बुधवार, 27 नवंबर 2024

अध्याय 8

👉📚अध्याय 8👈

✍️अक्षर ब्रह्म योग
            28 श्लोक।

भगवद  गीता अध्याय: 8
श्लोक 1

श्लोक:
( ब्रह्म, अध्यात्म और कर्मादि के विषय में अर्जुन के सात प्रश्न और उनका उत्तर ) 
 अर्जुन उवाच
 किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं पुरुषोत्तम।
 अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते॥

भावार्थ:
अर्जुन ने कहा- हे पुरुषोत्तम! वह ब्रह्म क्या है? अध्यात्म क्या है? कर्म क्या है? अधिभूत नाम से क्या कहा गया है और अधिदैव किसको कहते हैं
 8॥1॥

श्लोक का परिचय:

ब्रह्म योग एक आध्यात्मिक प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति अपने आप को ब्रह्म (सार्वभौमिक चेतना) के साथ एकत्व में लाने का प्रयास करता है। इसका उद्देश्य आत्म-साक्षात्कार और मोक्ष प्राप्त करना है।

इस श्लोक में अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण से पूछता है कि ब्रह्म क्या है, आत्मा क्या है, सर्वोच्च कर्म क्या है, अधिभूत (भौतिक जगत) क्या है, और अधिदैव (दिव्य शक्ति) क्या है।

इस प्रश्न का भाव यह है कि अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण से आध्यात्मिक ज्ञान की मांग कर रहा है, जिससे वह अपने जीवन को सही दिशा में ले जा सके और मोक्ष प्राप्त कर सके।
8॥1॥
भगवद  गीता अध्याय: 8
श्लोक 2

श्लोक:
अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन।
 प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः॥

भावार्थ:
हे मधुसूदन! यहाँ अधियज्ञ कौन है? और वह इस शरीर में कैसे है? तथा युक्त चित्त वाले पुरुषों द्वारा अंत समय में आप किस प्रकार जानने में आते हैं
 8॥2॥

व्याख्या:

पूर्व अध्याय के अंतिम दो श्लोकों में अकस्मात ब्रह्म अध्यात्म अधिभूत आदि जैसे नवीन पारिभाषिक शब्दों का प्रयोग किया गया है और कहा गया है कि ज्ञानी पुरुष मरण काल ​​में भी वर्णित है जिसमें मुझे भी शामिल किया गया है। इस अध्याय में अर्जुन के बारे में कुछ कहा गया है। वह यह भी जानने को उत्सुक है कि जीवन काल में सतत आध्यात्मिक साधना के अभ्यास से प्राप्त पूर्ण आत्मसंयम के मरणकाल में भी आत्मा का अनुभव किस प्रकार से प्राप्त किया जा सकता है। भगवान श्रीकृष्ण के प्रत्येक शब्द की परिभाषा बताई गई है।

अर्जुन बोले -- हे आदर्श ! ब्रह्म वह क्या है? अध्यात्म क्या है? कर्म क्या है? अधिभूत किसको कहा गया है? और अधिदेव किसको कहा जाता है? यहाँ अधियज्ञ कौन है और वह यह देउमे कैसे है? हे मधुसूदन ! आत्मा (वास्तविक अंतःकरणवाले) मनुष्य के नियति द्वारा अंतकाल में आप कैसे आते हैं?
8॥2॥
भगवद  गीता अध्याय: 8
श्लोक 3

श्लोक:
श्रीभगवानुवाच
 अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते।
 भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः॥

भावार्थ:
श्री भगवान ने कहा- परम अक्षर 'ब्रह्म' है, अपना स्वरूप अर्थात जीवात्मा 'अध्यात्म' नाम से कहा जाता है तथा भूतों के भाव को उत्पन्न करने वाला जो त्याग है, वह 'कर्म' नाम से कहा गया है
 8॥3॥

व्याख्या:

जैसे शब्द क, ख, ग होते है
इनके मिलने से शब्द,शब्दों के मिलने से पूरा वाक्य बनता है।

जैसा कि , ब्रह्म शब्द का अर्थ परम अक्षर है, जो सर्वोपरि सच्चिदानंदघन अविनाशी निर्गुण निराकार परमात्मा का वाचक है। यह शब्द परमात्मा के उस रूप को दर्शाता है जो निराकार, निर्गुण और अविनाशी है।
इस से यह स्पष्ट होता है कि ब्रह्म शब्द का अर्थ केवल क, ख, ग़ आदि वर्णों से नहीं है, बल्कि यह परमात्मा के उस रूप को दर्शाता है जो सर्वोपरि और अविनाशी ब्रह्म से है।
परम अक्षर (अविनाशशी) तत्त्व ब्रह्म है; स्वभाव (अपना स्वरूप) अध्यात्म कहा जाता है; भूतों के भावों को उत्पन्न करने वाला विसर्ग (यज्ञ,शिक्षक) कर्म नाम से जाना जाता है।
8॥3॥
भगवद  गीता अध्याय: 8
श्लोक 4
श्लोक:
अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम्‌।
 अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर॥

भावार्थ:
उत्पत्ति-विनाश धर्म वाले सब पदार्थ अधिभूत हैं, हिरण्यमय पुरुष (जिसको शास्त्रों में सूत्रात्मा, हिरण्यगर्भ, प्रजापति, ब्रह्मा इत्यादि नामों से कहा गया है) अधिदैव है और हे देहधारियों में श्रेष्ठ अर्जुन! इस शरीर में मैं वासुदेव ही अन्तर्यामी रूप से अधियज्ञ हूँ
 8॥4॥
1. ब्रह्म

2. अध्यात्म

3. कर्म

4. अधिभूत

5. अधिदैव

6.जो प्राणिमात्रको अधिकारी है उसका नाम अधिभूत है। वह कौन है क्षर -- जो कि क्षय होता है ऐसा विनाशी भाव अर्थात् जो कुछ भी उत्पन्न करने वाला पदार्थ है वे सब अधिभूत हैं। पुरुष का तात्पर्य यह है कि सब जगत् उत्तम है अथवा जो शरीररूप पुरमें निवासवाला है, पुरुष बन्धु है वह सब इन्द्रियादि करणोंका अनुग्राहक सूर्यलोकमें निवासवाला हिरण्यगर्भ अधिदैवत है। यज्ञ ही विष्णु है इस श्रुतिके अनुसार सभी यज्ञोंका अधिष्ठाता जो विष्णुनामक देवता है वह अधियज्ञ है। हे देह पट्टियों में श्रेष्ठ अर्जुन इस देउमे जो यज्ञ है उनकी अधिष्ठाता वह विष्णुरूप अधियज्ञ मैं ही हूं। यज्ञ से शरीर ही सिद्ध होता है मूलतः यज्ञ से शरीर का नित्य संबंध होता है इसलिए उसे शरीर में रहना माना जाता है।
अर्थात
यहाँ पर 6 शब्दों की व्याख्या की गई है जो आध्यात्मिक ज्ञान के लिए महत्वपूर्ण हैं:

1. *ब्रह्म*: परमात्मा का नाम, जो सर्वोपरि और अविनाशी है।
हिन्दू धर्म में ब्रह्म को परम सत्य और जगत का सार माना जाता है।ब्रह्म को ईश्वर या परमात्मा भी कहा जाता है।ब्रह्म, सृष्टि का कारण है और उस पर आधारित है।ब्रह्म, सार्वभौमिक सिद्धांत है जो पूरी सृष्टि में सक्रिय है।ब्रह्म, अनंत, निर्मित और अविनाशी है।ब्रह्म, प्रकृति से परे है।ब्रह्म को सर्वोच्च अस्तित्व, परम सत्य और अनंत चेतना का प्रतीक माना जाता है।ब्रह्म के पर्यायवाची शब्द हैं - 
विधाता, स्वयंभू, प्रजापति,विष्णु आत्मभू, लोकेश, पितामह, चतुरानन, विरंचि आदिआदि
ब्रह्म को समझने के लिए वेदांत दर्शन और उपनिषदों में ज्ञान की खोज की गई है।

2. *अध्यात्म*: आत्मा का ज्ञान, जो व्यक्ति को अपने असली स्वरूप को समझने में मदद करता है।
अध्यात्म का मतलब है, अपने भीतर के चेतन तत्व को जानना, मनना, और दर्शन करना। यह एक व्यक्ति की आत्मा, ब्रह्म, या ईश्वर के साथ उसके अंतरंग संबंध को समझने और अनुभव करने की मात्र प्रक्रिया है।जिसे ऐसे समझें ।अध्यात्म व्यक्ति को अपने अस्तित्व के साथ जोड़ता है।अध्यात्मिक होने का मतलब है कि व्यक्ति अपने अनुभव के आधार पर जानता है कि वह अपने आनंद का स्रोत है।अध्यात्मिकता का संबंध हमारे आंतरिक जीवन से है।अध्यात्मिकता को दो चरणों वाली प्रक्रिया माना जाता है।पहला चरण आंतरिक विकास पर और दूसरा चरण, प्रतिदिन संसार में इस परिणाम की अभिव्यक्ति।अध्यात्मिक मार्ग एक विशिष्ट लक्ष्य या जीवन-काल की ओर निर्दिष्ट एक लघु अवधि का मार्ग है।जीवन की हर घटना इस यात्रा का हिस्सा है।
आध्यात्मिक यात्रा में ध्यान, प्रार्थना, उपवास जैसे अभ्यास भी शामिल होते हैं।कुछआध्यात्मिक लोग हमेशा नंगे पैर रहते हैं और खाली ज़मीन पर बैठना पसंद करते हैं।
पहाड़ों में रहना चुनौतीपूर्ण होते हुए भी योगी अक्सर अपने रहने के लिए पहाड़ों को ही चुनते हैं।

3. *कर्म*: व्यक्ति द्वारा किए गए कार्य, जो उसके जीवन को आकार देते हैं।
कर्म का मतलब है, इंसान द्वारा किया गया कोई भी काम. कर्म की व्याख्या इस प्रकार से की जा सकती है: 
कर्म, कार्य-कारण के सिद्धांत के आधार पर काम करता है, यानी, पिछले अच्छे कामों का अच्छा और बुरे कामों का बुरा नतीजा ही मिलता है।
कर्म के सिद्धांत के मुताबिक, इंसान जो भी काम करता है, उसे उसका नतीजा मिलता है।
कर्मों के आधार पर ही इंसान की सामाजिक, आर्थिक, और पारिवारिक स्थिति तय होती है।
कर्मों का फल तत्काल भी मिलता. (किसी को थप्पड़ मारा तो तुरंत घुसा मिलता है।किसी ने किसी अबला के साथ बतमीजी की तो सड़क पर आने जाने वाले ही उस की धुनाई कर तुरंत फल दे देते हैं।कुछ कर्मों का फल तुरंत नहीं मिलाकरता समय लेता है। आज बीज बोया तो कुछ समय बाद फल प्राप्त होता है ।
कर्म अच्छे या बुरे हो सकते हैं. अच्छे कर्मों का नतीजा भी अच्छा होता है और बुरे कर्मों का नतीजा भी बुरा होता है. 
कर्मों का मूल्य उनके बाहरी रूप और फल में नहीं, बल्कि उनसे होने वाली आंतरिक दिव्यता की वृद्धि में होता है।
कर्मों का संबंध पुनर्जन्म से भी जुड़ा है।जैसे तरबूज जहां बीजा जाता है उसका फल थोड़ी दूर उसकी बेल से मिलता है।इसी तरह पूर्व जन्म का फल इस जन्म में मिलता है।जो जीव को भोगना ही पड़ता है।जीव को अपने अच्छे-बुरे कर्मों का फल भुगतने के लिए फिर से जन्म लेना पड़ता है।अब प्रश्न उठता हे कि जब कर्मों  का नाश ही नहीं होता,ओर उनका अच्छा बुरा फल भी भुगतना है तो तप आदि का क्या लाभ?
ऐसा नहीं है पूर्व जन्म के फल तो भोगने है।अब अगर निष्काम कर्म करें तो उनका फल नहीं आए गा। भोगने वाले भोग लिए निष्काम कर्म तो आगे भोगने ही नहीं हैं।

4. *अधिभूत*: भौतिक जगत, जो नाशवान और परिवर्तनशील है।अधिभूत शब्द के कई अर्थ होते हैं: 
अधिभूत का अर्थ है ब्रह्म. 
अधिभूत का अर्थ है सृष्टि के सभी पदार्थ. 
अधिभूत का अर्थ है भूत संबंधी. 
अधिभूत का अर्थ है जिसका क्षरण होता है, जो नाशवान है, जिसका परिवर्तन होता है, जो बदलता है. 
अधिभूत का अर्थ है उत्पन्न हुआ सब भावों जरा-मरण (क्षर) स्वभाव के होते हैं. 
5. *अधिदैव*: दिव्य शक्ति, जो देवी या देवता का रूप है।
अधिदैव शब्द का अर्थ है: दैविक, दवयोग से होने वाला, आकस्मिक. 
भगवद्गीता के अनुसार, अधिदैव सूक्ष्म अस्तित्व का आधार है. वहीं, अधिभूत भौतिक अस्तित्व का आधार है. 
अधिदेवता या अधिदेवी शब्द का अर्थ है, ऐसे देवता या देवी जो किसी स्थान, परिवार, गाँव, शहर, व्यक्ति, राष्ट्र, व्यवसाय या अन्य चीज़ का रक्षक होने के लिए विशेष मान्यता रखते हों. उदाहरण के लिए, हिन्दू धर्म में ज्ञान की अधिदेवी सरस्वती , कुल देवी देवता भी हैं।

6. *अधियज्ञ*: यज्ञ का अधिष्ठाता, जो विष्णु या परमात्मा का रूप है, जो यज्ञ को सिद्ध करता है।
अधियज्ञ शब्द के कई अर्थ होते हैं: 
अधियज्ञ का मतलब है यज्ञ से संबंध रखने वाला या यज्ञ संबंधी. 
अधियज्ञ का मतलब प्रधान यज्ञ भी होता है. 
भगवद्गीता के मुताबिक, परमात्मा अधियज्ञ कहलाता है और वह हृदय में स्थित होता है. 
भगवद्गीता के मुताबिक, मैं (स्थूल तथा सूक्ष्म ब्रह्माण्डीय रूप से विचारात्मक रूप से प्रकट हुआ आत्मा) अधियज्ञ हूँ. 
यज्ञ का मतलब है भक्ति, पूजा, अग्नि में आहुति देने का कार्य. हिंदू धर्म में यज्ञ को हवन के नाम से भी जाना जाता है।
8।।4।।
भगवद  गीता अध्याय: 8
श्लोक 5

श्लोक:
अंतकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्‌।
 यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः॥

भावार्थ:
जो पुरुष अंतकाल में भी मुझको ही स्मरण करता हुआ शरीर को त्याग कर जाता है, वह मेरे साक्षात स्वरूप को प्राप्त होता है- इसमें कुछ भी संशय नहीं है
 8॥5॥

व्याख्या:

किसको सब कुछ वासुदेव ही है। (माता, पिता,बंधु,सखा,गुरु इत्यादि,इत्यादि।)

इस समग्ररूपका ज्ञान हो गया है उसके लिए अंतकालके स्मरण की बात ही नहीं की जा सकती।

 कारण कि दृष्टि में संसार की स्वतन्त्र सत्ता न सब कुछ वासुदेव ही है उसके लिए अन्तकाल में भगवान् का चिन्तन करें यह कहना ही नहीं बनता।

👉(जैसे एक प्राणी मृत्यु शया पर होता है। और भयंकर पीड़ा से कहरा रहा होता है तो परिवार जन उस से पूछते है बापू यह कौन है?
वह देख कर जवाब देता है यह फलाना है।पर राम या इष्ट का नाम ही नहीं ले पाता।क्यों कि वह अभ्यास से टूटा होता है ,उसने राम नाम का अभ्यास ही नहीं किया होता।)

 जैसे सामान्य मनुष्य मैं हूं अपने होने का किंचिन्मात्र का भी स्मरण नहीं करना चाहिए ऐसे ही उस महापुरुषों का भगवान का स्मरण नहीं करना चाहिए।

 अपितु उसे जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति आदि अवस्थाओं में भी भगवान के दिव्य ज्ञान, में रहना होता है। किसी भी काल में जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति मूर्छा रुग्नता निरोगता आदि किसी भी काल में पवित्र या अपवित्र कल्याण कोई भी वस्तु पदार्थ आदि सामने कुछ भी हो सकता है कि महापुरुषों के बीच में किञ्चिन्मात्र भी कोई सन्देह नहीं रहता,

 जैसे महापुरुषों के भगवान की पूजा करने वाले भक्त भी साधक हैं वे सच्चे या निराकार के उपासक हों या निराकार के उपासक हों चाहे सगुण उपासक हों या निर्गुण के उपासक हों। राम कृष्ण आदि अवतारों के उपासक होन भगवान के किसी भी नाम रूप में लीला धाम आदिकी श्रद्धाप्रेम की पूजा करनेवाले क्यों न हों । उन भक्तों को अपनी रुचिके अनुसार अंत समय में भगवान के किसी भी रूप का नाम आदिका स्मरण हो जाता है तो वह भगवान का ही स्मरण होता है। 

पर साधकों के अंत समय में भगवान का स्मरण स्वाभाविक ही हो जाता है। 
जैसे जीवन में उसने सुना है कि दुःखी के दुःख को भगवान समझते हैं इस संस्कार से अन्तिम समय की पीड़ा(दुःख) के समय भी उसे भगवान की याद आ सकतो है। अन्त समय में यदि यमदूत दिखायी दे जायें तो भयके कारण भगवान का स्मरण हो जाता है। 

कोई साधु उसके सामने भगवान्का चित्र रख दे--देखें भगवान नाम सुना दे भगवानकी लीला की कथा सुना दे भक्तों का चरित्र सुना दे उसका सामने कीर्तन करने लग गया तो भगवानकी याद आ जाएगी। इस प्रकार किसी भी कारण से भगवान की ओर से ही स्मरण किया जाता है।

 संबंध-- अंतकाल में जो मेरा स्मरण करते हैं वे तो मेरे को ही प्राप्त होते हैं। पर जो मेरा स्मरण न करके अन्य किसी ओर का स्मरण करते हैं। यह किसी को याद करते है। जैसे किसी का धयान किसी और की ओर हो जाए उस की मन इंद्रियों वृति कही और भटक जाए तो उसको उसी को प्राप्त हो जाना होता है ऐसा ही हम सुनते पड़ते आ रहे हैं।
महर्षि व्यास वेदांत के इस वैज्ञानिक सिद्धांत पर बल देते हुए कहा गया है कि कोई भी जीव किसी भी देह विशेष के साथ तब तक तादात्म्य बना रहता है जब तक कि उसे अपनी संबद्धता प्राप्त करने में वह उपयोगी और आवश्यक नहीं हो जाता। एक बार यह सिद्ध हो गया कि वह उस शरीर को सदा के लिए त्याग देती है। मूल्य उस देह के प्रति न कोई कर्तव्य रहता है न संबंध और न ही कोई अभिमान। देह से विलग के समय जीव के मन में उस विषय के संबंध में विचार होता है जिसके लिए वह प्रबल इच्छा या सहमति व्यक्त करता है वह इच्छा किसी भी जन्म में पैदा हुई हो। इस प्रकार की उपयुक्त युक्तियुक्त है। ध्यान और भक्ति की साधना मन को एकाग्र करने की कला है जिसमें ध्येय विषयक एक अखण्ड वृत्ति कायम रखी जाती है। ऐसे साधक अन्तकाल में मेरा ध्यान ही शरीर को त्याग कर जाता है। मरण के पूर्व जीव की यह अन्तिम प्रबल इच्छा उसकी भावी गति को निश्चित रूप से पूरा करती है। जो जीव अपने जीवन काल में केवल आचरण और स्वार्थ का जीवन जीता है और देह के साथ तादात्म्य बनाकर निम्न स्तर की कामना करता है, उसे ही पूर्ण करने में संलग्न रहता है हो ऐसा जीव वैश्य गुणों से युक्त होने के कारण ऐसे ही शरीर को धारण करता है जिसमें उसका पाश्विक प्रवृत्तियाँ अधिक से अधिक सन्तुष्ट हो।  विकास की डॉक्यूमेंट्री स्थिति प्राप्त होती है। वेदांत के अनुसार इसी युक्तियुक्त एवं बुद्धिगामी सिद्धांत में यह घोषणा की गई है कि मरणासन्न पुरुष की अंतिम इच्छा उसके भावी शरीर और वातावरण को निश्चित करती है। इसलिए भगवान यहां कहते हैं कि अंतकाल में आगे जो पुरुष मेरा स्मरण करता है उसका देह त्याग करता है वह मेरे स्वरूप को है प्राप्त होता है। यह कथन केवल मेरे ही विषय में नहीं है।

मनुष्य अन्तकाल में भी मेरे स्मरण से शरीर नष्ट हो जाता है, उसका स्वरूप ही प्राप्त होता है, उसमें सन्देह नहीं होता।
8॥5॥
भगवद  गीता अध्याय: 8
श्लोक 6

श्लोक:
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्‌।
 तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः॥

भावार्थ:
हे कुन्ती पुत्र अर्जुन! यह मनुष्य अंतकाल में जिस-जिस भी भाव को स्मरण करता हुआ शरीर त्याग करता है, उस-उसको ही प्राप्त होता है क्योंकि वह सदा उसी भाव से भावित रहा है
 8॥6॥
भगवद  गीता अध्याय: 8
श्लोक 7

श्लोक:
तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युद्ध च।
 मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्‌॥

भावार्थ:
इसलिए हे अर्जुन! तू सब समय में निरंतर मेरा स्मरण कर और युद्ध भी कर। इस प्रकार मुझमें अर्पण किए हुए मन-बुद्धि से युक्त होकर तू निःसंदेह मुझको ही प्राप्त होगा
 8॥7॥

व्याख्या:
[सातवें अध्यायके अट्ठाईसवें श्लोक में जो सगुणनिराकार भगवान का वर्णन हुआ था उसी को यहां मियामी नवें और दसवें श्लोक में विस्तार से कहा गया है।]
कोई भी धर्म तब तक समाज की सामुहिक सेवा नहीं कर सकता जब तक वह धर्मानुयायी लोगों को अपना पारंपरिक दैनिक जीवन जीने की विधि और साधना का उपदेश नहीं देता। 

यहां एक ऐसी साधना बताई गई है जो भौतिक और आध्यात्मिक दोनों ही क्षेत्रों में समान रूप से लागू होती है। इस सरल उपदेश के पालन से न केवल रहन सहन स्तर का बल्कि संपूर्ण जीवन का स्तर भी ऊंचा किया जा सकता है। 

अनेक लोगों को सन्देह होता है कि मन को धर्म और स्थिर जीवन में बाँटना किसी भी क्षेत्र में वास्तविक सफलता प्राप्त करता है ।। 

वास्तव में यह एक अविचारपूर्ण तर्क है। बहुत ही कम मौकों पर किसी व्यक्ति का मन उसी स्थान पर मिलता है जहां वह काम कर रहा होता है। सामान्यत: मन का एक बड़ा भाग भय के भयंकर जंगल में या फिर तितर-बितर की गुफाओं में या फिर असफलता की काल्पनिक दुर्लभताओं के रेगिस्तान में हमेशा भटकता रहता है। इस प्रकार मन की संपूर्ण शक्ति का अपव्यय करने के स्थान पर भगवान उपदेश देते हैं कि भौतिक और आध्यात्मिक दोनों ही क्षेत्रों में सर्वोच्च लाभ प्राप्त करने की इच्छा और प्रयासशील पुरुष को अपना मन शांत और परम सत्य में स्थिर करना चाहिए। ऐसा करने से वह अपनी संपूर्ण क्षमता को अपने कार्य के उपयोग में ला सकता है और इस प्रकार इह और दोनों ही लोकों में सर्वोच्च सम्मान का स्थान प्राप्त कर सकता है।

 हिंदू धर्म में धर्म और जीवन में समानता नहीं है। 

एक और विलग होने से दोनों ही नष्ट हो गये। वे एकता समान ही जुड़े हुए हैं जैसे इंसान का धड़ और मस्तक। वियुक्त कथन दोनों ही जीवित नहीं रह सकते। जीवन में आने वाली परीक्षा का भगवान में भी एक शिष्य साधक को चाहिए कि वह अपने मन के सामान्य शुद्ध आत्मस्वरूप तथा विश्व के अधिष्ठान ब्रह्म में एकत्व भाव से स्थिर रहना सीखे। न तो यह कठिन है और न ही  *👉अनाभ्यसन। यदि यह आपकी पहचान भूलकर थिएटर के बाहर भी वह राजा के समान व्यवहार करने लगा तो चालू ही उसे समाज के हित में किसी भी पागलखाने में भर्ती करा दिया जाएगा। लेकिन वह अपने वास्तविक व्यक्तित्व को जानता है इसलिए कुशल अभिनेता होता है। 

इसी प्रकार सदा अपने दिव्य स्वरूप के प्रति विशेषज्ञ रहते हुए भी हम जगत में बिना किसी बाधा के कार्य कर सकते हैं। इस ज्ञान में स्थित लक्ष्य कर्म करने से हमारी पूर्ति को विशेष आधार प्राप्त होता है और उसके साथ ही जीवन में आने वाली घड़ी में उत्पन्न होने वाली मन की मृत्यु को हम शांत और मंद करने में समर्थ भूमिका निभाते हैं। 

वास्तविक अर्थ में एक सुशिक्षित एवं सुसंस्कृत पुरुष को कभी भी अपनी शिक्षा का विस्मरण नहीं होता। वह तो अपने जीवन का अंग बन जाता है। उनके आचार विचार और व्यवहार में शिक्षा की सुरभि का सतत निस्सारण ​​होता रहता है। उसी प्रकार आत्मभाव में स्थित मन में साक्षात् प्रति करुणा और पुरुष प्रेम तथा कर्मों में निःस्वार्थ भाव होता है। यही वह रहस्य है जिसका कारण यह है कि वैदिक सभ्यता ने अपने काल में संपूर्ण विश्व को अपनी ओर आकर्षित किया और वह भावी मंदिर के सम्मान का पात्र बनी। स्मरण में उसका मन और बुद्धि सम्मिलित हो जाता है। अपने विचारों के अनुसार तुम बनोगे इस सिद्धांत के अनुसार तुम मुझे निःसंदेह प्राप्त करोगे।
 *👉अनाभ्यसन का अर्थ होता है।

अनाभ्यसन शब्द का अर्थ है "अभ्यास न करना" या "अनुशासन में न रहना"।

 इसका भाव यह है कि जब कोई व्यक्ति किसी विशेष कार्य या अभ्यास को नियमित रूप से नहीं करता है, तो वह उस कार्य में प्रवीणता प्राप्त ही नहीं कर सकता है और उसकी प्रगति रुक जाती है।
8॥7॥
भगवद  गीता अध्याय: 8
श्लोक 8

श्लोक:
( भक्ति योग का विषय ) 
 अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना।
 परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन्‌॥

भावार्थ:
हे पार्थ! यह नियम है कि परमेश्वर के ध्यान के अभ्यास रूप योग से युक्त, दूसरी ओर न जाने वाले चित्त से निरंतर चिंतन करता हुआ मनुष्य परम प्रकाश रूप दिव्य पुरुष को अर्थात परमेश्वर को ही प्राप्त होता है
 8॥8॥

भगवद  गीता अध्याय: 8
श्लोक 9

श्लोक:
कविं पुराणमनुशासितार-मणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः।
 सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप-मादित्यवर्णं तमसः परस्तात्‌॥

भावार्थ:
जो पुरुष सर्वज्ञ, अनादि, सबके नियंता (अंतर्यामी रूप से सब प्राणियों के शुभ और अशुभ कर्म के अनुसार शासन करने वाला) सूक्ष्म से भी अति सूक्ष्म, सबके धारण-पोषण करने वाले अचिन्त्य-स्वरूप, सूर्य के सदृश नित्य चेतन प्रकाश रूप और अविद्या से अति परे, शुद्ध सच्चिदानन्दघन परमेश्वर का स्मरण करता है
 8॥9॥

व्याख्या:

भगवद्गीता के अध्याय 8 के श्लोक 9 में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि परम पुरुष को प्राप्त करने के लिए क्या करना चाहिए।

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो योगी अपने मन को एकाग्र करके परम पुरुष का स्मरण करता है, वह उनका स्मरण इसी प्रकार प्राप्त होता है।

इस श्लोक की व्याख्या इस प्रकार की जा सकती है:

परम पुरुष को प्राप्त करने के लिए, योगी को अपने मन को एकाग्र करना चाहिए और परम पुरुष का स्मरण करना चाहिए।
परम पुरुष का स्वरूप अचिन्त्य है, अर्थात् उनका स्वरूप नियत और फल होता है, और वह किसी के द्वारा चिंतन नहीं किया जा सकता है।
परम पुरुष का वर्ण सूर्यके समान है, अर्थात् वह नित्य चेतनप्रकाशमय है।
परम पुरुष अज्ञानरूप मोहमय अंधकारसे सर्वथा अतीत है, अर्थात् वह अज्ञान और मोह से मुक्त है।
योगी को परम पुरुष का स्मरण करना चाहिए, जिससे वह उनका स्मरण प्राप्त कर सके।

 जैसे एक आदमी मंदिर में जल चढ़ाता है, दूसरा रोज पत्थर बरसाने जाता है पर पथर बरसाने वाले का नियम होता है दूसरे का नहीं
 यह  उदाहरण समझने में मदद करता है कि नियमितता और अनुशासन कितने महत्वपूर्ण हैं।

जैसा कि आप ने पढ़ा एक आदमी मंदिर में जल चढ़ाता है, लेकिन उसके पास कोई नियम नहीं है। वह कभी-कभी जल चढ़ाता है, लेकिन नियमित रूप से नहीं भी।

दूसरी ओर, दूसरा आदमी रोज पत्थर बरसाने जाता है, लेकिन उसके पास एक नियम है। वह हर रोज एक निश्चित समय पर पत्थर बरसाने जाता है, और यह उसके लिए एक नियम बन जाता है।

इस उदाहरण से हमें यह समझने में मदद मिलती है कि नियमितता और अनुशासन हमारे जीवन में कितने महत्वपूर्ण हैं। जब हम किसी कार्य को नियमित रूप से करते हैं, तो हम उसमें प्रवीणता प्राप्त कर लेते हैं और हमारे जीवन में स्थिरता और अनुशासन आता है।

8॥9॥

भगवद  गीता अध्याय: 8
श्लोक 10

श्लोक:
प्रयाण काले मनसाचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव।
 भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक्‌- स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम्‌।

भावार्थ:
वह भक्ति युक्त पुरुष अन्तकाल में भी योगबल से भृकुटी के मध्य में प्राण को अच्छी प्रकार स्थापित करके, फिर निश्चल मन से स्मरण करता हुआ उस दिव्य रूप परम पुरुष परमात्मा को ही प्राप्त होता है
 ॥10॥

भगवद  गीता अध्याय: 8
श्लोक 10

श्लोक:
प्रयाण काले मनसाचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव।
 भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक्‌- स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम्‌।

भावार्थ:
वह भक्ति युक्त पुरुष अन्तकाल में भी योगबल से भृकुटी के मध्य में प्राण को अच्छी प्रकार स्थापित करके, फिर निश्चल मन से स्मरण करता हुआ उस दिव्य रूप परम पुरुष परमात्मा को ही प्राप्त होता है।

व्याख्या:

योग करते हुए अपना ध्यान हमें अपने भृकुटियाँ के बीच में यानी के आईब्रो के बीच में रखना होता है। 
वो पुरुष जिसके मन में भक्ति है।
जो अपने कर्म करता है और वह पुरुष जब अंत काल में अपने योगबल से भृकुटि के मध्य में प्राण को अच्छी प्रकार स्थापित करके फिर निश्चल मन से स्मरण करता है।यहां कृष्ण बता रहे हैं कि कैसे अंत काल के समय आप उस परमात्मा को याद कर उसी को प्राप्त हो सकते हैं।
इस श्लोक का एकमात्र वाच्यार्थ लेकर गीतकार इसे विपरीत रूप से समझाता है, जो कि वास्तव में जादुई शक्ति नहीं है। गीता में प्रस्तुत प्रकरण का विषय एकाग्र चित्त से परम पुरुष का ध्यान है। मूलतः प्राणकाल से अभिप्राय मृत्यु के क्षण से पुनर्ग्रहण करना चाहिए। ध्यान साधना के द्वारा जब शरीर, मन और बुद्धि को ध्यान में रखते हुए तादात्म्य को पूर्णता से निवृत्त किया जाता है तब साधक आन्त्रिक शांति के स्थिर क्षण का अनुभव करता है। उस समय निश्चल मन से इस श्लोक में उपदिष्ट साधना का पालन करना चाहिए।यहाँ भक्ति शब्द से सामान्य सांसारिक भाषा की क्रियाविधि की भक्ति नहीं समझनी चाहिए। ईश्वर के लिए वह परम प्रेम है जिसमें न किसी प्रकार की कामना है और न ही तीव्र प्रेम जो केवल प्रेम है उसके लिए ही भक्ति है। प्रेम का अर्थ है अपने प्रियतम से वह तादात्म्य जिसमें प्रियतम के सुख और दुख अपने स्वयं के ही सुखद सुख का अनुभव होता है। संक्षेप में प्रेमी और प्रेमिका भक्त और ईश्वर एकता एकरूप हो जाते हैं। इसलिए श्री सनातनानुसंधान भक्ति का लक्षण है अर्थात् जीव का अपने सत्यस्वरूप के साथ एकत्व भक्ति है। हो। आत्मा का स्वरूप पूर्व श्लोक में विस्तार से बताया गया है। आन्तरिक शान्ति के समय जब ईश्वर की मृत्यु होती है तब साधक को आत्मस्वरूप में स्थित होना चाहिए। सामान्यतः उनका रहस्य प्रकट नहीं हुआ। योगबल से इलेक्ट्रिक साधक के उस बल से जो उसे दीर्घकाल तक नियमित रूप से ध्यानाभ्यास करने की शुरुआत प्राप्त होती है। यह आन्त्रिक शक्ति है जो मन के विषयों से तथा तज्जनित विक्षेपों से निवृत्त होती है तथा बुद्धि के परम सत्य में स्थिर होने से प्राप्त होती है तथा सामुद्रिक रूप से समृद्ध होती है। कार्यकुशलता से पूर्ण तत्परता के साथ ध्यान में एक चित्त हो जाता है। ध्यानाभ्यास में रत योगी के संपूर्ण प्राण उनके ध्यानबिंदु में केन्द्रित हो जाते हैं जैसे यहाँ मध्य में भ्रकुटी में कहा गया है। यह भाग स्थिर विचार का स्थान माना जाता है। वेदांत में प्राण से अमूर्त केवल वायु से न शरीर के विभिन्न अंगों में विभिन्न रूप से वाणी हो रही जीवनशक्ति से है। इस जीवनशक्ति (प्राण) का पंचम कार्य के पंचम उद्गम में मिश्रण किया गया है जैसे प्राण विषय ग्रहण की क्रिया के अनुसार मल विसर्जन व्यान संपूर्ण शरीर में रक्त आदि प्रवाहित करना समान पाचन क्रिया और उदान जिसके कारण हममें वह क्षमता होती है जो वर्तमान से परे है भी ज्ञान को हम समझते हैं सहायक। इनमें से हमारी बहुत सी शक्ति बिखर जाती है जो ध्यानाभ्यास के समय एक स्थान पर कुछ समय के लिए केन्द्रित हो जाती है। ध्यानमार्ग पर चलने वाले साधक के लिए तीव्र गति से जाने वाली किसी भी शारीरिक साधना की आवश्यकता नहीं होती है। परम श्रद्धा एवं उत्साह के साथ ध्येय आत्मतत्त्व के साथ एक रूप हो जाता है वह उस परम दिव्य पुरुष का अनुयायी होता हैप्राप्त होता है। ओंकार पर विशेष ध्यान के प्रस्ताव के रूप में अगला श्लोक है --

भगवद  गीता अध्याय: 8
श्लोक 11

श्लोक:
यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये॥

भावार्थ:
वेद के जानने वाले विद्वान जिस सच्चिदानन्दघनरूप परम पद को अविनाश कहते हैं, आसक्ति रहित यत्नशील संन्यासी महात्माजन, जिसमें प्रवेश करते हैं और जिस परम पद को चाहने वाले ब्रह्मचारी लोग ब्रह्मचर्य का आचरण करते हैं, उस परम पद को मैं तेरे लिए संक्षेप में कहूँगा
8॥11॥

भगवान दूर बताये जानेवाले उपाय से प्राप्त होनेयोग और वेदविदो वदन्ति के एक विशेष विशेष विवरण के साथ, जानेवाले विद्वान जिस अक्षरका का वर्णन करते हैं --, हे गार्गी ब्राह्मण लोग वही इस अक्षरा का वर्णन करते हैं। जिसका अर्थ है कि कभी नाश न हो ऐसे परमात्माका वह न स्थूल है न सूक्ष्म इस प्रकार सभी विशेष सम्मिलित करके वर्णन किया जाता है तथा आस्किट नष्ट हो गया है ऐसे वीतराग यत्नशील संती यथार्थ ज्ञानकी प्राप्ति हो जाने पर जिसमें प्रविष्ट होते हैं। एवं जिस अक्षर को जाना जाता है (साधक) गुरुकुल में ब्रह्मचर्यव्रत का पालन किया जाता है वह अक्षरनामक पद अर्थात प्राप्त करने योग्य स्थान मैं युवा संग्रहसे--संक्षेपसे बतलाता हूं। संग्रह संक्षेपको कहते हैं। सत्यकामके यह शास्त्रपरक है कि हे भगवान ने कहा है कि हे सत्यकाम यह ओंकार ही निःसंदेह परब्रह्म है और यही अपर ब्रह्म भी है। इस प्रकार प्रसाद ग्रहण करके फिर जो कोई भी यह तीन मात्रा वाले ॐ की पूजा करता है। अन्य वचनों से (प्रश्नोपनिषदें) तथा जो धर्मसे नष्ट होता है तथा अधर्म से भी उसका नाश होता है, इस प्रकार प्रसङ्ग आक्षेप करके फिर समस्त वेद जिस परमपदका का वर्णन कर रहे हैं, समस्त तप योग बता रहे हैं तथा जिस परमपदको प्रमाणित करनेवाले ब्रह्मचर्यका पालन करते हैं वह परमपद संक्षिप्तसे बताऊँगा। ॐ ऐसा यह (एक अक्षर) है। अन्य वचनों से (कोोपनिषदें)। परमब्रह्म का वाचकसे एवं प्रतिमाकी भाँति उसका प्रतीक (के) होनेसे मनद और मध्यम बुद्धिवाले साधकोंके लिए जो परमात्मकी प्राप्तिका साधनरूप माना गया है वह ओंकारकी कालान्तर में मुक्तिरूप फल प्रदान करता है जो उपासना बताई गई है।
इस श्लोक में जो एक प्रसिद्ध उपनिषद के मंत्र का स्मरण कराता है, उसमें भगवान श्रीकृष्ण लक्ष्य की स्तुति करते हैं, वे वचन देते हैं कि वे निम्नलिखित श्लोकों में पूर्णत्व के परम लक्ष्य तथा तत्प्राप्ति के उपायों का वर्णन करेंगे। ध्यानसाधना में पूर्ण सफलता प्राप्त करने के लिए मन की योग्यता अत्यावश्यक होती है। इस योग्यता के सम्पादन के लिए सभी उपनिषदों में ओंकारोपासना का अनेक स्थानों पर उपदेश दिया गया है। पौराणिक युग से इस आराधना का स्थान श्रद्धाभक्ति ने देखा, जाने वाले ईश्वर के साकार रूप या अवतारों का ध्यान आदि ने लिया है। इस प्रकार के ध्यान का प्रस्ताव और समीक्षा दी गई है जो वैदिक उपासनाओं की है। यहां साधकों को कई प्रकार के प्रतिबन्धों की शराब और आवश्यक सावधानियों का निर्देश दिया गया है जिससे उनकी आध्यात्मिक तीर्थयात्रा अधिक सरल और आनंदप्रद हो सके। साधारणतः जिन विघ्नों की याचिका साधक करते हैं वे सब विघ्न अनात्म डिग्रीयों से मिले तादात्म्य के कारण ही आते हैं। इन डिग्रीयों के तादात्म्य से मन को परावर्तन करने में वह स्वयं को अशक्त पाता है। आत्मोन्नति के शास्त्र के रूप में वेदांत के लिए आवश्यक है कि इस साधक को ध्यान की विधि बताई जाए, साथ ही समभावित विज्ञान का भी संकेत दिया जाए ताकि सुरक्षित जीवन के उपायों का भी वर्णन किया जा सके। यदि साधक को संपूर्ण ज्ञान हो तो शीघ्र ही वह अपनी सुरक्षा कर सकता है। यह श्लोक बताता है कि आत्मसंयम और वैराग्य के किस प्रकार से इस मार्ग पर सुख मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है। इसी अध्याय में ब्रह्म की लौकिक परिभाषा देते हुए उसे अक्षर कहा गया था। भगवान श्रीकृष्ण के विशेष बल के नेता कहते हैं कि जो वीतराग यति हैं वे ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं वही अक्षर ब्रह्म में प्रवेश करते हैं। प्रगति और विकास के प्रचारक हैं कामनाओं का संत, बुद्धि की मौलिकता का फल, मन की प्रवृत्तियों का दमन नहीं। नैनी खिली हुई कलियाँ कुछ समय की पार्टियाँ अपनी कोमलसुंदर मूर्ति के चित्र को त्यागकर शोभनीयता का संन्यासी कथन नग्न अवस्था में स्थिर रहती हैं। प्रकृति में यह तब होता है जब फूलों पर सेचन क्रियाकलापों की रचना हो गई। इन फूलों पर दृष्टिपात करने वाले एक सामान्य पुरुष की दृष्टि से इस प्रकार के बिखरे हुए फूलों का महान त्याग या संत हो सकता है। इस प्रकार भारत के आध्यात्मिक ज्ञान के सिद्धांत निःसंदेह ही संत या वैराग्य की आवश्यकता को बल दिया गया है, लेकिन उनका अर्थ निरादर और विषादपूर्ण आत्मत्याग या स्वयं को दंडित नहीं करना है। किन्हींकिन्हीं धर्मों में इस प्रकार के त्याग को बढ़ावा एवं अभ्यास दिया जाता है। उपनिषदों के ऋषियों ने सदा सम्यक विवेक जनित वैराग्य का ही उपदेश दिया है और उनका आग्रह है। इसलिए वीतरागः शब्दों से उन साधकों को श्रेय देना चाहिए जो विषयों की सच्चाई और जीवन के परम लक्ष्य की श्रेष्ठता समझकर विषयासक्ति से सर्वथा मुक्त हो गए हैं। विक्षेपों की अधिकता का मानसिक अर्थक्षमता की नवीनता है। साधक के ध्यान में सफलता मन की शक्ति पर निर्भर करती है और मनः शांति ही वह धन है जिससे इस यात्रा की कठिनाइयाँ और कष्ट कम हो सकते हैं। मूल रूप से एक नियम के रूप में कहा जा सकता है कि ज्ञान मार्ग में पुरुषों को सफलता का अवसर अधिक मिलता है, जबकि कामनाओं की संख्या न्यूनतम होती है। भगवान के लिए उपासना का क्रम और फल बताए गए हैं--

- परम पुरुष को प्राप्त करने के लिए, योगी को अपने मन को एकाग्र करके परम पुरुष का स्मरण करना चाहिए।
- परम पुरुष का स्वरूप अचिन्त्य है, अर्थात् उनका स्वरूप नियत और फल होता है, और वह किसी के द्वारा चिंतन नहीं किया जा सकता है।
- परम पुरुष का वर्ण सूर्यके समान है, अर्थात् वह नित्य चेतनप्रकाशमय है।
- परम पुरुष अज्ञानरूप मोहमय अंधकारसे सर्वथा अतीत है, अर्थात् वह अज्ञान और मोह से मुक्त है।
- योगी को परम पुरुष का स्मरण करना चाहिए, जिससे वह उनका स्मरण प्राप्त कर सके।

👉सरल विस्तृत व्याख्या:

परम पुरुष को प्राप्त करने के लिए योगी का अपने मन को एकाग्र कर परम पुरुष का स्मरण करना, गीता और अन्य ग्रंथों में एक साधना मार्ग के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इसका भाव विस्तार से समझाया जा सकता है:

1. मन को एकाग्र करना:

भावार्थ: मन को एकाग्र करने का अर्थ है कि योगी को अपने इंद्रियों और विचारों को स्थिर कर, उन्हें संसारिक इच्छाओं और विकारों से मुक्त करना चाहिए।

विधि: यह साधना ध्यान, प्राणायाम और आत्म-चिंतन के माध्यम से की जाती है, जिससे मन की चंचलता समाप्त होती है।

गीता का संदर्भ: भगवद गीता (6.19) में कहा गया है कि ध्यान में स्थित योगी का मन "दीपक की लौ" की भांति स्थिर हो जाता है, जो वायु से प्रभावित नहीं होती।

2. परम पुरुष का स्वरूप अचिन्त्य है:

अर्थ: परम पुरुष (ईश्वर) का स्वरूप हमारी कल्पना और समझ से परे है। उन्हें न तो इंद्रियों से अनुभव किया जा सकता है और न ही साधारण मनोविज्ञान द्वारा समझा जा सकता है।

भाव: योगी को चाहिए कि वह अपने विचारों को "निर्गुण" (अचिन्त्य, अव्यक्त, अप्रकाशित) परमेश्वर पर केंद्रित करे, जो समस्त कारणों का कारण हैं।

गीता का संदर्भ: गीता (12.3-4) कहती है कि "जो अदृश्य और अचिन्त्य स्वरूप को ध्यान में रखते हुए आराधना करते हैं, वे भी मोक्ष के अधिकारी होते हैं।"

3. परम पुरुष का वर्ण सूर्य के समान है:

भावार्थ: परम पुरुष प्रकाशमय हैं, उनका स्वरूप चेतन और दिव्यता से युक्त है।

प्रतीक: सूर्य के समान दिव्यता का अर्थ है कि वे ज्ञान और सत्य के स्त्रोत हैं। यह प्रतीक यह दर्शाता है कि ईश्वर सब कुछ आलोकित करते हैं, अज्ञान को मिटाते हैं।

ध्यान में उपयोग: योगी अपने ध्यान में इस प्रकाश को स्मरण करता है, जिससे आत्मा और परमात्मा का संबंध प्रकट होता है।

4. अज्ञान और मोह से अतीत:

अर्थ: परम पुरुष अज्ञान, मोह, और संसारिक बंधनों से परे हैं। उन्हें जानने के लिए योगी को अपने अज्ञान और मोह को समाप्त करना पड़ता है।

प्रक्रिया:

स्वधर्म और कर्म योग के द्वारा अपने कर्मों को शुद्ध करना।

ध्यान के माध्यम से अज्ञान के अंधकार को हटाना।

गीता का संदर्भ: गीता (10.11) में श्रीकृष्ण कहते हैं, "मैं अपने भक्तों के हृदय में स्थित होकर, उनके अज्ञान के अंधकार को दूर करता हूँ।"

5. योगी का स्मरण:

प्रयास: योगी को चाहिए कि वह मन में बार-बार परम पुरुष के नाम, गुण, और स्वरूप का स्मरण करे। इसे भक्ति योग और ज्ञान योग का संयोजन कहा जाता है।

साधना:

जप और ध्यान के माध्यम से ध्यान केंद्रित करना।

हृदय में परमेश्वर के दिव्य स्वरूप की अनुभूति करना।

गीता का संदर्भ: गीता (8.7) में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं, "सदैव मेरा स्मरण करो और युद्ध करो।"

निष्कर्ष:

परम पुरुष का स्मरण: योगी के लिए परम पुरुष का स्मरण आत्मा के परम लक्ष्य की प्राप्ति है। स्मरण के माध्यम से, योगी ईश्वर की दिव्यता और अनंतता को अपने भीतर अनुभव करता है।

आध्यात्मिक उपलब्धि: जब योगी अपने मन को संसारिक बंधनों से मुक्त कर परम पुरुष में स्थिर कर देता है, तभी वह मुक्ति (मोक्ष) प्राप्त कर सकता है।

गीता के यह उपदेश न केवल योगियों के लिए, बल्कि सामान्य मनुष्यों के लिए भी आत्म-ज्ञान और आत्म-विकास का मार्ग दर्शाते हैं।

8॥11॥

भगवद  गीता अध्याय: 8
श्लोक 12-13

श्लोक:
सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च।
 मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम्‌॥
 ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्‌।
 यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्‌॥

भावार्थ:
सब इंद्रियों के द्वारों को रोककर तथा मन को हृद्देश में स्थिर करके, फिर उस जीते हुए मन द्वारा प्राण को मस्तक में स्थापित करके, परमात्म संबंधी योगधारणा में स्थित होकर जो पुरुष 'ॐ' इस एक अक्षर रूप ब्रह्म को उच्चारण करता हुआ और उसके अर्थस्वरूप मुझ निर्गुण ब्रह्म का चिंतन करता हुआ शरीर को त्यागकर जाता है, वह पुरुष परम गति को प्राप्त होता है
 ॥12-13॥
सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च।

मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम्।।
8.12।। यहाँ भी कविं पुराणमनुशासितारम् यदक्षरं वेदविदो वदन्ति इस प्रकार प्रतिपादन किये हुए परब्रह्मकी प्राप्तिका पूर्वोक्तरूपसे उपायभूत जो ओंकार है उसकी कालान्तरमें  मुक्ति   रूप फल देनेवाली वही उपासना योगधारणासहित कहनी है तथा उसके प्रसङ्ग और अनुप्रसङ्गमें आनेवाली बातें भी कहनी हैं। इसलिये आगेका ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है --, समस्त द्वारोंका अर्थात् विषयोंकी उपलब्धिके द्वाररूप जो समस्त इन्द्रियगोलक हैं उन सबका संयम करके एवं मनको हृदयकमलमें निरुद्ध करके अर्थात् संकल्पविकल्पसे रहित करके फिर वशमें किये हुए मनके सहारेसे हृदयसे ऊपर जानेवाली नाडीद्वारा ऊपर चढ़कर अपने प्राणोंको मस्तकमें स्थापन करके योगधारणाको धारण करनेके लिये प्रवृत्त हुआ साधक जो (इन्द्रियोंके) सम्पूर्ण द्वारोंको रोककर मनका हृदयमें निरोध करके और अपने प्राणोंको मस्तकमें स्थापित करके योगधारणामें सम्यक् प्रकारसे स्थित हुआ जो 'ऊँ' इस एक अक्षर ब्रह्मका  उच्चारण और मेरा स्मरण करता हुआ शरीरको छोड़कर जाता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है।

( परम गति को प्राप्त होता है इस प्रकार अगले श्लोकसे सम्बन्ध है )

मूल श्लोकः
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहर्न्मानुस्मरन्।

यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमं गतिम्।।8.13।।

उसी स्थान (प्राणोंको) स्थिर हुए --, ॐ यह एक अक्षररूप ब्रह्मका अर्थात् ब्रह्मकेस्वरूपका लक्ष्यवाले ओंकारका उच्चारश करता है और उसका अर्थरूप मह ईश्वररूपका चिंतन करता है जो पुरुष शरीर को दूर कर देता है अर्थात मर जाता है वह इस प्रकार है शरीर को ठीक होने वाला परम गतिको मिलता है। यहाँ त्यजन्देहम् यह विशेषण मरण का लक्ष्य है। अभिप्राय यह है कि देह के त्यागसे से है। ना कि आत्मा का मरण है स्वरूप के नाश होने से नहीं है।

ध्यान के अभ्यास में मन को सफलता और मंदबुद्धि एकाग्र करने के लिए साधक को तीन कार्यों को सम्पादित करना होता है। इन श्लोकों में त्रि का वर्णन किया गया है जिसमें कहा गया है कि क्रम में अभ्यास किया जाता है। श्रोत्र त्वचा चक्षु जिह्वा और घ्राणेन्द्रिय (नाक) ये वे पाँचवें द्वार हैं जिनके माध्यम से आकर्षक विषयों की संवेदनाएँ मन में प्रवेश करके उन्हें विक्षुब्ध करती हैं। विवेक और वैराग्य के द्वारा इंद्रिय देवताओं को अवरुद्ध या संयमित करना प्रथम साधना है जिसके बिना ध्यान में प्रवेश नहीं हो सकता। इनमें से कोई भी केवल वैयक्तिक विषय मन में प्रवेश नहीं करता है। विक्षेपों की इन तरंगों को अवरुद्ध करने पर नए विक्षेपों का प्रवाह ही रुद्ध हो जाता है। से वह स्वयं ही विक्षुब्ध हो सकता है। इसलिए मन को हृदय में स्थापित करने का उपदेश दिया गया है। वेदांत में हृदय का अर्थ शरीर में स्थित रक्त गुरु अवयव से नहीं है। साहित्य और दर्शन में हृदय का अर्थ, स्नेह और सहृदयता, करुणा और कृपा, भक्ति और प्राप्त आदर्श एवं प्रेरित भावनाओं का अस्तित्व उद्गम स्थल है। प्रभावशाली स्थूल विषयों की संवेदनाओं के मन में प्रवेश के लिए ब्लॉक करने के अनुयायियों की भूमिका है कि वह भावनाओं के साधन रूप मन को दिव्य एवं पवित्र बनाए रखता है कि उसका दमन न करे। हृदय के उच्च और श्रेष्ठ वातावरण में ही मन को स्थिर करना। इसका विवेचन कम से कम किया जा सकता है। नकारात्मक विचार वह है जिसके कारण मन क्षुब्ध और चंचल हो जाता है। विषय ग्रहण आदि के द्वारा बुद्धि का अज्ञान तत्त्वमय रहता है। सतत आत्मानुसंधान की प्रक्रिया से बुद्धि को विषयों से परावृत्त किया जा सकता है। तीन कार्यकलापों के योग सिद्धांत पर मन की आत्मानुसंधान में जो दृढ़ स्थिति होती है उसे ही यहां धारण किया जाता है। जो साधक अपने आस-पास के वैश्यिक वातावरण को भूलकर आनंद और संतोष से पूर्ण हृदय से मन को बुद्धि के निर्देश में ला सकते हैं। मन में ओंकार का उच्चारण सरलता और उत्साह के साथ किया जा सकता है। शांत मन में उठे हुए ओंकार वृत्तांतों को जो साक्षार्थी देख सकते हैं वही पुरुष दर्शन के योग्य है। श्लोक की अगली पंक्ति इस तथ्य को स्पष्ट करती है। देह त्याग कर जो जाता है उसके उच्चारण और उसके लक्ष्यार्थ पर मनन करने के साधक मिथ्या जाट ड्रिचियों के साथ अपने तादात्म्य से ऊपर उठ जाते हैं जिसके कारण अहंकार लोप हो जाता है ।। यही असली मौत है. देह त्याग का अभिप्राय है देहात्मभाव का त्याग। प्रणव के लक्ष्यार्थ पर ध्यान देने वाले साधक को परम गति प्राप्त होती है क्योंकि उसका लक्ष्य सम्पूर्ण विश्व का वह अधिष्ठान है जिस पर जन्म और मृत्यु का मनः कल्पित नाटक खेला जाता है। क्या ध्यानमार्ग पर चलने वाले सभी साधकों को आत्मसाक्षात्कार समानरूप से कठिन है भगवान कहते हैं।

भगवद  गीता अध्याय: 8
श्लोक 14

श्लोक:
अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः।
 तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनीः॥

भावार्थ:
हे अर्जुन! जो पुरुष मुझमें अनन्य-चित्त होकर सदा ही निरंतर मुझ पुरुषोत्तम को स्मरण करता है, उस नित्य-निरंतर मुझमें युक्त हुए योगी के लिए मैं सुलभ हूँ, अर्थात उसे सहज ही प्राप्त हो जाता हूँ
 ॥14॥
भगवद  गीता अध्याय: 8
श्लोक 15

श्लोक:
मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम्‌।
 नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः॥

भावार्थ:
परम सिद्धि को प्राप्त महात्माजन मुझको प्राप्त होकर दुःखों के घर एवं क्षणभंगुर पुनर्जन्म को नहीं प्राप्त होते
 ॥15॥
भगवद  गीता अध्याय: 8
श्लोक 16

श्लोक:
आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन।
 मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते॥

भावार्थ:

हे अर्जुन! ब्रह्मलोकपर्यंत सब लोक पुनरावर्ती हैं, परन्तु हे कुन्तीपुत्र! मुझको प्राप्त होकर पुनर्जन्म नहीं होता, क्योंकि मैं कालातीत हूँ और ये सब ब्रह्मादि के लोक काल द्वारा सीमित होने से अनित्य हैं
 ॥16॥
व्याख्या:
लोक:

हिंदू धर्म में, ब्रह्मांड में 14 लोक माने गए हैं: 
सात लोक पृथ्वी से ऊपर और सात लोक पृथ्वी के नीचे 

पृथ्वी के ऊपर के सात लोक: 

भूर्लोक, 
भुवर्लोक, 
स्वर्लोक, 
महर्लोक, 
जनलोक, 
तपोलोक, 
ब्रह्मलोक ,

पृथ्वी के नीचे के सात लोक: 

अतल,
 वितल, 
सतल, 
रसातल, 
तलातल, 
महातल, 
पाताल ,

पृथ्वी के सबसे ऊपर वाले लोक को बैकुंठ कहते हैं. 

वहीं, पृथ्वी के सबसे नीचे वाले लोक को पाताल कहते हैं.

 इन सातों लोकों के बारे में कुछ और अलग बातें भी है:

इन सातों लोकों की मिट्टी का रंग अलग-अलग है।

 जैसे, 
अतल की मिट्टी काली, 
वितल की सफ़ेद, 
नितल की लाल,
 सुतल की पीली, 
तलातल की कंकरीली, 
रसातल की पथरीली, 
 पाताल की सुवर्णमयी है।

इन सातों लोकों में बड़े-बड़े महल हैं, जहां दानव और दैत्य रहते हैं.
इन लोकों में विशाल नागों के कुटुंब भी रहते हैं.
इन सभी पातालों के नीचे भगवान विष्णु का तमोगुणी रूप है, जिसे शेषनाग कहते हैं।

इन सभी लोकों में गया या ले जाया गया जीव अपना समय भोग वापस यही आ जाता है।
मुझको प्राप्त होकर पुनर्जन्म नहीं होता, क्योंकि मैं कालातीत हूँ और ये सब ब्रह्मादि के लोक काल द्वारा सीमित होने से अनित्य हैं।

भगवद  गीता अध्याय: 8
श्लोक 17

श्लोक:
सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदुः।
 रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः॥

भावार्थ:
ब्रह्मा का जो एक दिन है, उसको एक हजार चतुर्युगी तक की अवधि वाला और रात्रि को भी एक हजार चतुर्युगी तक की अवधि वाला जो पुरुष तत्व से जानते हैं, वे योगीजन काल के तत्व को जानने वाले हैं
 8॥17॥
व्याख्या:

हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, ब्रह्मा देव का एक दिन हमारे 1000 महायुगों के बराबर माना गया है। एक महायुग में 4 युग होते हैं - सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग। प्रत्येक युग की अवधि अलग-अलग होती है:

सतयुग - 17,28,000 वर्ष
त्रेतायुग - 12,96,000 वर्ष
द्वापरयुग - 8,64,000 वर्ष
कलियुग - 4,32,000 वर्ष

इस प्रकार, एक महायुग की अवधि 43,20,000 वर्ष होती है। ब्रह्मा देव का एक दिन 1000 महायुगों के बराबर होता है, जो कि 43,20,00,000 वर्ष के बराबर होता है।

अविनाशी गुरु का लोक हिंदू पौराणिक कथाओं में वर्णित एक लोक है, जो कि गुरु के निवास स्थान के रूप में जाना जाता है। यह लोक ब्रह्मा देव के लोक से भी ऊंचा माना जाता है।

गुरु का लोक सत्यलोक या विष्णुलोक के नाम से भी जाना जाता है। यह लोक भगवान विष्णु के निवास स्थान के रूप में भी जाना जाता है।

गुरु का लोक एक ऐसा स्थान है जहां गुरु और अन्य उच्च आत्माएं निवास करती हैं। यह लोक बहुत ही पवित्र और शुद्ध माना जाता है, और यहां के निवासी बहुत ही उच्च आध्यात्मिक स्तर पर होते हैं।

गुरु का लोक पहुंचने के लिए, एक व्यक्ति को बहुत ही उच्च आध्यात्मिक स्तर पर पहुंचना होता है, और उसे गुरु की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त करना होता है।

कलयुगी गुरु को उसका गुरु जिस अपने देवी देवता के स्थान पर ले जाता है उस के अनुसार होता है।

हिंदू पौराणिक कथाओं में देवी देवताओं के लोक का वर्णन किया गया है, जो कि स्वर्गलोक या अमरलोक के नाम से भी जाना जाता है। इस लोक में देवी देवता, इंद्रादिक देवता, और अन्य उच्च आत्माएं निवास करती हैं।

देवी देवताओं के लोक के दिन का विस्तार से वर्णन इस प्रकार है:

देवी देवताओं के लोक का एक दिन हमारे 30 वर्षों के बराबर होता है। यह दिन देवी देवताओं के लिए एक सामान्य दिन होता है, जिसमें वे अपने नित्य कार्यों को करते हैं और अपने सेवकों की सेवा करते हैं।

इस लोक में एक वर्ष की अवधि 360 दिनों की होती है, जो कि हमारे 10,800 वर्षों के बराबर होती है। इस प्रकार, देवी देवताओं के लोक में एक युग की अवधि 4,32,000 वर्षों के बराबर होती है, जो कि हमारे 120 वर्षों के बराबर होती है।

देवी देवताओं के लोक में समय की गणना हमारे लोक से बहुत अलग होती है। यहां का समय बहुत ही धीमी गति से चलता है, जिससे देवी देवताओं के लिए समय की अवधि बहुत ही लंबी होती है।

इस लिए यह सभी हम लोगों को हमारे 24 घंटे हमें देखते रहते है।

👉अब प्रत्यक्ष ज्ञान:👈

एक बुजुर्ग चींटी से किसी चींटी ने पूछा यह भगवान किधर रहता है?

तो उस बुजुर्ग चींटी ने कहा यही हमारे साथ ही रहता है।

हम कई पीढ़ियों से सुनते आरहे हैं।की यही वो भगवान है जिसको हमारी कई पीढ़ियों देखती आ रही हैं।

चींटी की उम्र आमतौर पर कुछ हफ्तों से लेकर कुछ महीनों तक होती है, लेकिन यह उनकी प्रजाति और पर्यावरण पर निर्भर करता है।

कुछ चींटी प्रजातियों की औसत उम्र इस प्रकार है:

- कार्यकर्ता चींटी: 1-3 महीने
- सैनिक चींटी: 1-2 महीने
- रानी चींटी: 1-5 साल (कुछ प्रजातियों में 10-15 साल तक)

चींटी की उम्र को दिनों में मापें तो:

- 1 महीना = लगभग 30 दिन
- 1 साल = लगभग 365 दिन

इस प्रकार, एक चींटी की उम्र लगभग 30-100 दिन हो सकती है, लेकिन यह उनकी प्रजाति और पर्यावरण पर निर्भर करता है।
8॥17॥
भगवद  गीता अध्याय: 8
श्लोक 18

श्लोक:
अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे।
 रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके॥

भावार्थ:
संपूर्ण चराचर भूतगण ब्रह्मा के दिन के प्रवेश काल में अव्यक्त से अर्थात ब्रह्मा के सूक्ष्म शरीर से उत्पन्न होते हैं और ब्रह्मा की रात्रि के प्रवेशकाल में उस अव्यक्त नामक ब्रह्मा के सूक्ष्म शरीर में ही लीन हो जाते हैं
 8॥18॥

व्याख्या:

वैधानिक विधानके शरीर हैं, यहां  'व्यक्तयः' और चौदहवें अध्याय के चौथे श्लोक में '*👉मूर्तयः' कहा गया है। जैसे, जीवकृत सृष्टि अर्थात् 'मैं' और 'मेरापन' को लेकर जीवकी जो सृष्टि है, जीवके नींदसे जगनेपर वह सृष्टिजीवसे ही पैदा होती है और नींदके आ जानेपर वह सृष्टिजीवमें ही लीन हो जाती है। ऐसे ही जो यह स्थूल समष्टि सृष्टि देखती है, वह सबके सब ब्रह्माजीके जगनेपर उनके सूक्ष्मशरीरसे अर्थात प्रकृतिसे जन्म लेते हैं और ब्रह्माजीके सोनेपर उनके सूक्ष्मशरीरमें ही लीन हो जाते हैं। ब्रह्माजीके जगनेपर तो पुनः रचना होती है और ब्रह्माजीके जगनेपर 'प्रलय'होता है। जब ब्रह्माजी की सौ वर्ष की आयु होती है, तब 'महाप्रलय' होती है, जिसमें ब्रह्माजी भी भगवान में लीन हो जाते हैं। ब्रह्माजी की आयु अधिक होती है, ब्रह्माजी की महाप्रलयिका समय रहती है। महाप्रलयका समय जब ब्रह्माजी भगवान से प्रकट होते हैं तो 'महासर्ग' (की पुनः रचना होती है) का आरंभ होता है।

हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, अब तक कुल 51 ब्रह्मा रचे गए हैं। यह जानकारी वेदों और पुराणों में वर्णित है 

👉टिप्पणी 1

मूर्तयः का सरल भाव यह है कि जो वस्तुएँ या प्राणी हमारी इंद्रियों द्वारा देखे, सुने, सूंघे, चखे या छुए जा सकते हैं, उन्हें मूर्त कहा जाता है।

उदाहरण के लिए, एक पेड़, एक पत्थर, एक जानवर, एक मानव, आदि सभी मूर्त हैं क्योंकि हम उन्हें देख सकते हैं, छू सकते हैं, सुन सकते हैं, आदि।
इस प्रकार, मूर्तयः का अर्थ है जो वस्तुएँ या प्राणी हमारी इंद्रियों द्वारा अनुभव किए जा सकते हैं।
हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, अब तक कुल 51 ब्रह्मा रचे गए हैं। यह जानकारी वेदों और पुराणों में वर्णित है ¹।


भगवद  गीता अध्याय: 8
श्लोक 18

श्लोक:
अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे।
रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके॥

भावार्थ:
संपूर्ण चराचर भूतगण ब्रह्मा के दिन के प्रवेश काल में अव्यक्त से अर्थात ब्रह्मा के सूक्ष्म शरीर से उत्पन्न होते हैं और ब्रह्मा की रात्रि के प्रवेशकाल में उस अव्यक्त नामक ब्रह्मा के सूक्ष्म शरीर में ही लीन हो जाते हैं
8॥18॥
भगवद  गीता अध्याय: 8
श्लोक 19

श्लोक:
भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते।
रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे॥

भावार्थ:
हे पार्थ! वही यह भूतसमुदाय उत्पन्न हो-होकर प्रकृति वश में हुआ रात्रि के प्रवेश काल में लीन होता है और दिन के प्रवेश काल में फिर उत्पन्न होता है
8॥19॥

व्याख्या:

अनादिकालसे जन्म मरणके चक्कर में पड़ा यह प्राणिसमुदाय वही है, जो साक्षात् मेरा अंश है, मेरा स्वरूप है। मेरा सनातन अंश होना नित्य है। सर्ग और महाप्रलय तथा महासर्ग और महाप्रलय में भी यही था और आगे भी यही रहेगा। इसकी कोई कमी नहीं है और आगे कभी कोई कमी नहीं रहेगी। यह जो सनातनी है, इसका विनाश कभी नहीं होता। लेकिन भूल से यह प्रकृतिके साथ अपना संबंध मान लेता है। प्राकृत पदार्थ (शरीर आदि) तो अस्थिर रहते हैं, उत्पन्न और नष्ट होते रहते हैं, पर यह उनके संबंधों को पकड़ में रहता है। यह अद्भुत आश्चर्य की बात है कि सांसारिक पदार्थ तो नहीं रहते, पर उनका सम्बन्ध रहता है; क्योंकि उस सम्बन्ध को स्वयं ने पकड़ा है। मूलतः यह स्वयं जबतक उस संबंध को नहीं छोड़ता, तबतक दूसरा कोई सिद्धांत नहीं हो सकता। उस संबंध को छोड़ने में यह स्वतन्त्र है, सबल है। वास्तव में यह उस संबंध को बनाए रखता है जिसमें सदा परतंत्र है; क्योंकि वे पदार्थ तो हरदम बचे रहते हैं, पर यह नया-नया संबंध पकड़ रहता है। जैसे, बच्चों को छुट्टी नहीं मिली और कोई चाहत नहीं थी, पर उसे छूट मिल गई। ऐसे ही युवीको ने छोड़ा नहीं, पर छूट गई। और तो और, ये शरीर भी नहीं चाहता, पर वो भी छूट जाता है। यह हुआ कि प्राकृत पदार्थ तो छूटते ही रहते हैं, पर यह जीव नशा के साथ अपने संबंध को बनाते हैं, जिससे,इसको बार-बार शरीर धारण करने का अवसर मिलता है, बार-बार जन्मना-मरना होता है। जब तक यह उससे माने गए संबंध को नहीं छोड़ेगा तब तक यह जन्मस्थान की परंपरा चलती रहेगी, कभी नहीं मिटेगी।

      भगवानके द्वारा अकेले खेल नहीं हुआ  (एकाकी न रमते) तो खेल के लिए अर्थात प्रेमका शामिल होने-सगानेके के लिए भगवान ने इस प्राणिसमुदायको शरीर-रूप वाले खिलौनों को शामिल किया। खेल का यह नियम है कि खेल के पदार्थ केवल के लिए ही होते हैं, किसी के व्यक्तिगत नहीं होते। लेकिन यह प्राणिसमुदाय खेल खेलना तो भूल गया और खेल खेलना यानि शरीरोंको व्यक्तिगत रसायन लगना। इसीसे यह सामने आया और भगवान से सर्वथा विमुख हो गया। 'भूत्वा भूत्वा प्रलीयते'-- ये शरीरों के लिए कहे गए हैं, जो उत्पन्न होते हैं और नष्ट होते रहते हैं जिनमें प्रतिक्षण ही परिवर्तन होता रहता है। परन्तु जीव उन शरीरों के परिवर्तनों को अपनाते हैं और उनके जन्म-मरने को अपना जन्म-मरने को दर्शाते हैं। इसी सिद्धांत के कारण उनका जन्म - मरण कहा जाता है । स्वधर्म है.

'रात्र्यगमेऽः पार्थ प्रभात्यहरागमे'-- यहां 'अवशः' शब्द का अर्थ है कि यदि यह जीव प्रकृतिकी वस्तुओं में से किसी भी वस्तु को अपनी वर्गीकृत अवस्था में रखता है तो यह वश होगा कि 'मैं इस वस्तु का स्वामी हूं', पर हो जाएगा उस वस्तु का प्रकाश, पराधीन। प्राकृत मकडीको यह इतनी ही अधिक ग्रहण करना, किला ही यह महान् परतंत्र रचना चला जायेगा। फिर इसकी परतंत्रता कभी छूटेगी ही नहीं। ब्रह्माजीके जगने और सोनेपर अर्थात सर्ग और प्रलयके होनेपर (8.18), ब्रह्माजीके प्रकट और ऋणपर अर्थात् महासर्ग और महाप्रलयके होनेपर (9.7 8) तथा वर्तमानमें प्रकृतिके प्रकाश कर्म करते रहतेपर (3.5) यह भी जीव 'जन्मना और मरना और कर्म करना और उसका फल भोगना'--इस आफतसे कभी छूटेगा ही नहीं। इससे यह सिद्ध हुआ कि जबतक परमात्माकी प्राप्ति नहीं होती, बोध नहीं होता और यह प्रकृतिके संबंधको नहीं छोड़ता, तबतक परतन्त्र होनेके कारण यह दुःखरूप जन्म-मरणके चक्करसे मुक्ति नहीं मिलती। परंतु जब इसकी प्रकृति और प्रकृतिजन्य पदार्थों की व्यापकता मिट जाती है, तो प्रकृति से संबंधित सर्वथा अपने शुद्ध स्वरूप का बोध हो जाता है, तब यह महासर्ग उत्पन्न नहीं होता और महाप्रलय में भी व्यथित नहीं होता।

जब तक इस परवशता को ही कहीं कालकी, कहीं प्रकृतिक कहीं कर्म की और कहीं परवस्थाके नाम से कहा गया है। इस संयोगवश सुखकी इच्छासे ही यह पराधीनता जीव भोगता ही रहता है और ऐसा अभिलेख रहता है कि यह पराधीनता आजादी नहीं, स्वतंत्रता प्राप्ति बड़ा कठिन है। परन्तु यह परवशता इसका ही निर्माण हुआ है, स्वतः नहीं। मूल रूप से छोड़े गए जिम्मेवारी इसी तरह है। यह जब भी ठीक है, तब भी छोड़ा जा सकता है।
यह श्लोक भगवद गीता के 14वें अध्याय से लिया गया है। इसकी सरल व्याख्या इस प्रकार है:

"सर्गेऽपि नोपजायन्ते" - सृष्टि के समय भी वे (आत्मा) पैदा नहीं होते हैं,
"प्रलय न व्यथन्ति च" - और प्रलय (विनाश) के समय भी वे विनष्ट नहीं होते हैं।

इस श्लोक का अर्थ यह है कि आत्मा न तो सृष्टि के समय पैदा होता है और न ही प्रलय के समय विनष्ट होता है। आत्मा शाश्वत और अविनाशी है, और वह सृष्टि और प्रलय के चक्र से परे है।

इस का भाव:

आत्मा की अवस्था को "लुप्त" या "अव्यक्त" कहा जा सकता है। वह सृष्टि और प्रलय के चक्र से परे है, और वह अपनी वास्तविक स्वरूप में रहता है, जो कि हमारी इंद्रियों द्वारा अनुभव नहीं किया जा सकता है। क्यों कि इंद्रियों से युक्त शरीर रूपी वस्त्रों को जीव त्याग चुका होता है।

अब यहां एक शंका उत्पन होती है।

जन आत्मा की अवस्था को "लुप्त" या "अव्यक्त" कहा जा सकता है। वह सृष्टि और प्रलय के चक्र से परे है, और वह अपनी वास्तविक स्वरूप में रहता है, जो कि हमारी इंद्रियों द्वारा अनुभव नहीं किया जा सकता है। तो श्राद्ध को कैसे जीव ग्रहण कर लेता है।

आइए जाने

👉यह एक बहुत ही गहरी और जटिल समस्या है जिसका उत्तर केवल हिंदू धर्मशास्त्र और दर्शन शास्त्र में ही पाया जा सकता है।👈

हिंदू धर्मशास्त्र के अनुसार, जब एक जीव की मृत्यु होती है, तो उसकी आत्मा अपने भौतिक शरीर को त्याग देती है, लेकिन वह अपने सूक्ष्म शरीर को बनाए रखती है। सूक्ष्म शरीर में जीव की वासनाएं, इच्छाएं और कर्मों के संस्कार शामिल होते हैं।

श्राद्ध के दौरान, जब हम पितरों को तर्पण और पिंडदान करते हैं, तो हम वास्तव में उनकी आत्मा को नहीं, बल्कि उनके सूक्ष्म शरीर को पोषण प्रदान करते हैं। यह पोषण उनकी आत्मा को शांति और सुख प्रदान करता है और उन्हें अपने आगे के जीवन के लिए तैयार करता है।

इस प्रकार, श्राद्ध के दौरान, हम जीव के सूक्ष्म शरीर को पोषण प्रदान करते हैं, न कि उनके भौतिक शरीर को। यह पोषण उनकी आत्मा को शांति और सुख प्रदान करता है और उन्हें वह अपने आगे के जीवन के लिए तैयार करता है।

इसी लिए पुत्र को मुक्ति करने वाला कहते है।

हिंदू धर्म में पुत्र को मुक्ति करने वाला माना जाता है, क्योंकि वह अपने पितरों को श्राद्ध और तर्पण के माध्यम से पोषण प्रदान करता है और उन्हें मोक्ष प्राप्त करने में मदद करता है।

यह मान्यता है कि जब एक पुत्र अपने पितरों का श्राद्ध और तर्पण करता है, तो वह उनकी आत्मा को शांति और सुख प्रदान करता है और उन्हें मोक्ष प्राप्त करने में मदद करता है। इस प्रकार, पुत्र को मुक्ति करने वाला माना जाता है।
8॥19॥


भगवद  गीता अध्याय: 8

श्लोक 20


श्लोक:

परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः।

 यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति॥


भावार्थ:

उस अव्यक्त से भी अति परे दूसरा अर्थात विलक्षण जो सनातन अव्यक्त भाव है, वह परम दिव्य पुरुष सब भूतों के नष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होता

 8॥20॥


व्याख्या:


जिस अक्षरा ने पहले प्रतिपादन किया था उसका प्राप्तिका उपाय ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म उदाहरण संयोजन से बताया गया था। अब एक ही अक्षरके प्रारूपका निर्देश करने की इच्छा से यह बताया जाता है कि यह योगमार्गगामी अमुक वस्तुएँ है --, तु शब्द यहाँ आगे वर्णन पेन जानेवाले अक्षराकी वह पूर्वोक्त अव्यक्तसे विलक्षणता दिखाने के लिए है। (वह अव्यक्त) भाव अर्थात् अक्षरनामक परब्रह्म परमात्म अत्यंत भिन्न है। किस्से उससे पहले कहे गए अव्यक्त से। विभिन्न होने पर भी किसी भी प्रकार का हेय हो सकता है। ऐसा कहा गया है कि वह पूर्वोक्त भूतसमुदायके बीजभूत अविद्यारूप अव्यक्तसे परे है। ऐसा जो सनातन भाव अर्थात सदासे होने वाला भाव है वह ब्रह्मादि समस्त मोक्ष का नाश होने पर भी नष्ट नहीं होता।


विद्यालय की कक्षा में एक श्यामपट पाया जाता है जिसका उपयोग एक ही दिन में अनेक शिक्षक विभिन्न विषयों के लिए करते हैं। प्रत्येक शिक्षक अपने पूर्व शिक्षक श्यामपट द्वारा लिखित पत्रक को अंकित कर अपना विषय समझाता है। इस प्रकार का गणित शिक्षक अंकगणित या रेखागणित की उपाधियाँ लार्सन है तो भूगोल वाले न शिक्षक, जिनमें नदी पर्वत आदि का ज्ञान शामिल है। रसायन शास्त्र के शिक्षक रासायनिक क्रियाएं एवं सूत्र समझाते हैं और इतिहास के शिक्षक विद्वानों की राजवंश परंपराओं का ज्ञान निर्माण करते हैं। प्रत्येक शिक्षक विभिन्न प्रकार के अंक सिद्धांत आदि के द्वारा अपने ज्ञान को व्यक्त करता है। यद्यापा सार्वभौम विषय सिद्धांत अलग-अलग अलग-अलग स्थानों पर आम लोगों के लिए श्यामपट का उपयोग किया गया। ।। जब सायं काल में सभी छात्र और शिक्षक अपने घर चले जाते हैं तब भी वह श्यामपट अपने स्थान पर ही स्थित रहता है। यह चैतन्य तत्त्व जो स्वयं इंद्रिय मन और बुद्धि के अव्यक्त होने के कारण अव्यक्त है, इस जगत का अधिष्ठान है जिसे भगवान श्रीकृष्ण के इस कथन में उपदेश दिया गया है, इस अव्यक्त से अन्य सनातन अव्यक्त भाव है। इस प्रकार हम देखते हैं कि यहाँ वैयक्तिक सृष्टि का कारण तथा चैतन्य तत्त्व दोनों को ही अव्यक्त कहा गया है। परन्तु दोनों में यह भेद है कि चैतन्य तत्त्व का कभी भी व्यक्त प्रमाण प्रमाणों का विषय नहीं बनता जबकि सृष्टि का कारण जो अव्यक्त कहलाती है वह कल्प के अवतार में सूक्ष्म तथा स्थूल रूप में व्यक्त होता है। वेदांत में अविद्या भी कहते हैं। अविद्या या अज्ञान स्वयं कोई वस्तु नहीं है। किसी भी मनुष्य को अपनी पूँछ का अज्ञान नहीं हो सकता क्योंकि पूँछ अभावरूप है। इससे एक भावरूप परमार्थ सत्य का अनुभव सिद्ध होता है। जैसे कक्षा में पढ़ाये गए विषय ज्ञान के लिए श्यामपट अधिष्ठान है वैसे ही इस सृष्टि के लिए यह चैतन्य तत्त्व आधार है। इस सत्य को कोई नहीं जानता जो अविद्या है जो इस परिवर्तनकारी नामरूपमयी सृष्टि को व्यक्त करता है। पुनः आरंभ सर्ग स्थिति और लय को प्राप्त करने वाली इस अविद्याजनित सृष्टि से परे जो तत्व है उसका संकेत यहां वही सनातन अव्यय भाव इन शब्दों द्वारा दिया गया है। क्या यह अव्यक्त ही परम तत्व है या इस सनातन अव्यय से परे कोई भाव जीवन का लक्ष्य उपयुक्त हो गया है।

भगवद  गीता अध्याय: 8

श्लोक 21


श्लोक:

अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम्‌।

 यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥


भावार्थ:

जो अव्यक्त 'अक्षर' इस नाम से कहा गया है, उसी अक्षर नामक अव्यक्त भाव को परमगति कहते हैं तथा जिस सनातन अव्यक्त भाव को प्राप्त होकर मनुष्य वापस नहीं आते, वह मेरा परम धाम है

 8॥21॥


व्याख्या:



पूर्व श्लोक में सनातन अव्यय भाव कहा गया है जो सनातनी रहते हैं उन्हें ही यहां अक्षर वचन कहा गया है। अध्याय के संस्थापक में कहा गया था कि अक्षर तत्व ब्रह्म है जो संपूर्ण विश्व का अधिष्ठान है। या प्रणव में ब्रह्म का वाचक या सूचक है जिस पर हमें ध्यान देने का उपदेश दिया गया था। यह अविनाशी चैतन्य स्वरूप आत्मा ही अव्यक्त प्रकृति को सत्य एवं चेतना प्रदान करती है, क्योंकि प्रकृति इस वैचित्र्यपूर्ण सृष्टि को व्यक्त करने में समर्थ होती है। यह सनातन अव्यक्त अक्षर आत्मतत्त्व ही मनुष्य के लिए प्राप्त करने योग्य परम लक्ष्य है। संसार में जो भी स्थिति या लक्ष्य हमें प्राप्त होता है वह बारम्बार लौटता है। संसार शब्द का अर्थ वही है जो साधारण परिवर्तन में रहता है। निद्रा किसी भी जीवन का अंत नहीं है, वर्ण दो कर्मप्रधान जाग्रत अवस्थाओं के मध्य का विश्राम काल है उसी प्रकार मृत्यु भी जीवन का अंत नहीं है। जीव के दो विभिन्न शरीर धारण करने के मध्य में अव्यक्त अवस्था में विश्राम का क्षण होता है। यह पहले ही बताया जा चुका है कि ब्रह्मलोक तक के सभी लोक पुनरावर्ती हैं जहां से पुरालेखों को पुनः आरंभ करके अपने सपनों के क्षय के लिए शरीर धारण करने वाले कलाकार हैं। पुनर्जन्म दुःखालय में कहा गया है इसलिए परम आनंद का लक्ष्य वहीं होगा जहां से दुनिया का पुनरावर्तन नहीं होता है। समान टिक नहीं कर सकते. सामान्यतः कारण की खोज उसी संबंध में होती है जो वस्तु उत्पन्न होती है या जो घटना प्रासंगिक होती है और न कि उसके संबंध में जो अनुत्पन्न या अ संगत है कोई मुझे उत्सुकता से यह नहीं पूछता कि मैं अस्पताल में क्यों नहीं हूं जबकि अस्पताल में हूं जाने उसका कारण जानें। हम यह प्रश्न कर सकते हैं कि अनंत ब्रह्म परिच्छन्न कैसे बन गया लेकिन इस प्रश्न का कोई औचित्य नहीं है कि अनंत वस्तु को पुनः प्राप्त करने का कोई औचित्य नहीं है। भविष्य में बन सकता है। एक छोटी सी लड़की को हम जीवन के शारीरिक और मानसिक पक्ष के सुखों का वर्णन करके नहीं बता सकते हैं और न ही समझा सकते हैं। इसमें उस विषय को संकेत देना कि शारीरिक और मानसिक चिकित्सक शामिल नहीं हैं। बचपन में वह बस यही चाहती है कि उसकी मां उसकी शादी कर ले लेकिन उसके साथी किशोर अवस्था में उस विषय पर फिल्में करना उचित हो जाए। इसी कारण अंतःकरण की कलाकारी के रूप में गोबर के ढेर के सांस्कृतिक विरासत में शामिल व्यक्ति खुले आकाश में मन्दमन्द प्रवाहित समीर की सुगंध को कभी नहीं जान सकता। जब वह व्यक्ति उपदिष्ट ध्यान विधि के अभ्यास से डिग्री के साथ होता है मिथ्या तादात्म्य को दूर कर देता है तब वह अपने शुद्ध अनंतस्वरूप का साक्षात अनुभव करता है। स्वप्न से जगने पर ही स्वप्न के मिथ्यात्व का बोध होता है अन्यथा एक बार जागृत राज्य में आने के बाद स्वप्न के सुख-दुख के प्रभाव से मनुष्य सर्वथा मुक्त हो जाता है। यहां शुद्ध चैतन्यस्वरूप आत्मा को महर्षि व्यास जी ने काव्यात्मक शैली दी है। श्रीकृष्ण के निवास स्थान के रूप में वर्णित है तद्धाम परमं मम। अनेक स्थानों पर यह स्पष्ट हो चुका है कि गीता में भगवान श्रीकृष्ण के शब्दों का अर्थ आत्मस्वरूप के दर्शन से होता हैहैं। मूलतः यहाँ भी धाम शब्द से किसी स्थान विशेष से तापमान नहीं वर्ण स्वरूप से ही है। यह आत्मानुभूति ही साधक का लक्ष्य है जो सदैव उपलब्ध है। ध्यान द्वारा परम दिव्य पुरुष की प्राप्ति के प्रसंग में इसका विस्तृत वर्णन किया गया है। अब उस परम दिव्य पुरुष की प्राप्ति का साक्षात् मार्ग बताया गया है।

भगवद  गीता अध्याय: 8

श्लोक 22


श्लोक:

पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया।

 यस्यान्तः स्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम्‌॥


भावार्थ:

हे पार्थ! जिस परमात्मा के अंतर्गत सर्वभूत है और जिस सच्चिदानन्दघन परमात्मा से यह समस्त जगत परिपूर्ण है (गीता अध्याय 9 श्लोक 4 में देखना चाहिए), वह सनातन अव्यक्त परम पुरुष तो अनन्य (गीता अध्याय 11 श्लोक 55 में इसका विस्तार देखना चाहिए) भक्ति से ही प्राप्त होने योग्य है

 8॥22॥


व्याख्या:


यहां बौद्ध के उपदेष्टा भगवान श्रीकृष्ण के साधन मार्ग को शिष्य बनाया जाता है, जिसे उस परम पुरुष द्वारा प्राप्त किया जा सकता है, जिसे अव्यक्त अक्षर ने कहा था। वह साधन मार्ग है अनन्य भक्ति। परम पुरुष से भक्ति (निष्काम परम प्रेम) तभी वास्तविक और पूर्ण हो सकती है जब साधक स्वयं को शरीर, मन और बुद्धि द्वारा अनुभवमान जगत से विराट और वियुक्त करना सीखता है। नित्य पारमार्थिक सत्य से प्रेम ही वह साधन है जिसके द्वारा मिथ्या वस्तु से वैराग्य होता है। प्रखर जिज्ञासा से अनुप्राणित हुई आत्मतत्त्व की खोज और फिर उसके साथ एकत्व की यह अनुभूति कि यह आत्मा मैं हूं अनन्य भक्ति है जिसका विषय यहां बताया गया है। तत्त्व की कोई सीमा नहीं होनी चाहिए जो केवल एक व्यष्टि डिग्री में ही स्थित हो और उसे चेतना प्रदान कर रही हो। हालाँकि आत्मा की खोज और अनुभव साधक अपने दिल में करता है तथापि उसका ज्ञान ऐसा होता है कि यह चैतन्य आत्मा संपूर्ण विश्व का अधिष्ठान है। इस हृदयस्थ आत्मा का जगदधिष्ठान सत्य ब्रह्म के साथ एकता का निर्देश भगवान श्रीकृष्ण इस वाक्य में दिया गया है कि जिसमें भूतमाता स्थित है और यह संपूर्ण जगत् व्याप्ति है वह पुरुष है। मिट्टी के सभी बने घाटों में मिट्टी ही स्थित हैं और उनका नाम रूपरंग है। और आकार विविध होते हुए भी एक ही मिट्टी उन सबमें व्याप्त है। सभी लहरें तरंगें फेन आदि समुद्र में स्थित हैं और समुद्र उन्हें शोक में रहता है। घाटों के अंतर्बाह्य उनके उपादान कारण (मूल स्वरूप) मिट्टी और लहरों में समुद्र होता है। शुद्ध चैतन्य स्वरूप ही वह सनातन सत्य है जिसमें अव्यक्त सृष्टि विद्यमान है। किसी भी वस्त्र पर ग़ज़ल से बने चित्र का अधिष्ठान सिक्का है जिसके बिना वह चित्र नहीं बन सकता था। शुद्ध चैतन्य तत्त्व संकल्पों के विविध संचलनों में ढलकर अविद्या से स्थूल रूप प्राप्त होता है, विशाल नामरूपमय जगत् के रूप में आभास होता है। उत्पाद सर्वत्र सभी लोग विषयों को आकर्षित होते हुए देखकर अपनी इच्छाएं पूरी करते हैं, उन्हें प्राप्त करने के लिए संघर्ष करते हैं। जो पुरुष आत्मस्वरूप का साक्षात् अनुभव करता है, उससे यह समझ में आता है कि इस नानाविध सृष्टि का ही एक अधिष्ठान है, जबकि अज्ञान से ही इस जगत् का प्रत्यक्ष हो रहा है। जीव अज्ञान के वश में यह ही सत्य है कि संसार के मिथ्या दुखों से पीड़ित व्यक्ति के दो अलग-अलग चरित्रों का वर्णन मिलता है, अब भगवान के अगले प्रकरण में साधकों द्वारा प्राप्त किए गए दो अलग-अलग लक्ष्यों के अलग-अलग रूपों का वर्णन करते हैं। कोई भी साधक उस लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर पाता है जहाँ से संसार का पुनरावर्तन होता है तथा अन्य लक्ष्य वह है जिसे पुनः प्राप्त करके संसार वापस नहीं आता है। वे दो मार्ग किसे कहते हैं भगवान --

उस परमधामकी प्राप्ति का उपाय बताया जाता है --, शरीररूप पुरमें शयन करनेसे या सर्वत्र समृद्ध होनेसे परमात्माका नाम पुरुष है। हे पार्थ वह निरतिशय परमपुरुष मेकिंग पर (सूक्ष्मश्रेष्ठ) अन्य कुछ भी नहीं है जिस पुरुष के रिकार्ड समग्र कार्यरूप भूत स्थित हैं -- क्योंकि कार्य कारणके अंतर्विद्या हुआ है -- और जिस पुरुष से यह सारा संसार आकाशसे घट आदिकी भाँति व्याप्त है। ऐसी परम अनन्य भक्ति अर्थात् आत्मविषयक ज्ञानरूप भक्तिसे प्राप्त होने योग्य है।

8॥22॥


भगवद  गीता अध्याय: 8

श्लोक 23


श्लोक:

( शुक्ल और कृष्ण मार्ग का विषय ) 

 यत्र काले त्वनावत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः।

 प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ॥


भावार्थ:

हे अर्जुन! जिस काल में (यहाँ काल शब्द से मार्ग समझना चाहिए, क्योंकि आगे के श्लोकों में भगवान ने इसका नाम 'सृति', 'गति' ऐसा कहा है।) शरीर त्याग कर गए हुए योगीजन तो वापस न लौटने वाली गति को और जिस काल में गए हुए वापस लौटने वाली गति को ही प्राप्त होते हैं, उस काल को अर्थात दोनों मार्गों को कहूँगा

 8॥23॥


व्याख्या:


जिन्होंने ओंकारमें ब्रह्मबुद्धि सम्पादन की है जिसमें कालान्तरमें मुक्ति मिलनवाली है तथा यहाँ पर योगियोंकी ब्रह्मबुद्धि सम्पादन के लिये भागा मार्ग पर चल रहा है। मूलतः विवक्षित अर्थको बतलानेके लिए ही यात्रा काले अन्य श्लोक कहे जाते हैं। यहां पुनराविद्या मार्गका का वर्णन अन्य मार्गकी स्तुति करने के लिए किया गया है --, यात्रा काले इस पदका सिलिकॉनयुक्त प्रायताः यह अगला पदसे संबंधित है। जिस कालमें अनावृत्तिको--अपुर्नजन्मको और जिस कालमें अनावृत्तको--इसके विपरीत पुनर्जन्मको योगी लोग बैठते हैं। योगिनः इस पदसे कर्म करनेवाले योगी लोग भी योगी कहे जाते हैं क्योंकि कर्मयोगेन योगिनम् इस पदसे कर्म करनेवाले भी योगी कहे जाते हैं। पौराणिक कथा यह है कि अर्जुन जिस काल में मरे हुए लोग पुनर्जन्म को नहीं देखते हैं और जिस काल में मरे हुए लोग पुनर्जन्म लेते हैं मैं अब उस काल का वर्णन करता हूं।


अभ्युदय और निःश्रेयस ये दो लक्ष्य हैं जिन्हें प्राप्त करने के लिए मनुष्य अपने जीवन में प्रयास करता है। अभ्युदय का अर्थ है लौकिक संपदा और भौतिक विकास के माध्यम से अधिकाधिक विषयों के उपभोग से सुख प्राप्त करना। यह वास्तव में सुख का एहसास है क्योंकि प्रत्येक उपभोक्ता के गर्भ में दुख छिपा रहता है। निःश्रेयस का अर्थ है अनात्मबन्ध से मोक्ष। मनुष्य में आत्मस्वरूप का ज्ञान प्राप्त होता है जो संपूर्ण जगत् का अधिष्ठान है। इस स्वरूपानुभूति में संसारी जीव की समाप्ति और परमानंद की प्राप्ति होती है। ये दोनों लक्ष्य समता विपरीत धर्म वाले हैं। भोग एक सत्य है और मोक्ष नित्य एक में संसार का पुनरावर्तन है तो अन्य में अपुनरावर्तन है। अभ्युदय में जीवभाव बना रहता है जबकि ज्ञान में आत्मभाव दृढ़ बनता है। आत्मानुभवी पुरुष अपने आनन्दस्वरूप का अखण्ड अनुभव करता है। यदि लक्ष्य सम्पर्क भिन्न-भिन्न है तो इन दोनों की प्राप्ति का मार्ग भी भिन्न-भिन्न होना चाहिए। भगवान श्रीकृष्ण यहां भरतश्रेष्ठ अर्जुन को वचन देते हैं कि वे उन दो कृतियों और अनाप्रावृत्तियों का वर्णन करेंगे। यहां काल शब्द का द्वयार्थक प्रयोग किया गया है। काल का अर्थ वही है जो काल और प्रकार प्रस्तुत करता है सन्दर्भ में उसका दूसरा अर्थ है मार्ग जो साधकगण देहयाग के ऊपरान्त अपने लक्ष्य तक पहुँचते हैं।(बिना ज्ञान मोक्ष नहीं होता)

8॥23॥

भगवद  गीता अध्याय: 8

श्लोक 24


श्लोक:

अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्‌।

 तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः॥


भावार्थ:

जिस मार्ग में ज्योतिर्मय अग्नि-अभिमानी देवता हैं, दिन का अभिमानी देवता है, शुक्ल पक्ष का अभिमानी देवता है और उत्तरायण के छः महीनों का अभिमानी देवता है, उस मार्ग में मरकर गए हुए ब्रह्मवेत्ता योगीजन उपयुक्त देवताओं द्वारा क्रम से ले जाए जाकर ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।

 8॥24॥


व्याख्या:


इस भूमंडलपर शुक्लमार्ग में सबसे पहले अग्निदेवताका अधिकार रहता है। अग्नि रात्रिमें प्रकाश करता है, दिनमें नहीं; क्योंकि डाइन्के प्रकाश की अंतरिक्ष अग्निका प्रकाश सीमित है। मूलतः अग्निका प्रकाश थोड़ा दूर (थोड़े देश में) और सात समय तक रहता है; और दिनका प्रकाश बहुत दूरतक और बहुत समयतक रहता है।


   शुक्ल पक्ष का एक दिन होता है, जो पितरों की एक रात होती है। यह शुक्ल पक्षका प्रकाश आकाश में बहुत दूरतक और बहुत दिनतक रहता है। इसी प्रकार जब सूर्य भगवान उत्तरकी ओर रहते हैं, तब उत्तरायण कहते हैं, जिसमें दिनका समय बढ़ता है। वह उत्तरायण छह महीने का होता है, जो एक दिन का देवता है। वह उत्तरायण प्रकाश बहुत दूरदर्शी और बहुत समय तक रहता है।

जो शुक्लमार्गमें अर्थात् प्रकाशकी बहुलतावाले मार्गमें जानेवाले हैं, वे सबसे पहले ज्योतिस्वरूप अग्निदेवताके अधिकारमें आते हैं। जहां तक ​​अग्निदेवता का अधिकार है, वहां से पार वास अग्निदेवता को एक दिनके देवताको तीन देता है। दिनका देवता उन तीर्थंकर को अपना अधिकार तक ले जाते हैं जो शुक्लपक्ष के अधिपति देवता को समर्पित कर देते हैं। वह शुक्ल पक्षका अधिपति देवता को अपने सीमाको पार के शस्त्रागार में उन आवेशको उत्तरायणके अधिपति देवता का स्थान देता है। फिर वह उत्तरायण अधिपति देवता ब्रह्मलोक के अधिकारी देवता को समर्पित कर देता है। इस प्रकार वे क्रमबद्ध ब्रह्मलोक में पहुँच जाते हैं। ब्रह्माजीकी आयुतक वे वहां स्थित हैं महाप्रलयमें ब्रह्माजीके साथ ही मुक्त हो जाते हैं--सच्चिदानंदघन परमात्माको प्राप्त होते हैं।

यहाँ अग्नि कालाभिमानी देवताका ही वाचक है तथा ज्योति भी कालाभिमानी देवताका ही वाचक है अथवा अग्नि और ज्योति नामवाले दोनों प्रसिद्ध वैदिक देवता ही हैं। वनों में आमके पेड़ अधिक होते हैं जैसे आमका वन कहते हैं एक ही प्रकार यहां कालाभिमानी लोकों का वर्णन अधिक होने से यात्रा काले तं कालम् जिसके अलावा कालवाचक शब्दों का प्रयोग किया गया है। (अभिप्राय यह है कि जिस मार्ग में अग्निदेवता ज्योतिदेवता हैं) दिनका देवता शुक्ल पक्षका देवता और उत्तरायणके छठाका देवता उस मार्ग में हैं (अर्थात् मित्र देवताओं के अधिकार में) मरकर गए ब्रह्मवेत्ता अर्थात ब्रह्मकी पूजा में शीघ्र ही पुरुष क्रम से ब्रह्मको प्राप्त होते हैं। यहां उत्तरायण मार्ग भी देवताका ही वाचक हैं क्योंकि अन्यत्र (ब्रह्मसूत्रमें) भी यही न्याय माना गया है। जो पूर्ण ज्ञाननिष्ठ सद्योमुक्तके पात्र होते हैं उनका अजाना कहीं नहीं होता श्रुति भी कहती है कि उसका प्राण मार्ग कहीं नहीं जाता। वे तो ब्रह्मसंलीनप्राण अर्थात् ब्रह्ममय--ब्रह्मरूप ही हैं।


क्रममुक्ति के मार्ग को स्थापित किया गया है। वेद प्रतिपादित कर्म एवं उपासना के समुच्चय अर्थात् दोनों के साथ-साथ अनुष्ठान करने वाले साधक और एक ही प्रकार के जिन लोगों को वर्तमान जीवन में ही ब्रह्म का साक्षात् अनुभव न हुआ हो ऐसे ब्रह्म के उपासक से यह कर्ममुक्ति के अधिकारी होते हैं। उपनिषदों के ये साधक जन देह त्याग की भूमिका देवयान (देवताओं के मार्ग) के अनुसार ब्रह्मलोक अर्थात सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी के लोक में प्रवेश करते हैं। वहां कल्प की समाप्ति तक दिव्य अलौकिक विषयों के आनंद का अनुभव करके प्रलय के समय ब्रह्माजी के साथ वे सर्वथा मुक्त हो जाते हैं। उपनिषदों में संयुक्त शब्दों का प्रयोग कर भगवान श्रीकृष्ण को यहां देवायन प्रदान किया जाता है। ऋषि प्रतिपादित तत्त्व ज्ञान के जिज्ञासाओं के लिए आध्यात्मिक दृष्टि से यह श्लोक विशेष अर्थपूर्ण है। अग्नि ज्योति दिन शुक्लपक्ष उत्तरायण के षणमास ये सब सूर्य के द्वारा अधिष्ठित देवयान को सूचित करते हैं। प्रश्नोपनिषद में परम सत्य की सृष्टि से उत्पत्ति का वर्णन किया गया है। वहां गुरु के शिष्य हैं कि सृष्टिकर्ता प्रजापति स्वयं सूर्य और चन्द्रमा बन गये। आकाश में दृश्यमान सूर्य और चंद्र क्रमशः चेतन और जड़ तत्त्व के प्रतीक स्वरूप हैं। स्मरणीय है कि ऐसा उपासक अपने उपास्य के लोक को प्राप्त होता है क्योंकि वृत्ति के अनुसार व्यक्ति बनता है। संपूर्ण जीवन काल में दैवीय एवं सांस्कृतिक दृष्टिकोण का ही चिंतन मनुष्य पर निश्चित रूप से वर्तमान शरीर का त्याग करता है, विकास के मार्ग पर ही विनाश करता है। इस मार्ग को अग्नि ज्योति दिवस आदि शब्दों से लक्षित किया गया है। इस प्रकार उपनिषदों की अपनी विशिष्ट भाषा में ब्रह्म के उपासकों की मुक्ति का मार्ग उत्तरायण है। क्रममुक्ति को बताए गए के लिए ऋषियों द्वारा क्रीड़ा प्रयोगों में जाने वाले यह शब्द उत्तरायण में शैक्षणिक सभी अभिप्राय समाविष्ट हैं।

8।।24।।

भगवद  गीता अध्याय: 8

श्लोक 25


श्लोक:

धूमो रात्रिस्तथा कृष्ण षण्मासा दक्षिणायनम्‌।

 तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते॥


भावार्थ:

जिस मार्ग में धूमाभिमानी देवता है, रात्रि अभिमानी देवता है तथा कृष्ण पक्ष का अभिमानी देवता है और दक्षिणायन के छः महीनों का अभिमानी देवता है, उस मार्ग में मरकर गया हुआ सकाम कर्म करने वाला योगी उपयुक्त देवताओं द्वारा क्रम से ले गया हुआ चंद्रमा की ज्योत को प्राप्त होकर स्वर्ग में अपने शुभ कर्मों का फल भोगकर वापस आता है

8॥25॥


व्याख्या:


गीता में मृतक के लिए दो मार्ग बताए गए हैं - शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष। यहाँ दोनों पक्षों में शरीर त्याग कर कोन कहां जाता है, इसकी सरल व्याख्या है:


शुक्ल पक्ष:


शुक्ल पक्ष में शरीर त्याग करने वाले व्यक्ति की आत्मा उत्तरायण मार्ग से होकर देवताओं के लोक में जाती है। यह मार्ग सूर्य की ओर जाने वाला मार्ग है, जो कि प्रकाश और ज्ञान का प्रतीक है।


उत्तरायण मार्ग से होकर जाने वाली आत्मा देवताओं के लोक में जाती है, जहां वह सुख और आनंद का अनुभव करती है। यह लोक ब्रह्मलोक या विष्णुलोक के नाम से भी जाना जाता है।


कृष्ण पक्ष:


कृष्ण पक्ष में शरीर त्याग करने वाले व्यक्ति की आत्मा दक्षिणायन मार्ग से होकर पितरों के लोक में जाती है। यह मार्ग सूर्य की विपरीत दिशा में जाने वाला मार्ग है, जो कि अंधकार और अज्ञान का प्रतीक है।


दक्षिणायन मार्ग से होकर जाने वाली आत्मा पितरों के लोक में जाती है, जहां वह अपने पूर्वजों के साथ मिलती है और उनके साथ समय बिताती है। यह लोक पितरलोक या यमलोक के नाम से भी जाना जाता है।


यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि यह दोनों मार्ग केवल मृत्यु के बाद की यात्रा के लिए हैं, और यह व्यक्ति के जीवनकाल में किए गए कर्मों और उसकी आध्यात्मिक उन्नति पर भी  निर्भर करता है।


सूर्य का उजाला उगता सूर्य बालक रूप होता है।

दुपहर का सूर्य जवानी में होता है।

संध्या काल का सूर्य बुढ़ापे की अवस्था में होता है।

पर विश्व में कभी अस्त नहीं होता।

(1) उद्देश्य परमात्मप्राप्तिका है; परंतु सुखभोगकी सूक्ष्म सूक्ष्मदर्शन सर्वथा मिटती नहीं है, वे शरीर को ठीक करने वाले ब्रह्मलोक में जाते हैं। ब्रह्मलोक के भोगने पर उनका दर्शन मिट जाता है तो वे मुक्त हो जाते हैं। इसका वर्णन यहां चौबीसवें श्लोक में हुआ है।


       उद्देश्य परमात्मप्राप्तिका ही है और जिसमें न यहांके भोगोंकी संकल्पना है और न ब्रह्मलोकके भोगोंकी; परन्तु जो अन्तकाल में निर्गुण के ध्यान से समाप्त हो जाते हैं, वे ब्रह्मलोक आदि लोकों में नहीं जाते। वे तो सीधे ही योगियों के कुलमें जन्म लेते हैं अर्थात जहां पूर्वजन्मकृत ध्यानरूप साधन ठीक तरह से हो सके, ऐसे योगियों के कुलमें उनका जन्म होता है। वहां वे साधन बनकर मुक्त हो जाते हैं 


         -- भौतिक शास्त्र साधकों का उद्देश्य तो एक ही रहता है पर वासना में अनंत निवाससे एक तो ब्रह्मलोक में साधक मुक्त होते हैं और एक सीधे ही योगियों के कुल में उत्पन्न साधन साधन करके मुक्त होते हैं।


     सारांश उद्देश्य ही स्वर्गादि ऊँचे-ऊँचे लोकोंके सुख भोगनेका है, वे यज्ञ आदि शुभ-कर्म करके ऊँचे-ऊँचे लोकों में जाते हैं और वहाँके दिव्य भोग भोगकर पुण्य क्षीण होने पर पीछे लौट जाते हैं और अर्थात जन्म-मरणको प्राप्त होते हैं ।


उद्देश्य तो परमात्मप्राप्तिका ही है; पृथ्वी सुखभोग की इच्छा पर वह काम नहीं कर सका। अत: अन्तकाल में योग से विश्राम वह स्वर्गादि लोकों में रहता है, जहाँ उसका भोग होता है और फिर लौटकर शुद्ध श्रीमानोंके घर में जन्म लेता है। वहाँ वह  पूर्वजन्मकृत साधन में लग जाती है और मुक्त हो जाती है 


       -- मनोवैज्ञानिक साधकों में एकका तो उद्देश्य ही स्वर्गके सुखभोगका है, इसलिए वह पुण्यकर्मोंके अनुसार वहांके भोगभोगकर पीछे लौटकर आता है। उद्देश्य परमात्मा का है और वह विचारवाचक जगत् भोगों का त्याग भी करता है, फिर भी कोई संकल्प नहीं मिटता, तो अंत में भोगों की याद आती है वह स्वर्गादि लोकों में है। जिसने भी तीर्थ भोगों का त्याग किया है, उसका बड़ा भारी माहात्म्य है। इसलिए वह उन लोकों में बहुत समय तक भोग लगाता है, यहां श्रीमानोंके घर में जन्म होता है।


(2) सामान्य सिद्धांत की यह धारणा है कि जो दिनमें, शुक्लपक्षमें और उत्तरायणमें मरते हैं, वे तो मुक्त हो जाते हैं, पर जो रात्रिमें कृष्णपक्षमें और दक्षिणायणमें मरते हैं उनकी मुक्ति नहीं होती। यह धारणा ठीक नहीं है। 


क्योंकि यहां जो शुक्ल और कृष्णमार्ग का वर्णन हुआ है, वह ऊर्ध्वगटिको प्राप्त करने वालों के लिए ही हुआ है। इसलिए यदि ऐसा ही मान लिया जाय कि एक दिन आदि में जन्माँवले मुक्त होते हैं और रात आदि में एक भी समय नहीं होता है, तो फिर अधोगतिवाले कब मरेंगे? 


असल में मौतवाले अपने-अपने कर्मों के अनुसार ही ऊंची-नीच गतियों में जाते हैं, वे कच्चे दिन में मरें, कच्ची रात में; कृष्ण कृष्ण पक्ष में मरें, कृष्ण  पक्ष में; कलाई उत्तरायण में मरें, परत दक्षिणायण में -- इसका कोई नियम नहीं है।     


       जो भगवद्भक्त हैं, जो केवल भगवान के ही परायण हैं, जिनके मन में भगवद्दर्शनकी ही लालसा है, ऐसे भक्त दिनमें या रातमें, शुक्लपक्षमें या कृष्णपक्षमें, उत्तरायणमें या दक्षिणायणमें, जब कभी शरीर धारण करते हैं, तो उनके लिए भगवानके दर्शन होते हैं। मज़दूरों के साथ वे सीधे भगवद्धाम में पहुँच जाते हैं।


    👉यहाँ भी एक शङ्का है कि जब मनुष्य अपने कर्मों के अनुसार ही गति पाता है, तो फिर भीष्मजीने, जो तत्वज्ञ जीवनमुक्त महापुरुष थे, दक्षिणायन में शरीर न पूर्ण उत्तरायणकी प्रतीक्षा क्यों की?


 इसका समाधान यह है कि भीष्मजी भगवद्धाम नहीं गये थे। वे 'द्यौ' नामक वसु (अजान देवता) थे, जो शापके कारण मृत्युलोक में आये थे। मूलतः उन्हें देवलोक में जाना जाता था। दक्षिणायणके समय देवलोक में रात रहती है और उसके द्वार बंद रहते हैं। यदि भीष्मजी दक्षिणायनके समय शरीर प्रयोग करते हैं, तो उन्हें अपने लोक में प्रवेश करने के लिए बाहर तक चलने वाले सामान दें। वे इच्छामृत्यु तो थे ही; मूलतः उन्होंने सोचा कि वहाँ प्रतिस्पर्द्धा करना ठीक समझा है; क्योंकि यहां तो भगवान श्रीकृष्णके अस्तित्व दर्शन और सत्संग भी रहता है, जिससे सबका हित होगा, वहां अकेले पड़े साथ क्या रहेंगे? ऐसा संकेत वे अपना शरीर दक्षिणायनमें न पूर्ण उत्तरायणमें ही समाप्त करते हैं।

8॥25॥


भगवद  गीता अध्याय: 8

श्लोक 26


श्लोक:

शुक्ल कृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते।

 एकया यात्यनावृत्ति मन्ययावर्तते पुनः॥


भावार्थ:

क्योंकि जगत के ये दो प्रकार के- शुक्ल और कृष्ण अर्थात देवयान और पितृयान मार्ग सनातन माने गए हैं। इनमें एक द्वारा गया हुआ (अर्थात इसी अध्याय के श्लोक 24 के अनुसार अर्चिमार्ग से गया हुआ योगी।)-- जिससे वापस नहीं लौटना पड़ता, उस परमगति को प्राप्त होता है और दूसरे के द्वारा गया हुआ ( अर्थात इसी अध्याय के श्लोक 25 के अनुसार धूममार्ग से गया हुआ सकाम कर्मयोगी।) फिर वापस आता है अर्थात्‌ जन्म-मृत्यु को प्राप्त होता है

 8॥26॥


पूर्वोक्त देवयान और पितृयान को ही यहाँ क्रमशः शुक्लगति और कृष्णगति कहा गया है। लक्ष्य के प्रारूप के अनुसार यह उनका पुनर्नामांकन किया गया है। प्रथम मार्ग साधक को उद्वेलित के सर्वोच्च शिखर तक पहुँचाता है तो अन्य मार्ग के परिणाम में गिरावट आती है। मानव की प्रत्येक पीढ़ी में जीवन के दो मार्ग या प्रकार होते हैं, भौतिक और आध्यात्मिक। भौतिकशास्त्रियों के अनुसार मनुष्य की आवश्यकताएँ केवल भोजन, वस्त्र और मकान हैं। उनका मत जीवन का परम पुरुषार्थ वैश्य सुखोपभोग से शरीर और मन की रुचियों को संतुष्ट करना ही है। केवल इतने से ही संतोष हो जाता है। इससे संबंधित और दिव्य आदर्श के प्रति न कोई उनकी रुचि है और न ही कोई रुचि। अध्यात्म के मार्ग पर चलने वाले विवेकजन अपने समसामयिक दर्शन विषयों को देखकर लब्ध नहीं हो पाते। उनकी बुद्धि अग्निशिखा के समान सदा ऊर्ध्वगामी होती है जो सतही जीवन में उच्च और श्रेष्ठ लक्ष्य की खोज में रमण करती है। व्यापक अर्थ की दृष्टि से इन दोनों का समावेश रूप ही संसार है। वेदांत का सिद्धांत है कि जीव संसार दुःख से निवृत्त हो सकता है। यह ऋषियों का प्रत्यक्ष अनुभव है। इस श्लोक में एक साधक की दृष्टि से विचार करने पर सफल योगी बनने के लिए दिए गए निर्देशों का बोध हो सकता है। कभी-कभी साधना काल में मन की बहिर्मुखी प्रवृत्ति के साधक विषयों की ओर आकर्षित होकर उन्हें आस्कत हो जाता है। ऐसे में न हमें स्वयं को धिक्कारने की आवश्यकता है और न आश्चर्य मुग्ध होने की। भगवान स्पष्ट करते हैं कि मनुष्य के मन में उच्च जीवन की भावना और निम्न जीवन के प्रति आकर्षण इन दोनों विरोधी प्रवृत्तियों में अनादि काल से कशिश चल रही है। दृढ़ता से काम लेने पर उन्नत प्रवृत्तियों पर हम विजय प्राप्त कर सकते हैं। इन दो राष्ट्रों और उनके सनातन स्वरूप को देखने का निश्चित फल क्या है?

यहां भगवान कृष्ण अर्जुन को जीवन के दो मार्गों के बारे में बता रहे हैं - भौतिक और आध्यात्मिक।


भौतिक मार्ग वह है जिसमें व्यक्ति की आवश्यकताएँ केवल भोजन, वस्त्र और मकान होती हैं। यह मार्ग व्यक्ति को सुखोपभोग की ओर ले जाता है, लेकिन इससे अधिक कुछ नहीं मिलता है।


आध्यात्मिक मार्ग वह है जिसमें व्यक्ति की बुद्धि अग्निशिखा के समान सदा ऊर्ध्वगामी होती है, जो सतही जीवन में उच्च और श्रेष्ठ लक्ष्य की खोज में रमण करती है। यह मार्ग व्यक्ति को मोक्ष की ओर ले जाता है, जहां व्यक्ति को परमात्मा के साथ एकता का अनुभव होता है।


भगवान कृष्ण यह भी बता रहे हैं कि ये दोनों मार्ग सनातन हैं और हमेशा से मौजूद हैं। व्यक्ति को अपनी पसंद के अनुसार इनमें से एक मार्ग का चयन करना होता है।


इस श्लोक का निष्कर्ष यह है कि व्यक्ति को अपने जीवन के लक्ष्य को स्पष्ट रूप से समझना चाहिए और उसी के अनुसार अपने मार्ग का चयन करना चाहिए। यदि व्यक्ति भौतिक सुखों की ओर आकर्षित होता है, तो उसे भौतिक मार्ग का चयन करना चाहिए। लेकिन यदि व्यक्ति आध्यात्मिक उन्नति और मोक्ष की ओर आकर्षित होता है, तो उसे आध्यात्मिक मार्ग का चयन करना चाहिए।

8॥26॥

भगवद  गीता अध्याय: 8

श्लोक 27


श्लोक:

नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन।

 तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन॥


भावार्थ:

हे पार्थ! इस प्रकार इन दोनों मार्गों को तत्त्व से जानकर कोई भी योगी मोहित नहीं होता। इस कारण हे अर्जुन! तू सब काल में समबुद्धि रूप से योग से युक्त हो अर्थात निरंतर मेरी प्राप्ति के लिए साधन करने वाला हो

 8॥27॥

शुक्लमार्ग प्रकाशमय है और कृष्णमार्ग अंधकारमय है। अंतःकरण में उत्पत्ति-विनाशकारी वस्तु का महत्व नहीं है और उद्देश्य, ध्येय में प्रकाशस्वरूप (ज्ञानस्वरूप) परमात्मा ही हैं, ऐसे वे परमात्मा की ओर चलने वाले साधक शुक्लमार्गी हैं अर्थात उनका मार्ग प्रकाशमय है। जो संसार में रचे-पचे हैं और मोक्ष भोगने के उद्देश्य से यहां उनके भोगों से संयम करके यज्ञ, तप, दान आदि शास्त्रविहित शुभ कर्म करते हैं, ऐसे मनुष्य तो घोर अंधकार में हैं। बाद में स्वर्गादि उच्च भोग-भूमियों में जाते हैं, वे यद्यपि यहाँके भोगों में आस्तिक सन्देशसे ऊँचे उठे हुए हैं, तो भी आने-जानेवाले (जन्म-मरनके) मार्गमें होनेसे वे ये भी अंधकार में हैं. टोकरा है कि कृष्णमार्गवाले ऊँचे-ऊँचे लोकों में जाने पर भी जन्म-मराँके चक्कर में पड़े रहते हैं। कहीं गया है तो मरना बाकी है और मर गया है तो जन्मना बाकी है --ऐसे जन्म-मरणके चक्कर में पड़े हुए वे कोल्हूके बाल्की की तरह अनंतकालतक दिखते हैं। हो जाता है, भोगी नहीं। कारण कि वह यहां और परलोक के भोगों से ऊंची उठती है। इसलिए वह मोहित नहीं होता है।सांसारिक भोगोंके प्राप्त होने में और प्राप्त न होने में जिसका उद्देश्य निर्विकार अस्तित्व ही होता है, वह योगी है।

ऐसा दृढ़ संकल्प हो गया है कि मुझे तो केवल परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति ही करनी है, तो फिर कैसे ही देश, काल, परिस्थिति आदि के बारे में पता चल जाता है, पर भी वह सिद्ध नहीं होता अर्थात उसकी जो साधना है वह किसी भी प्रकार की होती है। देश काल घटना परिस्थिति आदिके अधीन नहीं। उनका लक्ष्य परमात्मा की ओर अटल रहने का कारण देशकाल आदिका पर कोई असर नहीं हुआ। उपयुक्त-प्रतिकूल देश काल परिस्थिति आदि में उसकी स्वाभाविक समता हो जाती है। इसलिए भगवान अर्जुन कहते हैं कि तू सब समय में अनुकूल प्रतिकूल परिदृश्य के द्वारा प्रभावित होकर न उसके सदुपयोग से प्राप्त होता है। -निरंतर समतामें स्थित रह।


शुक्लगति और कृष्णगति इन दोनों के ज्ञान का फल यह है कि इन्हें ज्ञात योगी पुरुष कभी मोहित नहीं होता है मन में उत्थान वाली उच्च स्तर की प्रवृत्तियों के कारण धैर्य खोकर वह कभी निराश नहीं होता है। वर्णित और अब इस श्लोक में वे ज्ञान और उसके फल को आधार बनाकर कहते हैं कि इसलिए हे अर्जुन तुम सब काल में योगी बनो। जो अनंत से तादात्म्य त्रिमूर्ति मन को आत्मस्वरूप में एकाग्र करना सिखाता है वह पुरुष योगी है। तादात्म्य स्थापित कर आत्मज्ञान में स्थिर होने का प्रयास करना चाहिए। अंत में हुए इस योग के महात्म्य को भगवान कहते हैं--


भगवद  गीता अध्याय: 8

श्लोक 28


श्लोक:

वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम्‌।

 अत्येत तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम्‌॥


भावार्थ:

योगी पुरुष इस रहस्य को तत्त्व से जानकर वेदों के पढ़ने में तथा यज्ञ, तप और दानादि के करने में जो पुण्यफल कहा है, उन सबको निःसंदेह उल्लंघन कर जाता है और सनातन परम पद को प्राप्त होता है

 8॥28॥ 

 

व्याख्या:


यज्ञ, दान, तप, तीर्थ, व्रत आदि भी शास्त्रीय उत्तम-से-उत्तम कार्य हैं और उनका जो फल है, वह विनाशी ही होता है। 


क्योंकि जब उत्तम-से-उत्तम कार्य का भी आरंभ और समापन होता है, तो फिर वह कार्य से उत्पन्न होने वाला फल अज्ञानी कैसे हो सकता है?


 वह फल इस लोक का हो, नरक स्वर्गादि भोग-भूमियोंका हो, उसकी नश्वरता में किञ्चिन्मात्रा भी नहीं है। जीव स्वयं परमात्माका अज्ञानी अंश भी विनाशी सूक्ष्मजीवों में फंसे रहे, तो इसमें उनकी अज्ञेयता ही मुख्य है। मूलतः जो मनुष्य तेइसवें श्लोकसे लेकर छब्बीसवें श्लोक तक वर्णित है, वह शुक्ल और कृष्णमार्गके रहस्यों को समझता है, वह यज्ञ, तप, दान आदि सभी पुण्यफलोंका की पूर्ति करता है। क्योंकि इससे उसे यह समझ में आता है कि भोग-भूमियों की भी आखिरी बार जो ब्रह्मलोक है, वहाँ जाकर भी पीछे-ही आना है; परन्तु भगवान्को प्राप्त होने पर लौटकर नहीं आना  और साथ-साथ यह भी समझ में आता है कि मैं तो साक्षात परमात्माका अंश हूं तथा ये प्राकृत पदार्थ नित्य-निरंतर यह अभाव में, नाशमें जा रहे हैं, तो फिर वह नशावन नशेमें, भोगोंमें न भुख्मकर भगवान्के ही अवशेष हो जाते हैं। इसलिए वह आदिस्थान परमात्मा को प्राप्त होता है, इसी अध्यायके इक्कीसवें श्लोक में 'परमगति' और 'परमधाम' नाम से कहा गया है। न जानने की यह असामर्थ्य न तो भगवान्की दी गई है, न प्रकृतिसे पैदा हुई है और न कोई कर्मका फल ही है अर्थात यह असामर्थ्य किसीकी मांद नहीं है; बुरा स्वयं जीवने ही परमात्मतत्त्वसे विमुख का जन्म हुआ है। इसलिए यह स्वयं ही अवैयक्तिक हो सकता है। कारण कि आपके द्वारा की गई भूल को स्वयं ही वोट दिया जा सकता है और दार्शनिक का दायित्व भी स्वयं पर ही है। इस भूलको नक्षत्र में यह जीव असिद्ध नहीं है, निर्बल नहीं है, पात्र नहीं है। केवल संयोगजन्य सुखकी लोलुपताके कारण यह अपनेमें असामर्थ्यका आरोप लगाता है और इसीसे मनुष्यजन्मके महान् लाभसे वंचित रह जाता है। मूल रूप से मनुष्य को संयोगजन्य सुखकी लोलुपताका त्याग करके मनुष्यजन्मको सार्थक बनानेके लिए नित्य-निरंतर उद्यत कीर्ति उत्सव।छठे अध्यायके अंतमें भगवानने पहले योगीकी महिमा कही और पीछे अर्जुनको योगी हो जानेकी आज्ञा दी ; और यहां भगवानने पहले अर्जुनको योगी होनेकी आज्ञा दी और पीछे योगीकी महिमा कहि। इसमें कहा गया है कि अर्जुन के छठे अध्याय में योगभ्रष्टका प्रसाद है, और उसके विषय में मन में सन्देह था कि वह कहीं भी नष्ट-भ्रष्ट नहीं होता? इस शकाको दूर करने के लिए भगवान ने कहा कि 'कोई किसी तरह से योग में लग गया तो उसका पतन नहीं होगा।' 'इतना ही नहीं, यह योगका जिज्ञासुमात्रा भी शब्दब्रह्म का आविष्कार है।' इसलिए योगीकी महिमा पहले कही और पीछे अर्जुनके लिए योगीकी आज्ञा दी। लेकिन यहां अर्जुन का सवाल है कि आप किस नियति के साथ आत्मा पुरुषों के दर्शन करने आते हैं? इस प्रश्न का उत्तर देते हुए भगवान ने कहा था कि 'जो मोक्ष से सर्वथा विमुख उद्देश्य केवल मेरा परायण होता है, वह योगीके लिए मुझे सरलता है', इसलिए पहले 'तू योगी हो जा' ऐसी आज्ञा दी और पीछे योगीकी महिमा कही।

👉(यज्ञ, दान, तप, तीर्थ, व्रत आदि भी शास्त्रीय उत्तम-से-उत्तम कार्य हैं।पर मुक्ति के लिए इन सब से ज्ञान का जुड़ना महत्व पूर्ण है)👈


'इस प्रकार हैं, तत् सत्--इन भगवन्नामोके उच्चारण निरर्थक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय'श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद्रूप श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें 'अक्षरब्रह्मयोग' नामक अष्टवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।।8।। ,


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ॐ तत्सदिति श्री मद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्री कृष्णार्जुनसंवादे अक्षर ब्रह्मयोगो नामाष्टमोऽध्यायः

 ॥8॥

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