बुधवार, 2 अगस्त 2023

शकील बदायू

शकील बदायुनी
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*Ş₳ŦเŞ𝓱👸🏻◣🍁💜⃝🇱♥︎2*
🎂जन्म03 अगस्त 1916
बदायू ,उत्तर प्रदेश, भारत
⚰️मौत20 अप्रैल 1970 (उम्र 53)
पेशाशायर
राष्ट्रीयताभारत
विधागजल
विषयप्रेम, दर्शन
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शकील पर घर के माहौल से अलग बदायूं और रिश्तेदार की शायरी का असर पड़ा. वे शायरियां करने लगे. लेकिन शायर के तौर पर उनकी पहचान बदायूं छोड़ने के बाद हुई. 1936 में जब शकील पढ़ाई के लिए अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी पहुंचे, तब उन्होंने कॉलेज और विश्वविद्यालयों के मुशायरों में जमकर हिस्सा लेना शुरू किया. 1940 में सलमा के साथ उनका निकाह हो गया. हालांकि ग्रैजुएशन पूरा करने के बाद सप्लाई ऑफिसर के रूप में शकील दिल्ली पहुंच गए. नौकरी के बावजूद उनका मुशायरों में जाना जारी रहा.

शकील शुरुआत से ही अपने दौर के शायरों से बिल्कुल अलग थे. उनके समकालीन शायर जहां सामाजिक, राजनीतिक घटनाओं पर लिख रहे थे, शकील की शायरी का विषय सिर्फ दर्द और रोमांस था. फिल्मी गीतों के लेखन में भी शकील की यही खासियत नजर आती है. शकील के ही एक शेर में इसे समझा जा सकता है -

मैं शकील दिल का हूं तर्जुमा, के मोहब्बतों का हूं राजदां,

मुझे फक्र है कि मेरी शायरी, मेरी जिंदगी से जुदा नहीं

शकील करीब चार साल तक नौकरी करते हुए दिल्ली में रहे. उनकी जिंदगी में 1944 के दौरान वो वक्त आया जब उन्होंने फिल्मों में लिखने की ठानी. उन्होंने फिल्मी गीतकार बनने के लिए नौकरी छोड़ी और मुंबई पहुंच गए. यहां आकर उन्होंने फिल्म निर्माता एआर केदार और संगीतकार नौशाद से मुलाक़ात की. नौशाद ने शकील से एक लाइन में उनकी पोएट्रिक स्किल बताने को कहा गया. उन्होंने कहा-

"हम दर्द का अफसाना दुनिया को सुना देंगे, हर दिल में मोहब्बत की आग लगा देंगे"

इसके बाद जो कुछ हुआ वो बॉलीवुड में एक इतिहास जैसा है. शकील और नौशाद की जोड़ी 20 साल से ज्यादा वक्त तक साथ काम किया और कई बेहतरीन फिल्में दीं. दोनों ने दीदार, बैजू बावरा, मदर इंडिया, मुग़ल-ए-आजम, दुलारी, शबाब, गंगा जमुना और मेरे महबूब जैसी फिल्मों में साथ काम किया. इनके गानों में आज भी रोमांस और दर्द को महसूस किया जा सकता है. शकील ने ज्यादातर नौशाद के साथ काम किया, पर उन्होंने कई दूसरे संगीतकारों की धुनों पर भी गीत लिखे. उन्होंने रवि और हेमंत कुमार के संगीत निर्देशन में भी काम किया.

फिल्म "घराना" का गीत "हुश्नवाले तेरा जवाब नहीं" के लिए शकील और रवि को बेस्ट गीतकार और बेस्ट संगीतकार का फिल्मफेयर मिला. रवि के साथ शकील की अन्य महत्वपूर्ण फिल्मों में चौदहवी का चांद थी. इस फिल्म के टाइटल गाने के लिए शकील ने 1961 में बेस्ट गीतकार का फिल्म फेयर अवॉर्ड जीता था. हेमंत कुमार के साथ शकील की सबसे बड़ी हिट साहिब बीवी और गुलाम थी. शकील ने अपने फ़िल्मी करियर में करीब 89 फिल्मों के लिए गाने लिखे. उन्होंने कई ऐसी गज़लें भी लिखीं जिसे बेगम अख्तर ने अपनी आवाज दी और वो बेहद मशहूर हुईं.

नौशाद की धुनों पर गाना लिखने वाले शकील बाद में उनके गहरे दोस्त भी बने. शकील से मुलाक़ात के बाद 25 साल तक नौशाद ने अपने ज्यादातर गाने शकील से ही लिखवाए. बैजू बावरा दोनों के करियर की बेहतरीन फिल्म है जो अपने गीत और संगीत के लिए आज भी याद की जाती है. हालांकि फिल्म के निर्देशक विनय भट्ट इसमें कवि प्रदीप से गाना लिखवाना चाहते थे. नौशाद को जब पता चला तो उन्होंने विनय से अनुरोध किया कि एक बार शकील के लिखे को सुन लें. और इस तरह शकील को सुनने के बाद विनय, नौशाद की बात पर राजी हो गए.

नौशाद और शकील की दोस्ती का एक और किस्सा मशहूर है. दरअसल, शकील को टीबी की बीमारी हो गई और वो इलाज के लिए पचगनी में थे. नौशाद जानते थे कि उनकी आर्थिक हालत भी खराब है. नौशाद ने शकील को तीन फिल्में दिलवाई. बताते चलें कि इन फिल्मों के लिए नौशाद को उनकी सामान्य फीस से 10 गुना ज्यादा भुगतान किया गया. नौशाद के अलावा शकील की दोस्ती संगीतकार रवि और गुलाम मोहम्मद के साथ भी थी. बॉम्बे हॉस्पिटल में इलाज के दौरान 20 अप्रैल 1970 में 53 वर्ष की आयु में शकील की मौत हो गई थी.

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