ग्राहम क्षत्रिय आदि वेद वेदांग कि पाक आर्मी निशाः और काम ही और भागवत की उपासना करने वाले ही वे अनुक्रम भी उत्तरा उत्तर आनंद को पुरा को पढ़ें
दर्शन को माह ये जो कुछ आनंद है सो आत्मज्ञान की बराबर ही हर इस लिए आत्मज्ञान का ही अनुष्ठान करना है
जो ग्राम भ्रम देवता है उसे कर्म उपासना से कुछ प्रयोजन नहीं है
नौ की करंसी कुछ वृद्धि और ना न करने दें कुछ नहीं है

निशाः गहरी वे करने का विधान और विशेषकर वो का निश्चय किया है

वे केवल जिस तरह ज्ञान नहीं तभी तक है ज्ञान होने पर कुछ नहीं और यदि ज्ञानी लोग विस्थापन के लिमिट करें तो भी कुछ आनंद ही इस कारण जान माल ब्रह्मा सबसे श्रेष्ठ जो कोई भी बन गया है
जानकर कम करता है 

उसके पुण्य का फल अक्षय का है जिस पर को मनुष्य करोड़ों ब्राह्मण की भोजन कराने से प्राप्त करता है

वे एक यानी कि भोजन कराने से प्राप्त हो जाता है
जो बहुत ज्ञानी जनों को दिया जाता है में करोड़ों गुना मिलती है और जो मनुष्यों में अदम के आने की निंदा करता है
क्षय रोग को प्राप्त होकर मृतक हो जाता है का की जानी साक्षात ईश्वर है

अध्याय शिव गीता 11 का समापन
आनंद प्रभु आनंद ही आनंद

शिव गीता अध्याय 10


जाए भोले नाथ


शिव जी का दसवां अध्याय श्री रामचंद्र 

पूर्वे है
इस नहीं में ये जी कहाँ वर्तमान में ये कहां से उत्पन्न होता है और इसका क्या रुख है तो आप कहीं देहांत में यह कहा जाता है और जाकर कहा इससे सकता है और फिर रहे में किस प्रकार आता है
या नहीं आता तो आप श्री श्रीभगवान भी हे महाभाग बहुत अच्छी बात जी ने जो गुप्त से भी घूमते हैं
जिसे इंद्रा देवी देवता और ऋषि भी कठिनता से नहीं जान सकते हे रघुनन्दन मैं भी यह किसी दूसरे से कहना नहीं चाहता परंतु तुम्हारी भक्ति से प्रसन्न होकर मेहता में ही सत्य ज्ञान स्वरूप सानंद परमानंद
परमात्मा पर झूठे माया से मोहित जीवों को न दिखने वाला संसार का कारण नित्य विशुद्ध संपूर्ण का आत्मा सर्वान्तर्यामी निस्संग क्रिया रहे थे सब धर्मों से पर ही मन से भी पर ही मुझे कोई इंद्रिय ग्रहण नहीं कर सका
थी में संपूर्ण का ग्रहण करने वाला हूँ में सम्पूर्ण लोग को चाहता हूं
और मुझे कोई नहीं जानता में संपूर्ण विकारों से रहित वाले यौवन आदि परिणाम आदि विकार भी मुझे में ही जहाँ मन के सहित जाकर वाली निवृत हो जाती है
आनंद ग्रहण मुझको प्राप्त होकर ये प्राणी फिर कहीं से भी भाई को प्राप्त होता है
जो सम्पूर्ण प्राणियों को मुझमें देखता है और मुझे सम्पूर्ण प्राणियों में दिखता है लिंडा रहित जाता है जिसको सम्पूर्ण प्राणी आत्मा रूप दिखती ही पुष्कर व क्र एक रूप देखने वाले को शोक और मुंह भी होता
यह सम्पूर्ण भूतों में गुप्त रूप आत्मा प्रकाशित भी उठता हूँ
संपूर्ण में वर्तमान ही सूक्ष्मदर्शी श्रवण मनन निदिध्यासन साधना करने वाले पुरुष को अगर बुद्धि से दिखता है
दूसरे मनुष्यों को नहीं दिखता है
अनाज माया से युक्त निर्विकार अविनाशी एक में ही नाम रूप रहित ड्रम जगत का करता और शेयर हूं पर कहा अविद्या के साक्षी भुंतर ज्ञान पर स्वप्न में त्रिलोकी की कल्पना की जाती है
इसी प्रकार मुझे यह सब जगह उत्पन्न ही दिखता भी पाता और लय हो जाता है
अनेक प्रकार की अविद्या के आश्रय होकर जीव रूप से भी में ही निवास करता हूं पाँच करने देंगे और पाँच भी इन्द्रिय मन बुद्धि का चरित्र के चारों पंच रहा यह सब मिलकर लेकिन शरीर को उत्पन्न करती ली
फीलिंग्स शरीर भी अभी घर युक्त के चेतन ने कहा पृथ्वी पड़ता है
उसी को व्यवहार में जी क्षेत्र के और पुरुष ही वहीं जी अनादिकाल से पुण्य पाप से निर्मित हुए इस स्थावर जंगम आदि देशों में निवास कर शुभ अशुभ कर्म का फल है उसी को और लोग भी तथा वही
जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति इन अवस्थाओं का भाव है
झेली थी पर के अलग होने में मुखर्जी मलिन लिखा है
इसी प्रकार अन्तः करण के देशों से आत्मा विकारी काफी अन्तः करण और भी इन दोनों के परस्पर अभ्यास के कारण और एक भाव का अभिमान कर से परमात्मा भी दुखी सा प्रतीत होता है
वास्तव में सब दुख का धन अन्तः करण रही है
जी में नहीं परन्तु जिस पर कहा चंद्रमा का पृथ्वी जल में पढ़ने से में चलकर चलायमान होने से चलायमान वितरित का इसी प्रकार अन्तः करण के सुख दुख होने से वहीं झील में जिस प्रकार मारवाड़ देश मिली
दोपहर के समय सूर्य की किरण रेस में पढ़कर जल रूप से प्रति प्रति है
उसमें केवल अज्ञान से जाना जाता है
वो जल्द रूप नहीं वास्तव में संताप की करने जा रही हैं
इसी प्रकार आत्मा भी निर्देश है
परंतु है मूल बुद्धि वालों को अधिक किया और अपने दोष के कारण करता भोक्ता प्रतीत होता है
अन्य में फिर लिखे इस भूल नहीं में हृदय के विषय थी
रहता है
और न कि अगर वहां से लिखकर शिखा पर्यंत या हो रहा है
सावधान होकर वहीं एक ही वह में मनुष्य में ब्रह्मा इत्यादि अभिमान करता हुआ इस माह के भी इस चिट्ठे न ही से ऊपर से नीचे अवकाश के स्थान को व्याप्त करके स्थित रहता है
इतनी ही स्थान के बीच मिला है
जिसे का स्वरूप डंडे सहित कोमल कली की संभावना है
उसका मुख नीचे को है उसमें सोची और सुंदर एक छिद्र है
उसी को वह का थी
उसमें भी रहता है
केश के अग्रभाग का कौमों भागकर फिर उसका भी सोमा भास्कर की जो प्रमाण किया जाए वही सूक्ष्मता जीवों की जानी चाहिए
वस्तुतः जीव के स्वरूप का प्रमाण है कि ऐसा है और न ही जिस प्रकार कदम के फूल को भी आई चारों ओर की थी
इसी प्रकार से हृदय थानवी
नारी मिलकर ही वे एक और बल को देखती ही इस कारण उनकी फिर संध्या है
योगी ही नहीं उन गाड़ियों की संख्या बहत्तर से है
कही है
जिस प्रकार सूर्य से किरण निर्गत रहती है इसी प्रकार से वे नारी हृदय से निकली ही उनमें एक सौ एक मुख्य नारी ही नहीं सम्पूर्ण शरीर को वे शुरू कर दिया है
ऑफर थे कि इन्द्रियों में दस दस नाही
उन्हीं के द्वारा विषयों का अनुभव होता है
यह नारी सुख दुख जाग्रत स्वप्न आदि की साक्षात का कारण भी जिस प्रकार नदी जल को बढ़ाती है इसी प्रकार नारी सुख दुख रूप फल को भारतीय है
एक सौ एक नारियों में से एक नारी ऊपर अनंत नाम है और ब्रह्मरंध्र तक पहुंच गई है
जो को अर्थात सुषुम्ना नाम नारी है उसमें प्राप्त होकर यह जी मुक्त हो जाता है
जिस समय भी अन्तः करण कर आदि दोषी नहीं है
उस समय या कुलकर्णी श्री योगी का आत्मा इस नारे में प्राप्त होता है
परंतु समय सद्गुरु की कृपा और पूर्ण ज्ञान की आवश्यकता है कहा कि ज्ञान द्वारा मुक्ति फिरा जाती है
जिस प्रकार से राहुल अदृश्य रहकर भी चंद्र मंगल दिखता है
इसी प्रकार करवट रहने वाला आत्मा से ही में ही प्रतीत था है
या फिर भी वे सर्वत्र फूल और निश्चल रहे परन्तु वे जागृत अवस्था में घट आदि पदार्थों का चेतन में पृथ्वी में युक्त होने से अंतःकरण रखती से व्याप्त होकर चंचल का था
जिस प्रकार भी दूरी दसों दिशाओं को व्यापक करता है
इसी प्रकार निष्क्रिय कर पदार्थों में व्याप्त लिंग रहे के संबंध से उत्पन्न हुई अंतःकरण की वृत्ति नारियों द्वारा बाहर जाकर विषयों में रात को उन्हें प्रकाश करती है
अपने की उन कर्मों के अनुष्का जाग्रत अवस्था में सुख दुख का साक्षात का जी करता रहता है
कम फूल वृद्धि लिंग शरीर से है
जब तक मोक्ष न हो तब तक लिंग शरीर का नाश नहीं होता जिस समय ज्ञान द्वारा जीव और ब्रह्म का भी मिल जाएगा और अविद्या सहित इस शरीर का नाश जाएगा
उस समय केवल आत्मा का अनुभव मात्र अहं ब्रह्मास्मि इस रूप में स्थिर होने पर ही नहीं उठता है
जिस पर का घटकर उत्पन्न होते ही घटिया काश उसमें प्राप्त हो जाता है
और उसके नष्ट होने से वे अपने स्वरूप को मिली अवस्थान करता है
इसी प्रकार माया के नष्ट होने से आत्मा अपने स्वरूप को मिली अवस्था करता है जब जागृत अवस्था में भोग देने वाले कर्मों का क्षय होकर स्वप्न काल में वोट देने वाली कर जागृत करने के दिए गए आदि विषय के साक्षात
नेपाली ज्ञान को छुपाकर जब जागृत होते ही था
यह झील क्रीड़ा करो
इस प्रकार भी परमेश्वर की इच्छा से और अनुभव किया हुआ स्वप्न में के विषय का जागृत होने पर यह माया भी अभिनेत्रियों का भी जी माया की निद्रा के योग भी जाग्रत अवस्था में भी कपल से भिन्न करो अवस्था की ओर देखता है
घटबढ़ आदि विषय बहुत ही आहे
और सफल में की गोद देने वाले पदार्थ की तमाम सप्तशती अन्तः करण ने कल्पना भी जिस
का एक मनुष्य होने में अनेक मनुष्य ही का गौरव गुप्ता और संसार की सब रचना भिन्न भिन्न जानता है
यथार्थ में एक ही है
इसी प्रकार वास्तविक आत्मा है परन्तु अन्तः करण की कल्पना भी यह जगत अनेक भाव से दिखता है
इन सबको देखने वाला स्वयं झूठ आत्मा साक्षी रूप से
था में करण आदि सब पदार्थो की वासना भाव से की हुई असत्य होने दें वे रात आरोपी गए और परमात्मा उसी स्थान थानवी वासना मात्र से साक्षी है जिस प्रकार जागृत अवस्था में कर्ता कर्म किया
एक संपूर्ण कारणों से युक्त व्यवहार चलता है इसी प्रकार पूर्वांचल के एक कर्मों की प्रेरणा से गार्टनर रूप प्रपंच है
परंतु जागृत अवस्था में प्रपंच व्यवहार कमाना होता है और स्वप्नावस्था में कल फिर से यही रहे थे
संपूर्ण बुद्धि वृत्ति का साक्षी आत्मा स्वयं ही प्रकाश करता है
उसका का जो वासना मात्र साक्षी बना दे
स्वप्न कहते ही बाल्यावस्था में जागृत झुककर स्तनपान कंदुक क्रीड़ा अधिक ही उस कर रही उसी की वासना फिर वे प्रबल रहती है इस कारण वे ही लिखते ही और तरुण अवस्था में इन्द्रिय अपने व्यापार में
कुशल हो जाती है
यह ब्रांड अनेक व्यापार में व्यग्र हो जाता है
अध्ययन कृषि व्यापार आदि की वासना हृदय में अत्यंत उद्धरण जाती है इस कारण तद्रूप भी स्वप्न देखता है
और जो वृद्धावस्था में परलोक जाने के निमित्त दान धर्म विद्यार्थी धान ऐसे तब कम करते ही उनके हृदय में यह वासना दृढ़ हो जाती है तो प्रायः यह भी इसी प्रकार के देखा करते ही कि हमने ग्रहण किया इस प्रकार है
लोक की प्राप्ति हुई जिस प्रकार भी शेल पक्षी आकाश में भ्रमण करते करते जब थक जाता है तब विश्राम का और कोई उपाय नहीं देख कर निस पंखों को सिकोड़कर अपने घोंसले में विश्राम कर देता है इसी प्रकार जाग्रत और
स्वप्नावस्था में विचरने थी जब आत्मा शांत होता है तब संपूर्ण इंद्रियों के शिथिल होने से सब साधनाओं को ले कर देता है
अर्थात संपूर्ण इंद्रियों के व्यापार को समाप्त कर निवृत जाता है
नारियों के मार्ग से इंद्रिय की वासना को आकर्षण जागरण और सौंपा व्यवस्था के सब कार्य समाप्त कर आत्मा लिए जाता है जिसे कर रही यह माया से अच्छा से लेकर शैतान ने और व्याकरण स्वरूप को में लगा रहता है
उस समय संपूर्ण प्रपंच ले जाता है
परंतु यह अत्यंत नहीं इसमें केवल कार्य रोग का नाश का कारण रूप वासना बनी रहती है
जिस पुरुष की किसी भी स्त्री की अत्यंत इच्छा हो और वह उसे प्राप्त हो जाए उसके संभोग से जो सुख हो जाता है उसकी मां है परन्तु उससे कहीं अधिक सुख निद्रा अवस्था में जीव को आनंदमय कोष में प्राप्त होने का
जब जीव की गाय विषयों का ज्ञान नहीं होता वे अंततः था मोक्ष की अवस्था के समान जिसमें विषय वासना अत्यंत में वृद्धि होती है निवृत्त वासना वाला नहीं होता दूसरा कुछ भी न जाना केवल
ज्ञान का ही अनुभव किया परन्तु यह ज्ञान भी साक्षी आदि की दृष्टि से अनुभव किया जाता है
क्योंकि से सोया यदि साक्षी न हो तो सुख से सोने की मूर्ति किसी प्रकार भी हो सकती क्योंकि प्रगाढ़ निद्रा में सोते समय तो उसे सुख का अनुभव था न ही उसके पश्चात जागृत होकर साक्षी के द्वारा जानता जा है
स्वप्न सुषुप्ति अवस्था जैसी इस लोग की है जैसी भी ही सृष्टि के अंत में जब जागृत अवस्था आती है तो अपनी कारण झील के प्रारब्ध कर्म से फिर निर्दलीय इस प्रकार जाग उठती है
जिस प्रकार अग्निदेव चिंगारियां उठने लगती इसी का सूक्ष्म रूप में लीन हुई इन्द्रिय में मिली थी जिस पर का जल भरा हुआ घड़ा जल में डुबा तो और यदि उसे फिर से निकाल लो तो है उस जल से भरा ही आता है
इसी प्रकार से यह जीवात्मा इंद्री आदि सहित कारण में लय को प्राप्त हो उन इन्द्रियों सहित ली जागृत अवस्था को प्राप्त होता है जी ईश्वर ये दोनों वास्तव में एक ही रूप से परंतु अभी भी आगे प्रपंच से उन मिली
प्रतीत होता है
अविद्या न जाए तो ऐसा नहीं होता उसका
एक रूप में जाते ही जिस प्रकार थी
जल आदि पदार्थों से पृथ्वी से ही अनेक रूप दिखता है और झलकी चलायमान होने दी सूर्य आदि में ही चंचलता प्रतीत होती है इसी प्रकार को ट्रस्ट एक जीवात्मा ईश्वर एक ही है
और अनेक देशों में विविध रूप से प्रविष्ट होकर अनेक रूप को और गमनागमन भी रूप से नहीं दिखता है
वे आदि उपाधि से रहित सौ प्रकाश है परन्तु स्वरूप की स्मृति लोप को करने वाली माया ने विस्मृति को प्राप्त कर दिया कि इससे से का प्रपंच इसमें अज्ञान अज्ञात विविधता ने कहा कि यह माया तो
न होने वाली बात को भी करके दिखा देती है
माया के योग भी आत्मा में कितनी ही विरुद्ध कम थी
परन्तु माया की दूर होते ही जीव ईश्वर और ने भी कहा जाता है

भोले बाबा की जय हो


शिव गीता अध्याय 9


शिव गीता अध्याय 9

भगवान का अल्ट्रासाउंड का ही ज्ञान है
चलिए देखें और सुने हर हर महा देव 



शेष था नामक अध्याय श्री भगवान बोली हे राजन तुम सावधान होकर लोग तुम से वे का स्वरूप काम यह सब था मुझे से उत्पन्न होता है मुझे इसे धारण किया जाता है और जिस प्रकार
भ्रम निवृत होने से रजत में लाई जाती है
इसी प्रकार यह जगह ज्ञान से मुझे में ले हो जाता है में निर्माण पूर्ण सच्चिदानंद स्वरूप को में संग्रहित शुद्ध कर्नाटक हूं
मैं अनाज सिद्धि माया से युक्त होकर जगत का अकारण था
मेरी माया का वर्णन नहीं हो सकता उसमें सत्व रज तम गुणों है ही सकता हूँ शुकुल वर्ण वाले मनुष्य को सुख और ज्ञान का देने वाला है
और रजो गुण का रक्त वर्ण ही यह चंचल और मनुष्यों को दुख देने वाला है
तम का कृषि वन है कि जाए और सुख दुख से उदासीन रहता है
इसी कारण मेरे सहयोग से जीतकर रघुनाथन कमाया प्रकट होती है
मेरे लिए भी थी इस प्रकार जगत को रचना करके दिखाती है जिसके का अज्ञान शक्ति भी रजत और अस्सी में फर्क दिखाई देता है
मुस्लिम माया के द्वारा आकाश आदि की उत्पत्ति होती है
मुझसे प्रथम आकाश आकाश वायु वायु से ही अगली से जल जल पृथ्वी उत्पन्न होती है उन्हें पांचों से उत्पन्न हुआ ये सब दें ही पंचभूत आत्मक कलाकारी पिता माता की भक्षण किए अनुमति इस शर्त को
तुम शरीर उत्पन्न होता है
जिसमें स्नायु थी और मनोचा पिता के कोष से उत्पन्न होती कच्चा मांस और उधेड़ यह माता के वीर से उत्पन्न होते ही इसी प्रकार माता और पिता संबंधी शतकों शास्त्र मकडी ही में माता से उत्पन्न होने वाली
पिता से उत्पन्न होने वाली रज से उत्पन्न होने वाली आत्मा से उत्पन्न होने वाली चार पदार्थ की उस रात में का मजा प्लीहा यह ख़त गुदा फिर गए न ही इतिहास ही मधु पदार्थ माता
से उत्पन्न होते ही मशरूम लोग के इस दिन शेरा धमनी नारी नाक धाक वे आदि इस फिर पर्दा प्रथा के संबंध से होते ही पुष्टता वह
रखती भर अवयवों की दृढ़ता अनुरूपता कहा इत्यादि रस से उत्पन्न होती इच्छा दृश्य सुख दुख धम धर्म भावना क्रियान्वयन जहां आयुष्य इन्द्रिय इत्यादि की आत्मा जी
आत्मा से उत्पन्न हुए कहलाती शुरुआत तेल त्वचा चक्षु जीव लिया और ग्रांड यह भी पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ ही क्रम से ही शब्द स्पर्श रूप रस गंध ये पाँच इनके विषय ही
ही हाथ पैर घुसा और उपवास ये पाँच करोड़ रुपये ही भूल ना लेना देना चलना मल विसर्जन और रहती यह क्रम से पांचों इंद्रियों की पाँच कहानी और माह या मक्खी
मन बुद्धि अहंकार और यह करण की चार ही सुख और दुख यह मन का लक्ष्य है इस भी भय विकल्प इत्यादि मन के कारण ही और जो निश्चय करती है उसी को बुद्धि कहती ही और हैं
मम यह जो अहंकार में मन के प्रति है इससे ही चित्र खेती ही यह अन्तः करण भी सतोगुण आदि के भीड़ जुटती तीन प्रकार का है
सत रज तम यह तीन घोड़े नहीं जब सतोगुण प्रधान था है
असंख्य बुद्धि स्वच्छता धर्म में रुचि इत्यादि साथ एक धन प्राप्त होते ही और झा रजोगुण होता है तो काम क्रोध मद इत्यादि ही तमोगुण की प्रधानता में निद्रा अलग से प्रमाद मंच
है इन्द्रियों की प्रसन्नता होगी आलस्य का न होना यह गोल सत्तर से उत्पन्न ही इन पांच महाभूतों की मात्रा से उत्पन्न हुआ यह देह ही उनके गुणों को धारण करता है
उनमें शब्द श्रौत सूत्र इन्द्रिय वाहन कुशलता लघुता झेल रहे और बल साथ गुण आकाश से इसे स्टूल अंधेरे में प्राप्त ही इस वर्ष तभी
उस पर
था ऊपर को फेंकना अब से पर अर्थात नीचे तो फेंकना अकुंश चक्र अर्थात खोदना प्रसाद अर्थात फैलना गमन अर्थात चलना यह पाँच कम नहीं रहा अपान व्यान उदान यह पाँच रहाणे भी
नाक को कल वे रात धनंजय यह पाँच उपरांत लगते ही यह एक ही वायु विकार को प्राप्त होने पर दर्शना ढली ही उन सभी प्रकार पवन है
जो नाभि से लेकर कंठ तक स्थित रहता है
अनन्नास का नाम ही तरह हृदय कमल में गमन करता है
शब्द के उच्चारण निशब्द निश्वास और श्वास अधिक का यही कारण भी
लिंग करती जंग उधार न कंठ अंडकोष जोड़ों की संधि और जंघाओं में अपान वायु रहता है उसका कारण मूत्र और पुरुष का प्रयास करना नहीं भी
कारण कामों के भूतनी जीव तथा नाथ का इन पांच स्थानों में ज्ञान वाइन रहता है
प्राणायाम रेचक पूरक कुम्भक इसके कारण ही समान भाई सब शरीर में व्याप्त होकर जठराग्नि के सहित बहत्तर हजार नारियों के रंग में संचार करता है
भोजन की और यह हुए संपूर्ण रसों की देह की पुष्टि के निमित्त लेकर चलना हाथ और अमेरिकी संधियों में उदान वायु रहता है
वे का उठाना चलाना ये इसका कर कहा कि कर्जा माफ हो रही थी और स्नायु इन पांच धातुओं के आश्रय नाग आदि पाँच उपरांत व्यक्ति द कहा हिचकी यह नाग पवन का कारण पलक खोलना लगा
ना कटाक्ष यह
उनका कर भूख प्यास चीखना कनखल का कारण आलस्य निद्रा जब हाई डैम दर्द का कारण पर शोक और हाँ से धनंजय रखकर नहीं अग्नि के भारत चक्षु
क्रिसिल ने शुक्ल इत्यादि रूप भोजन का वाहक स्वतः प्रकाश क्रूड विश्व पर क्रिस्टा इन्द्रियों का तेज चलता शूरता और रोक थी यह गुण तेज से प्राप्त होते ही और नींबू रस शीट
चिता पर दिनभर तो पसीने और संपूर्ण अवयवों में कोमलता ये घर जल से उत्पन्न होते ही ग्राइंडर रहे गंध इस भिन्नता गहरे गुरु यह शहर पृथ्वी से उत्पन्न होते ही त्वचा रुधिर माह में
अस्थि मज्जा और शुक्र यह साथ धातु शरीर को धारण करती ही पुरुषों का भक्षण किया अहं जठराग्नि से तीन भाग हो जाता है जिसका है
भारत मध्य भाग मास्क और सूक्ष्म हा मन था ही इससे निर्माण अन्नमय कहा था है झटका है फूल भाग मूत्र मध्यभाग रखते हैं और कनिष्ठ भाव कहता है इससे जल में रहने में तेज का इस टूल में था
थी मज़ा मध्य भाग और वाहिनी तुच्छ विभाग ने आश्चर्य यह है कि अहं उदक और से शुरू कर झट से रक्त से मार्च पर होता है
मास्टर से नहीं था मेफेयर थी और अस्थि मज्जा उत्पन्न होती है
मां से ही नारी उत्पन्न होती है और मज़ाक भी जी ने उत्पन्न होता है
वाह प्रेरित का हो या तीन धातु शरीर में रेतीली शरीर भी दस अंजलि फिर शर्मा जल रहता है
अंजलि रथ को तथा अन्य रहता है
रफ्तार ली विशाखा तक बिजली कर छः अंजली पित्त चली चली और मूत्र चार अधजली रहता है
भी तीन अंजली मीटर दो अंजली मचा एक ली और भी रहे आदि अंजलि रहता है इसी को भले ही शरीर में थी तीन सौ साठ शर्म का रोचक आप तरह और न ये पाँच प्रकार की थी
शरीर ही दो सौ अस्सी और की भी है उनको रोड़ा प्रसार इस कद्र फीचर उल्लू खद समर्थक मंदक शंका भारत और बाईस तुलना ये आठ वे अस्थियों की संधि के ही सहारे फिर करो सब शरीर
पर रोम ही और दाढ़ी के बाद से ही दर्शकों को मां इस प्रकार यह भी का हो तुम्हारे प्रति की किया इस देह के समान निस्तार पड़ा दूसरा त्रिलोकी में कोई ही इस भी को प्राप्त होकर पास बुद्धि पुरुष माह अभी
भ्रम निवृत होने से रजत में लाई जाती है

हर हर महादेव

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...