बुधवार, 13 नवंबर 2024

कर्म प्रधान संसार

*जैसा यह लोक - वैसा ही है परलोक*

जिस को यहां धक्के 
वो वहां भी कैसे रुके 
राग देवेश है यहां 
वहां कोन सा नही 

कोन है जो इन्द्र को नहीं जानता 

भोग, विलास, शोक, सन्ताप, 
 
इधर भी उधर भी 
इधर का परिवार है सहार 
वहां का 
जिसका परिवार यहां नहीं 
 वहां क्या बनेगा 
श्राद्ध तपर्ण, 
मुक्ति करे गा क्या?
करे गा अच्छा कर्म हमारा
या पुत्र के किया श्राद्ध
अर्पण तर्पण
जीव की मुक्ती करेगा 
यह शुभ कर्म 
पुत्र ही कर पाता है
तो यह शुभ कर्म
केवल पुत्र का था
  नहीं करे गा 
 तो गया जीव 
अपने पित्रों सहित 
नरकों मे गिरेगा
राग द्वेष चला जैसा यहां,
 वहां भी वैसा ही चलेगा
 इस लोक और प्रलोक में 
केवल यही अन्तर है 
प्रायशचित कर्म होता है यहाँ 
वहां उसका का दरवाजा भी बन्द है।
उसका का दरवाजा भी बन्द है।

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