कुल 29 श्लोक हैं इस भगवद गीता के अध्याय: 5 में
श्लोक 1
अर्जुन उवाच।,संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि ।,यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम् ॥1॥
Description:
अर्जुन ने कहा-हे कृष्ण! पहले आपने कर्म संन्यास की सराहना की और आपने मुझे भक्ति युक्त कर्मयोग का पालन करने का उपदेश भी दिया। कृपापूर्वक अब मुझे निश्चित रूप से अवगत कराएँ कि इन दोनों में से कौन सा मार्ग अधिक लाभदायक है।
भगवद गीता अध्याय: 5
श्लोक 1
श्लोक:
( सांख्ययोग और कर्मयोग का निर्णय )
अर्जुन उवाच
सन्न्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि।
यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम्॥
भावार्थ:
अर्जुन बोले- हे कृष्ण! आप कर्मों के संन्यास की और फिर कर्मयोग की प्रशंसा करते हैं। इसलिए इन दोनों में से जो एक मेरे लिए भलीभाँति निश्चित कल्याणकारक साधन हो, उसको कहिए
॥1॥
सांख्य योग और कर्म योग दोनों ही हिन्दू दर्शन के भाग हैं लेकिन उनमें अंतर है:
सांख्य योग: यह दर्शन ज्ञान के माध्यम से मोक्ष की प्राप्ति को समझाता है। इसमें माना जाता है कि अनात्मा और परमात्मा में अंतर है और ज्ञान द्वारा ही मोक्ष संभव है।
कर्म योग: यह दर्शन कर्मों के माध्यम से मोक्ष की प्राप्ति को बताता है। इसमें कर्म, भक्ति और सेवा के माध्यम से भगवान की प्राप्ति और मोक्ष संभव हैं।
इस प्रकार, सांख्य योग में ज्ञान का महत्व और कर्म योग में कर्म और भक्ति का महत्व है।
दर्शनशास्त्र का अध्ययन करने से, हम अपने लिए सोचने के कौशल विकसित करते हैं.
दर्शनशास्त्र का अध्ययन करने से, हम अपने लिए सोचने के कौशल विकसित करते हैं.
जैसे ताज महल कहते ही हम वहां हो ना हो हमारी आंखे के सामने नजर आने लगता है।
वैसे ही अगर कहा जाए कि आसमान पर जाने की सीडी जो सुनी तो है पर देखी नहीं वो यह महल की भांति आंखों के सामने कल्पना से प्रगट होती है कल्पना भिन भिन लोगो की भी अलग अलग होगी।
भगवान मन में सूक्ष्म रूप में कण कण कण में अगर यही किसी बच्चे से उसके घर में पूछो भगवानजी कहां हैं तो वो मंदिर की ओर इशारा करता है जो आलमारी में है।उधर हे देख लो।
वहां जाओ(कर्म करो)आलमारी खोलने के (ज्ञान) को साथ जोड़ो और भगवान को देख लो।
भगवद गीता अध्याय: 5
श्लोक 2
श्लोक:
श्रीभगवानुवाच
सन्न्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ।
तयोस्तु कर्मसन्न्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते॥
भावार्थ:
श्री भगवान बोले- कर्म संन्यास और कर्मयोग- ये दोनों ही परम कल्याण के करने वाले हैं, परन्तु उन दोनों में भी कर्म संन्यास से कर्मयोग साधन में सुगम होने से श्रेष्ठ है
॥2॥
कर्मयोग और कर्म संन्यास दोनों ही आध्यात्मिक विकास और मुक्ति के मार्ग हैं, लेकिन इन दोनों में अंतर है:
कर्मयोग
कर्मयोग का मतलब है दुनिया में निस्वार्थ कर्म करना. कर्मयोगी, आसक्ति रहित होकर काम करता है और किसी से घृणा नहीं करता. कर्मयोगी, सांसारिक दायित्वों का निर्वहन करते हुए भी अकर्मा की अवस्था में रहता है.
कर्म संन्यास
कर्म संन्यास का मतलब है सांसारिक बंधनों से त्याग करना और वैराग्य अपनाना. संन्यासी, सभी इच्छाओं, मोह, और व्यक्तिगत संबंधों का त्याग कर देता है और परमात्मा की आराधना में लीन रहता है.
गीता के मुताबिक, कर्मयोग, कर्म संन्यास से ज़्यादा श्रेयस्कर है. गीता में कहा गया है कि कर्मों का सिर्फ़ त्याग करने से सिद्धि या परमपद नहीं मिलता. कर्म करना मनुष्य के लिए ज़रूरी है. आत्मज्ञानी व्यक्ति को भी प्रकृति के बंधन से मुक्त होकर कर्म करना चाहिए.
कर्म में अहंकार ,स्वार्थ,परोपकार,आदि को त्याग कर ज्ञान पूर्वक किया जाए।
भगवान् श्री जो यहाँ कहना चाह रहे हैं, उसके अनुसार कर्मों में अहंकार का त्याग ही कर्मणां संन्यासः है- कर्मों का त्याग है तथा कर्मफल उपभोग के प्रति हमारी चाह के त्याग को कर्मयोग कहा गया है। कितना बारीकी से रखा गया दर्शन है, पर वह समझ में तब ही आ सकता है, जब हम उसका मर्म समझ सकें।
भाव यह है कि अपना फर्ज समझ कर बिना किसी फल की इच्छा से कर्म भी मोक्ष तक पहुंचा देता है।
भगवद गीता अध्याय: 5
श्लोक 3
श्लोक:
ज्ञेयः स नित्यसन्न्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति।
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते॥
भावार्थ:
हे अर्जुन! जो पुरुष न किसी से द्वेष करता है और न किसी की आकांक्षा करता है, वह कर्मयोगी सदा संन्यासी ही समझने योग्य है क्योंकि राग-द्वेषादि द्वंद्वों से रहित पुरुष सुखपूर्वक संसार बंधन से मुक्त हो जाता है
॥3॥
सन्यासी को समझ ने के लिए सन्यासी के कर्म की समझना जरूरी हो जाता है
(नहीं तो चल सन्यासी मंदिर में तक ही सिमट कर रह जाएगा)
सन्यासी सांसारिक भीड़ से अलग रहता है।अर्थात इन सांसारिक प्रपंचों चोचलो से हटना गीता के मुताबिक, सच्चा संन्यासी वह है जो सभी कर्मों के फल की इच्छा त्याग देता है और निष्काम भाव से अपने कर्तव्यों का पालन करता है।अग्नि का त्याग करने वाले सन्यासी शारीरिक निर्वाह जंगलों में रहते हुए कंद मूल से ही जीवन व्यतीत कर लेते है बिना सिला वस्त्र धारण करते है।संन्यासी अपने पूरे जीवन को एक वैरागी के रूप में जीता है और आत्मज्ञान की खोज करता है.
संन्यासी अपने ज्ञान, संवेदनाओं, कर्म, और पुरुषार्थ की आहुति समष्टि के लिए देता है.
यह पंक्ति दर्शाती है कि एक सच्चा संन्यासी अपने ज्ञान, भावनाओं, कर्मों और पुरुषार्थ (संघर्ष या प्रयास) को अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं, बल्कि समष्टि (समाज, विश्व, या संपूर्ण सृष्टि) के कल्याण के लिए समर्पित करता है।
संन्यासी केवल आत्म-मुक्ति या आत्म-सुख की कामना नहीं करता, बल्कि उसका उद्देश्य अपने भीतर की सभी शक्तियों और संवेदनाओं को त्यागते हुए, उन्हें समर्पण की भावना के साथ समष्टि की सेवा में लगाना होता है। संन्यासी अपने ज्ञान और अनुभूति को, समाज या संपूर्ण मानवता के कल्याण में लगा देता है। उसका कर्म निस्वार्थ होता है और पुरुषार्थ का लक्ष्य भी व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर समाज के हित के लिए होता है।
संक्षेप में, संन्यासी का जीवन त्याग और समर्पण का प्रतीक बन जाता है, जो उसे समाज और सृष्टि के प्रति समर्पित बनाता है। यह समर्पण ही संन्यासी को "समष्टि के लिए आहुति देने वाला" बना देता है।
संन्यासी जीवन को उत्सव के रूप में जीता है.
संन्यासी बाहरी सुखों के विचारों को त्यागकर इच्छा, भय, और क्रोध से मुक्त हो जाता है।
संन्यासी अपकारी पर भी उपकार करता है. सब का भला अंत भले का भला कहता है।संन्यासी अपकारी कोभी श्राप नहीं देता। पर उसके बोलो में माफ भी नहीं देता अंत भले का भला ही मांगता है।क्यों कि वह अच्छे बुरे कर्मों के फल को जानता है।वह जानता है, अपकारी नेभी कर्म फल भोगना ही है।
सन्यासी तीन घर मांगता है
पहला ब्रह्मा का घर जान कर दूसरा विष्णु का तीसरा महेश का जो मिले उसी भिक्षा पर गुजारा कर लेता है। नहीं तो पानी पीकर राम राम कर लेता है।
❤️ संन्यासी के लिए जीवन में जो भी मिलता है, वह उसी में संतुष्ट रहता है, और उसकी भूख केवल भौतिक नहीं होती, बल्कि आत्मिक होती है। तीन घरों से भिक्षा मांगने का भाव यह है कि वह अपनी आवश्यकता की पूर्ति के लिए भी इस संसार के तीन प्रमुख रूपों – सृजन (ब्रह्मा), पालन (विष्णु) और संहार (महेश) – से भी कुछ नहीं मांगता; बस न्यूनतम जीवन-यापन की भिक्षा ही लेता है।
यह संकेत है कि संन्यासी केवल परमात्मा की कृपा पर निर्भर रहते हुए, अपनी इच्छाओं और भौतिक आवश्यकताओं को सीमित कर देता है। उसे जीवन की अन्य आवश्यकताओं की चाह नहीं होती, और यदि भिक्षा न भी मिले, तो भी संन्यासी भूखा नहीं रहकर मात्र जल पीकर या ईश्वर का स्मरण कर संतुष्ट रहता है। उसका जीवन इस बात का प्रतीक है कि संतोष, त्याग और ईश्वर-प्रेम के द्वारा मनुष्य सहज ही अपने मन को शांति और संतोष प्रदान कर लेता है।
संन्यासी का जीवन इस प्रकार हमें यह शिक्षा देता है कि जो व्यक्ति बाहरी अपेक्षाओं को कम कर देता है और भीतर की ओर मुड़ जाता है, वह वास्तव में स्वतंत्र हो जाता है।
(यह सन्यासी की पहचान है जो घर घर जाकर मांगते है वह सियासी है या नहीं आप पर छोड़ता हुए)
सन्यासी ब्राह्मण का गुरु होता हे
सन्यासी का गुरु अरदासी
वैसे तो अरदास ही गृहस्थी होते हैं वैसे ही जैसे मैं या आप सभी
अरदासी वे लोग होते हैं जो भगवान की भक्ति और सेवा में अपना जीवन समर्पित करते हैं। वे लोग भगवान की पूजा, आराधना, और सेवा में लगे रहते हैं और अपने जीवन को भगवान के लिए समर्पित करते हैं।
अरदासी शब्द का मूल अर्थ है "प्रार्थना करने वाला" या "भगवान की सेवा करने वाला"। अरदासी लोग आमतौर पर भगवान के मंदिरों में रहते हैं और भगवान की सेवा में लगे रहते हैं।
सन्यासी भी अरदासी को अपना गुरु मानते हैं क्योंकि अरदासी लोग भगवान की भक्ति और सेवा में अपना जीवन समर्पित करते हैं और सन्यासी को भी भगवान की सेवा में लगने की प्रेरणा मिलती है।
अरदासी के कुछ गुण हैं:
1. भगवान की भक्ति और सेवा में समर्पण। (गृहस्थी)
2. प्रार्थना और आराधना में लगना।(गृहस्थी कर्तव्य)
3. भगवान के प्रति समर्पण और निष्ठा।(भगति भाव)
4. आत्म-त्याग और सेवा की भावना। (अतिथि देवों भव को चित्रार्थ करने को खुद भूखे रह कर भी अतिथि की सेवा)
5. भगवान के प्रति प्रेम और श्रद्धा।
भगवान में श्रद्धा ही नहीं अटूट विश्वाश
अरदासी की महत्ता:
1. भगवान की सेवा में लगना।
2. सन्यासी और अन्य लोगों को प्रेरणा देना।
3. भगवान की भक्ति और सेवा को बढ़ावा देना।
4. आत्म-शांति और मोक्ष की प्राप्ति।
आगे बढ़ते है
ग्रस्थ में संन्यास आश्रम भी आता है।
सन्यासी कभी गृहस्थी नहीं बन सकता पर गृहस्थी,संन्यासी बन कर पुनः गृहस्थी बन जाता है। सिर्फ और सिर्फ उसी को यह छूट मिली हुई है।
प्रत्यक्ष में ऐसे जाने:
जब किसी प्रिय की मृत्यु होती है।तब गृहस्थी संन्यासियों जैसे वस्त्र धारण करता है।संन्यासियों जैसा भोजन करता है। जमीन पर सोता है।सब से अलग रहता है। जब आचार्य ब्राह्मण शुद्धि करता है तो तो सन्यासी बना गृहस्थी पुनः गृहस्थ जीवन में आ जाता है।
भगवद गीता अध्याय: 5
श्लोक 4
श्लोक:
साङ्ख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः।
एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम्॥
भावार्थ:
उपर्युक्त संन्यास और कर्मयोग को मूर्ख लोग पृथक्-पृथक् फल देने वाले कहते हैं न कि पण्डितजन, क्योंकि दोनों में से एक में भी सम्यक् प्रकार से स्थित पुरुष दोनों के फलरूप परमात्मा को प्राप्त होता है
॥4॥
जिस कर्म का फल परमात्मा को प्राप्त होता है वह निष्काम कर्म कहलाता ।
भगवद गीता अध्याय: 5
श्लोक 5
श्लोक:
यत्साङ्ख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्यौगैरपि गम्यते।
एकं साङ्ख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति॥
भावार्थ:
ज्ञान योगियों द्वारा जो परमधाम प्राप्त किया जाता है, कर्मयोगियों द्वारा भी वही प्राप्त किया जाता है। इसलिए जो पुरुष ज्ञानयोग और कर्मयोग को फलरूप में एक देखता है, वही यथार्थ देखता है
॥5॥
ज्ञान योगी और कर्म योगी दोनो को मिलने वाला फल एक समान होता है।
भगवद गीता अध्याय: 5
श्लोक 6
श्लोक:
सन्न्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः।
योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति॥
भावार्थ:
परन्तु हे अर्जुन! कर्मयोग के बिना संन्यास अर्थात् मन, इन्द्रिय और शरीर द्वारा होने वाले सम्पूर्ण कर्मों में कर्तापन का त्याग प्राप्त होना कठिन है और भगवत्स्वरूप को मनन करने वाला कर्मयोगी परब्रह्म परमात्मा को शीघ्र ही प्राप्त हो जाता है
॥6॥
मन, इन्द्रिय और शरीर द्वारा होने वाले सम्पूर्ण कर्मों में कर्तापन का त्याग कर पाना बहुत कठिन है।पर खाते ,पीते, सोते,जागते घूमतेफिरते भगवान का स्मरण कठिन होते हुए भी कढ़िन नहीं होता।
जैसे:
👉यह शरीर आपका मंदिर है इस में आत्मा रूप में आप परमात्मा हो।बुद्धि सरस्वती माता आप हो।आप के साथ चलने वाले आप के नोकर है। और विषयों के अधीन हो जो खाता,पिता,देखता,सुनता,बोलता,स्पर्श करता हूं आप की पूजा है।निद्रा आप की समाधि,चलना फिरना आप की प्रदक्षिणा है मेरे वचन आप की स्तुति है ऐसे आराधना करते हुए कर्म में लीन होने को भगवान बताते या इशारा करते नजर आते है।👈
भगवद गीता अध्याय: 5
श्लोक 7
श्लोक:
👉( सांख्ययोगी और कर्मयोगी के लक्षण और उनकी महिमा ) 👈
योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः।
सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते॥
भावार्थ:
जिसका मन अपने वश में है, जो जितेन्द्रिय एवं विशुद्ध अन्तःकरण वाला है और सम्पूर्ण प्राणियों का आत्मरूप परमात्मा ही जिसका आत्मा है, ऐसा कर्मयोगी कर्म करता हुआ भी लिप्त नहीं होता
॥7॥
भाव:
इसका भाव यह है कि जो व्यक्ति अपने मन को अपने वश में रखता है, जो अपने इंद्रियों को वश में रखता है और जिसका अन्तःकरण शुद्ध और पवित्र है, वह व्यक्ति सम्पूर्ण प्राणियों में परमात्मा को देखता है और अपने आप को भी परमात्मा का ही एक अंश मानता है।
ऐसा व्यक्ति कर्म करता हुआ भी लिप्त नहीं होता है, अर्थात् वह अपने कर्मों से बंधा नहीं होता है। वह अपने कर्मों को परमात्मा की सेवा के रूप में करता है और अपने आप को परमात्मा के साथ जोड़कर रखता है।
अर्थात
जब कोई व्यक्ति अपने मन को अपने वश में रखता है, अपने इंद्रियों को वश में रखता है और अपने अन्तःकरण को शुद्ध और पवित्र रखता है, तो वह निष्काम कर्म की ओर बढ़ता है।
निष्काम कर्म का अर्थ है कि कर्म करने के पीछे कोई व्यक्तिगत लाभ या स्वार्थ नहीं होता है। बल्कि कर्म करने का उद्देश्य परमात्मा की सेवा करना और अपने आप को परमात्मा के साथ जोड़ना होता है।
निष्काम कर्म करने से व्यक्ति को आत्म-संतुष्टि और शांति मिलती है, और वह अपने जीवन को अधिक अर्थपूर्ण और सार्थक बना सकता है।
भगवद गीता अध्याय: 5
श्लोक 8-9
श्लोक:
नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्ववित्।
पश्यञ्श्रृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपंश्वसन्॥
प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि॥
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्॥
भावार्थ:
तत्व को जानने वाला सांख्ययोगी तो देखता हुआ, सुनता हुआ, स्पर्श करता हुआ, सूँघता हुआ, भोजन करता हुआ, गमन करता हुआ, सोता हुआ, श्वास लेता हुआ, बोलता हुआ, त्यागता हुआ, ग्रहण करता हुआ तथा आँखों को खोलता और मूँदता हुआ भी, सब इन्द्रियाँ अपने-अपने अर्थों में बरत रही हैं- इस प्रकार समझकर निःसंदेह ऐसा मानें कि मैं कुछ भी नहीं करता हूँ
॥8-9॥
यहां तो राम राम कहना बनता है
(❤️जैसे यह शरीर आपका मंदिर है इस में आत्मा रूप में आप परमात्मा हो।बुद्धि सरस्वती माता आप हो।आप के साथ चलने वाले आप के नोकर है। और विषयों के अधीन हो जो खाता,पिता,देखता,सुनता,बोलता,स्पर्श करता हूं आप की पूजा है।निद्रा आप की समाधि,चलना फिरना आप की प्रदक्षिणा है मेरे वचन आप की स्तुति है ऐसे आराधना करते हुए कर्म में लीन होना❤️)
भगवद गीता अध्याय: 5
श्लोक 10
श्लोक:
ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः।
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा॥
भावार्थ:
जो पुरुष सब कर्मों को परमात्मा में अर्पण करके और आसक्ति को त्याग कर कर्म करता है, वह पुरुष जल से कमल के पत्ते की भाँति पाप से लिप्त नहीं होता
॥10॥
अब तो भगवान भी ऐसा ही कह रहे है।
भगवद गीता अध्याय: 5
श्लोक 11
श्लोक:
कायेन मनसा बुद्धया केवलैरिन्द्रियैरपि।
योगिनः कर्म कुर्वन्ति संग त्यक्त्वात्मशुद्धये॥
भावार्थ:
कर्मयोगी ममत्वबुद्धिरहित केवल इन्द्रिय, मन, बुद्धि और शरीर द्वारा भी आसक्ति को त्याग कर अन्तःकरण की शुद्धि के लिए कर्म करते हैं
॥11॥
सरल भाव:
कर्मयोगी व्यक्ति अपने कर्मों को बिना किसी मोह या आसक्ति के करता है। वह अपने इंद्रियों, मन, बुद्धि और शरीर का उपयोग करके कर्म करता है, लेकिन वह इन कर्मों से जुड़ा नहीं रहता है।
वह अपने अन्तःकरण की शुद्धि के लिए कर्म करता है, न कि किसी व्यक्तिगत लाभ या स्वार्थ के लिए। इस प्रकार, वह अपने कर्मों को एक साधन के रूप में उपयोग करता है जिससे वह अपने अन्तःकरण को शुद्ध और पवित्र बना सके।
भगवद गीता अध्याय: 5
श्लोक 12
श्लोक:
युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम्।
अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते॥
भावार्थ:
कर्मयोगी कर्मों के फल का त्याग करके भगवत्प्राप्ति रूप शान्ति को प्राप्त होता है और सकामपुरुष कामना की प्रेरणा से फल में आसक्त होकर बँधता है
॥12॥
मैं करता हूं,कर रहा हूं, मैने किया, ऐसी कामना करने वाला बंधता है।
भगवद गीता अध्याय: 5
श्लोक 13
श्लोक:
(ज्ञानयोग का विषय )
सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी।
नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन्॥
भावार्थ:
अन्तःकरण जिसके वश में है, ऐसा सांख्य योग का आचरण करने वाला पुरुष न करता हुआ और न करवाता हुआ ही नवद्वारों वाले शरीर रूप घर में सब कर्मों को मन से त्यागकर आनंदपूर्वक सच्चिदानंदघन परमात्मा के स्वरूप में स्थित रहता है
॥13॥
भगवान ने यंत्र, मंत्र,तंत्र ,योग,भोग,रोग ,पाठ चालीसे, आसन ,माला, कंठी कई प्रकार के कठिन कर्मों से मुक्त होने का सरल सा साधन बता दिया।
भगवद गीता अध्याय: 5
श्लोक 14
श्लोक:
न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः।
न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते।
भावार्थ:
परमेश्वर मनुष्यों के न तो कर्तापन की, न कर्मों की और न कर्मफल के संयोग की रचना करते हैं, किन्तु स्वभाव ही बर्त रहा है
॥14॥
पत्ता भी जब हिलता है प्रभु की मर्जी से उसी के बारे में कह रहे हैं
परमेश्वर मनुष्यों के न तो कर्तापन की, न कर्मों की और न कर्मफल के संयोग की रचना करते हैं, किन्तु स्वभाव ही बर्त रहा है।
इस को समझने को हमे वेदों के नेत्र की आवश्यकता होगी।
गवाह भी तो यही पर भेज रखे हैं भगवान ने।
ज्योतिष को वेदों का नेत्र कहा जाता है और इसकी प्रमाणिकता वेदों और प्राचीन हिंदू ग्रंथों में पाई जाती है।
वेदों में ज्योतिष का उल्लेख:
1. ऋग्वेद (1.164.34) में ज्योतिष को "नेत्र" कहा गया है।
2. यजुर्वेद (23.44) में ज्योतिष को "वेदों का नेत्र" कहा गया है।
3. अथर्ववेद (19.7.1) में ज्योतिष को "ज्योतिषम्" कहा गया है, जिसका अर्थ है "प्रकाश का विज्ञान"।
प्राचीन हिंदू ग्रंथों में ज्योतिष का उल्लेख:
1. महाभारत में ज्योतिष को "ज्योतिष शास्त्र" कहा गया है।
2. मनुस्मृति (1.80) में ज्योतिष को "वेदों का अंग" कहा गया है।
3. ब्रह्मसूत्र (1.1.2) में ज्योतिष को "वेदों का नेत्र" कहा गया है।
ज्योतिष के महत्व को दर्शाने वाले श्लोक:
"ज्योतिषम् वेदों नेत्रम्" (ऋग्वेद 1.164.34)
"वेदों नेत्र ज्योतिषम्" (यजुर्वेद 23.44)
इन प्रमाणों से यह स्पष्ट होता है कि ज्योतिष को वेदों का नेत्र कहा जाता है और इसकी प्रमाणिकता वेदों और प्राचीन हिंदू ग्रंथों में पाई जाती है।
भगवद गीता अध्याय: 5
श्लोक 15
श्लोक:
नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः।
अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः॥
भावार्थ:
सर्वव्यापी परमेश्वर भी न किसी के पाप कर्म को और न किसी के शुभकर्म को ही ग्रहण करता है, किन्तु अज्ञान द्वारा ज्ञान ढँका हुआ है, उसी से सब अज्ञानी मनुष्य मोहित हो रहे हैं
॥15॥
अज्ञान द्वारा ज्ञान ढँका हुआ है
अज्ञानेनावृतं ज्ञानम्'--स्वरूपका ज्ञान सभी मनुष्योंमें स्वतः सिद्ध है; किन्तु अज्ञानके द्वारा यह ज्ञान ढका हुआ है। उस अज्ञानके कारण जीव मूढ़ताको प्राप्त हो रहे हैं। अपनेको कर्मोंका कर्ता मानना मूढ़ता है (गीता 3। 27)।
भगवद गीता अध्याय: 5
श्लोक 16
श्लोक:
ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः।
तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्॥
भावार्थ:
परन्तु जिनका वह अज्ञान परमात्मा के तत्व ज्ञान द्वारा नष्ट कर दिया गया है, उनका वह ज्ञान सूर्य के सदृश उस सच्चिदानन्दघन परमात्मा को प्रकाशित कर देता है
॥16॥
भगवद गीता अध्याय: 5
श्लोक 17
श्लोक:
तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः।
गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः॥
भावार्थ:
जिनका मन तद्रूप हो रहा है, जिनकी बुद्धि तद्रूप हो रही है और सच्चिदानन्दघन परमात्मा में ही जिनकी निरंतर एकीभाव से स्थिति है, ऐसे तत्परायण पुरुष ज्ञान द्वारा पापरहित होकर अपुनरावृत्ति को अर्थात परमगति को प्राप्त होते हैं
॥17॥
भाव तद्रूप
तद्रूप शब्द का प्रयोग किसी वस्तु के ही जैसा होने के स्पष्टीकरण के लिए किया जाता है. उदाहरण के लिए, 'जैसी यह दुर्गा की मूर्ति है उसी के अनुरूप की अन्य मूर्तियां भी बना दें'.
या
समान
सद्दश
वैसा ही
उसी प्रकार का
तदाकार या तदनुरूप
उसी के समान या अनुरूप
भगवद गीता अध्याय 5, श्लोक 18 का भाव यह है:
वे ज्ञानीजन विद्या और विनययुक्त ब्राह्मण में तथा गौ, हाथी, कुत्ते और चाण्डाल में भी समदर्शी होते हैं।
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि:
- ज्ञानीजन सभी जीवों में समानता देखते हैं।
- वे विद्या और विनययुक्त ब्राह्मण में भी और गौ, हाथी, कुत्ते और चाण्डाल में भी समदर्शी होते हैं।
- ज्ञानीजन की दृष्टि में सभी जीव समान होते हैं।
- ज्ञानीजन की दृष्टि में न कोई उच्च होता है और न कोई नीच।
इस श्लोक का विस्तार अध्याय 6, श्लोक 32 में दिया गया है:
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं अधिघमिष्ठो भूतेषु च गतेषु च।
भाव:
जो व्यक्ति मुझे सभी में देखता है और सभी को मुझमें देखता है, वह मुझे हर जगह और हर समय में पाता है, चाहे वह जीवित हो या मृत।
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि:
- जो व्यक्ति भगवान को सभी में देखता है, वह भगवान के साथ एकता को प्राप्त करता है।
- जो व्यक्ति सभी को भगवान में देखता है, वह भगवान की सर्वव्यापकता को समझता है।
- भगवान हर जगह और हर समय में विद्यमान हैं।
भगवद गीता अध्याय: 5
श्लोक 19
श्लोक:
इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः।
निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद् ब्रह्मणि ते स्थिताः॥
भावार्थ:
जिनका मन समभाव में स्थित है, उनके द्वारा इस जीवित अवस्था में ही सम्पूर्ण संसार जीत लिया गया है क्योंकि सच्चिदानन्दघन परमात्मा निर्दोष और सम है, इससे वे सच्चिदानन्दघन परमात्मा में ही स्थित हैं
॥19॥
भगवद गीता अध्याय: 5
श्लोक 20
श्लोक:
न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम्।
स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद् ब्रह्मणि स्थितः॥
भावार्थ:
जो पुरुष प्रिय को प्राप्त होकर हर्षित नहीं हो और अप्रिय को प्राप्त होकर उद्विग्न न हो, वह स्थिरबुद्धि, संशयरहित, ब्रह्मवेत्ता पुरुष सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्मा में एकीभाव से नित्य स्थित है
॥20॥
भगवद गीता अध्याय: 5
श्लोक 21
श्लोक:
बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम्।
स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते॥
भावार्थ:
बाहर के विषयों में आसक्तिरहित अन्तःकरण वाला साधक आत्मा में स्थित जो ध्यानजनित सात्विक आनंद है, उसको प्राप्त होता है, तदनन्तर वह सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्मा के ध्यानरूप योग में अभिन्न भाव से स्थित पुरुष अक्षय आनन्द का अनुभव करता है
॥21॥
भगवद गीता अध्याय: 5
श्लोक 22
श्लोक:
ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते।
आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः॥
भावार्थ:
जो ये इन्द्रिय तथा विषयों के संयोग से उत्पन्न होने वाले सब भोग हैं, यद्यपि विषयी पुरुषों को सुखरूप भासते हैं, तो भी दुःख के ही हेतु हैं और आदि-अन्तवाले अर्थात अनित्य हैं। इसलिए हे अर्जुन! बुद्धिमान विवेकी पुरुष उनमें नहीं रमता
॥22॥
भगवद गीता अध्याय: 5
श्लोक 23
श्लोक:
शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात्।
कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः॥
भावार्थ:
जो साधक इस मनुष्य शरीर में, शरीर का नाश होने से पहले-पहले ही काम-क्रोध से उत्पन्न होने वाले वेग को सहन करने में समर्थ हो जाता है, वही पुरुष योगी है और वही सुखी है
॥23॥
भगवद गीता अध्याय: 5
श्लोक 24
श्लोक:
योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः।
स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति॥
भावार्थ:
जो पुरुष अन्तरात्मा में ही सुखवाला है, आत्मा में ही रमण करने वाला है तथा जो आत्मा में ही ज्ञान वाला है, वह सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्मा के साथ एकीभाव को प्राप्त सांख्य योगी शांत ब्रह्म को प्राप्त होता है
॥24॥
भगवद गीता अध्याय: 5
श्लोक 25
श्लोक:
लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः।
छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः॥
भावार्थ:
जिनके सब पाप नष्ट हो गए हैं, जिनके सब संशय ज्ञान द्वारा निवृत्त हो गए हैं, जो सम्पूर्ण प्राणियों के हित में रत हैं और जिनका जीता हुआ मन निश्चलभाव से परमात्मा में स्थित है, वे ब्रह्मवेत्ता पुरुष शांत ब्रह्म को प्राप्त होते हैं
॥25॥
भगवद गीता अध्याय: 5
श्लोक 26
श्लोक:
कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम्।
अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम्॥
भावार्थ:
काम-क्रोध से रहित, जीते हुए चित्तवाले, परब्रह्म परमात्मा का साक्षात्कार किए हुए ज्ञानी पुरुषों के लिए सब ओर से शांत परब्रह्म परमात्मा ही परिपूर्ण है
॥26॥
भगवद गीता अध्याय: 5
श्लोक 27-28
श्लोक:
( भक्ति सहित ध्यानयोग का वर्णन )
स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः।
प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ॥
यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः।
विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः॥
भावार्थ:
बाहर के विषय-भोगों को न चिन्तन करता हुआ बाहर ही निकालकर और नेत्रों की दृष्टि को भृकुटी के बीच में स्थित करके तथा नासिका में विचरने वाले प्राण और अपानवायु को सम करके, जिसकी इन्द्रियाँ मन और बुद्धि जीती हुई हैं, ऐसा जो मोक्षपरायण मुनि (परमेश्वर के स्वरूप का निरन्तर मनन करने वाला।) इच्छा, भय और क्रोध से रहित हो गया है, वह सदा मुक्त ही है
॥27-28॥
मुक्त जिस के लिए शेष कोई काम ही नहीं रहा।
भगवद गीता अध्याय: 5
श्लोक 29
श्लोक:
भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्।
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति॥
भावार्थ:
मेरा भक्त मुझको सब यज्ञ और तपों का भोगने वाला, सम्पूर्ण लोकों के ईश्वरों का भी ईश्वर तथा सम्पूर्ण भूत-प्राणियों का सुहृद् अर्थात स्वार्थरहित दयालु और प्रेमी, ऐसा तत्व से जानकर शान्ति को प्राप्त होता है
॥29॥
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ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मसंन्यासयोगो नाम पंचमोऽध्यायः
॥5॥
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