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भगवद गीता अध्याय: 3
भगवान् और महापुरुष में भी वो कामना है, क्रोध है, लोभ है। मामूली क्रोध नहीं, यहाँ जितने आप लोग बैठे हैं किसी ने शायद एक भी मर्डर नहीं किया होगा और अर्जुन ने देखो तो करोड़ों मर्डर कर डाले, हनुमान जी ने करोड़ों मर्डर ब्राह्मणों की हत्या कर डाली, लेकिन भगवान् के लोक में गये।
दण्ड मिलने की कौन कहे, पुरस्कार मिला। महापुरुष और भगवान् का कार्य योगमाया से होता है। 'योगमाया' माने भगवान् की एक पर्सनल पॉवर का नाम है। योग रहे अपनी पर्सनैलिटी में और माया का कार्य करे, वो योगमाया है। हम लोगों का काम 'माया' से होता है और भगवान् का काम योगमाया से होता है। और भगवान् और महापुरुष में अन्तर नहीं, इसलिये महापुरुष का कार्य भी योगमाया से होता है। इसलिये दिखाई तो पड़ता है कि मर्डर कर रहा है अर्जुन लेकिन उसने सर्वत्र श्यामसुन्दर को देखा। मर्डर करने की कौन कहे। और कुछ देखा ही नहीं। हनुमान जी ने सर्वत्र राम को देखा और कुछ देखा ही नहीं, मर्डर करते रहे लेकिन कुछ देखा नहीं और। अरे ! बड़ा आश्चर्य है। हाँ ऽऽ ! योगमाया का मतलब ही है जो बुद्धि से परे वर्क करे। काम नहीं है, काम का वर्क करे, क्रोध नहीं है, क्रोध का वर्क करे, लोभ नहीं है लोभ का वर्क करे। और तीस करोड़ सड़सठ लाख बीस हजार वर्ष तक प्रह्लाद ने राज्य किया। भगवत्प्राप्ति करने के बाद। ब्याह किया, बच्चे हुए। हम लोग भी थे उस समय। हम लोगों को बताया होगा किसी ने कि ये प्रह्लाद को भगवत्प्राप्ति हो चुकी है। हूँऽ ? ये करोड़ों वर्ष से राज्य कर रहे हैं इनका पेट नहीं भरा, वैराग्य नहीं हुआ। हैं! क्या ? भगवत्प्राप्ति हुई ! उस समय हम लोगों ने यह कह दिया।
लेकिन वो नित्य विरक्त हैं। नित्य विरक्त। और काम सब कर रहे हैं, बड़े-बड़े काम, युद्ध वगैरह। मर्डर कितने सारे होते हैं युद्ध में, सब कुछ कर रहे हैं, लेकिन माया से परे हैं, आनन्दमय हैं।
क्रोध से भ्रम पैदा होता है. भ्रम से बुद्धि व्यग्र होती है. जब बुद्धि व्यग्र होती है तब तर्क नष्ट हो जाता है. जब तर्क नष्ट नहीं होता है तब व्यक्ति का पतन होता ही जाता है।
मन की गतिविधियों, होश, श्वास, और भावनाओं के माध्यम से भगवान ओर उन की शक्ति सदा तुम्हारे साथ है; और लगातार तुम्हे बस एक साधन की तरह प्रयोग कर के सभी कार्य कर रही है। अध्याय 3 में प्रवेश
भगवद गीता अध्याय: 3
श्लोक 1
श्लोक:
(ज्ञानयोग और कर्मयोग के अनुसार अनासक्त भाव से नियत कर्म करने की श्रेष्ठता का निरूपण) अर्जुन उवाच ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन।
तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव॥
भावार्थ:
अर्जुन बोले- हे जनार्दन! यदि आपको कर्म की अपेक्षा ज्ञान श्रेष्ठ मान्य है तो फिर हे केशव! मुझे भयंकर कर्म में क्यों लगाते हैं?
॥1॥
भगवद गीता अध्याय: 3
श्लोक 2
श्लोक:
व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे।
तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम्॥
भावार्थ:
आप मिले हुए-से वचनों से मेरी बुद्धि को मानो मोहित कर रहे हैं। इसलिए उस एक बात को निश्चित करके कहिए जिससे मैं कल्याण को प्राप्त हो जाऊँ
॥2॥॥
तब भगवान श्री कृष्ण कहते है।
भगवद गीता अध्याय: 3
श्लोक 3
श्लोक:
श्रीभगवानुवाच लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ।
ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्॥
भावार्थ:
श्रीभगवान बोले- हे निष्पाप! इस लोक में दो प्रकार की निष्ठा (साधन की परिपक्व अवस्था अर्थात पराकाष्ठा का नाम 'निष्ठा' है।) मेरे द्वारा पहले कही गई है। उनमें से सांख्य योगियों की निष्ठा तो ज्ञान योग से (माया से उत्पन्न हुए सम्पूर्ण गुण ही गुणों में बरतते हैं, ऐसे समझकर तथा मन, इन्द्रिय और शरीर द्वारा होने वाली सम्पूर्ण क्रियाओं में कर्तापन के अभिमान से रहित होकर सर्वव्यापी सच्चिदानंदघन परमात्मा में एकीभाव से स्थित रहने का नाम 'ज्ञान योग' है, इसी को 'संन्यास', 'सांख्ययोग' आदि नामों से कहा गया है।) और योगियों की निष्ठा कर्मयोग से (फल और आसक्ति को त्यागकर भगवदाज्ञानुसार केवल भगवदर्थ समत्व बुद्धि से कर्म करने का नाम 'निष्काम कर्मयोग' है, इसी को 'समत्वयोग', 'बुद्धियोग', 'कर्मयोग', 'तदर्थकर्म', 'मदर्थकर्म', 'मत्कर्म' आदि नामों से कहा गया है।) होती है
॥3॥
निष्ठा:.अवस्था, दशा।दृढ़ निश्चय, निश्वास से है।
सांख्य योग:सांख्य योग, भगवद् गीता से लिया गया एक हिंदू दार्शनिक शब्द है. इसका मतलब है, ज्ञान, आत्म-साक्षात्कार, और वास्तविकता की प्रकृति को समझने का मार्ग.जो आत्म साक्षात्कार से प्राप्त होता है।ना कि वॉट्सएप यूनिवर्सिटी जिस के ज्ञान से आत्म साक्षात्कार ज्ञान भी नष्ट हो जाता है।।
सारांश में: इस अध्याय की शुरुआत इस विचार से होती है कि आम व्यक्ति और ईश्वर में भले ही कुछ क्रियाएं समान प्रतीत हों, परंतु वे असल में योगमाया से किए गए कार्य होते हैं। जैसे अर्जुन की शंका के समाधान में श्रीकृष्ण कर्म और ज्ञान योग के बीच संतुलन बनाते हैं और यही संदेश देते हैं कि संसार में रहते हुए हमें भगवान के प्रति अर्पित कर्म करना चाहिए, ताकि हमारे कर्म भी योगमाया के अंतर्गत रह ते हे।
यह भूमिका अध्याय 3 के विचारों को जीवंत रूप से उद्घाटित करती है और अध्याय को सरल तरीके से समझाती है बिना कोई मूल भाव के साथ छेड़ छाड़ किए
कर्म: तत्त्वज्ञानी पुरुषोंने संचित, वर्तमान और प्रारब्धके भेदसे कर्मकी तीन गतियाँ बतलायी हैं। अनेक जन्मों से संचय किये हुए 'पुराने कर्म को 'संचित' कर्म कहते हैं। फिर कर्म भी तीन प्रकारके होते हैं- सात्त्विक, राजस और तामस।
भगवद गीता अध्याय: 3
श्लोक 4
श्लोक:
न कर्मणामनारंभान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते।
न च सन्न्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति॥
भावार्थ:
मनुष्य न तो कर्मों का आरंभ किए बिना निष्कर्मता (जिस अवस्था को प्राप्त हुए पुरुष के कर्म अकर्म हो जाते हैं अर्थात फल उत्पन्न नहीं कर सकते, उस अवस्था का नाम 'निष्कर्मता' है।) को यानी योगनिष्ठा को प्राप्त होता है और न कर्मों के केवल त्यागमात्र से सिद्धि यानी सांख्यनिष्ठा को ही प्राप्त होता है
॥4॥
योग निष्ठा: कर्म और ज्ञान इन्हीं दो निष्ठाओं के अंतर्गत है।
सांख्यनिष्ठा:गीता में तीसरे अध्याय के अट्ठाईसवें और पांचवें अध्याय के आठवें, नवें और तेरहवें श्लोकों में सांख्यनिष्ठा की दृष्टि से कर्म करने की बात कही गई है. इसको देख कर फिर दुबार
(🔴तीसरे अध्याय का पाँच वाँ श्लोक देखे गे🔴)
भगवद गीता अध्याय: 3
श्लोक 28
श्लोक:
तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः।
गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते॥
भावार्थ:
परन्तु हे महाबाहो! गुण विभाग और कर्म विभाग (त्रिगुणात्मक माया के कार्यरूप पाँच महाभूत और मन, बुद्धि, अहंकार तथा पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ और शब्दादि पाँच विषय- इन सबके समुदाय का नाम 'गुण विभाग' है और इनकी परस्पर की चेष्टाओं का नाम 'कर्म विभाग' है।) के तत्व (उपर्युक्त 'गुण विभाग' और 'कर्म विभाग' से आत्मा को पृथक अर्थात् निर्लेप जानना ही इनका तत्व जानना है।) को जानने वाला ज्ञान योगी सम्पूर्ण गुण ही गुणों में बरत रहे हैं, ऐसा समझकर उनमें आसक्त नहीं होता।
॥28॥
अब अध्याय 5का 8नंबर का श्लोक देखते हैं
भगवद गीता अध्याय: 5
श्लोक 8-9
श्लोक:
नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्ववित्।
पश्यञ्श्रृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपंश्वसन्॥
प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि॥
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्॥
भावार्थ:
तत्व को जानने वाला सांख्ययोगी तो देखता हुआ, सुनता हुआ, स्पर्श करता हुआ, सूँघता हुआ, भोजन करता हुआ, गमन करता हुआ, सोता हुआ, श्वास लेता हुआ, बोलता हुआ, त्यागता हुआ, ग्रहण करता हुआ तथा आँखों को खोलता और मूँदता हुआ भी, सब इन्द्रियाँ अपने-अपने अर्थों में बरत रही हैं- इस प्रकार समझकर निःसंदेह ऐसा मानें कि मैं कुछ भी नहीं करता हूँ
॥8-9॥
(एक सांस आए एक जाए प्रभु चिंतन राम राम चलता ही रहे)
अब तेरहवें श्लोक को भी देखते है।
भगवद गीता अध्याय: 5
श्लोक 13
श्लोक:
(ज्ञानयोग का विषय )
सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी।
नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन्॥
भावार्थ:
अन्तःकरण जिसके वश में है, ऐसा सांख्य योग का आचरण करने वाला पुरुष न करता हुआ और न करवाता हुआ ही नवद्वारों वाले शरीर रूप घर में सब कर्मों को मन से त्यागकर आनंदपूर्वक सच्चिदानंदघन परमात्मा के स्वरूप में स्थित रहता है
॥13॥
चलिए अब छूटे हुए तीसरे अध्याय का पाँच वाँ श्लोक देखे गे।
भगवद गीता अध्याय: 3
श्लोक 5
श्लोक:
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः॥
भावार्थ:
निःसंदेह कोई भी मनुष्य किसी भी काल में क्षणमात्र भी बिना कर्म किए नहीं रहता क्योंकि सारा मनुष्य समुदाय प्रकृति जनित गुणों द्वारा परवश हुआ कर्म करने के लिए बाध्य किया जाता है
॥5॥
खुद को ओर समाज के साथ धोखे का वर्णन सरलता पूर्वक भगवान ने कर दिया है देखे।
भगवद गीता अध्याय: 3
श्लोक 6
श्लोक:
कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्।
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते॥
भावार्थ:
जो मूढ़ बुद्धि मनुष्य समस्त इन्द्रियों को हठपूर्वक ऊपर से रोककर मन से उन इन्द्रियों के विषयों का चिन्तन करता रहता है, वह मिथ्याचारी अर्थात दम्भी कहा जाता है
॥6॥
इसे पाखंड से भी जोड़ कर आगे देखने को मिले गा।
भगवद गीता अध्याय: 3
श्लोक 7
श्लोक:
यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन।
कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते॥
भावार्थ:
किन्तु हे अर्जुन! जो पुरुष मन से इन्द्रियों को वश में करके अनासक्त हुआ समस्त इन्द्रियों द्वारा कर्मयोग का आचरण करता है, वही श्रेष्ठ है
॥7॥॥
भगवद गीता अध्याय: 3
श्लोक 8
श्लोक:
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्धयेदकर्मणः॥
भावार्थ:
तू शास्त्रविहित कर्तव्यकर्म कर क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है तथा कर्म न करने से तेरा शरीर-निर्वाह भी नहीं सिद्ध होगा
॥8॥
शास्त्रविहित: का मतलब है, जो शास्त्रों में कथित या अनुमोदित हो. शास्त्रों में मुख्य रूप से दो तरह के कर्मों का वर्णन किया गया है: विहित कर्म, निषिद्ध कर्म.
जिन कर्मों को करने के लिए शास्त्रों में उपदेश दिया गया है, उन्हें विहित कर्म कहते हैं. वहीं, जिन कर्मों को करने के लिए शास्त्रों में मनाही की गई है, उन्हें निषिद्ध कर्म कहते हैं.
शास्त्रों के मुताबिक, कर्मों का फल उसी को भोगना पड़ता है, दूसरा व्यक्ति उसे नहीं भोग सकता. इसलिए, हर कर्म को दूसरों के हित का भाव रखते हुए बड़ी सावधानी से करना चाहिए.
(यह मूल भाव है पर इसको वाट्सअप यूनिवर्सिटी वाले कहकर गुमराह कर सकते है हर कर्म दूसरे के हित को ध्यान में रखना है तो भाईचार का ध्यान क्यों नहीं रखते हिंदू मुस्लिम क्यों करते हो आदि आदि पर सब का साथ सब के विकास को नहीं समझ सकते। तो यहां व्यवहारिक कर्म उत्पन हो के कहता है "जैसे को तैसा")
महाभारत: के अपने भाईचारे का युद्ध होने का प्रमुख कारण जर,जोरू,जमीन बना अब भी वही जर,जोरू,जमीन, ही क्या कारण नहीं बन सकता अगर आपसी भाई बंधु महाभारत कर सकते है तो ऐसे दूसरे धर्मो के साथ "धर्म युद्ध क्यों नहीं हो सकता विचारणीय विषय आप को नहीं लगता क्या?
इसी लिए भगवान भी कहते है उठ युद्ध कर। ज्ञान से अपना कर्म कर।
भगवद गीता अध्याय: 3
श्लोक 9
श्लोक:
( यज्ञादि कर्मों की आवश्यकता का निरूपण ) यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबंधनः।
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसंगः समाचर॥
भावार्थ:
यज्ञ के निमित्त किए जाने वाले कर्मों से अतिरिक्त दूसरे कर्मों में लगा हुआ ही यह मुनष्य समुदाय कर्मों से बँधता है। इसलिए हे अर्जुन! तू आसक्ति से रहित होकर उस यज्ञ के निमित्त ही भलीभाँति कर्तव्य कर्म कर।
इस भाव के अर्थ के साथ भी बिना छेड़ छाड़ किए ऐसे भी समझ सकते है।
सरल भाषा में यह कहा जा सकता है:
"लोग धर्मयज्ञ के अलावा अन्य कामों में लगकर कर्मों से बंध जाते हैं। इसलिए, हे अर्जुन! तू धर्म यज्ञ के लिए ही अपने कर्तव्य कर्मों को कर, और इसमें आसक्ति नहीं रख।"
इसका भाव यह है:
लोग अपने कर्मों से बंध जाते हैं यदि वे धर्मयज्ञ के अलावा अन्य कामों में लगते हैं तो।
धर्म यज्ञ के लिए किए जाने वाले कर्म ही सही कर्म हैं।
इन कर्मों को आसक्ति से नहीं, बल्कि कर्तव्य की भावना से करना चाहिए।
॥9॥
भगवद गीता अध्याय: 3
श्लोक 10
श्लोक:
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्टा पुरोवाचप्रजापतिः।
अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक्॥
भावार्थ:
प्रजापति ब्रह्मा ने कल्प के आदि में यज्ञ सहित प्रजाओं को रचकर उनसे कहा कि तुम लोग इस यज्ञ द्वारा वृद्धि को प्राप्त होओ और यह यज्ञ तुम लोगों को इच्छित भोग प्रदान करने वाला हो
॥10॥
भगवद गीता अध्याय: 3
श्लोक 11
श्लोक:
देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः।
परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ॥
भावार्थ:
तुम लोग इस यज्ञ द्वारा देवताओं को उन्नत करो और वे देवता तुम लोगों को उन्नत करें। इस प्रकार निःस्वार्थ भाव से एक-दूसरे को उन्नत करते हुए तुम लोग परम कल्याण को प्राप्त हो जाओगे
॥11॥
भगवद गीता अध्याय: 3
श्लोक 11
श्लोक:
देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः।
परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ॥
भावार्थ:
तुम लोग इस यज्ञ द्वारा देवताओं को उन्नत करो और वे देवता तुम लोगों को उन्नत करें। इस प्रकार निःस्वार्थ भाव से एक-दूसरे को उन्नत करते हुए तुम लोग परम कल्याण को प्राप्त हो जाओगे
॥11॥
इस बात को दशानंद बखूबी जानता था कि यदि तुम लोग इस यज्ञ द्वारा देवताओं को उन्नत करो गे तो देवताओं की शक्ति बड़े गी जो स्वर्ग में रह कर भी तुम्हारा अनिष्ट नहीं होने देगे।
इस लिए उसने यज्ञों को दूषित करने का कार्य किया ताकि आप द्वार किए यज्ञ द्वारा दी सामग्री उन तक ना पहुंचे रणनीति के अनुसार रसद पहुंचाने की लाइन ही काटनी शुरू करदी।
📚अन्य सनातनी पवित्र पुस्तकों में
तासामत्रास्ति का हानिर्यया कुप्यन्ति देवताः।। पाराशर्योऽथ ममः यत्पृष्ठं श्रृणु वत्स तत् ।।8।।
उनकी इसमें क्या हानि है, जो वे देवता क्रोध करते हैं। यह सुनकर व्यासजी मुझसे बोले हे वत्स ! तू अपने प्रश्न का उत्तर सुन।।8।।
नित्याग्निहोत्रिनो विप्राः सन्ति ये गृहमेधिनः।। त एव सर्वफलदाः सुराणां कामधेनवः ॥य॥
जो ब्राह्मण नित्य अग्निहोत्र (यज्ञ आदि) करते और गृहस्थाश्रममें रहते हैं वही सब फलों के देनेहारे देवताओं के लिए कामधेनु 9॥ के समान है।।
भक्ष्यं भोज्यं च पेयं च यद्यदिष्टं पर्यवेक्षकम्।। अग्नौ हुतेन हविषा तत्सर्वं लभते दिवि॥ 10॥
भक्ष्य, भोज्य, पान करने योग्य, जो कुछ पर्वोंमें यज्ञ किया गया है, सो हविद्वारा अग्निमें आहुती दी गई है, वह सब स्वर्ग में मिलती है॥10॥
नान्यदस्ति सुरेशानामिष्टसिद्धिप्रदं दिधि ॥ दोग्धि धेनुर्यथा नीता दुःखदा गृहमेधिनाम् ॥11॥
देवताओंको स्वर्गमें इष्टसिद्धि देनेवाला और कुछ नहीं है जैसे गृहस्थी पुरुषों को दुही गई गाय को कोई ले जाए तो उससे उसे केवल दुःखही होता है॥
तथैवं ज्ञानवान्विप्रो देवाना दुःखदो भवेत् ॥ विदशास्तेन विघ्नति प्रविस्ता विषयं नृणाम् ॥12॥
इसी प्रकार जो ज्ञानवान् ब्राह्मण(यज्ञ , होम और भोग भी नहीं देता)
जगतको दुःखदाता ही है क्योंकि वह कर्म नहीं करता है इस कारण इसके विषय में भार्या पत्नी, पुत्रादि में प्रवेश करने के देवता भी विघ्न पैदा करते हैं।॥12॥
(और हम क्या सोचते है 😀?देवता का प्रवेश हो ही गया है। जिन्हें ने कभी अपने घर जो एक मंदिर ही है में कभी झाड़ू पूछा नहीं लगाया यहां वह सब कुछ करने को लाइन में खड़े नजर आएं गे दरियाँ बिछाएंगे और हमारे घर के बाहरी अन्य काम भी करें गे यह इसे वरदान समझ लेते है)
ततो न जायते भक्तिः शिवे कस्यापि देहिनः।। तस्मादविदुषां नैव जायते शूलपाणिनः ॥13॥ इससे किसी भी प्रकार की देहधारी शिव में भक्ति नहीं होती, इस कारण मुरखो को शिव का प्रसाद नहीं मिलता।॥ 13॥
कायौ कि ज्यादातर लोग काम में फंस जाते हैं।
यथाकथनचिज्जतापि मध्ये विच्छिद्यते नृणाम् ॥ जातं वापि शिवज्ञानं न विश्वासं भजत्यलम् ॥14॥
यथा कथा और जो यथा कथा जानता है वह किसी कारण मध्यमें ही खंडित हो जाता है और जिसे भी ज्ञान हुआ तो वह विश्वास नहीं कर पाता।।14।।
यद्येवं देवता विघ्नमाचरन्ति तनुभृतम्।।
पौरुषं तत्र करस्यास्ति येन मुक्तिर्भविष्यति ॥15॥
ऋषि बोले जब इस प्रकार से देवता शरीरधारियों को विघ्न करते हैं तं फिर इसमें किसका पराक्रम है जो मुक्तिको प्राप्त हो सके॥ 15॥
अब आप ही सत्य कहिये कि, इनका उपाय है या नहीं है।।
इसका उपाय भी गीता जी में ही आगे चल कर मिलने वाला है।
तब तक इस पर भी विचार करले कि
यंत्र, मंत्र, तंत्र, सिद्धि , पाठ , धागा, ताबीज, जप, तप, रतन, नग धारण करने जैसे सभी कर्म जिनको मनुष्य अपने भले का साधन समझ कर करने लगता है। उसे कोई यज्ञ की उपाधि या उसका विकल्प कह नहीं सकते।
हम अपने शास्त्रों में नजर डाले जब जब कोई कठोर तप किसी ने किया तो इंद्र देव का सिंहासन डोलने लगता है तब उस व्यक्ति पर इंद्र द्वार वज्र प्रहार किए जाने लगते है।जो हमारे लिए शुभ संकेत नहीं कहे जाते। चलो इसको छोड़ आगे बढ़ते है।नहीं तो गीता जी का भाव ही बिगड़ जाए गा।
भगवद गीता अध्याय: 3
श्लोक 12
श्लोक:
इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः।
तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुंक्ते स्तेन एव सः॥
भावार्थ:
यज्ञ द्वारा बढ़ाए हुए देवता तुम लोगों को बिना माँगे ही इच्छित भोग निश्चय ही देते रहेंगे। इस प्रकार उन देवताओं द्वारा दिए हुए भोगों को जो पुरुष उनको बिना दिए स्वयं भोगता है, वह चोर ही है
॥12॥
(जो अपना ही कमाता ओर खुद ही खाता है उसको तो भगवान ने चोर बता दिया)
भगवद गीता अध्याय: 3
श्लोक 13
श्लोक:
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः।
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्॥
भावार्थ:
यज्ञ से बचे हुए अन्न को खाने वाले श्रेष्ठ पुरुष सब पापों से मुक्त हो जाते हैं और जो पापी लोग अपना शरीर-पोषण करने के लिए ही अन्न पकाते हैं, वे तो पाप को ही खाते हैं
॥13॥
(आज कल एक स्लोगन वाट्सअप ब्यूनिवर्सिटी द्वार वायरल किया गया है "उतना लो थाली में जो ना जाए नाली में")
जो हमें हर घर के जीव की रोटियां भी गिन कर बनवाने लग गया है ऐसा हमारी बहु बेटियां अक्सर पूछती देखी गई है आप की कितनी रोटी बनाऊं 😀
अपना कमाना अपना खाना तो गली की गो , कुत्ते की भी नहीं सोचते कि उसने कुछ खाया या नहीं!अपना पकाओ अपना खाओ।
गीता में ही आगे चल कर दान का भी चेप्टर खुले गा जिस में कच्चा अन या पके अन के दान पर भी चर्चा हो सकती है अभी हम श्री कृष्ण के अगले आदेश को देखे।
भगवद गीता अध्याय: 3
श्लोक 14-15
श्लोक:
अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः।
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः॥
कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्।
तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्॥
भावार्थ:
सम्पूर्ण प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं, अन्न की उत्पत्ति वृष्टि से होती है, वृष्टि यज्ञ से होती है और यज्ञ विहित कर्मों से उत्पन्न होने वाला है। कर्मसमुदाय को तू वेद से उत्पन्न और वेद को अविनाशी परमात्मा से उत्पन्न हुआ जान। इससे सिद्ध होता है कि सर्वव्यापी परम अक्षर परमात्मा सदा ही यज्ञ में प्रतिष्ठित है
॥14-15॥
भगवद गीता अध्याय: 3
श्लोक 16
श्लोक:
एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः।
अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति॥
भावार्थ:
हे पार्थ! जो पुरुष इस लोक में इस प्रकार परम्परा से प्रचलित सृष्टिचक्र के अनुकूल नहीं बरतता अर्थात अपने कर्तव्य का पालन नहीं करता, वह इन्द्रियों द्वारा भोगों में रमण करने वाला पापायु पुरुष व्यर्थ ही जीता है
॥16॥
भगवद गीता अध्याय: 3
श्लोक 17
श्लोक:
( ज्ञानवान और भगवान के लिए भी लोकसंग्रहार्थ कर्मों की आवश्यकता ) यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः।
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते॥
भावार्थ:
परन्तु जो मनुष्य आत्मा में ही रमण करने वाला और आत्मा में ही तृप्त तथा आत्मा में ही सन्तुष्ट हो, उसके लिए कोई कर्तव्य नहीं है
॥17॥
यहां ध्यान दे आपको अपनी आत्मा के लिए नहीं कहा गया!
भगवद गीता अध्याय: 3
श्लोक 18
श्लोक:
संजय उवाच: नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन।
न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः॥
भावार्थ:
उस महापुरुष का इस विश्व में न तो कर्म करने से कोई प्रयोजन रहता है और न कर्मों के न करने से ही कोई प्रयोजन रहता है तथा सम्पूर्ण प्राणियों में भी इसका किञ्चिन्मात्र भी स्वार्थ का संबंध नहीं रहता
॥18॥
भगवद गीता अध्याय: 3
श्लोक 19
श्लोक:
तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर।
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पुरुषः॥
भावार्थ:
इसलिए तू निरन्तर आसक्ति से रहित होकर सदा कर्तव्यकर्म को भलीभाँति करता रह क्योंकि आसक्ति से रहित होकर कर्म करता हुआ मनुष्य परमात्मा को प्राप्त हो जाता है
॥19॥
(इस से भी सरल सुगम मार्ग भी गीता के आगे आनेवाले चेप्टर में मिल सके गा)
भगवद गीता अध्याय: 3
श्लोक 20
श्लोक:
कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः।
लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि॥
भावार्थ:
जनकादि ज्ञानीजन भी आसक्ति रहित कर्मद्वारा ही परम सिद्धि को प्राप्त हुए थे, इसलिए तथा लोकसंग्रह को देखते हुए भी तू कर्म करने के ही योग्य है अर्थात तुझे कर्म करना ही उचित है
॥20॥
भगवद गीता अध्याय: 3
श्लोक 21
श्लोक:
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥
भावार्थ:
श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, अन्य पुरुष भी वैसा-वैसा ही आचरण करते हैं। वह जो कुछ प्रमाण कर देता है, समस्त मनुष्य-समुदाय उसी के अनुसार बरतने लग जाता है (यहाँ क्रिया में एकवचन है, परन्तु 'लोक' शब्द समुदायवाचक होने से भाषा में बहुवचन की क्रिया लिखी गई है।)
॥21॥
(भगवद गीता अध्याय 3, श्लोक 21 का सरल भाव यह है:
"जो व्यक्ति अपने कर्तव्य को जानता है और उसे करता है, वह दूसरों को भी प्रेरित करता है। इसलिए, हे अर्जुन! तू अपने कर्तव्य को जानकर उसे कर, ताकि दूसरे भी तेरा अनुसरण करें।"
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि:
अपने कर्तव्य को जानना और उसे करना महत्वपूर्ण है।
दूसरों को प्रेरित करने के लिए अपना उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए।
अपने कर्तव्य को करने से दूसरे भी प्रेरित होते हैं और सही मार्ग पर चलते हैं।
भगवद गीता अध्याय: 3
श्लोक 22
श्लोक:
न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन।
नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि॥
भावार्थ:
हे अर्जुन! मुझे इन तीनों लोकों में न तो कुछ कर्तव्य है और न कोई भी प्राप्त करने योग्य वस्तु अप्राप्त है, तो भी मैं कर्म में ही बरतता हूँ
॥22॥
भगवद गीता अध्याय: 3
श्लोक 23
श्लोक:
यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥
भावार्थ:
क्योंकि हे पार्थ! यदि कदाचित् मैं सावधान होकर कर्मों में न बरतूँ तो बड़ी हानि हो जाए क्योंकि मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं
॥23॥
भगवद गीता अध्याय: 3
श्लोक 24
श्लोक:
यदि उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम्।
संकरस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः॥
भावार्थ:
इसलिए यदि मैं कर्म न करूँ तो ये सब मनुष्य नष्ट-भ्रष्ट हो जाएँ और मैं संकरता का करने वाला होऊँ तथा इस समस्त प्रजा को नष्ट करने वाला बनूँ
॥24॥
*जब पत्ता भी नहीं हिलता बिना प्रभु की मर्जी के तो बन्दा गुनहगार क्यों?*
समझ में आने लगा हमारे ही कर्मों का योगदान है।
भगवद गीता अध्याय: 3
श्लोक 25
श्लोक:
( अज्ञानी और ज्ञानवान के लक्षण तथा राग-द्वेष से रहित होकर कर्म करने के लिए प्रेरणा ) सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत।
कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम्॥
भावार्थ:
हे भारत! कर्म में आसक्त हुए अज्ञानीजन जिस प्रकार कर्म करते हैं, आसक्तिरहित विद्वान भी लोकसंग्रह करना चाहता हुआ उसी प्रकार कर्म करे
॥25॥
भगवद गीता अध्याय: 3
श्लोक 26
श्लोक:
न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङि्गनाम्।
जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन्॥
भावार्थ:
परमात्मा के स्वरूप में अटल स्थित हुए ज्ञानी पुरुष को चाहिए कि वह शास्त्रविहित कर्मों में आसक्ति वाले अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम अर्थात कर्मों में अश्रद्धा उत्पन्न न करे, किन्तु स्वयं शास्त्रविहित समस्त कर्म भलीभाँति करता हुआ उनसे भी वैसे ही करवाए
॥26॥
भगवद गीता अध्याय: 3
श्लोक 27
श्लोक:
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।
अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते॥
भावार्थ:
- वास्तव में सम्पूर्ण कर्म सब प्रकार से प्रकृति के गुणों द्वारा किए जाते हैं, तो भी जिसका अन्तःकरण अहंकार से मोहित हो रहा है, ऐसा अज्ञानी 'मैं कर्ता हूँ' ऐसा मानता है
॥27॥
भगवद गीता अध्याय: 3
श्लोक 28
श्लोक:
तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः।
गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते॥
भावार्थ:
परन्तु हे महाबाहो! गुण विभाग और कर्म विभाग (त्रिगुणात्मक माया के कार्यरूप पाँच महाभूत और मन, बुद्धि, अहंकार तथा पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ और शब्दादि पाँच विषय- इन सबके समुदाय का नाम 'गुण विभाग' है और इनकी परस्पर की चेष्टाओं का नाम 'कर्म विभाग' है।) के तत्व (उपर्युक्त 'गुण विभाग' और 'कर्म विभाग' से आत्मा को पृथक अर्थात् निर्लेप जानना ही इनका तत्व जानना है।) को जानने वाला ज्ञान योगी सम्पूर्ण गुण ही गुणों में बरत रहे हैं, ऐसा समझकर उनमें आसक्त नहीं होता।
॥28॥
भगवद गीता अध्याय: 3
श्लोक 29
श्लोक:
प्रकृतेर्गुणसम्मूढ़ाः सज्जन्ते गुणकर्मसु।
तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत्॥
भावार्थ:
प्रकृति के गुणों से अत्यन्त मोहित हुए मनुष्य गुणों में और कर्मों में आसक्त रहते हैं, उन पूर्णतया न समझने वाले मन्दबुद्धि अज्ञानियों को पूर्णतया जानने वाला ज्ञानी विचलित न करे
॥29॥
उनके अनुकूल ही कार्य करे। तभी तो यह गुरु समुदाय शिष्यों को राम राम जपते रहो कह अपने चेले के पति किए जाने कर्म से खुद को मुक्त कर लेते है।
अर्थात पिंड छुड़ा लेते है।पर चेला एबीसी एबीसी ही रटता रहता है उस से आगे बढ़ ही नहीं पाता राम राम जपो यह तो हम बचपन से ही जानते आरहे हैं। हम में और गीता के अर्जुन में यही अंतर है गीता का अर्जुन सवाल पर सवाल करता है।अगर हम कोई प्रश्न करें तो टोक दिए जाते है।तो आगे कैसे बढ़े यह प्रश्न तो है ही। और रहेगा भी।
भगवद गीता अध्याय: 3
श्लोक 30
श्लोक:
मयि सर्वाणि कर्माणि सन्नयस्याध्यात्मचेतसा।
निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः॥
भावार्थ:
मुझ अन्तर्यामी परमात्मा में लगे हुए चित्त द्वारा सम्पूर्ण कर्मों को मुझमें अर्पण करके आशारहित, ममतारहित और सन्तापरहित होकर युद्ध कर
॥30॥
भगवद गीता अध्याय: 3
श्लोक 31
श्लोक:
ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः।
श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽति कर्मभिः॥
भावार्थ:
जो कोई मनुष्य दोषदृष्टि से रहित और श्रद्धायुक्त होकर मेरे इस मत का सदा अनुसरण करते हैं, वे भी सम्पूर्ण कर्मों से छूट जाते हैं
॥31॥
भगवद गीता अध्याय: 3
श्लोक 32
श्लोक:
ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम्।
सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः॥
भावार्थ:
परन्तु जो मनुष्य मुझमें दोषारोपण करते हुए मेरे इस मत के अनुसार नहीं चलते हैं, उन मूर्खों को तू सम्पूर्ण ज्ञानों में मोहित और नष्ट हुए ही समझ
॥32॥
(यह भगवान की धमकी ही मान कर अभी से गीता पड़ो उसे समझते हुए आगे बढ़ो गीता के चिंतन में आप हर बार कुछ नया ही संदेश पाएंगे जब तक आप का ज्ञान स्थिर एक जगह रुक नहीं जाता क्यो कि जीवन के उतार चढ़ाव में गीता नित्य गीता के भावों में परिवर्तन आकर अगले ज्ञान के दर्शन करवाए गी यह मेरा निजी अनुभव है इस लिए गीता पड़ो आगे बढ़ो
भगवान भी वही बता रहे है)
भगवद गीता अध्याय: 3
श्लोक 33
श्लोक:
सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि।
प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति॥
भावार्थ:
सभी प्राणी प्रकृति को प्राप्त होते हैं अर्थात अपने स्वभाव के परवश हुए कर्म करते हैं। ज्ञानवान् भी अपनी प्रकृति के अनुसार चेष्टा करता है। फिर इसमें किसी का हठ क्या करेगा
॥33॥
भगवद गीता अध्याय: 3
श्लोक 34
श्लोक:
इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ।
तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ॥
भावार्थ:
इन्द्रिय-इन्द्रिय के अर्थ में अर्थात प्रत्येक इन्द्रिय के विषय में राग और द्वेष छिपे हुए स्थित हैं। मनुष्य को उन दोनों के वश में नहीं होना चाहिए क्योंकि वे दोनों ही इसके कल्याण मार्ग में विघ्न करने वाले महान् शत्रु हैं
॥34॥
भगवद गीता अध्याय: 3
श्लोक 35
श्लोक:
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥
भावार्थ:
अच्छी प्रकार आचरण में लाए हुए दूसरे के धर्म से गुण रहित भी अपना धर्म अति उत्तम है। अपने धर्म में तो मरना भी कल्याणकारक है और दूसरे का धर्म भय को देने वाला है
॥35॥
❤️जिस धर्म में आपको भगवान ने जन्म दिया उसी में रहो उसी के बने रहे तभी ज्ञान की प्रगति हो गी अगर आप को अपने सनातन धर्म से कोई दूसरा धर्म अच्छा लगता है तो उस धर्म में जाकर स्थापित होने की जगह उसमें जन्म क्यों नहीं ले लेते वो इंसान ही क्या जो कठिन से कठिन काम ना कर सके!तुम में शक्ति है पहाड़ का सीना चीरने की हवा, अग्नि, पानी के वेग को बदलने की तो दूसरे मन पसंद धर्म में स्थापित क्यों होते हो सीधे वही जन्म क्यों नहीं ले लेते।जानने को अगले श्लोक पर चलते है❤️
भगवद गीता अध्याय: 3
श्लोक 36
श्लोक:
( काम के निरोध का विषय ) अर्जुन उवाचः अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पुरुषः।
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः॥
भावार्थ:
अर्जुन बोले- हे कृष्ण! तो फिर यह मनुष्य स्वयं न चाहता हुआ भी बलात् लगाए हुए की भाँति किससे प्रेरित होकर पाप का आचरण करता है
॥36॥
भगवद गीता अध्याय: 3
श्लोक 37
श्लोक:
श्रीभगवानुवाच काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः।
महाशनो महापाप्मा विद्धयेनमिह वैरिणम्॥
भावार्थ:
श्री भगवान बोले- रजोगुण से उत्पन्न हुआ यह काम ही क्रोध है। यह बहुत खाने वाला अर्थात भोगों से कभी न अघानेवाला और बड़ा पापी है। इसको ही तू इस विषय में वैरी जान
॥37॥
भगवद गीता अध्याय: 3
श्लोक 38
श्लोक:
धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च।
यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम्॥
भावार्थ:
जिस प्रकार धुएँ से अग्नि और मैल से दर्पण ढँका जाता है तथा जिस प्रकार जेर से गर्भ ढँका रहता है, वैसे ही उस काम द्वारा यह ज्ञान ढँका रहता है
॥38॥
भगवद गीता अध्याय: 3
श्लोक 39
श्लोक:
आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा।
कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च॥
भावार्थ:
और हे अर्जुन! इस अग्नि के समान कभी न पूर्ण होने वाले काम रूप ज्ञानियों के नित्य वैरी द्वारा मनुष्य का ज्ञान ढँका हुआ है
॥39॥
भगवद गीता अध्याय: 3
श्लोक 40
श्लोक:
इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते।
एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम्॥
भावार्थ:
इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि- ये सब इसके वासस्थान कहे जाते हैं। यह काम इन मन, बुद्धि और इन्द्रियों द्वारा ही ज्ञान को आच्छादित करके जीवात्मा को मोहित करता है।
॥40॥
भगवद गीता अध्याय: 3
श्लोक 41
श्लोक:
तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ।
पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम्॥
भावार्थ:
इसलिए हे अर्जुन! तू पहले इन्द्रियों को वश में करके इस ज्ञान और विज्ञान का नाश करने वाले महान पापी काम को अवश्य ही बलपूर्वक मार डाल
॥41॥
भगवद गीता अध्याय: 3
श्लोक 42
श्लोक:
इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः।
मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः॥
भावार्थ:
इन्द्रियों को स्थूल शरीर से पर यानी श्रेष्ठ, बलवान और सूक्ष्म कहते हैं। इन इन्द्रियों से पर मन है, मन से भी पर बुद्धि है और जो बुद्धि से भी अत्यन्त पर है वह आत्मा है
॥42॥
भगवद गीता अध्याय: 3
श्लोक 43
श्लोक:
एवं बुद्धेः परं बुद्धवा संस्तभ्यात्मानमात्मना।
जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्॥
भावार्थ:
इस प्रकार बुद्धि से पर अर्थात सूक्ष्म, बलवान और अत्यन्त श्रेष्ठ आत्मा को जानकर और बुद्धि द्वारा मन को वश में करके हे महाबाहो! तू इस कामरूप दुर्जय शत्रु को मार डाल
॥43॥
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मयोगो नाम तृतीयोऽध्यायः
॥3॥
तीसरा कर्म योग का अध्याय समाप्त
जाए श्री कृष्णा जय श्री राम
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