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प्रथम अध्याय परिचय,संवाद,व्याख्या
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यह श्लोक भगवद गीता के भीष्म पर्व से लिया गया है, जिसमें अर्जुन को अपनी सेना के सेनापतियों के बारे में बताया जा रहा है।
संजय के माध्यम से धृतराष्ट्र को बताया गया है, जो युद्ध की परिस्थिति और कौरव पक्ष की शक्ति को रेखांकित करता है। इससे यह भी समझ आता है कि कौरव पक्ष में कैसे कई अद्वितीय योद्धा थे, जो विभिन्न कारणों से उनके पक्ष में लड़ रहे थे।
अस्माकं तु विशिष्टा ये तन्निबोध द्विजोत्तम |
नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तानब्रवीमि ते || 7 ||
हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! मेरी सेना में जो विशिष्ट वीर हैं, उन्हें आप भी जानें | मेरी सेना के जो-जो सेनापति हैं, उन्हें आपको बताता हूं |
(हे ब्राह्मणश्रेष्ठ, मेरी सेना में जो विशिष्ट वीर हैं, उन्हें मैं बताता हूँ।" - दुर्योधन, द्रोणाचार्य को अपनी सेना की शक्ति और प्रमुख योद्धाओं का परिचय देकर उन्हें प्रभावित करना चाहता है। यह उसके आत्मविश्वास और रणनीतिक दृष्टिकोण को दर्शाता है।)
भवन्भीष्मश्च कर्णश्च कृपाश्च समितिञ्जयः |
अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तस्तथैव च || 8 ||
आप, द्रोणाचार्य और पितामह भीष्म, कर्ण, कृपाचार्य, विजयी अश्वत्थामा, विकर्ण और सोमदत्त के पुत्र भूरिश्रवा |
🔴 श्लोक 8 अध्याय 1 के द्रोणाचार्य
द्रोणाचार्य ऋषि भारद्वाज तथा घृतार्ची नामक अप्सरा के पुत्र तथा थे।कुरू प्रदेश में पांडु के पुत्रों तथा धृतराष्ट्र पुत्रों के वे गुरु थे। महाभारत युद्ध के समय वह कौरव पक्ष के सेनापति थे। गुरु द्रोणाचार्य के अन्य शिष्यों में एकलव्य का नाम उल्लेखनीय है। उसने द्रोणाचार्य द्वारा गुरु दक्षिणा माँगे जाने पर अपने दाएं हाथ का अंगूठा काट कर दे दिया। एकलव्य निषाद राज का पुत्र था और एक राजकुमार भी। कौरवों और पांडवों ने द्रोणाचार्य के आश्रम मे ही अस्त्रों और शस्त्रों की शिक्षा पाई थी। अर्जुन द्रोणाचार्य के प्रिय शिष्य थे। वे अर्जुन को विश्व का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनाना चाहते थे।आज अर्जुन के यही गुरु अर्जुन के विरोध में रण भूमि में नजर आ रहे है (गुरु शिष्य की परम्परा का गुरु द्वारा शिष्य के शोषण को तो दर्शाता ही है)
परशुराम के शिष्य बन कर द्रोण अस्त्र-शस्त्रादि सहित समस्त विद्याओं के अभूतपूर्व ज्ञाता हो गये।
गुरु द्रोणाचार्य कई विद्याओं के ज्ञाता थे:
वेद-वेदागों में पारंगत थे
वे एक महान धनुर्धारी थे
उन्हें दिव्यास्त्रों का ज्ञान परशुराम से मिला था
उन्हें शस्त्रों के आह्वान और प्रत्याहार का मंत्र भी परशुराम ने ही दिया था
उनके पास ब्रह्मास्त्र, ब्रह्मशिरा, नारायणास्त्र, रुद्र, आग्नेय, वज्र जैसे कई अस्त्र थे शास्त्रआह्वान और प्रत्याहार का मंत्र के भी जाता होन के साथ साथ वे उनमें प्रवीण भी थे।
द्रोणाचार्य दोनों पक्षों के गुरु होते हुए भी कौरवों के पक्ष में लड़ने का निर्णय क्यों लिया?
समझें (प्राण जाए पर वचन नहीं जाए) के आधार पर,महाभारत के युद्ध में कई योद्धा ऐसे थे जो पांडवों की विजय चाहते थे लेकिन उन्होंने अपनी विवशता के कारण कौरवों पक्ष में युद्ध लड़ा । इनमें कुछ योद्धा थे : -
भीष्म पितामह - भीष्म पितामह कौरव और पांडव दोनों के पितामह थे। हस्तिनापुर सिंहासन की सदैव रक्षा का वचन उन्होंने दिया था । उस वचन को निभाने के लिए उन्होंने कौरवों के पक्ष में युद्ध लड़ा ।
द्रोणाचार्य - द्रोणाचार्य कौरव और पांडव दोनों के गुरु थे । साथ ही वह हस्तिनापुर के राजगुरु भी थे । हस्तिनापुर के प्रति राजधर्म का पालन करने के लिए उन्होंने कौरवों के पक्ष में युद्ध लड़ा।
❤️ इसी श्लोक के पितामह भीष्म,
भीष्म पितामह
भूमिका: कौरवों की ओर से युद्ध में भाग लेने वाले भीष्म पितामह नैतिकता और आदर्शों का प्रतीक हैं, फिर भी वे कौरवों का पक्ष लेते हैं। वो भी एक प्रतिज्ञा के कारण आज तो हम भी प्रतिज्ञा लेते ओर तोड़ते रहते है भीष्म तोड़ते नहीं इस लिए “भीष्म प्रतिज्ञा” नाम पढ़ जाता है ।
मुख्य संदेश: भीष्म का जीवन कर्तव्य और नैतिकता के बीच संघर्ष को दर्शाता है। वे धर्म और अधर्म के बीच फँसते हैं, जिससे समझ आता है कि सही कर्तव्य का चुनाव आसान नहीं होता।क्यों कि उनकी प्रतिज्ञा ही सामने आ खड़ी होती है।
❤️इसी श्लोक के कृपाचार्य - कृपाचार्य हस्तिनापुर के कुल गुरु थे । उन्हें भी राजधर्म निभाने के लिए हस्तिनापुर के पक्ष में युद्ध करना पड़ा।
कृपाचार्य महाभारत युद्ध में कौरवों की ओर से लड़े थे। महाभारत युद्ध के कृपाचार्य, गुरु द्रोणाचार्य और भीष्म पितामह की जोड़ी थी। युद्ध में द्रोणाचार्य, कृपाचार्य और अश्वत्थामा तीनों ही भयंकर योद्धा थे।
कृपाचार्य महर्षि गौतम शरद्वान् के पुत्र। शरद्वान की तपस्या भंग करने के लिए इंद्र ने जानपदी नामक एक देवकन्या भेजी थी, जिसके गर्भ से दो यमज भाई-बहन हुए। पिता-माता दोनों ने इन्हें जंगल में छोड़ दिया जहाँ महाराज शांतनु ने इनको देखा। इनपर कृपा करके दोनों को पाला पोसा जिससे इनके नाम कृप तथा कृपी पड़ गए।
कृप भी धनुर्विद्या में अपने पिता के समान ही पारंगत हुये। भीष्म जी ने इन्हीं कृप को पाण्डवों और कौरवों की शिक्षा-दीक्षा के लिये नियुक्त किया और वे कृपाचार्य के नाम से विख्यात हुये।
❤️शल्य - शल्य पांडु की दूसरी पत्नी माद्री के भाई थे अर्थात नकुल और सहदेव के मामा थे । दुर्योधन ने महाभारत युद्ध में धोखे से शल्य को अपने पक्ष में कर लिया था। और अपनी सहायता का वचन ले लिया था।
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जिस से हमें शिक्षा मिलती है कि कभी किसी को बंधन में बंधने वाला कोई वचन ही ना दे।काल परिस्थिति कभी भी बदल सकती है।
विवाह संस्कार है
उसमें दिए गए वचन धारण कर के अपनाना धर्म कहा जाता है।
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द्रोणाचार्य के बारे में कुछ और बातें:
वे कौरव और पांडवों दोनो ही पक्षों के गुरु थे।
वे हस्तिनापुर के राजगुरु भी थे
उनका विवाह कृपाचार्य की बहन कृपि से हुआ था
उनके पुत्र का नाम अश्वत्थामा था
अर्जुन उनके प्रिय शिष्य थे !
एकलव्य भी उनके शिष्य थे ।।
🔴अन्ये च बहवः शूरा मद्रते त्यक्तजीविताः |
नानाशास्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविषारदाः || 9 ||
और भी मेरे लिए जीवन की आशा त्याग देने वाले बहुत से शूरवीर हैं, जो विभिन्न शस्त्रों के जानकार और सभी युद्धों में चतुर हैं |
यह श्लोक भगवद गीता के अध्याय 1, श्लोक 7-9 में है।
वचनों में ही बंध कर उन बाहु बालियों को महा भारत युद्ध में कौरव पक्ष में युद्ध करना पड़ा जब कि वह सभी पांडवों की जीत ही चाहते थे।
इसे ऐसे भी समझा जा सकता है
शल्य राजा पाण्डू की छोटी रानी माद्री का भाई था, यानि कि नकुल और सहदेव का मामा था। शल्य कुशल युोद्धा और महा रथी था। महाभारत युद्ध में पाण्डवों के पक्ष में युद्ध करने की इच्छा से वह भी मद्र देश की राजधानी से कुरुक्षेत्र की ओर अपनी सेना सहित चल पडा था।
मार्ग में वह जहां जहां शल्य अपनी सैना समेत रुका, उस का भव्य स्त्कार किया गया जिस से वह बहुत प्रसन्न हुआ। उस ने समझा कि उस का सत्कार उस के भांजों ने किया है। उस ने अपने स्त्कारक को धन्यवाद देने की इच्छा से मिलने के लिये और वर देने के लिये आमन्त्रित किया। लेकिन वह यह देख कर हैरान रह गया कि सत्कार का पूरा आयोजन दुर्योद्धन ने किया था। दुर्योद्धन पहले से ही चुपचाप शल्य की सैना के साथ ही चल रहा था।
शल्य ने आभार प्रगट करते हुये दुर्योद्धन को वर मांगने के लिये कहा तो दुर्योद्धन ने आग्रह किया कि वह युद्ध में उस के पक्ष की ओर से लडें। दुर्योद्धन की इस कूटनीति के कारण शल्य कौरवों की ओर से लडे थे।
शल्य ऐक कुश्ल रथ चालक थे। जब कर्ण और अर्जुन का युद्ध हुआ तो कर्ण ने दुर्योद्धन से कहा कि इन्द्र से प्राप्त शक्ति घटोद्कच्च के वध में प्रयोग होने के कारण नष्ट हो चुकी है और उस के कवच और कुण्डल भी इन्द्र ने दान में ले लिये हैं। अब कम से कम उसे कृष्ण जैसा ऐक रथचालक ही दे दिया जाये - और उस ने शल्य को रथ चालक के तौर पर मांग लिया था।
युद्ध में शल्य ने हर समय कर्ण का मनोबल गिराने का प्रयत्न किया। जब अर्जुन प्रहार करता था तो शल्य उस की तारीफों के पुल बांधता था और जब कर्ण बाण चलाता था तो शल्य उस में आलोचना कर के कर्ण का मनोबल गिरा देता था। श्राप के कारण जब कर्ण का रथ गढे में फंस गया तो शल्य ने उस का पहिया निकालने में भी कर्ण की कोई सहायता नहीं करी थी और वह काम कर्ण को को खुद ही लडते लडते करना पडा था जिस के करते उस का वध किया गया था।
कर्ण की मृत्यु के बाद स्त्रहवें दिन मध्यान्ध तक शल्य कौरव सैना का सैनापति बना था क्यों कि अब कोई विकल्प ही नहीं बचा था और उसी दिन शल्य मारा गया था।
युद्ध में मनोबल का कितना महत्व है यह पाठ कर्ण अर्जुन युद्ध में शल्य की भूमिका से प्राप्त होता है।
✍️अब अत्यंत संक्षिप्त लेख
संजय अपने दिव्य दृष्टि द्वार धृतराष्ट्र को बताते है।
भीष्म पितामह: वे कौरव और पांडव दोनों के पितामह हैं और अपने प्रतिज्ञा के कारण कौरवों का पक्ष ले रहे हैं। भीष्म की भूमिका में नैतिकता और प्रतिज्ञा का विशेष महत्त्व है, जो उन्हें एक आदर्श योद्धा बनाती है।
द्रोणाचार्य: वे कौरव और पांडव दोनों के गुरु और हस्तिनापुर के राजगुरु हैं। राजधर्म का पालन करते हुए, वे कौरवों का पक्ष लेते हैं। उनकी महानता उनकी तपस्या और युद्ध कौशल में है, जो उन्होंने परशुराम से सीखा था।
कृपाचार्य: हस्तिनापुर के कुलगुरु कृपाचार्य, जो महर्षि गौतम के वंशज हैं, भी राजधर्म निभाते हुए कौरवों के पक्ष में युद्ध में भाग लेते हैं।
कर्ण: जन्म से सूर्यपुत्र कर्ण कौरव पक्ष के प्रति निष्ठावान हैं, जिन्हें अपनी योग्यता और युद्ध कौशल के बावजूद सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ा। उनकी भूमिका में मित्रता और वीरता का प्रदर्शन करने की क्षमता रखने वाल भी कौरव पक्ष में है।
शल्य: नकुल-सहदेव के मामा शल्य को दुर्योधन ने कूटनीति से अपने पक्ष में सम्मिलित किया। युद्ध के दौरान, वे कर्ण के रथ-सारथी बने, लेकिन उनकी भूमिका में पांडव पक्ष की ओर झुकाव स्पष्ट है।
जैसे श्लोक 7 में,
हर पात्र से जो शिक्षा मिलती है, उसे संक्षेप में इस तरह समझ सकते है:
भीष्म: द्वारा वचन और धर्म की रक्षा के लिए किसी भी परिस्थिति का सामना करना।
द्रोणाचार्य:द्वारा अपने संकल्प और धर्म का पालन करना।
कृपाचार्य और शल्य:का अपने दायित्वों का पालन और संधियों के प्रति निष्ठा हैं।
शल्य की भूमिका: शल्य के चरित्र से यह स्पष्ट होता है कि मानसिक समर्थन और मनोबल की भूमिका युद्ध में कितनी महत्वपूर्ण होती है।
द्रोणाचार्य और अन्य योद्धाओं की विस्तृत जानकारी है ताकि उनको भी जान सके कि महायोद्धाओं को किन कारणों से श्री कृष्ण महाभारत में अर्जुन के हाथों पराजय दिलवा देते है
✍️🌹प्रस्तावित संशोधित विश्लेषण युक्त संस्करण
श्लोक 7-9 में दुर्योधन द्वारा अपनी सेना का परिचय देते संजय द्वारा धृतराष्ट्र से कहा।
अर्जुन की सेना को देखकर, दुर्योधन अपनी सेना के प्रमुख योद्धाओं का परिचय देते हैं और द्रोणाचार्य से कहते हैं:
श्लोक 7:
"हे ब्राह्मणश्रेष्ठ, मेरी सेना के जो प्रमुख योद्धा हैं, उन्हें आप भी जानें।"
दुर्योधन यह संकेत दे रहे हैं कि कौरव पक्ष में भी अत्यंत शक्तिशाली योद्धा हैं, जिनके नेतृत्व में उनकी सेना दृढ़ और सक्षम है।
श्लोक 8-9:
दुर्योधन भीष्म, कर्ण, कृपाचार्य, अश्वत्थामा, विकर्ण और अन्य वीर योद्धाओं का नाम लेते हुए अपनी सेना की शक्ति का बखान करते हैं। ये सभी योद्धा, भिन्न-भिन्न कारणों से कौरवों के पक्ष में हैं, फिर भी उनका युद्ध कौशल अति उत्कृष्ट है।
संक्षिप्त परिचय और शिक्षा:
भीष्म पितामह: वचनबद्धता के प्रतीक। भीष्म कौरवों के प्रति अपनी प्रतिज्ञा के कारण धर्मसंकट में रहते हैं, परंतु वे अपनी प्रतिज्ञा का पालन करते हैं।
द्रोणाचार्य: राजगुरु और आचार्य के रूप में राजधर्म निभा रहे हैं। वे श्रेष्ठ धनुर्धर अर्जुन के गुरु हैं, किंतु आज परिस्थितिवश कौरवों का पक्ष ले रहे हैं।
कृपाचार्य: महर्षि गौतम के वंशज कृपाचार्य भी हस्तिनापुर के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए युद्ध में भाग लेते हैं।
शल्य: नकुल-सहदेव के मामा शल्य ने दुर्योधन के कूटनीतिक राजनीति युक्ति में फँसकर कौरवों के पक्ष से युद्ध का निर्णय लिया, परंतु युद्ध में उनका मानसिक झुकाव पांडवों की ओर ही था।
कर्ण: मित्रता और स्वाभिमान के प्रतीक कर्ण, अपने स्वाभिमान और दुर्योधन के साथ मित्रता निभाते हुए कौरवों के लिए लड़े।
मुख्य संदेश: इन श्लोकों से यह शिक्षा मिलती है कि प्रत्येक योद्धा का एक कर्तव्य और धर्म है, जिसे निभाने के लिए वह बंधन में हैं। चाहे भीष्म की प्रतिज्ञा हो, द्रोणाचार्य का राजधर्म, या शल्य का दिया हुआ वचन—इनमें से प्रत्येक अपनी प्रतिज्ञाओं का पालन करते हुए भी, अपनी व्यक्तिगत भावनाओं और मूल्यों के साथ खुद ही संघर्ष कर रहे हैं।
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✍️गीता आरम्भ
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समस्त पात्रों के परिचय के बाद अब गीता का आरंभ हो जाता है।
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 2
श्लोक:
संजय उवाच
दृष्टवा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा।
आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत्॥
भावार्थ:
संजय बोले- उस समय जब उनकी दिव्य दृषि चेतन प्रकाश से प्रकाशित होती है तब राजा दुर्योधन ने व्यूहरचनायुक्त पाण्डवों की सेना को देखा और द्रोणाचार्य के पास जाकर यह वचन कहा।
॥2॥
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 3
श्लोक:
पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम्।
व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता॥
भावार्थ:
हे आचार्य!(गुरु जी) आपके बुद्धिमान् (क्यों कि यही तो गुरु शिष्य परम्परा है जिसमें गुरु ही चेले को बुद्धिमान ,ज्ञानवान बनाने का कार्य निष्ठा पूर्वक करता है उन चेलों द्वारा)
शिष्य द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न द्वारा व्यूहाकार खड़ी की हुई पाण्डुपुत्रों की इस बड़ी भारी सेना को देखिए
॥3॥
(इसकी जानकारी राज युधिष्ठिर तक संजय द्वारा बताया जा रहा है)
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 4-6
श्लोक:
अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि।
युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः॥
धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान्।
पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङवः॥
युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान्।
सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः॥
भावार्थ:
इस सेना में बड़े-बड़े धनुषों वाले तथा युद्ध में भीम और अर्जुन के समान शूरवीर सात्यकि और विराट तथा महारथी राजा द्रुपद, धृष्टकेतु और चेकितान तथा बलवान काशिराज, पुरुजित, कुन्तिभोज और मनुष्यों में श्रेष्ठ शैब्य, पराक्रमी युधामन्यु तथा बलवान उत्तमौजा, सुभद्रापुत्र अभिमन्यु एवं द्रौपदी के पाँचों पुत्र- ये सभी महारथी हैं।
॥4-6॥
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 7
श्लोक:
अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम।
नायका मम सैन्यस्य सञ्ज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते॥
भावार्थ:
हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! अपने पक्ष में भी जो प्रधान हैं, उनको आप समझ लीजिए। आपकी जानकारी के लिए मेरी सेना के जो-जो सेनापति हैं, उनको बतलाता हूँ
॥7॥
(यहां द्रोणा चार्य को श्रेष्ठ ब्राह्मण के संज्ञा दी है)
ब्राह्मण वह सभी जीव निर्जीव चीजें आ जाती है जो पूजा में प्रयोग हों या समलित किए गए हों उसमें चावल, चंदन, फल, फूल,जल जैसी सारी सामग्री भी जिन के बिना पूजा ही सम्पन्न ना हो सके ब्राह्मण तुल्य ही है)
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 8
श्लोक:
भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जयः।
अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च॥
भावार्थ:
आप-द्रोणाचार्य और पितामह भीष्म तथा कर्ण और संग्रामविजयी कृपाचार्य तथा वैसे ही अश्वत्थामा, विकर्ण और सोमदत्त का पुत्र भूरिश्रवा
॥8॥
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 9
श्लोक:
अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः।
नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः॥
भावार्थ:
और भी मेरे लिए जीवन की आशा त्याग देने वाले(वचन से बंधे ये) बहुत-से शूरवीर अनेक प्रकार के शस्त्रास्त्रों से सुसज्जित और सब-के-सब युद्ध में चतुर हैं
॥9॥
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 10
श्लोक:
अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम्।
पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम्॥
भावार्थ:
भीष्म पितामह द्वारा रक्षित हमारी वह सेना सब प्रकार से अजेय है और भीम (सेना हमार सेना आसानी से जीत लेगी ऐसी आशा को बल देती है) द्वारा रक्षित इन लोगों की यह सेना जीतने में सुगम है
॥10॥
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 11
श्लोक:
अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः।
भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि॥
भावार्थ:
इसलिए सब मोर्चों पर अपनी-अपनी जगह स्थित रहते हुए आप लोग सभी निःसंदेह भीष्म पितामह की ही सब ओर से रक्षा करें
॥11॥
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 12
श्लोक:
(दोनों सेनाओं की शंख-ध्वनि का कथन)
तस्य सञ्जनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः।
सिंहनादं विनद्योच्चैः शंख दध्मो प्रतापवान्॥
भावार्थ:
कौरवों में वृद्ध बड़े प्रतापी पितामह भीष्म ने उस दुर्योधन के हृदय में हर्ष उत्पन्न करते हुए उच्च स्वर से सिंह की दहाड़ के समान गरजकर शंख बजाया
॥12॥
इस शंख नाद के बाद रण भूमि में।
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 13
श्लोक:
ततः शंखाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः।
सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत्॥
भावार्थ:
इसके पश्चात शंख और नगाड़े तथा ढोल, मृदंग और नरसिंघे आदि बाजे एक साथ ही बज उठे। उनका वह शब्द बड़ा भयंकर हुआ
॥13॥
(रण भूमि हो या अपनी रक्षा खुशहाली के युद्ध रूपी प्रति दिन मंदिरों की जाने वाली ॐ जय जगदीश हरे आरती में समानता है। जीवन प्रति दिन का महाभारत ही नहीं तो ओर क्या है!जिसे मित्र शत्रु सभी एक समान रूप में लड़ रहे नजर आते है भगवान भी खुद इसमें शामिल होते है ऐसा भी प्रतीत होता है)
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 14
श्लोक:
ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ।
माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शंखौ प्रदध्मतुः॥
भावार्थ:
इसके अनन्तर सफेद घोड़ों से युक्त उत्तम रथ में बैठे हुए श्रीकृष्ण महाराज और अर्जुन ने भी अलौकिक शंख बजाए
॥14॥
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 15
श्लोक:
पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः।
पौण्ड्रं दध्मौ महाशंख भीमकर्मा वृकोदरः॥
भावार्थ:
श्रीकृष्ण महाराज ने पाञ्चजन्य नामक, अर्जुन ने देवदत्त नामक और भयानक कर्मवाले भीमसेन ने पौण्ड्र नामक महाशंख बजाया
॥15॥
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 16
श्लोक:
अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः।
नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ॥
भावार्थ:
कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने अनन्तविजय नामक और नकुल तथा सहदेव ने सुघोष और मणिपुष्पक नामक शंख बजाए
॥16॥
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 17-18
श्लोक:
काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः।
धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः॥
द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते।
सौभद्रश्च महाबाहुः शंखान्दध्मुः पृथक्पृथक्॥
भावार्थ:
श्रेष्ठ धनुष वाले काशिराज और महारथी शिखण्डी एवं धृष्टद्युम्न तथा राजा विराट और अजेय सात्यकि, राजा द्रुपद एवं द्रौपदी के पाँचों पुत्र और बड़ी भुजावाले सुभद्रा पुत्र अभिमन्यु- इन सभी ने, हे राजन्! सब ओर से अलग-अलग शंख बजाए
॥17-18॥
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 19
श्लोक:
स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत्।
नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन्॥
भावार्थ:
और उस भयानक शब्द ने आकाश और पृथ्वी को भी गुंजाते हुए धार्तराष्ट्रों के अर्थात आपके पक्षवालों के हृदय विदीर्ण कर दिए
॥19॥
(भाव विदीर्ण की परिभाषाएं और अर्थ हिन्दी में
टूटा हुआ । भग्न । मार डाला हुआ से है। शंख नाद पर पहला जवाबी प्रहार होता है)
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 20-21
श्लोक:
(अर्जुन द्वारा सेना-निरीक्षण का प्रसंग भी रोचक रोमांच कारी है शंख नाद के जवाबी प्रहार के बाद का दृश्य)
अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः।
प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः॥
हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते।
अर्जुन उवाचः
सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत॥
भावार्थ:
हे राजन्! इसके बाद कपिध्वज अर्जुन ने मोर्चा बाँधकर डटे हुए धृतराष्ट्र-संबंधियों को देखकर, उस शस्त्र चलने की तैयारी के समय धनुष उठाकर हृषीकेश श्रीकृष्ण महाराज से यह वचन कहा- हे अच्युत! मेरे रथ को दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा की जिए।
॥20-21॥
(अर्जुन का आग्रह सुन भगवान ने वही किया क्यों कि अर्जुन के रथ के वह सारथी जो है)
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 22
श्लोक:
यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान्।
कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे॥
भावार्थ:
और जब तक कि मैं युद्ध क्षेत्र में डटे हुए युद्ध के अभिलाषी इन विपक्षी योद्धाओं को भली प्रकार देख न लूँ कि इस युद्ध रूप व्यापार में मुझे किन-किन के साथ युद्ध करना योग्य है, तब तक उसे खड़ा रखिए
॥22॥
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 23
श्लोक:
योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः।
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः॥
भावार्थ:
दुर्बुद्धि दुर्योधन का युद्ध में हित चाहने वाले जो-जो ये राजा लोग इस सेना में आए हैं, इन युद्ध करने वालों को मैं देखूँगा
॥23॥
भाव (में भी तो देखूं दुर्योधन के पक्ष में मेरे साथ युद्ध करने वाले यह कौन से लोग हैं)
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 24-25
श्लोक:
संजय उवाचः
एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत।
सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम्॥
भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम्।
उवाच पार्थ पश्यैतान् समवेतान् कुरूनिति॥
भावार्थ:
संजय बोले- हे धृतराष्ट्र! अर्जुन द्वारा कहे अनुसार महाराज श्रीकृष्णचंद्र ने दोनों सेनाओं के बीच में भीष्म और द्रोणाचार्य के सामने तथा सम्पूर्ण राजाओं के सामने उत्तम रथ को खड़ा कर इस प्रकार कहा कि हे पार्थ! युद्ध के लिए जुटे हुए इन कौरवों को देख।
॥24-25॥
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 26-27 पूर्वार्ध
श्लोक:
तत्रापश्यत्स्थितान् पार्थः पितृनथ पितामहान्।
आचार्यान्मातुलान्भ्रातृन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा॥
श्वशुरान् सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि।
भावार्थ:
इसके बाद पृथापुत्र अर्जुन ने उन दोनों ही सेनाओं में स्थित (अपने ही) ताऊ-चाचों को, दादों-परदादों को, गुरुओं को, मामाओं को, भाइयों को, पुत्रों को, पौत्रों को तथा मित्रों को, ससुरों को और सुहृदों( मित्र, सखा।)को भी देखा
॥26 और 27वें का पूर्वार्ध॥
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 27 उत्तरार्ध 28 पूर्वार्ध
श्लोक:
तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान् बन्धूनवस्थितान्॥
कृपया परयाविष्टो विषीदत्रिदमब्रवीत्।
भावार्थ:
उन उपस्थित सम्पूर्ण बंधुओं बांधो सखा मित्रो को देखकर वे कुंतीपुत्र अर्जुन अत्यन्त करुणा से युक्त होकर शोक करते हुए यह वचन बोले।
❤️॥27वें का उत्तरार्ध और 28वें का पूर्वार्ध॥❤️
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 28 उत्तरार्ध और 29
श्लोक:
(मोह से व्याप्त हुए अर्जुन के कायरता, स्नेह और शोकयुक्त वचन )
अर्जुन उवाच
दृष्टेवमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्॥
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति।
वेपथुश्च शरीरे में रोमहर्षश्च जायते॥
भावार्थ:
अर्जुन बोले- हे कृष्ण! युद्ध क्षेत्र में डटे हुए युद्ध के अभिलाषी इस स्वजनसमुदाय को देखकर मेरे अंग शिथिल हुए जा रहे हैं और मुख सूखा जा रहा है तथा मेरे शरीर में कम्प एवं रोमांच हो रहा है।
❤️॥28वें का उत्तरार्ध और 29॥❤️
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 30
श्लोक:
गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्वक्चैव परिदह्यते।
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः॥
भावार्थ:
हाथ से गांडीव धनुष गिर रहा है और त्वचा भी बहुत जल रही है तथा मेरा मन भ्रमित-सा हो रहा है, इसलिए मैं खड़ा रहने को भी समर्थ नहीं हूँ।
॥30॥
(पारिवारिक सामाजिक मोह पाश में जकड़ा अर्जुन घबराई हुई हालत में नजर आ रहे हैं और अपने ही ज्ञान से भयभीत हो जाते है)
जिस का प्रमुख कारण
ही माया रूपी वॉट्सएप यूनिवर्सिटी से प्राप्त ज्ञान है
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 31
श्लोक:
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव।
न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे॥
भावार्थ:
हे केशव! मैं लक्षणों को भी विपरीत ही देख रहा हूँ तथा युद्ध में स्वजन-समुदाय को मारकर कल्याण भी नहीं देखता
॥31॥
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 32
श्लोक:
न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च।
किं नो राज्येन गोविंद किं भोगैर्जीवितेन वा॥
भावार्थ:
हे कृष्ण! मैं न तो विजय चाहता हूँ और न राज्य तथा सुखों को ही। हे गोविंद! हमें ऐसे राज्य से क्या प्रयोजन है अथवा ऐसे भोगों से और जीवन से भी क्या लाभ है?
॥32॥
(अर्जुन अपनी मनोदशा श्री कृष्ण को बताते है)
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 33
श्लोक:
येषामर्थे काङक्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च।
त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च॥
भावार्थ:
हमें जिनके लिए राज्य, भोग और सुखादि अभीष्ट हैं, वे ही ये सब धन और जीवन की आशा को त्यागकर युद्ध में खड़े हैं
॥33॥
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 34
श्लोक:
आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः।
मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः संबंधिनस्तथा॥
भावार्थ:
गुरुजन, ताऊ-चाचे, लड़के और उसी प्रकार दादे, मामे, ससुर, पौत्र, साले तथा और भी संबंधी लोग हैं
॥34॥
(आज के भाईचारे को दर्शाता प्रसंग प्रतीत होता है)
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 35
श्लोक:
एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन।
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते॥
भावार्थ:
हे मधुसूदन! मुझे मारने पर भी अथवा तीनों लोकों के राज्य के लिए भी मैं इन सबको मारना नहीं चाहता, फिर पृथ्वी के लिए तो कहना ही क्या है?
॥35॥
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 36
श्लोक:
निहत्य धार्तराष्ट्रान्न का प्रीतिः स्याज्जनार्दन।
पापमेवाश्रयेदस्मान् हत्वैतानाततायिनः॥
भावार्थ:
हे जनार्दन! धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हमें क्या प्रसन्नता होगी? इन आततायियों को मारकर तो हमें पाप ही लगेगा
॥36॥
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 37
श्लोक:
तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान्।
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव॥
भावार्थ:
अतएव हे माधव! अपने ही बान्धव धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारने के लिए हम योग्य नहीं हैं क्योंकि अपने ही कुटुम्ब को मारकर हम कैसे सुखी होंगे?
॥37॥
(जब कि दूसरे भाईचारे वालों के विचार इन से मिलते ही नहीं है अगर दोनों पक्षों के भाई चारे में थोड़ी सी भी समानता होती तो महाभारत होता ही नहीं)
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 38-39
श्लोक:
यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः।
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम्॥
कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम्।
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन॥
भावार्थ:
यद्यपि लोभ से भ्रष्टचित्त हुए ये लोग कुल के नाश से उत्पन्न दोष को और मित्रों से विरोध करने में पाप को नहीं देखते, तो भी हे जनार्दन! कुल के नाश से उत्पन्न दोष को जानने वाले हम लोगों को इस पाप से हटने के लिए क्यों नहीं विचार करना चाहिए?
॥38-39॥
(मेरे को तो 2024 की भारत की ही स्थिति दिखने लग गई है भाई चारे की चलो फिर से रण भूमि कुरुक्षेत्र में लौट चलते है)
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 40
श्लोक:
कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः।
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत॥
भावार्थ:
कुल के नाश से सनातन कुल-धर्म नष्ट हो जाते हैं तथा धर्म का नाश हो जाने पर सम्पूर्ण कुल में पाप भी बहुत फैल जाता है
॥40॥
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 41
श्लोक:
अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः।
स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकरः॥
भावार्थ:
हे कृष्ण! पाप के अधिक बढ़ जाने से कुल की स्त्रियाँ अत्यन्त दूषित हो जाती हैं और हे वार्ष्णेय! स्त्रियों के दूषित हो जाने पर वर्णसंकर उत्पन्न होता है
॥41॥
भाव
(वर्ण संकर?का भाव जाति दो अलग-अलग जातियों के पुरुष और महिला के मिलने से पैदा होती है, उसे वर्णसंकर कहते हैं. वर्णसंकर शब्द का इस्तेमाल धर्मशास्त्र में भी किया गया है. इसमें कई जातियों और जनजातियों के वर्ण व्यवस्था में मिश्रण शामिल है. वर्णसंकर शब्द का उल्लेख बौधायन शूत्र में भी मिलता है.
वर्णसंकर के कुछ उदाहरण:
खच्चर, जो घोड़े और गधे से पैदा होता है
सर्पों की कई प्रजातियां वर्णसंकर हैं
नीलगाय, जो घोड़े और हिरन से पैदा होती है
वर्णसंकर से जुड़ी कुछ और बातें:
जब किसी व्यक्ति के माता-पिता अलग-अलग जाति के हों या धर्म के हों, तो उनकी संतान को वर्णसंकर कहा जाता है.
वर्णसंकर के गुण माता-पिता से ज़्यादा होते हैं.
श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक संख्या 1.41 में वर्णसंकर शब्द का इस्तेमाल भी इसी रूप में किया गया है अब समझने वाले अच्छा समझे या बुरा यह हरि इच्छा )
Ş₳ŦเŞ𝓱👸🏻◣🍁💜⃝🇱♥︎𝐕𝐄4♥️𝐘𝐎 गीता और मैं◣
गीता को सुनने की अभी मेरे द्वारा कोई व्यवस्था नहीं की गई है।
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