इंद्रिय सुख
मुस्लिम धर्म में जन्नत (स्वर्ग) में इंद्रिय सुख की मात्रा 32 गुना बढ़ती है,
जन्नत में इंद्रिय सुख की मात्रा 32 गुना बढ़ती है, जैसा कि कुरान में वर्णित है:
"जन्नत में जो कुछ भी है, वह दुनिया की चीजों से 32 गुना बेहतर है।" (कुरान, सूरह अल-बकरा, आयत 25)
🤫हिंदू धर्म के अनुसार, पृथ्वी लोक से अन्य दूसरे लोकों में इंद्रिय सुख कई गुना बढ़ता जाता है। यहाँ कुछ विवरण दिए गए हैं:
1. *पृथ्वी लोक*: पृथ्वी लोक में इंद्रिय सुख की मात्रा 1 गुना होती है।
2. *स्वर्ग लोक*: स्वर्ग लोक में इंद्रिय सुख की मात्रा 100 गुना होती है।
3. *महार्लोक*: महार्लोक में इंद्रिय सुख की मात्रा 1000 गुना होती है।
4. *जनरलोक*: जनरलोक में इंद्रिय सुख की मात्रा 10,000 गुना होती है।
5. *तपस्थलोक*: तपस्थलोक में इंद्रिय सुख की मात्रा 100,000 गुना होती है।
6. *सत्यलोक*: सत्यलोक में इंद्रिय सुख की मात्रा अनंत गुना होती है।
7. *ब्रह्मलोक*: ब्रह्मलोक में इंद्रिय सुख की मात्रा अनंत गुना होती है।
यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि ये विवरण हिंदू धर्म के पौराणिक ग्रंथों में वर्णित हैं और विभिन्न सम्प्रदायों में अलग-अलग व्याख्याएँ हो सकती हैं।
यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि ये विवरण इस्लामी धर्मग्रंथों में वर्णित हैं और विभिन्न सम्प्रदायों में अलग-अलग व्याख्याएँ हो सकती हैं।
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श्रीकृष्ण अर्जुन को चेताते हैं कि केवल सत्त्वगुण में ही लीन होना भी मोक्ष के मार्ग में बाधक हो सकता है, इसलिए उससे भी आगे बढ़ने की आवश्यकता है।
प्रकृति द्वारा रचित पाये गये जीव कई प्रकार के होते हैं। कोई सुखी है और कोई अत्यधिक व्यावसायिक है,
ब्राह्मण: यदि सतो गुणी पूर्ण ज्ञानी भी है पर पाठ पूजा में भेद भाव रखता है तो मोक्ष के मार्ग में बाधक ही है।
क्षत्रिय: भी पूर्ण ज्ञानी होने पर भी यदि भेद भाव बरते तो वह भी तो मोक्ष के मार्ग में बाधक ही है।
वैश्य भी ज्ञानी होने पर कम तोले,दिखाया मॉल बदल कर दे तो वो भी तो मोक्ष के मार्ग में बाधक ही है।
शूद्र:पूर्ण ज्ञानी होते है सेवा इनका स्वाभाविक कर्म है यदि समान सेवा ना करे तो वो भी अपने मोक्ष मार्ग में बाधक ही है।
👉मूल श्लोकः
इच्छा द्वेषः सुखं दुखं संघातश्चेतनाधृतिः।
एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्।।13.7।।
इच्छा, द्वेष, सुख, दुख, संघात, आत्मशक्ति और धृति--इसमें पोषक तत्वसंहित यह क्षेत्र संक्षेप में कहा गया है।
अब जिन इच्छा आदिको वैशेशिकमतावलंबी आत्माके धर्म मानते हैं वे भी क्षेत्रके ही धर्म हैं आत्माके नहीं यह बात भगवान कहते हैं --, इच्छा -- जिस प्रकारके सुखदायक विषयका पहले उपभोग किया गया था फिर वैसा ही पदार्थ के होने पर प्राप्त होने वाला सुखका कारण समझकर मनुष्य उसे लेना चाहता है वह चाहत है नाम की चाहत वह अन्तःकरण का धर्म है और ज्ञेय होने के कारण क्षेत्र है। तथा द्वितीय--जिस प्रकार के पदार्थको दुःखका कारण समझकर पहले अनुभव हुआ हो फिर एक ही जाति के पदार्थ के प्राप्त होने पर कौन सा मनुष्य द्वेष करता है उस भावका नाम क्या है वह भी ज्ञेय होनेके कारण क्षेत्र ही है। वही प्रकार सुख कौन सा उपयुक्त आशारूप और सात्विक है ज्ञेय होने के कारण क्षेत्र ही है तथा विपरीतरूप दुःख भी ज्ञेय होने के कारण क्षेत्र ही है। देह और इंद्रियोंका समूह संघ के सदस्य हैं। प्रकाशित हुई जो अन्तःकरणकी वृत्ति है जो अग्निसे कलश लोहपिण्डकी भाँति आत्मचैतन्यके आभासरूपसे व्याप्त है वह स्वयं भी ज्ञेय होनेके कारण क्षेत्र ही है। व्याकुल हुए शरीर और इन्द्रियादि किस आधार पर मिलते हैं? वह धृति भी ज्ञेय होने से ही क्षेत्र है। अंतःकरण के लिए समस्त धर्मों का संकेत करने के लिए यहां इच्छादि धर्मों का ग्रहण किया गया है। कौन सा कुछ कहा गया है उनके उपसंहार हैं--महत्तत्त्वदि अलवरसे सम्मिलित क्षेत्रका इसका स्वरूप संक्षेपसे कहा गया है। अर्थात् जिन समस्त क्षेत्रभेदोंका समूह में यह शरीर क्षेत्र ऐसा कहा गया है महाभूतोंसे लेकर धृतिपर्यन्त भेदोंसे अलग-अलग उस क्षेत्र की व्याख्या कर दी गई। जो आगे कहे जानेवाले विशेष क्षेत्र से सम्बंधित है? जिस क्षेत्रज्ञ को प्रभावयुक्त जन लेने से (मनुष्य) अमृतरूप हो जाता है? भगवान स्वयं वाम आश्रम ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि, अन्य वचनों से विशेषों सहित।
संक्षेप में ऐसे समझें:
इस श्लोक का भावार्थ और व्याख्या निम्नलिखित है:
इस श्लोक में, भगवान श्रीकृष्ण ने
क्षेत्र (शरीर)
क्षेत्रज्ञ (आत्मा) इन दोनों के बीच के संबंध को समझाने के लिए एक विस्तृत व्याख्या दी है।
श्लोक का पहला भाग कहता है:
इच्छा द्वेषः सुखं दुखं संघातश्चेतनाधृतिः
इसका अर्थ है:
इच्छा (कामना),
द्वेष (घृणा),
सुख (आनंद),
दुख (पीड़ा), संघात (शरीर के अवयवों का संयोजन),
चेतनाधृति (जीवन शक्ति)
ये सभी क्षेत्र (शरीर) के गुण हैं।
श्लोक का दूसरा भाग कहता है:
एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्
इसका अर्थ है:
यह क्षेत्र (शरीर) समग्र रूप से विकारों से युक्त है, जैसा कि ऊपर वर्णित है।
इस श्लोक में, भगवान श्रीकृष्ण ने
क्षेत्र (शरीर) के गुणों और विकारों का वर्णन किया है, जो क्षेत्रज्ञ (आत्मा) के साथ जुड़े हुए हैं। यह श्लोक हमें यह समझने में मदद करता है कि क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के बीच का संबंध कैसे काम करता है।
जिनमें इनके गुण अवगुण है।
क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के गुण और अवगुण भगवद गीता में वर्णित हैं। यहाँ उनका विवरण दिया गया है:
क्षेत्र (शरीर) के गुण:
1. इच्छा (कामना)
2. द्वेष (घृणा)
3. सुख (आनंद)
4. दुख (पीड़ा)
5. संघात (शरीर के अवयवों का संयोजन)
6. चेतनाधृति (जीवन शक्ति)
7. विकार (दोष)
8. अविद्या (अज्ञानता)
क्षेत्र (शरीर) के अवगुण:
1. मोह (माया का प्रभाव)
2. अज्ञानता (अविद्या)
3. द्वेष (घृणा)
4. क्रोध (क्रोध)
5. लोभ (लालच)
6. मादकता (नशा)
7. अहंकार (अहंकार)
क्षेत्रज्ञ (आत्मा) के गुण:
1. ज्ञान (ज्ञान)
2. विज्ञान (विशेष ज्ञान)
3. असंगता (माया से अलगाव)
4. शुद्धता (पवित्रता)
5. निर्लेपता (माया से अलगाव)
6. निर्विकारिता (विकारों से मुक्ति)
7. निराकारिता (आकार से मुक्ति)
क्षेत्रज्ञ (आत्मा) के अवगुण:
क्षेत्रज्ञ (आत्मा) के अवगुण नहीं होते हैं, क्योंकि वह माया से अलग और विकारों से मुक्त होता है।👈
आध्यात्म ज्ञान के लिए दो ही सूत्र होते हैं
(1) शास्त्र आज्ञा
(2) शास्त्र निषिद्ध आज्ञा
विज्ञान के लिए
वैज्ञानिक विधि है में ज्ञान
जिसका उपयोग विभिन्न प्रकार के पदार्थों के गुणों और विशेषताओं का अध्ययन करने के लिए किया जाता है।
यह विधि विशेष रूप से पदार्थों के रासायनिक और भौतिक गुणों का अध्ययन करने के लिए उपयुक्त है।
इस के विवेचन के मुख्य चरण निम्नलिखित हैं:
1. *नमूना तैयारी*:
2. *विश्लेषण*:
3. *डेटा विश्लेषण*:
4.*चौथा चरण* अलग अलग जगह प्रयोग करना
1. *नमूना तैयारी*: पदार्थ का नमूना तैयार किया जाता है और उसे विश्लेषण के लिए तैयार किया जाता है।
2. *विश्लेषण*: नमूने का विश्लेषण विभिन्न प्रकार के उपकरणों और तकनीकों का उपयोग करके किया जाता है, जैसे कि एक्स-रे फ्लोरोसेंस, इन्फ्रारेड स्पेक्ट्रोस्कोपी, और न्यूक्लियर मैग्नेटिक रेजोनेंस।
3. *डेटा विश्लेषण*: विश्लेषण के परिणामों का विश्लेषण किया जाता है और पदार्थ के गुणों और विशेषताओं के बारे में निष्कर्ष निकाले जाते हैं।
4. *चौथे चरण में* विस्तृत विवेचन के लाभ जो निम्नलिखित हैं:
1. *विस्तृत जानकारी*: यह विधि पदार्थों के गुणों और विशेषताओं के बारे में विस्तृत जानकारी प्रदान करती है।
2. *उच्च सटीकता*: एलामिक विस्तृत विवेचन के परिणाम उच्च सटीकता के साथ प्राप्त किए जा सकते हैं।
3. *विभिन्न पदार्थों का अध्ययन*: यह विधि विभिन्न प्रकार के पदार्थों के अध्ययन के लिए उपयुक्त है, जैसे कि धातुएं, प्लास्टिक, और जैविक पदार्थ।
वैज्ञानिक विस्तृत विवेचन के अनुप्रयोग निम्नलिखित हैं:
1. *वैज्ञानिक अनुसंधान*: यह विधि वैज्ञानिक अनुसंधान में पदार्थों के गुणों और विशेषताओं का अध्ययन करने के लिए उपयुक्त है।
2. *उद्योग*: वैज्ञानिक विस्तृत विवेचन का उपयोग उद्योग में पदार्थों के गुणों और विशेषताओं का अध्ययन करने के लिए किया जाता है।
3. *चिकित्सा*: यह विधि चिकित्सा में जैविक पदार्थों के गुणों और विशेषताओं का अध्ययन करने के लिए उपयुक्त है।
*परीक्षा*
आध्यात्म की हो या कोई और
परीक्षा एक प्रकार की प्रोफेशनल परीक्षा है जो कि
सभी के आयोजित की जा सकती है। यह परीक्षा उन व्यक्तियों के लिए है जो कि आध्यात्म,रसायन, विज्ञान, भौतिक, विज्ञान, गणित, और इंजीनियरिंग, जैसे क्षेत्रों में अपना करियर बनाना चाहते हों।
निम्नलिखित विषयों पर ही प्रश्न पूछे जाते हैं:
1. रसायन विज्ञान
2. भौतिक विज्ञान
3. गणित
4. इंजीनियरिंग
5. विज्ञान और प्रौद्योगिकी
6.आध्यात्म ज्ञान को विज्ञान से जोड़ कर (इस में प्रत्यक्ष ज्ञान और कुछ मुहावरे कुछ वेद पुराण के कहे वचन समलित होते है)
परीक्षा का प्रारूप आमतौर पर मौखिक, लिखित परीक्षा के रूप में हो सकता है,
जिसमें प्रश्नों का उत्तर देने के लिए उम्मीदवारों को एक निश्चित समय सीमा भी दी जा सकती है।
इस परीक्षा को पास करने से उम्मीदवारों को निम्नलिखित लाभ मिल सकते हैं:
1. किसी कंपनी में नौकरी के अवसर
2. अन्य कंपनियों में नौकरी के अवसर
3. विश्वविद्यालयों और अनुसंधान संस्थानों में अध्ययन और अनुसंधान के अवसर
4. प्रोफेशनल सर्टिफिकेशन और मान्यता
यह परीक्षा उन व्यक्तियों के लिए उपयुक्त है जो कि विज्ञान और ज्ञान के प्रौद्योगिकी क्षेत्र में अपना करियर बनाना चाहते हो। और अपनी पसंद कंपनी उद्योग में नौकरी करने के इच्छुक हैं।
या अपनी प्रगति को प्राप्त करने के इच्छुक है।
अगर कोई आध्यात्म द्वारा अपनी और समाज की प्रगति करना चाहे तो उसे निम्न अध्ययन की आवश्यकता होगी
आध्यात्म में मनुष्य अपनी और अपने समाज की प्रगति के लिए निम्नलिखित विषयों का अध्ययन कर सकता है:
1. आत्म-ज्ञान: आत्म-ज्ञान का अर्थ है अपने आप को समझना और अपनी आत्मा की प्रकृति को समझना।
2. ध्यान और योग: ध्यान और योग आध्यात्मिक प्रगति के लिए महत्वपूर्ण हैं। ये विषय मनुष्य को अपने मन और शरीर को नियंत्रित करने में मदद करते हैं।
1. नैतिकता और सदाचार: नैतिकता और सदाचार आध्यात्मिक प्रगति के लिए आवश्यक हैं। ये विषय मनुष्य को अपने जीवन में उचित निर्णय लेने में मदद करते हैं।
2. आध्यात्मिक ग्रंथ: आध्यात्मिक ग्रंथ, जैसे कि उपनिषद, भगवद गीता, और वेद, आध्यात्मिक प्रगति के लिए महत्वपूर्ण हैं। ये ग्रंथ मनुष्य को आध्यात्मिक ज्ञान और समझ प्रदान करते हैं।
1. सामाजिक सेवा: सामाजिक सेवा आध्यात्मिक प्रगति के लिए आवश्यक है। ये विषय मनुष्य को अपने समाज में योगदान करने और दूसरों की मदद करने में मदद करते हैं।
इन विषयों का अध्ययन करके, मनुष्य अपनी और अपने समाज की प्रगति के लिए आवश्यक ज्ञान और समझ प्राप्त कर सकता है।
फिर उसे किसी डिग्री ,या उपाधि की भी जरूरत नहीं होती। वो अपने ज्ञान ,कर्म ,भगति , द्वारा ही पूर्ण हो सकता है।
अब उसे और कुछ करने आवश्यकता ही नहीं होती है।
ऐसे व्यक्ति को और क्या करने की आवश्यकता हो सकती है, यह निम्नलिखित हो सकते हैं:
1. *आत्म-निरीक्षण और आत्म-मूल्यांकन*: वह अपने जीवन और अपने कर्मों का निरीक्षण और मूल्यांकन करता रहे, ताकि वह अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए निरंतर प्रयास कर सके।
2. *दूसरों की सेवा और सहायता*: वह दूसरों की सेवा और सहायता करने के लिए प्रयास करे, ताकि वह अपने समाज में योगदान कर सके और दूसरों की जिंदगी में सकारात्मक परिवर्तन ला सके।
3. *आध्यात्मिक ज्ञान का प्रसार*: वह आध्यात्मिक ज्ञान का प्रसार करने के लिए प्रयास करे, ताकि वह दूसरों को भी आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने में मदद कर सके।
4. *आत्म-शांति और आत्म-तृप्ति*: वह आत्म-शांति और आत्म-तृप्ति की दिशा में निरंतर प्रयास करे, ताकि वह अपने जीवन में सच्ची शांति और तृप्ति प्राप्त कर सके।
5.*बार बार अभ्यास* बार-बार अभ्यास करने से व्यक्ति को निम्नलिखित लाभ हो सकते हैं:
1. _ज्ञान की गहराई_: बार-बार अभ्यास करने से व्यक्ति को अपने ज्ञान की गहराई में जाने का अवसर मिलता है।
2. _कौशल की वृद्धि_: अभ्यास करने से व्यक्ति के कौशल में वृद्धि होती है और वह अपने कार्यों को अधिक कुशलता से कर सकता है।
3. _आत्म-विश्वास की वृद्धि_: बार-बार अभ्यास करने से व्यक्ति का आत्म-विश्वास बढ़ता है और वह अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए अधिक आत्मविश्वासी होता है।
4. _आध्यात्मिक विकास_: अभ्यास करने से व्यक्ति का आध्यात्मिक विकास होता है और वह अपने जीवन में अधिक शांति और तृप्ति प्राप्त कर सकता है।
*❖════❃≛⃝❈⬤🪷
अब यह स्पष्ट होता है कि आध्यात्मिक ज्ञान और वैज्ञानिक ज्ञान दोनों ही महत्वपूर्ण हैं और एक दूसरे के पूरक हैं।
आध्यात्मिक ज्ञान हमें अपने आप को समझने, अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने, और अपने जीवन में शांति और तृप्ति प्राप्त करने में मदद करता है। जबकि वैज्ञानिक ज्ञान हमें प्राकृतिक जगत को समझने, के नए आयाम स्पष्ट करता है। कि आध्यात्मिक ज्ञान और वैज्ञानिक ज्ञान दोनों ही एक दूसरे के बिना अधूरे हैं। आध्यात्मिक ज्ञान के बिना, वैज्ञानिक ज्ञान हमें पूरी तरह से संतुष्ट नहीं कर सकता है, जबकि वैज्ञानिक ज्ञान के बिना, आध्यात्मिक ज्ञान हमें पूरी तरह से समझने में मदद नहीं कर सकता है।
इसलिए, यह महत्वपूर्ण है कि हम आध्यात्मिक ज्ञान और वैज्ञानिक ज्ञान दोनों को एक साथ मिलाकर अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए प्रयास करें।
⬤≛⃝❈❃════❖*
✍️*"परमात्मा" कहते है कि जो "मानव" अपनी "निंदा" सुन लेने के बाद भी "शांत" है... वह सारे "जगत" पर "विजय" "प्राप्त" कर लेता है...!!!*
*अमृतवेला ट्रस्ट*
*जी मानव अपनी निदा सुन कर चुप हो जाता है*
*अब इसे गीता के माध्यम से विचार करने पर भी देखे*
*भगवद गीता में, भगवान श्रीकृष्ण ने अहंकार, निंदा, और दूसरों की निंदा के प्रति मनुष्य के व्यवहार को संबोधित करते हुए कई महत्वपूर्ण शिक्षाएँ दी हैं। यहाँ आपके द्वारा उठाए गए विषय के संदर्भ में गीता के विचार ही प्रस्तुत हैं:*
👉 निंदा और सहनशीलता* (शांति का महत्व)
*भगवान गीता में अहंकार और अपमान के प्रति सहनशीलता और स्थिरता का मार्ग सुझाते हैं।
अध्याय 2, श्लोक 14
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत॥
भावार्थ:
*हे अर्जुन! सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख जैसे अनुभव अस्थायी हैं और आते-जाते रहते हैं। इन्हें सहन करना सीखो।*
*भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक में सिखाते हैं कि निंदा, अपमान, या अस्थायी कष्टों के प्रति सहनशील होना ही मनुष्य की स्थिरता का संकेत है। यह शांति का मार्ग है।*
*👉माता-पिता और समाज के कर्तव्य (कर्म का महत्व)*
*गीता में माता-पिता को देवताओं के समान पूजनीय माना गया है। उनकी सेवा और सम्मान धर्म का अंग है।*
*समाज में माता पिता की आयु के सभी जाती वर्ण के लोगों के साथ अपने माता पिता के समान ही कर्तव्य करना होता हे*
भाई के बराबर के भाई बहन के बराबर सब बहने या सार समाज है*
*ना कि ब्राह्मण समाज आर्य समाज या अन्य सभी समाज*
अध्याय 17, श्लोक 14:
देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्।
ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते॥
भावार्थ:
*देवता, ब्राह्मण, गुरु और माता-पिता का पूजन करना, पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा को शारीरिक तप कहा गया है।*
*माता-पिता और समाज की निंदा का विरोध करना उनके प्रति धर्म और कर्तव्य का हिस्सा है, क्योंकि उनकी रक्षा और सम्मान करना पुत्र/पुत्री का प्रमुख धर्म है।*
*अब धर्म और अधर्म का भेद*
*गीता में स्पष्ट किया गया है कि धर्म का पालन करते हुए अधर्म का विरोध करना अनिवार्य है।*
अध्याय 3, श्लोक 21:
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥
भावार्थ:
*श्रेष्ठ व्यक्ति जो भी आचरण करता है, अन्य लोग उसका अनुसरण करते हैं। वह जो आदर्श प्रस्तुत करता है, लोग उसी को मानते हैं।*
*इस संदर्भ में भी, अपने माता-पिता समाज की निंदा का विरोध करना धर्म का हिस्सा है, क्योंकि ऐसा आचरण आने वाली पीढ़ियों के लिए उदाहरण प्रस्तुत करता है।*
*👉अपने धर्म का पालन* *(स्वधर्म का महत्व)*
अध्याय 18, श्लोक 47:
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥
भावार्थ:
*अपने धर्म का पालन करना, भले ही वह दोषपूर्ण हो, दूसरों के धर्म का अनुसरण करने से श्रेष्ठ है।*
*माता-पिता की रक्षा, समाज और सम्मान स्वधर्म का हिस्सा है। यदि उनकी निंदा की जाती है, तो इसे रोकने के लिए उचित कदम उठाना धर्म संगत है।*
*विशेष: शस्त्र और अहिंसा का भेद*
*गीता में हिंसा या शस्त्र उठाने को केवल धर्म की रक्षा के लिए उचित बताया गया है। निंदा के जवाब में हिंसा को उचित नहीं ठहराया गया, बल्कि तर्क और संवाद के माध्यम से सच्चाई की रक्षा करने की सलाह दी गई है।*
अध्याय 16, श्लोक 3:
तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहोनातिमानिता।
भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत॥
भावार्थ:
*क्षमा, धैर्य, और अहंकार रहित आचरण ही दैवी गुणों का लक्षण हैं।*
*निष्कर्ष:*
*गीता के अनुसार, निंदा के प्रति शांति और सहनशीलता बनाए रखना श्रेष्ठ गुण है। लेकिन माता-पिता की निंदा सहन करना धर्म विरुद्ध है। यह आवश्यक है कि उनकी रक्षा, सम्मान, और प्रतिष्ठा बनाए रखी जाए। यदि उनकी निंदा हो रही हो, तो उसे रोकना पुत्र/पुत्री का धर्म है।*
*👉ना कि भाई चारा निभाना*
*आपका विचार कि "सच, सत्य के रूप में मनुष्य अपनी निंदा को सुन कर शायद इस लिए भी शांत रहता हो स्थायी है," गीता के उपदेशों से मेल खाता है। सत्य और धर्म का पालन ही जीवन का उद्देश्य है।*
रामायण जी से
इस पोस्ट पर
💧 *_आज का मीठा मोती_*💧
_*20 नवंबर:–*_ दूसरो की बुराई करना जैसे दूसरे की गंदगी को उठाना है अतः बुराई को न देख सबकी अच्छाई ही देखे।
🙏🙏 *_ओम शान्ति_*🙏🙏
🌹🌻 *_ब्रह्माकुमारीज़_*🌻🌹
💥🇲🇰💥🇲🇰💥🇲🇰💥🇲🇰💥🇲🇰
*क्या बुराई बुरे की नहीं होनी चाहिए?*
*सोच है तो विचार भी है*
*विचार है तो जवाब भी है*
*बुरे की बुराई में क्या , और दूसरे की बुराई में क्या अपना पराया देखना धर्म होता है?*
*❖════❃≛⃝❈⬤🪷 *जब धर्म ज्ञान की*
*क्लास लगती है सभी की वाट लगती है*
⬤≛⃝❈❃════❖*
*अपना पराया "मोह है" यही से उत्पन होता अहंकार और क्रोध है*
⬤≛⃝❈❃════❖*
*दूसरों की गंदगी उठाना इस में छिपे ज्ञान का कमाल है जो दिखाता मानसिकता को कि कॉपी पेस्ट का कमाल है*
*किसी के सवाल का जवाब वही देते है जो कॉपी पेस्ट से बचते हैं।*
⬤≛⃝❈❃════❖*
*अब गंदगी उठाने पर आते है*
*शबरी माता को तो हम सभी जानते है कि नहीं?*
*अपने घर से ले कर दूर तक जब लोग सो रहे होते हैं रास्ते पर झाड़ू लगाती थी रामायण इस का प्रमाण है*
*आज तो शिक्षा बदल दी घर की सफाई करो कूड़ा दूसरे के दरवाजे की ओर अपना कूड़ा धकेल दो*
*तभी तो राम भी शबरी के घर ही आते है*
*जय श्री राम तो बोलना पड़ेगा*
*गीता खोलो पढ़ो आगे बढ़ो*
अनमोल सूत्र भगवद गीता अध्याय: 5
श्लोक 6
श्लोक:
सन्न्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः।
योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति॥
भावार्थ:
परन्तु हे अर्जुन! कर्मयोग के बिना संन्यास अर्थात् मन, इन्द्रिय और शरीर द्वारा होने वाले सम्पूर्ण कर्मों में कर्तापन का त्याग प्राप्त होना कठिन है और भगवत्स्वरूप को मनन करने वाला कर्मयोगी परब्रह्म परमात्मा को शीघ्र ही प्राप्त हो जाता है
॥6॥
भाव अनमोल सूत्र
मन, इन्द्रिय और शरीर द्वारा होने वाले सम्पूर्ण कर्मों में कर्तापन का त्याग कर पाना बहुत कठिन है।पर खाते ,पीते, सोते,जागते घूमतेफिरते भगवान का स्मरण कठिन होते हुए भी कढ़िन नहीं होता।जैसे यह शरीर आपका मंदिर है इस में आत्मा रूप में आप परमात्मा हो।बुद्धि सरस्वती माता आप हो।आप के साथ चलने वाले आप के नोकर है। और विषयों के अधीन हो जो खाता,पिता,देखता,सुनता,बोलता,स्पर्श करता हूं आप की पूजा है।निद्रा आप की समाधि,चलना फिरना आप की प्रदक्षिणा है मेरे वचन आप की स्तुति है ऐसे आराधना करते हुए कर्म में लीन होने को भगवान बताते या इशारा करते नजर आते है।
अनमोल सूत्र
भगवद गीता अध्याय: 5
श्लोक 13
श्लोक:
(ज्ञानयोग का विषय )
सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी।
नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन्॥
भावार्थ:
अन्तःकरण जिसके वश में है, ऐसा सांख्य योग का आचरण करने वाला पुरुष न करता हुआ और न करवाता हुआ ही नवद्वारों वाले शरीर रूप घर में सब कर्मों को मन से त्यागकर आनंदपूर्वक सच्चिदानंदघन परमात्मा के स्वरूप में स्थित रहता है
॥13॥
❤️भगवान ने यंत्र, मंत्र,तंत्र ,योग,भोग,रोग ,पाठ चालीसे, आसन ,माला, कंठी कई प्रकार के कठिन कर्मों से मुक्त होने का सरल सा साधन बता दिया❤️
*🌞शुभ प्रभात🌞*
*✍️आज का अनमोल ज्ञान*
*मन ❤️ टूटता है आत्मा नहीं*
*मन चंचल होता है वायु से तेज गति वाले मन में "आत्मा" का वास होता है*
*आत्मा खुद परमात्मा है उसे कौन मजबूत ,या कमजोर कर सकता है?*
*हम जिसे भजते हैं पूजते है उसका बल बढ़ता है*
*चोर,दंभी,देवी,देवता,माता पिता और भाई बहन जिसे पूजो उसी का बल बढ़ता है*
*आत्मा स्वयं बलवान है अविनाशी है इसे कोई काट नहीं सकता,कोई जला नहीं सकता , कोई सूखा नहीं सकता*
*फिर भी माया रूपी वॉट्सएप यूनिवर्सिटी का ज्ञान ऐसे भ्रम को ही बढ़ावा देता है*
*जिस में ज्ञान वान ब्राह्मण को लिप्त नहीं होना चाहिए*
भगवद गीता अध्याय: 2
श्लोक 3
श्लोक:
क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप॥
*भावार्थ:*
*इसलिए हे अर्जुन! नपुंसकता को मत प्राप्त हो, तुझमें यह उचित नहीं जान पड़ती। हे परंतप! हृदय की तुच्छ दुर्बलता को त्यागकर युद्ध के लिए खड़ा हो जा*
॥3॥
*गीता पड़ो आगे बढ़ो*
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 30
श्लोक:
गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्वक्चैव परिदह्यते।
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः॥
भावार्थ:
हाथ से गांडीव धनुष गिर रहा है और त्वचा भी बहुत जल रही है तथा मेरा मन भ्रमित-सा हो रहा है, इसलिए मैं खड़ा रहने को भी समर्थ नहीं हूँ।
॥30॥
(पारिवारिक सामाजिक मोह पाश में जकड़ा अर्जुन घबराई हुई हालत में नजर आ रहे हैं और अपने ही ज्ञान से भयभीत हो जाते है)
जिस का प्रमुख कारण
ही माया रूपी वॉट्सएप यूनिवर्सिटी से प्राप्त ज्ञान है
अनमोल सूत्र
✍️
*❖════❃≛⃝❈⬤
🪷*सूर्य भगवान जिनको भगवान ने पहले ज्ञान दिया था*
⬤≛⃝❈❃════❖*
भगवद गीता अध्याय: 4
श्लोक 3
श्लोक:
स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः।
भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्॥
भावार्थ:
तू मेरा भक्त और प्रिय सखा है, इसलिए वही यह पुरातन योग आज मैंने तुझको कहा है क्योंकि यह बड़ा ही उत्तम रहस्य है अर्थात गुप्त रखने योग्य विषय है
॥3॥
भगवद गीता अध्याय: 4
श्लोक 1
श्लोक:
( सगुण भगवान का प्रभाव और कर्मयोग का विषय ) श्री भगवानुवाच इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्।
विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्॥
भावार्थ:
श्री भगवान बोले- मैंने इस अविनाशी योग को सूर्य से कहा था, सूर्य ने अपने पुत्र वैवस्वत मनु से कहा और मनु ने अपने पुत्र राजा इक्ष्वाकु से कहा
॥1॥
जो दर्शाता है भगवान गुरु थे और सूर्य चेला।
सूर्य आज भी हमारे साथ हैं चाहे हम इस देश में हों या प्रदेश में!
उसका हाथ सदा हमारे सर पर ही रहता है।जब कि आज हम जिस को गुरु मान लेते है उस की देह ने नाश होना ही होना है आज के इस लेख में हम अविनाशी, और नाशवान गुरु दोनों ही पर विचार करते हे।
❤️
*देखे गुरु आज के वर्ण संकर बनवाते , बड़वाते कैसे पाप*
पुजवा के अपने पांव,
पांव पुजवाते नारी से जिसे दुर्गा की शक्ती बताते शास्त्र
पाप डराता मुझे
ऐसी नार को होते पित्र अधोगति को प्राप्त
जो रास्ता दिखाए
खुद भगवान
क्यों ना कहूं
उसे महान
रहबर भी तो दिखाते हे रास्ते कितने सुन्दर भाव से
दिखाते रास्ता गुरु भी जो नर्कों को ले जाते
जो काम अधर्म के सिखाते
जो सनातन धर्म और शास्त्र से हो बाहर
निन्दनिय है आचरण उन सब का
छल कपट हो मन का तन को शिंगारा हो
धर्म वह पाप है जिस में धर्मी न होने की पहिचान हो
पाप वह भी अधर्म है जो भाई भाई को लडवाता हो
पापी तो वह गुरु भी है जो आत्मा को भूत प्रेत बताता हो
अधर्मी बनाता कर्म ऐसा जिस का फल भी बुरा आता हो
अधर्मी पालता तन को हँसे
जैसे नहीं घो कुत्ता मिट्टी मे जा लोटा हो
अधर्म है। माता पिता को दोशी कहना
चोरी चुगली चिंगारी नफरत की भाषा से भरना
लड़ना झगड़ना पडोसी से बनना व्यभिचारी क्या वो ही
अधर्म है
सबसे बड़ा अधर्म तो है अबला को असहाये कहना
उनपर पर जुलम करना दम्मी और दुराचारी बनना
किसी दूसरे को भगवान जैसा समझना
शास्त्र आज्ञा विरुद्ध चलना पाप तो बडता है
अधर्म से धर्म की रक्षा को, लेते भगवन अवतार ।
कया यही प्रेम है भगवान से तुम्हारा जो फिर से ले अबतार खुद चाहते हो मोक्ष इस लोक से क्या इसके लिए अवतारों की कुरबानी चाहोगे
या खुद ही पकड़ो वो राह धर्मकी
या फिर से राम को बन में मटकावेगे
कृष्ण मरवाओगे फिर जरा हाथों या नानक गोविन्द की खाल फिर से खिंचवाओ गे।
क्या ऐसा फिर करोगे
कितने और यशु सूली पर लटकवाओगे यही प्रेम है तुमहारा
कया था यही प्रेम उनके प्रति दिखलाओ गे
❤️प्रेम का फल कैसा पावोगे❤️
सुनो समझो ओ दिवानों करो कर्म-धर्म-शर्म को अपनाकर वरना दिन वो अब दूर नहीं जब मिटा देगा वो तेरी ही हसली को आकर
सोचा क्या करते हो, धर्म, कर्म और बिना शर्म
तुम्हें स्वर्ग मिलेगा
या भगवान तुझे बहुत अच्छा कहेगा
बडते ही पाप के दोगला कहलायेगा
न आवेगा ना रहे गा भगवान का न गुरु का चेला ही तुझे कहा जायेगा
धोबी के घाट का..... कहा जाए गा
बनना है तो बन चेला अविनाशी गुरु का वहीं साथ तेरा निभावेगा
वरना गुरु आचार्य द्रोण जैसा गुरु भी तुझ को मरवाएगा
पाप बाड़ेगा और वर्ण ही दोगला हो जावेगा धर्म कर्म शर्म को अपना ये गा अगर तभी सन्तानी भगवान का कहलायेगा।
(मेरी 1980 की एक लिखित का यह कटा फ़टा कागज का टुकड़ा आज रद्दी में पढ़ा मिला जिसको यहां आप देख रहे है।)
अब आते है कलयुगी गुरु की पहचान करते है।
एक ड्रेस में मोटा झोटा ऊंचे आसान पर बैठा बड़ा ही भारी कलयुगी गुरु
जो आप के चढ़ावे से प्राप्त बड़ी बड़ी गाड़ियों में घूमता है और आप उसकी गाड़ी रूपी रथ के पीछे पीछे भाग रहे होते है। मुझे भी दिख जाता है। कई लोगों को यही से वैराग्य होता है तो कुछ को ज्ञान सभी आपस में एक दूसरे को देख मंद मंद मुस्कुराते ना जाने क्या कह रहे होते है।
प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं तो क्या इसे निंदा करना कहो गे मुझे इस से कोई फर्क नहीं पड़ता।
अगली पहचान की ओर बढ़ते है
ऊंट तो आप सभी ने देखा ही होगा ना उस से ऊंचा किस मनुष्य गुरु को मैने तो नहीं देखा। जिन की गाड़ियों के पीछे दौड़ लगाते चेलों को देखा था।
ऊंट तो ऐसा गुरु हे जो सारा दिन बोझ उठा कर बिना थके कमाई करता है। और उस को आप ही को दे देता है। आप का पक्का मकान उसकी कमाई से बन जाता है। खुद गर्मी,सर्दी,बरसात,जिसमें गड़े भी गिरते हैं। बाहर खुले में झेल लेता है।पर आपके घर जो उसकी कृपा रूपी कमाई से बना है।में आश्रय नहीं लेता ना ले ही सकता है।
चलिए एक ओर गुरु की पहचान देखने में आ गई सोचा उसे भी साझा कर ही दूं
वो है सफेद का पेड़ बहुत ऊंचा होता है। बड़ा भारी गुरु होताता है। जब इसकी छाया की जरूरत होती है तो यह छाया आप को नहीं पड़ोसियों को देता है। आप को नहीं , अगर इसकी लकड़ी की जरूरत हो तो दूसरों के घर पर गिर नया पंगा खड़ा कर देता है बैठे बिठाए मारपीट दंगा फसाद कोर्ट कचहरी के चक्कर लगवा देता है।
🌹अब असली गुरु की पहचान भी जरूरी हो जाती है उस पर भी एक नजर हो जाए🌹
आम का पेड़ जिस का सब कुछ आपको समर्पित होता है। अपना फल वो खुद नहीं खाता आप को दे देता है अगर उसकी लकड़ी की जरूरत हो तो वह उसके लिए भी त्यार ही रहता है।हर तरफ से आप ही का लाभ ही करता है
अंत सार रूपी भाव
अगर घर में बेरी का पेड़ रूपी गुरु लगा दिया तो सारी उम्र कांटे ही बिनते रहेंगे।इतना ही नहीं बेर पाने की लालस से बाहर से फेंके जाने वाले पत्थर अलग से दुखी करें गे।
इस को ध्यान से पढ़ने का धन्यवाद।फिर मिलते है।
✍️ प्रस्तुत लेख को गीता के विभिन्न श्लोकों से जोड़ने का प्रयास किया जा सकता है। गीता में गुरु, ज्ञान, धर्म, और सत्य पर आधारित कई श्लोक मिलते हैं। यहाँ कुछ महत्वपूर्ण श्लोक दिए गए हैं जो आपके विचारों को सुदृढ़ करते हैं:
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1. गीता अध्याय 4, श्लोक 34
> श्लोक: "तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया, उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः।"
भावार्थ: ज्ञान प्राप्त करने के लिए समर्पण और सेवा के साथ सच्चे गुरु के पास जाना चाहिए, वही सच्चे ज्ञानी गुरु जो सही मार्गदर्शन करेंगे।
यह श्लोक उन विचारों को स्पष्ट करता है जहाँ आपने सही गुरु की पहचान की बात की है। सच्चे गुरु से ज्ञान प्राप्त करना तभी संभव है जब हम उनके प्रति श्रद्धा और सेवा भाव रखें।
2. गीता अध्याय 2, श्लोक 47
> श्लोक: "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।"
भावार्थ: केवल कर्म पर तुम्हारा अधिकार है, उसके फलों पर नहीं।
इस श्लोक से जुड़े विचार आपने गुरु के संदर्भ में दिए हैं। सच्चा गुरु निष्काम कर्म का मार्ग दिखाता है, न कि किसी भौतिक लाभ या स्वार्थ का।
*🌞दिन से रात 🌝रात से दिन जरू आता है🌞*
*📚संसार भर में अनेकों धर्म ग्रंथों का पाठ होता है, विचार किये जाते हैं, इन में गुणों का मान सुना-सुनाया जाता पर भौतिकता को त्यागने की भावना किसी में दिखाई नहीं देती।*
*तब लोहा रूप मानव संत , रूप कंचन कैसे हो सकता है⁉️*
*किसी के पास इस का जवाब हो तो बता के धन्यवाद के पात्र जरूर बनना‼️*
*जब तक यह मैं-मेरा में खोए रहेंगे। सतिगुर व्यवस्था रूप पारस पर, जब तक कोई व्यक्तित्व गुणसारी नहीं बन उस पारस को,खोज नहीं पाए गा तब तक लोहा रूपी मनुष्य सोना कैसे बन पायेगा❓*
*👉यदि हर "मानव जन्म का ध्येय क्या है, कि गुर बुद्धि का छोटे से छोटा अंश भी अगर व्यक्तित्व ग्रहण कर ले, जब शिशु जन्मा तब स्तन पान किस गुरु ने सिखाया जान ले*
*👉पर जब काम क्रोध,अहंकार, माया का मद भय आदि के सहारे ले दो बेड़ियों पर पर सवार हो मानवता के सभी मूल्यों को लूटवा क्यों लेता है ॥*
*👉जैसे मैं मेरा गुरु बड़ा, में कवि हूं, कुलीन हूं, पंडित हूं, जोगी हूं, सन्यासी हूं, ज्ञानी हूं, गुणी हूं, सूर्मा हूं, दानी हूं, इस प्रकार की दुबुद्धि से कभी छुटकारा ही नहीं करवा पाता तो विचार करो तब हम लोग जीवन मुक्त कैसे होंगे?*
*👉आज तक कितने लोग मुक्त हुए🫵 प्रहलाद के बिना कोई भी सप्त ऋषि मंडल के साथ नजर आता ही नहीं तो धरती पर मुक्ति दिलवाने को कौन क्यों भरमाता है?*
*👉विद्वान जनों का एक मत से कहना है, कि हम इन्सानों का व्यक्तिगत गुर अंश ही उस व्यक्तित्व का मूल पदार्थ रब है एक रब बाकी सब जब (जी का जंजाल है)*
*👉जो पारस है वहीं मुक्ति का पदार्थ है, जिसका संपर्क पा लोहा भी सोना हो जाता है*
*👉बस यही बात सभी 🫵भूल जाते हैं, और किसी ना किसी गुरु से मुक्ति की आस लगा ही बैठते है👌*
*👉मानो जैसे बावरे हो गए हो सभी धर्म ग्रंथ उसी को एक ईश्वर मानते हैं। तब क्या यही मानव प्राण का वो मूलधन नहीं है❓*
*जो मेरा ही नहीं हम सब का आधार और सहारा है🪔*
*✍️उसी पारस को भूलने पर लोहा लोहा ही रह जाता है क्यों कि खुद असली पारस को छोड़ किसी और को पारस मान बैठा है*
*🫵पहले इतना सा जान लो फिर अगला पग उठाओ और भगवद यात्रा पर आनंद से आगे बढ़ते जाओ अगर कभी कहीं रास्ता भटक जाओ तो फिर इसी को पढ़ कर आगे बढ़ना🚶*
*कभी कोई कॉपी पेस्ट भी प्राप्त हो तो इसी के अनुसार विश्लेषण करते रहना जैसे इन वाक्यों का करो गे! गीता ज्ञान ही है सब से सुंदर गहना अपना खुद का अनुभव बता दिया🙏*
*राम राम जय सीता राम🙏*
*🌹कर भला हो भला*
*अंत भले का भला🌹*
3. गीता अध्याय 3, श्लोक 21
> श्लोक: "यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः, स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।"
भावार्थ: श्रेष्ठ व्यक्ति जैसा आचरण करता है, अन्य लोग भी उसी का अनुसरण करते हैं।
सही गुरु का आचरण कैसा होना चाहिए, यह श्लोक उस पर प्रकाश डालता है। जो गुरु स्वयं धर्म का पालन करता है, वही दूसरों को सही दिशा दिखा सकता है। इस श्लोक के अनुसार जो गुरु खुद के आचरण से उदाहरण प्रस्तुत करता है, की वही सच्चा गुरु है।
गीता में ज्ञान देने वाले श्री कृष्ण हैं जब कि उसी काल में कृपाचार्य, गुरु द्रोण जैसे दूसरे भी बहुत से गुरु थे पर सखा ओ बंधुओं बांधवों की रक्षा हेतु अपनी चिचि अंगुली पर उठाने वाले श्री कृष्ण ही थे।
4. गीता अध्याय 16, श्लोक 23-24
> श्लोक: "यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः।"
भावार्थ: जो व्यक्ति शास्त्र की आज्ञा को छोड़कर अपनी इच्छा से कार्य करता है, उसका मार्ग अशुभ की ओर ही जाता है।
मेरे द्वारा अपने इस लेख में जिन गुरु की आलोचना की है,वह सभी वही है जो शास्त्रों की मर्यादा नहीं रखते, यह श्लोक सच्चा गुरु वही है जो शास्त्रों की मर्यादा को समझता हो और उसका पालन करता हो। कलयुग में तो कुकर मूतों की भांति जगह जगह गुरु देखने को मिल जाते हैं असली कौन नकली कौन अज्ञानी तो जान ही नहीं सकता
5. गीता अध्याय 4, श्लोक 7-8
> श्लोक: "यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।"
भावार्थ: जब-जब धर्म की हानि होती है, तब-तब मैं (भगवान) अधर्म को नष्ट करने के लिए अवतार लेता हूँ।
कलयुग के गलत गुरुओं की आलोचना और अधर्म के उभरने का जिक्र है। यह श्लोक बताता है कि जब समाज में अधर्म बढ़ जाता है, तो भगवान धर्म की स्थापना के लिए अवतरित होते हैं। यह विचार सच्चे गुरु की आवश्यकता को और स्पष्ट करता है, ताकि समाज में अधर्म का नाश हो सके।
6. गीता अध्याय 10, श्लोक 10
> श्लोक: "तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्। ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते॥"
भावार्थ: जो भक्त मुझमें निरंतर प्रेमपूर्वक लगे रहते हैं, मैं उन्हें विशेष बुद्धि प्रदान करता हूँ जिससे वे मेरे पास पहुँच सकते हैं।
यह श्लोक सच्चे गुरु के सानिध्य का वर्णन करता है। भक्त के प्रति सच्चे गुरु का प्रेम उसे ज्ञान के सही मार्ग पर ले जाता है। यह उस सच्चे गुरु की पहचान है जो शिष्य को धर्म का मार्ग दिखाता है।
7. गीता अध्याय 9, श्लोक 22
> श्लोक: "अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते। तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥"
भावार्थ: जो व्यक्ति अनन्य भाव से मेरी भक्ति करता है और मुझमें लगा रहता है, उसके योगक्षेम की मैं स्वयं व्यवस्था करता हूँ। संसार रूपी भवसागर से पार करवाने वाले गुरु से मिलवा देते है भगवान
यह श्लोक उस निःस्वार्थ भक्ति का वर्णन करता है जिसे सच्चा गुरु शिष्य में विकसित करता है। लेख में जिस सच्चे मार्गदर्शक की चर्चा की है, वही गुरु अपने भक्तों के योग-क्षेम की देखभाल करते है,ओर उन्हें सही मार्ग भी दिखाता है।
8. गीता अध्याय 18, श्लोक 66
> श्लोक: "सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥"
भावार्थ: सभी धर्मों को त्यागकर केवल मेरी शरण में आओ। मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूँगा।
यह श्लोक सच्चे समर्पण का वर्णन करता है। यह शरणागति का मार्ग सच्चे गुरु के प्रति भक्त को समर्पण करना सिखाता है। सच्चा गुरु शिष्य को आत्मसमर्पण के मार्ग पर ले जाता है और उसे मुक्ति की ओर अग्रसर करता है।
9. गीता अध्याय 2, श्लोक 7
> श्लोक: "कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः।"
भावार्थ: अर्जुन भगवान से कहता है कि मैं कर्त्तव्य को लेकर संशय में हूँ, इसलिए आप मेरे गुरु के रूप में मुझे सही मार्ग दिखाएँ।
जब अर्जुन स्वयं अपने जीवन में मार्गदर्शन के लिए भगवान श्रीकृष्ण को अपना गुरु स्वीकार करते हैं, धारण करते है बिना कुछ भेंट दक्षिणा के वो भी युद्ध के मैदान तो
क्या यह हमारे लिए भी प्रेरणा नहीं है कि हम एक सच्चे मार्गदर्शक का चयन कैसे करें।गुरु की पहचान के संदर्भ में काफी वितर से बता चुका हूं क्या यह प्रासंगिक नहीं है?
10. गीता अध्याय 13, श्लोक 8-12
> श्लोक: "अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्।"
भावार्थ: गीता में बताई गई ‘ज्ञान’ की परिभाषा में विनम्रता, अहिंसा, शुद्धता, आदि गुणों को ज्ञान कहा गया है।
इन गुणों से भरे हुए व्यक्ति को ही सच्चा गुरु कहा जा सकता है। इस लेख में भी यही भावना है कि जो गुरु शिष्य के मार्गदर्शन के लिए स्वयं में विनम्रता और अहिंसा जैसे गुण रखता है, वही सही मार्गदर्शक है।
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इन श्लोकों के माध्यम से यह कहा जा सकता है कि गीता में गुरु की पहचान, धर्म के मार्ग का चुनाव, और सही आचरण का विचार बहुत गहराई से प्रस्तुत किया जा रहा है। फिर भी होने वाली किसी भी त्रुटि के लिए क्षमा प्रार्थी हूं,क्यों कि इंसान ही गलतियों का पुतला होता है।गुरु नहीं।
precious formula
अनमोल सूत्र
*❖════❃≛⃝❈⬤
🪷🌹🍁
✍️*हिन्दू कौन है?
हिन्दू शब्द की खोज
हीनं दुष्यति इति हिन्दू:
से हुई है।
अर्थात: जो अज्ञानता और हीनता का त्याग करे उसे हिन्दू कहते हैं ।
हिन्दू ' शब्द, करोड़ों वर्ष प्राचीन, संस्कृत शब्द से है !
यदि संस्कृत के इस शब्द का सन्धि विछेदन करें तो पायेंगे ....
हीन + दू = हीन भावना + से दूर
अर्थात : जो हीन भावना या दुर्भावना से दूर रहे , मुक्त रहे , वो हिन्दू है !
हमें बार - बार, सदा झूठ ही बतलाया जाता है कि *हिन्दु शब्द मुगलों ने हमें दिया , जो " सिंधु " से " हिन्दू " हुआ l हिन्दू को गुमराह किया जा रहा है
हिन्दू शब्द की वेद से ही उत्पत्ति है !
जानिए , कहाँ से आया हिन्दू शब्द और कैसे हुई इसकी उत्पत्ति ?
कुछ लोग यह कहते हैं कि हिन्दू शब्द सिंधु से बना है औऱ यह फारसी शब्द है । परंतु ऐसा कुछ नहीं है ! ये केवल झुठ फ़ैलाया जाता है।हमारे " वेदों " और " पुराणों " में हिन्दू शब्द का उल्लेख मिलता है । आज हम आपको बता रहे हैं कि हमें हिन्दू शब्द कहाँ से मिला है !
"ऋग्वेद" के " ब्रहस्पति अग्यम " में हिन्दू शब्द का उल्लेख इस प्रकार आया हैं :-
“ हिमालयं समारभ्य
यावद् इन्दुसरोवरं ।
तं देवनिर्मितं देशं
हिन्दुस्थानं प्रचक्षते ।"
अर्थात : हिमालय से इंदु सरोवर तक , देव निर्मित देश को हिंदुस्तान कहते हैं !
केवल " वेद " ही नहीं, बल्कि " शैव " ग्रन्थ में हिन्दू शब्द का उल्लेख इस प्रकार किया गया हैं
हीनं च दूष्यतेव् हिन्दुरित्युच्च ते प्रिये ।
अर्थात :- जो अज्ञानता और हीनता का त्याग करे उसे हिन्दू कहते हैं !
इससे मिलता जुलता लगभग यही श्लोक " कल्पद्रुम " में भी दोहराया गया है :
हीनं दुष्यति इति हिन्दूः ।
अर्थात : जो अज्ञानता और हीनता का त्याग करे उसे
हिन्दू कहते हैं ।
" पारिजात हरण " में हिन्दु को कुछ इस प्रकार कहा गया है :-
हिनस्ति तपसा पापां
दैहिकां दुष्टं ।
हेतिभिः श्त्रुवर्गं च
स हिन्दुर्भिधियते ।”
अर्थात :- जो अपने तप से शत्रुओं का , दुष्टों का , और पाप का नाश कर देता है , वही हिन्दू है !
" माधव दिग्विजय " में भी *हिन्दू* शब्द को कुछ इस प्रकार उल्लेखित किया गया है :-
“ ओंकारमन्त्रमूलाढ्य
पुनर्जन्म द्रढ़ाश्य: ।
गौभक्तो भारत:
गरुर्हिन्दुर्हिंसन दूषकः ।"
अर्थात : वो जो " ओमकार " को ईश्वरीय धुन माने , कर्मों पर विश्वास करे , गौ-पालक रहे , तथा बुराइयों को दूर रखे, वो हिन्दू है !
केवल इतना ही नहीं , हमारे *"ऋगवेद" (8:2:41) में हिन्दू* नाम के बहुत ही पराक्रमी और दानी राजा का वर्णन मिलता है , जिन्होंने 46,000 गौमाता दान में दी थी ! और "ऋग्वेद मंडल" में भी उनका वर्णन मिलता है l
बुराइयों को दूर करने के लिए सतत प्रयासरत रहने वाले , सनातन धर्म के पोषक व पालन करने वाले हिन्दू हैं ।
गर्व से कहो हम हिंदू है
🚩 जय जय श्री राम 🚩
⬤≛⃝❈❃════❖*
#धर्मादेश *❖════❃≛⃝❈⬤* *🕉️धर्मादेश ✍️ पहले हिं
By मुडार एस के
*❖════❃≛⃝❈⬤*
*🕉️धर्मादेश ✍️ पहले हिंदू गुरुओं को जगाओ हिंदू खुद जाग जाए गा🪷*
⬤≛⃝❈❃════❖*
*"धर्म का आदेश" या "धार्मिक नियमों और सिद्धांतों का औपचारिक घोषणा।"*
*इतिहास में, धर्मादेश की अवधारणा विभिन्न सभ्यताओं और संस्कृतियों में अलग-अलग समय पर उभरती ही रही है।*
*भारतीय संदर्भ में:*
*प्राचीन वेदिक काल*
*धर्म का आधार वेदों को माना जाता है।* *"धर्मादेश" का पहला औपचारिक उल्लेख वेदों और स्मृतियों में हुआ, जैसे "मनुस्मृति" और "याज्ञवल्क्य स्मृति।" इनमें सामाजिक, नैतिक और धार्मिक नियमों की व्याख्या की गई थी।*
*फिर बौद्धकाल और अशोक का धर्मादेश*
*भारतीय इतिहास में "धर्मादेश" का सबसे प्राचीन और व्यवस्थित उल्लेख सम्राट अशोक के समय (268–232 BCE) में मिलता है।* *अशोक ने अपने शिलालेखों और स्तंभों में "धम्म" (धर्म) के सिद्धांतों का प्रचार किया। उन्होंने धार्मिक सहिष्णुता, अहिंसा, नैतिकता और प्राणीमात्र के कल्याण की बात की।*
*ये धर्माआदेश पत्थरों और स्तंभों पर अंकित किए गए और पूरे साम्राज्य में फैलाए गए थे।*
*पश्चिमी संदर्भ में*
*यहूदी और ईसाई धर्म:*
*बाइबल में "दस आज्ञाएँ" (Ten Commandments) को धर्मादेश का पहला औपचारिक रूप माना जाता है। इसे मूसा को ईश्वर द्वारा प्रदान किया गया था, और यह नैतिक और धार्मिक नियमों का मूल आधार मान लिया गया है।*
*इस्लामिक धर्मादेश*
*इस्लाम में धर्मादेश के रूप में "कुरआन" और "हदीस" का महत्व माना जाता है,*
*जो पैगंबर मोहम्मद के समय (7वीं शताब्दी CE) में स्थापित हुए थे।*
*सार या भाव*
*जहां भारतीय परिप्रेक्ष्य में अशोक के धर्मादेश और वेदों के सिद्धांत प्राचीनतम उदाहरण हैं।*
*वही वैश्विक संदर्भ में, यहूदी धर्म की "दस आज्ञाएँ" और अन्य धार्मिक ग्रंथों में धर्मादेश की अवधारणा भी पाई जाती है।*
*चलिए यह थी धर्मादेश कि उत्पति की धारणा*
*फतवा और धर्मादेश में मूलभूत अंतर धार्मिक, कानूनी और प्रशासनिक दृष्टिकोणों से है।*
*दोनों धार्मिक और नैतिक नियमों का प्रतिनिधित्व करते हैं,* *लेकिन उनकी प्रकृति, प्रयोजन और अधिकार क्षेत्र में विभिन्नता हो जाती है।*
*फतवा (Fatwa):*
*फतवा की परिभाषा*
*फतवा एक इस्लामी कानूनी राय या निर्णय है, जो किसी धार्मिक या सामाजिक मुद्दे पर इस्लामी कानून (शरीयत) के आधार पर दी जाती है।*
*इस कारण देश के कानून से इनका कानून अलग हो जाता है यह लोग जिस भी देश के वासी हों उस देश के कानून को अपने निजी हित का नाम बता उस देश के कानून को ही मानने या ना मानने की बात करने लगते है और उसी देश के संविधान का चीर हरण करने लगते है*
*इस फतवे को इस्लामी विद्वान (मुफ़्ती) द्वारा जारी किया जाता है।*
*इस की विशेषताएँ*
*वैसे तो गैर-बाध्यकारी: फतवा कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं होता।*
*यह केवल परामर्श माना जाता है और इसका पालन व्यक्ति की इच्छा पर निर्भर करता है।*
*वैयक्तिक या सामुदायिक मुद्दे पर यह किसी व्यक्तिगत समस्या (जैसे विवाह, तलाक, व्यापार आदि) या सामुदायिक प्रश्नों पर तो आधारित हो सकता है।*
*आज तो इस फतवे को गैर धर्मों के सिर कलम करने के रूप में देना ही यह साबित करता है कि वह किसे के साथ भाईचारा रखना नही चाहते और हिंदू ,मुस्लिम,सिख,ईसाई,आपस में भाई भाई का चीर हरण करने का कारण होता है जिस से शांत वातावरण तनावपूर्ण होने लगता है*
*क्यों कि फतवा शरीयत के आधार पर दिया जाता है, और इसका उद्देश्य इस्लामी परंपराओं और नैतिकता के अनुरूप मार्गदर्शन प्रदान करना होता है का सारा उद्देश्य ही राज द्रोही हो जाता है*
*अब यह जानना भी जरूरी हो जाता है कि*
*किसी विशेष परिस्थिति में उसका कार्य धार्मिक रूप से सही है या नहीं, तो वह फतवे की मांग करता है।*
*और दूसरे धर्म में धर्म कर्म के पंडालों ,यात्राओं, मंदिरों को नुकसान पहुंचा कर अपने धर्म के फतवे की रक्षा करने आजाता है*
*ओर जब दूसरा धर्म अपने बचाव के लिए प्रहार करता है या उस देश का कानून अपनी बनती कार्यवाही करे तो नया फतवा आ जाता है जो सरकार के विरोध में होता है*
*तब भाई चारा गैंग सक्रिय हो कर कहने लगता है " आपस में बैर रखना नही सिखाता हिंदुस्तान हमारा आत्म रक्षा करना नहीं काम तुम्हारा डबल सिद्धांतों से जीवन नहीं चलता ना आने वाली पीढ़ियां ही कोई सुख पाती हैं*
*भाई चारे की बात करना बुरा नहीं पर भाई चारा निभाना किसी एक की बात भी नहीं*
*हिंदू धर्म के लिए आज उनको पुनः धर्मादेश की जरूरत है जो समय समय पर धर्म गुरुओं को भी आगे आकर करनी चाहिए अगर वह ऐसा नहीं करते तो आप के धर्म और आप का दोनों के पतन को कोई रोक भी नहीं सकता और हम ,सेकुलर,लिबरल,जाती_पाती में उलझ कर आपस में ही लड़ लड़ कर खत्म हो जाएंगे*
*जिस का जिम्मेदार ना मैं ना आप यह धर्म के ठेकेदार हमारे गुरुजन ही होगे*
*जो द्रोणाचार्य की तरह धर्म युद्ध में आमने सामने कर के हमें ही मरवाए गे*
*जब तक यह धर्म गुरु अपने "धर्मादेश" का पालन नहीं करते तब तक हिंदू कुंभ कर्ण की नींद से नहीं जाग सकता*
*धर्मादेश (Dharma Adesh):*
*जिस की परिभाषा है*
*धर्मादेश भारतीय परंपराओं में धार्मिक या नैतिक नियमों, सिद्धांतों, या आदेशों का एक औपचारिक साझा बयान*
*यह आमतौर पर धर्मशास्त्रों, शिलालेखों, या धार्मिक*
*गुरु पद के अधिकारियों द्वारा जारी किया जाना जरूरी है अपने गुरु पद पर बैठे अधिकारियों को जगाओ हिंदू खुद जाग जाए गा*
*❖════❃≛⃝❈⬤🪷
*हिंदू सनातन धर्म में शस्त्र उठाने की नीति*
⬤≛⃝❈❃════❖*
हिंदू धर्म में शस्त्र उठाने के लिए बहुत स्पष्ट और नैतिक आधार हैं, और यह कार्य धर्म (न्याय और सत्य) की रक्षा के लिए होता है, न कि केवल किसी के आस्थावादी या नास्तिक होने के कारण। आइए इसे गहराई से समझते हैं:
1. हिंदू धर्म में शस्त्र उठाने का उद्देश्य:
हिंदू धर्म में शस्त्र का उपयोग केवल अधर्म (अन्याय, हिंसा, और अत्याचार) के खिलाफ होता है, न कि किसी की व्यक्तिगत मान्यता या विचारधारा पर। यह हे सनातन धर्म की नर्माई
धर्मयुद्ध का सिद्धांत: महाभारत और अन्य ग्रंथों में धर्मयुद्ध का वर्णन है, लेकिन इसका उद्देश्य अधर्म का नाश करना और समाज में न्याय व शांति की स्थापना करना है।
उदाहरण: अर्जुन ने कौरवों पर शस्त्र उठाया क्योंकि उन्होंने धर्म (न्याय) का उल्लंघन किया और अपने ही परिवार के अधिकार छीनने का प्रयास भी किया।
शास्त्रों की शिक्षा:
*"अहिंसा परमो धर्मः, धर्म हिंसा तथैव च।"*
अहिंसा को सबसे बड़ा धर्म माना गया है, लेकिन जब धर्म (सत्य और न्याय) की रक्षा के लिए हिंसा आवश्यक हो, तब वह भी धर्म का हिस्सा बन जाती है।
असुरों और आतंकियों पर शस्त्र उठाना:
हिन्दू धर्म में भगवान ने राक्षसों, असुरों और समाज में आतंक फैलाने वालों का वध किया। यह स्पष्ट है कि नास्तिकता उनकी भी कोई विचारधारा नहीं, बल्कि आतंक और अन्याय ही शस्त्र उठाने का कारण बनते हैं।
उदाहरण:
भगवान राम ने रावण का वध किया, क्योंकि वह अन्याय और हिंसा का प्रतीक बन चुका था।
भगवान कृष्ण ने कंस और शिशुपाल का वध किया, क्योंकि वे अत्याचार के प्रतीक थे।
2. क्या नास्तिकों पर कभी शस्त्र उठाया गया?
नहीं, हिन्दू धर्म में नास्तिकों का वध केवल उनके नास्तिक होने के कारण कभी नहीं किया गया।
शास्त्रों में चार्वाक जैसे नास्तिक विचारकों का उल्लेख मिलता है, लेकिन उनके विचारों का खंडन दार्शनिक चर्चा के माध्यम से किया गया, न कि हिंसा के माध्यम से।
हिन्दू धर्म सहिष्णुता और विविध विचारों को सम्मान देने वाला धर्म है।
3. मुस्लिम धर्म में नास्तिकों पर दृष्टिकोण स्पष्ट है:
इस्लाम में, विशेष रूप से शरिया कानून के तहत, नास्तिकता को कुफ्र (अल्लाह के प्रति अविश्वास) माना जाता है।
ऐतिहासिक रूप से, इस्लामी साम्राज्यों में नास्तिकता को दंडनीय अपराध माना गया और ऐसे व्यक्तियों को शारीरिक दंड या मृत्युदंड दिया गया।
लेकिन इस्लामिक सिद्धांत अलग-अलग समय और स्थान पर विविध व्याख्याओं के अधीन ही रहे हैं।
4. आतंक फैलाने वालों पर शस्त्र उठाने का सिद्धांत:
हिन्दू धर्म में यह स्पष्ट है कि शस्त्र का उपयोग केवल उन पर होता है जो:
आतंकी ,अत्याचारी और हिंसक हों।
समाज में अराजकता और आतंक फैला रहे हों।
धर्म, सत्य, और न्याय का उल्लंघन कर रहे हों।
उदाहरण:
1. असुरों का वध:
भगवान विष्णु ने हिरण्यकश्यप और रावण जैसे असुरों का वध किया, क्योंकि वे अधर्म और आतंक का प्रतीक बन चुके थे।
2. महाभारत का युद्ध:
कौरवों ने अन्याय और अराजकता फैलाई थी। इसलिए पांडवों ने धर्म की स्थापना के लिए शस्त्र उठाए।
5. निष्कर्ष:
हिंदू धर्म में शस्त्र: केवल धर्म, सत्य, और न्याय की रक्षा के लिए उठाए जाते हैं। किसी की आस्था या नास्तिकता के आधार पर हिंसा का कोई स्थान तो है ही नहीं।
मुस्लिम धर्म में नास्तिकता का दंड: ऐतिहासिक रूप से नास्तिकों को सजा देने की घटनाएं देखने को मिलती हैं, लेकिन यह इस्लाम की विभिन्न व्याख्याओं पर निर्भर है।
आतंकियों पर शस्त्र: हिंदू धर्म में आतंक और अत्याचार फैलाने वालों पर शस्त्र उठाना धर्म का कर्तव्य माना गया है।
अब ध्यान दें:
धर्म की स्थापना केवल भगवान द्वारा होती है। मनुष्य का कर्तव्य है कि वह धर्म, सत्य, और न्याय के मार्ग पर चले और अन्याय या हिंसा का सामना करने के लिए शास्त्र और शस्त्र दोनों का संतुलित उपयोग करे।
शस्त्रऔर शास्त्र से बुद्धि और बल का आपसी समन्वय होता है। व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास के लिए दोनों ही जरूरी हैं। शास्त्र जीवन के लिए व्यवहारिक ज्ञान प्रदान करते है और शस्त्र दुष्टों से रक्षा करते हैं। शास्त्र जीवन जीना सीखाता है और शस्त्र जीवन की रक्षा करना सीखाता है।
हिंदू धर्म शास्त्रों में आतंकी
हिंदू शास्त्रों में आतंकी या दुष्ट लोगों को विभिन्न प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है। इनमें से कुछ प्रमुख प्रकार हैं:
1. राक्षस: ये वे लोग होते हैं जो न केवल अपने स्वार्थ के लिए बल्कि अन्य लोगों को भी नुकसान पहुंचाते हैं।
2. दानव: ये वे लोग होते हैं जो दूसरों के साथ बुरा व्यवहार करते हैं और समाज के लिए हानिकारक होते हैं।
1. पिशाच: ये वे लोग होते हैं जो अन्य लोगों को डराते-धमकाते हैं और उनका शोषण करते हैं।
2. क्रूर: ये वे लोग होते हैं जो निर्दयी और क्रूर होते हैं और दूसरों को दर्द पहुंचाते हैं।
3. असुर: ये वे लोग होते हैं जो अधर्मी और अन्यायी होते हैं और समाज के लिए खतरा होते हैं।
यह वर्गीकरण विभिन्न हिंदू शास्त्रों जैसे कि रामायण, महाभारत, और पुराणों में पाया जाता है।
पूजा पाठ मै क्या जानू
*❖════❃≛⃝❈⬤🪷
(❤️जैसे यह शरीर आपका मंदिर है इस में आत्मा रूप में आप परमात्मा हो।बुद्धि सरस्वती माता आप हो।आप के साथ चलने वाले आप के नोकर है। और विषयों के अधीन हो जो खाता,पिता,देखता,सुनता,बोलता,स्पर्श करता हूं आप की पूजा है।निद्रा आप की समाधि,चलना फिरना आप की प्रदक्षिणा है मेरे वचन आप की स्तुति है ऐसे आराधना करते हुए कर्म में लीन होना❤️)
⬤≛⃝❈❃════❖*
*Chapter:* 4
*श्लोक:* 42
*श्लोक:*
तस्मादज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः ।
छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत ॥ ४२ ॥
*अनुवाद:* अतएव तुम्हारे हृदय में अज्ञान के कारण जो संशय उठे हैं उन्हें ज्ञानरूपी शस्त्र से काट डालो। हे भारत! तुम योग से समन्वित होकर खड़े होओ और युद्ध करो।
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