Ş₳ŦเŞ𝓱👸🏻◣🍁💜⃝🇱♥︎𝐕𝐄4♥️𝐘𝐎🇺⃝◣
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 1
श्लोक:
धृतराष्ट्र उवाच
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय॥
भावार्थ:
धृतराष्ट्र बोले- हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में एकत्रित, युद्ध की इच्छावाले मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया?
॥1॥
पात्र परिचय सहित व्याख्या
✍️व्याख्या
नाम: धृतराष्ट्र
जन्म स्थल: हस्तिनापुर
भाई-बहन: पांडु और विदुर
माता-पिता: महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास (वास्तविक जैविक पिता), विचित्रवीर्य (आध्यात्मिक पिता), अम्बिका (माता)
धृत राष्ट्र…… कुरुक्षेत्र के युद्ध के समय धृतराष्ट्र अंधे होने के बावजूद कौरवों के पक्ष में राजा के रूप में अपनी भूमिका निभाते हैं। उनका पुत्र मोह और सत्ता का मोह उन्हें निष्पक्षता से दूर रखता है। जो अंधा (अज्ञानी) होने के कारण अपने राजधर्म का पालन सही ढंग से नहीं करते और तो दूसरी ओर उनकी पत्नी भी अपनी आंखों पर पट्टी बांध लेती है।
गांधारी, गंधार की राजकुमारी थीं.
भीष्म ने धृतराष्ट्र का विवाह गांधारी से कराया था.
विवाह से पहले गांधारी को नहीं पता था कि धृतराष्ट्र जन्मांध हैं.
जब गांधारी को यह बात पता चली, तो उन्होंने भी हमेशा के लिए अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली.
धृतराष्ट्र और गांधारी के सौ पुत्र और एक पुत्री थी.
दुर्योधन और दु:शासन उनके पहले दो पुत्र थे.
धृतराष्ट्र का एक अनैतिक पुत्र भी था, जिसका नाम यूयुत्सु था.
महर्षि वेदव्यास ने गांधारी को सौ पुत्रों की मां होने का वरदान दिया था.
मुख्य संदेश:
धृतराष्ट्र का चरित्र यह दिखाता है कि अज्ञानता और आसक्ति कैसे मनुष्य के निर्णयों को प्रभावित करती है और विनाश का कारण ही बनती है।
संजय
संजय धृतराष्ट्र के सारथी और उनके लिए युद्ध के घटनाक्रम का प्रत्यक्षदर्शी हैं जो महाभारत युद्ध में अर्जुन के सारथी श्री कृष्ण के बीच होने वाली वार्ता के साक्षी (गवाह भी है)। संजय दिव्य दृष्टि के माध्यम से धृतराष्ट्र को युद्ध की घटनाओं का सजीव वर्णन करते हैं।
मुख्य संदेश:
संजय के माध्यम से यह समझ आता है कि सच्चे ज्ञान और निष्पक्षता के साथ किसी घटना को देखना और समझना और वैसा ही समझाना कितनाआवश्यक और कठिन होता है।
धर्मभूमि
अब यहां धर्म को अगर सत्य के साथ जोड़ कर देखे तो प्रमुख चारों धर्म सनातनी हिंदू ,सनातनी,मुसलमान,सनातनी सिख, सनातनी ईसाई , ओर पांचवें वेद के अनुसरण करता फकीर लोग जिनकी निशानी फिक्र, फाका, ओर संतोष होता है। और यह चारो उपरोक्त सनातनी धर्मो में एक समानता में पाए जाते है।
धर्म अर्थात किसी को धारण करना खुद में उतारना होता है।इसी को धर्म कहते है।
अब एक नजर चारों धर्मो की शिक्षा पर जिनको धारण करने के लिए कहा गया है और इन को धारण करना ही धर्म हो जाता है। जैसे सदा सत्य के साथ रहो,व्याभिचारी ना बने, चोरी ना करे, चुगली ना करें, दूसरे के धन पर कभी बुरी नजर ना रखें (दूसरे का सोना मेरे लिए मिट्टी समान है जाने)निहत्थे पर वार ,मासूम की हत्या, झूठ ओर जूठा कभी ग्रहण या धारण ना करे पवित्रता पर ध्यान दे और उसे धारण करे। ऐसे सभी सूत्र धर्म बन जाते है और इनको ही धारण करना अपनाना ही धर्म होता है। अर्थात हम जिसको धारण करते है वो धर्म कहलाता है।इसे ऐसे भी समझ सकते हैं
धर्म का मतलब है, वह चीज़ जिसे धारण किया जा सके. धर्म से जुड़ी कुछ और बातेंः
धर्म, संस्कृत के ‘धृ’ धातु से बना है जिसका अर्थ है जो धारण किया जाये।
धर्म, समाज में व्यक्ति जीवन प्रति जो धारणा बनाता है या धारणा करता है वही धर्म है.
धर्म,भी कर्म ही प्रधान है और कर्म के लिए ज्ञान का होना भी बहुत जरूरी है इन गुणों के योग को जो प्रदर्शित करे वह धर्म है.
धर्म, नैतिक मूल्यों का आचरण है.
धर्म, वह पवित्र अनुष्ठान है जिससे चेतना का शुद्धिकरण होता है.
धर्म, वह तत्व है जिसके आचरण से व्यक्ति अपने जीवन को चरितार्थ कर पाता है धर्म, मनुष्य का उससे संबंध जिसे वह पवित्र, पवित्र, निरपेक्ष, आध्यात्मिक, दिव्य या विशिष्ट श्रद्धा के योग्य बनाता है।
धर्म, लोगों द्वारा अपने जीवन और मृत्यु के बाद अपने भाग्य के बारे में अंतिम चिंताओं से निपटने के सरल तरीके के रूप में भी माना जाता है।
कुरुक्षेत्र
तो समझ में आता है कुरु साम्राज्य या कुरु राजवंश का इलाका या क्षेत्र में सामूहिक, युद्ध की इच्छावाले मेरे पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया?
महाभारत के अनुसारपांडु के पांच पुत्र थे: युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव, इन पांचों को पांडु पुत्र कहा गया है।
युधिष्ठिर
युधिष्ठिर का चरित्र हमें सिखाता है कि सत्य धर्मऔर सत्य न्याय धर्म का पालन करना कितना कठिन हो सकता है, लेकिन दीर्घकालिक दृष्टिकोण से यह आवश्यक और मूल्यवान होता है।
भीम
महाभारत के अनुसार, भीम या भीमसेन पांडवों में दूसरे नंबर के पुत्र (भाई) थे। वे पवनदेव के वरदान से कुंती के गर्भ से पैदा हुए थे। भीम को वृकोदर भी कहा जाता है। वे महाभारत के प्रमुख पात्रों में से एक थे और उनकी गिनती महान योद्धाओं में की जाती है. भीम के बारे में
कुछ खास बातेंः
भीम जन्म से ही बहुत बलवान थे।
भीम के बल के आगे कोई टिक नहीं पाता था।
भीम ने अकेले ही कुरुक्षेत्र के युद्ध में सभी 100 कौरवों का वध किया था ऐसा कहा जाता है।
भीम को 10 हज़ार हाथियों के समान बल प्राप्त था।
भीम के नाम के साथ अक्सर प्रत्यय ‘सेना’ जोड़ा जाता है, जिससे भीमसेन बनता है।
भीम की तीन पत्नियां थीं और तीनों से एक-एक पुत्र थे।
(भीम के पुत्रों के नाम थे- सुतशोम और घटोत्कच , सर्वांग)
भीम खुद वायु देव के अंश थे।
अर्जुन ( अब इन को समझ ले पूरी गीता में यह छाए हुए हैं इनको जान लेने के बाद गीता पढ़ना समझना सुगम (सरल) हो जाता है।)
गीता में अर्जुन को गीता जी में जिन नामों से बुलाया गया है:
अर्जुन, फाल्गुन, जिष्णु, कीर्ति, श्वेतवाहन, वीभत्सु, विजय, कृष्णअर्जुन के अलावा कुछ और नाम भी है:
पार्थ, किरीटिन्, भीभस्तु, सव्यसाची, धनंजय, गाण्डीवधन्वन्, गुडाकेश, परन्तप, बीभत्सु, गांडीवधारी, एक नाम जो कही नहीं बताया जाता ताकि गुरु नाम की महिमा कम ना हो जाए पूरी गीता में अर्जुन को गुरु नहीं कहा गया जब कि उनको चेले के रूप में ही दिखाया गया है अर्थात गुरु बनो गे तो महाभारत के इस युद्ध में चेले के हाथों तुम्हारा वध निश्चित ही है।
प्रत्यक्ष रूप में देखने में आता हे आज के कलयुग के सभी चेले धर्म पर चलने वाले भी नहीं होते है। जिसका दोष चेले को नहीं उसके गुरु को ही दिया जाता है।
अर्जुन के बारे में कुछ और बातें भी जान लेते हैं तभी आगे बढ़ते है:
अर्जुन के चार पुत्र थे, जिनके नाम थे- श्रुतकर्मा,इरावन, बभ्रुवाहन, और अभिमन्यु है
अर्जुन योद्धा होने के साथ-साथ संगीत और नृत्य में भी कुशल थे।
महाभारत के मुताबिक, अर्जुन इंद्र देव के अंश थे।
अब: गीता में अर्जुन एक संघर्षरत योद्धा के रूप में नजर आ रहे हैं जो धर्म और अपने कर्तव्यों के बीच फँस कर रह जाते हैं। श्रीकृष्ण उनके मन के द्वंद्व को समझाते हैं और मार्गदर्शन भी अपने ज्ञान से ही देते भी हैं।
मुख्य संदेश: अर्जुन का चरित्र हमें मानवीय कमजोरी, संदेह, और प्रश्न करने की प्रवृत्ति का प्रतीक बनने की प्रेरणा तो देता ही है साथ।
हमें अर्जुन के जरिए हमें यह समझ आता है कि ज्ञान प्राप्ति का सबसे पहला कदम प्रश्न करना ही होता है।फिर सुनना और अमल में लाना।ना की गुरु बन के बैठे रहना इस लिए अर्जुन खुद को चेले के रूप में भी ले आते है। और आसानी से इस बात को समझा जा सकता है। कि मनुष्य खुद ही अपना मित्र और अपना शत्रु भी हो जाता है। ज्ञान से जुड़ कर (मित्र) अज्ञान से जुड़ कर (शत्रु)
अब पहले चेले को समझ कर ही नकुल सहदेव की बात करें गे।
चेला: शिष्य गुरु परंपरा अनुसार अज्ञानी मूर्ख होता है, गुरु उसको ज्ञानवान बनाता है।चेले का महत्व सभी धर्मो में कहा जाता है।
लग भग यह हिन्दू, सिख, जैन और बौद्ध आदि भारत से उपजे सभी धर्मों में समान रूप से पाया जाता है।
मुस्लिम धर्म के गुरु को मुला जी कहते है।
ईसाई कैथोलिक संप्रदाय में पोप को सर्वोच्च धर्मगुरु मानते हैं।
चेले को बंदा, ग़ुलाम, घर का नौकर या दास
शिष्य, शागिर्द, वह जिसने किसी गुरु से शिक्षा पाई हो
वह जो धार्मिक आस्था से किसी गुरु से मंत्र लेकर उसका अनुयायी या शिष्य बना हो, या किसी के मत या सिद्धांत का अनुकरण करने वाला व्यक्ति हो।
इल्म की आप अपनी इस्तेदाद
कहीं मुर्शिद कहीं पे चेला है
नकुल सहदेव
महाभारत में नकुल और सहदेव से मिलने वाली शिक्षाओं में से एक है कि एक अच्छा भाई होना अच्छा है। नकुल और सहदेव, पांडवों के पांचवें और चौथे भाई थे. वे अपने भाइयों के साथ रहने में सक्षम होना चाहते थे। उन्हें अपना खुद का राज्य देने की पेशकश की गई थी, लेकिन उन्होंने इसे स्वीकार नहीं किया।
नकुल विज्ञान के ज्ञाता थे, जबकि सहदेव ज्ञान के भंडार थे।उधर सहदेव परशु अस्त्र के निपुण योद्धा थे,सहदेव एक विद्वान और ज्योतिषी (भविष्य वक्ता )भी थे।भविष्य वक्ता भी लगभग सभी धर्मो में होते हैं।
उद्योग पर्व में सहदेव ने कृष्ण से कहा था कि वे युद्ध नहीं, बल्कि शांति चाहते हैं।
गीता के अध्ययन से पता चलता है। की महाभारत के गुरु कौरव पांडव दोनों के गुरु थे।
जिनका वध श्री कृष्ण चेले अर्जुन से ही करवा देते है।
गुरु मोक्ष प्राप्त करने वाले होते जरूर है पर शंका ही होती है गीता में उस गुरु का भी जिक्र आता है जो मुक्ति दिलाने में सक्षम होता है उस गुरु की चर्चा आगे चल कर हो गी
प्रथम गुरु माता पिता
दूसरा गुरु पाठशाला (गुरुकुल)का कहलाता है जो जीवन यापन के गुरु सिखाता है।
पर चेले के लिए स्पष्ट है कि दो गुरुओं का चेला किसी ना किसी गुरु को धोखा जरूर देता है।
जैसे दो स्वामियों के नोकर से भी उन स्वामियों को भी डर रहता है कि यह नोकर, बंदा ,शिष्य, शागिर्द किसी एक को कभी धोखा ना दे दे।समस्त पात्रों के परिचय के बाद अब गीता का आरंभ हो जाता है।
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 2
श्लोक:
संजय उवाच
दृष्टवा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा।
आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत्॥
भावार्थ:
संजय बोले- उस समय जब उनकी दिव्य दृषि चेतन प्रकाश से प्रकाशित होती है तब राजा दुर्योधन ने व्यूहरचनायुक्त पाण्डवों की सेना को देखा और द्रोणाचार्य के पास जाकर यह वचन कहा।
॥2॥
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 3
श्लोक:
पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम्।
व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता॥
भावार्थ:
हे आचार्य!(गुरु जी) आपके बुद्धिमान् (क्यों कि यही तो गुरु शिष्य परम्परा है जिसमें गुरु ही चेले को बुद्धिमान ,ज्ञानवान बनाने का कार्य निष्ठा पूर्वक करता है उन चेलों द्वारा)
शिष्य द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न द्वारा व्यूहाकार खड़ी की हुई पाण्डुपुत्रों की इस बड़ी भारी सेना को देखिए
॥3॥
(इसकी जानकारी राज युधिष्ठिर तक संजय द्वारा बताया जा रहा है)
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 4-6
श्लोक:
अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि।
युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः॥
धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान्।
पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङवः॥
युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान्।
सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः॥
भावार्थ:
इस सेना में बड़े-बड़े धनुषों वाले तथा युद्ध में भीम और अर्जुन के समान शूरवीर सात्यकि और विराट तथा महारथी राजा द्रुपद, धृष्टकेतु और चेकितान तथा बलवान काशिराज, पुरुजित, कुन्तिभोज और मनुष्यों में श्रेष्ठ शैब्य, पराक्रमी युधामन्यु तथा बलवान उत्तमौजा, सुभद्रापुत्र अभिमन्यु एवं द्रौपदी के पाँचों पुत्र- ये सभी महारथी हैं।
॥4-6॥
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 7
श्लोक:
अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम।
नायका मम सैन्यस्य सञ्ज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते॥
भावार्थ:
हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! अपने पक्ष में भी जो प्रधान हैं, उनको आप समझ लीजिए। आपकी जानकारी के लिए मेरी सेना के जो-जो सेनापति हैं, उनको बतलाता हूँ
॥7॥
(यहां द्रोणा चार्य को श्रेष्ठ ब्राह्मण के संज्ञा दी है)
ब्राह्मण वह सभी जीव निर्जीव चीजें आ जाती है जो पूजा में प्रयोग हों या समलित किए गए हों उसमें चावल, चंदन, फल, फूल,जल जैसी सारी सामग्री भी जिन के बिना पूजा ही सम्पन्न ना हो सके ब्राह्मण तुल्य ही है)
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 8
श्लोक:
भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जयः।
अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च॥
भावार्थ:
आप-द्रोणाचार्य और पितामह भीष्म तथा कर्ण और संग्रामविजयी कृपाचार्य तथा वैसे ही अश्वत्थामा, विकर्ण और सोमदत्त का पुत्र भूरिश्रवा
॥8॥
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 9
श्लोक:
अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः।
नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः॥
भावार्थ:
और भी मेरे लिए जीवन की आशा त्याग देने वाले(वचन से बंधे ये) बहुत-से शूरवीर अनेक प्रकार के शस्त्रास्त्रों से सुसज्जित और सब-के-सब युद्ध में चतुर हैं
॥9॥
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 10
श्लोक:
अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम्।
पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम्॥
भावार्थ:
भीष्म पितामह द्वारा रक्षित हमारी वह सेना सब प्रकार से अजेय है और भीम (सेना हमार सेना आसानी से जीत लेगी ऐसी आशा को बल देती है) द्वारा रक्षित इन लोगों की यह सेना जीतने में सुगम है
॥10॥
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 11
श्लोक:
अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः।
भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि॥
भावार्थ:
इसलिए सब मोर्चों पर अपनी-अपनी जगह स्थित रहते हुए आप लोग सभी निःसंदेह भीष्म पितामह की ही सब ओर से रक्षा करें
॥11॥
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 12
श्लोक:
(दोनों सेनाओं की शंख-ध्वनि का कथन)
तस्य सञ्जनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः।
सिंहनादं विनद्योच्चैः शंख दध्मो प्रतापवान्॥
भावार्थ:
कौरवों में वृद्ध बड़े प्रतापी पितामह भीष्म ने उस दुर्योधन के हृदय में हर्ष उत्पन्न करते हुए उच्च स्वर से सिंह की दहाड़ के समान गरजकर शंख बजाया
॥12॥
इस शंख नाद के बाद रण भूमि में।
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 13
श्लोक:
ततः शंखाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः।
सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत्॥
भावार्थ:
इसके पश्चात शंख और नगाड़े तथा ढोल, मृदंग और नरसिंघे आदि बाजे एक साथ ही बज उठे। उनका वह शब्द बड़ा भयंकर हुआ
॥13॥
(रण भूमि हो या अपनी रक्षा खुशहाली के युद्ध रूपी प्रति दिन मंदिरों की जाने वाली ॐ जय जगदीश हरे आरती में समानता है। जीवन प्रति दिन का महाभारत ही नहीं तो ओर क्या है!जिसे मित्र शत्रु सभी एक समान रूप में लड़ रहे नजर आते है भगवान भी खुद इसमें शामिल होते है ऐसा भी प्रतीत होता है)
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 14
श्लोक:
ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ।
माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शंखौ प्रदध्मतुः॥
भावार्थ:
इसके अनन्तर सफेद घोड़ों से युक्त उत्तम रथ में बैठे हुए श्रीकृष्ण महाराज और अर्जुन ने भी अलौकिक शंख बजाए
॥14॥
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 15
श्लोक:
पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः।
पौण्ड्रं दध्मौ महाशंख भीमकर्मा वृकोदरः॥
भावार्थ:
श्रीकृष्ण महाराज ने पाञ्चजन्य नामक, अर्जुन ने देवदत्त नामक और भयानक कर्मवाले भीमसेन ने पौण्ड्र नामक महाशंख बजाया
॥15॥
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 16
श्लोक:
अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः।
नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ॥
भावार्थ:
कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने अनन्तविजय नामक और नकुल तथा सहदेव ने सुघोष और मणिपुष्पक नामक शंख बजाए
॥16॥
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 17-18
श्लोक:
काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः।
धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः॥
द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते।
सौभद्रश्च महाबाहुः शंखान्दध्मुः पृथक्पृथक्॥
भावार्थ:
श्रेष्ठ धनुष वाले काशिराज और महारथी शिखण्डी एवं धृष्टद्युम्न तथा राजा विराट और अजेय सात्यकि, राजा द्रुपद एवं द्रौपदी के पाँचों पुत्र और बड़ी भुजावाले सुभद्रा पुत्र अभिमन्यु- इन सभी ने, हे राजन्! सब ओर से अलग-अलग शंख बजाए
॥17-18॥
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 19
श्लोक:
स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत्।
नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन्॥
भावार्थ:
और उस भयानक शब्द ने आकाश और पृथ्वी को भी गुंजाते हुए धार्तराष्ट्रों के अर्थात आपके पक्षवालों के हृदय विदीर्ण कर दिए
॥19॥
(भाव विदीर्ण की परिभाषाएं और अर्थ हिन्दी में
टूटा हुआ । भग्न । मार डाला हुआ से है। शंख नाद पर पहला जवाबी प्रहार होता है)
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 20-21
श्लोक:
(अर्जुन द्वारा सेना-निरीक्षण का प्रसंग भी रोचक रोमांच कारी है शंख नाद के जवाबी प्रहार के बाद का दृश्य)
अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः।
प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः॥
हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते।
अर्जुन उवाचः
सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत॥
भावार्थ:
हे राजन्! इसके बाद कपिध्वज अर्जुन ने मोर्चा बाँधकर डटे हुए धृतराष्ट्र-संबंधियों को देखकर, उस शस्त्र चलने की तैयारी के समय धनुष उठाकर हृषीकेश श्रीकृष्ण महाराज से यह वचन कहा- हे अच्युत! मेरे रथ को दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा की जिए।
॥20-21॥
(अर्जुन का आग्रह सुन भगवान ने वही किया क्यों कि अर्जुन के रथ के वह सारथी जो है)
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 22
श्लोक:
यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान्।
कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे॥
भावार्थ:
और जब तक कि मैं युद्ध क्षेत्र में डटे हुए युद्ध के अभिलाषी इन विपक्षी योद्धाओं को भली प्रकार देख न लूँ कि इस युद्ध रूप व्यापार में मुझे किन-किन के साथ युद्ध करना योग्य है, तब तक उसे खड़ा रखिए
॥22॥
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 23
श्लोक:
योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः।
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः॥
भावार्थ:
दुर्बुद्धि दुर्योधन का युद्ध में हित चाहने वाले जो-जो ये राजा लोग इस सेना में आए हैं, इन युद्ध करने वालों को मैं देखूँगा
॥23॥
भाव (में भी तो देखूं दुर्योधन के पक्ष में मेरे साथ युद्ध करने वाले यह कौन से लोग हैं)
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 24-25
श्लोक:
संजय उवाचः
एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत।
सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम्॥
भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम्।
उवाच पार्थ पश्यैतान् समवेतान् कुरूनिति॥
भावार्थ:
संजय बोले- हे धृतराष्ट्र! अर्जुन द्वारा कहे अनुसार महाराज श्रीकृष्णचंद्र ने दोनों सेनाओं के बीच में भीष्म और द्रोणाचार्य के सामने तथा सम्पूर्ण राजाओं के सामने उत्तम रथ को खड़ा कर इस प्रकार कहा कि हे पार्थ! युद्ध के लिए जुटे हुए इन कौरवों को देख।
॥24-25॥
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 26-27 पूर्वार्ध
श्लोक:
तत्रापश्यत्स्थितान् पार्थः पितृनथ पितामहान्।
आचार्यान्मातुलान्भ्रातृन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा॥
श्वशुरान् सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि।
भावार्थ:
इसके बाद पृथापुत्र अर्जुन ने उन दोनों ही सेनाओं में स्थित (अपने ही) ताऊ-चाचों को, दादों-परदादों को, गुरुओं को, मामाओं को, भाइयों को, पुत्रों को, पौत्रों को तथा मित्रों को, ससुरों को और सुहृदों( मित्र, सखा।)को भी देखा
॥26 और 27वें का पूर्वार्ध॥
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 27 उत्तरार्ध 28 पूर्वार्ध
श्लोक:
तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान् बन्धूनवस्थितान्॥
कृपया परयाविष्टो विषीदत्रिदमब्रवीत्।
भावार्थ:
उन उपस्थित सम्पूर्ण बंधुओं बांधो सखा मित्रो को देखकर वे कुंतीपुत्र अर्जुन अत्यन्त करुणा से युक्त होकर शोक करते हुए यह वचन बोले।
❤️॥27वें का उत्तरार्ध और 28वें का पूर्वार्ध॥❤️
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 28 उत्तरार्ध और 29
श्लोक:
(मोह से व्याप्त हुए अर्जुन के कायरता, स्नेह और शोकयुक्त वचन )
अर्जुन उवाच
दृष्टेवमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्॥
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति।
वेपथुश्च शरीरे में रोमहर्षश्च जायते॥
भावार्थ:
अर्जुन बोले- हे कृष्ण! युद्ध क्षेत्र में डटे हुए युद्ध के अभिलाषी इस स्वजनसमुदाय को देखकर मेरे अंग शिथिल हुए जा रहे हैं और मुख सूखा जा रहा है तथा मेरे शरीर में कम्प एवं रोमांच हो रहा है।
❤️॥28वें का उत्तरार्ध और 29॥❤️
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 30
श्लोक:
गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्वक्चैव परिदह्यते।
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः॥
भावार्थ:
हाथ से गांडीव धनुष गिर रहा है और त्वचा भी बहुत जल रही है तथा मेरा मन भ्रमित-सा हो रहा है, इसलिए मैं खड़ा रहने को भी समर्थ नहीं हूँ।
॥30॥
(पारिवारिक सामाजिक मोह पाश में जकड़ा अर्जुन घबराई हुई हालत में नजर आ रहे हैं और अपने ही ज्ञान से भयभीत हो जाते है)
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 31
श्लोक:
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव।
न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे॥
भावार्थ:
हे केशव! मैं लक्षणों को भी विपरीत ही देख रहा हूँ तथा युद्ध में स्वजन-समुदाय को मारकर कल्याण भी नहीं देखता
॥31॥
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 32
श्लोक:
न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च।
किं नो राज्येन गोविंद किं भोगैर्जीवितेन वा॥
भावार्थ:
हे कृष्ण! मैं न तो विजय चाहता हूँ और न राज्य तथा सुखों को ही। हे गोविंद! हमें ऐसे राज्य से क्या प्रयोजन है अथवा ऐसे भोगों से और जीवन से भी क्या लाभ है?
॥32॥
(अर्जुन अपनी मनोदशा श्री कृष्ण को बताते है)
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 33
श्लोक:
येषामर्थे काङक्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च।
त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च॥
भावार्थ:
हमें जिनके लिए राज्य, भोग और सुखादि अभीष्ट हैं, वे ही ये सब धन और जीवन की आशा को त्यागकर युद्ध में खड़े हैं
॥33॥
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 34
श्लोक:
आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः।
मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः संबंधिनस्तथा॥
भावार्थ:
गुरुजन, ताऊ-चाचे, लड़के और उसी प्रकार दादे, मामे, ससुर, पौत्र, साले तथा और भी संबंधी लोग हैं
॥34॥
(आज के भाईचारे को दर्शाता प्रसंग प्रतीत होता है)
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 35
श्लोक:
एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन।
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते॥
भावार्थ:
हे मधुसूदन! मुझे मारने पर भी अथवा तीनों लोकों के राज्य के लिए भी मैं इन सबको मारना नहीं चाहता, फिर पृथ्वी के लिए तो कहना ही क्या है?
॥35॥
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 36
श्लोक:
निहत्य धार्तराष्ट्रान्न का प्रीतिः स्याज्जनार्दन।
पापमेवाश्रयेदस्मान् हत्वैतानाततायिनः॥
भावार्थ:
हे जनार्दन! धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हमें क्या प्रसन्नता होगी? इन आततायियों को मारकर तो हमें पाप ही लगेगा
॥36॥
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 37
श्लोक:
तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान्।
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव॥
भावार्थ:
अतएव हे माधव! अपने ही बान्धव धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारने के लिए हम योग्य नहीं हैं क्योंकि अपने ही कुटुम्ब को मारकर हम कैसे सुखी होंगे?
॥37॥
(जब कि दूसरे भाईचारे वालों के विचार इन से मिलते ही नहीं है अगर दोनों पक्षों के भाई चारे में थोड़ी सी भी समानता होती तो महाभारत होता ही नहीं)
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 38-39
श्लोक:
यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः।
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम्॥
कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम्।
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन॥
भावार्थ:
यद्यपि लोभ से भ्रष्टचित्त हुए ये लोग कुल के नाश से उत्पन्न दोष को और मित्रों से विरोध करने में पाप को नहीं देखते, तो भी हे जनार्दन! कुल के नाश से उत्पन्न दोष को जानने वाले हम लोगों को इस पाप से हटने के लिए क्यों नहीं विचार करना चाहिए?
॥38-39॥
(मेरे को तो 2024 की भारत की ही स्थिति दिखने लग गई है भाई चारे की चलो फिर से रण भूमि कुरुक्षेत्र में लौट चलते है)
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 40
श्लोक:
कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः।
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत॥
भावार्थ:
कुल के नाश से सनातन कुल-धर्म नष्ट हो जाते हैं तथा धर्म का नाश हो जाने पर सम्पूर्ण कुल में पाप भी बहुत फैल जाता है
॥40॥
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 41
श्लोक:
अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः।
स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकरः॥
भावार्थ:
हे कृष्ण! पाप के अधिक बढ़ जाने से कुल की स्त्रियाँ अत्यन्त दूषित हो जाती हैं और हे वार्ष्णेय! स्त्रियों के दूषित हो जाने पर वर्णसंकर उत्पन्न होता है
॥41॥
भाव
(वर्ण संकर?का भाव जाति दो अलग-अलग जातियों के पुरुष और महिला के मिलने से पैदा होती है, उसे वर्णसंकर कहते हैं. वर्णसंकर शब्द का इस्तेमाल धर्मशास्त्र में भी किया गया है. इसमें कई जातियों और जनजातियों के वर्ण व्यवस्था में मिश्रण शामिल है. वर्णसंकर शब्द का उल्लेख बौधायन शूत्र में भी मिलता है.
वर्णसंकर के कुछ उदाहरण:
खच्चर, जो घोड़े और गधे से पैदा होता है
सर्पों की कई प्रजातियां वर्णसंकर हैं
नीलगाय, जो घोड़े और हिरन से पैदा होती है
वर्णसंकर से जुड़ी कुछ और बातें:
जब किसी व्यक्ति के माता-पिता अलग-अलग जाति के हों या धर्म के हों, तो उनकी संतान को वर्णसंकर कहा जाता है.
वर्णसंकर के गुण माता-पिता से ज़्यादा होते हैं.
श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक संख्या 1.41 में वर्णसंकर शब्द का इस्तेमाल भी इसी रूप में किया गया है अब समझने वाले अच्छा समझे या बुरा यह हरि इच्छा )
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें