गुरुवार, 31 अगस्त 2023

डाक्टर राही मासूम रजा

राही मासूम रज़ा 
🎂01सितंबर 1925
⚰️15 मार्च 1992
उनका जन्म गाजीपुर जिले के गंगौली गांव में हुआ था और प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा गंगा किनारे गाजीपुर शहर के एक मुहल्ले में हुई थी। बचपन में पैर में पोलियो हो जाने के कारण उनकी पढ़ाई कुछ सालों के लिए छूट गयी, लेकिन इंटरमीडियट करने के बाद वह अलीगढ़ आ गये और यहीं से एमए करने के बाद उर्दू में `तिलिस्म-ए-होशरुबा' पर पीएच.डी. की। पीएच.डी. करने के बाद राही अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़ के उर्दू विभाग में प्राध्यापक हो गये और अलीगढ़ के ही एक मुहल्ले बदरबाग में रहने लगे। अलीगढ़ में रहते हुए ही राही ने अपने भीतर साम्यवादी दृष्टिकोण का विकास कर लिया था और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के वे सदस्य भी हो गए थे। अपने व्यक्तित्व के इस निर्माण-काल में वे बड़े ही उत्साह से साम्यवादी सिद्धान्तों के द्वारा समाज के पिछड़ेपन को दूर करना चाहते थे और इसके लिए वे सक्रिय प्रयत्न भी करते रहे थे।

राही मासूम रज़ा
राष्ट्रीयता भारतीय
१९६८ से राही बम्बई में रहने लगे थे। वे अपनी साहित्यिक गतिविधियों के साथ-साथ फिल्मों के लिए भी लिखते थे जो उनकी जीविका का प्रश्न बन गया था। राही स्पष्टतावादी व्यक्ति थे और अपने धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रीय दृष्टिकोण के कारण अत्यन्त लोकप्रिय हो गए थे। यहीं रहते हुए राही ने आधा गांव, दिल एक सादा कागज, ओस की बूंद, हिम्मत जौनपुरी उपन्यास व १९६५ के भारत-पाक युद्ध में शहीद हुए वीर अब्दुल हमीद की जीवनी छोटे आदमी की बड़ी कहानी लिखी। उनकी ये सभी कृतियाँ हिंदी में थीं। इससे पहले वह उर्दू में एक महाकाव्य १८५७ जो बाद में हिन्दी में क्रांति कथा नाम से प्रकाशित हुआ तथा छोटी-बड़ी उर्दू नज़्में व गजलें लिखे चुके थे। आधा गाँव, नीम का पेड़, कटरा बी आर्ज़ू, टोपी शुक्ला, ओस की बूंद और सीन ७५ उनके प्रसिद्ध उपन्यास हैं।पिछले कुछ वर्षों प्रसिद्धि में रहीं हिन्दी पॉप गायिका पार्वती खान का विवाह इनके पुत्र नदीम खान, हिन्दी फिल्म निर्देशक एवं सिनेमैटोग्राफर से हुआ था।

उन्होंने एक टीवी धारावाहिक महाभारत की पटकथा और संवाद लिखे।टीवी धारावाहिक महाकाव्य महाभारत पर आधारित था। धारावाहिक भारत के सबसे लोकप्रिय टीवी धारावाहिकों में से एक बन गया, जिसमें लगभग 86% की चोटी की टेलीविजन रेटिंग थी।

राकेश बापट

राकेश बापट
🎂01 सितंबर 1978 
अमरावती , महाराष्ट्र , भारत
अन्य नामों
राकेश वशिष्ठ
व्यवसायों
अभिनेतानमूना
सक्रिय वर्ष
1999–2022
जीवनसाथी
रिद्धि डोगरा
​राकेश बापट का जन्म 0 1 सितंबर 1978 को अमरावती , महाराष्ट्र , भारत में हुआ था । उन्होंने अपनी पेंटिंग के लिए जूनियर स्तर पर राष्ट्रीय पुरस्कार जीता।

उनकी शादी 2011 में रिद्धि डोगरा से हुई थी लेकिन 2019 में उनका तलाक हो गया। उन्होंने सितंबर 2021 में शमिता शेट्टी को डेट करना शुरू किया , जो बिग बॉस ओटीटी में उनकी कनेक्शन थीं
उन्हें उनकी पहली भूमिका फिल्म तुम बिन (2001) में अमर शाह दी गई, जब निर्देशक की पत्नी ने उन्हें एक टूथपेस्ट विज्ञापन में देखा और अपने पति से उनकी सिफारिश की।उन्होंने अगली बार दिल विल प्यार व्यार (2002) में गौरव की भूमिका निभाई । इसके बाद वह जिग्नेश एम. वैष्णव द्वारा निर्देशित सस्पेंस थ्रिलर तुमसे मिलके रॉन्ग नंबर (2003), राजेश भट्ट द्वारा निर्देशित कौन है जो सपनों में आया (2004) में दिखाई दिए; नाम गुम जाएगा में , अमोल शेटगे द्वारा लिखित और निर्देशित एक रोमांटिक ड्रामा; और समीक्षकों द्वारा आलोचना की गई कोई मेरे दिल में है (2005) में, दीपक रामसे द्वारा निर्देशित।
बापट ने अपने टेलीविजन करियर की शुरुआत 2005 में स्फीयर ऑरिजिंस हिंदी टेलीविजन नाटक सात फेरे - सलोनी का सफर से की, जो 2005 से 2008 तक चला। उन्हें नकारात्मक भूमिका में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के लिए इंडियन टेली अवार्ड के लिए नामांकित किया गया था।

बापट 2006 में दो फिल्मों में दिखाई दिए: अहमद सिद्दीकी द्वारा निर्देशित जय संतोषी माँ , जिसमें नुसरत भरूचा भी मुख्य भूमिका में थीं, और जादू सा चल गया , देव बसु द्वारा निर्देशित।

2008 में, बापट ने हैट्स ऑफ प्रोडक्शंस द्वारा प्रस्तुत एक शो में अनुज की भूमिका निभाई, जो इमेजिन टीवी के एक पैकेट उम्मीद पर प्रसारित हुआ । इस शो में एक छत के नीचे रहने वाली सभी शैलियों की महिलाओं की कहानी दिखाई गई और राकेश ने धारावाहिक में एकमात्र पुरुष की भूमिका निभाई। इस शो को द इंडियन टेली अवार्ड्स में सर्वश्रेष्ठ साप्ताहिक कार्यक्रम का नाम दिया गया । 

2010 में, बापट सोनी एंटरटेनमेंट टेलीविजन पर प्रसारित एक भारतीय अलौकिक टेलीविजन श्रृंखला सेवन- द अश्वमेध प्रोफेसी शो में दिखाई दिए । इस सीरीज का निर्माण यश चोपड़ा ने किया था । बापट ने सेवन के पुरुष संरक्षक श्लोक की भूमिका निभाई। सेवन सात वंशजों की खोज और उनकी वास्तविक क्षमताओं की खोज की यात्रा की कहानी थी। शो ने तीन टेली पुरस्कार और एक आईटीए पुरस्कार जीता।

2010 से 2012 तक, बापट ने मर्यादा: लेकिन कब तक? में पुरुष नायक आदित्य सिंह जाखड़ की भूमिका निभाई। , स्टार प्लस पर एक भारतीय टेलीविजन नाटक । यह शो झाकर परिवार की चार महिलाओं के जीवन और उनके रिश्तों की स्याह सच्चाइयों के इर्द-गिर्द घूमता है।

राम कपूर

राम कपूर
🎂01 सितम्बर 1973 
अल्मा मेटर
कोडाइकनाल इंटरनेशनल स्कूल
पेशा
अभिनेता
सक्रिय वर्ष
1997-वर्तमान
के लिए जाना जाता है
मंशा
कसम से
बड़े अच्छे लगते हैं
दिल की बातें दिल ही जाने
हमशकल्स
जीवनसाथी
गौतमी कपूर ​( एम.  2003 )
बच्चे
2
उन्होंने अपने प्रारंभिक वर्ष उत्तराखंड के नैनीताल में शेरवुड कॉलेज में बिताए । शेरवुड कॉलेज में, कपूर को अभिनय से परिचित कराया गया, जब एक चुनौती और अपने मुख्य कप्तान के आदेश के रूप में उन्होंने चार्लीज़ आंटी के वार्षिक स्कूल नाट्य निर्माण के लिए ऑडिशन दिया और मुख्य भूमिका निभाई। अमीर रज़ा हुसैन के निर्देशन और संरक्षण में, कपूर को अपना करियर पथ मिला और उन्हें अभिनय के प्रति अपने प्यार का एहसास हुआ।

अपनी दसवीं बोर्ड परीक्षा पूरी करने के बाद, कपूर ने कोडाइकनाल इंटरनेशनल स्कूल में पढ़ाई की । अपनी स्नातक स्तर की पढ़ाई के बाद, कपूर ने मनोरंजन उद्योग में शामिल होने का फैसला किया और फिल्म निर्माण का अध्ययन करने के लिए यूसीएलए में शामिल होने के इरादे से संयुक्त राज्य अमेरिका में लॉस एंजिल्स चले गए , लेकिन लॉस एंजिल्स में स्टैनिस्लावस्की -आधारित अभिनय अकादमी में शामिल हो गए।
कपूर ने टेलीविजन धारावाहिक न्याय (1997) से ऑनस्क्रीन डेब्यू किया । उन्होंने तीन और शो हीना (1998), संघर्ष (1999) और कविता (2000) में काम किया।

2000 में, कपूर ने लोकप्रिय पारिवारिक नाटक घर एक मंदिर में अभिनय किया । कपूर ने एक बार फिर अमीर रज़ा हुसैन के साथ नाटक द फिफ्टी डेज़ ऑफ़ वॉर - कारगिल में काम किया , जो कारगिल युद्ध के नायकों को श्रद्धांजलि के रूप में नई दिल्ली में 10 दिनों तक चला । कपूर ने पांच किरदार निभाए।

2001 में, कपूर ने रिश्ते , धारावाहिक कभी आए ना जुदाई में अभिनय किया और मीरा नायर की प्रशंसित फिल्म मॉनसून वेडिंग में एक छोटी सी भूमिका निभाई ।

वह धड़कन (2003) और आवाज़ - दिल से दिल तक जैसी फिल्मों में दिखाई दिए , उसके बाद हजारों ख्वाहिशें ऐसी और बाली (2004), एक टेलीफिल्म जिसमें उन्होंने पृथ्वी सिंह की भूमिका निभाई।

2005 में, कपूर को देवकी ,  कल: यस्टरडे एंड टुमॉरो और मिस्ड कॉल जैसी फिल्मों में देखा गया था ।

2006 में, उन्होंने शो कसम से में जय उदय वालिया की भूमिका निभाई ।

इसके बाद कपूर को सोप ओपेरा बसेरा में देखा गया और उन्होंने दो रियलिटी शो में भाग लिया: एक प्रतिभागी के रूप में झलक दिखला जा और मेजबान के रूप में राखी का स्वयंवर ।

कपूर 2010 में दो फिल्मों में छोटी भूमिकाओं में दिखाई दिए। पहली व्यावसायिक रूप से सफल कार्तिक कॉलिंग कार्तिक थी , जिसमें कपूर ने कामथ सर की भूमिका निभाई थी। दूसरी, उड़ान , विक्रमादित्य मोटवानी द्वारा निर्देशित और अनुराग कश्यप द्वारा निर्मित समीक्षकों द्वारा प्रशंसित और पुरस्कार विजेता फिल्म थी ।

2011 में, उन्होंने टीवी शो बड़े अच्छे लगते हैं में अभिनय किया और पुरुष नायक राम अमरनाथ कपूर की भूमिका निभाई । शो तुरंत सफल रहा और कपूर के प्रदर्शन की सराहना की गई।

वह बॉलीवुड फिल्मों एजेंट विनोद (2012), स्टूडेंट ऑफ द ईयर (2012) और हमशकल्स (2014) में दिखाई दिए।

के एन सिंह

नाम K.N.SINGH 

 कृष्ण निरंजन सिंह
प्रसिद्ध नाम के. एन. सिंह
🎂जन्म 01 सितंबर, 1908
जन्म भूमि देहरादून
⚰️मृत्यु 31 जनवरी, 2000
मृत्यु स्थान देहरादून
अभिभावक पिता- चंडी दास
कर्म भूमि मुम्बई
कर्म-क्षेत्र अभिनेता
मुख्य फ़िल्में हुमायूं (1944), बरसात (1949), सज़ा व आवारा (1951), जाल व आंधियां (1952) आदि।
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी के.एन. सिंह अपनी इस खासियत के लिये भी पहचाने जाते थे कि वो किरदार में घुस कर एक्टिंग तो करते हैं लेकिन ओवर एक्टिंग नहीं। उनका किरदार परदे पर चीखने-चिल्लाने से सख़्त परहेज़ रखता था। उन्हें यकीन था कि हर किरदार में एक क्रियेटीविटी है, स्कोप है।
के. एन. सिंह का जन्म 1 सितंबर, 1908 को देहरादून (उत्तराखंड) में हुआ था। यह भारतीय सिनेमा के जाने-माने अभिनेता थे। ये हर भूमिका का अच्छा अध्ययन करते थे। इनका पूरा नाम कृष्ण निरंजन सिंह था। इनके पिता चंडी दास एक जाने-माने वकील (क्रिमिनल लॉएर) थे और देहरादून में कुछ प्रांत के राजा भी थे। ये भी उनकी तरह वकील बनना चाहते थे लेकिन अप्रत्याशित घटना चक्र उन्हें फ़िल्मों की ओर खींच ले आया। मंजे हुए अभिनय के बल पर के. एन. सिंह एक चरित्र अभिनेता बने व विलेन के रूप में स्थापित हुए। के. एन. सिंह की पत्नी प्रवीण पाल भी सफल चरित्र अभिनेत्री थीं। उनकी अपनी कोई संतान नहीं थी। उनके छोटे भाई विक्रम सिंह थे, जो मशहूर अंग्रेज़ी पत्रिका फ़िल्मफ़ेयर के कई साल तक संपादक रहे। उनके पुत्र पुष्कर को के.एन. सिंह दंपति ने अपना पुत्र माना था। ये अपने 6 भाई-बहिनों में सबसे बड़े थे।

कुंदन लाल सहगल से भेंट
के. एन. सिंह की दोस्ती लखनऊ में ही अपने एक हम उम्र कुंदन लाल सहगल से हुई। आगे चल कर इस दोस्ती ने कई पड़ाव तय किये। पढ़ाई खत्म कर के. एन. देहरादून आ गए उनके पिता चाहते थे कि के. एन. जल्द से जल्द अपने पैरों पर खड़े हों। उन्होंने कई काम किए कभी लाहौर जा कर प्रिंटिग प्रेस स्थापित की कभी राजों रजवाड़ों को पालने के लिये जंगली जानवर स्पलाई किये तो कभी चाय बागान में काम करने वालों के लिये ख़ास तरह के जूते बनवाए, तो कभी फ़ौज में खुखरी की सप्लाई की हर धंधा शुरू में चला लेकिन के. एन. सिंह का स्वभाव व्यवसायिकता के लिए बना ही नहीं था। पिता परेशान थे और के. एन. का खुद का आत्मविश्वास भी लगातार असफलताओं से डिगने लगा था। उन्हें लग रहा था कि इससे बेहतर तो लंदन जाकर बैरिस्टर की पढ़ाई ही कर ली होती। पिता को लगने लगा कि बेटे को जीवन की कठोरताओं से मुक़ाबला करवाने के लिये उस पर ज़िम्मेदारी लादनी ही होगी। 1930 में मेरठ के फ़ौलादा गांव की आनंद देवी से के. एन. का विवाह करवा दिया गया। इनकी ऊँचाई 6 फुट दो इंच थी।

विवाह के कुछ दिनों बाद के. एन. सिंह ने ज़ाफ़रान की सप्लाई का काम शुरू किया। धंधा फूलने फलने लगा तो के. एन. का आत्मविश्वास भी लौटा और घरवालों का उन पर भरोसा भी बढ़ा इसी दौरान के. एन. की पत्नी बीमार पड़ गयीं। उस दौर में जब इंजेक्शन की पहुंच आम आदमी तक नहीं हुई थी और ऑपरेशन को मौत का दूसरा नाम समझा जाता था इलाज की व्यापक सुविधाएं नहीं थीं। जब तक पत्नी की बीमारी की सही वजह पता चलता उनका निधन हो गया। उधर बीमारी की वजह से उलझे के. एन. सिंह अपने धंधे पर भी ध्यान नहीं दे पाए और उनके व्यवसाय पर उनके भागीदारों ने कब्ज़ा जमा लिया। इस हादसे के कुछ दिनों बाद के. एन. की मुलाक़ात एक अंग्रेज़ लड़की से हुई जिसके साथ मिल कर उन्होंने रूढ़की में एक स्कूल खोला, लेकिन साल भर में ही स्कूल ठप हो गया। इससे पहले उन्होंने होटलों में बासमती चावल की सप्लाई की धंधा भी किया, लेकिन जल्द ही वो खत्म हो गया।

पृथ्वी राज कपूर को पत्र
के. एन. सिंह की एक बहन की शादी कोलकाता में हुई थी। उनकी अचानक तबियत खराब हो गयी। उनकी देखभाल के लिए किसी को जाना था। के. एन. सिंह ख़ाली थे उन्हें ही यह ज़िम्मेदारी सौंपी गयी। उनके कोलकाता जाने की बात सुनकर देहरादून में उनके एक दोस्त नित्यानंन्द खन्ना ने उन्हें पृथ्वी राज कपूर के नाम एक पत्र दिया। पृथ्वी राज उन दिनों कोलकाता में रह कर फ़िल्मों में व्यस्त थे और नित्यानंद उनके फुफेरे भाई थे। कोलकाता सफ़र के दौरान के. एन. सिंह को याद आया कि उनका लड़कपन का दोस्त कुंदन लाल तो फ़िल्मों में स्टार हो गया है शायद मिलने पर वह पहचान ले। सहगल भी उन दिनों कोलकाता में ही थे क्योंकि उस समय कोलकाता फ़िल्म निर्माण का सबसे प्रमुख केंद्र था। कोलकाता में के. एन. दिन भर तो बहन के पास अस्पताल में रहते और शाम को कुछ समय किसी पब या बार में बिताते थे।

ऋतुपर्ण घोष

फ़िल्म निर्देशक ऋतुपर्णो घोष के जन्मदिन पर हार्दिक श्रद्धांजलि
🎂जन्म 31 अगस्त, 1963
⚰️30 मई, 2013
ऋतुपर्णो घोष बंगाली फ़िल्मों के प्रसिद्ध निर्देशक, लेखक और अभिनेता थे। 'चोखेर बाली', 'रेनकोट' और 'अबोहोमन' जैसी फ़िल्मों के लिए 'राष्ट्रीय पुरस्कार' विजेता ऋतुपर्णो घोष की ख्याति राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय जगत् में थी। उन्होंने और उनकी फ़िल्मों ने रिकॉर्ड बारह 'राष्ट्रीय पुरस्कार' जीते थे। ऋतुपर्णो घोष उन निर्देशकों में से एक थे, जो फ़िल्म को एक कला मानते थे। व्यवसाय या बॉक्स ऑफिस को ध्यान में रखकर उन्होंने कभी फ़िल्में नहीं बनाईं। उनकी अपनी सोच थी, शैली थी और अपने मिजाज के अनुरूप ही ‍वे फ़िल्में बनाते थे। बहुत कम समय में ही उन्होंने अपनी एक ख़ास पहचान बना ली थी। घोष ने विज्ञापन की दुनिया से अपना व्यवसाय प्रारम्भ किया था और जल्द ही फ़िल्मों की ओर मुड़ गए थे। अपने 19 साल के फ़िल्मी करियर में ऋतुपर्णो घोष ने 19 फ़िल्मों का निर्देशन और तीन फ़िल्मों में अभिनय किया।

जन्म_तथा_शिक्षा

ऋतुपर्णो घोष का जन्म 31 अगस्त, 1963 को कोलकाता, पश्चिम बंगाल में हुआ था। इनके पिता का नाम सुनील घोष था। सुनील घोष डॉक्युमेंट्री फ़िल्म मेकर और पैंटर थे। ऋतुपर्णो घोष को फ़िल्म मेकिंग की प्रेरणा अपने पिता से ही मिली थी। ऋतुपर्णो घोष ने अपनी प्रारम्भिक स्कूली शिक्षा 'साउथ पॉइंट हाईस्कूल' से प्राप्त की। उन्होंने अपनी अर्थशास्त्र की डिग्री 'जादवपुर यूनिवर्सिटी', कोलकाता से प्राप्त की थी। आगे चलकर अपने आधुनिक विचारों को उन्होंने फ़िल्मों के जरिये पेश किया और जल्दी ही अपनी पहचान एक ऐसे फ़िल्म मेकर के रूप में बना ली, जिसने 'भारतीय सिनेमा' को समृद्ध किया।

फ़िल्म_निर्माण

विज्ञापन की दुनिया से अपना कैरियर शुरू करने वाले ऋतुपर्णो घोष ने अपने फ़िल्मी कैरियर की शुरुआत बाल फ़िल्मों के निर्माण से की। वर्ष 1994 में बाल फ़िल्म 'हिरेर आंग्टी' के निर्देशन से उन्हें शोहरत मिलने लगी थी। इसके बाद 'उनिशे एप्रिल' के लिए उन्हें 1995 में 'राष्ट्रीय पुरस्कार' से नवाज़ा गया था। यह फ़िल्म प्रख्यात फ़िल्म निर्देशक इंगमार बर्गमन की 'ऑटम सोनाटा' से प्रेरित थी। इस फ़िल्म में ऋतुपर्णो घोष ने माँ-बेटी के तनावपूर्ण रिश्तों को बारीकी से रेखांकित किया था। एक कामकाजी महिला अपने व्यावसायिक कैरियर में सफल है, लेकिन अपनी पारिवारिक ज़िंदगी में वह असफल रहती है। इसका असर उसकी बेटी पर होता है और बेटी अपनी माँ से इस बात को लेकर नाराज है कि वह अपने व्यवसाय को कुछ ज़्यादा ही महत्त्व देती है। इस फ़िल्म में अपर्णा सेन, देबश्री राय और प्रसन्नजीत चटर्जी ने अभिनय किया था। इस फ़िल्म को सिने प्रेमियों ने खूब सराहा था। उनके जानने-पहचानने वाले लोग उन्हें 'ऋतु दा' के नाम से पुकारने लगे थे।

लोकप्रियता

अपनी फ़िल्मों के माध्यम से ऋतुपर्णो घोष ने बहुत लोकप्रियता प्राप्त की। सारे बड़े फ़िल्मी कलाकार उनके साथ काम करने के लिए तुरंत राजी हो जाते थे, क्योंकि उनकी फ़िल्मों में काम करना गर्व की बात थी। रिश्तों की जटिलता और लीक से हट कर विषय उनकी फ़िल्मों की ख़ासियत होते थे। बांग्ला उनकी मातृभाषा थी और इस भाषा में वे सहज महसूस करते थे। इसलिए अधिकतर फ़िल्में उन्होंने बांग्ला भाषा में ही बनाईं। फ़िल्म फेस्टिवल में सिनेमा देखने वाले दर्शक और ऑफबीट फ़िल्मों के शौकीन ऋतु दा की फ़िल्मों का बेसब्री से इंतज़ार करते थे।

राष्ट्रीय_पुरस्कार

फ़िल्म 'हिरेर आंग्टी', जो कि एक बाल फ़िल्म थी, उसकी सफलता के बाद से ही ऋतुपर्णो घोष की फ़िल्मों को 'राष्ट्रीय पुरस्कार' मिलना आम बात हो गई। कभी कलाकारों को, कभी लेखकों तो कभी फ़िल्म को 'राष्ट्रीय पुरस्कार' मिलता। वर्ष 1999 में ऋतुपर्णो घोष द्वारा निर्देशित फ़िल्म 'बारीवाली' के लिए अभिनेत्री किरण खेर ने श्रेष्ठ अभिनेत्री का 'राष्ट्रीय पुरस्कार' हासिल किया था। 'बारीवाली' एक ऐसी महिला की कहानी थी, जिसके होने वाले पति की विवाह के एक दिन पहले ही मौत हो जाती है और इसके बाद वह एकांकी जीवन बिताती है। ऋतुपर्णो घोष ने कुल 19 फ़िल्में बनाईं और 12 'राष्ट्रीय पुरस्कार' जीते। ये पुरस्कार उनकी काबलियत को जाहिर करते हैं।

उल्लेखनीय_तथ्य

'उत्सव' (2000), 'तितली' (2002), 'शुभो महुर्त' (2003) जैसी ‍बांग्ला भाषा में बनी फ़िल्मों ने ऋतुपर्णो घोष की ख्याति को बढ़ाया। इसके बाद ऋतुपर्णो ने हिन्दी फ़िल्मों की मशहूर अभिनेत्री ऐश्वर्या राय को लेकर 'चोखेर बाली' (2003) बनाई। यह फ़िल्म रवीन्द्रनाथ टैगोर के उपन्यास पर आधारित थी। इस फ़िल्म में महिला किरदारों को बखूबी पेश किया गया था।
वर्ष 2004 में ऋतुपर्णो घोष ने हिन्दी भाषा में फ़िल्म 'रेनकोट' बनाई। 'रेनकोट' ऐसे दो प्रेमियों की कहानी है, जो वर्षों बाद बरसात की एक रात में मिलते हैं। इस फ़िल्म को ऐश्वर्या राय के कैरियर की श्रेष्ठ फ़िल्मों में से एक माना जाता है। अभिनेता अजय देवगन ने भी इस फ़िल्म में शानदार अभिनय किया।
वर्ष 2007 में ऋतुपर्णो घोष ने सिनेमा के दिग्गज अभिनेता अमिताभ बच्चन के साथ किया और फ़िल्म 'द लास्ट लियर' बनाई।
ऋतुपर्णो घोष की दूसरी हिन्दी फ़िल्म 'सनग्लास' थी, जो 2012 में रिलीज हुई थी।

प्रमुख_फ़िल्में

1994 हिरेर आंग्टी बंगाली
1995 उनिशे एप्रिल बंगाली
1997 दहन बंगाली
1999 बेरीवाली बंगाली
2003 चोखेर बाली बंगाली
2004 रेनकोट  हिन्दी
2005 अंतरमहल बंगाली
2006 दोसर  बंगाली
2007 द लास्ट लीअर  अंग्रेज़ी
2008 शोभ चरित्रो काल्पोनिक  बंगाली
2010 अबोहोमन बंगाली
2010 नौकाडूबी बंगाली
2012 चित्रांगदा  बंगाली
2012 सनग्लास  हिन्दी

समलैंगिक_फ़िल्में

चाहे हिन्दी फ़िल्म 'रेनकोट' में ऐश्वर्या राय और अजय देवगन से संवेदनशील अभिनय करवाना हो या फिर बांग्ला और हिन्दी में 'चोखेरबाली' हो, ऋतुपर्णो घोष ने न केवल महिलाओं से जुड़े मुद्दों को उठाया, बल्कि समलैंगिक मुद्दों को भी वे उठाते रहे। उनकी फ़िल्मों में समलैंगिक विषयों का काफ़ी संजीदा तरीके से चित्रण हुआ है। सर्वश्रेष्ठ अंग्रेज़ी फ़िल्म के लिए 'राष्ट्रीय पुरस्कार' जीतने वाली फ़िल्म 'मेमरीज़ इन मार्च' भी समलैंगिक विषय पर बनाई गई थी, जिसमें ऋतुपर्णो के अभिनय को काफ़ी सराहा गया था। अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त ऋतुपर्णो ने कभी भी बॉलीवुड की मुख्य धारा का रुख नहीं किया और कोलकाता में ही रह कर अलग-अलग विषयों पर अर्थपूर्ण फ़िल्में बनाते रहे। इस बात का अंदाजा़ इसी से लगाया जा सकता है कि उन्हें सिर्फ 49 वर्ष की आयु में ही बारह 'राष्ट्रीय पुरस्कार' और कई अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके थे। सिर्फ़ 21 वर्ष में बहुत कम ही फ़िल्मकारों को इतने पुरस्कार नसीब हुए हैं, लेकिन ऋतुपर्णो घोष अपने आप में ख़ास किस्म के निर्देशक और अभिनेता रहे थे।

पुरस्कार_व_सम्मान

ऋतुपर्णो घोष ने कई श्रेणियों में बारह 'राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार' जीते थे। उन्हें 'चोखेर बाली', 'उन्नीशे अप्रैल', 'रेनकोट' और 'द लास्ट लीअर' जैसी फ़िल्मों के लिए याद किया जाता है। वर्ष 2012 में आई उनकी आखिरी फ़िल्म 'चित्रांगदा' के लिए उन्हें 60वें 'राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार' समारोह में 'स्पेशल ज्यूरी अवार्ड' दिया गया था। घोष ने अपनी फ़िल्मों 'अरेक्ती प्रेमेर गोल्पो' 'मेमोरीज इन मार्च' और 'चित्रांगदा' में अपना अभिनय कौशल भी दिखाया था।

निधन

'भारतीय सिनेमा' को अपनी सूझबूझ और फ़िल्मों के माध्यम से समृद्ध बनाने वाले ऋतुपर्णो घोष पैन्क्रियाटाइटिस से पीड़ित थे। 30 मई, 2013 को कोलकाता में सुबह के समय साढ़े सात बजे उन्हें दिल का दौरा पड़ा और उनका निधन हो गया। उनकी आखिरी फ़िल्म 'चित्रांगदा' थी, जो हाल ही में मुंबई में हुए समलैंगिक फ़िल्म महोत्सव की क्लोज़िग फ़िल्म थी। इस महोत्सव के निर्देशक श्रीधर रंगायन का कहना था कि- "हमने एक ऐसा निर्देशक खोया है, जो समलैंगिक विषयों पर खुलकर, बिना डरे और बेहद ही संजीदगी से फ़िल्में बनाता था।"

बुधवार, 30 अगस्त 2023

राज कुमार यादव

राज कुमार यादव
31 अगस्त 1984 
गुरूग्राम , हरियाणा , भारत
अल्मा मेटर
भारतीय फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान
पेशा
अभिनेता
सक्रिय वर्ष
2010-वर्तमान
काम करता है
पूरी सूची
जीवनसाथी
पत्रलेखा पॉल ​
भारतीय फिल्म और टेलीविजन संस्थान में अभिनय का अध्ययन करने के बाद , राव ने एंथोलॉजी फिल्म लव सेक्स और धोखा (2010) से अभिनय की शुरुआत की और गैंग्स ऑफ वासेपुर - भाग 2 और तलाश: द आंसर लाइज़ विदइन फिल्मों में सहायक भूमिकाएँ निभाईं । दोनों 2012)। उन्हें 2013 में काई पो चे नाटक में समीक्षकों द्वारा प्रशंसित प्रदर्शन के साथ सफलता मिली! और शाहिद . बाद में वकील शाहिद आज़मी के उनके चित्रण ने उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्मफेयर क्रिटिक्स अवॉर्ड दिलाया ।

राव का करियर क्वीन (2014), अलीगढ़ (2015) और बरेली की बर्फी (2017) में सहायक भूमिकाओं के साथ आगे बढ़ा , जिसमें बाद में उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला । उन्होंने स्वतंत्र फिल्मों ट्रैप्ड (2016) और न्यूटन (2017) में मुख्य भूमिकाएँ निभाईं, पहली फिल्म ने उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के लिए दूसरा फिल्मफेयर क्रिटिक्स अवार्ड दिलाया और दूसरी फिल्म ने उन्हें एक अभिनेता द्वारा सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के लिए एशिया पैसिफिक स्क्रीन अवार्ड दिलाया । राव की हॉरर कॉमेडी स्त्री (2018) में उनकी सबसे अधिक कमाई वाली रिलीज़ थी, और व्यंग्य द व्हाइट टाइगर में उनकी पहली अंग्रेजी-फिल्म भूमिका थी।(2021)। लूडो (2020), मोनिका, ओ माई डार्लिंग (2022) और भेड़ (2023) में उनकी अभिनीत भूमिकाओं के लिए और अधिक प्रशंसा मिली , और उन्होंने बधाई दो (2022) में एक गुप्त समलैंगिक व्यक्ति की भूमिका निभाने के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्मफेयर पुरस्कार जीता।
🌹राजकुमार राव का जन्म राज कुमार यादव के रूप में 31 अगस्त 1984 को प्रेम नगर, गुड़गांव , हरियाणा , भारत में हुआ था।उनके विस्तृत परिवार में दो बड़े भाई-बहन और तीन चचेरे भाई-बहन थे। उनके पिता, सत्य प्रकाश यादव,  हरियाणा राजस्व विभाग में एक सरकारी कर्मचारी थे , और उनकी माँ, कमलेश यादव, एक गृहिणी थीं।उनकी माता और पिता की मृत्यु क्रमशः 2016 और 2019 में हो गई। उन्होंने अपनी 12वीं कक्षा एसएन सिद्धेश्वर सीनियर से पूरी की। सेक पब्लिक स्कूल, जहाँ उन्होंने स्कूल नाटकों में भाग लिया। उन्होंने आत्मा राम सनातन धर्म कॉलेज से स्नातक की उपाधि प्राप्त की , (दिल्ली विश्वविद्यालय ) जहां वह क्षितिज थिएटर ग्रुप और दिल्ली में श्री राम सेंटर के साथ एक साथ थिएटर कर रहे थे । 

राव ने कहा कि उन्होंने मनोज बाजपेयी को देखने और उनके प्रदर्शन से "अत्यधिक प्रभावित" होने के बाद अभिनेता बनने का फैसला किया ।2008 में, उन्होंने पुणे के फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (एफटीआईआई) में दो साल के अभिनय पाठ्यक्रम में दाखिला लिया और फिल्मी करियर बनाने के लिए मुंबई चले गए।  राव शाकाहारी हैं।उन्होंने 2014 में अपना उपनाम यादव से बदलकर राव कर लिया और अपने नाम में एक अतिरिक्त 'एम' भी जोड़ लिया। उन्होंने इसका कारण बताया, "राव या यादव, मैं दोनों में से किसी एक उपनाम का उपयोग कर सकता हूं क्योंकि दोनों पारिवारिक नाम हैं। जहां तक ​​पहले नाम में दोहरे 'एम' का सवाल है, यह मेरी मां के लिए है। वह अंक ज्योतिष में विश्वास करती हैं।" ।" उन्हें औपचारिक रूप से तायक्वोंडो में प्रशिक्षित किया गया है ।

राव 2010 से अभिनेत्री पत्रलेखा पॉल के साथ रिश्ते में थे। उन्होंने 15 नवंबर 2021 को चंडीगढ़ में उनसे शादी की ।

ए के हंगल

🎂01 फ़रवरी 1914, सियाल कोट पाकिस्तान
⚰️26 अगस्त
अवतार किशन हंगल
indo-canadian 
अभिनेता ए के हंगल की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रधांजली

🎂01फरवार 19 17 पाकिस्तान सियालकोट

⚰️26 अगस्त 2012, मुंबई

अवतार किशन हंगल हिन्दी फ़िल्मों के प्रसिद्ध अभिनेता एवं दूरदर्शन कलाकार थे। वर्ष 1967 से हिन्दी फ़िल्म उद्योग का हिस्सा रहे हंगल ने लगभग 225 फ़िल्मों में काम किया। उन्हें फ़िल्म 'परिचय' और 'शोले' में अपनी यादगार भूमिकाओं के लिए जाना जाता है।


भारत के स्वतंत्रता संग्राम में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने वाले ए.के. हंगल का जन्म 1 फ़रवरी 1917 को कश्मीरी पंडित परिवार में अविभाजित भारत में पंजाब राज्य के सियालकोट में हुआ था। इनका पूरा नाम अवतार किशन हंगल था। कश्मीरी भाषा में हिरन को हंगल कहते हैं। उन्होंने हिंदी सिनेमा में कई यादगार रोल अदा किए। वर्ष 1966 में उन्होंने हिंदी सिनेमा में कदम रखा और 2005 तक 225 फ़िल्मों में काम किया। राजेश खन्ना के साथ उन्होंने 16 फ़िल्में की थी। हंगल साहब उर्दू भाषी थे। उन्हें हिंदी में स्क्रिप्ट पढ़ने में परेशानी होती थी। इसलिए वे स्क्रिप्ट हमेशा उर्दू भाषा में ही मांगते थे।


कश्मीरी ब्राह्मणों का यह परिवार बहुत पहले लखनऊ में बस गया था। लेकिन हंगल साहब के जन्म के डेढ़-दो सौ साल पहले वे लोग पेशावर चले गये थे। इनके दादा के एक भाई थे जस्टिस शंभुनाथ पंडित, जो बंगाल न्यायालय के प्रथम भारतीय जज बने थे। हंगल साहब के पिता उन्हें पारसी थियेटर दिखाने ले जाया करते थे। वहीं से नाटकों के प्रति शौक़ उत्पन्न हुआ। हंगल साहब शुरुआती दौर से ही कभी किसी काम को छोटा नहीं समझते थे।


इनका बचपन पेशावर में गुजरा, यहां उन्होंने थिएटर में अभिनय किया। इनके पिता का नाम पंडित हरि किशन हंगल था। अपने जीवन के शुरुआती दिनों में, जब वे कराची में रहते थे, वहां उन्होंने टेलरिंग का काम भी किया है। पिता के सेवानिवृत्त होने के बाद पूरा परिवार पेशावर से कराची आ गया। 1949 में भारत विभाजन के बाद ए.के. हंगल मुंबई चले गए। 21 की उम्र में 20 रुपये लेकर पहली बार मुंबई आए थे। ये बलराज साहनी और कैफी आजमी के साथ थिएटर ग्रुप आईपीटीए के साथ जुड़े थे।

उन्होंने इप्टा से जुड़ कर अपने नाटकों के मंचन के माध्यम से सांस्कृतिक चेतना जगायी। हंगल साहब पेंटिंग भी करते थे। उन्होंने किशोर उम्र में ही एक उदास स्त्री का स्केच बनाया था और उसका नाम दिया चिंता। वे हमेशा अपनी फ़िल्मों से ज्यादा अपने नाटक को अहमियत देते थे और मानते थे कि ज़िंदगी का मतलब सिर्फ अपने बारे में सोचना नहीं है। वे हमेशा कहते थे कि चाहे कुछ भी हो जाये, ‘मैं एहसान-फरामोश और मतलबी नहीं बन सकता।’

भारत की आज़ादी की लड़ाई में भी इनकी भागीदारी थी। 1930-47 के बीच स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रहे। दो बार जेल गए। हंगल तीन साल पाकिस्तान में जेल में रहे। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान पेशावर में काबुली गेट के पास एक बहुत बड़ा प्रदर्शन हुआ था, जिसमें हंगल साहब भी उपस्थित थे। अंग्रेजों ने अपने सिपाहियों को प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने का हुक्म दिया था, लेकिन चंदर सिंह गढ़वाली के नेतृत्व वाले उस गढ़वाल रेजीमेंट की टुकड़ी ने गोली चलाने से इनकार कर दिया। यह एक विद्रोह था। चंदर सिंह गढ़वाली को जेल में डाला गया। हंगल साहब को दु:ख था कि चंदर सिंह गढ़वाली को ‘भारत रत्न’ नहीं मिला। भारत माँ का यह वीर सपूत 1981 में गुमनाम मौत मरा। पेशावर में हुआ नरसंहार उसी काबुल गेट वाली घटना के बाद हुआ था। उस वक्त अंग्रेजों ने अमेरिकी से गोलियाँ चलवाई थीं। हंगल साहब ने अपनी आँखों से यह सब देखा था। यही वजह रही कि वे थियेटर से जुड़ने के साथ-साथ स्वतंत्रता संग्राम और सामाजिक आंदोलनों को लेकर हमेशा सजग रहते थे।
भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फाँसी से बचाने के लिए चलाये गये हस्ताक्षर अभियान में भी वे शामिल थे। किस्सा-ख्वानी बाज़ार नरसंहार के दौरान उनकी कमीज ख़ून से भीग गयी थी। हंगल साहब कहते थे, ‘वह ख़ून सभी का था- हिंदू, मुस्लिम, सिख सबका मिला हुआ खून!’ छात्र जीवन से ही वे बड़े क्रांतिकारियों की मदद में जुट गये थे। बाद में उन्हें अंग्रेजों ने तीन साल तक जेल में भी रखा, फिर भी वे अपने इरादे से नहीं डिगे

ए.के. हंगल 50 वर्ष की उम्र में हिंदी सिनेमा में आए। उन्होंने 1966 में बासु चटर्जी की फ़िल्म 'तीसरी कसम' और 'शागिर्द' में काम किया। इसके बाद उन्होंने सिद्घांतवादी भूमिकाएँ निभाई। 70, 80 और 90 के दशकों में उन्होंने प्रमुख फ़िल्मों में पिता या अंकल की भूमिका निभाई। हंगल ने फ़िल्म शोले में रहीम चाचा (इमाम साहब) और 'शौकीन' के इंदर साहब के किरदार से अपने अभिनय की छाप छोड़ी। इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन (इप्टा) के साथ बढ़-चढ़कर काम करने वाले हंगल ने 139 से अधिक फिल्‍मों में अपने अभिनय कौशल का लोहा मनवाया है। इनके प्रमुख रोल फ़िल्म 'नमक हराम', शौकीन, शोले, आईना, अवतार, अर्जुन, आंधी, तपस्या, कोरा कागज, बावर्ची, छुपा रुस्तम, चितचोर, बालिका वधू, गुड्डी, नरम-गरम में रहे। इनके बाद के समय में यादगार किरदारों में वर्ष 2002 में शरारत, 1997 में तेरे मेरे सपने और 2005 में आमिर खान के साथ लगान में नज़र आए थे।


वर्ष 2006 में उन्हें भारत सरकार ने पद्मभूषण से नवाजा।


टीवी सीरियल में उपस्थिति

1997 में बॉम्बे ब्लू
1998 में जीवन रेखा
1986 में मास्टरपीस थिएटर : लार्ड माउंटबेटन
1996 में चंद्रकांता
1993-94 में जबान संभाल के में छोटी भूमिका
2004-05 में होटल किंग्सटन में छोटी भूमिका
2012 में धारावाहिक कलर्स चैनल के धारावाहिक मधुबाला में विशेष उपस्थित

हंगल लम्बे समय से बुढ़ापे की बीमारियों से पीड़ित रहे। बॉलीवुड के सबसे वयोवृद्ध अभिनेता ए. के. हंगल का 26 अगस्त 2012 को सुबह नौ बजे के क़रीब मुंबई के आशा पारेख अस्पताल में निधन हो गया था। 95 साल के हंगल को 16 अगस्त को अस्पताल में भर्ती कराया गया था। 13 अगस्त को हंगल गिर गए थे। पीठ में चोट लगने और कूल्हे की हड्डी टूटने के कारण उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहाँ उनकी सर्जरी हुई। सर्जरी होने के बावजूद उनती सेहत में कोई सुधार नहीं हुआ। बाद में पता चला कि उन्हें सीने में दर्द और सास लेने में तकलीफ़ है। इसके बाद उन्हें वेंटीलेटर पर रखा गया, लेकिन उनकी सेहत में कोई सुधार नहीं हुआ।

दीपक देव कोहली


🎂2 नवंबर 1942
⚰️26अगस्त

जाने-माने गीतकार देव कोहली नहीं रहे। अफ़सोस, बहुत सारे गीतकारों को हम उनके गानों के ज़रिए नहीं पहचानते। इसलिए मुझे ये लिखना पड़ रहा है कि ये वही देव कोहली हैं जिन्‍होंने लिखा था—‘दीदी तेरा देवर दीवाना/ हाय राम चिडियों को डाले दाना’ और हम दीवानों की तरह इस गाने को गुनगुनाते या सुनते नहीं थकते थे। देव कोहली का हक़ है कि उन्‍हें हम उनके उन गानों के ज़रिए पहचानें जिन्‍हें हमने ख़ूब सराहा है और जिन्‍होंने ज़िंदगी के बड़े हसीन लम्‍हे साझा किये हैं। नब्‍बे के दशक में कौन होगा जिसने ‘आते-जाते हंसते गाते, सोचा था मैंने कई बार’ नहीं गाया होगा। भला कौन होगा जिसने नाइंटीज़ में सलमान भाई का ‘पहला पहला प्‍यार है/पहली-पहली बार है’ गाकर किसी को यक़ीन ना दिलाया होगा कि सचमुच उस जैसा दीवाना कोई नहीं है। 
प्‍यारे दोस्‍त सुनील करमेले Suneel R. Karmele जैसे लोगों की तो ज़िंदगी बन गयी थी देव कोहली के गाने ‘दीदी तेरा देवर दीवाना’ से। हम गवाह हैं इस बात के। उन्‍होंने ‘माई नी माई मुंडेर पे तेरी बोल रहा है कागा’ भी लिखा जिस पर जाने कितनी लड़कियां कॉलेज के एनुअल डे के दिन मेंडोलिन की तरंग पर थिरकीं और इस गाने की आगे की लाइन ‘चन माहिया मेरे डोल सिपाहिया’ पर उन्‍होंने तालियां बटोरीं। 
यही देव कोहली चुपके से चले गये। 
बता दूं कि ‘वादा रहा सनम’ (खिलाड़ी), ‘ये काली काली आंखें’ (बाज़ीगर) और ‘जब तक रहेगा समोसे में आलू’ (मिस्‍टर एंड मिसेज खिलाड़ी) भी देव साहब लिखते रहे। पर उन्‍होंने हंसराज हंस वाला ‘देस नूं चलो’ (23 मार्च 1931 शहीद भगत सिंह) भी लिखा। 
भूलना नहीं चाहिए कि 1971 में आई फ़िल्‍म ‘लाल पत्‍थर’ का गाना ‘गीत गाता हूं मैं गुनगुनाता हूं मैं’ भी देव कोहली की कलम का कमाल था। 
फिर भी नाइंटीज़ को लालों!!!! 
फिल्म संगीत के कद्रदानो!!!
देव कोहली को नमन करना बनता है भाई। वो बड़े गीतकार थे। 

शुभाखोटे

शुभा खोटे और विजू खोटे भाई बहन 
फ़िल्म अभिनेत्री शुभा खोटे के जन्मदिन पर हार्दिक शुभकामनाएं
भाई: विजू खोटे
माता-पिता: नंदू खोटे
बच्चे: भावना बलसावर, अश्विन बलसावर
पति: डी॰ एम॰ बलसावर (विवा. 1960)

शुभा खोटे 
 🎂जन्म 30 अगस्त 1936
एक भारतीय फिल्म और टेलीविजन अभिनेत्री हैं।  वह तैराकी और साइकिलिंग में पूर्व महिला राष्ट्रीय चैंपियन भी हैं।

शुभा खोटे का जन्म मराठी-कोंकणी परिवार में हुआ था उनके पिता नंदू खोटे मराठी थियेटर में काम करते थे उनकी माँ कोंकणी थी जो कर्नाटक के मैंगलोर की रहने वाली थी  अभिनेता विजू खोटे उनके छोटे भाई थे।अनुभवी अभिनेत्री दुर्गा खोटे शुभा के पिता के चचेरे भाई की पत्नी थीं।  शुभा के मामा नयामपल्ली भी एक अभिनेता थे।

शुभा खोटे ने सेंट टेरेसा हाई स्कूल, चर्नी रोड और सेंट कोलंबिया स्कूल (गमदेवी) से पढ़ाई की।  एक लड़की के रूप में, उन्होंने तैराकी और साइकिलिंग में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया, और एक ऐसे युग में जब बहुत कम महिलाओं ने इस तरह के खेलों में भाग लिया, वह लगातार तीन वर्षों, 1952-55 में तैराकी और साइकिलिंग में महिला राष्ट्रीय चैंपियन थीं।  स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद, उन्होंने विल्सन कॉलेज से अंग्रेजी साहित्य में स्नातक किया।

शुभा की शादी डी एम बलसावर से हुई है, जो (शुभा की मां की तरह) मैंगलोर से हैं।  वह एक प्रमुख भारतीय कॉरपोरेट नोसिल में मार्केटिंग के उपाध्यक्ष थे। वह मराठी फिल्म चिमुकला पाहुना (1968) में एक कैमियो में दिखाई दिए, जिसका उन्होंने निर्माण और निर्देशन भी किया। उनकी बेटी भावना बलसावर भी एक टीवी अभिनेत्री हैं।

उन्होंने 4 साल की उम्र में बाल कलाकार के रूप में अपने कैरियर की शुरुआत फ़िल्म सीमा (1955) से की उसमे उनके चरित्र का नाम पुतली था उनकी अच्छी साइकिलिंग ने उसे व्यापक रूप से पहचान दिलाई उस के बाद उन्होंने बड़ी संख्या में हिंदी और मराठी फिल्मों, स्टेज शो और टीवी धारावाहिकों में अभिनय किया है।  उन्होंने ज्यादातर महमूद के साथ अभिनय किया और यह जोड़ी ससुराल, भरोसा, ज़िद्दी, छोटी बहन, सांझ और सवेरा, लव इन टोक्यो, गृहस्थी हमराही और बेटी बेटे में हिट हुई।  उन्होंने फ़िल्म पेइंग गेस्ट और एक दूजे के लिए में नकारात्मक भूमिकाएँ निभाईं।  1962 में, 9 वें फिल्मफेयर पुरस्कारों में, उन्हें घराना और ससुराल के लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री के फिल्मफेयर पुरस्कार के लिए दो नामांकन प्राप्त हुए, हालांकि वह निरूपा रॉय से हार गईं। 

उन्होंने हेरा फेरी, हम दोनो, बैचलर्स वाइफ और लेट्स डू इट (2000) जैसे कॉमेडी नाटकों का निर्देशन किया है  उनकी होम प्रोडक्शन बैचलर्स वाइव्स  ने मुंबई और औरंगाबाद में 40 से अधिक प्रदर्शन किए।  उनका टीवी शो ज़बान संभाल के (माइंड योर लैंग्वेज सीरीज़ पर आधारित) एक बड़ी हिट थी। 

नामांकित - सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार - घराना (1962)

नामांकित - सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार - ससुराल (1962)

वर्ष फ़िल्म चरित्र
2005 ज़मीर
2004 घर गृहस्थी
2003 मैं प्रेम की दीवानी हूँ
2002 शरारत
1999 मदर
1999 सिर्फ तुम अम्मा
1998 महाराजा
1997 परदेश
1997 तराज़ू
1994 साजन का घर
1994 संगदिल सनम विमला
1993 वक्त हमारा है
1992 जुनून
1992 एक लड़का एक लड़की
1991 दिल है कि मानता नहीं
1991 कर्ज़ चुकाना है श्रीमती धनिराम
1990 जवानी ज़िन्दाबाद
1990 किशन कन्हैया लीला
1990 वर्दी
1989 दो कैदी
1989 दोस्त
1989 तेरी पायल मेरे गीत
1988 सोने पे सुहागा
1987 प्यार के काबिल
1987 हिफ़ाज़त
1987 हिम्मत और मेहनत सोना की माँ
1986 बेटी गणिका
1986 प्यार के दो पल
1986 तीसरा किनारा
1986 भगवान दादा
1986 स्वर्ग से सुन्दर
1986 सदा सुहागन
1985 उल्टा सीधा
1985 महागुरु
1985 आखिर क्यों?
1985 मोहब्बत
1985 दो दिलों की दास्तान
1985 हम दोनों
1985 बलिदान
1985 महक
1985 हकीकत
1984 ज़िन्दगी जीने के लिये
1984 रक्षा बंधन भोला की माँ
1984 आज का एम एल ए राम अवतार
1984 मेरा फैसला
1983 मैं आवारा हूँ
1983 पु्कार
1983 मुझे इंसाफ चाहिये
1983 कुली
1983 बंधन कच्चे धागों का
1982 तुम्हारे बिना
1982 कच्चे हीरे शोभा
1982 सुन सजना
1981 एक दूजे के लिये
1979 गोल माल
1979 हमारे तुम्हारे
1979 नैया
1978 बदलते रिश्ते
1975 मिली
1975 मज़ाक
1975 धोती लोटा और चौपाटी
1974 पॉकेटमार
1974 बेनाम
1974 कसौटी
1973 आ गले लग जा
1966 लव इन टोक्यो शीला
1966 पिकनिक
1965 आकाशदीप
1965 बेदाग
1964 फूलों की सेज
1964 ज़िद्दी
1964 बेटी बेटे
1963 भरोसा
1963 दिल एक मन्दिर
1963 गृहस्थी
1962 दिल तेरा दीवाना माल्ती
1961 संजोग
1961 काँच की गुड़िया
1961 घराना
1961 ससुराल सीता
1961 सुहाग सिन्दूर
1960 कानून
1959 दीदी
1959 अर्द्धांगिनी
1959 नई राहें
1959 अनाड़ी आशा
1957 पेइंग गेस्ट चंचल
1956 एक शोला
1955 सीमा

मंगलवार, 29 अगस्त 2023

राजबीर सिंह

राजवीर सिंह
जन्म 30 अगस्त
पठानकोट , पंजाब, भारत
राष्ट्रीयता
भारतीय
व्यवसायों
अभिनेता
सिंह ने टेलीविजन पर अपना डेब्यू स्टार प्लस के रियलिटी शो परफेक्ट ब्राइड से किया । उन्होंने रिश्ता .कम पर एक एपिसोडिक भूमिका भी निभाई । 2013 से 2014 तक, सिंह ने लाइफ ओके सीरीज़ द एडवेंचर्स ऑफ हातिम में हातिम की मुख्य भूमिका निभाई ।  इसके बाद उन्होंने अगस्त 2015 से नवंबर 2015 तक ज़ी टीवी के क़ुबूल है सीज़न 4 में मुख्य पुरुष आज़ाद की भूमिका निभाई। क़ुबूल है में, सिंह ने महिला प्रधान के विपरीत एक आधे-पिशाच की भूमिका निभाई।

फिल्में

2011 वहाँ कौन है?
2016 इश्क जुनून
2016 क्लब डांसर

गुरु रंधावा

गुरशरणजोत सिंह रंधावा
जन्म
🎂30 अगस्त 1991
नूरपुर, गुरदासपुर जिला, पंजाब, भारत
विधायें
भांगड़ा इंडी-पॉप बॉलीवुड नृत्य
पेशा
गायक गीतकार संगीतकार
रंधावा का जन्म नूरपुर, डेरा बाबा नानक तहसील गुरदासपुर जिले में गुरशरणजोत सिंह रंधावा के रूप में हुआ था। उन्होंने गुरदासपुर में छोटे-छोटे शो करके शुरुआत की और फिर दिल्ली में छोटे दलों और समारोहों में प्रदर्शन करना शुरू कर दिया।दिल्ली में रहते हुए, रंधावा ने अपना एमबीए पूरा किया।रैपर बोहेमिया द्वारा उन्हें "गुरु" नाम दिया गया, जो मंच पर रहते हुए उनका पूरा नाम छोटा कर देते थे।
उन्होंने यूट्यूब पर अर्जुन के साथ "सेम गर्ल" नाम से अपना पहला गाना गाया, जो रंधावा को अपने वीडियो में लेने वाले पहले व्यक्ति थे। उन्होंने 2017 इंडियन प्रीमियर लीग उद्घाटन समारोह में गाया।उन्होंने हिंदी मीडियम (2017) से बॉलीवुड गायन में अपनी शुरुआत की।उनके कई गाने फिल्मों में दिखाई दिए हैं। 2018 में, वह सलमान खान के दबंग रीलोडेड टूर का हिस्सा बने।

उनके सबसे ज्यादा देखे जाने वाले गीत "हाई रेटेड गबरू" और "लाहौर" को यूट्यूब पर 823 और 785 मिलियन से अधिक बार देखा गया है।उनका पहला अंतर्राष्ट्रीय सहकार्यता पिटबुल के साथ 19 अप्रैल 2019 को रिलीज हुई "स्लोली स्लोली" है। इस गाने के म्यूजिक वीडियो को 24 घंटे के भीतर यूट्यूब पर 38 मिलियन व्यूज मिले, जो दुनिया के 24 घंटे में सबसे अधिक देखे जाने वाले म्यूजिक वीडियो में से एक बन गया।

गंगा प्रसाद श्रीवास्ता

गंगा प्रसाद श्रीवास्तव
अन्य नाम गंगा बाबू
🎂जन्म 23 अप्रैल, 1889 ई.
जन्म भूमि सारन, बिहार
⚰️मृत्यु 30 अगस्त, 1976 ई.
कर्म-क्षेत्र साहित्यकार
मुख्य रचनाएँ 'लम्बी दाढ़ी' (1913 ई.), 'नाक झोक' (1919 ई.) आदि।
भाषा हिन्दी
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी गंगा बाबू को ‘साहित्य वारिधि’ व ‘साहित्य महारथी’ जैसे अलंकरण से विभूषित किया गया।
गंगा प्रसाद श्रीवास्तव 
जन्म- 23 अप्रैल, 1889, सारन, बिहार; मृत्यु- 30 अगस्त, 1976
हिन्दी साहित्यकार थे। गंगा प्रसाद अच्छे कथाकार, कहानीकार के अलावा एक बेहतर अभिनेता भी थे। 
कई नाटकों में उन्होंने सशक्त अभिनय किया है। 
उस दौरान श्रीवास्तव जी एकांकी के सशक्त अभिनेता थे। सरलता एवं अभिनय के गुण से परिपक्व, एकांकी लिखने में माहिर गंगा बाबू का नाम हिंदी के शुरुआती एकांकीकार के रूप में जाना जाता है। गंगा बाबू को ‘साहित्य वारिधि’ व ‘साहित्य महारथी’ जैसे अलंकरण से विभूषित किया गया।

परिचय
गंगा प्रसाद श्रीवास्तव का जन्म 23 अप्रैल, 1889 ई. को छपरा, ज़िला सारन, बिहार प्रांत में हुआ था। हिन्दी के हास्य रस के लेखकों में इनका प्रमुख स्थान है। जी. पी. श्रीवास्तव का पूरा नाम गंगा प्रसाद श्रीवास्तव है। किंतु हिन्दी के पाठकों में जी. पी. श्रीवास्तव के नाम से ही प्रसिद्ध हैं।

शिक्षा
गंगा प्रसाद जी ने प्रयाग विश्वविद्यालय से बी. ए., एल-एल. बी. की परीक्षा पास करके गोण्डा ज़िला में वकालत की।

भाषा शैली
गंगा प्रसाद जी का हिन्दी के हास्य रस के लेखकों में प्रमुख स्थान है। हास्य रस की जिस परम्परा को भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने 'अन्धेर नगरी चौपट राजा' में स्थापित किया था, इन्होंने हास्य को उसी दिशा में विकसित किया है। गंगा प्रसाद जी की प्रतिभा प्राय: सभी विधाओं में समान रूप से व्यक्त हुई है। नाटक, उपन्यास, कहानी, कविता एवं शुद्ध परिकल्पना के आधार पर गल्प भी इन्होंने लिखे हैं।

कृतियाँ
गंगा प्रसाद जी की कुल मिलाकर अब तक बाईस पुस्तकें प्रकाश में आ चुकी हैं। आपकी प्रमुख कृतियाँ इस प्रकार हैं-

कहानी संग्रह 'लम्बी दाढ़ी' 1913 ई. में प्रकाशित हुई।
नाटक 'उलट फेर' 1918 ई. को प्रकाशित हुआ।
काव्यसंग्रह 'नाक झोक' 1919 ई. प्रकाश में आया।
1931 ई. में गंगा प्रसाद जी का प्रथम उपन्यास 'लतखोरी लाल' प्रकाशित हुआ जो आप के समय में बहुचर्चित उपन्यास रहा।
1932 में दूसरा उपन्यास 'दिल की आग उर्फ दिल जले की आग' प्रकाशित हुआ।
1953 में इनका एक नाटक 'बौछार' के नाम से प्रकाशित हुआ था।
निधन
गंगा प्रसाद श्रीवास्तव की मृत्यु 30 अगस्त 1976 ई. को हुई थी।

चित्रांगदा सिंह

चित्रंगदा सिंह रंधावा, हिन्दी फ़िल्मों की एक अभिनेत्री हैं। वह 2005 में बनी फ़िल्म हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी में गीता राव की भूमिका अदा करने के लिए जानी जाती है। उनकी शादी भारतीय गोल्फ़ खिलाडी ज्योति रंधावा से हो चुकी है। चित्रांगदा चहल का जन्म राजस्थान के जोधपुर में हुआ था। 

🎂जन्म की तारीख और समय: 30 अगस्त 1976  जोधपुर
पति: ज्योति रंधावा (विवा. 2001–2014)
बच्चे: ज़ोरावर रंधावा
माता-पिता: निरंजन सिंह
भाई: दिग्विजय सिंह, टीना सिंह

2003 हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी गीता राव 
2005 कल: यैस्टर्डे एंड टुमॉरो भावना वी दयाल 
2008 सौरी भाई ! आलियाह 
2010 बसरा अंतरा मित्रा/अन्ना परेरा 
2011 ये साली जिन्दगी प्रीती 
2011 देसी बॉयज तान्या शर्मा 
2012 जोकर स्वयं "काफिराना" गाने में विशेष उपस्थिति
2013 इनकार माया लुथरा 
2013 आय, मी और मैं अनुष्का लाल

अभिनेत्री जमुना

जमुना अभिनेत्री
पुराने जमाने की अभिनेत्री
🎂जन्म की तारीख और समय: 30 अगस्त 1936, हम्पी
⚰️मृत्यु की जगह और तारीख: 27 जनवरी 2023
पति: जुलुरी रमना राव (विवा. 1965–2014)
बच्चे: स्रवनती राव, वामसीकृष्णा राव, श्रावंती जुलुरी
माता-पिता: निप्पनी श्रीनिवास राव, कौसल्या देवी
जमुना का जन्म वर्तमान कर्नाटक के हम्पी में कन्नड़ भाषी निप्पानी श्रीनिवास राव और तेलुगु भाषी कौसल्या देवी के घर हुआ था और उनका नाम जना बाई रखा गया था। उनके पिता माधव ब्राह्मण थे , जबकि उनकी मां वैश्य थीं , जिसके परिणामस्वरूप अंतरजातीय प्रेम विवाह हुआ ।जमुना आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले के दुग्गीराला में पली बढ़ीं । उनके पिता हल्दी और तंबाकू के व्यवसाय से जुड़े थे और जब वह सात साल की थीं, तब उनका परिवार वहां चला गया।जब सवित्री दुग्गीराला में नाटक कर रही थी, वह जमुना के घर पर रहेगी। बाद में, सावित्री ने जमुना को फिल्मों में अभिनय करने के लिए आमंत्रित किया। उन्होंने 16 साल की उम्र में फिल्मों में नायिका के रूप में अभिनय करना शुरू कर दिया था।
जमुना स्कूल में एक स्टेज कलाकार थीं। उनकी माँ ने उन्हें स्वर संगीत और हारमोनियम सिखाया । 1952 में, इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन के डॉ. गरीकिपति राजा राव ने उनका स्टेज शो माँ भूमि देखा और उन्हें अपनी फिल्म पुत्तिलु में एक भूमिका की पेशकश की।

जमुना ने तेलुगु और अन्य दक्षिण भारतीय भाषाओं की 198 फिल्मों में अभिनय किया । उन्होंने मूल तेलुगु फिल्म मूगा मनासुलु (1964) में अपनी भूमिका को दोहराते हुए, मिलान (1967) के लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री का फिल्मफेयर पुरस्कार जीतकर, हिंदी फिल्मों में भी अभिनय किया।

जमुना ने तेलुगु कलाकार संघ की भी स्थापना की और इसके माध्यम से 25 वर्षों तक सामाजिक सेवाएं प्रदान कीं।
जमुना 1980 के दशक में कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गईं और 1989 में राजमुंदरी निर्वाचन क्षेत्र से लोकसभा के लिए चुनी गईं। वह 1991 का चुनाव हार गईं और राजनीति छोड़ दीं, लेकिन 1990 के दशक के अंत में अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल के दौरान कुछ समय के लिए भाजपा के लिए प्रचार किया।

उन्हों ने अवार्ड जीते

1968: सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार - मिलान
1972: फ़िल्मफ़ेयर विशेष पुरस्कार - दक्षिण  पांडंती कपूरम
1999: तमिलनाडु राज्य फ़िल्म मानद पुरस्कार - एमजीआर पुरस्कार
2008: एनटीआर राष्ट्रीय पुरस्कार
2010: पद्मभूषण डॉ. बी. सरोजादेवी राष्ट्रीय पुरस्कार 
2019: 17वें संतोषम फिल्म अवार्ड्स में संतोषम लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड

उनकी हिंदी फिल्में

मिस मैरी (1957)
रामू दादा (1961)
एक राज़ (1963)
हमराही (1963)
बेटी बेटे (1964)
रिश्ते नाते (1965)
मिलन (1967) (फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री पुरस्कार)
दुल्हन (1975)
नौकर बीवी का (1983)
राज तिलक (1984)

मृत्यु

1965 में जमुना ने एसवी विश्वविद्यालय में प्राणीशास्त्र के प्रोफेसर जुलुरी रमना राव से शादी की ; 10 नवंबर 2014 को 86 साल की उम्र में कार्डियक अरेस्ट से उनकी मृत्यु हो गई। उनका एक बेटा, वामसी जुलुरी और एक बेटी, श्रावंती जुलुरी थी , और वे हैदराबाद , तेलंगाना , भारत में रहते थे।

जमुना का 86 वर्ष की आयु में 27 जनवरी 2023 को हैदराबाद में उनके घर पर निधन हो गया

शेलेंदर

शंकरदास केसरीलाल
प्रसिद्ध नाम शैलेन्द्र
🎂जन्म 30 अगस्त, 1923
जन्म भूमि रावलपिंडी (पाकिस्तान)
⚰️मृत्यु 14 दिसंबर 1966
मृत्यु स्थान मुंबई
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र गीतकार, कवि
मुख्य रचनाएँ 'सब कुछ सीखा हमने...', 'रमैया वस्तावैया...', 'मेरा जूता है जापानी...' आदि।
पुरस्कार-उपाधि तीन बार सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी गीतकार शैलेंद्र ने राजकपूर और वहीदा रहमान द्वारा अभिनीत 'तीसरी कसम' फ़िल्म का निर्माण भी किया था।

शैलेन्द्र  
Disamb2.jpg शैलेन्द्र एक बहुविकल्पी शब्द है अन्य अर्थों के लिए देखें:- शैलेन्द्र (बहुविकल्पी)
शैलेन्द्र
शैलेन्द्र
पूरा नाम शंकरदास केसरीलाल
प्रसिद्ध नाम शैलेन्द्र
जन्म 30 अगस्त, 1923
जन्म भूमि रावलपिंडी (पाकिस्तान)
मृत्यु 14 दिसंबर 1966
मृत्यु स्थान मुंबई
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र गीतकार, कवि
मुख्य रचनाएँ 'सब कुछ सीखा हमने...', 'रमैया वस्तावैया...', 'मेरा जूता है जापानी...' आदि।
पुरस्कार-उपाधि तीन बार सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी गीतकार शैलेंद्र ने राजकपूर और वहीदा रहमान द्वारा अभिनीत 'तीसरी कसम' फ़िल्म का निर्माण भी किया था।
शंकरदास केसरीलाल (अंग्रेज़ी: Shankardas Kesarilal, प्रसिद्ध नाम- 'शैलेन्द्र, जन्म: 30 अगस्त, 1923 रावलपिंडी, (पाकिस्तान); मृत्यु: 14 दिसंबर, 1966 मुंबई) हिन्दी फ़िल्मों के एक प्रसिद्ध गीतकार थे। ‘होठों पर सच्चाई रहती है, दिल में सफाई रहती है', 'मेरा जूता है जापानी,' ‘आज फिर जीने की तमन्ना है’ जैसे दर्जनों यादगार फ़िल्मी गीतों के जनक शैलेंद्र ने महान् अभिनेता और फ़िल्म निर्माता राज कपूर के साथ बहुत काम किया

आरंभिक जीवन

शैलेन्द्र जी के पिता फ़ौज में थे। बिहार के रहने वाले थे। पिता के रिटायर होने पर मथुरा में रहे, वहीं शिक्षा पायी। घर में भी उर्दू और फ़ारसी का रिवाज था, लेकिन शैलेन्द्र की रुचि घर से कुछ भिन्न ही रही। हाईस्कूल से ही राष्ट्रीय ख़याल थे। सन 1942 में बंबई रेलवे में इंजीनियरिंग सीखने गये। अगस्त आंदोलन में जेल भी गये। लेकिन कविता का शौक़ बना रहा।

बाल्यकाल

किसी ज़माने में मथुरा रेलवे कर्मचारियों की कॉलोनी रही धौली प्याऊ की गली में गंगासिंह के उस छोटे से मकान की पहचान सिर्फ बाबूलाल को है जिसमें शैलेन्द्र अपने भाईयों के साथ रहते थे। सभी भाई रेलवे में थे। बड़े भाई बी.डी. राव, शैलेन्द्र को पढ़ा-लिखा रहे थे। बाबू लाल के अनुसार, मथुरा के 'राजकीय इंटर कॉलेज' में हाईस्कूल में शैलेन्द्र ने पूरे उत्तर प्रदेश में तीसरा स्थान प्राप्त किया। वह बात 1939 की है। तब वे 16 साल के थे। के.आर. इंटर कॉलेज में आयोजित अंताक्षरी प्रतियोगिताओं में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते थे और खूब ईनाम जीतते थे। इसके बाद शैलेन्द्र ने रेलवे वर्कशाप में नौकरी कर ली। बाबूलाल भी रेलवे में लग गए। कुछ दिन मथुरा रहकर शैलेन्द्र का तबादला माटुंगा हो गया।

कैरियर की शुरूआत

अगस्त सन् 1947 में श्री राज कपूर एक कवि सम्मेलन में शैलेन्द्र जी को पढ़ते देखकर प्रभावित हुए। और फ़िल्म 'आग' में लिखने के लिए कहा किन्तु शैलेन्द्र जी को फ़िल्मी लोगों से घृणा थी। सन् 1948 में शादी के बाद कम आमदनी से घर चलाना मुश्किल हो गया।इसलिए श्री राज कपूर के पास गये। उन दिनों राजकपूर बरसात फ़िल्म की तैयारी में जुटे थे। तय वक्त पर शैलेन्द्र राजकपूर से मिलने घर से निकले तो घनघोर बारिश होने लगी। क़दम बढ़ाते और भीगते शैलेन्द्र के होंठों पर ‘बरसात में तुम से मिले हम सनम’ गीत ने अनायास ही जन्म ले लिया। अपने दस गीत सौंपने से पहले शैलेन्द्र ने इस नए गीत को राजकपूर को सुनाया। राजकपूर ने शैलेन्द्र को सीने से लगा लिया। दसों गीतों का पचास हज़ार रुपये पारिश्रमिक उन्होंने शैलेन्द्र को दिया। नया गीत बरसात का टाइटिल गीत बना गीत चले, फिर क्या था, उसके बाद शैलेन्द्र जी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

संवेदनशील गीतकार

सरल और सटीक शब्दों में भावनाओं और संवेदनाओं को अभिव्यक्त कर देना शैलेन्द्र जी की महान् विशेषता थी। 'किसी के आँसुओं में मुस्कुराने' जैसा विचार केवल शैलेन्द्र जैसे गीतकार के संवेदनशील हृदय में आ सकता है। उनकी संवेदना का एक उदाहरण देखिये -

“कल तेरे सपने पराये भी होंगे, लेकिन झलक मेरी आँखों में होगी
फूलों की डोली में होगी तू रुख़सत, लेकिन महक मेरी साँसों में होगी…..”

शायद कभी प्यार की राह में कभी ऐसे गिरे रहे होंगे वे कि फिर कभी संभल नहीं पाये। इसीलिये वे लिखते हैं-
“सहज है सीधी राह पे चलना, देख के उलझन, बच के निकलना
कोई ये चाहे माने न माने, बहुत है मुश्किल गिर के संभलना…..”

फ़िल्मों में गीत लिखने के पहले देश के आजादी की लड़ाई में योगदान देने का उनका एक अलग ही तरीका रहा है। वे उस समय देशभक्ति से सराबोर वीररस की कविताएँ लिखा करते थे और उन्हें जोशोखरोश के साथ सुनाकर सुनने वालों को देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत कर दिया करते थे, परिणामस्वरूप देश के आजादी के वीरों का बहुत अधिक उत्साहवर्धन होता था। उनकी रचना ‘जलता है पंजाब……’ ने उन दिनों बहुत प्रसिद्धि पाई। फ़िल्मों में आने के बाद भी उनका ये जज़्बा बना ही रहा इसीलिये वे ग़रीब भारतीय की अभिव्यक्ति इन शब्दों में करते हैं -
“मेरा जूता है जापानी, ये पतलून इंग्लिस्तानी
सर पे लाल टोपी रूसी, फिर भी दिल है हिंदुस्तानी…..”

एक हिंदुस्तानी स्त्री की भावनाओं का कितना सुंदर प्रदर्शन करते हैं वे अपने इस गीत में-
“तन सौंप दिया, मन सौंप दिया, कुछ और तो मेरे पास नहीं
जो तुम से है मेरे हमदम, भगवान से भी वो आस नहीं…..”

शैलेंद्र के प्रसिद्ध गीत
क्रम गीत फ़िल्म नाम
1- आवारा हूँ आवारा
2- रमैया वस्तावैया श्री 420
3- दिल के झरोखे में तुझको बिठा कर ब्रह्मचारी
4- मुड मुड के ना देख मुड मुड के श्री 420
5- मेरा जूता है जापानी श्री 420
6- आज फिर जीने की गाईड
7- गाता रहे मेरा दिल गाईड
8- पिया तोसे नैना लागे रे गाईड
9- खोया खोया चांद काला बाज़ार
10- हर दिल जो प्यार करेगा संगम
11- दोस्त दोस्त ना रहा संगम
12- सब कुछ सीखा हमने अनाडी
13- किसी की मुस्कराहटों पे अनाडी
14- दिल की नज़र से अनाडी
15- अजीब दास्तां है ये, कहाँ शुरू कहा खतम दिल अपना और प्रीत परायी

गीतकार से बने निर्माता

कम लोग ये जानते होंगे कि शैलेंद्र ने राजकपूर अभिनीत 'तीसरी कसम' फ़िल्म का निर्माण किया था। दरअसल, शैलेन्द्र को फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी 'मारे गए गुलफाम' बहुत पसंद आई। उन्होंने गीतकार के साथ निर्माता बनने की ठानी। राजकपूर और वहीदा रहमान को लेकर 'तीसरी कसम' बना डाली। खुद की सारी दौलत और मित्रों से उधार की भारी रकम फ़िल्म पर झोंक दी। फ़िल्म डूब गई। कर्ज़ से लद गए शैलेन्द्र बीमार हो गए। यह 1966 की बात है। अस्पताल में भरती हुए। तब वे ‘जाने कहां गए वो दिन, कहते थे तेरी याद में, नजरों को हम बिछायेंगे’ गीत की रचना में लगे थे। शैलेन्द्र ने राजकपूर से मिलने की इच्छा ज़ाहिर की। वे बीमारी में भी आर. के. स्टूडियो की ओर चले। रास्ते में उन्होंने दम तोड़ दिया। यह दिन 14 दिसंबर 1966 का था। मौके की बात है कि इसी दिन राजकपूर का जन्म हुआ था। शैलेन्द्र को नहीं मालूम था कि मौत के बाद उनकी फ़िल्म हिट होगी और उसे पुरस्कार मिलेगा।

सम्मान और पुरस्कार
शैलेन्द्र जी को तीन बार सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला था, जो निम्न प्रकार है-

1958 में 'ये मेरा दीवानापन है...' (फ़िल्म- यहूदी) के लिए सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला।
1959 में 'सब कुछ सीखा हमने...' (फ़िल्म- अनाडी) के लिए सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला।
1968 में 'मै गाऊं तुम सो जाओ...' (फ़िल्म- ब्रह्मचारी) के लिए सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला।
⚰️निधन
14 दिसंबर, 1966 को बीमार शैलेन्द्र राजकपूर से मिलने आर.के. स्टूडियो की ओर जा रहे थे। रास्ते में उन्होंने दम तोड़ दिया। काल के गाल में एक दिन जाना तो सभी को होता है पर शैलेन्द्र जैसे गीतकार के चले जाने से भारतीय सिनेमा में आया ख़ालीपन कभी भी न भर पायेगा। ये जानते हुये भी कि उनके लिखे इन शब्दों का सच होना असंभव है, चलिये एक बार दुहरा लेते हैं उनके उन असंभव शब्दों को -

“ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आना…..”

जय श्री गडकरी

🎂जन्म की तारीख और समय: 21 फ़रवरी 1942, कारवार
⚰️मृत्यु की जगह और तारीख: 29 अगस्त 2008, मुंबई
पति:  बाल धुरी(विवा. 1975–2008)
अभिनेत्री जयश्री गोडकर की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि
 
सन 1950 से 1980 के दशक तक मराठी और हिंदी सिनेमा की मशहूर अभिनेत्री जयश्री गडकर का जन्म 21 फरवरी 1942 को कारवार, कर्नाटक में एक कोंकणी भाषी परिवार हुआ था । जयश्री ने रामानंद की रामायण से  कौशल्या की भूमिका निभाई थी जिसने जयश्री को सम्मान, गौरव, लोकप्रियता के साथ-साथ जीवनसाथी भी मिला यानि रामायण में दशरथ का किरदार निभाने वाले “बाल धुरी” के साथ वह शादी के बंधन में बंध गईं।  उनकी प्रतिभा, नृत्य कौशल और सौंदर्य के सभी कायल थे।राजश्री ने फिल्म ‘तमाशा’ में बाल नृत्य कलाकार के रूप में अपने करियर की शुरुआत की थी, व्ही. शांताराम की ‘झनक झनक पायल’ बाजे में उन्होंने एक समूह नर्तकी के रूप में अपने नृत्य कौशल का प्रदर्शन किया था। 29  अगस्त 2008  को  जयश्रीजी का निधन हो गया

N.A अंसारी


🎂जन्म की तारीख और समय: 29 अगस्त 1917, झांसी
⚰️मृत्यु की जगह और तारीख: 11 जनवरी 1993,पोर्ट कोलबोर्न कनाडा
आकर्षक व्यक्तित्व भावहीन चेहरा सामने वाले को भेदती आँखे कुल मिलाकर एक खलनायक की सारी खूबियां लेकिन निसार अहमद अंसारी का इतना सा परिचय नही है दो दशक तक रहस्य और अपराध के कथानक पर बनी हिंदी फिल्मों में एक लेखक एक निर्देशक के तौर पर भी उनका अहम योगदान रहा है
निसार अहमद अंसारी फिल्मों में एन ए अंसारी और अंसारी के नाम से पहचाने गये
29 अगस्त 1917 को उनका जन्म उत्तर प्रदेश के झांसी में हुआ था अंग्रेजी में एम ए करने के बाद 1939 में अंसारी अपने एक रिश्तेदार से मिलने बम्बई पहुँचे यह शहर उन्हें इतना भा गया कि वही बसने को योजना बनाने लगे सिनेमा के रोमांच में जकड़े जा चुके अंसारी को मुम्बई में आसानी से विदेशी फिल्में देखने का मौका मिल रहा था और वे उसे छोड़ना नही चाहते थे
यह महज एक इत्तेफाक था कि एक दिन अंसारी की फिल्मकार महबूब से विस्तार से मुलाकात हो गयी महबूब उन दिनों अपनी फिल्म औरत बनाने की तैयारी कर रहे थे
महबूब उनसे प्रभावित हुए और औरत में एक छोटा सा रोल दे दिया (1943 )महबूब खान ने नजमा फ़िल्म बनाई इसमे भी अंसारी को एक अहम रोल मिला बचपन से ही जासूसी साहित्य के दीवाने अंसारी को को लगता था कि जासूसी कहानियों पर जैसी फिल्में बन सकती है वैसी बन नही रही है तभी अंसारी की अभिनेता शेख मुख्तार से दोस्ती हो गयी 1956 में शेख मुख्तार ने फ़िल्म मिस्टर लंबू बनाई जिसके निर्देशन की जिम्मेदारी अंसारी को सौंप दी अंसारी ने मिस्टर लंबू में एक अहम रोल भी अदा किया
इस फ़िल्म की सफलता ने अंसारी को एक निर्देशक के तौर पर स्थापित कर दिया उनके निर्देशन में अगली फिल्म थी मंगू जो 1954 में बनी थी मगर अंसारी को अगली फिल्म का निर्देशन करने में पांच साल का इंतेज़ार का करना पड़ा  इस बीच वे फिल्मों में अभिनय जरूर करते रहे (1959) में जी पी सिप्पी ने फ़िल्म ब्लैक कैट के लिए अंसारी को कहानी लेखक एवं निर्देशक के तौर पर साइन किया
इसके बाद वांटेड (1961)और टावर हाउस (1962) अंसारी की लिखी कहानियों पर आधारित और उनके ही निर्देशन में बनी वे फिल्में थी जो अपने समय मे काफी चर्चित रही
अब अंसारी को लग रहा रहा कि उन्हें भी फ़िल्म निर्माण में हाथ डालना चाहिये उन्होंने बुंदेलखंड फ़िल्म नाम से अपनी कम्पनी खड़ी की और उसके तहत पहली फ़िल्म बनाई मुलजिम (1963) लेकिन अगली तीन फिल्में ज़िंदगी और मौत(1965)वहां के लोग (1967) और मिस्टर मर्डरर 1969 वो परिणाम नही दे पाई जैसी अंसारी को उम्मीद थी (1974) में फ़िल्म जुर्म और सज़ा अपराध पर बनाई गई उनकी अंतिम फ़िल्म थी हालांकि इस बीच वे दूसरे निर्देशकों की बनाई फिल्मों में काम कर रहे थे रंगा खुश (1975) हरफनमौला (1976) महाबदमाश (1975) में ही कुछ ऐसी फिल्में थी 
अंसारी के निर्देशन में अंतिम फ़िल्म बनी नूर-ए-इलाही (1977) लेकिन तेज़ी से बदलते माहौल में धीरे धीरे अंसारी रुपहले पर्दे से दूर होते चले गये
11 जनवरी 1993 को कनाडा में अपने पुत्र के पास अंसारी का निधन हो गया

नागार्जुन

सुपरस्टार नागार्जुन 
🎂 जन्म 29 अगस्त 1959 को हैदराबाद में हुआ था. 
नागार्जुन की फैन फॉलोइंग तगड़ी है. उनकी अदाकारी के फैंस कायल हैं. नागार्जुन एक्टर होने के साथ-साथ सफल प्रोड्यूसर और बिजनेसमैन भी हैं. नागार्जुन के नाम करोड़ों की संपत्ति है.

दो बार फोर्ब्स की लिस्ट में बनाई जगह मालूम हो कि नागार्जुन अन्नपूर्णा स्टूडियो प्रोडक्शन कंपनी के मालिक हैं. स्टूडियो के अलावा नागार्जुन अन्नपूर्णा इंटरनेशनल स्कूल ऑफ फिल्म एंड मीडिया, हैदराबाद के प्रेसिडेंट भी हैं. साथ ही एमएनएन रियलिटी इंटरप्राइजेज के फाउंडिंग पार्टनर हैं. नागार्जुन फोर्ब्स की लिस्ट में दो बार (2012 और 2013) जगह पा चुके हैं.  

तब्बू संग रही अफेयर की चर्चा पर्सनल लाइफ में नागार्जुन ने दो शादियां की हैं. पहली पत्नी से तलाक लेने के बाद नागार्जुन ने अमला अक्किनेनी से शादी की. नागार्जुन के दो बेटे नागा चैतन्य और अखिल अक्कीनेनी हैं. नागार्जुन के एक्ट्रेस तब्बू संग अफेयर की खबरें भी खूब चर्चा में रहीं. खबरें हैं कि दोनों लंबे समय तक रिलेशन में रहे थे. दोनों की मुलाकात उस समय हुई थी जब उन्होंने फिल्म में साथ काम किया था. लेकिन नागार्जुन के पहले से ही शादीशुदा होने के कारण दोनों की शादी नहीं हो पाई. इसी कारण से दोनों अलग हो गए थे. हालांकि, दोनों ही स्टार्स ने कभी भी इस पर बात नहीं की.    

वर्कफ्रंट पर नागार्जुन ने बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट 1967 में अपने करियर की शुरुआत की थी. वो तेलुगू फिल्म Sudigundalu में नजर आए थे. नागार्जुन ने साउथ में एक से बढ़कर एक हिट फिल्म दी है. साउथ फिल्मों के अलावा नागार्जुन बॉलीवुड फिल्मों में भी हाथ आजमा चुके हैं. उन्होंने टीवी की दुनिया में प्रोड्यूसर के तौर पर भी काम किया है. नागार्जुन को 2 नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स, 9 Nandi Awards और 3 फिल्मफेयर अवॉर्ड साउथ मिल चुके हैं.

रिचा शर्मा


ऋचा शर्मा
 🎂जन्म 29 अगस्त 1974
एक भारतीय फिल्म पार्श्व गायिका होने के साथ-साथ एक भक्ति गायिका भी हैं। 2006 में, उन्होंने फिल्म बाबुल (2006) में बॉलीवुड का सबसे लंबा ट्रैक, बिदाई गीत गाया। 

पंडित आस्करन शर्मा के संरक्षण में, ऋचा ने भारतीय शास्त्रीय और हल्के संगीत का उचित प्रशिक्षण प्राप्त किया।  ऋचा ने ग़ज़लें जोड़ीं;  फिल्मी गीत, पंजाबी और राजस्थानी लोक गीत उनके प्रदर्शनों की सूची में, इस प्रकार उनकी आवाज विभिन्न ध्वनियों में अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचती है।

जब ऋचा के जीवन में संगीत अपने चरम पर था, उन्हें शिक्षा का त्याग करना पड़ा और संगीत की दुनिया में बड़ा बनने के सपने लिये, ऋचा 1994 में मुंबई में उतरीं। उन्होंने यह पेट पालने के लिए भजन गाने लगी और साथ ही साथ बॉलीवुड में अपना संघर्ष भी जारी रखा।  उन्होंने 1996 में सावन कुमार की फ़िल्म सलमा पे दिल आ गया के साथ बॉलीवुड में अपने कैरियर की शुरुआत की और इसके बाद कई फिल्में की  ए.आर.  रहमान के संगीत निर्देशन में फ़िल्म ताल से उनको प्रसिद्धि मिली

इसके बाद कई हिट फ़िल्में आईं, जैसे जुबैदा, साथिया (ए.आर. रहमान);  हेरा फेरी (अनु मलिक);  खाकी (राम संपत);  तरकीब (गीत "दुपट्टे का पल्लू"), बागबान (आदेश श्रीवास्तव के लिए टाइटल गीत);  सोच (जतिन-ललित के लिए "निकल चली बे" गीत);  रुद्राक्ष, कल हो ना हो (शंकर-एहसान-लॉय के साथ टाइटल ट्रैक का सैड सांग );  गंगाजल (संदेश शांडिल्य);  पॉपकॉर्न खाओ मस्त हो जाओ (विशाल-शेखर), सांवरिया (मोंटी शर्मा), और ओम शांति ओम (विशाल-शेखर) और कांटे के लिए सबसे लोकप्रिय गीत (आनंद राज आनंद के लिए "माही वे")।

बहुमुखी पार्श्व गायिका ने अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए कुछ एल्बम भी किए हैं।  नी मैं यार नु सजदा करदी, पिया और विंड्स ऑफ़ राजस्थान (2004 की शुरुआत में रिलीज़ हुए टाइम्स म्यूज़िक के लिए) जैसे एल्बमों ने ऋचा की आवाज़ और एक गायिका के रूप में उनकी बहुमुखी प्रतिभा में क्लास और ग्रेस को सामने लाया है। 

मार्च 2011 में, ऋचा शर्मा और उनके परिवार ने फरीदाबाद, हरियाणा में साईंबाबा मंदिर का उद्घाटन किया और सारेगामा इंडिया द्वारा जारी अपना पहला साईंबाबा भक्ति एल्बम साई की तस्वीर लॉन्च किया।

काजी निसरुल्ला

काज़ी नज़रुल इस्लाम
🎂जन्म 24 मई, 1899
जन्म भूमि ज़िला वर्धमान, पश्चिम बंगाल
⚰️मृत्यु 29 अगस्त, 1976
मृत्यु स्थान ढाका, बांग्लादेश
पति/पत्नी प्रमिला देवी
भाषा बांग्ला, हिन्दुस्तानी, पर्शियन
पुरस्कार-उपाधि 'पद्म भूषण' (1960), 'इंडिपेडेन्ट डे अवॉर्ड' (1977)
प्रसिद्धि बांग्ला कवि, साहित्यकार, दार्शनिक
नागरिकता बांग्लादेशी
अन्य जानकारी काज़ी नज़रुल इस्लाम ने लगभग तीन हज़ार गानों की रचना की और साथ ही अधिकांश को स्वर भी दिया। इनके संगीत के आजकल 'नज़रुल संगीत' या "नज़रुल गीति" नाम से जाना जाता है।
परिचय
काज़ी नज़रुल इस्लाम का जन्म भारत के पश्चिम बंगाल प्रदेश के वर्धमान ज़िले में आसनसोल के पास चुरुलिया नामक गाँव में एक दरिद्र मुस्लिम परिवार में हुआ था। उनकी प्राथमिक शिक्षा धार्मिक (मजहबी) शिक्षा के रूप में हुई। किशोरावस्था में विभिन्न थिएटर दलों के साथ काम करते-करते काज़ी नज़रुल इस्लाम ने कविता, नाटक एवं साहित्य के सम्बन्ध में सम्यक ज्ञान प्राप्त किया।

राष्ट्रीय कवि

काज़ी नज़रुल इस्लाम बांग्ला भाषा के अन्यतम साहित्यकार, देशप्रेमी तथा बांग्ला देश के राष्ट्रीय कवि हैं। पश्चिम बंगाल और बांग्ला देश दोनों ही जगह उनकी कविता और गान को समान आदर प्राप्त है। उनकी कविता में विद्रोह के स्वर होने के कारण उनको 'विद्रोही कवि' के नाम से जाना जाता है। उनकी कविता का वर्ण्य विषय 'मनुष्य के ऊपर मनुष्य का अत्याचार' तथा 'सामाजिक अनाचार तथा शोषण के विरुद्ध सोच्चार प्रतिवाद' है।

नज़रुल संगीत' या 'नज़रुल गीति'
काज़ी नज़रुल इस्लाम ने लगभग 3000 गानों की रचना की तथा साथ ही अधिकांश को स्वर भी दिया। इनको आजकल 'नज़रुल संगीत' या 'नज़रुल गीति' नाम से जाना जाता है।

मृत्यु
अधेड़ उम्र में काज़ी नज़रुल इस्लाम 'पिक्‌स रोग' से ग्रसित हो गए थे, जिसके कारण शेष जीवन वे साहित्य कर्म से अलग हो गए। बांग्ला देश सरकार के आमन्त्रण पर वे 1972 में सपरिवार ढाका आये। उस समय उनको बांग्ला देश की राष्ट्रीयता प्रदान की गई। यहीं 29 अगस्त, 1976 को उनकी मृत्यु हुई।

सोमवार, 28 अगस्त 2023

हिमाचल के विक्रम कंवर पाल अभिनेता

बिक्रमजीत कंवरपाल
🎂जन्म 29 अगस्त, 1968
जन्म भूमि सोलन, हिमाचल प्रदेश
⚰️मृत्यु 01 मई, 2021
मृत्यु स्थान मुम्बई, महाराष्ट्र
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र भारतीय सेना, हिन्दी सिनेमा
मुख्य फ़िल्में 'पेज 3', 'पाप, करम', 'कॉरपोरेट', 'क्या लव स्टोरी है', 'खुशबू', 'हाइजैक', 'थैंक्स मां', 'रॉकेट सिंह', 'आरक्षण', 'माई फ्रेंड पिंटो' आदि।
प्रसिद्धि अभिनेता
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी बिक्रमजीत कंवरपाल ने पढ़ाई पूरी करने के बाद 1989 में भारतीय सेना ज्वॉइन की थी। सेना में अपनी बहादुरी और साहस का पर‍िचय देने के बाद 2002 में बतौर मेजर वे सेना से रिटायर हुए।
बिक्रमजीत कंवरपाल 
जन्म- 29 अगस्त, 1968; मृत्यु- 1 मई, 2021) हिन्दी फ़िल्मों के अभिनेता थे। उन्होंने कई धारावाहिकों में काम किया था। बिक्रमजीत कंवरपाल एक्टर बनने से पहले भारतीय सेना के अफसर रह चुके थे। उन्होंने आर्मी से रिटायर होने के बाद साल 2003 में अपना एक्टिंग डेब्यू किया। न्होंने 'पेज 3', 'रॉकेट सिंह: सेल्समैन ऑफ द ईयर', 'आरक्षण', 'मर्डर 2', '2 स्टेट्स' और 'द गाजी अटैक' जैसी फिल्मों में अभिनय किया। फिल्मों के अलावा बिक्रमजीत कंवरपाल ने टेलीविजन धारावाहिकों, जैसे- 'दीया और बाती हम', 'ये हैं चाहतें', 'दिल ही तो है' आदि में प्रमुख भूमिकाएं निभाईं।
मृत्यु
18 साल के अपने फिल्मी कॅर‍ियर में बिक्रमजीत कंवरपाल ने दर्शकों को कभी श‍िकायत का मौका नहीं दिया। फ‍िल्मों और टीवी शोज में उनकी मौजूदगी हमेशा ही ऑड‍ियंस के लिए फायदे का सौदा साबित हुई। अपने बचपन के इस अधूरे सपने को पूरा करना ही शायद बिक्रमजीत की जिंदगी का आख‍िरी पड़ाव था। पिछले दिनों कोरोना से संक्रमित होने के बाद 1 मई, 2021 को उन्होंने 52 वर्ष की उम्र में अंतिम सांस ली। पर्दे के इस दिग्गज कलाकार को दोबारा स्क्रीन पर ना देख पाने का मलाल उनके फैंस को हमेशा रहेगा।

माइकल जेक्सन

माइकल जोसेफ जैक्सन, लोकप्रिय अमरीकी पॉप गायक थे, जिन्हें किंग ऑफ पॉप भी कहा जाता है। माइकल, जैक्सन दंपति की सातवीं संतान थे, जिन्होंने मात्र ग्यारह वर्ष की आयु में ही व्यवसायिक रूप से गायकी आरंभ कर दी थी। उस समय वे जैक्सन-५ समूह के सदस्य हुआ करते थे। 
🎂जन्म की तारीख और समय: 29 अगस्त 1958, गैरी, इंडियाना, संयुक्त राज्य अमेरिका
⚰️मृत्यु की जगह और तारीख: 25 जून 2009, होलम्बी हिल्स, लॉस एंजिल्स, कैलीफोर्निया, संयुक्त राज्य अमेरिका
बच्चे: पेरिस-माइकल कैथरीन जैक्सन, प्रिंस माइकल जैक्सन II, ज़्यादा
पत्नी: डेबी रोव (विवा. 1996–2000), ज़्यादा
माता-पिता: जो जैक्सन, कैथरीन जैक्सन
लंबाई: 1.75 मी
माइकल जोसेफ जैक्सन (29 अगस्त, 1958 - 25 जून, 2009) एक अमेरिकी गायक, गीतकार, नर्तक और परोपकारी व्यक्ति थे। " पॉप के राजा " के रूप में जाने जाने वाले, उन्हें 20वीं सदी की सबसे महत्वपूर्ण सांस्कृतिक हस्तियों में से एक माना जाता है । अपने चार दशक के करियर के दौरान, संगीत, नृत्य और फैशन में उनके योगदान के साथ-साथ उनके प्रचारित निजी जीवन ने उन्हें लोकप्रिय संस्कृति में एक वैश्विक शख्सियत बना दिया। जैक्सन ने कई संगीत शैलियों के कलाकारों को प्रभावित किया। मंच और वीडियो प्रदर्शन के माध्यम से, उन्होंने जटिल स्ट्रीट डांस मूव्स जैसे मूनवॉक , जिसे उन्होंने नाम दिया, और साथ ही रोबोट को लोकप्रिय बनाया ।
🌹जैक्सन परिवार की आठवीं संतान , जैक्सन ने 1964 में अपने बड़े भाइयों जैकी , टीटो , जर्मेन और मार्लोन के साथ जैक्सन 5 (जिसे बाद में जैकसन के नाम से जाना गया) के सदस्य के रूप में सार्वजनिक शुरुआत की। जैक्सन ने अपने एकल करियर की शुरुआत 1971 में मोटाउन रिकॉर्ड्स में रहते हुए की थी । वह अपने 1979 के एल्बम ऑफ द वॉल से एकल स्टार बन गए । उनके संगीत वीडियो , जिनमें " बीट इट ", " बिली जीन " और उनके 1982 एल्बम थ्रिलर के " थ्रिलर " शामिल हैं, को नस्लीय बाधाओं को तोड़ने का श्रेय दिया जाता है।और माध्यम को एक कला रूप और प्रचार उपकरण में बदलना। उन्होंने एमटीवी की सफलता को आगे बढ़ाने में मदद की और बैड (1987), डेंजरस (1991), हिस्ट्री: पास्ट, प्रेजेंट एंड फ्यूचर, बुक I (1995), और इनविंसिबल (2001) एल्बमों के लिए वीडियो के साथ नवाचार करना जारी रखा। थ्रिलर अब तक का सबसे अधिक बिकने वाला एल्बम बन गया , जबकि बैड पांच यूएस बिलबोर्ड हॉट 100 नंबर-एक एकल का निर्माण करने वाला पहला एल्बम था । [nb 1]

1980 के दशक के उत्तरार्ध से, जैक्सन अपनी बदलती उपस्थिति , रिश्तों , व्यवहार और जीवनशैली के कारण विवादों और अटकलों का विषय बन गया । 1993 में उन पर एक पारिवारिक मित्र के बच्चे का यौन शोषण करने का आरोप लगा । मुकदमा सिविल कोर्ट से बाहर सुलझाया गया; सबूतों के अभाव के कारण जैक्सन को दोषी नहीं ठहराया गया। 2005 में, उन पर मुकदमा चलाया गया और उन्हें बाल यौन शोषण के आरोपों और कई अन्य आरोपों से बरी कर दिया गया। एफबीआई को किसी भी मामले में जैक्सन द्वारा आपराधिक आचरण का कोई सबूत नहीं मिला । 2009 में, जब वह वापसी संगीत कार्यक्रमों की एक श्रृंखला, दिस इज़ इट की तैयारी कर रहे थे, प्रोपोफोल की अधिक मात्रा के कारण जैक्सन की मृत्यु हो गई ।उनके निजी चिकित्सक, कॉनराड मरे द्वारा प्रशासित किया गया , जिन्हें 2011 में जैक्सन की मौत में शामिल होने के लिए अनैच्छिक हत्या का दोषी ठहराया गया था। उनकी मृत्यु पर दुनिया भर में प्रतिक्रियाएँ शुरू हो गईं, जिससे इंटरनेट ट्रैफ़िक में अभूतपूर्व वृद्धि हुई और उनके संगीत की बिक्री में भी वृद्धि हुई। लॉस एंजिल्स के स्टेपल्स सेंटर में आयोजित जैक्सन के लिए टेलीविजन पर प्रसारित स्मारक सेवा को वैश्विक स्तर पर अनुमानित 2.5 बिलियन से अधिक लोगों ने देखा।

दुनिया भर में 400 मिलियन से अधिक रिकॉर्ड की अनुमानित बिक्री के साथ, जैक्सन सभी समय के सबसे अधिक बिकने वाले संगीत कलाकारों में से एक है । [एनबी 2] उनके पास 13 बिलबोर्ड हॉट 100 नंबर-वन सिंगल्स थे ( हॉट 100 युग में किसी भी कलाकार का तीसरा सबसे बड़ा ) और पांच अलग-अलग दशकों में बिलबोर्ड हॉट 100 पर टॉप-टेन सिंगल में जगह बनाने वाले पहले कलाकार थे। उनके सम्मानों में 15 ग्रैमी पुरस्कार , छह ब्रिट पुरस्कार , एक गोल्डन ग्लोब पुरस्कार और 39 गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स शामिल हैं, जिनमें "सभी समय का सबसे सफल मनोरंजनकर्ता" भी शामिल है। जैक्सन के प्रेरणों में रॉक एंड रोल हॉल ऑफ फ़ेम शामिल है (दो बार), वोकल ग्रुप हॉल ऑफ़ फ़ेम , सॉन्ग राइटर्स हॉल ऑफ़ फ़ेम , डांस हॉल ऑफ़ फ़ेम (उन्हें इसमें शामिल होने वाला एकमात्र रिकॉर्डिंग कलाकार बनाया गया) और रिदम एंड ब्लूज़ म्यूज़िक हॉल ऑफ़ फ़ेम ।

बिन्नु ढीलों

बिन्नू ढिल्लों 
🎂जन्म 29 अगस्त 1975
 एक भारतीय अभिनेता हैं जो पंजाबी सिनेमा और हिंदी फिल्मों में अपनी भूमिकाओं के लिए जाने जाते हैं।
29 अगस्त 1975 
धुरी, पंजाब , भारत
अल्मा मेटर
पंजाबी यूनिवर्सिटी
व्यवसायों
अभिनेताहास्य अभिनेताफ़िल्म निर्माताटेलीविज़न प्रस्तोता
सक्रिय वर्ष
1996-वर्तमान
संगठन
बिन्नू ढिल्लों प्रोडक्शन
के लिए जाना जाता है
कॉमेडी
बच्चे
2
बिन्नू ढिल्लों ने अपना करियर भांगड़ा कलाकार के रूप में शुरू किया और उन्हें जर्मनी और यूके में भारतीय समारोहों में प्रदर्शन करने का अवसर मिला, अभिनय क्षेत्र में प्रवेश करने से पहले वह टेलीविजन और धारावाहिकों में दिखाई दिए। उन्होंने विश्वविद्यालय में अपने समय के दौरान एक छात्र के रूप में और थिएटर और टेलीविजन विभाग के रिपर्टरी के हिस्से के रूप में नाटकों में अभिनय करना जारी रखा।

उन्होंने 1998 में गुरबीर सिंह ग्रेवाल द्वारा लिखित और निर्देशित धारावाहिक पड्डू से टेलीविजन पर अपनी शुरुआत की और लोकप्रिय टेलीविजन धारावाहिक सरहद , लोरी , गौंडी धरती , सिरनावे , मन जीते जग जीत , चन्नो चान वर्गी में काम किया । प्रोफेसर मनी प्लांट , जुगनू हाज़िर है , जुगनू मस्त मस्त , पदम पारिया , कंकाल , अस्ते और पगडंडियन । उन्होंने खरा दूध और खिच घुग्गी खिच जैसी टेलीफिल्मों में अभिनय करना जारी रखा.

उन्होंने शहीद-ए-आजम और देव डी जैसी व्यावसायिक रूप से सफल हिंदी फिल्मों में छोटी भूमिकाएँ भी निभाईं ।

2010 में, उन्होंने एक नाटक नॉटी बाबा इन टाउन का निर्देशन किया , जो अमेरिका और कनाडा दोनों में प्रदर्शित किया गया था। बिन्नू अब पंजाबी फिल्मों के सबसे मशहूर कॉमेडियन में से एक हैं।

आंचल सभरवाल

आंचल सभरवाल 
🎂जन्म 29 अगस्त 1986 
 वह एक लोकप्रिय भारतीय टीवी अभिनेत्री हैं जिन्होंने 'टीवी शो' से अपने करियर की शुरुआत की थी।एक चाभी है पड़ोस में' (2006)। टीवी सीरियलों में अभिनय करने से पहले उन्होंने कई टीवी विज्ञापनों में काम किया। उनकी पहली हिंदी फिल्म आमरस थी, जो स्कूली लड़कियों की मासूम जिंदगी की कहानी पर आधारित फिल्म थी। फिल्म का निर्देशन किया थारूपाली गुहाकी बेटी हैबासु चटर्जीऔर औसत सफलता मिली.

उन्होंने सिटकॉम सजन रे झूठ मत बोलो (सब टीवी का एक बहुत लोकप्रिय धारावाहिक) में आरती झावेरी की भूमिका निभाई। कुछ अन्य धारावाहिक जिनमें उन्होंने अभिनय किया:भास्कर भारती, साजन बिना ससुराल और उतरन (रूपाली गुहा द्वारा निर्देशित)। उन्होंने एक मलयालम फिल्म में भी काम कियारेल गाड़ी(2011) जिसमें मुख्य भूमिका ममूटी ने निभाई थी। उन्होंने "" में सहायक भूमिका निभाईकेम्पे गौड़ाएक फिल्म जिसमें उन्हें मुख्य भूमिका निभानी थी।

आंचल हमेशा अपने फोटोशूट में बेहद ग्लैमरस दिखती हैं और उनमें वो ओम्फ फैक्टर है। वर्ष 2013 में, वह उस समय विवादों में घिर गईं जब तेलुगु फिल्म 'कोडीपुंजू' के ऑडियो लॉन्च के दौरान उनके इनर वियर की तस्वीरें इंटरनेट पर वायरल हो गईं। ऐसा लगता है कि वह माहौल से अनजान थी और जब यह हुआ तब वह अपने क्षेत्र में थी। इस तस्वीर ने सभी मशहूर वेबसाइटों पर एंट्री कर ली। फिलहाल वह 'इस प्यार को क्या नाम दूं?...एक बार फिर' में मानसी का किरदार निभा रही हैं।
उनको जब वालीवुड में सफलता नहीं मिली तो उन्हों ने दूसरे क्षेत्रों में जाना सही समझा
हम आंचल को उनकी आगामी परियोजनाओं के लिए शुभकामनाएं देते हैं।

लीना चद्रवर्क

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लीना चंद्रावरके
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  🎂जन्म की तारीख और समय: 29 अगस्त 1950 (आयु 72 वर्ष), धारवाड़
पति: किशोर कुमार (विवा. 1980–1987)
बच्चे: सुमित कुमार
माता-पिता: श्रीनाथ चंदावरकर
भाई: अनिल चंदावरकर
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लीना चन्दावरकर हिन्दी फ़िल्मों की एक अभिनेत्री हैं। लीना किशोर कुमार की चौथी पत्नी हैं,एक्ट्रेस लीना चंदावरकर महज 25 साल की उम्र में विधवा हो गई थीं. इसके बाद उन्होंने अपने से 20 साल बड़े किशोर कुमार से शादी कर ली. 

🎂29 अगस्त को लीना का जन्मदिन है.
बीते जमाने की एक्ट्रेस लीना चंदावरकर का जन्म मुंबई में एक आर्मी परिवार में हुआ. उन्होंने अपनी अदाकारी से दर्शकों के दिल में दशकों तक राज किया. लीना ने अपना करियर मन का मीत फिल्म से शुरू किया था. इस फिल्म को सुनील दत्त ने प्रोड्यूस किया था. बताया जाता है इस फिल्म के लिए सुनील दत्त की पत्नी नरगिस ने उन्हें एक एक्ट्रेस के रुप में तैयार किया था. इसके अलावा उन्होंने मेहबूब की मेहंदी, हमजोली, प्रीतम, रखवाला जैसी बेहतरीन फिल्मों में काम किया. लीना महज 25 साल की उम्र में विधवा हो गई थीं. इसके बाद उन्होंने अपने से 20 साल बड़े किशोर कुमार से शादी कर ली. 29 अगस्त को लीना का जन्मदिन है. आइए लीना की निजी जिंदगी के बारे में जानें।

1975 में लीना की शादी राजनैतिक फैमिली से ताल्लुक रखने वाले सिद्धार्थ बंडोडकर से हुई थी. लेकिन किसे पता था कि एक घटना की वजह से उनकी बसी बसाई जिंदगी बंजर हो जाएगी. उनके पति को गलती से गोली लग गई थी. इसका कुछ समय तक इलाज चला लेकिन वह मौत से जीत नहीं पाए और उनका निधन हो गया. पति के इस तरह से चले जाने के बाद लीना डिप्रेशन में चली गई थीं. उन्होंने अपने करीबियों से मिलना जुलना बंद कर दिया था. लीना की ऐसी हालत देख उनके पिता उन्हें घर ले गए. कुछ समय बाद उन्होंने फैसला लिया कि वह फिर से इंडस्ट्री में वापसी करेंगी. उन्होंने दोबारा फिल्मों में काम करना शुरू किया. इसी बीच उनकी मुलाकात किशोर कुमार से हुई. दोनों ने मिलना जुलना शुरू किया. दोनों की प्रेम कहानी दोस्ती से शुरू होकर शादी पर खत्म हुई. इस बीच लीना को परिवार की आपत्ति का भी सामना करना पड़ा. जब लीना ने अपने पिता को किशोर के बारे में बताया तो वह नाराज हो गए. उन्होंने दोनों के रिश्ते का विरोध किया. लीना के पिता नहीं चाहते थे कि वह एक ऐसे इंसान से शादी करें जो तीन बार शादी कर चुका हो. लेकिन लीना ने परिवारवालों के खिलाफ जाकर किशोर कुमार से शादी. इन दिनों वह सौतेले बेटे सिंगर अमित कुमार, बेटे सुमित कुमार के साथ मुंबई में रहती हैं.
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1980 ज़ालिम 
1978 डाकू और जवान 
1978 नालायक सीमा 
1975 कैद 
1975 विदाई 
1971 रखवाला 
1971 मेहबूब की मेहन्दी
1970 हमजोली

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...